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MP को मिलेगा नया रेल इंफ्रास्ट्रक्चर बूस्ट, 11 हजार करोड़ की परियोजना से बढ़ेगी कनेक्टिविटी

 कटनी/बीना  मध्यप्रदेश में रेलवे नेटवर्क विस्तार की दो बड़ी परियोजनाओं को केंद्र सरकार ने मंजूरी देकर प्रदेश के यात्री और माल परिवहन ढांचे को नई दिशा दी है। इटारसी-भोपाल-बीना रेलखंड पर चौथी रेल लाइन और न्यू कटनी जंक्शन से सिंगरौली तक तीसरी- चौथी रेल लाइन परियोजना शुरू होने से रेलवे की संचालन क्षमता में बड़ा इजाफा होगा। दोनों परियोजनाओं पर मिलाकर 11 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए जाएंगे। रेलवे अधिकारियों के अनुसार परियोजनाओं से न केवल ट्रेनों की इन लेटलतीफी कम होगी, बल्कि प्रदेश के औद्योगिक क्षेत्रों को भी लाभ मिलेगा। इटारसी-भोपाल-बीना रेलखंड देश के सबसे व्यस्त मार्गों में शामिल इटारसी-भोपाल-बीना रेलखंड देश के सबसे व्यस्त मार्गों में शामिल है। यहां यात्री और मालगाडिय़ों का भारी दबाव रहता है। इधर पश्चिम मध्य रेलवे के न्यू कटनी जंक्शन से सिंगरौली तक तीसरी और चौथी रेल लाइन परियोजना से सिंगरौली की कोयला तथा कटनी के सीमेंट उद्योगों को फायदा पहुंचेगा। करीब 4329 करोड़ रुपए की इस परियोजनाा में 9 सुरंगें, 39 बड़े और 151 छोटे पुल, 43 ओवरब्रिज और 39 अंडरब्रिज बनेंगे रेलवे ने इटारसी-भोपाल-बीना रेलखंड चौथी रेल लाइन बनाने का निर्णय लिया है। यह लाइन 237 किमी लंबी बनेगी। करीब 4329 करोड़ रुपए की इस परियोजनाा में 9 सुरंगें, 39 बड़े और 151 छोटे पुल, 43 ओवरब्रिज और 39 अंडरब्रिज बनेंगे। रेलवे ने इस वित्तीय वर्ष में इसके लिए 100 करोड़ रुपए जारी भी कर दिए हैं। जबलपुर मंडल अंतर्गत न्यू कटनी जंक्शन से सिंगरौली तक तीसरी और चौथी रेल लाइन परियोजना को भारत सरकार ने स्पेशल रेलवे प्रोजेक्ट घोषित किया वहीं पश्चिम मध्य रेलवे के जबलपुर मंडल अंतर्गत न्यू कटनी जंक्शन से सिंगरौली तक तीसरी और चौथी रेल लाइन परियोजना को भारत सरकार ने स्पेशल रेलवे प्रोजेक्ट घोषित किया है। 264 किमी के इस कॉरिडोर पर 6779.87 करोड़ खर्च होंगे। परियोजना कटनी, उमरिया, शहडोल, सीधी और सिंगरौली जिलों से होकर गुजरेगी। इसके सिंगरौली की कोयला और ऊर्जा बेल्ट तथा कटनी के सीमेंट व खनिज उद्योगों को इससे सबसे अधिक फायदा होगा। बता दें कि एमपी का कटनी जिला, प्रदेश के माइनिंग सेेंटर के रूप में उभर रहा है। यहां बाक्साइट की खदानों के साथ ही अब सोना भी मिला है। खदानों में प्रचुर मात्रा में स्वर्ण अयस्क होने का दावा किया जा रहा है। कटनी का सीमेंट उद्योग देशभर में विख्यात है। इन परियोजनाओं को हरी झंडी इटारसी-भोपाल-बीना चौथी रेल लाइन लंबाई: 237 किमी लागत: 4329 करोड़ समयसीमा: 4 वर्ष आवंटन: 100 करोड़ रुपए न्यू कटनी जंक्शन-सिंगरौली तीसरी-चौथी रेल लाइन लंबाई: 264.070 किमी ट्रैक विकास: 578.675 किमी लागत: 6779.87 करोड़ रुपए समयसीमा: 4 वर्ष

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की बड़ी घोषणा, मध्य क्षेत्रीय परिषद् की मेजबानी करेगा उज्जैन

