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चीन-पाकिस्तान के लिए बढ़ी चुनौती? भारत की नई परमाणु रणनीति को लेकर तेज हुई चर्चाएं

बेंगलुरु  भारत की परमाणु रणनीति को लेकर एक नई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ने बड़ा दावा किया है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ईयरबुक 2026 के मुताबिक भारत ने पहली बार अपने कुछ परमाणु हथियारों को ऑपरेशनल रूप से तैनात किया है. अगर यह आकलन सही साबित होता है तो इसे भारत की परमाणु नीति और सैन्य तैयारियों में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जाएगा।  रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब SIPRI ने दुनिया को चेतावनी दी है कि वैश्विक स्तर पर एक नई परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो चुकी है. भू-राजनीतिक तनाव, सैन्य आधुनिकीकरण और हथियार नियंत्रण समझौतों के कमजोर पड़ने के कारण परमाणु जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं।  भारत ने बदली परमाणु नीति? SIPRI के अनुसार जनवरी 2026 तक भारत के पास अनुमानित 190 परमाणु हथियार थे, जबकि एक साल पहले यह संख्या 180 बताई गई थी. रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से करीब 12 परमाणु वारहेड अब ऑपरेशनल फोर्स के साथ तैनात हो सकते हैं. अब तक माना जाता रहा है कि भारत शांति काल में अपने परमाणु हथियार और मिसाइल सिस्टम को अलग-अलग रखता है, ताकि किसी भी परमाणु कार्रवाई पर अंतिम नियंत्रण राजनीतिक नेतृत्व के पास रहे ।  विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित संख्या में वारहेड की तैनाती भारत की अधिक तेज और प्रभावी प्रतिरोध क्षमता की दिशा में उठाया गया कदम हो सकता है. खासकर तब, जब भारत अपनी समुद्र आधारित परमाणु क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है।  आक्रमण नहीं, हिफाजत के लिए परमाणु हथियार भारत की परमाणु नीति लंबे समय से ‘नो फर्स्ट यूज’ और ‘क्रेडिबल मिनिमम डिटरेंस’ यानी विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध क्षमता के सिद्धांत पर आधारित रही है. इसका मतलब यह है कि भारत परमाणु हथियारों को आक्रमण के लिए नहीं, बल्कि दुश्मन को हमले से रोकने के लिए रखता है. SIPRI की रिपोर्ट में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि भारत की आधिकारिक परमाणु नीति में बदलाव हुआ है, लेकिन यह जरूर संकेत दिया गया है कि रणनीतिक बलों की तैयारियों का स्तर पहले से अधिक मजबूत हुआ है।  चीन भी तेजी से बढ़ा रहा परमाणु जखीरा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की परमाणु आधुनिकीकरण प्रक्रिया पर सबसे बड़ा प्रभाव चीन की तेजी से बढ़ती सैन्य और परमाणु क्षमता का है. SIPRI के मुताबिक चीन दुनिया में सबसे तेजी से अपना परमाणु जखीरा बढ़ा रहा है. इसी वजह से भारत ने ऐसी नई मिसाइल प्रणालियां विकसित की हैं जो चीन के भीतर दूर तक स्थित लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम हैं. इससे साफ संकेत मिलता है कि भारत की रणनीतिक सोच अब केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रही है।  हालांकि पाकिस्तान भी भारत की सुरक्षा गणनाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है. पिछले एक दशक में दोनों देशों ने नई मिसाइल प्रणालियों और परमाणु हथियारों को ले जाने वाले प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं. ऐसे में दक्षिण एशिया में रणनीतिक संतुलन बनाए रखना भारत की प्राथमिकता बना हुआ है।  दुनियाभर में कितने परमाणु हथियार? वैश्विक स्तर पर भी परमाणु हथियारों का महत्व बढ़ता दिखाई दे रहा है. SIPRI के अनुसार दुनिया के नौ परमाणु संपन्न देशों के पास कुल मिलाकर लगभग 12,187 परमाणु वारहेड हैं. इनमें से लगभग सभी देश अपने परमाणु शस्त्रागार के आधुनिकीकरण में जुटे हुए हैं. रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि सुरक्षा रणनीतियों में परमाणु हथियारों की भूमिका लगातार बढ़ रही है और दुनिया धीरे-धीरे एक नए न्यूक्लियर आर्म्स रेस की ओर बढ़ रही है।  इसी व्यापक वैश्विक परिदृश्य में भारत की कथित ऑपरेशनल तैनाती को भी देखा जा रहा है. भले ही इसकी संख्या सीमित हो, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की प्रतिरोध क्षमता को अधिक विश्वसनीय और प्रभावी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है. खासकर ऐसे दौर में जब चीन और पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। 

6 महीने में 6.5 लाख गर्भवतियों की हुई जांच, 1.75 लाख महिलाओं में हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान

