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अग्नि-4 मिसाइल का परीक्षण हो सकता है बंगाल की खाड़ी में, NOTAM जारी

 नई दिल्ली भारत सरकार ने बंगाल की खाड़ी में लंबी दूरी की मिसाइल परीक्षण के लिए NOTAM (Notice to Airmen) जारी किया है. यह चेतावनी 25 अप्रैल से 6 मई 2026 तक लागू रहेगी. NOTAM में करीब 3550 किलोमीटर लंबा खतरे का इलाका घोषित किया गया है।  रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस दौरान अग्नि-4 मिसाइल का परीक्षण किया जा सकता है. यह परीक्षण ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ के आसपास होने जा रहा है, जिससे यह परीक्षण सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि रणनीतिक संदेश भी देने वाला माना जा रहा है. अग्नि-4 मिसाइल की विशेषताएं  अग्नि-4 भारत की महत्वपूर्ण मिसाइलों में से एक है. यह एक Intermediate Range Ballistic Missile (IRBM) है।      रेंज: 3500 से 4000 किलोमीटर       वजन: लगभग 17 टन       लंबाई: करीब 20 मीटर       ईंधन: सॉलिड फ्यूल (ठोस ईंधन)       चरण: दो चरण वाली मिसाइल        वॉरहेड: 1000 किलोग्राम तक का परमाणु या पारंपरिक हथियार ले जा सकती है.       विशेषता: बेहद सटीक निशाना लगाने की क्षमता और मोबाइल लॉन्चर पर चलने वाली मिसाइल।  अग्नि-4 भारत की न्यूक्लियर ट्रायड का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह रेल और सड़क दोनों जगहों से लॉन्च की जा सकती है, जिससे दुश्मन को इसे पहले से नष्ट करना बहुत मुश्किल होता है।  क्यों जारी किया गया NOTAM? NOTAM जारी करके भारत ने पायलटों और जहाजों को चेतावनी दी है कि वे तय क्षेत्र में न जाएं. यह क्षेत्र बंगाल की खाड़ी में है, जो अग्नि-4 जैसी मिसाइल के परीक्षण के लिए उपयुक्त है. रक्षा सूत्रों के अनुसार, फ्लाइट पाथ और खतरे वाले क्षेत्र की दूरी अग्नि-4 की क्षमता से बिल्कुल मेल खाती है।  ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर परीक्षण का मतलब ऑपरेशन सिंदूर मई 2025 में भारत द्वारा पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर किया गया था. अब ठीक एक साल बाद यह मिसाइल परीक्षण हो रहा है. हालांकि रक्षा मंत्रालय ने इसे आधिकारिक रूप से वर्षगांठ से जोड़ा नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह परीक्षण भारत की सैन्य तैयारियों और मजबूती का संदेश देगा।  भारत की मिसाइल क्षमता बढ़ रही है हाल के महीनों में भारत ने अपनी मिसाइलों के परीक्षण तेज कर दिए हैं. अग्नि सीरीज के अलावा K-4 (सबमरीन से लॉन्च होने वाली), हाइपरसोनिक मिसाइल LRAShM और ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल के 800 किलोमीटर रेंज वाले वर्जन का परीक्षण चल रहा है।  ब्रह्मोस का नया वर्जन 2027 तक भारतीय सेना में शामिल होने वाला है. इन सभी परीक्षणों से साफ है कि भारत अपनी रक्षा क्षमता को लगातार आधुनिक और मजबूत बना रहा है।  क्यों जरूरी है अग्नि-4 जैसी मिसाइल? अग्नि-4 चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों के किसी भी हिस्से को निशाना बना सकती है. यह मिसाइल भारत को क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस नीति को मजबूत करती है. ठोस ईंधन होने के कारण इसे जल्दी लॉन्च किया जा सकता है. दुश्मन के रडार से बचना भी आसान होता है।  बंगाल की खाड़ी में जारी NOTAM और अग्नि-4 का संभावित परीक्षण भारत की सैन्य ताकत और तैयारियों को दर्शाता है. ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ पर यह परीक्षण रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. भारत लगातार अपनी मिसाइल तकनीक को बेहतर बना रहा है ताकि देश की सुरक्षा अटूट बनी रहे। 