मध्य क्षेत्रीय परिषद् की अगली बैठक होगी उज्जैन में : मुख्यमंत्री डॉ. यादव केन्द्रीय गृह मंत्री शाह बैठक के बाद सिंहस्थ की तैयारियों का करेंगे मुआयना मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने मंत्रि-परिषद की बैठक से पहले मंत्रीगण को सरकार की उपलब्धियों की दी जानकारी उज्जैन  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मध्य क्षेत्रीय परिषद् की अगली (27वीं) बैठक वर्ष 2027 में उज्जैन में होगी। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने 19 मई को बस्तर में परिषद् की 26वीं बैठक में इस आशय की सहमति दे दी है। मध्य क्षेत्रीय परिषद् की बैठक लेने के बाद केन्द्रीय गृह मंत्री शाह उज्जैन में सिंहस्थ-2028 की तैयारी को लेकर हो रही व्यापक नागरिक व्यवस्थाओं, मानव प्रबन्धन एवं आपदा प्रबंधन का भी मुआयना करेंगे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मध्यप्रदेश नक्सल मुक्त हो चुका है। केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने मध्य क्षेत्रीय परिषद् की 26वीं बैठक बस्तर में करके देश में नक्सलवाद की समाप्ति का जन संदेश दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव बुधवार को मंत्रालय में आयोजित मंत्रि-परिषद् की बैठक से पहले मंत्रीगण को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने मंत्रीगण से बीते सप्ताह राज्य में हुई विशेष गतिविधियों और सरकार को मिली उपलब्धियों की जानकारी भी साझा की। मध्यप्रदेश को नक्सल मुक्त बनाने के लिए पुलिस अधिकारी सम्मानित, मुख्यमंत्री ने दी बधाई मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रदेश को नक्सल मुक्त करने में अपने शौर्य और पराक्रम का प्रदर्शन करने वाले पुलिस अधिकारियों को बधाई और शुभकामनाएं दीं हैं। उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री शाह द्वारा पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना, विशेष पुलिस महानिदेशक पंकज श्रीवास्तव सहित 'नक्सल उन्मूलन अभियान' में सक्रिय योगदान देने वाले पुलिस अधिकारियों को सम्मानित किया गया है। भोजशाला पर उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत, मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा लाने का प्रयास करेगी सरकार मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने धार जिले की भोजशाला परिसर को लेकर मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश शांति का टापू है। प्रदेश में कानून व्यवस्था नियंत्रण हमारी प्राथमिकता है। इसमें कोई ढिलाई नहीं बरती जायेगी। उन्होंने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय ने करीब 750 साल पुराने और धार्मिक/ईश वंदना से जुड़े इस मसले का सकारात्मक एवं शांतिपूर्ण समाधान किया है। सरकार इस विषय से जुड़े सभी पक्षों की भावनाओं का सम्मान करते हुए उच्च न्यायालय के निर्णय का पालन करायेगी। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार मां वाग्देवी की वास्तविक प्रतिमा विदेश से स्वदेश लाने के लिए केन्द्र सरकार के साथ हर जरूरी प्रयास एवं समन्वय करेगी। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस महत्वपूर्ण फैसले के मद्देनजर मध्यप्रदेश में शांति, सौहार्द और सद्भावना बनाए रखने के लिए प्रदेशवासियों को सरकार की ओर से बधाई भी दी। प्रधानमंत्री का सम्मान – देश का सम्मान मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे विश्व में भारत का मान बढ़ाया है। उन्हें विदेश में मिल रहा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पूरे देश का सम्मान है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई वृद्धि, किसानों को मिली नई सौगात मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने धान, ज्वार-बाजरा, कपास, तिल, सोयाबीन और अन्य फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करने के लिए केन्द्र सरकार का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि किसान कल्याण वर्ष में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के