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इंदौर की किसान दीदी ने 600 बीघा खेत बचाए, पराली न जलाने की अलख जागृत की

सफलता की कहानी इंदौर की किसान दीदी ने जगाई पराली नहीं जलाने की अलख, 600 बीघा खेत बचाए भोपाल  उत्तर भारत में फसल कटाई के बाद पराली जलाने की समस्या लंबे समय से बनी हुई है लेकिन मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के धुलेट गांव में एक महिला किसान ने इस प्रवृति को बदलने की दिशा में मिसाल पेश की है। गांव की रहने वाली श्रीमती पपीता रावत ने न केवल किसानों को जागरूक किया, बल्कि वैकल्पिक समाधान देकर पराली जलाने पर रोक लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वयं सहायता समूह से शुरू हुआ सफर श्रीमती पपीता रावत, जो एक स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष है ने अपनी यात्रा आजीविका मिशन से जुड़कर शुरू की। शुरुआती आर्थिक तंगी के बीच उन्होंने सिलाई कार्य से शुरुआत की। कृषि गतिविधियों में रूचि के चलते बाद में स्व-सहायता समूह और बैंक से ऋण लेकर स्ट्रा रीपर मशीन खरीदी। इसके बाद उन्होंने गांव और आसपास के किसानों को पराली जलाने के नुकसान और उससे भूसा बनाने के फायदे समझाए। 600 बीघा खेत में पराली जलाने से बचाया जिले के धुलेट गांव के आसपास दूर-दूर तक कोई भी किसान अब अपने खेत में पराली (गेहूं कटाई के बाद बचे हुए ठूंठ,अवशेष) नहीं जलाता। इसका कारण महिला किसान श्रीमती पपीता रावत है। पपीता रावत बताती है -"शुरुआती दिनों में मैं घर ही रहती और मेरे पति महेश मजदूरी करने जाते थे। घर में तंगी बनी रहती। एक दिन गांव में आजीविका मिशन के अधिकारी आए। द्वारकाधीश सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाया। सिलाई मशीन ली और काम शुरू किया। इसके बाद मैंने लोन लेकर 'स्ट्रा रीपर मशीन' खरीद ली। गांव सहित आसपास के किसान परिवारों को पराली जलाने के नुकसान और भूसा तैयार करने के फायदे बताए। देखते ही देखते इस साल हमने 600 बीघा से ज्यादा खेत में फसल कटने के बाद पराली जलने से बचा लिया। इस बार पराली से भूसा तैयार कर किसानों को लाभ पहुंचाया। वे इसका उपयोग मवेशियों के 'केटल फीड' के रूप में कर रहे है। डे आजीविका मिशन के जिला प्रबंधक गायत्री राठौड़ बताती है-"इस समूह को विलेज ऑर्गेनाइज़ेशन के साथ आस्था संकुल संगठन खुड़ैल से जोड़ा गया। किसान दीदी के रूप में पपीता रावत बेहतर काम कर रही ही है। पशु पालन से जुड़कर भी चार मवेशियों के माध्यम से दूध उत्पादन का व्यवसाय भी कर रही है।" पराली जलाने से यह होता है नुकासान कृषि वैज्ञानिकों का कहना है किसानों द्वारा पराली जलाने की मानसिकता बनी हुई है। प्रदेश में ही सैकड़ों एकड़ खेत में पराली जलाने से उनकी उपजाऊ क्षमता दांव पर लगी हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार "पराली जलाने से जहां अगले सीज़न में फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है वहीं पराली (सूखी फसल अवशेष या STUBBLE) जलाने से CO2 (कॉर्बन डाय ऑक्साइड), नाइट्रोजन ऑक्साइड सहित हानिकारक गैस बनती है जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग प्रभावित होती है। मिट्टी उर्वरता (सॉइल फर्टिलिटी) के साथ सूक्ष्मजीव और बैक्टीरिया नष्ट हो जाते है।" जिला प्रशासन और कृषि विभाग पराली न जलाने के लिए किसानों को जागरूक कर रहा है। यहां तक कि पराली जलाने पर जुर्माने का भी प्रावधान है। प्रशासन भी कर रहा प्रोत्साहित जिला पंचायत इंदौर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी सिद्धार्थ जैन ने बताया कि जिला प्रशासन और कृषि विभाग पराली नहीं जलाने के लिए लगातार जागरूकता अभियान चला रहे है और नियमों के तहत जुर्माने का प्रावधान भी है। अधिकारियों का कहना है कि श्रीमती रावत जैसी किसान दीदियां न केवल खुद आत्मनिर्भर बन रही है, बल्कि समाज और कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला रही हैं। धुलेट गांव की यह पहल दिखाती है कि जागरूकता, नवाचार और सामूहिक प्रयास से पराली जताने जैसी गंभीर समस्या का समाधान संभव है। आने वाले समय में ऐसी पहलें कृषि सुधार और पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकती है।  

प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को पूरा कर रहा है मध्यप्रदेश: मुख्यमंत्री डॉ. यादव

प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को पूर्ण कर रहा है मध्यप्रदेश: मुख्यमंत्री डॉ. यादव पीएम स्वनिधि योजना में मध्यप्रदेश का देश में शीर्ष स्थान इंदौर, भोपाल और जबलपुर ने राष्ट्रीय स्तर पर अर्जित की विशिष्ट उपलब्धि भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना में मध्यप्रदेश की गौरवशाली उपलब्धियों पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में प्रदेश के पथ-विक्रेता स्ट्रीट वेण्डर आज आत्मनिर्भरता की नई ऊंचाइयों को स्पर्श कर रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश ने इस योजना के सफल क्रियान्वयन में देशभर में अग्रणी रहते हुए एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो अंत्योदय और समावेशी विकास के प्रति हमारी सरकार की अटूट प्रतिबद्धता का परिचायक है। इंदौर, भोपाल और जबलपुर की ऐतिहासिक सफलता मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने नगरीय निकायों द्वारा राष्ट्रीय रैंकिंग में अर्जित किए गए उत्कृष्ट स्थान की सराहना करते हुए बताया कि इंदौर नगर निगम ने नवीन पीएम स्वनिधि योजना के अंतर्गत 33,332 ऋण प्रकरणों के वितरण के साथ देश के समस्त नगरीय निकायों में प्रथम स्थान प्राप्त कर प्रदेश को गौरवान्वित किया है। देश में 10 लाख से 40 लाख की जनसंख्या वाली श्रेणी में भोपाल ने देशभर में द्वितीय और जबलपुर ने तृतीय स्थान प्राप्त कर विकास के मानकों में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है।डॉ. यादव ने कहा कि यह उपलब्धि केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे छोटे व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी वाले भाई-बहनों के जीवन में आए सकारात्मक परिवर्तन का प्रतिबिंब है। पथ-विक्रेताओं के जीवन में आ रहा गुणात्मक परिवर्तन योजना के विस्तार पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बताया कि प्रदेश में अब तक 9.92 लाख से अधिक पथ-विक्रेताओं को इस योजना का लाभ प्राप्त हुआ है। 15.69 लाख ऋण प्रकरणों के माध्यम से 2632 करोड़ रुपये की ऋण राशि सीधे हितग्राहियों तक पहुँचाई गई है। योजना के पुनर्गठित स्वरूप में अब 15 हजार, 25 हजार और 50 हजार रुपये की क्रमिक ऋण सहायता के साथ-साथ 30,000 रुपये की सीमा वाला यूपीआई-लिंक्ड क्रेडिट कार्ड भी प्रदान किया जा रहा है, जिससे उनकी कार्यशील पूंजी की आवश्यकताएं सुगमता से पूर्ण हो रही हैं। डिजिटल क्रांति और छोटे निकायों का उत्कर्ष मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने डिजिटल साक्षरता की सराहना करते हुए कहा कि प्रदेश के 7 लाख से अधिक पथ-विक्रेता डिजिटल लेन-देन अपना चुके हैं, जिन्हें 47 करोड़ रुपये