थलापति के विजय रथ के सामने खड़ी हो सकती हैं पिता की दो संतानें: DMK और AIADMK

चेन्नई  तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में थलापति विजय की टीवीके पार्टी ने जबर्दस्त जीत हासिल कर पूरे देश में कोहराम मचा दिया है. राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा में टीवीके को 108 सीटों पर जीत मिली है. देश के इतिहास में यह अपने तरह की अभूतपूर्व घटना है. महज दो साल पुरानी पार्टी अपने दम पर एक बड़े राज्य में इतनी बड़ी जीत हासिल कर सकती है. इस बात का भरोसा अच्छे-अच्छे चुनावी पंडितों को भी नहीं था. टीवीके की स्थापना दो मार्च 2024 को हुई थी. लेकिन, इतनी शानदार जीत हासिल करने के बावजूद टीवीके बहुमत से थोड़ी दूर रह गई है. राज्य में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए. उसको कम से कम 10 और विधायकों की जरूरत है. लेकिन, उसके लिए यह 10 का नंबर अब भारी पड़ता दिख रहा है।  एक संभावना यह बन रही है कि टीवीके के विजय रथ को रोकने के लिए राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियां डीएमके और एआईएडीएमके पुरानी दुश्मनी भूलकर साथ आ सकती हैं. ऐसा इसलिए भी संभव है कि ये दोनों एक ही पिता की संतानें हैं. इनके बीच एक तरह से खून का रिश्ता है. दरअसल, तमिलनाडु की राजनीति में DMK और AIADMK लंबे समय से दुश्मन के रूप में जानी जाती हैं. लेकिन दोनों का जन्म द्रविड़ आंदोलन से हुआ है. दोनों की विचारधारा लगभग एक समान है. दोनों द्रविड़ संस्कृति, सामाजिक न्याय, भाषाई गौरव और हिंदुत्व की विरोधी रही हैं।  डीएमके के बंटवारे की कहानी इस कहानी की शुरुआत 1972 में डीएमके के टूटने से होती है. दरअसल, DMK के संस्थापक सीएन अन्नादुरै की मृत्यु के बाद पार्टी में दो बड़े नेता एम. करुणानिधि और एम.जी. रामचंद्रन (MGR) चेहरा बने. करुणानिधि पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री थे, जबकि MGR पार्टी के सबसे बड़े चेहरे, कोषाध्यक्ष और जनप्रिय अभिनेता थे. सबसे बड़ा विवाद पैसे और पारदर्शिता को लेकर हुआ. MGR ने पार्टी नेताओं से अपनी संपत्ति घोषित करने की मांग की. उन्होंने 1972 के मदुरै सम्मेलन के हिसाब-किताब पर सवाल उठाए और पार्टी में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया. करुणानिधि इसे अपनी सत्ता पर चुनौती मान बैठे. तनाव पहले से बढ़ रहा था. 1971 में करुणानिधि ने MGR को कैबिनेट में जगह देने से मना कर दिया था. इसके अलावा करुणानिधि ने बेटे एमके मुथु को फिल्मों में MGR का मुकाबला करने के लिए तैयार किया, जो MGR को नागवार गुजरा. यही आग अक्टूबर 1972 में सुलग गई. 10-11 अक्तूबर को MGR को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित कर दिया गया।      14 अक्टूबर: DMK की आम परिषद ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।      17 अक्टूबर: MGR ने नई पार्टी अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (ADMK) का ऐलान कर दिया. 1976 में इमरजेंसी के दौरान उन्होंने ऑल इंडिया जोड़कर इसे AIADMK बना दिया।  