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कागज नहीं, प्लास्टिक करेंसी! RBI की चर्चा के बीच जानिए कितने टिकाऊ होते हैं ये नोट

 नई दिल्ली भारत में भी अब 'प्लास्टिक' के नोट आने वाले हैं, जैसे कई दूसरे देशों में छापे जाते हैं. खास मैटेरियल से बने ये नोट जल्दी से फटते नहीं हैं और अगर पानी में गिर जाए तो खराब नहीं होते हैं. अब भारतीय रिजर्व बैंक ने भी बता दिया है कि इस तरह के नोट लाने का प्रस्ताव केंद्रीय बैंक के समक्ष विचाराधीन है और फिलहाल यह विचार अभी शुरुआती फेज में है. अभी भले ही इसमें टाइम लगेगा, लेकिन भारत के करेंसी नोट भी अलग मैटेरियल के होंगे. ऐसे में जानते हैं कि आखिर ये नोट प्योर प्लास्टिक से बनाए जाएंगे या फिर कुछ अलग मैटेरियल के होंगे और इस पर कितना काम हो चुका है? अभी आरबीआई का क्या कहना है? हाल ही में आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि पॉलिमर से बने नोट लाने का प्रस्ताव केंद्रीय बैंक के समक्ष विचाराधीन है और फिलहाल यह विचार अभी प्रारंभिक चरण में है. पॉलिमर नोट लाने के संबंध में अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है और आरबीआई इसे लेकर आकलन कर रहा है. इस पर जैसे ही कोई निर्णय होता है, उसकी जानकारी दी जाएगी. दरअसल, सरकार इस पर लंबे वक्त से काम कर रही है।  इससे पहले इससे पहले फरवरी 2014 में सरकार ने संसद को बताया था कि 10 रुपये के एक अरब पॉलिमर नोटों को देश के पांच शहरों में परीक्षण के तौर पर जारी किया जाएगा. इस परीक्षण के लिए कोच्चि, मैसूर, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर का चयन किया गया था. हालांकि, तकनीकी और परिचालन संबंधी समस्याओं के कारण इस पहल को बाद में रोक दिया गया था।  किस मैटेरियल के होंगे ये नोट? जिन नोटों की चर्चा हो रही है, उन्हें पॉलिमर नोट कहा जाता है. ये कागज के बजाय एक विशेष प्रकार की पतली और लचीली प्लास्टिक फिल्म से बने मुद्रा नोट होते हैं. ये आम कागजी नोटों (जो कपास और लिनन से बनते हैं) की तुलना में कई गुना अधिक मजबूत होते हैं. ये पानी में भीगने या वॉशिंग मशीन में धुल जाने पर भी खराब नहीं होते हैं. ये नोट थोड़े चिकने होते हैं।  इन नोट्स को बनाने में BOPP यानी पॉलीप्रोपाइलीन का इस्तेमाल किया जाता है. पॉलिमर नोटों में पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP) ही वह मुख्य आधार है, जो इन्हें पारंपरिक कागजी नोटों से अलग बनाता है. इन्हें प्लास्टिक का कहा जा सकता है, लेकिन ये पूरी तरह से प्लास्टिक के नोट नहीं होते हैं जबकि ये उसी मैटेरियल का सबसे अच्छा रूप है. पॉलिमर नोट आम प्लास्टिक (जैसे कैरी बैग या पीवीसी) से काफी अलग होते हैं. इसकी परत आम प्लास्टिक की तरह मोटी या सख्त नहीं, बल्कि कागज जितनी पतली होती है. यह सामान्य प्लास्टिक की तरह जेब की गर्मी या धूप से आसानी से पिघलता या सिकुड़ता नहीं है।  इस प्लास्टिक फिल्म पर स्याही को रोकने के लिए खास तरह की लेयर की कोटिंग की जाती है, इस पर छपाई टिकी रहती है. पॉलिमर नोटों की शुरुआत सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया में हुई थी. इसके बाद से यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, न्यूजीलैंड और सिंगापुर जैसे कई अन्य देशों ने भी अपनी मुद्रा के लिए पॉलिमर तकनीक को सफलतापूर्वक अपनाया है. अब भारत भी इस पर विचार कर रहा है। 

वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले बढ़ा तनाव, ईरान-अमेरिका विवाद ने खींचा ध्यान