से अधिक का कैशबैक प्राप्त हुआ है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि 1 लाख से कम आबादी वाले निकायों में सारणी नगर पालिका ने देशभर में प्रथम स्थान प्राप्त कर यह सिद्ध कर दिया है कि संकल्प शक्ति हो तो छोटे निकाय भी राष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान स्थापित कर सकते हैं। इसी श्रेणी में बालाघाट (5वें), टीकमगढ़ (7वें)और हरदा (9वें)के प्रदर्शन को भी उन्होंने अनुकरणीय बताया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने विश्वास व्यक्त किया कि 31 मार्च, 2030 तक विस्तारित यह योजना आगामी समय में मध्यप्रदेश के नगरीय अर्थतंत्र को नई गति प्रदान करेगी और समाज के अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का सशक्त माध्यम बनेगी।  

सरकार की योजना: ₹10,000 पेंशन की संभावना, ये लोग होंगे सबसे बड़े लाभार्थी

नई दिल्ली भारत सरकार इनफॉर्मल वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की योजना बना रही है। बढ़ती महंगाई और रिटायर लोगों के बढ़ते खर्च को देखते हुए, सरकार अटल पेंशन योजना (APY) के तहत दी जाने वाली न्यूनतम पेंशन की अपर लिमिट को बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह करने पर विचार कर रही है। मिंट ने यह जानकारी तीन अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर दी है। बता दें भारत में नफॉर्मल वर्कर्स वे श्रमिक हैं, जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। यहां नौकरी की सुरक्षा, फिक्स्ड सैलरी, या सामाजिक सुरक्षा (PF, पेंशन, छुट्टी) का अभाव होता है। ये देश के कुल वर्कफोर्स का लगभग 90% हिस्सा हैं, जिनमें रेहड़ी-पटरी वाले, घरेलू कामगार, मजदूर और स्वरोजगार करने वाले शामिल हैं। क्यों जरूरी है यह बदलाव? अटल पेंशन योजना मई 2015 में शुरू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, किसानों, दुकानदारों और छोटे व्यवसायियों को बुढ़ापे में आर्थिक सहारा देना है। अभी इस योजना के तहत 60 साल की उम्र के बाद ₹1,000 से ₹5,000 प्रति माह तक की गारंटीड पेंशन दी जाती है। लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण यह राशि कम पड़ रही है। मौजूदा हालात क्या हैं? अटल पेंशन योजना में अब तक 9 करोड़ से अधिक सदस्य जुड़ चुके हैं, लेकिन इनमें से लगभग आधे सदस्य नियमित योगदान देना बंद कर चुके हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक के सबसे ज्यादा 1.35 करोड़ नए सदस्य जुड़े हैं। सरकार का मानना है कि पेंशन की लिमिट बढ़ाने से नए सदस्य जुड़ेंगे और पुराने सदस्य योजना में बने रहेंगे। नया प्रस्ताव क्या है? वित्त मंत्रालय और पेंशन फंड नियामक (PFRDA) मिलकर इस प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं। संभावना है कि पेंशन की अपर लिमिट ₹8,000 से ₹10,000 प्रति माह कर दी जाए।एक अधिकारी ने बताया , “यह बदलाव योजना को और आकर्षक बनाएगा और बढ़ती जीवन-लागत के अनुसार ढालेगा।” सरकार का कितना योगदान जो सदस्य 31 मार्च 2016 से पहले जुड़े थे, उन्हें शुरुआती पांच साल में सरकार की तरफ से को-कंट्रीब्यूशन मिलता था। यह रकम सदस्य के योगदान का 50% (अधिकतम ₹1,000 प्रति वर्ष) थी। यह सुविधा केवल उन्हीं को मिलती थी, जो इनकम टैक्स का भुगतान नहीं करते थे और किसी अन्य सामाजिक सुरक्षा योजना से नहीं जुड़े थे। कैसे होगा योजना का विस्तार? सरकार 'पेंशन सखी' और बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट (BC) के जरिए गांव-गांव तक योजना पहुंचाने की योजना बना रही है। साथ ही, निरंतर योगदान की चुनौती पर भी काम हो रहा है।