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भाजपा प्रदेश कार्यसमिति होगी अपडेट, 75% नए सदस्य और कुल 106 सदस्य होंगे शामिल

भोपाल   भाजपा प्रदेश संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी चल रही है। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में संगठन को अधिक प्रभावी और चुस्त बनाने के लिए प्रदेश कार्यसमिति के आकार में कटौती का प्रस्ताव तेजी से आगे बढ़ रहा है। सूत्रों के अनुसार, लंबे समय बाद कार्यसमिति के सदस्यों की संख्या को करीब 50 प्रतिशत तक कम करने पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। वर्तमान में 62 संगठनात्मक जिलों में कुल 463 सदस्य हैं, जिनमें 187 प्रदेश कार्यसमिति सदस्य, 52 स्थायी आमंत्रित और 224 विशेष आमंत्रित सदस्य शामिल हैं। नए प्रस्ताव के तहत इस संख्या को घटाकर सिर्फ 106 तक सीमित करने की योजना है। इसके साथ ही विशेष आमंत्रित सदस्यों की संख्या को भी नियंत्रित करने का फार्मूला तैयार किया गया है। नई व्यवस्था के अनुसार, विशेष आमंत्रित सदस्य कुल संख्या के अधिकतम 30 प्रतिशत तक ही रखे जाएंगे, जिससे संगठन में संतुलन और कार्यक्षमता दोनों बढ़ाई जा सके। ओरछा में प्रस्तावित प्रदेश कार्यसमिति बैठक से पहले ही इस नए ढांचे को लागू करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। खास बात यह भी सामने आ रही है कि इस बार कार्यसमिति में करीब 75 प्रतिशत नए चेहरों को मौका मिल सकता है, जिससे संगठन में नई ऊर्जा और ताजगी आने की उम्मीद है।

लंबित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए प्रदेश में 9 मई को नेशनल लोक अदालत आयोजित

नेशनल लोक अदालत लंबित प्रकरणों के त्वरित निराकरण के लिए प्रदेश में 9 मई को नेशनल लोक अदालत संपत्ति एवं जल कर के सरचार्ज (अधिभार) में मिलेगी 100 प्रतिशत तक की छूट भोपाल मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रदेश में 9 मई शनिवार को 'नेशनल लोक अदालत' का वृहद स्तर पर आयोजन किया जा रहा है। नागरिकों के कल्याण और उन्हें आर्थिक संबल प्रदान करने के उद्देश्य से राज्य शासन द्वारा यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। नेशनल लोक अदालत में नागरिकों को विशेष सुविधा प्रदान करते हुए संपत्तिकर, जलकर एवं अन्य उपभोक्ता कर के लंबित प्रकरणों में देय अधिभार (सरचार्ज) पर 100 प्रतिशत तक की अभूतपूर्व छूट प्रदान की जा रही है। योजना के प्रावधानों के अंतर्गत 50 हजार रुपये तक के संपत्तिकर और 10 हजार रुपये तक के जल कर की बकाया राशि वाले प्रकरणों में सरचार्ज पूर्णतः माफ किया जाएगा। इससे अधिक की बकाया राशि होने पर निर्धारित स्लैब के अनुरूप सरचार्ज में 25 से 75 प्रतिशत तक की रियायत का प्रावधान किया गया है। वित्तीय वर्ष 2025-26 तक की बकाया राशि पर यह विशेष छूट वन टाइम सेटलमेंट के रूप में देय होगी। इसयोजना का लाभ प्राप्त करने वाले नागरिकों को छूट के उपरांत शेष राशि अधिकतम दो आसान किश्तों में जमा करने की सुविधाजनक व्यवस्था प्रदान की गई है, जिसके अंतर्गत कम से कम 50 प्रतिशत राशि लोक अदालत के दिन ही जमा करना अनिवार्य होगा। राज्य शासन ने प्रदेश के सभी नागरिकों से अपील की है कि वे अधिक से अधिक संख्या में इस नेशनल लोक अदालत में सहभागिता कर अपने लंबित प्रकरणों का निराकरण करवाएं और शासन द्वारा प्रदाय की जा रही इस विशेष छूट का अधिकतम लाभ उठाएं।    