किसानों को यह नई सौगात दी है। इंडो-फ्रांस कॉन्क्लेव मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने मंत्रीगण को बीते सप्ताह हुए इंडो-फ्रांस कान्क्लेव (भारत-फ्रांस निवेश सम्मेलन) के सफल आयोजन की जानकारी देते हुए कहा कि हमारी सरकार फ्रांस के साथ हर  क्षेत्र में मिलकर काम करेगी। फ्रांस के राजदूत थियरी माथू, आईएफसीसीआई की महानिदेशक सुपायल एस कंवर और लगभग 150 प्रतिनिधियों से इसमें हिस्सा लिया, जिसमें भारतीय और फ्रांसीसी कंपनियों के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, राजनियक, नीति निर्माता, शासकीय अधिकारी और उद्योग प्रतिनिधि शामिल थे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि पोमा रोपवेस, एआई वैनसिटी एण्ड मेडिकेप्स यूनीवर्सिटी, डासाल्ट सिस्टमस, सफलेट, सियस्ट्रा, एन्जी सहित विश्व के प्रमुख औद्योगिक संस्थानों के वरिष्ठ पदाधिकारियों, सीईओ-सीओओ और बहुराष्ट्रीय कंपनी प्रतिनिधियों की इस कान्क्लेव में सहभागिता मध्यप्रदेश सरकार की औद्योगिक नीतियों के प्रति दिनों-दिन बढ़ रहे वैश्विक विश्वास का प्रतीक है। निगम-मंडलों के पदाधिकारियों को मिला प्रशिक्षण, सरकार ने प्रारंभ किया नवाचार मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रदेश में राज्य सरकार के अधीन विभिन्न निगम, मंडल, बोर्ड, आयोग, प्राधिकरणों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं सदस्यों की हाल ही में नियुक्ति की गई है। शासकीय विभागों के प्रमुख निगम, मंडल, बोर्ड, आयोग एवं प्राधिकरण के सभी नवनियुक्त पदाधिकारियों के लिए प्रदेश में पहली बार कार्य प्रशिक्षण एवं उन्मुखीकरण कार्यशाला आयोजित की गई। उन्होंने कहा कि यह हमारी सरकार का एक नवाचारी प्रयास है। इसमें सभी नये पदाधिकारियों को उनके पदीय दायित्वों के निर्वहन की रीति-नीति, नियम-कायदे और वित्त प्रबंधन के संबंध में प्रशिक्षित किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने नवनियुक्त पदाधिकारियों को बधाई देकर सभी से प्रदेश के विकास के लिए काम करने की अपील की।  

BRICS सम्मेलन में भारत का ग्लोबल दम, मोदी-पुतिन-जिनपिंग की मुलाकात पर दुनिया की नजरें

नई दिल्ली दुनिया बहुत जल्द दिल्ली की धमक देखने वाली है. भारत में ब्रिक्स के मंच से नया वर्ल्ड ऑर्डर दिखेगा. पश्चिम एशिया तनाव के बीच एक ही मंच पर दुनिया की सबसे मजबूत तिकड़ी दिखेगी. जी हां, हम बात कर रहे हैं पीएम मोदी, व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग की. सितंबर महीने में ब्रिक्स समिट होने वाली है. यह ब्रिक्स समिट नई दिल्ली में होगी. इस ब्रिक्स समिट में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी व्लादिमीर पुतिन के शामिल होने की संभावना है. अगर ऐसा होता है तो फिर दुनिया को ब्रिक्स के मंच से नया मैसेज जाएगा. ब्रिक्स के मंच से एक नया गठजोड़ आकार लेगा।  रूसी राष्ट्रपति पुतिन का भारत दौरा कन्फर्म है. खुद रूसी साइड ने भी इसकी घोषणा कि है कि पुतिन सितंबर में ब्रिक्स समिट में शामिल होंगे. अब तक शी जिनपिंग को लेकर कोई ऑफिशियल जानकारी नहीं है. हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस का दावा है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी ब्रिक्स समिट में शामिल होंगे. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) नेताओं के शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं।  