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भोपाल टॉकीज तक ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार, काली माता मंदिर से 6 जंक्शन होंगे री-डिजाइन

भोपाल भोपाल शहर में ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए एक अहम कदम उठाया गया है। तलैया स्थित काली माता मंदिर से तीन मोहारा तक करीब 3.2 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर पर ट्रैफिक सुधार की नई योजना पर काम शुरू हो गया है। इस योजना के तहत काली माता मंदिर तिराहा से भोपाल टॉकीज चौराहे के बीच आने वाले 6 प्रमुख जंक्शनों (3 चौराहे और 3 तिराहे) को नए सिरे से डिजाइन किया जाएगा। विस्तृत प्लान पुलिस कमिश्नर के सामने प्रस्तुत किया गया इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा ट्रैफिक पुलिस ने School of Planning and Architecture (SPA) के साथ मिलकर तैयार की है। सोमवार को यह विस्तृत प्लान पुलिस कमिश्नर के सामने प्रस्तुत किया गया, जिसमें हर जंक्शन की मौजूदा समस्याओं और उनके समाधान को चिन्हित किया गया है। इस कॉरिडोर में भोपाल टॉकीज, नादरा बस स्टैंड, अल्पना, संगम, भारत टॉकीज और काली माता तिराहा जैसे व्यस्त जंक्शन शामिल हैं। ट्रायल में सामने आई असली समस्या हमीदिया रोड स्थित भोपाल टॉकीज चौराहे पर किए गए ट्रायल के दौरान यह पाया गया कि ट्रैफिक जाम की मुख्य वजह सड़क की चौड़ाई की कमी नहीं, बल्कि सड़क का गलत उपयोग और खामीपूर्ण डिजाइन है। ट्रायल के दौरान लेन डिसिप्लिन, स्टॉप लाइन और टर्निंग स्पेस में बदलाव कर ट्रैफिक फ्लो को बेहतर बनाया गया। जंक्शनों पर होंगे ये प्रमुख बदलाव नई डिजाइन के तहत ट्रैफिक मूवमेंट को ध्यान में रखते हुए कई सुधार किए जाएंगे:     स्टॉप लाइन, जेब्रा क्रॉसिंग और टर्निंग एंगल में सुधार     अनावश्यक कट और अवैध पार्किंग हटाई जाएगी     पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित फुटपाथ विकसित किए जाएंगे बाजार क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती कॉरिडोर के दोनों ओर घनी कमर्शियल गतिविधियों के कारण ट्रैफिक और पार्किंग का संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। इस समस्या के समाधान के लिए योजना में सड़क किनारे पार्किंग के साथ-साथ जरूरत के अनुसार मल्टीलेवल पार्किंग की व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई है। यह पहल शहर में ट्रैफिक मैनेजमेंट को आधुनिक और सुगम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।  

प्यास से बेहाल डिंडौरी: गंदे नाले का पानी पीने को मजबूर लोग, प्रशासन के सामने छलका गुस्सा

 डिंडौरी आदिवासी बहुल जिले डिंडौरी में जलसंकट इस कदर गहरा गया है कि ग्रामीण बूंद बूंद पानी के लिए भी तरस रहे है। पानी की समस्या को लेकर ग्रामीण चक्का जाम का रास्ता भी अपना रहे हैं। विभागीय अधिकारियों सहित कलेक्टर तक भी शिकायत पहुंच रही है। इसी क्रम में मंगलवार को कलेक्टर की जनसुनवाई में दो गांवों के ग्रामीण खाली बर्तन लेकर पहुंचे और पानी की समस्या का हल करने के गुहार लगाई। जनपद मेहंदवानी के ग्राम चौबीसा और जरगुड़ा में जलसंकट गहराने से ग्रामीणों को पीने के लिए भी बमुश्किल पानी मिल पा रहा है। एक किलोमीटर दूर नाला का पानी कर रहे उपयोग जनसुनवाई में पहुंचे ग्राम पंचायत चौबीसा रैयत के सकरीटोला की महिलाओं ने बताया कि गांव में लगभग एक सैकड़ा परिवार जलसंकट से जूझ रहे है। नल जल योजना से पाइप लाइन भी नहीं बिछ पाई है। गांव में चार हैंडपंप है लेकिन तीनों सूख चुके है। एक कुंआ भी है, जिसमें पानी नहीं है। ऐसी स्थिति में करीब एक किलोमीटर दूर नाला से पानी लाकर जीविकोपार्जन करना पद रहा है। समस्या को लेकर ग्राम पंचायत सरपंच, सचिव को कई बार अवगत कराए जाने के बाद भी अभी तक कोई कार्यवाही नही की गई है। त्रस्त होकर ग्रामीण शिकायत करने जनसुनवाई में पहुंच गए। कुआं का गंदा पानी पीने मजबूर जरगुड़ा के ग्रामीण इसी तरह मेहंदवानी जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत जरगुड़ा के पोषक ग्राम घांघारी टोला के दर्जनों ग्रामीण खाली बर्तन लेकर जनसुनवाई में पहुंचे और पानी की शिकायत की। महिलाओं ने बताया कि घांघारी टोला की जनसंख्या लगभग 500 के आसपास है। गांव में नल जल योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है। गांव में एक हैंडपंप है लेकिन उससे मटमैला पानी निकलता है। वहीं एक कुआं है जिसका दूषित पानी ग्रामीण पीने मजबूर हैं। काफी मशक्कत से मिल पाता है एक बाल्टी ही पानी ग्रामीणों ने बताया कि हैंडपंप में सुबह से लाइन लगाने के बाद काफी मशक्कत से एक बाल्टी ही पानी मिल पाता है। समस्या को लेकर ग्राम पंचायत के जिम्मेदारों सहित जनपद और पीएचई विभाग में भी ग्रामीणों द्वारा लिखित तौर पर शिकायत की गई है। इसके बाद भी अभी तक कोई पहल न होने से मजबूर होकर ग्रामीण खाली बर्तन लेकर जनसुनवाई में पहुंच गए।  