एक ही पिता की संतानें DMK और AIADMK में वैचारिक रूप से कोई बड़ी दूरी नहीं है. दोनों ही पेरियार के द्रविड़ आंदोलन की विरासत का दावा करती हैं. दोनों समाज के पिछड़े वर्गों, मंदिर प्रबंधन, जाति विरोध और तमिल गौरव की बात करती हैं. उनका झगड़ा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, सत्ता और करुणानिधि-MGR के बीच व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता का था, न कि विचारधारा का।  जब एमजीआर बने सीएम वर्ष 1972 नई पार्टी बनने के महज दो महीने में AIADMK में करीब दस लाख सदस्य जुड़ गए, ज्यादातर MGR के फैन क्लबों के जरिए. 1977 के चुनाव में AIADMK ने भारी जीत हासिल की और MGR भारत के पहले अभिनेता मुख्यमंत्री बने. उसके बाद पांच दशक तक तमिलनाडु में DMK और AIADMK के बीच सत्ता की अदला-बदली चलती रही।  2026 में नया मोड़ 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस लंबे द्वंद्व को नई चुनौती मिली है. थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने शानदार प्रदर्शन किया है. विजय की लोकप्रियता, युवाओं का समर्थन और सिनेमा की ताकत ने पुरानी दो-दलीय व्यवस्था को हिला दिया है. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या DMK और AIADMK जो पिछले 50 साल से एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे, थलापति विजय के बढ़ते विजय रथ को रोकने के लिए एक साथ आ सकती हैं? कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह संभव है. दोनों पार्टियां जानती हैं कि अगर वे अलग-अलग रहीं तो विजय की TVK तमिलनाडु की राजनीति को नया आकार दे सकती है।  एक ही गठबंधन में डीएमके-एआईएडीएमके ऐतिहासिक रूप से देखें तो दोनों पार्टियों ने राज्य में आपस में कभी गठबंधन नहीं किया. लेकिन, ये दोनों दल एक ही समय में राष्ट्रीय स्तर पर एक ही गठबंधन में साझेदार रह चुके हैं. दिवंगत अटल बिहार वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए में 1999 में ये दोनों दल एक ही समय में गठबंधन में साझेदार थे. इसी तरह इन दोनों दलों ने एक समय केंद्र की यूपीए सरकार को समर्थन दिया था. ऐसे में बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में कुछ भी असंभव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस वक्त टीवीके ने डीएमके और एआईएडीएमके के अस्तित्व को सीधी चुनौती दी है। 

10 मई को दमोह में पीएम मोदी, स्वावलंबी गोशाला की आधारशिला रखेंगे

दमोह मध्य प्रदेश के दमोह जिले के लिए एक बड़ी खबर सामने आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर प्रदेश के दौरे पर आ रहे हैं। इस बार वे किसी चुनावी रैली या सभा के लिए नहीं आ रहे हैं पीएम मोदी इस बार एक बेहद खास काम के लिए दमोह आ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक 10 मई 2026 को पीएम मोदी पथरिया विधानसभा क्षेत्र में आएंगे। दमोह जिले के पथरिया में एक विशाल स्वावलंबी गोशाला बनने जा रही है। यह गोशाला कोई आम गोशाला नहीं होगी, बल्कि इसे आधुनिक और आत्मनिर्भर मॉडल पर तैयार किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी इसी गोशाला का भूमि पूजन करेंगे और इसकी नींव रखेंगे। 517 एकड़ जमीन पर तैयार होगी इस पूरी योजना के लिए कुल 517 एकड़ जमीन इसके लिए चुनी गई है। ये जमीन विकासखंड पथरिया के तीन गांवों रानगिर, कल्याणपुरा और बिजोरी में है।