26 जनवरी 2026 को कैबिनेट ने इस योजना को वित्त वर्ष 2031 तक जारी रखने की मंजूरी दी। प्रचार, विकास और गैप-फंडिंग गतिविधियों के लिए भी मदद जारी रहेगी। क्या सरकार के खजाने पर पड़ेगा बोझ? विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव से सरकारी खजाने पर अधिक दबाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि अटल पेंशन योजना ज्यादातर सदस्यों के अपने योगदान पर चलती है। ग्रांट थॉर्नटन के विवेक अय्यर कहते हैं, “APY एक निर्धारित-योगदान वाली योजना है। सुरक्षा ही इसका मुख्य उद्देश्य है। इसलिए इस बदलाव से सरकार पर कोई बड़ा वित्तीय दबाव नहीं पड़ेगा।”

राफेल डील पर भारत ने तय की लक्ष्मण रेखा, शर्त नहीं मानी तो सौदा रद्द, फ्रांस को ₹325000 करोड़ का भारी नुकसान

नईदिल्ली  भारत अपने डिफेंस सिस्‍टम को अपग्रेड करने और उसे मॉडर्न एज वॉरफेयर के लेवल तक लाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है. स्‍वदेशी तकनीक से नेक्‍स्‍ट जेनरेशन फाइटर जेट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोग्राम लॉन्‍च किया गया है. इसके तहत 5th और 6th जेनरेशन का फाइटर जेट डेवलप किया जाना है. इसके साथ ही एयरस्‍पेस को अभेद्य किला बनाने के लिए मिशन सुदर्शन चक्र नाम से नेशनल एयर डिफेंस प्रोग्राम भी शुरू किया गया है. S-400 के साथ ही अन्‍य देसी डिफेंस सिस्‍टम इसका हिस्‍सा हैं. साल 2035 तक इसे पूरी तरह से अमल में लाने का लक्ष्‍य रखा गया है. इसके तहत कई एंटी मिसाइल, एंटी ड्रोन और एंटी एयरक्राफ्ट सिस्‍टम डेवलप किए गए हैं और किए जा रहे हैं. मिसाइल के क्षेत्र में भी भारत ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं. अग्नि सीरीज की मिसाइलों के साथ ही ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल इसका उदाहरण हैं. फाइटर जेट के मामले में भारत अभी भी इंपोर्ट पर निर्भर है. इसी क्रम में फ्रांस की डसॉल्‍ट एविएशन के साथ 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के प्रस्‍ताव को हरी झंडी दी गई है. यह सौदा तकरीबन 3.25 लाख करोड़ बताया जा रहा है. हालांकि, अब इस डील में नया पेच फंसता दिख रहा है. दरअसल, भारत ने राफेल डील के तहत इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट (ICD) तक पहुंच की शर्त रखी है. भारतीय पक्ष का कहना है कि यदि फ्रांस के साइड से इस शर्त का पालन नहीं किया गया तो भारत इस डील से पूरी तरह से बाहर निकल सकता है. ऐसे में अब फ्रांस पर निर्भर करता है कि 114 राफेल फाइटर जेट की महाडील आगे बढ़ती है या फिर बीच रास्‍ते ही दम तोड़ती है।  दरअसल, भारत के बहुप्रतीक्षित मीडियम रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम में 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस मेगा सौदे में अब इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट (ICD) सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है, जो इस डील के भविष्य का फैसला कर सकता है. रक्षा मंत्रालय (MoD) के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, भारत को ICD तक पहुंच मिलने को लेकर भरोसा तो है, लेकिन यदि फ्रांस की ओर से इसमें किसी तरह की अनिच्छा दिखाई जाती है, तो नई दिल्ली इस सौदे से पूरी तरह पीछे हटने का कड़ा फैसला भी ले सकती है. यह रुख भारत की रक्षा खरीद नीति में एक बड़ा बदलाव दर्शाता है, जहां अब तकनीकी पहुंच और ऑपरेशनल ऑटोनॉमी को अनिवार्य शर्त के रूप में देखा जा रहा है, न कि एक अतिरिक्त सुविधा के रूप में. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के नेतृत्व में ICD के महत्व को और अधिक बढ़ाया गया है. फरवरी 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) से मंजूरी मिलने के बाद MRFA कार्यक्रम अब सिर्फ विमानों की खरीद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक सामरिक आत्मनिर्भरता से जुड़ गया है. सरकार का स्पष्ट लक्ष्य है कि भविष्य में किसी भी अपग्रेड या वेपन इंटीग्रेशन के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम की जाए।  डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क तकनीकी रूप से ICD एक मानकीकृत डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क होता है, जो विमान के मिशन कंप्यूटर और बाहरी सिस्टम जैसे हथियारों के हार्डपॉइंट्स के बीच हैंडशेक का काम करता है. यदि भारत को ICD मिल जाता है, तो भारतीय इंजीनियर बिना मूल निर्माता के सोर्स कोड तक पहुंचे ही स्वदेशी हथियारों का फाइटर जेट में इंटीग्रेशन कर सकेंगे. इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि लागत भी काफी कम हो जाएगी. पहले 36 राफेल विमानों की खरीद में भारत को हर नए गैर-फ्रांसीसी हथियार को जोड़ने के लिए डसॉल्ट एविएशन पर निर्भर रहना पड़ा था. इस प्रक्रिया में अतिरिक्त लागत और लंबा समय लगता था, जिससे ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी प्रभावित होता था. हर नए हथियार के लिए अलग से बातचीत करनी पड़ती थी, जिससे पूरे सिस्टम की दक्षता पर असर पड़ता था. अब MRFA कॉन्‍ट्रैक्‍ट में ICD को शामिल करके भारत शुरुआत से ही इंटीग्रेशन फ्रीडम सुनिश्चित करना चाहता है. इसके तहत स्वदेशी हथियारों जैसे अस्त्र सीरीज (Mk1, Mk2, Mk3) की बीवीआर मिसाइलें, रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल और स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (SAAW) जैसे प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन को आसानी से जोड़ा जा सकेगा।  ICD क्‍यों है इतना अहम?     आईसीडी की अहम भूमिका: तकनीकी तौर पर ICD (Interface Control Document) एक मानकीकृत डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क है, जो विमान के मिशन कंप्यूटर और बाहरी सिस्टम के बीच हैंडशेक लेयर का काम करता है।      सिस्टम के बीच समन्वय: यह फ्रेमवर्क तय करता है कि विमान के मिशन कंप्यूटर और हथियार हार्डपॉइंट्स जैसे बाहरी सिस्टम आपस में कैसे संवाद करेंगे।      स्वदेशी क्षमता को बढ़ावा: ICD हासिल होने से भारतीय इंजीनियरों को स्वदेशी हथियारों को विमान में इंटीग्रेट करने की क्षमता मिलती है।      निर्माता पर निर्भरता कम: इसके जरिए मूल उपकरण निर्माता (OEM) के मालिकाना सोर्स कोड तक पहुंच की जरूरत नहीं रहती, जिससे विदेशी निर्भरता घटती है।      रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: यह कदम भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने और स्वदेशी तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।  तकरीबन सवा तीन लाख करोड़ रुपये की राफेल डील के तहत भारत इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट यानी ICD का एक्‍सेस चाहता है, ताकि वेपन सिस्‍टम को फाइटर जेट में इंटीग्रेट करने में द‍िक्‍कतों का सामना न करना पड़े।  