TESLA का नया सुपरचार्जर, 15 मिनट में इलेक्ट्रिक कार पूरी तरह होगी चार्ज

 नई दिल्ली अमेरिकी इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी Tesla ने पिछले साल जुलाई में अपनी पहली इलेक्ट्रिक कार मॉडल वाई को भारत में लॉन्च किया था. अब कंपनी ने नवी मुंबई में अपना नया चार्जिंग स्टेशन शुरू किया है. भारत में ये टेस्ला का पांचवा चार्जिंग स्टेशन है. ख़ास बात ये है कि ये नया सुपर चार्जिंग स्टेशन मॉल के अंदर लगाया गया है, इससे अब लोग शॉपिंग के साथ-साथ अपनी कार भी आसानी से चार्ज कर सकेंगे।  कंपनी द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार टेस्ला का यह नया सुपरचार्जर मुंबई के नेक्सस सीवुड्स मॉल में लगाया गया है. ये कंपनी का पहला इन-मॉल चार्जिंग स्टेशन है. इससे पहले कंपनी ने इंडिया में किसी मॉल के अंदर चार्जिंग फेसिलिटी शुरू नहीं की थी. इस नई फेसिलिटी में कुल 8 चार्जर लगाए गए हैं, जिससे आसपास के Tesla कार मालिकों को बड़ी राहत की उम्मीद है. यह चार्जिंग स्टेशन मॉल के B1 पार्किंग एरिया में लगाया गया है।  टेस्ला पहले से गुरुग्राम, दिल्ली, और मुंबई में अपने चार्जिंग स्टेशन लगा चुका है. अब कंपनी पूरे देश में अपने Supercharger नेटवर्क को तेजी से बढ़ा रही है. खास बात यह है कि कंपनी ऐसे लोकेशन की तलाश में है, जहां लोग आमतौर पर समय बिताते हैं, जैसे मॉल, हाईवे रेस्ट स्टॉप और फूड कोर्ट इत्यादि. ताकि कार को खड़ी चार्जिंग करना आसान हो।  पावरफुल चार्जिंग की सुविधा इस नए स्टेशन पर 4 V4 सुपरचार्जर (डीसी चार्जिंग) लगाए गए हैं. जिनकी स्पीड 250 kW तक है. इसके अलावा चार डेस्टिनेशन चार्जर भी लगाए गए हैं, जो 11 kW की पावर देते हैं. यानी यूजर अपनी जरूरत के हिसाब से चार्जिंग का विकल्प चुन सकते हैं. कंपनी का दावा है कि सुपरचार्जर की मदद से Model Y इलेक्ट्रिक कार को सिर्फ 15 मिनट में लगभग इतना चार्ज किया जा सकता है कि, यूजर को 275 किलोमीटर तक की रेंज मिलेगी।  Tesla ऐप से पूरा कंट्रोल Tesla के मोबाइल ऐप के जरिए यूजर्स आसानी से नजदीकी चार्जिंग स्टेशन ढूंढ सकते हैं, बैटरी को पहले से तैयार कर सकते हैं, चार्जिंग स्टेटस देख सकते हैं और पेमेंट भी कर सकते हैं. यह पूरा सिस्टम एक ही जगह पर उपलब्ध है. इस नए स्टेशन के साथ Tesla के भारत में अब कुल 4 चार्जिंग स्टेशन हो गए हैं. जिसमें 20 सुपरचार्जर और 14 डेस्टिनेशन चार्जर शामिल हैं।  चार्जिंग स्टेशन के साथ ही नेक्सस सीवुड्स मॉल के एट्रियम में Tesla ने एक पॉप-अप स्टोर भी शुरू किया है. यहां लोग कंपनी की कारों को करीब से देख सकते हैं, टेस्ट ड्राइव ले सकते हैं और नई तकनीक को समझ सकते हैं. Model Y की शुरुआती कीमत 59.89 लाख रुपये है. साथ ही कंपनी होम चार्जिंग की सुविधा भी दे रही है। 