शी जिनपिंग आएंगे भारत! सूत्रों की मानें तो रूस और चीन की ओर से नई दिल्ली को सूचित किया गया है कि उनके नेता इस सम्मेलन में आने की संभावना है. रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूसी अधिकारियों ने व्लादिमीर पुतिन की ब्रिक्स समिट में उपस्थिति की पुष्टि की है. वह 31 अगस्त और 1 सितंबर को किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन में भी शामिल होंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी SCO सम्मेलन में शामिल होने की संभावना है।  क्यों अहम है जिनपिंग का भारत दौरा अगर शी जिनपिंग ब्रिक्स समिट में आते हैं तो यह बड़ी खबर होगी. दुनिया के लिए भी एक मैसेज होगा. अमेरिका के कान खड़े हो जाएंगे. वैसे भी डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स से बहुत जलते हैं. वह ब्रिक्स को मजबूत होता नहीं देखना चाहते. वह ब्रिक्स की ताकत से डरते हैं. वह ब्रिक्स को लेकर काफी जहर उगल चुके हैं. ऐसे में अगर ब्रिक्स के मंच से पीएम मोदी, शी जिनपिंग और पुतिन की तिकड़ी दिखती है तो पूरी दुनिया में खलबली मचेगी।  अब सुधरने लगे रिश्ते वैसे भी चीन और भारत के जिस तरह से रिश्ते उठा-पटक वाले रहे हैं, ऐसे में शी जिनपिंग का ब्रिक्स समिट में शामिल होना, बड़ी बात होगी. सबसे अधिक चर्चा जिनपिंग के भारत दौरे की ही होगी. शी जिनपिंग का अक्टूबर 2019 के बाद भारत का पहला दौरा होगा. 2019 में जब वह भारत आए थे, तब वह चेन्नई के पास मामल्लापुरम में पीएम मोदी से मिले थे. हालांकि, भारत और चीन के बीच रिश्ते अप्रैल-मई 2020 में सीमा पर गतिरोध शुरू होने के बाद बिगड़ गए थे. गलवान संघर्ष ने दोनों देशों के बीच दूरी और बढ़ा दी. हालांकि, संबंधों को स्थिर करने की प्रक्रिया अक्टूबर 2024 में रूस के कजान में आयोजित ब्रिक्स समिट के दौरान हुई थी. तब पीएम मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी. उसी समय दोनों पक्षों ने पूर्वी लद्दाख में एलएसी यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की वापसी पूरी करने का फैसला किया था।  भारत-चीन रिश्तों में सुधार     पिछले डेढ़ साल में भारत और चीन ने संबंधों को स्थिर करने में काफी प्रगति की है. इसमें सीधी उड़ानों की बहाली, वीजा जारी करना, चीनी कंपनियों पर लगी पाबंदियों में ढील और कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली शामिल है।      हालांकि, एलएसी पर अभी भी 50,000 से ज्यादा सैनिक तैनात हैं. सैनिकों की वापसी और तनाव कम करने की प्रक्रिया अब भी जारी है।      पिछले हफ्ते ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी. उसी में चीनी राष्ट्रपति के भारत दौरे की पटकथा लिखी गई है।   

भारत सरकार ने कसे CAA नियम, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वालों पर बढ़ी निगरानी

कोलकाता/ नई दिल्ली केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के तहत भारतीय नागरिकता पाने की प्रक्रिया को और सख्त कर दिया है. गृह मंत्रालय ने सोमवार को एक नया नोटिफिकेशन जारी कर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए धार्मिक अल्पसंख्यक आवेदकों के लिए अतिरिक्त खुलासे अनिवार्य कर दिए. अब इन देशों से भारत आने वाले हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी समुदाय के लोगों को यह बताना होगा कि उनके पास इन देशों का कोई वैध या एक्सपायर्ड पासपोर्ट है या नहीं. अगर पासपोर्ट है, तो उसकी पूरी जानकारी देनी होगी और भारतीय नागरिकता मिलने के 15 दिन के भीतर उसे सरेंडर भी करना पड़ेगा।  