लोक अदालत के माध्यम से नगरीय निकायों के लंबित प्रकरणों का त्वरित एवं सुलभ निराकरण किया जाएगा, जिससे आमजनों को व्यापक राहत मिलेगी। शासन की इस जन-कल्याणकारी पहल से नागरिकों को न केवल करों के भारी बोझ से मुक्ति प्राप्त होगी, बल्कि इसके फलस्वरूप नगरीय निकायों को भी एकमुश्त राजस्व की प्राप्ति सुनिश्चित हो सकेगी।

चुनावी जीत के बाद MP में सियासी गतिविधियां बढ़ीं, जल्द होगा कैबिनेट विस्तार

 भोपाल बंगाल समेत पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद अब मध्य प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है. बंगाल, असम और पुडुचेरी में बीजेपी के पक्ष में आए चुनाव परिणामों ने उस प्रक्रिया को फिर से गति देने के संकेत दिए हैं, जो चुनावों के चलते कुछ समय के लिए थम गई थी. सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री मोहन यादव की अगुवाई वाली सरकार में इस साल कैबिनेट विस्तार और फेरबदल संभव है।  पिछले कुछ महीनों में कई मंत्रियों के बयानों और बॉडी लैंग्वेज ने संगठन को असहज किया है. सार्वजनिक मतभेद और बयानबाजी ने इन संकेतों को और स्पष्ट किया. इसी को देखते हुए मंत्रियों का परफॉर्मेंस ऑडिट कराया गया, जिसकी रिपोर्ट अब पार्टी हाईकमान के पास है. मंत्रियों के कामकाज और संगठन के साथ समन्वय की समीक्षा की गई है, और माना जा रहा है कि इन्हीं आधारों पर मंत्रिमंडल में फेरबदल के फैसले लिए जा सकते हैं।  राजनीतिक दृष्टि से यह फेरबदल अहम माना जा रहा है, क्योंकि राज्य सरकार अपने कार्यकाल के मध्य चरण में पहुंच चुकी है. मोहन सरकार के करीब ढाई साल पूरे हो चुके हैं और अगले ढाई साल चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होंगे. ऐसे में पार्टी किसी भी तरह का जोखिम लेने के मूड में नहीं है और समय रहते संगठन और सरकार के बीच तालमेल मजबूत करना चाहती है।  कराया गया है मंत्रियों के कामकाज का मूल्यांकन दरअसल, पिछले कुछ महीनों में कई मंत्रियों के बयानों और बॉडी लैंग्वेज ने संगठन को असहज किया है. सार्वजनिक मतभेद और बयानबाजी ने इन संकेतों को और स्पष्ट कर दिया था. यही वजह है कि मंत्रियों का परफॉर्मेंस ऑडिट कराया गया, जिसकी रिपोर्ट अब हाईकमान के पास है. मंत्रियों के कामकाज का मूल्यांकन कराया गया है. संगठन ने जो समन्वय बढ़ाने के निर्देश दिए थे, उनकी भी परीक्षा अब इस फेरबदल में होगी. राजनीतिक तौर पर यह फेरबदल बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि राज्य सरकार अपने कार्यकाल के मध्य बिंदु पर लगभग पहुंच चुकी है यानी मोहन सरकार के ढाई साल पूरे हो चुके हैं. अगले ढाई साल पूरी तरह चुनावी मोड में होंगे. ऐसे में पार्टी कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं दिख रही और मान कर चल रही है कि कैबिनेट में फेरबदल या विस्तार का यही सही समय है।  