10 अप्रैल से टोल प्लाजा पर कैश नहीं चलेगा, UPI पेमेंट पर 1.25 गुना अधिक चार्ज

नई दिल्ली देश के टोल प्लाजा पर होने वाले पेमेंट सिस्टम में नए बदलाव होने जा रहे हैं। दरअसल, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने बताया कि 10 अप्रैल से नेशनल हाईवे पर यात्रियों के लिए टोल प्लाजा पर कैश पेमेंट बंद कर दिया जाएगा। एक गजट नोटिफिकेशन में मंत्रालय ने कहा है कि जिन मामलों में कोई गाड़ी बिना वैलिड FASTag के किसी फीस प्लाजा में घुसती है, तो यूजर फिर भी यूनफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) के जरिए पेमेंट कर सकते हैं, लेकिन उन्हें लागू टोल फीस से 1.25 गुना ज्यादा चार्ज देना होगा। यानी जिस टोल पर 100 रुपए लगते हैं, वहां UPI करने पर 125 रुपए देने होंगे। NHAI के एक सीनियर अधिकारी ने बताया कि इस कदम का मकसद टोल गेट पर लगने वाली लंबी कतारों को कम करना और यात्रियों के लिए हाईवे पर सफर को ज्यादा आसान बनाना है। अधिकारी ने कहा कि 10 अप्रैल से टोल बूथ पर कैश पेमेंट स्वीकार नहीं किया जाएगा। टोल कलेक्शन का मुख्य तरीका FASTag ही रहेगा, जबकि UPI उन गाड़ियों के लिए पेमेंट का दूसरा ऑप्शन होगा, जो बिना वैलिड FASTag के आती हैं। या फिर किसी अन्य वजह से FASTag से पेमेंट नहीं होता। MoRTH के नोटिफिकेशन के मुताबिक, "अगर किसी गाड़ी का यूजर बिना FASTag या बिना किसी वैलिड और काम कर रहे FASTag के (जैसा भी मामला हो) किसी फीस प्लाजा से गुजरता है और UPI के जरिए फीस देने का विकल्प चुनता है, तो उसे नियम 4 के उप-नियम (2) के प्रावधानों के मुताबिक, उस कैटेगरी की गाड़ी पर लागू यूजर फीस का 1.25 गुना पेमेंट करना होगा। यदि गाड़ी का मालिक या ड्राइवर इस नियम के तहत बताए गए तरीके से फीस देने का ऑप्शन नहीं चुनता है, तो ऐसी गाड़ी के साथ नियम 14 के मुताबिक कार्रवाई की जाएगी।" FASTag एनुअल पास भी महंगा हुआ नेशनल हाईवे के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने FASTag एनुअल पास को भी महंगा कर दिया है। फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए इस पास की कीमत बढ़ाकर 3,075 रुपए कर दी गई है। यह बदलाव 1 अप्रैल, 2026 से लागू हो चुका है। पहले इस पास की कीमत 3,000 रुपए थी। इस पास को 6 महीने के अंदर 50 लाख से ज्यादा यूजर्स ने एक्टिव कराया था। इस दौरान 26.55 करोड़ से ज्यादा ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड किए गए हैं। NHAI ने बताया था कि नेशनल हाईवे (NH) नेटवर्क पर होने वाले कुल कार ट्रांजैक्शन में से लगभग 28% अब FASTag एनुअल पास के जरिए किए जा रहे हैं, जो नेशनल हाईवे यूजर्स के बीच FASTag एनुअल पास की बढ़ती पसंद को दिखाता है। FASTag एनुअल पास क्या है? सबसे पहले समझते हैं कि FASTag एनुअल पास क्या है? तो ये सालाना टोल पास एक तरह की प्रीपेड टोल स्कीम है, जिसे खास तौर से कार, जीप और वैन जैसे नॉन-कमर्शियल प्राइवेट व्हीकल के लिए तैयार किया गया है। नए पास की घोषणा करते समय नितिन गडकरी ने कहा था कि इसका