नई दिल्ली फीफा वर्ल्ड कप के 23वें संस्करण (FIFA World Cup 2026) को शुरू होने में अब 2 दिन बचे हैं. इससे पहले एक और विवाद खड़ा हो गया है. ईरान फुटबॉल फेडरेशन (FFIRI) ने अमेरिका पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उनकी टीम के वर्ल्ड कप के ग्रुप मैचों के टिकेटों का आवंटन रद्द कर दिया है. बता दें कि इस बार 3 देश मिलकर टूर्नामेंट की मेजबानी कर रहे हैं, जिसमें USA भी है।  ईरान फुटबॉल फेडरेशन का कहना है कि डिप्लोमेटिक विवाद के कारण अमेरिका ईरानी दर्शकों को फीफा वर्ल्ड कप के मैच देखने से रोकने की कोशिश कर रहा है. बता दें कि इससे पहले अमेरिका में इराक फुटबॉल टीम के एक खिलाड़ी को एयरपोर्ट पर डिटेन कर लिया था, जिसे 7 घंटे पूछताछ के बाद छोड़ा था।  मंगलवार को बयान जारी करते हुए ईरान फुटबॉल फेडरेशन ने कहा, "फीफा वर्ल्ड कप 2026 शुरू होने में अब 2 दिन बचे हैं. अमेरिका ने एक बार फिर ग्रुप स्टेज में ईरान फुटबॉल टीम के तीनों मैचों के वेन्यू पर ईरानी समर्थकों के आने में बाधा डालने का काम किया है।  रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका ने ईरान के लिए कई प्रशासनिक मुश्किलें भी खड़ी की हैं, जैसे उन्होंने कुछ सपोर्ट स्टाफ के सदस्यों को वीजा देने से मना कर दिया. बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच अभी रिश्ते बिल्कुल भी अच्छे नहीं है।  फीफा के नियमों के मुताबिक हर मैच के लिए 8 प्रतिशत टिकट ईरान को मिलने चाहिए. ईरान ने आरोप लगाया है कि टिकट का ये हिस्सा टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाले फेडरेशन को दिए जाते हैं, जिससे वह अपने माध्यम से समर्थकों को इन्हें बांट सके।  ईरान फुटबॉल फेडरेशन के मुताबिक उन्होंने अपने ग्रुप मैचों की टिकट बिक्री शुरू कर दी थी, जो अमेरिका में होने वाले हैं. लेकिन अमेरिका ने उन्हें मिलने वाला कोटा वापस ले लिया है, और अभी ईरान अपने समर्थकों को एक भी टिकट नहीं देने की स्थिति में है. ईरान फुटबॉल टीम ग्रुप 'जी' में है, जिसमें उनका सामना बेल्जियम, इजिप्ट और न्यूजीलैंड से होगा। 

सूर्यकुमार की छुट्टी, हार्दिक की एंट्री तय? BCCI के फैसले ने बढ़ाई चर्चा

नई दिल्ली   हाल ही में इंग्लैंड और आयरलैंड दौरे के लिए भारतीय टीम का ऐलान किया गया. टीम में कुछ नए चेहरों को भी जगह दी गई है, लेकिन सबसे बड़े बदलाव के रूप में सूर्यकुमार को यादव कप्तानी और टीम से बाहर करना रहा, लेकिन इसी बीच स्टार ऑलराउंडर हार्दिक पंड्या की वनडे टीम में वापसी तय हो गई है. पंड्या टीम इंडिया में वापसी के लिए पूरी तरह फिट हो चुके हैं. बीसीसीआई के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की खेल विज्ञान टीम ने उन्हें अफगानिस्तान के खिलाफ धर्मशाला में शुरू होने वाली तीन मैच की वनडे सीरीज में खेलने की मंजूरी दे दी है. 32 साल के पंड्या पीठ में ऐंठन के कारण मुंबई इंडियन्स के लिए आईपीएल के कई मैच नहीं खेल पाए थे और दो जून से सीओई में हैं।  बीसीसीआई के एक सूत्र ने पीटीआई को बताया, ‘‘दो जून को सीओई में आने से पहले हार्दिक विदेश में छुट्टियां मना रहे थे. अगले पांच दिन में उन्होंने मैच जैसी कई स्थितियों में तैयारी की और 10 ओवर (पूरा कोटा) तक गेंदबाजी भी की.’’ सूत्र ने कहा, ‘‘उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई और जानकारी के मुताबिक सीओई में स्ट्रेंथ और अनुकूलन कोच ने अलग-अलग पैमानों पर उनकी फिटनेस को मंजूरी दे दी है।  बैटिंग के साथ बॉलिंग भी करेंगे हार्दिक पंड्या सोमवार को भारत के सहायक कोच सितांशु कोटक ने कहा था कि भले ही उनके पास पंड्या की फिटनेस के बारे में कोई ताजा जानकारी नहीं है लेकिन उन्हें लगता है कि यह ऑलराउंडर ठीक है. पंड्या भारत की सीमित ओवरों की टीम के लिए एक अहम खिलाड़ी हैं क्योंकि वह अपनी तेज गेंदबाजी और डेथ ओवरों में आक्रामक बल्लेबाजी से टीम को संतुलन देते हैं।  सबसे अच्छी बात यह है कि पंड्या ट्रेनिंग सत्र में 10 ओवर गेंदबाजी कर रहे हैं जिसका मतलब है कि वह 50 ओवर के क्रिकेट की चुनौतियों के लिए तैयार हैं. हालांकि यह साफ नहीं है कि पंड्या चंडीगढ़ में दूधिया रोशनी में होने वाले ट्रेनिंग सत्र के लिए टीम से जुड़ेंगे या सीधे धर्मशाला पहुंचेंगे जैसा कि पहले तय किया गया था। 