गृह मंत्रालय के इस फैसले को CAA प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुरक्षा बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. अधिकारियों के मुताबिक, हाल के दिनों में ऐसे कई मामले सामने आए थे, जिनमें कुछ आवेदकों के पास पुराने या अमान्य विदेशी पासपोर्ट पाए गए. भारतीय कानून के तहत दोहरी नागरिकता और दो पासपोर्ट रखने की अनुमति नहीं है. ऐसे में सरकार अब यह सुनिश्चित करना चाहती है कि भारत की नागरिकता मिलने के बाद कोई व्यक्ति दूसरे देश की पहचान या दस्तावेज का इस्तेमाल न कर सके।  CAA का क्या है नया नियम? नए नियमों के मुताबिक, हर आवेदक को शपथ पत्र के जरिए यह घोषित करना होगा कि उसके पास पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान सरकार की ओर से जारी कोई वैध या एक्सपायर्ड पासपोर्ट नहीं है. अगर किसी के पास ऐसा दस्तावेज है, तो उसे पासपोर्ट नंबर, जारी करने की जगह, जारी होने की तारीख और एक्सपायरी डेट जैसी पूरी जानकारी देनी होगी. इसके बाद नागरिकता मंजूर होने पर 15 दिनों के भीतर वह पासपोर्ट संबंधित देश के दूतावास या उचित प्राधिकरण के पास जमा करना होगा।  क्यों हुआ यह बदलाव? दरअसल 2019 में पारित नागरिकता संशोधन कानून का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न का सामना कर भारत आए छह अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने का रास्ता आसान बनाना था. इनमें हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदाय शामिल हैं. केंद्र सरकार ने 2024 में इस कानून को लागू करने के लिए नियम अधिसूचित किए थे और अब उन्हीं नियमों में संशोधन कर यह नई शर्त जोड़ी गई है।  सरकार का कहना है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और कानूनी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी है. अधिकारियों के अनुसार, कई बार देखा गया कि आवेदक भारत में नागरिकता की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद पुराने विदेशी दस्तावेज अपने पास रखते हैं. इससे पहचान, यात्रा और कानूनी स्थिति को लेकर भ्रम की स्थिति बन सकती है. ऐसे मामलों को रोकने के लिए अब सरकार ने पासपोर्ट सरेंडर को अनिवार्य बना दिया है।  क्या होगा असर? ये नई अधिसूचना ऐसे समय आई है जब भारत की सीमाओं पर अवैध घुसपैठ, फर्जी दस्तावेज और नागरिकता से जुड़े मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं. खासकर बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले लोगों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से सतर्क रही हैं. ऐसे में सरकार अब नागरिकता प्रक्रिया में दस्तावेजों की जांच और खुलासे को ज्यादा सख्त बनाना चाहती है।  इस नए नियम के बाद CAA के तहत आवेदन करने वालों की जांच प्रक्रिया और लंबी तथा कड़ी हो सकती है. आवेदकों को अब अपने पुराने दस्तावेजों का पूरा रिकॉर्ड देना होगा. साथ ही नागरिकता मिलने के बाद विदेशी पासपोर्ट रखने पर कानूनी कार्रवाई भी संभव होगी। 

दिल्ली CM रेखा गुप्ता के बयान के निकाले जा रहे बड़े मायने, BJP की नई रणनीति पर चर्चा तेज

नईदिल्ली  दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्‍ता ने कहा कि अगर घरों में रखी भगवान की मूर्तियां खंडित हो जाएं तो उन्हें कूड़े में मत फेंकिए, सरकार को दीजिए. दिल्ली सरकार इसके लिए कलेक्शन सेंटर बनाएगी. सुनने में यह छोटा फैसला लगता है. लेकिन राजनीति में कई बार सबसे बड़ा खेल वहीं शुरू होता है, जहां लोग कहते हैं- अरे इसमें क्या है? बीजेपी ठीक वहीं खेलती है. क्‍या ऐसा नहीं लगता क‍ि इस बार बीजेपी ने सीधे हिंदूओं के ड्रॉइंग रूम, पूजा घर और भावनाओं के सबसे निजी कोने में एंट्री मार दी है? राजनीत‍ि के जानकारों की मानें तो मैसेज क्‍ल‍ियर है. बीजेपी अब सिर्फ मंदिर बनाने वाली पार्टी नहीं रहना चाहती, वह घर के मंदिर तक पहुंचना चाहती है. हर हिंदू घर में एक छोटा मंदिर होता है. वहां रखी मूर्ति टूट जाए तो लोग असहज हो जाते हैं. फेंकें तो पाप लगेगा, रखें तो कैसे रखें? बीजेपी ने इसी भावनात्मक खाली जगह को पकड़ लिया. अब सरकार कह रही है- भगवान की चिंता मत करो, सरकार है ना! राजनीति में इसे कहते हैं दिल के रास्ते वोट तक पहुंचना।      