कैबिनेट में विस्तार करने की गुंजाइश अभी बाकी संख्या के लिहाज से भी देखा जाए तो कैबिनेट में विस्तार करने की गुंजाइश अभी बाकी है. फिलहाल मोहन कैबिनेट में 31 मंत्री हैं, जबकि अधिकतम संख्या 35 हो सकती है यानी चार नए चेहरों की एंट्री करने की संभावना बाकी है. लेकिन सवाल यह है कि इसके साथ ही क्या मौजूदा मंत्रियों की विदाई होगी या बचे हुए चार खाली मंत्री पदों पर नियुक्तियां होंगी. सवाल इस बात का भी है कि क्या गुजरात की ही तर्ज पर यहां भी तो कहीं पूरी कैबिनेट को नहीं बदल दिया जाएगा? हालांकि इसकी संभावना यहां इसलिए कम है क्योंकि गुजरात के अलावा अन्य किसी राज्य में बीजेपी ने पूरी कैबिनेट को नहीं बदला. इसी साल मार्च में बीजेपी शासित उत्तराखंड में  पूरी कैबिनेट बदलने के बजाय, धामी सरकार ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 5 नए चेहरों को मंत्री पद की शपथ दिलाई थी।  संख्या के लिहाज से भी कैबिनेट विस्तार की गुंजाइश बनी हुई है. फिलहाल मंत्रिमंडल में 31 मंत्री हैं, जबकि अधिकतम संख्या 35 हो सकती है. यानी चार नए चेहरों को शामिल किए जाने की संभावना है. हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि नए मंत्रियों की एंट्री के साथ कुछ मौजूदा मंत्रियों की छुट्टी होगी या सिर्फ खाली पदों को भरा जाएगा. एक सवाल यह भी है कि क्या गुजरात की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी पूरी कैबिनेट बदली जा सकती है।  हालांकि इसकी संभावना कम मानी जा रही है, क्योंकि बीजेपी ने गुजरात के अलावा अन्य राज्यों में ऐसा कदम नहीं उठाया है. हाल ही में उत्तराखंड में भी कैबिनेट विस्तार के तहत नए चेहरों को शामिल किया गया, लेकिन पूरी कैबिनेट नहीं बदली गई. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 5 नए चेहरों को मंत्री पद की शपथ दिलाई थी।  मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें तेज हालांकि राजनीतिक गलियारों में इस भेंट को मंत्रिमंडल विस्तार और संभावित बदलावों से जोड़कर देखा जा रहा है। चुनावी नतीजों के बाद संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर संतुलन साधने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। ‘गुजरात मॉडल’ की तर्ज पर बदलाव की चर्चा सूत्रों के अनुसार, मॉडल की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी बड़ा कदम उठाया जा सकता है। गुजरात में पूर्व में सभी मंत्रियों से इस्तीफा लेकर पूरी तरह नया मंत्रिमंडल गठित किया गया था। इसी तरह का प्रयोग मध्यप्रदेश में भी संभव माना जा रहा है, हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। आधिकारिक ऐलान का इंतजार फिलहाल सरकार की ओर से मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। लेकिन हालिया राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए आने वाले दिनों में बड़ा फैसला सामने आ सकता है।

IMF की वॉर्निंग: युद्ध से वैश्विक संकट गहरा, भविष्य और खराब होने का अंदेशा

  नई दिल्ली    अमेरिका और ईरान के बीच हमलों की खबर से एक बार फिर ग्लोबल टेंशन चरम पर पहुंच गई है. कच्चे तेल की कीमतों में आग लग गई है. दोनों देशों के बीच शांति वार्ता की तमाम कोशिशें होर्मुज स्ट्रेट पर आकर फेल हो रही हैं. न तो डोनाल्ड ट्रंप Hormuz Strait पर पीछे हटने को तैयार हैं, न ही ईरान हथियार डालने के मूड में नजर आ रहा है।  