डिजिटल संप्रभुता रक्षा मंत्रालय ICD को डिजिटल संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण साधन मान रहा है. इसका उद्देश्य भारत को अपने लड़ाकू प्लेटफॉर्म्स के विकास और उन्नयन पर पूर्ण नियंत्रण देना है, ताकि देश विदेशी कंपनियों के तकनीकी इकोसिस्टम में बंधा न रहे. यह कदम आत्मनिर्भर भारत और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने की व्यापक रणनीति के अनुरूप है. हालांकि, फ्रांस के लिए यह मुद्दा संवेदनशील बना हुआ है. ICD तक पहुंच देने से बौद्धिक संपदा अधिकारों और सिस्टम आर्किटेक्चर पर नियंत्रण से जुड़े सवाल उठ सकते हैं. ऐसे में सीमित या शर्तों के साथ पहुंच देने का विकल्प भी बातचीत में सामने आ सकता है, लेकिन यह भी विवाद का कारण बन सकता है. MRFA डील अब केवल रक्षा खरीद नहीं, … Read more

भारत ने खोजा एनर्जी का ‘ब्रह्मास्‍त्र’, अब LPG और तेल के संकट का होगा अंत, हर घर का चूल्‍हा जलता रहेगा

मुंबई  ईरान जंग की शुरुआत के साथ ही पूरी दुनिया नई समस्‍या से रूबरू होने लगी. ईरान ने एनर्जी कॉरिडोर होर्मुज स्‍ट्रेट को बार्गेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. इससे यूरोप से लेकर एशिया तक में एनर्जी क्राइसिस का दौर शुरू हो गया. प्रभावित देशों को अपने ऊर्जा स्रोतों के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया. भारत भी पश्चिम एशिया संकट से अछूता नहीं है. ऐसे में देश में किसी तरह का ऊर्जा संकट न आए, इसको लेकर कई तरह के कदम उठाए गए हैं. पूर्व में लिए गए फैसलों का असर अब दिखने लगा है. सौर ऊर्जा के बाद अब भारत ने पवन ऊर्जा यानी विंड एनर्जी के क्षेत्र में नया इतिहास रचा है. अक्षय ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं पर यदि इसी तरह गंभीरता से काम किया जाता रहा तो LPG और तेल के बिना भी भारत विकास की पटरी पर सरपट भागता रहेगा।  ईरान जंग के चलते दुनियाभर में एनर्जी क्राइसिस गहरा गई है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. खाड़ी देश से आने वाले तेल और गैस पर निर्भरता को कम करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं. भारत भी इसमें पीछे नहीं है. भारत पिछले कुछ सालों में रिन्‍यूवेबल यानी अक्षय ऊर्जा पर मिशन मोड में काम रहा है. उसका परिणाम सामने आने लगा है. पिछले दिनों सौर ऊर्जा के जरिये रिकॉर्ड एनर्जी प्रोडक्‍शन किया गया था. भारत ने सोलर एनर्जी के जरिये 45 गीगावाट बिजली पैदा किया था. अब भारत ने पवन ऊर्जा के सेक्‍टर में जबरदस्‍त सफलता हासिल की है. यह उपलब्‍ध‍ि ऐसे समय में सामने आई है, जब दुनिया के तमाम देश ईरान युद्ध और होर्मुज सट्रेट संकट से दो-चार हो रही है. तेल और गैस की सप्‍लाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है. ऐसे में भारत की यह उपलब्धि दिल को सुकून देने वाला है।  भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए वर्ष 2025-26 के दौरान पवन ऊर्जा क्षमता में 6.1 गीगावाट (GW) की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की है. केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह अब तक की सबसे बड़ी सालाना बढ़ोतरी है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा और ग्रीन एनर्जी फ्यूचर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. विंड इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (WIPPA) के स्थापना दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रह्लाद जोशी ने बताया कि भारत इस समय वैश्विक स्तर पर पवन ऊर्जा क्षमता के मामले में चौथे स्थान पर है. देश में वर्तमान में 56.1 गीगावाट से अधिक स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता है, जबकि करीब 28 गीगावाट की परियोजनाएं विभिन्न चरणों में कार्यान्वयन के अधीन हैं।  