उद्देश्य 60 किलोमीटर के दायरे में स्थित टोल प्लाजा से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही चिंताओं को दूर करना और सिंगल, अफॉर्जेबल लेनदेन के माध्यम से टोल भुगतान को सरल बनाना है। टोल प्लाजा पर वेटिंग टाइम को कम करके, भीड़भाड़ को कम करके और विवादों को कम करके, वार्षिक पास का उद्देश्य लाखों प्राइवेट व्हीकल ओनर्स के लिए एक फास्ट और आसान यात्रा का अनुभव देना है। खास बात ये है कि इसके लिए लोगों को नया टैग खरीदने के की जरूरत नहीं है, बल्कि ये आपके मौजूदा FASTag से जुड़ जाएगा। इसकी कंडीशन ये है कि आपका मौदूजा FASTag एक्टिव होना चाहिए और आपके व्हीकल रजिस्ट्रेशन नंबर से जुड़ा हो। यह योजना केवल NHAI और सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर लागू होगा। इसके लिए बार-बार ऑनलाइन रिचार्ज करने की आवश्यकता नहीं है, जिससे यह डेली पैसेंजर्स के लिए विशेष रूप से उपयोगी है। यह पास नॉन-ट्रांसफरेबल है। इसे सिर्फ रजिस्टर्ड व्हीक के साथ ही इस्तेमला कर पाएंगे। FASTag एनुअल पास कहां काम करेगा? FASTag एनुअल पास केवल NHAI द्वारा ऑपरेटेड राष्ट्रीय राजमार्गों (NH) और राष्ट्रीय एक्सप्रेसवे (NE) पर स्थित टोल प्लाजा पर ही काम करता है। जैसे, दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, मुंबई-नासिक, मुंबई-सूरत और मुंबई-रत्नागिरी मार्ग आदि। राज्य राजमार्गों या नगरपालिका टोल सड़कों पर आपका FASTag सामान्य रूप से काम करेगा और टोल सामान्य रूप से वसूला जाएगा। जैसे, मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे, मुंबई-नागपुर एक्सप्रेसवे (समृद्धि महामार्ग), अटल सेतु, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, बेंगलुरु-मैसूर एक्सप्रेसवे और अहमदाबाद-वडोदरा एक्सप्रेसवे। ये सभी राज्य प्राधिकरणों द्वारा संचालित होते हैं। ऐसे एक्टिवेट करें फास्टैग एनुअल पास FASTag एनुअल पास एक्टिवेट करने को लेकर इंडियन हाईवे मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड (IHMCL) की तरफ एक नोटिफिकेशस जारी किया गया है। IHMCL ने नोटिफिकेशन में इस एनुअल पास से जुड़े सभी सवालों के जवाब दिए गए हैं। साथ ही, फास्टैग के एनुअल पास को एक्टिवेट करने का तरीका भी बताया है। IHMCL के मुताबिक, FASTag एनुअल पास को सिर्फ Rajmargyatra (राज मार्ग यात्रा) मोबाइल ऐप और NHAI पोर्टल पर जाकर ही एक्टिवेट किया जा सकेगा। इस पास को एक्टिवेट करने के लिए कार चालक को पहले अपने व्हीकल और उसके ऊपर लगे FASTag की एलिजिबिलिटी को वेरिफाई करना होगा। एक बार वेरिफिकेशन्स कंप्लीट होने के बाद 3,075 रुपए का पमेंट करना होगा। यूजर द्वारा किया गया 3,075 रुपए की पेमेंट कंफर्मेशन होने के बाद 2 घंटे के अंदर FASTag एनुअल पास एक्टिवेट हो जाएगा। यह एक्टिवेशन आपके मौजूदा फास्टैग पर ही होगा। FASTag एनुअल पास के लिए आपको न्यू फास्टैग खरीदने की जरूरत नहीं है। फास्टैग एनुअल पास पर पेमेंट करने से अगले 1 साल तक या फिर 200 टोल पार करने तक की वैलिडिटी मिलेगी।  