मिडिल ईस्ट में गहराए इस तनाव को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF ने बड़ी चेतावनी दी है. आईएमएफ चीफ ने कहा है कि अगर ये युद्ध 2027 तक चला, तो इसके सबसे बुरे परिणाम देखने को मिलेंगे।  अनुमान से ज्यादा बुरे परिणाम आईएमएफ ने चेतावनी देते हुए कहा है कि दुनिया में महंगाई पहले से ही बढ़ रही है. इस बीच मिडिल ईस्ट युद्ध एक और बड़ा संकट बनकर सामने आया है. IMF Chief क्रिस्टलीना जॉर्जीवा ने कहा कि अगर अमेरिका-ईरान के बीच ये युद्ध 2027 तक खिंचता है और इसके चलते कच्चे तेल की कीमतें लगभग 125 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनुमान से कहीं ज्यादा बुरे परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।  जॉर्जीवा ने आगे कहा कि US-Iran War को लेकर अब तक जो पूर्वानुमान जताए गए थे, वो धरे रहते जा रहे हैं. इसके साथ ही इनमें जाहिर किए गए ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ में गिरानट के बाद इसके 3.1 फीसदी और महंगाई के 4.4 फीसदी रहने के अनुमान पीछे छूटते जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि हर बीतते दिन के साथ ये अनुमान बेकार होते जा रहे हैं।  IMF Chief के मुताबिक, युद्ध का जारी रहना, तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल या उससे अधिक पर बने रहना और इसके चलते महंगाई के बढ़ते दबाव का साफ मतलब है कि हालात आगे खराब होने वाले हैं और आईएमएफ का आउटलुक अब आधार बन चुका है. इसमें कहा गया है कि 2026 में वैश्विक ग्रोथ 2.5 फीसदी तक गिर सकती है, जबकि महंगाई का बम फूट सकता है और ये 5.4 फीसदी पर पहुंच सकती है।  Hormuz बंद होने से बिगड़ेंगे हालात शेवरॉन (Chevron) के चेयरमैन और सीईओ माइक विर्थ ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण दुनिया भर में तेल आपूर्ति में भौतिक कमी दिखाई देने लगेगी, जिसके माध्यम से युद्ध से पहले वैश्विक कच्चे तेल की आपूर्ति का 20% हिस्सा गुजरता था. विर्थ के मुताबिक, लंबे समय तक युद्ध चला तो दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं सिकुड़ने लगेंगी, सबसे पहले एशिया में बुरा असर देखने को मिलेगा।  IMF की हालात पर पैनी नजर क्रिस्टलीना जॉर्जीवा ने कहा कि IMF इस संघर्ष के सप्लाई चेन पर पड़ने वाले धीमे असर पर बारीकी से नजर रख रहा है. इसके असर को देखें, तो खाद पहले से ही 30% से 40% महंगी हो चुकी है, जिससे खाने-पीने की चीजों के दाम 3% से 6% तक बढ़ सकती हैं. सिर्फ खाने-पीने की चीजें ही नहीं, बल्कि दूसरे बिजनेस भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।  उन्होंने आगे कहा, 'मैं जिस बात पर जोर देना चाहती हूं, वह यह है कि यह वाकई बहुत गंभीर मामला बनता जा रहा है. कई पॉलिसी मेकर्स अभी भी ऐसा बर्ताव कर रहे हैं, मानो यह संकट कुछ ही महीनों में खत्म हो जाएगा. वे उपभोक्ताओं और व्यवसायों पर पड़ने वाले असर को कम करने के लिए ऐसे कदम उठा रहे हैं, जिससे तेल की डिमांड लगातार हाई पर बनी हुई है। 

अमित शाह तय करेंगे बंगाल का सीएम, ये नेता हैं संभावित दावेदार