जनजातीय अध्ययन में नई पहचान बना रहा DAVV इंदौर, शोध और नवाचार को मिल रही नई दिशा

जनजातीय अध्ययन को नई दिशा दे रहा इंदौर का डीएवीवी जनजातीय समाज, संस्कृति और विकास के अध्ययन-शोध के लिए विशेष पाठ्यक्रम; युवाओं के लिए शोध के अवसर डीएवीवी में एमए, एमबीए और पीएचडी में प्रवेश प्रारंभ इंदौर देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर के स्कूल ऑफ ट्राइबल स्टडीज द्वारा जनजातीय समाज, संस्कृति, परंपराओं और विकास के विविध आयामों को समझने के लिए एक अभिनव शैक्षणिक पहल की गई है। विश्वविद्यालय में जनजातीय अध्ययन एवं जनजातीय विकास पर केंद्रित विशेष पाठ्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों को जनजातीय समुदायों के जीवन, ज्ञान परंपराओं, चुनौतियों और विकास की संभावनाओं से परिचित कराना है। यह पहल विद्यार्थियों में जनजातीय समाज के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने के साथ उन्हें ऐसे ज्ञान और कौशल से सुसज्जित करती है, जिससे वे भविष्य में जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण और विकास में सार्थक योगदान दे सकें। स्कूल ऑफ ट्राइबल स्टडीज में एम.ए. (जनजातीय अध्ययन), एम.बी.ए. (जनजातीय विकास एवं प्रबंधन) तथा पीएचडी (जनजातीय अध्ययन) जैसे विशिष्ट कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। ये पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को जनजातीय समाज के इतिहास, संस्कृति, जीवन-पद्धति, पारंपरिक ज्ञान, सामाजिक चुनौतियों तथा विकास संबंधी मुद्दों को समझने का अवसर प्रदान करते हैं। वर्तमान में जनजातीय समुदायों से जुड़े विषयों पर अध्ययन और शोध की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में ये पाठ्यक्रम विद्यार्थियों को अकादमिक ज्ञान के साथ जनजातीय विकास की नीतियों, योजनाओं और प्रबंधन से जुड़ी व्यावहारिक समझ भी प्रदान करते हैं। इससे छात्र शोध, शिक्षण, सामाजिक विकास, नीति निर्माण तथा प्रशासनिक क्षेत्रों में बेहतर कॅरियर के अवसर बढ़ जाते हैं। स्कूल ऑफ ट्राइबल स्टडीज द्वारा संचालित ये पाठ्यक्रम न केवल मध्यप्रदेश बल्कि देश के उच्च शिक्षा परिदृश्य में भी अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। जनजातीय अध्ययन के प्रति रुचि रखने वाले विद्यार्थियों के लिए यह पाठ्यक्रम समाज के एक महत्वपूर्ण वर्ग को निकट से समझने और उनके विकास में सार्थक योगदान देने का अवसर उपलब्ध कराते हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने विद्यार्थियों से इन विशेष पाठ्यक्रमों का लाभ उठाने और समय पर प्रवेश प्रक्रिया में शामिल होने की अपील की है।  

क्यों अहम है मालवा की 69 सीटों की लड़ाई? पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा रणक्षेत्र