इतनी बड़ी जमीन पर गोशाला बनने से न केवल गायों को बेहतर ठिकाना मिलेगा, बल्कि इलाके के विकास को भी नई रफ्तार मिलेगी।हाल ही में आईएएस प्रताप नारायण यादव और पुलिस अधीक्षक (SP) श्रुतकीर्ति सोमवंशी ने खुद मौके पर जाकर जमीन का मुआयना किया।  मुंबई की कंपनी को मिला है जिम्मा मध्य प्रदेश गौसंबर्धन बोर्ड ने इस गोशाला के निर्माण के लिए मुंबई की एक प्रतिष्ठित कंपनी को आदेश जारी कर दिए हैं।पशुपालन विभाग के उपसंचालक डॉ. बृजेंद्र असाटी ने बताया कि कंपनी को सख्त निर्देश दिए गए हैं। साथ ही 10 मई से पहले जमीन की फेंसिंग का काम पूरा हो जाने की बात कही है। इसके अलावा कम से कम 200 गायों के रहने के लिए अस्थायी शेड तैयार करने के निर्देश दिए हैं। सुरक्षा और तैयारियों का जायजा दमोह के एसपी ने साफ किया है कि भूमि पूजन का कार्यक्रम प्रधानमंत्री के हाथों होना है। इसलिए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं। जिले के बड़े अधिकारी लगातार पथरिया का दौरा कर रहे हैं ताकि व्यवस्थाओं में कोई कमी न रह जाए। अंतिम चरण में चल रही तैयारियां स्वीकृत भूमि पर गोशाला के निर्माण और संचालन के लिए मेसर्स श्रीराम मानेक एग्रो प्रोडक्टस प्राइवेट लिमिटेड मुंबई को मध्य प्रदेश गौसंबर्धन बोर्ड भोपाल द्वारा आदेशित किया गया है। दिए गए निर्देश इस संबंध में उपसंचालक पशुपालन डॉ. बृजेंद्र असाटी ने बताया कि मध्य प्रदेश गौसंबर्धन बोर्ड द्वारा गोशाला के संचालन के लिए नियुक्त कंपनी को समय सीमा में भूमि की फेंसिंग और अस्थायी 200 गौवन्श की गोशाला का निर्माण 10 मई 2026 के पहले किए जाने के निर्देश दिए गए हैं। वरिष्ठ अधिकारियों ने लिया जायजा एसपी ने कहा कि, इस गोशाला का भूमि पूजन वैसे तो प्रधानमंत्री के सानिध्य में होना प्रस्तावित है, जिसकी तैयारियां प्रक्रिया के अंतिम चरण में चल रही हैं। इसी के चलते कलेक्टर के साथ – साथ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने व्यवस्थाओं का जायजा लिया और समय पर निर्धारित काम निपटाने के साथ साथ तैयारियों को लेकर जरूरी दिशा – निर्देश दिए। पीएम मोदी के पिछले दौरे प्रधानमंत्री मोदी का मध्य प्रदेश से पुराना लगाव रहा है। इससे पहले वे 17 सितंबर 2025 को अपने 75वें जन्मदिन के मौके पर प्रदेश आए थे। उस दौरान उन्होंने कई बड़े काम किए थे।     धार दौरा: बदनावर के भैसोला गांव में देश के पहले पीएम मित्रा पार्क का शिलान्यास किया था।     महिला सशक्तिकरण: 'स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार' अभियान की शुरुआत की थी। साथ ही प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत महिलाओं को पैसे ट्रांसफर किए थे।     भोपाल दौरा (31 मई 2025): रानी अहिल्याबाई होलकर की 300वीं जयंती पर भोपाल आए थे। इंदौर मेट्रो के एक खास कॉरिडोर का उद्घाटन किया था।

₹1500 सीधे खातों में! लाड़ली बहनों के लिए बड़ी राहत, जानें तारीख और प्रक्रिया