यह वही बीजेपी है जिसने वर्षों तक मंदिर वहीं बनाएंगे की राजनीति की. लेकिन अब पार्टी उससे दो कदम आगे निकल चुकी है. पहले आंदोलन सड़क पर था, फिर अयोध्या तक पहुंचा, अब सीधा घर के पूजा घर में घुस गया है. यह सिर्फ धार्मिक पहल नहीं, लोगों के द‍िल तक उतरने की बात है. बीजेपी चाहती है कि हिंदू परिवार को हर दिन महसूस हो कि यह सरकार सिर्फ सड़क और बिजली वाली सरकार नहीं है, बल्कि उसके भगवान की भी संरक्षक है. वह अपनापन जताना चाहती है।  आपके घर की आस्था अब सरकार की जिम्मेदारी दिल्ली की राजनीति में यह दांव और भी बड़ा है. क्योंकि बीजेपी जानती है कि राजधानी में सिर्फ हिंदुत्व का शोर काफी नहीं होता. यहां पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग है, सरकारी कर्मचारी हैं, अपार्टमेंट कल्चर है, न्यूक्लियर फैमिली है. यहां खुले धार्मिक उन्माद से ज्यादा असर संस्कृति की चिंता वाली राजनीति करती है. इसलिए यह पूरा मॉडल बेहद सॉफ्ट दिखता है. कोई भड़काऊ बयान नहीं. कोई विरोधी धर्म पर हमला नहीं. बस इतना कहना- खंडित मूर्तियां हमें दे दीजिए. लेकिन असली संदेश इससे कहीं बड़ा है. यह मैसेज है क‍ि आपके घर की आस्था अब सरकार की जिम्मेदारी है।  भावनात्मक रिश्ते की भाषा में चुनाव बीजेपी की राजनीति को अगर एक लाइन में समझना हो तो वह यह है- जहां भावनाएं हैं, वहां संगठन पहुंचाओ. पहले पार्टी गांव के मंदिर तक गई. फिर तीर्थ कॉरिडोर बनाए. फिर सनातन को राष्ट्रीय बहस बनाया. अब घर के मंदिर तक पहुंच गई. यह माइक्रो-हिंदुत्व है. ऐसा हिंदुत्व जो टीवी डिबेट में नहीं, घर की अलमारी, पूजा की घंटी और टूटी मूर्ति के जरिए काम करता है. और सच कहें तो विपक्ष अभी भी इसे समझ नहीं पा रहा. विपक्ष अभी भी बेरोजगारी, महंगाई और संविधान की भाषा में लड़ रहा है, जबकि बीजेपी भावनात्मक रिश्ते की भाषा में चुनाव लड़ रही है।  सिर्फ प्रशासन नहीं, कल्‍चरल मैनेजमेंट यानी धर्म सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं. यह सिविक सर्विस हो गया. जैसे नगर निगम कूड़ा उठाता है, वैसे ही सरकार अब खंडित मूर्तियां भी उठाएगी. यानी राज्य और धार्मिक जीवन के बीच की दूरी लगातार कम हो रही है. यह वही मॉडल है जिसमें सरकार मंदिर कॉरिडोर भी बनाती है, पूजा स्थलों का सौंदर्यीकरण भी करती है, त्योहारों में मंच भी सजाती है और अब घर की टूटी मूर्तियों का भी सम्मान करेगी. यह सिर्फ प्रशासन नहीं, कल्‍चरल मैनेजमेंट है।  यह आने वाले समय की राजनीति का ट्रेलर और यही वजह है कि रेखा गुप्ता का बयान हल्का नहीं है. यह आने वाले समय की राजनीति का ट्रेलर है. बीजेपी अब सिर्फ वोटर नहीं चाहती, वह भावनात्मक अनुयायी चाहती है. वह चाहती है कि हिंदू परिवार को हर छोटे-बड़े धार्मिक क्षण में सरकार याद आए. मूर्ति टूटे-सरकार याद आए. त्योहार आए- सरकार याद आए. मंदिर बने-सरकार याद आए. यानी राजनीति अब सिर्फ चुनाव के दिन नहीं, रोजमर्रा की जिंदगी में घुस रही है. और अगर विपक्ष अभी भी इसे सिर्फ मूर्ति कलेक्शन समझ रहा है, तो शायद वह बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत को अब भी समझ नहीं पाया है। 