अमृतसर  पंजाब की सियासत में सबसे अहम क्षेत्र है मालवा, केवल इसलिए नहीं कि कुल 117 विधानसभा सीटों में से 69 इसी क्षेत्र में हैं बल्कि इसलिए भी कि इस इलाके से उठी सियासी लहर पूरे पंजाब में सियासत के रुख को बदल देती है। राजनीति हो या किसानी आंदोलन यहां के नेता और बाशिंदों ने बखूबी अपना दम दिखाया है। कद्दावर नेताओं के साथ-साथ बड़ी किसान जत्थेबंदियां का मालवा से संबंध है।   पंजाब के सभी राजनीतिक दल इस क्षेत्र का सियासी महत्व जानते हैं लिहाजा साल 2027 के मद्देनजर नेताओं ने इस क्षेत्र पर अपना फोकस और सक्रियता बढ़ा दी है। इसके इतर मालवा के मतदाताओं की खास बात यह है कि यहां के लोगों ने सभी दलों को परखा, समझा और फिर अपनी सेवा का मौका दिया। पिछले पांच विधानसभा चुनावों का ट्रेंड इसी बात को साबित करता है। यही वजह है कि भाजपा को छोड़कर कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और आम आदमी पार्टी इस क्षेत्र को अपना-अपना गढ़ मानते रहे हैं मगर यहां मतदाताओं का मिजाज पढ़ना आसान नहीं है। साल 2002 के विधानसभा चुनाव का परिणाम देखें तो कांग्रेस को यहां सबसे ज्यादा 29 सीटें मिली थीं जबकि 27 सीटों के साथ शिअद दूसरे नंबर पर थी। साल 2007 में मालवा की 37 सीटें कांग्रेस जीती थी जबकि अकालियों के खाते में 19 सीटें आई थीं। साल 2012 में शिअद ने 34 सीटों पर कब्जा किया जबकि कांग्रेस 31 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई।  साल 2017 में कांग्रेस ने 40 सीटें जीतकर मालवा में दोबारा जलवा दिखाया जबकि अकाली 8 सीटों पर सिमट गए। इसी चुनाव में सूबे में नया दल आम आदमी पार्टी (आप) ने पहली बार इस इलाके से 18 सीटें जीती। साल 2022 के चुनाव में मालवा के मतदाताओं ने आप पर इतना प्यार लुटाया कि पार्टी ने इस क्षेत्र की 69 में से 66 सीटों पर कब्जा किया। कांग्रेस 2 और अकाली 1 सीट पर सीमित रह गए। मतदाताओं का यह रुझान बताता है कि यहां के बाशिंदे लहर के साथ चलते हैं। पंजाब के बरनाला, बठिंडा, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का (अबोहर तहसील को छोड़कर), फिरोजपुर, लुधियाना, मलेरकोटला, मानसा, मोगा, पटियाला, मुक्तसर साहिब, रूपनगर व संगरूर मालवा का हिस्सा हैं। पार्टियों के अध्यक्ष यही सें, डेरा फैक्टर असरदार बरनाला से राजनीतिक मामलों के माहिर बघेल सिंह धालीवाल बताते हैं कि मालवा के लोग सरल मगर क्रांतिकारी प्रवृत्ति के हैं। यही वजह है कि नेताओं की घोषणाओं, उनके भाषणों, उनकी गतिविधियों और वादों का यहां के मतदाताओं पर बड़ा असर पड़ता है। पेंडू (ग्रामीण) कल्चर का भी यहां सियासत में काफी प्रभाव रहता है। अधिकतर बड़े नेता इसी संस्कृति की देन है। डेरा (सिरसा व ब्याास) फैक्टर भी अच्छी पकड़ रखता है। हालांकि सभी जातियों के लोग यहां बसते हैं मगर जट सिख बिरादरी की सियासत यहां ज्यादा अहम दिखती है। मोगा से सियासी मामलों के जानकार मलकीत सिंह कहते हैं कि पंथक मसलों का इस बेल्ट में बहुत असर रहता है। बरगाड़ी, बहबलकलां, कोटकपूरा में बेअदबी कांड हो या फिर हाथ में गुटका साहिब रखकर सूबे से नशा खत्म करने की बात हो, पंथ के हर मसले से जुड़ी बात यहां से उठकर पूरे पंजाब में सियासी असर डालती है। राजनीतिक विषयों के विशेषज्ञ जगतार सिंह भुल्लर कहते हैं मालवा की महत्ता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आप, कांग्रेस, शिअद और अब भाजपा ने अपने-अपने प्रदेशाध्यक्ष इसी क्षेत्र से चुने है। कांग्रेस, शिअद और आप तो यहां की सियासत में अपना जलवा दिखा चुके हैं, अब भाजपा यहां ज्यादा फोकस कर रही है। इस इलाके में विकास की बात भी होती है लेकिन लोक लुभावनी घोषणाओं की मतदाताओं पर गहरी छाप दिखती है। मिशन 2027 के लिए अहम क्यों? इन दिनों मालवा की सियासी महत्ता फिर बढ़ी हुई है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। सभी दल इन इलाकों में अपना-अपना पार्टी सर्वे करवा रहे हैं। कांग्रेस करवा चुकी है। बठिंडा, मानसा, सरदूलगढ़, मोड़ मंडी, रामपुरफूला, तलवंडी साबो इत्यादि क्षेत्रों में किसान वर्ग निर्णायक बनता है। साल 2022 के परिणामों में यहां दबदबा तो आप का है मगर कांग्रेस और अकाली यहां दोबारा अपना प्रभाव जमाना चाहते हैं जबकि भाजपा के लिए यहां खाेने के लिए कुछ नहीं है। लिहाजा सभी दलों ने यहां ताकत झोंकनी शुरू कर दी है।  

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए खुशखबरी! 8th Pay Commission से वेतन में हो सकती है बंपर बढ़ोतरी