भोपाल  मध्यप्रदेश की करोड़ों महिलाओं के लिए एक बार फिर राहत और उम्मीद की खबर है। राज्य की महत्वाकांक्षी लाड़ली बहना योजना की 36वीं किस्त को लेकर लंबे समय से चल रहा इंतजार अब खत्म होने की ओर है। मई महीने की यह किस्त खास इसलिए भी मानी जा रही है क्योंकि इस बार लाभार्थियों के खातों में बढ़ी हुई राशि 1500 रुपये भेजे जाने की तैयारी है। दरअसल, प्रदेश सरकार आमतौर पर हर महीने की 10 तारीख तक यह राशि ट्रांसफर करती रही है, लेकिन इस बार 10 मई को रविवार होने के कारण भुगतान में हल्का बदलाव संभव है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार 11 से 15 मई के बीच कभी भी यह किस्त जारी की जा सकती है, हालांकि अंतिम तारीख का आधिकारिक ऐलान अभी बाकी है। पिछले महीने अप्रैल में भी राशि 12 तारीख को जारी की गई थी, जिससे यह संकेत मिलता है कि भुगतान तिथि परिस्थितियों के अनुसार रखी जा रही है। इस योजना की शुरुआत 5 मार्च 2023 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की थी, आज प्रदेश की सामाजिक सुरक्षा की मजबूत कड़ी बन चुकी है। करीब 1 करोड़ 29 लाख से अधिक महिलाएं इस योजना का लाभ उठा रही हैं, जो इसे देश की सबसे व्यापक महिला कल्याण योजनाओं में शामिल करता है। सरकार का उद्देश्य न सिर्फ आर्थिक सहायता देना है, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना भी है। योजना के तहत विवाहित महिलाओं के साथ-साथ विधवा, तलाकशुदा और परित्यक्ता महिलाओं को भी शामिल किया गया है। 21 से 60 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाएं, जिनका बैंक खाता आधार से लिंक है और DBT सक्रिय है, वे इस योजना के दायरे में आती हैं। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि सहायता राशि सीधे लाभार्थियों के खातों में पारदर्शिता के साथ पहुंचे। भुगतान की स्थिति जानने के लिए सरकार ने ऑनलाइन सुविधा भी उपलब्ध कराई है, जिससे महिलाएं घर बैठे ही अपनी किस्त का स्टेटस चेक कर सकती हैं। आवेदन क्रमांक या समग्र आईडी और ओटीपी के माध्यम से यह जानकारी कुछ ही मिनटों में प्राप्त की जा सकती है। कुल मिलाकर, लाड़ली बहना योजना अब केवल एक आर्थिक सहायता योजना नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की महिलाओं के आत्मविश्वास और सशक्तिकरण का प्रतीक बन चुकी है। मई की 36वीं किस्त के साथ एक बार फिर सरकार की इस प्रतिबद्धता पर मुहर लगने जा रही है।

सीएम योगी ने बढ़ाया मुआवजा, यूपी के लोगों को मिलेगा दोगुना फायदा

लखनऊ  यूपी में किसानों के हित से जुड़ा एक बड़ा फैसला सामने आया है. लंबे समय से बिजली की हाईटेंशन लाइनों से प्रभावित किसानों की जो शिकायतें थीं, अब उन पर सरकार ने ठोस कदम उठाया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में मुआवजा व्यवस्था को पूरी तरह बदलते हुए किसानों को सीधा आर्थिक लाभ देने का फैसला किया गया है।  अब 765, 400, 220 और 132 केवी की हाईटेंशन लाइनों से प्रभावित जमीन पर पहले से कहीं ज्यादा मुआवजा मिलेगा. सबसे बड़ा बदलाव यह है कि जहां टावर (खंभे) खड़े किए जाते हैं, उस जमीन के लिए किसानों को अब जमीन की कीमत का 200% यानी दोगुना मुआवजा मिलेगा. वहीं, जिन खेतों के ऊपर से बिजली की लाइनें गुजरती हैं, उस हिस्से (राइट ऑफ वे/कॉरिडोर) के लिए 30% मुआवजा दिया जाएगा।  क्यों जरूरी था यह बदलाव दरअसल, बिजली की बड़ी ट्रांसमिशन लाइनों के लिए जमीन की जरूरत पड़ती है. टावर लगाने के साथ-साथ उनके बीच से गुजरने वाली तारों के नीचे भी जमीन का उपयोग सीमित हो जाता है. किसान उस जमीन पर न तो निर्माण कर सकते हैं और न ही कई बार पूरी तरह खेती कर पाते हैं. पहले इस नुकसान के बदले किसानों को या तो बहुत कम मुआवजा मिलता था या कई मामलों में बिल्कुल नहीं मिलता था. यही वजह थी कि कई परियोजनाओं में स्थानीय स्तर पर विरोध भी देखने को मिलता था. ऊर्जा मंत्री एके शर्मा ने बताया कि सरकार ने इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए नई व्यवस्था लागू की है, ताकि किसानों के साथ न्याय हो और परियोजनाएं भी बिना रुकावट आगे बढ़ सकें।  