धार भोजशाला केस: हिंदू पक्ष ने पेश किए मंदिर होने के सबूत, हवन कुंड और मूर्तियों का किया जिक्र

 धार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में धार की विवादित भोजशाला को लेकर नियमित सुनवाई शुरू हुई. जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच के सामने हिंदू पक्ष ने कड़ा तर्क दिया कि यह स्मारक कभी मस्जिद था ही नहीं, बल्कि यह राजा भोज द्वारा निर्मित वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है।  'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी, ''ASI की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट साफ बताती है कि वर्तमान ढांचा मंदिर के अवशेषों और स्तंभों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया है।  परिसर में आज भी संस्कृत श्लोकों वाले शिलालेख, हवन कुंड, मंडप और हिंदू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां मौजूद हैं. यह ढांचा 1034 ईस्वी में परमार राजा भोज ने बनाया था. आक्रमणकारियों ने प्रतीकों को मिटाने के बावजूद मूल चरित्र आज भी जीवंत है।  ASI के नियमों के अनुसार, किसी भी संरक्षित स्मारक का मूल धार्मिक स्वरूप बदला नहीं जा सकता, इसलिए यहां सिर्फ हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।  मुस्लिम पक्ष का विरोध और आपत्तियां तकरीबन 2 घंटे तक चली सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे एक वकील ने अनुरोध किया कि हिंदू समुदाय की याचिका के समर्थन में पेश किए गए सभी दस्तावेजों की प्रतियां उन्हें भी उपलब्ध कराई जाएं। हाई कोर्ट ने इस अनुरोध को मंजूर करते हुए मौखिक रूप से कहा कि दलीलें पूरी होने के बाद, इस मामले से जुड़े सभी पक्ष अपनी आपत्तियां पेश कर सकते हैं, जिन पर कोर्ट विचार करेगा. डिवीजन बेंच ने कहा कि वह मंगलवार को भी इस मामले की सुनवाई जारी रखेगी।  क्या कहती है ASI की रिपोर्ट? बता दें कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद ASI ने दो साल पहले विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था और एक रिपोर्ट पेश की थी. 2000 से ज्यादा पन्नों की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मस्जिद से पहले, धार के परमार राजाओं के शासनकाल का एक विशाल ढांचा वहां मौजूद था और मौजूदा विवादित ढांचा मंदिर के ही हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया था।  यह ध्यान देने लायक बात है कि परमार राजाओं ने 9वीं सदी से लेकर 400 सालों तक मध्य-पश्चिमी भारत के मालवा के आस-पास के एक बड़े इलाके पर राज किया था।  मुस्लिम पक्ष का विरोध और आपत्तियां मुस्लिम पक्ष ने ASI के सर्वेक्षण पर सवाल उठाए हैं और हिंदू पक्ष के इस दावे को खारिज कर दिया है कि भोजशाला परिसर असल में एक मंदिर था।  इसके अलावा, मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि ASI ने उनकी पिछली आपत्तियों को नजरअंदाज किया और सर्वेक्षण में विवादित परिसर के अंदर 'चोर दरवाजजे से रखी गई चीजों' को भी शामिल कर लिया।  ASI के 7 अप्रैल 2003 के आदेश के मुताबिक, हिंदुओं को हर मंगलवार को इस परिसर में पूजा करने की इजाजत है, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति है। 