नई दिल्ली केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 8वें वेतन आयोग को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं। कर्मचारी संगठनों की ओर से फिटमेंट फैक्टर बढ़ाने की मांग की जा रही है। अगर सरकार सबसे अधिक प्रस्तावित फिटमेंट फैक्टर 3.83 को मंजूरी देती है, तो केंद्रीय कर्मचारियों का न्यूनतम मूल वेतन (Basic Pay) मौजूदा ₹18,000 से बढ़कर करीब ₹68,940 हो सकता है। क्या होता है फिटमेंट फैक्टर? फिटमेंट फैक्टर एक गणितीय गुणक (Multiplier) होता है, जिसके आधार पर कर्मचारियों के मौजूदा बेसिक पे और पेंशन को नए सैलरी स्ट्रक्चर में परिवर्तित किया जाता है। वेतन आयोग की सिफारिशों में यह सबसे महत्वपूर्ण तत्वों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसी के आधार पर वेतन, पेंशन, भत्ते और एरियर तय होते हैं। 7वें वेतन आयोग में कितना था फिटमेंट फैक्टर? 7वें वेतन आयोग ने 2.57 का फिटमेंट फैक्टर लागू किया था। इसके बाद कर्मचारियों का न्यूनतम मूल वेतन ₹7,000 से बढ़कर ₹18,000 हो गया था। 8वें वेतन आयोग के लिए क्या हैं मांगें? विभिन्न कर्मचारी संगठनों और विशेषज्ञों ने अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर की मांग की है।विशेषज्ञों का फिटमेंट फैक्टर का अनुमान 1.92 है। जबकि, ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) का 3.00 और फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन (FNPO) का 3.25 है। वहीं, जम्मू-कश्मीर कर्मचारी मंच का अनुमान 3.05 और जम्मू-कश्मीर कर्मचारी समन्वय समिति का 2.86 से 3.68 है। नेशनल काउंसिल-जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM)ने 3.83 का अनुमान लगाया है। फिटमेंट फैक्टर के हिसाब से कितना हो सकता है वेतन? मौजूदा न्यूनतम मूल वेतन ₹18,000 को आधार मानें तो संभावित वेतन इस प्रकार हो सकता है… 1.92 फिटमेंट फैक्टर पर: ₹34,560 2.57 फिटमेंट फैक्टर पर: ₹46,260 2.86 फिटमेंट फैक्टर पर: ₹51,480 3.00 फिटमेंट फैक्टर पर: ₹54,000 3.25 फिटमेंट फैक्टर पर: ₹58,500 3.68 फिटमेंट फैक्टर पर: ₹66,240 3.83 फिटमेंट फैक्टर पर: ₹68,940 अगर सरकार 7वें वेतन आयोग जैसा 2.57 का फिटमेंट फैक्टर ही लागू करती है, तब भी न्यूनतम मूल वेतन ₹46,260 तक पहुंच सकता है। वहीं, कर्मचारियों की सबसे बड़ी मांग 3.83 फिटमेंट फैक्टर मंजूर होने पर वेतन में करीब 283 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिल सकती है। सिर्फ वेतन ही नहीं, भत्ते भी बढ़ेंगे फिटमेंट फैक्टर बढ़ने का असर केवल मूल वेतन तक सीमित नहीं रहेगा। इसके साथ ही हाउस रेंट अलाउंस (HRA) में बढ़ोतरी होगी। ट्रांसपोर्ट अलाउंस और अन्य भत्तों की समीक्षा होगी और मौजूदा महंगाई भत्ता (DA) मूल वेतन में समाहित किया जाएगा। नया सैलरी स्ट्रक्चर लागू होने के बाद DA की गणना फिर से शुरू होगी। कर्मचारियों की निगाह सरकार के फैसले पर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स की नजर अब सरकार और 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों पर टिकी है। फिटमेंट फैक्टर जितना अधिक होगा, वेतन और पेंशन में उतनी ही बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। हालांकि अंतिम फैसला सरकार को ही लेना है।

मोदी सरकार में बदलाव के संकेत, राज्यसभा चुनाव के बाद कई मंत्रियों की जिम्मेदारियां बदल सकती हैं