भारत पर मंडरा रहा बड़ा संकट, मानसून से पहले आई डराने वाली रिपोर्ट ने बढ़ाई टेंशन

नई दिल्ली  दुनियाभर में एक बार फिर अल नीनो (El Nino) को लेकर चिंता बढ़ने लगी है. वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस बार बनने वाला अल नीनो पिछले कई दशकों का सबसे खतरनाक संकट हो सकता है. अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स और जलवायु एजेंसियों के मुताबिक, कुछ क्लाइमेट मॉडल संकेत दे रहे हैं कि यह अल नीनो 1950 के बाद दर्ज सबसे शक्तिशाली घटनाओं में से एक बन सकता है. इसका असर भारत समेत दुनिया के कई देशों में मौसम, खेती, पानी और अर्थव्यवस्था पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।  अल नीनो का नाम स्पेनिश भाषा के शब्द 'लिटिल बॉय' से पड़ा है. यह प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान और हवाओं के पैटर्न में बदलाव से पैदा होने वाली प्राकृतिक जलवायु घटना है. आमतौर पर भूमध्य रेखा के पास चलने वाली ट्रेड विंड्स पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती हैं, लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या उलटी दिशा में बहने लगती हैं तो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में गर्म पानी जमा होने लगता है. यही बदलाव पूरी दुनिया के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है।  विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल नीनो ऐसे समय में बन रहा है जब धरती पहले से ही ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ज्यादा गर्म हो चुकी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ता तापमान अल नीनो के असर को और खतरनाक बना सकता है. इससे कहीं बाढ़ और चक्रवात बढ़ सकते हैं तो कहीं लंबे सूखे, भीषण गर्मी और जंगलों में आग जैसी घटनाएं तेज हो सकती हैं।  CNN की रिपोर्ट के अनुसार, कई मौसम मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि आने वाला अल नीनो 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसे बड़े अल नीनो से भी ज्यादा प्रभावशाली हो सकता है. 1997-98 का 'सुपर अल नीनो' दुनिया के इतिहास की सबसे विनाशकारी जलवायु घटनाओं में गिना जाता है, जिसने वैश्विक स्तर पर भारी आर्थिक तबाही मचाई थी।  रिपोर्ट्स के मुताबिक 1982-83 के अल नीनो से वैश्विक अर्थव्यवस्था को करीब 4.1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था, जबकि 1997-98 के सुपर अल नीनो ने लगभग 5.7 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक क्षति पहुंचाई थी. इसका असर खेती, मछली पालन, ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य कीमतों, ट्रांसपोर्ट और बीमा सेक्टर तक पर पड़ा था. वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो सीधे किसी तूफान या आपदा को पैदा नहीं करता, लेकिन यह मौसमीय परिस्थितियों को इतना बदल देता है कि चरम घटनाओं की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।  भारत के लिए यह खतरा और भी बड़ा माना जा रहा है क्योंकि देश की कृषि और जल व्यवस्था काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) पहले ही संकेत दे चुका है कि 2026 का मानसून अल नीनो के कारण कमजोर पड़ सकता है. अगर मानसून कमजोर रहा तो कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।  