40 लाख आवारा पशुओं को मिलेगा 12 अंकों का कोड, मध्य प्रदेश में केसरिया टैग से होगी पहचान

भोपाल मध्य प्रदेश की सड़कों और खेतों में घूम रहे करीब 40 लाख आवारा पशुओं की पहचान अब दूर से ही हो सकेगी। केंद्र सरकार ने राज्य के उस प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है, जिसके तहत आवारा मवेशियों के कान पर 12 अंकों वाला केसरिया या लाल रंग का पहचान टैग लगाया जाएगा। अब तक सभी पशुओं को पीले रंग के टैग लगाए जाते थे, जिससे पालतू और लावारिस पशुओं के बीच फर्क करना मुश्किल होता था। पहचान का नया डिजिटल फॉर्मूला अपर मुख्य सचिव (पशुपालन) उमाकांत उमराव के मुताबिक, अधिकारियों को फील्ड में मवेशियों के प्रबंधन में काफी दिक्कतें आ रही थीं। नए रंगों के कोड से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाले दस्ते बिना स्कैन किए यह समझ पाएंगे कि कौन सा पशु आवारा है और कौन सा किसी डेयरी या घर का है। यह पूरी कवायद भारत पशुधन परियोजना का हिस्सा है, जिसमें हर मवेशी का अपना एक डिजिटल डेटाबेस होगा। हादसों और मुआवजे का गणित राज्य विधानसभा में पेश आंकड़े बताते हैं कि आवारा मवेशी अब जानलेवा साबित हो रहे हैं। पिछले दो साल में पशुओं की वजह से हुए 237 सड़क हादसों में 94 लोगों की मौत हो चुकी है। यानी हर तीसरे दिन सड़क पर एक व्यक्ति अपनी जान गंवा रहा है। किसानों की दोहरी मार एक तरफ सड़कों पर हादसे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ खरीफ सीजन में किसान पूरी रात खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आवारा पशुओं द्वारा फसल बर्बादी पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने सदन में बताया कि विभाग के पास नुकसान का सटीक आंकड़ा फिलहाल मौजूद नहीं है। मौजूदा व्यवस्था में पीले टैग की वजह से पालतू और आवारा पशुओं के बीच अंतर करना कठिन था। हमने रंगों में बदलाव का प्रस्ताव दिया था जिसे केंद्र ने स्वीकार कर लिया है। अब केसरिया या लाल टैग से प्रबंधन तेज़ और सटीक होगा। अभी लगाए जाते हैं पीले टैग पशुपालन विभाग के अपर मुख्य सचिव उमाकांत उमराव ने बताया कि मौजूदा व्यवस्था में सभी मवेशियों को पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं, जिससे यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा पशु किसी किसान का है और कौन सा आवारा है. उमराव ने कहा, "अभी सभी मवेशियों पर पीले रंग के टैग लगाए जाते हैं। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कौन सा पशु पालतू है और कौन आवारा. इसलिए राज्य सरकार ने आवारा मवेशियों के लिए केसरिया या लाल जैसे अलग रंग के टैग का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था।  इस योजना के तहत गोशालाओं में रहने वाले या सड़कों पर घूमने वाले हर आवारा या परित्यक्त पशु को भारत पशुधन परियोजना के तहत 12 अंकों का एक विशिष्ट पहचान टैग दिया जाएगा. यह परियोजना राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य देश के पशुधन का डिजिटल डाटाबेस तैयार करना है।  स्कैन से तुरंत पता चलेगा पशु के बारे में अधिकारियों के अनुसार, रंग-कोड वाले टैग से नगर निगम और मवेशी पकड़ने वाली टीमों को बिना स्कैन किए ही तुरंत यह पता चल सकेगा कि पशु आवारा है या पालतू. इससे मवेशियों के प्रबंधन की प्रक्रिया और तेज और प्रभावी होने की उम्मीद है।  कानून क्या कहता है? मध्य प्रदेश में मवेशियों को लावारिस छोड़ना गौ-वध प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत अपराध है। इसके अलावा नगर निगम कानून के तहत मालिक पर पहली बार 200 रुपये और तीसरी बार पकड़े जाने पर 1,000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना के तहत एनजीओ के माध्यम से लाखों पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है, लेकिन सड़कों पर संख्या अब भी चुनौती बनी हुई है। किसान लगातार कर रहे हैं शिकायत दूसरी ओर कई जिलों के किसान लगातार शिकायत कर रहे हैं कि आवारा मवेशी उनकी खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, खासकर खरीफ के मौसम में. कई किसानों को रात-रात भर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है।  फसलों को हो रहे नुकसान के बावजूद सरकार ने यह स्वीकार किया है कि फिलहाल किसानों को ऐसी क्षति के लिए कोई मुआवजा देने की व्यवस्था नहीं है. शीतकालीन सत्र के दौरान पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने विधानसभा में बताया था कि विभाग आवारा मवेशियों से होने वाले फसल नुकसान का अलग से कोई आंकड़ा नहीं रखता और इसके लिए वित्तीय सहायता देने का कोई प्रस्ताव भी विचाराधीन नहीं है।  पिछले साल पकड़े गए इतने आवारा पशु समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2025 में ही प्रदेश में 78,153 आवारा मवेशियों को पकड़ा गया. अपने पशु वापस लेने वाले मालिकों से कुल 25.58 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना वसूला गया।  मवेशियों को छोड़ देना गोहत्या प्रतिषेध अधिनियम 2004 के तहत दंडनीय अपराध है. वहीं, नगर निगम अधिनियम 1956 में संशोधन के बाद ऐसे मामलों में पहली बार 200 रुपये, दूसरी बार 500 रुपये और तीसरी बार 1000 रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. साथ ही पशु को हिरासत में रखने के दौरान मालिक को प्रतिदिन 150 रुपये चारे के खर्च के रूप में भी देना होता है।  राज्य की गोशाला में बढ़ रहा दवाब इधर, राज्य की गोशाला व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है. मुख्यमंत्री गौसेवा योजना के तहत एनजीओ और स्थानीय निकायों के साथ मिलकर प्रदेश की पंजीकृत गोशालाओं में फिलहाल करीब 4.5 लाख मवेशी रखे गए हैं. इनके रखरखाव के लिए राज्य सरकार ने वर्ष 2025-26 के बजट में 296.20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है।  क्या ह रहे अधिकारी अधिकारियों का कहना है कि इस समस्या की जड़ मवेशियों की कम उत्पादकता भी है. पशुधन गणना के अनुसार प्रदेश में लगभग 70 प्रतिशत गायें कम दूध देने वाली नॉन-डिस्क्रिप्ट नस्ल की हैं, जिनमें से कई आधा लीटर से भी कम दूध देती हैं. जब ऐसे पशु दूध देना बंद कर देते हैं तो कई बार उन्हें छोड़ दिया जाता है और वे सड़कों या खेतों में भटकते हुए दिखाई देते हैं।  इसी समस्या को कम करने के लिए राज्य सरकार क्षीरधारा ग्राम योजना के तहत नस्ल सुधार कार्यक्रम चला रही है. इसके … Read more