पहले क्या था नियम, अब क्या बदला अगर पुराने सिस्टम की बात करें, तो 2018 से पहले टावर के नीचे आने वाली जमीन पर अक्सर कोई स्पष्ट मुआवजा तय नहीं था. कई मामलों में किसानों को उचित भुगतान नहीं मिल पाता था. 2018 में इसमें सुधार किया गया और टावर बेस के नीचे जमीन की कीमत का करीब 85% मुआवजा देने का प्रावधान किया गया. लेकिन इसके बावजूद एक बड़ी कमी बनी रही लाइन के नीचे आने वाली जमीन (कॉरिडोर) के लिए कोई मुआवजा नहीं था. अब नई व्यवस्था में दोनों हिस्सों को शामिल किया गया है. टावर के नीचे जमीन का 200% (दोगुना) मुआवजा दिया जाएगा इसी तरह लाइन कॉरिडोर (तारों के नीचे) 30% मुआवजा दिया जाएगा. यानी अब किसान को उसकी जमीन के हर प्रभावित हिस्से का भुगतान मिलेगा।  कैसे तय होगा मुआवजा  मुआवजा तय करने के लिए जिलाधिकारी द्वारा निर्धारित सर्किल रेट को आधार बनाया जाएगा. इसका मतलब है कि हर जिले में जमीन की जो सरकारी दर तय होती है, उसी के अनुसार भुगतान किया जाएगा. इससे मुआवजा प्रक्रिया पारदर्शी और एकसमान बनेगी. साथ ही विवाद की संभावना भी कम होगी. सरकार के मुताबिक, इस नए फैसले से किसानों को पहले के मुकाबले 21% से 33% तक ज्यादा लाभ मिलेगा. अधिकारियों का कहना है कि योगी सरकार के इस फैसले को अगर सरल भाषा में समझा जाए तो जहां पहले कम या कोई मुआवजा नहीं मिलता था, अब वहां सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा. जमीन का उपयोग भले सीमित हो, लेकिन उसका मुआवजा मिलेगा. लंबे समय से चल रही असंतोष की स्थिति खत्म होगी.  यह फैसला खास तौर पर उन किसानों के लिए राहत लेकर आया है, जिनकी जमीन से होकर बड़ी बिजली लाइनें गुजरती हैं।   क्या होगा इसका असर सरकार का मानना है कि इस फैसले का असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे बिजली परियोजनाओं को भी गति मिलेगी. पहले जमीन से जुड़े विवादों और विरोध के कारण कई प्रोजेक्ट्स में देरी होती थी. अब जब किसानों को उचित मुआवजा मिलेगा, तो उनकी सहमति भी आसानी से मिलेगी. इससे ट्रांसमिशन लाइन बिछाने का काम तेजी से पूरा हो सकेगा, जिसका सीधा फायदा बिजली आपूर्ति व्यवस्था को मिलेगा. ऊर्जा मंत्री ने बताया कि यह नई व्यवस्था भारत सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप तैयार की गई है. देश के कई अन्य राज्यों में भी इसी तरह की मुआवजा नीति लागू की जा रही है. उनका कहना है कि यह फैसला एक तरह से दो अहम जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश है एक तरफ किसानों के अधिकार और दूसरी तरफ विकास की जरूरत. अक्सर देखा जाता है कि बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन लेने पर विवाद होता है. लेकिन अगर मुआवजा सही और समय पर मिले, तो यह टकराव काफी हद तक कम हो सकता है. उनका कहना है कि सरकार ने इस फैसले के जरिए यही संदेश देने की कोशिश की है कि विकास के साथ-साथ किसान हितों को भी प्राथमिकता दी जा रही है।  जमीनी असर कब दिखेगा नई मुआवजा व्यवस्था लागू होने के बाद इसका असर धीरे-धीरे जिलों में दिखाई देगा. जहां भी नई ट्रांसमिशन लाइनें बनेंगी या पुराने मामलों का निपटारा होगा, वहां किसानों को इसका फायदा मिलेगा. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर इस नीति को सही तरीके से लागू किया गया, तो यह आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकता है।   