नई दिल्ली राज्यसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही एनडीए सरकार में कैबिनेट फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है। अटकलें हैं कि इस बार कई राज्य मंत्रियों को बदला जा सकता है। हालांकि, अब तक यह साफ नहीं है कि किन मंत्रालयों में बड़े स्तर पर बदलाव होंगे, लेकिन कहा जा रहा है कि इसकी संख्या एक दर्जन मंत्रियों तक जा सकती है। खास बात है कि 18 जून को राज्यसभा चुनाव हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी भारतीय जनता पार्टी कैबिनेट को लेकर बड़े फैसले ले सकती है। रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि कम से कम 2 कैबिनेट मंत्री और 3 राज्य मंत्रियों परिषद से बाहर हो सकते हैं। अटकलें ये भी हैं कि एक वरिष्ठ मंत्री को दक्षिण भारतीय राज्य में पार्टी की कमान भी सौंपी जा सकती है। दूसरे दलों को भी मिलेंगे पद रिपोर्ट के मुताबिक, सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि मोदी सरकार की नई कैबिनेट में JD(U), TDP, NCP और RLM जैसे सहयोगी दलों (Allies) को जगह मिल सकती है। इसमें भी नीतीश कुमार की JD(U) और चंद्रबाबू नायडू की TDP को सबसे ज्यादा फायदा हो सकता है। जबकि, सहयोगी दलों के ज्यादातर नेताओं को राज्य मंत्री का पद मिलने की उम्मीद है। राज्यसभा चुनाव कहा जा रहा है कि राज्यसभा का कार्यकाल पूरा कर रहे कई मंत्रियों को इस साल या 2027 की शुरुआत में संगठन में भेजा जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, माना जा रहा है कि 70 साल से ज्यादा उम्र के कुछ राज्यसभा सांसदों को बदलने पर विचार किया जा सकता है और नए चेहरों को मौका दिया जा सकता है। सूत्रों के हवाले से बताया गया कि भाजपा मोर्चा नेताओं को कैबिनेट में पहली बार शामिल किया जा सकता है। इन मंत्रालयों में बदलाव के आसार रिपोर्ट के मुताबिक, रेलवे, वित्त, कॉर्पोरेट अफेयर्स, कोयला, टेक्सटाइल, सूचना एवं प्रसारण, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी, ग्रामीण विकास, रसायन और उर्वरक, सहकारिता, मत्स्य पालन, जल शक्ति, कृषि और पर्यावरण, कानून और अन्य में बदलाव के आसार हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। राज्यसभा चुनाव 18 जून को होने वाले चुनाव में आंध्र प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक की चार-चार सीट, मध्य प्रदेश और राजस्थान की तीन-तीन सीट, झारखंड की दो सीट तथा मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम की एक-एक सीट शामिल हैं। महाराष्ट्र और तमिलनाडु से राज्यसभा की एक-एक सीट के लिए उपचुनाव भी होगा। जिन 26 सीटों के लिए चुनाव एवं उपचुनाव हो रहा है उनमें एनडीए के पास 18 सीटें हैं और इनमें भी 12 सीटें भाजपा की हैं।

होम लोन लेने वालों के लिए बड़ा अपडेट! नए CIBIL नियम के बाद बढ़ सकता है ब्याज का बोझ