ग्वालियर-आगरा का सफर होगा महज 50 मिनट में, केंद्रीय मंत्री ने हाईस्पीड कॉरिडोर से आर्थिक विकास का दिया भरोसा

ग्वालियर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर-आगरा एक्सप्रेस-वे निर्माण कार्य का निरीक्षण करते हुए बड़ा दावा किया कि इस हाईस्पीड कॉरिडोर के बनते ही ग्वालियर से आगरा की दूरी महज 45 से 50 मिनट में सिमट जाएगी। करीब 5500 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा यह 6 लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की कनेक्टिविटी और आर्थिक विकास को नई गति देगा। निरीक्षण के दौरान जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट और ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर भी मौजूद रहे। यातायात तेज और सुरक्षित सिंधिया ने कहा कि देश में तेजी से विकसित हो रहा आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर आर्थिक प्रगति की मजबूत आधारशिला बन रहा है। उन्होंने कहा, ग्वालियर-आगरा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे (MP News Gwalior Agra high Speed Corridor) वर्तमान मार्ग से करीब 32 किलोमीटर छोटा होगा और कुल दूरी लगभग 88 किलोमीटर रह जाएगी। मौजूदा 2 लेन सडक़ को अपग्रेड कर 6 लेन हाईस्पीड कॉरिडोर बनाया जा रहा है, जहां न्यूनतम गति 100 किमी प्रति घंटा निर्धारित की गई है। कॉरिडोर में सीमित एंट्री-एग्जिट के साथ कुल 4 इंटरचेंज बनाए जाएंगे, जिससे यातायात तेज और सुरक्षित रहेगा। सिंधिया ने कहा कि अब दो-लेन सड़क को अपग्रेड करके छह-लेन हाई-स्पीड कॉरिडोर बनाया जाएगा, जिसमें न्यूनतम गति 100 किमी/घंटा होगी. आगरा से ग्वालियर का सफर अभी 2.5-3 घंटे में पूरा होता है, लेकिन एक्सप्रेस-वे बनने के बाद सिर्फ 45-50 मिनट में पूरा होगा. केंद्रीय मंत्री ने बताया कि लगभग तीन साल में ये एक्सप्रेस-वे जनता के लिए खोल दिया जाएगा।  आधुनिक सुविधाओं वाला होगा नया एक्सप्रेस-वे सिंधिया ने कहा कि नया एक्सप्रेस-वे पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं वाला बन रहा है. इसमें सिर्फ चार मुख्य एंट्री-एक्जिट पॉइंट होंगे, जिससे ट्रैफिक में कोई दिक्कत नहीं आएगी. हाई-स्पीड कॉरिडोर बिना रुकावट चलेगा. लोग तेज और आराम से सफर कर सकेंगे. केंद्रीय मंत्री ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में चंबल नदी पर नया छह-लेन का पुल बनाया जाएगा. यह पुल सबसे आधुनिक तकनीक से बनेगा और डिजाइन में दुनिया के बेहतरीन पुलों जैसा होगा।  उन्होंने कहा कि इसके साथ ही शिवपुरी को जोड़ने के लिए लगभग 28 किलोमीटर लंबा पश्चिमी बाईपास भी डेवलप किया जा रहा है, जिसकी लागत लगभग 1,400 करोड़ रुपये है. इससे दिल्ली, ग्वालियर, शिवपुरी और गुना के बीच यात्रा आसान और तेज होगी।  600 करोड़ रुपये की लागत से नया आधुनिक रेलवे स्टेशन बनेगा केंद्रीय मंत्री ने बताया कि ग्वालियर-आगरा एक्सप्रेस-वे और पश्चिमी बाईपास मिलाकर लगभग 7,000 करोड़ की परियोजनाएं क्षेत्र को मिली हैं. इसके अलावा ग्वालियर में 600 करोड़ रुपये की लागत से नया आधुनिक रेलवे स्टेशन भी बन रहा है. उन्होंने कहा कि इन प्रोजेक्ट्स से पूरे ग्वालियर-चंबल इलाके का कायाकल्प होगा और यहां निवेश, रोजगार और व्यापार के नए मौके लोगों को मिलेंगे।  आधुनिक तकनीक से तैयार होगा 6 लेन का विश्वस्तरीय ब्रिज उन्होंने कहा, परियोजना के तहत चंबल नदी पर आधुनिक तकनीक से 6 लेन का विश्वस्तरीय ब्रिज बनाया जाएगा। साथ ही शिवपुरी को जोडऩे के लिए लगभग 28 किलोमीटर लंबा पश्चिमी बायपास विकसित किया जा रहा है, जिसकी लागत करीब 1400 करोड़ रुपए है। इससे दिल्ली, ग्वालियर, शिवपुरी और गुना के बीच आवागमन और अधिक सुगम होगा। 7000 करोड़ के प्रोजेक्ट से बदलेगी तस्वीर सिंधिया ने कहा, हाईस्पीड कॉरिडोर (MP News Gwalior Agra high Speed Corridor) और पश्चिमी बायपास को मिलाकर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र को करीब 7000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट मिले हैं। इसके अलावा ग्वालियर में 600 करोड़ रुपए की लागत से आधुनिक रेलवे स्टेशन का निर्माण भी जारी है। इन प्रोजेक्ट्स के पूरा होने पर क्षेत्र में निवेश, व्यापार और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।  

अलादीन का चिराग मिला भारत को! 50 अरब का प्रोजेक्ट 90 करोड़ में, 700 साल तक होगा चकाचक