केंद्रीय मंत्री ने इस क्षेत्र में मौजूद अपार संभावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि 150 मीटर हब ऊंचाई पर भारत की पवन ऊर्जा क्षमता लगभग 1,164 गीगावाट आंकी गई है, जो देश को ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. उन्होंने विश्वास जताया कि मौजूदा प्रयासों की गति बरकरार रही तो भारत 2030 तक 100 गीगावाट और 2036 तक 156 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता हासिल कर सकता है. यह लक्ष्य वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने में भी अहम योगदान देगा।  पवन ऊर्जा भारत के एनर्जी सिस्‍टम को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. प्रह्लाद जोशी ने कहा कि पवन ऊर्जा का उत्पादन मुख्य रूप से शाम और रात के समय अधिक होता है, जो बिजली की अधिक मांग वाले समय के साथ मेल खाता है. आंकड़ों के अनुसार, लगभग 45 प्रतिशत पवन ऊर्जा उत्पादन पीक डिमांड के समय होता है, जिससे यह सौर ऊर्जा का एक मजबूत पूरक बन जाती है. नीतिगत सुधारों का उल्लेख करते हुए मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने नवीकरणीय खरीद दायित्व (Renewable Purchase Obligations) के तहत पवन ऊर्जा के लिए एक विशेष घटक जोड़ा है, जिससे इस क्षेत्र में निरंतर मांग सुनिश्चित हो सके. इसके अलावा लेट पेमेंट सरचार्ज नियमों का सख्ती से पालन, पारदर्शी बोली प्रक्रिया और अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स (ALMM) जैसी व्यवस्थाओं ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है और घरेलू निर्माण को बढ़ावा दिया है।  भारत ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित किया है. देश की सालाना उत्‍पादन क्षमता 24 गीगावाट से अधिक है, जबकि स्वदेशीकरण का स्तर 70 से 80 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. ब्लेड, टावर, गियरबॉक्स और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों के निर्माण में भारत ने मजबूत सप्‍लाई चेन तैयार की है, जो इसे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाती है।  उद्योग से जुड़ी चुनौतियों पर बात करते हुए प्रह्लाद जोशी ने कहा कि सरकार अतिरिक्त पवन ऊर्जा टेंडर जारी करने पर विचार कर रही है. साथ ही हाइब्रिड और राउंड-द-क्लॉक (RTC) परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे ग्रिड की दक्षता और विश्वसनीयता में सुधार होगा. डिविएशन सेटलमेंट मैकेनिज्म (DSM) जुर्माने, पावर कर्टेलमेंट और ट्रांसमिशन में देरी जैसे मुद्दों पर भी सरकार गंभीरता से काम कर रही है और इनके व्यावहारिक समाधान तलाशे जा रहे हैं।  हाल ही में शुरू किए गए 500 मेगावाट के ‘कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस’ (CfD) मॉडल पायलट को बाजार में स्थिरता और राजस्व सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया गया. जोशी ने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के पास पवन ऊर्जा क्षेत्र में एक भरोसेमंद विनिर्माण और आपूर्ति साझेदार के रूप में उभरने का सुनहरा अवसर है, खासकर ऐसे समय में जब कई देश अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं।  अंत में प्रह्लाद जोशी ने जोर दिया कि आने वाले दशक में 156 गीगावाट के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करना पूरी तरह संभव है, बशर्ते स्पष्ट नीतिगत दिशा, मजबूत संस्थागत सहयोग और उद्योग की सक्रिय भागीदारी बनी रहे. उन्होंने पवन, सौर और ऊर्जा भंडारण को मिलाकर एकीकृत हाइब्रिड प्रणालियों पर अधिक ध्यान देने की अपील की, ताकि देश को एक विश्वसनीय, टिकाऊ और हरित ऊर्जा भविष्य की ओर अग्रसर किया जा सके। 