 नई दिल्ली RBI के ECL नियम लागू होने के बाद बैंकों को ज्यादा प्रावधान करना होगा, कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल वाले ग्राहकों के लिए बढ़ सकती हैं ब्याज दरें अगर आपका CIBIL स्कोर 730 से कम है तो आने वाले समय में होम लोन, ऑटो लोन और एजुकेशन लोन लेना पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो सकता है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए 'ECL Direction-2026' के लागू होने के बाद बैंक जोखिम वाले ग्राहकों को कर्ज देने में अधिक सतर्कता बरतेंगे. बैंकिंग सेक्टर के जानकारों का मानना है कि कम क्रेडिट स्कोर वाले ग्राहकों को या तो लोन मिलने में दिक्कत होगी या फिर उन्हें ज्यादा ब्याज दर पर कर्ज लेना पड़ेगा।  कई मामलों में बैंक अतिरिक्त गारंटी या कोलेटरल की भी मांग कर सकते हैं. सबसे बड़ी चिंता की बात है कि देश में करीब 62 फीसदी लोन आवेदकों का CIBIL स्कोर 730 से कम है. ऐसे में अगले साल से बड़ी संख्या में लोगों के लिए होम, ऑटो और एजुकेशन लोन हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।  1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे नए नियम RBI का 'Expected Credit Loss (ECL) Direction-2026' 1 अप्रैल 2027 से लागू होगा. वर्तमान व्यवस्था में बैंक किसी लोन के एनपीए (Non-Performing Asset) बनने के बाद उसके लिए प्रावधान करते हैं. आमतौर पर ये स्थिति तब आती है, जब ग्राहक 90 दिनों तक किश्त नहीं चुकाता.  नई व्यवस्था में बैंकों को संभावित डिफॉल्ट का अनुमान पहले ही लगाना होगा और उसके हिसाब से अलग से रकम रखनी होगी. यानी लोन डूबने का इंतजार नहीं किया जाएगा और संभावित नुकसान के लिए पहले से तैयारी करनी होगी. जानकारों का मानना है कि इस व्यवस्था से बैंकिंग सेक्टर के मुनाफे पर दबाव बढ़ सकता है और कुल मिलाकर करीब 42 हजार करोड़ रुपये तक का असर पड़ सकता है।  प्रीमियम ग्राहकों पर रहेगा ज्यादा फोकस एक्सपर्ट्स के मुताबिक, नए नियम लागू होने के बाद बैंक उन ग्राहकों से ज्यादा ब्याज वसूल सकते हैं जिनमें डिफॉल्ट का जोखिम अधिक है. वहीं, बेहतर क्रेडिट स्कोर वाले ग्राहकों को ब्याज दरों में रियायत और बेहतर शर्तों पर लोन मिलने की संभावना बढ़ सकती है. इसी वजह से बैंक 730 या उससे ज्यादा CIBIL स्कोर वाले ग्राहकों पर ज्यादा फोकस करेंगे. इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक देश में करीब 7 करोड़ ऐसे ग्राहक हैं जिनका क्रेडिट स्कोर 730 या उससे ज्यादा है।  बैंक कैसे लगाएंगे भविष्य के जोखिम का अनुमान? ECL फ्रेमवर्क के तहत बैंक मौजूदा भुगतान स्थिति देखने के साथ कई दूसरे इंडिकेटर्स का भी एनालिसिस करेंगे जिनमें शामिल हैं- -ग्राहक का भुगतान रिकॉर्ड -CIBIL स्कोर में बदलाव -आय में कमी या अस्थिरता -नौकरी जाने का जोखिम -लोन-टू-वैल्यू (LTV) रेशियो  -मौजूदा कर्ज की स्थिति इन आंकड़ों के आधार पर बैंक तय करेंगे कि भविष्य में डिफॉल्ट की आशंका कितनी है.  डिफॉल्ट पर कई गुना बढ़ेगा प्रावधान नए नियमों के तहत बैंकों को डिफॉल्ट की स्थिति में पहले के मुकाबले काफी ज्यादा रकम अलग रखनी होगी. उदाहरण के तौर पर, 25 लाख रुपये के होम लोन पर: – 30 दिन की EMI डिफॉल्ट होने पर अभी करीब 10 हजार रुपये का प्रावधान करना पड़ता है, जो बढ़कर 25 हजार रुपये हो जाएगा. – 31 से 60 दिन तक डिफॉल्ट रहने पर ये रकम 10 हजार रुपये से बढ़कर 1.25 लाख रुपये तक पहुंच सकती है. 90 दिन से ज्यादा के डिफॉल्ट की स्थिति में अभी 3.75 लाख रुपये (15%) का प्रावधान करना पड़ता है, जो बढ़कर 5 लाख रुपये हो जाएगा इससे बैंकों की लागत बढ़ेगी और वे कर्ज देने के दौरान वो ज्यादा सावधानी बरतेंगे.  आम ग्राहकों पर क्या असर होगा? जानकारों का मानना है कि ECL फ्रेमवर्क बैंकिंग सिस्टम को मजबूत बनाने और जोखिम की पहचान पहले करने की दिशा में बड़ा कदम है. हालांकि इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ सकता है, जिनका क्रेडिट स्कोर कमजोर है. ऐसे ग्राहकों को समय पर EMI भुगतान, क्रेडिट कार्ड बिल की नियमित अदायगी और कम कर्ज देनदारी बनाए रखने पर ध्यान देना होगा. बेहतर CIBIL स्कोर ही भविष्य में सस्ती ब्याज दर और आसान लोन मंजूरी की सबसे बड़ी कुंजी बन सकता है.  1 अप्रैल 2027 से नियम लागू होने के बाद बैंकों की लोन देने की रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है, जहां फोकस लोन डिस्ट्रीब्यूशन के साथ ही ग्राहक की क्रेडिट क्वालिटी और जोखिम क्षमता पर रहेगा। 

ऊर्जा सुरक्षा पर चीन की बड़ी चाल, ‘समुद्री दैत्य’ से होर्मुज पर निर्भरता घटाने की तैयारी