बेंगलुरु  ईरान जंग की वजह से पूरी दुनिया में बेचैनी है. कच्चे तेल के दाम बढ़ने से हर तरफ महंगाई बढ़ रही है. अमेरिका से लेकर नेपाल तक हर मुल्क की जनता परेशान है. भारत भी इस जंग के असर से अछूता नहीं है. लेकिन, इस भारत के हाथ अलादीन का चिराग लग गया है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा की है. अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस अलादीन के चिराग के दम पर भविष्य में भारत एक जगमगाता सितारा बन जाएगा. भारत को अरब देशों या रूस से तेल पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।  दरअसल, हम बात कर रहे हैं फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर की. कल्पक्कम में सोमवार को भारत ने इस टेक्नोलॉजी को हासिल करने की आधिकारिक घोषणा कर दी. फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर एक बेहद जटिल टेक्नोलॉजी है. पश्चिमी देश इस तकनीक को हासिल करने में नाकाम रहे हैं. इस तकनीक वाले न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम की जगह थोरियम का इस्तेमाल किया जाता है. और दुनिया के थोरियम भंडार का 25 फीसदी हिस्सा भारत में है. यानी इस तकनीक की बदौलत परमाणु बिजली के क्षेत्र में भारत की यूरेनियम पर निर्भरता खत्म हो जाएगी. भारत में यूरेनियम भंडार बहुत नगण्य है. इसके लिए भारत को रूस और ऑस्ट्रेलिया पर निर्भर रहना पड़ता है।  फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर और भारत का सफर भारत ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर की कल्पना 70 साल पहले की थी. जानेमाने वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा ने इस दिशा में काम शुरू किया था. तब से भारत इस तकनीक को हासिल करने में लगा था. दरअसल, दुनिया के सबसे अमीर छह देशों ने फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर्स तकनीक हासिल करने पर 50 बिलियन डॉलर (लगभग 4.25 लाख करोड़ रुपये) खर्च कर चुके हैं. लेकिन, असफलता के कारण एक-एक करके सभी ने प्रोजेक्ट छोड़ दिए. इस तकनीक को विकसित करने के लिए अमेरिका ने 15 बिलियन, जापान ने 12 बिलियन, ब्रिटेन ने 8 बिलियन, जर्मनी ने 6 बिलियन डॉलर खर्च कर दिए. फ्रांस और इटली भी भाग खड़े हुए. सबने कहा कि यह तकनीक हासिल करना बहुत मुश्किल और बहुत महंगा है।  लेकिन, भारत ने सिर्फ 90 करोड़ डॉलर (लगभग 7,700 करोड़ रुपये) में अपना पहला कमर्शियली वायबल प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित कर लिया. ऐसा करने वाला भारत, रूस और चीन के बाद तीसरा देश है. वर्ष 2004 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ प्रोजेक्ट था. शुरुआती बजट 42 करोड़ डॉलर का था. अब 22 साल बाद दर्जनों बार डेडलाइन खत्म होने और लागत दोगुनी होने के बाद भारत के हाथ सफलता लगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे सिविल न्यूक्लियर के सफर में एक अहम कदम बताया है।  भारत क्यों नहीं छोड़ा ये प्रोजेक्ट? कारण बहुत सीधा है. भारत के पास दुनिया के यूरेनियम रिजर्व का सिर्फ 1-2 फीसदी भंडार है. ऐसे में 1.4 अरब लोगों वाले देश के लिए पारंपरिक न्यूक्लियर फ्यूल पर निर्भर रहना खुदकुशी करने जैसा है. दूसरी तरफ भारत के पास दुनिया के थोरियम रिजर्व का 25 फीसदी हिस्सा है. पृथ्वी पर किसी भी एक देश के पास इतना बड़ा भंडार नहीं है. परमाणु ऊर्जा विभाग के अनुसार, भारत में करीब एक करोड़ टन मोनाजाइट है, जिसमें 9,63,000 टन थोरियम ऑक्साइड भरा हुआ है. समस्या यह है कि थोरियम को यूरेनियम की तरह सीधे नहीं जलाया जा सकता. 1950 के दशक में डॉ. होमी भाभा ने इसी समस्या का हल निकाला. उन्होंने तीन चरणों वाला न्यूक्लियर प्रोग्राम बनाया।      पहला चरण: नेचुरल यूरेनियम को हेवी वाटर रिएक्टर्स में जलाओ, बाईप्रोडक्ट में प्लूटोनियम इकट्ठा करो।      दूसरा चरण: उस प्लूटोनियम को फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में डालो. यहां रिएक्टर न सिर्फ ज्यादा प्लूटोनियम पैदा करेगा, बल्कि थोरियम को फिसाइल यूरेनियम-233 में बदल देगा।      तीसरा चरण: थोरियम को बड़े पैमाने पर जलाओ।  कल्पक्कम का फास्ट ब्रीडर न्यूक्लियर रिएक्टर भारत को स्टेज-2 में ले आया है. भाभा के कागज पर बने प्लान के 70 साल बाद यह उपलब्धि हासिल हुई है।  थोरियम का गणित वर्तमान ऊर्जा खपत की दर से भारत के थोरियम रिजर्व देश को 700 साल से ज्यादा बिजली दे सकते हैं. जबकि ज्यादातर न्यूक्लियर देश यूरेनियम पर खेल रहे हैं, जिनके पास सिर्फ 80-100 साल का ईंधन बचा है. भारत पूरी तरह अलग गेम खेल रहा है. पश्चिमी देश इसलिए भागे क्योंकि यूरेनियम सस्ता मिलता रहा और सोडियम कूलेंट बहुत खतरनाक है. यह हवा के संपर्क में आते ही आग पकड़ लेता है और पानी के संपर्क में आते ही विस्फोट कर देता है. रूस के BN-600 में 1980-1997 के बीच 27 सोडियम लीक और 14 आग की घटनाएं घटीं. फिर भी रूस ने इसे नहीं छोड़ा. भारत ने सब देखा और आगे बढ़ता रहा. जब आपके पास यूरेनियम सिर्फ एक फीसदी हो और थोरियम 25 फीसदी तब इंजीनियरिंग की मुश्किलों का बहाना नहीं बना सकते है. यही बात भारत पर लागू होती है. इस प्रयोग में भारत को 700 साल की ऊर्जा सुरक्षा दिख रही है।  चीन कहां है? चीन भी थोरियम पर काम कर रहा है. उसने गोबी डेजर्ट में दो मेगावाट थोरियम मॉल्टन सॉल्ट रिएक्टर (TMSR-LF1) लगाया है. उसने 2023 में यह सफलता हासिल की. 2024 में थोरियम फ्यूल लोड किया और 2025 में थोरियम से यूरेनियम-233 ब्रिडिंग की सफलता हासिल की. चीन का लक्ष्य 2035 तक 100 मेगावाट डेमो रिएक्टर और 2040 तक कमर्शियल थोरियम रिएक्टर बनाने की है. लेकिन चीन अभी प्रयोगात्मक स्तर पर है, जबकि भारत ने 500 मेगावाट प्रोटोटाइप को विकसित कर लिया है. अगर चीन की तकनीक आगे बढ़ी तो भारत को फायदा होगा क्योंकि थोरियम की तकनीक में हम पहले से मजबूत हैं. लेकिन फिलहाल भारत ने स्टेज-2 में कदम रखकर दुनिया को दिखा दिया कि हम थोरियम के असली गेम प्लेयर हैं।  आगे क्या?