कोलकाता  पश्चिम बंगाल में 15 साल के बाद सत्ता परिवर्तन हो गया है और बीजेपी सरकार के शपथ ग्रहण की तारीख भी फाइनल हो गई है. सूबे के सियासी इतिहास में पहली बार बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनने जा रही है. ऐसे में सभी की मन में एक ही सवाल है कि बीजेपी किसे मुख्यमंत्री बनाकर सत्ता की कमान सौंपी जाएगी।  केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद बंगाल के पर्यवेक्षक के तौर पर आज गुरुवार शाम कोलकाता पहुंच रहे हैं. इस दौरान वो बीजेपी विधायकों के साथ बातचीत कर मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान करेंगे. मुख्यमंत्री की रेस में कई नेताओं के नाम चल रहे हैं, जिसमें ममता बनर्जी को मात देने वाले शुभेंदु अधिकारी का नाम सबसे आगे है।  बंगाल में सीएम की रेस में शुभेंदु अधिकारी ही नहीं बल्कि बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य से लेकर दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉलऔर सुकांत मजूमदार जैसे आधा दर्जन नेताओं के नाम शामिल है. ऐसे में सवाल उठता है कि अमित शाह के सियासी क्राइटेरिया में कौन नेता फिट बैठेगा?  बंगाल सीएम के लिए शाह की क्राइटेरिया? पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले फेज की वोटिंग के बाद ही अमित शाह ने संकेत दे दिए थे कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा? कोलकाता में प्रेस कॉफ्रेंस के दौरान अमित शाह से पूछा गया था कि बीजेपी सत्ता में आती है तो बंगाल में कौन मुख्यमंत्री होगा. इसका जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा था कि जो भी होगा बंगाल की धरती का बेटा है, बंगाल में पढ़ा-लिखा है, बंगाली बोलता है और बीजेपी का कार्यकर्ता है, वही मुख्यमंत्री होगा? अमित शाह ने कहा था कि मैं बंगाल के लोगों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि अगला मुख्यमंत्री कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जो बंगाल में पैदा हुआ और पढ़ा-लिखा हो, और बंगाली अच्छी तरह बोलता हो. इस तरह से अमित शाह ने बीजेपी के सीएम बनाने की क्राइटेरिया बता दी थी. अब बीजेपी सत्ता में आई है तो उस लिहाज से नए मुख्यमंत्री का चयन होगा, जिसे अमलीजामा पहनाने के लिए खुद पर्यवेक्षक के तौर पर कोलकाता जा रहे हैं, जहां विधायकों से बातचीत करके नए सीएम के नाम का ऐलान करेंगे?  शुभेंदु अधिकारी बनेंगे अमित शाह की पसंद अमित शाह के क्राइटेरिया में शुभेंदु अधिकारी सबसे फिट बैठते हैं. भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी को हराकर शुभेंदु अधिकारी ने अपनी ताकत साबित की है. बंगाल से दिल्ली तक के सियासी कॉरिडोर में सबसे ज्यादा चर्चा शुभेंदु की हो रही है. सुवेंदु अधिकारी ने 2021 में नंदीग्राम में ममता को हराया था और विपक्ष के नेता बने थे और इस बार उन्होंने नंदीग्राम से जीतने के साथ-साथ भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को 15,000 से ज्यादा वोटों से मात दी है. ऐसे में सुवेंदु अधिकारी के नाम को नजरअंदाज करना मुश्किल है।  शुभेंदु अधिकारी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के क्राइटेरिया में भी फिट बैठ रहे हैं. बंगाल में जन्म लिए हैं और बंगाल में पढ़े लिखे हैं. यही नहीं बीजेपी में आए हुए भी उन्हें छह साल हो गए  हैं. अमित शाह को ऐसे नेता पसंद आते हैं, जो 'आक्रामक' होनेके साथ प्रशासन पर मजबूत पकड़ रखता हो. शुभेंदु के पास मंत्री रहने का भी अनुभव है और वे राज्य के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं.'