बीजिंग  होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया भर में तेल-गैस की किल्लत को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. अमेरिका और इजरायल के खिलाफ ईरान की जंग ने दुनिया के कई देशों को आर्थिक मंदी के मुहाने पर ला खड़ा किया है. डर यह जताया जा रहा है कि दुनिया के सबसे अहम समुद्री ट्रेड रूट में शामिल होर्मुज अगर जल्द नहीं खुला तो पेट्रोल,एलपीजी और एनएलजी की किल्लत और गहरा सकती है. इन्हीं चिंताओं के बीच चीन ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा दांव खेला है. चीन की प्रमुख शिपबिल्डिंग कंपनी ने समुद्र में दैत्याकार जहाज उतारने की तैयारी शुरू कर दी है. दुनिया के इस सबसे बड़े जहाज से एक ही बार में 2.71 लाख क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस यानी एनएलजी लाई जा सकेगी. यह जहाज न केवल शिपबिल्डिंग उद्योग में नया रिकॉर्ड बनाएगा, बल्कि वैश्विक गैस सप्लाई चेन को भी नई मजबूती देगा।  क्यों अहम है यह प्रोजेक्ट? हाल के महीनों में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने दुनिया को यह एहसास कराया कि तेल-गैस की सप्लाई कितनी संवेदनशील है. दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा और LNG की महत्वपूर्ण खेपें इसी रास्ते से गुजरती हैं. ऐसे में होर्मुज की नाकेबंदी से एशिया और यूरोप के कई देशों में गैस की कमी पैदा हो गई है।  यही वजह है कि LNG परिवहन क्षमता बढ़ाने को अब ऊर्जा सुरक्षा का हिस्सा माना जा रहा है. चीन का नया जहाज इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो एक बार में पहले की तुलना में कहीं ज्यादा LNG ढो सकेगा।  कितना विशाल है यह जहाज? नया LNG कैरियर 344 मीटर लंबा होगा और इसकी क्षमता 2,71,000 क्यूबिक मीटर LNG होगी. तुलना करें तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक LNG जहाजों की क्षमता करीब 1,70,000 से 1,80,000 क्यूबिक मीटर होती है. एक आधुनिक गैस कैरियर औसतन करीब 174,000 क्यूबिक मीटर LNG लेकर चलता है।  इस लिहाज से चीन का नया जहाज मौजूदा मानक जहाजों की तुलना में लगभग 57 प्रतिशत अधिक LNG ढो सकेगा. इसका मतलब है कि एक ही यात्रा में अधिक गैस पहुंचाई जा सकेगी, जिससे परिवहन लागत कम होगी और सप्लाई चेन अधिक प्रभावी बनेगी।  एलएलजी जहाज क्यों कहलाते हैं ‘क्राउन ज्वेल’? LNG कैरियर बनाना आज भी बेहद जटिल है. प्राकृतिक गैस को -162 डिग्री सेल्सियस पर तरल रूप में सुरक्षित रखना तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. इसके लिए विशेष टैंक, उन्नत इंसुलेशन सिस्टम और अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीकों की जरूरत होती है. यही वजह है कि इसे शिपबिल्डिंग इंडस्ट्री का ‘क्राउन ज्वेल’ यानी सबसे प्रतिष्ठित जहाज माना जाता है।  ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के इस नए जहाज में NO96 Super+ मेम्ब्रेन कंटेनमेंट सिस्टम लगाया जाएगा, जो गैस को सुरक्षित रखने के साथ-साथ रिसाव और ऊर्जा हानि को भी कम करेगा।  पर्यावरण के लिहाज से भी खास जहाज में डुअल-फ्यूल इंजन सिस्टम होगा, जिससे यह पारंपरिक ईंधन और एलएनजी दोनों पर चल सकेगा. कंपनी का दावा है कि इससे ईंधन की खपत और कार्बन उत्सर्जन दोनों कम होंगे. यह जहाज अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के Tier-III पर्यावरण मानकों का भी पालन करेगा।  ऐसे समय में जब दुनिया हरित ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, LNG को कोयले और तेल की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है. इसलिए LNG परिवहन क्षमता बढ़ना एनर्जी ट्रांजिशन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।  समुद्र में चीन की बढ़ती ताकत एक समय एलएनजी जहाज निर्माण पर दक्षिण कोरिया और कुछ पश्चिमी कंपनियों का लगभग एकाधिकार था. लेकिन अब चीन तेजी से इस क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है. रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक एनएलजी शिपबिल्डिंग बाजार में चीन की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।  चीन अखबार के मुताबिक, हुडोंग-झोंगहुआ शिपबिल्डिंग कंपनी के पास फिलहाल लगभग 60 LNG जहाजों के ऑर्डर हैं और उसके शिपयार्ड 2030 तक पूरी तरह बुक बताए जा रहे हैं. इससे साफ है कि वैश्विक ऊर्जा व्यापार में चीन अपनी भूमिका और मजबूत करना चाहता है।  होर्मुज संकट और एनएलजी का भविष्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव बना रहता है तो LNG परिवहन क्षमता दुनिया के लिए और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी. यूरोप, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे बड़े आयातक देशों को ऊर्जा सुरक्षा के लिए अधिक बड़े और अधिक कुशल एलएनजी जहाजों की जरूरत होगी।  ऐसे में चीन का यह मेगा एलएनजी कैरियर सिर्फ एक जहाज नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक ऊर्जा राजनीति और सप्लाई चेन की नई तस्वीर का प्रतीक माना जा रहा है. 2028 में इसकी पहली डिलीवरी होने के बाद यह दुनिया की एलएनजी लॉजिस्टिक्स क्षमता को एक नया आयाम दे सकता है।