राज्यसभा की तीसरी सीट के लिए कांग्रेस की रणनीति, कमलनाथ के नाम की चर्चा, और ये भी नाम हो सकते हैं उम्मीदवार

भोपाल  मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीसरी सीट को लेकर कांग्रेस में गहन मंथन चल रहा है। आंकड़े के हिसाब से पार्टी भले ही मजबूत हो, लेकिन परिस्थितियां कुछ ओर ही बता रही हैं। ऐसे में दिल्ली दरबार कोई भी रिस्क लेने के मूड में नहीं है। उन्हें समझ आ रहा है कि कमलनाथ ही हैं जो कि सीट जीत कर दे सकते हैं। हालांकि राहुल गांधी की पहली पसंद मीनाक्षी नटराजन को ही बताया जा रहा है तो दिग्विजय सिंह चाहते हैं कि पीसी शर्मा को मौका दिया जाए। मध्यप्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं जिसके चुनाव होना हैं। विधायकों की संख्या के हिसाब से दो पर भाजपा की एक तरफा जीत होनी है तो तीसरी सीट के लिए 58 वोट चाहिए और कांग्रेस के पास कुल 66 वोट थे, लेकिन विधायक मुकेश मल्होत्रा को वोटिंग का अधिकार नहीं है तो दतिया विधायक राजेंद्र भारती भी संकट में है। गहन मंथन जारी इसके अलावा निर्मला सप्रे का वोट भी नहीं मिलेगा। इस गणित से 63 वोट ही बच रहे हैं जिससे रिस्क फेक्टर बड़ा हो गया। वहीं, हरियाणा में क्रॉस वोटिंग कराके भाजपा खेल कर चुकी है। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए कांग्रेस में प्रत्याशी को लेकर गहन मंथन चल रहा है। कांग्रेस सुप्रीमो व लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की पहली पसंद मीनाक्षी नटराजन है जो मध्य प्रदेश के मंदसौर से सांसद भी रह चुकी हैं और वर्तमान में मैनेजमेंट संभाल रही हैं।  रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए पार्टी अपने वरिष्ठ नेता कमलनाथ को मैदान में उतार सकती है। उनके खड़े होने पर कांग्रेस का कोई भी विधायक क्रॉस वोटिंग नहीं कर पाएगा। तीसरी सीट फिर से पार्टी के खाते में आ जाएगी नहीं तो राज्यसभा से आकड़ा फिर कम हो जाएगा। इधर, एक समीकरण ये भी चल रहा है कि भाजपा अगर आदीवासी कार्ड खेलती है तो कमलनाथ खुद भी बाला बच्चन के नाम को आगे बढ़ा सकते हैं जिसके लिए वे खुद भी लॉबिंग कर सकते हैं। दिग्गी का पीसी शर्मा पर दांव वैसे तो राज्यसभा जाने के लिए कांग्रेस के कई नेता उत्साहित हैं। दलित कोटे से सज्जनसिंह वर्मा भी चाहते हैं कि उन्हें पार्टी मौका दे तो मौजूदा राज्यसभा सदस्य दिग्जिय सिंह ने पीसी शर्मा का नाम आगे किया जो कि कमलनाथ सरकार में मंत्री भी थे। वे ब्राह्मण समाज को उपकृत कर पार्टी की पकड़ को मजबूत होने का दावा कर रहे हैं। इधर, कमलेश्वर पटेल का नाम भी दावेदारों की सूची में दर्ज हो गया है। खींचतान में हो न जाए नुकसान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के बीच खींचतान जगजाहिर है। दोनों नेता एक-दूसरे को बिलकुल पसंद नहीं करते हैं। सिंघार की पटरी तो दिग्विजय सिंह से भी नहीं बैठती है, ये बात सिंह को भी समझ में आ गई थी। बड़ी बात ये है कि नाथ के आने पर पटवारी और सिंघार दोनों खुलकर मदद कर सकते हैं। उन्हें मालूम है कि नाथ सभी विधायकों से समन्वय बनाकर अपनी सीट को सुरक्षित कर लेंगे। ये भी हो सकता है कि भाजपा अपना प्रत्याशी भी नहीं उतारे।