नई सरकार के शपथ ग्रहण में 9 मई की तारीख क्यों है शुभ, BJP का फैसला

कोलकाता  भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में शानदार जीत दर्ज पूर्वी भारत के उस अहम गढ़ में प्रवेश कर लिया. इस शानदार जीत के बाद बीजेपी ने नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के लिए 9 मई की तारीख तय की है. ऐसे में लोग जानना चाहते हैं कि बीजेपी ने इस दिन का चयन क्यों किया है. बताया जा रहा है कि बुधवार को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह कोलकाता आएंगे. वह यहां बीजेपी के जीते हुए विधायकों से बातचीत करेंगे जिसके बाद विधायक दल का नेता और बंगाल के नये मुख्यमंत्री के नाम का फैसला होगा  बंगाल के लिए खास है 9 तारीख दरअसल, 9 मई को गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती होती है. बंगाल की संस्कृति से रविंद्र नाथ टैगोर के संगीत और साहित्य का क्या महत्व है यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान तृणूमल कांग्रेस और ममता बनर्जी यही आरोप लगाती रहीं कि बीजेपी सत्ता में आते ही बंगाल की संस्कृति से खिलवाड़ करेगी. ऐसे बीजेपी नई सरकार के गठन के लिए रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती का दिन चुना है, ताकि वह टीएमसी के आरोपों का जवाब दे सके कि बीजेपी बंगाल की सभ्यता और संस्कृति का कितना ख्याल करती है. पश्चिम बंगाल BJP अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने भी 9 मई की तारीख पर मुहर लगाई है  बंगाल में बीजेपी की जीत है खास पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह निर्णायक जीत सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने ममता बनर्जी के लंबे वर्चस्व को बड़ा झटका देते हुए राज्य की राजनीति को नया स्वरूप दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘जनता की शक्ति और सुशासन की जीत’ बताया. 2014 में सीमित उपस्थिति से शुरू हुई भाजपा की यात्रा 2019 में उभार, 2021 में चुनौतियों और अब 2026 में स्पष्ट जनादेश तक पहुंची है।  यह जीत राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की मजबूत होती राजनीतिक पकड़ को भी दर्शाती है. पार्टी ने अपनी रणनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा, घुसपैठ रोकने, सीमा बाड़बंदी, सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा, सीएए और यूसीसी जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी. साथ ही, कानून-व्यवस्था, औद्योगिक विकास, महिलाओं की सुरक्षा और केंद्र की योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया।  प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह जैसे शीर्ष नेताओं के आक्रामक प्रचार ने सत्ता विरोधी लहर को मजबूत किया. हालांकि, जीत के बाद भाजपा के सामने ध्रुवीकृत समाज, क्षेत्रीय पहचान और तृणमूल कांग्रेस के मजबूत विपक्ष जैसी चुनौतियां बनी रहेंगी।  इसके बावजूद, यह परिणाम एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है, जिसने भाजपा को चुनौती देने वाली पार्टी से सत्तारूढ़ शक्ति में बदल दिया है और बंगाल की राजनीति को नए दौर में पहुंचा दिया है। 