भारत की करीब आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है. ऐसे में कम बारिश का असर फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और महंगाई पर पड़ सकता है. मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बारिश का वितरण भी असमान हो सकता है. कुछ इलाकों में लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है, जबकि कुछ जगहों पर कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने से बाढ़ जैसे हालात बन सकते हैं. विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि भारत के शहर पहले से ही हीटवेव, फ्लैश फ्लड और पानी की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं. अल नीनो इन संकटों को और गंभीर बना सकता है।  इतिहास में भी अल नीनो के खतरनाक असर देखे जा चुके हैं. 1876-78 का महान अकाल (Great Famine) भी एक शक्तिशाली अल नीनो के दौरान आया था. उस समय भारत, चीन और ब्राजील समेत कई देशों में फसलें बर्बाद हो गई थीं और दुनिया भर में करोड़ों लोगों की मौत भूख और बीमारियों से हुई थी।  हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि आज आधुनिक मौसम पूर्वानुमान, खाद्य भंडारण और आपदा प्रबंधन व्यवस्था पहले से काफी बेहतर है, इसलिए वैसी तबाही की आशंका कम है. लेकिन इसके बावजूद एक शक्तिशाली अल नीनो भारत की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, बिजली की मांग और जल संकट पर भारी दबाव डाल सकता है. जलवायु एजेंसियां अब लगातार इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं. माना जा रहा है कि सर्दियों तक अल नीनो और मजबूत हो सकता है, जिसके चलते दुनिया के कई देशों ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है। 

ट्रक हड़ताल का असर ग्वालियर-चंबल में दिखेगा, माल परिवहन और बाजार पर पड़ेगा प्रभाव

 ग्वालियर ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के आह्वान पर 21 मई यानी आज से ट्रकों के पहिये देश भर में थम जाएंगे। इस वजह से न तो शहर से माल की लोडिंग हो पाएगी और न ही बाहर से शहर में माल आ पाएगा। यह हड़ताल दिल्ली एनसीआर में कमिशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट और दिल्ली नगर निगम के खिलाफ है। साथ ही बार-बार डीजल-पेट्रोल की दरों में बढ़ाने को लेकर है। हड़ताल तीन दिन चलेगी। इससे ग्वालियर-चंबल का बाजार काफी हद तक प्रभावित होगा। स्थानीय तीन सौ और बाहर जाने वाले चार सौ ट्रकों के चक्के थमेंगे स्थानीय ट्रांसपोर्ट यूनियन के अध्यक्ष राजीव मोदी के मुताबिक शहर व आसपास के जिलों में माल लाने ले जाने वाले करीब तीन सौ लोडिंग वाहन खड़े हो जाएंगे। इस वजह से स्थानीय स्तर पर कोई भी सामान इधर से उधर नहीं जा सकेगा। इसी तरह आल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के अध्यक्ष सुनील माहेश्वरी के मुताबिक वर्तमान में ग्वालियर चंबल से 400 ट्रक दिल्ली माल लेकर जाते हैं और माल लेकर आते हैं। ऐसे में ये चार सौ ट्रक भी बंद रहेंगे। पिछले तीन दिन से दिल्ली एनसीआर में वाहनों में लोडिंग ही नहीं हुई है। जानिए किन-किन चीजों पर पड़ेगा सीधा असर किन-किन चीजों पर पड़ेगा असर ग्वालियर चंबल में किराना, रेडीमेड गारमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि का सामान दिल्ली से आता है। साथ ही अंचल से तेल सहित अन्य चीजें दिल्ली जाती हैं। ऐसे में तीन दिन तक ट्रकों की हड़ताल की वजह से ये चीजें न तो अंचल में आ सकेंगी और न जा सकेंगी। इससे पूरे बाजार पर असर पड़ेगा। यदि कुछ ट्रक आ भी गए तो स्थानीय स्तर पर माल की ढुलाई करने वाले वाहन भी नहीं चलेंगे। ऐसे में यह माल भी अंचल के जिलों में नहीं पहुंच सकेगा।