हिंदुत्व' और 'विकास' के समन्वय के लिए वे शाह की पहली पसंद हो सकते हैं।  समिक भट्टाचार्य कहीं छुपे रुस्तम न साबित हों? पश्चिम बंगाल की राजनीति में सुवेंदु अधिकारी जहां नैचुरल दावेदार हैं तो वहीं उनके बाद समिक भट्टाचार्य का नाम है. समिक भट्टाचार्य एक ऐसा नाम हैं,जिन्हें बीजेपी का 'बौद्धिक चेहरा'माना जाता है. चुनाव नतीजों के बाद जब अमित शाह कोलकाता में मुख्यमंत्री के नाम पर मंथन कर रहे हैं, तो समिक भट्टाचार्य का नाम 'डार्क हॉर्स' (छुपा-रुस्तम) के रूप में तेजी से उभरा है. संघ और बीजेपी दोनों की पसंद माने जाते हैं।  समिक भट्टाचार्य के पास बंगाली-शिक्षिक मिडिल-क्लास और सभी ग्रुप्स के बीच कोऑर्डिनेशन बनाए रखने की क्षमता है. भट्टाचार्य पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से एक अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने शाह और सुनील बंसल मार्गदर्शन में पार्टी के पुराने नेताओं को एक साथ रखकर कमल खिलाने में कामयाब रहे.समिक में बंगालियों और बंगाली कल्चर को रिप्रेजेंट करने की काबिलियत है. अमित शाह ये भी जानते हैं कि बंगाल की सत्ता चलाने के लिए केवल आक्रामकता काफी नहीं है,बल्कि बंगाल के प्रबुद्ध समाज (इंटेलिजेंटिया) को साथ लेना भी जरूरी है।  दिलीप घोष बीजेपी के'जमीनी योद्धा' और कैडर की पसंद बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का नाम भी सीएम की रेस में है. बंगाल में बीजेपी को शून्य से शिखर तक पहुंचाने में दिलीप घोष का अहम रोल रहा है. वे 'खालिस बंगाली' अंदाज में बात करते हैं और कार्यकर्ताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं. अमित शाह को ऐसा व्यक्ति पसंद है जो मुश्किल वक्त में पार्टी के साथ खड़ा रहा हो. हालांकि, दिलीप घोष की बेबाक बयानबाजी कभी-कभी अनुशासन के आड़े आती है, लेकिन उनकी 'फाइटिंग स्पिरिट' उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है।  सुकांत मजूमदार 'संगठन'और 'शालीनता' का मेल पश्चिम बंगाल में सीएम की रेस में अमित शाह किसी ऐसे चेहरे की तलाश में हैं, जो विवादों से दूर रहे और संगठन के साथ तालमेल बिठा सके, तो सुकांत मजूमदार रेस में आगे हैं. वे पढ़े-लिखे हैं (प्रोफेसर रहे हैं) और पश्चिम बंगाल के भद्रलोक समाज में उनकी अच्छी छवि है. सुकांत एक 'लो-प्रोफाइल' लेकिन मेहनती नेता हैं, जो संघ (RSS) और पार्टी के बीच सेतु का काम कर सकते हैं. बीजेपी अपने फैसले से अक्सर चौंकाती रही है।  अग्निमित्रा पॉल 'महिला शक्ति' और नया प्रयोग बीजेपी पश्चिम बंगाल में 'महिला मुख्यमंत्री' का कार्ड खेलते हैं, तो अग्निमित्रा पॉल बड़ी दावेदार होंगी. दूसरी बार बीजेपी के टिकट पर विधायक बनी है. बंगाल में उन्होंने महिला सुरक्षा और 'आरजी कर' जैसे मुद्दों पर ममता सरकार को पुरजोर तरीके से घेरा है. बंगाल में 'नारी शक्ति' ने बीजेपी को वोट दिया है. ममता बनर्जी के जवाब में एक महिला मुख्यमंत्री देना शाह की 'मास्टरस्ट्रोक' वाली राजनीति का हिस्सा हो सकता है।  उत्पल महाराज को बंगाल का योगी कहा जाता है? पश्चिम बंगाल में एक नाम और भी चर्चा में है, जो उत्पल महाराज है. उन्हें बंगाल का योगी … Read more