कर्मचारियों के लिए खुशखबरी: 8वें वेतन आयोग से सैलरी 283% तक बढ़ सकती है

नई दिल्ली केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वें वेतन आयोग को लेकर एक बड़ी खबर है। नेशनल काउंसिल (JCM) के स्टाफ साइड ने सरकार को ज्ञापन सौंपते हुए 3.83 के फिटमेंट फैक्टर की मांग की है। अगर यह मांग मंजूर हो जाती है, तो कर्मचारियों की न्यूनतम मूल सैलरी और पेंशन में 283% तक का ऐतिहासिक उछाल आ सकता है। क्या है 3.83 फिटमेंट फैक्टर और इससे कितनी बढ़ेगी सैलरी? फिटमेंट फैक्टर वह गुणांक है, जिससे मौजूदा बेसिक सैलरी को गुणा किया जाता है। 7वें वेतन आयोग में यह फैक्टर 2.57 था। अब JCM ने इसे बढ़ाकर 3.83 करने की मांग रखी है। अगर मांग मान ली जाती है तो मौजूदा न्यूनतम मूल वेतन ₹18,000 × 3.83 = ₹68,940 हो जाएगा। वहीं, न्यूनतम पेंशन ₹9,000 से बढ़कर ₹34,470 हो जाएगा। यानी सैलरी और पेंशन दोनों में 283% की बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन यह सिर्फ कर्मचारियों की मांग है, अंतिम फैसला सरकार करेगी। क्या वाकई 283% बढ़ोतरी मिलेगी? हालांकि, 283% का आंकड़ा काफी चर्चा में है, लेकिन पिछले अनुभवों से समझा जा सकता है कि सरकार आमतौर पर कर्मचारियों की मांग से कम फिटमेंट फैक्टर तय करती है। एक्सपर्ट्स के अनुमान के अनुसार, सरकार 1.8 से 2.86 के बीच फिटमेंट फैक्टर लागू कर सकती है। ऐसे में असली बढ़ोतरी करीब 13% से 35% के बीच रहने की संभावना है, न कि 283%। फिर भी, यह केंद्रीय कर्मचारियों के लिए एक बड़ा फायदा होगा। कर्मचारियों की अन्य प्रमुख मांगें क्या हैं? JCM ने सिर्फ सैलरी बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा है। उनकी अन्य प्रमुख मांगों में ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की बहाली, वेतन स्तरों को घटाकर सिर्फ 7 लेवल करना, हाउस रेंट अलाउंस (HRA) 30% करना, सालाना इंक्रीमेंट 3% से बढ़ाकर 6% करना, और 30 साल की सेवा में कम से कम 5 प्रमोशन सुनिश्चित करना शामिल है। इन मांगों पर सरकार का फैसला अभी बाकी है। कब बना 8वां वेतन आयोग और कब मिलेगा फायदा? 8वें वेतन आयोग के गठन की घोषणा जनवरी 2025 में हुई थी। 3 नवंबर 2025 को इसका औपचारिक गठन किया गया। आयोग को अपनी रिपोर्ट देने के लिए 18 महीने का समय मिला है। उम्मीद है कि सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जाएंगी, भले ही औपचारिक लागू होने में देरी हो। संभावित तारीखों के अनुसार, कर्मचारियों को 2027 के अंत या 2028 की शुरुआत तक बढ़ी हुई सैलरी और पेंशन मिलना शुरू हो जाएगा। 7वां और 8वां वेतन आयोग में तुलना अगर 7वें वेतन आयोग की बात करें, तो उसमें फिटमेंट फैक्टर 2.57 था, जिससे न्यूनतम मूल वेतन ₹18,000 और अधिकतम ₹2,50,000 था। वहीं 8वें वेतन आयोग के लिए प्रस्तावित 3.83 फैक्टर से न्यूनतम मूल वेतन ₹68,940 हो सकता है। हालांकि, एक्सपर्ट्स अनुमान बताते हैं कि असली फैक्टर 2.86 के आसपास हो सकता है, जिससे न्यूनतम वेतन करीब ₹51,480 बनता है। क्या पेंशनर्स को भी फायदा होगा? जी हां, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें सभी केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स पर समान रूप से लागू होंगी। जिस फिटमेंट फैक्टर से सक्रिय कर्मचारियों की सैलरी बढ़ेगी, उसी फैक्टर से पेंशनभोगियों की पेंशन भी बढ़ाई जाएगी। साथ ही, पिछली तारीख (1 जनवरी 2026) से एरियर भी दिया जाना संभव है।