भोपाल   मध्यप्रदेश में हाई-रिस्क वाली गर्भवती महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) के तहत बीते छह माह में 6.5 लाख गर्भवतियों की जांच में 1.75 लाख को हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी श्रेणी में चिह्नित किया गया। भोपाल में 31.1 फीसदी गर्भवती हाई-रिस्क श्रेणी में पाई गईं। प्रदेश में गर्भवतियों में हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी की दर 26.9 प्रतिशत पाई गई। यानी हर 100 गर्भवती महिलाओं में लगभग 27 महिलाएं हाई-रिस्क श्रेणी में पाई गईं। वायु प्रदूषण से भी खतरा भोपाल एम्स के हालिया अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण के सूक्ष्म कण (पीएम 2.5 और पीएम 10) सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर रहे हैं और ये कण प्लेसेंटा (अपरा) तक पहुंच सकते हैं। प्लेसेंटा में सूजन, ऑक्सीडेंटिव स्ट्रेस बढ़ता है। शिशु तक ऑक्सीजन, पोषक तत्वों की आपूर्ति प्रभावित होती है। गर्भवतियों को खतरे में डाल रहे ये रोग हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी श्रेणी वाली गर्भवतियों में एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर और गर्भकालीन मधुमेह पाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार 35 वर्ष से अधिक आयु में गर्भधारण, मोटापा, जुड़वा या बहुभ्रूण गर्भावस्था और पूर्व में गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं के कारण भी महिलाओं की स्थिति खतरनाक हो जा रही है। वायु प्रदूषण से प्लेसेंटा को क्या-क्या नुकसान     जहरीले कण प्लेसेंटा के ऊतकों (tissues) को बुरी तरह नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे बच्चे तक पहुंचने वाले रक्त, ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की आपूर्ति बाधित होती है।     एम्स के इस शोध में पाया गया कि प्रदूषण के कारण IGFBP3 नामक एक आवश्यक जीन दब जाता है। यह जीन भ्रूण के स्वस्थ विकास के लिए बड़ी भूमिका निभाता है।     सांसों के माध्यम से जहरीले तत्वों में लेड, कैडमियम और एंटीमनी जैसी भारी और जहरीली धातुएं प्लेसेंटा में जमा होने लगती हैं, जो शिशु के मानसिक और शारीरिक विकास को क्षति पहुंचाती हैं। हाई-रिस्क प्रेगनेंसी में खतरे एम्स और अन्य चिकित्सा अध्ययनों में हाईरिस्क प्रेग्नेंसी यानी गर्भावस्था में जटिलताओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है-     प्रीक्लेम्पसिया और हाइपरटेंशन का बड़ा खतरा, इसमें गर्भवती का बीपी असामान्य तरीके से बढ़ जाता है।     प्री-टर्म डिलीवरी के मामले बढ़ना। इसमें 37 सप्ताह से पहले ही गर्भवती को प्रसव पीड़ा शुरू हो जाती है।     इसका सीधा असर गर्भस्थ शिशु के मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है। इसका असर यह होता है कि जन्म लेने वाले शिशुओं में न्यूरोलॉजिकल और व्यवहार संबंधी बदलाव का जोखिम बढ़ता है।     स्टिलबर्थ होना। यह एक अत्यंत गंभीर मामला है। इसमें गर्भ में ही बच्चे की मृत्यु का खतरा होता है। जानें क्या सावधानियां जरूरी     औद्योगिक इलाकों के साथ ही भारी ट्रैफिक और ज्यादा वायुप्रदूषण वाले क्षेत्रों में जाने से बचें। अगर जाना पड़ रहा है तो मास्क लगाकर जाएं। मास्क का यूज तब-तब करें जब घर से बाहर निकलना हो। ध्यान दें कि मास्क अच्छी गुणवत्ता वाला जैसे N95 या उससे बेहतर हो।     घर के अंदर भी वायुप्रदूषण का रिस्क बढ़ा है। ऐसे में एयर प्यूरीफायर का यूज करें। घर की खिड़कियां, दरवाजे बंद रखें।     इस दौरान नियमित रूप से जांच करवाने को लेकर अवेयर रहें। समय पर जांच कराएं, पौष्टिक आहार लें। 20 प्रतिशत गर्भवती हाई-रिस्क श्रेणी में 20 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं हाई-रिस्क श्रेणी में आ रही हैं। खून की कमी बीपी, थायराइड और अन्य बीमारियों के साथ ही 35 वर्ष अधिक आयु में शादी करने और प्रदूषण के कारण भी गर्भवतियों में हाई-रिस्क की स्थिति पैदा हो रही है। समय पर जांच कराने से मां और शिशु, दोनों की जान बच सकती हैं। -डॉ. नसीमा, स्त्री रोग विशेषज्ञ, एम्स भोपाल

वन्यजीव संरक्षण में चरवाहों की बढ़ेगी भूमिका, टाइगर फाउंडेशन ने 22.79 करोड़ रुपये की योजनाओं को दी हरी झंडी

भोपाल  मध्य प्रदेश के जंगलों में इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव (मानव-वन्यजीव संघर्ष) को रोकने के लिए वन विभाग अब एक बेहद जमीनी स्तर का प्लान तैयार कर रहा है। इसके तहत प्रदेश में पहली बार क्षेत्रीय स्तर पर 'चरवाहा सम्मेलन' आयोजित किए जाएंगे। इन सम्मेलनों के जरिए उन ग्रामीणों और चरवाहों को सीधे जागरूक किया जाएगा, जो मवेशी चराने के लिए अक्सर जंगलों के भीतर या संरक्षित क्षेत्रों के आसपास जाते हैं। उन्हें वन्यजीवों के संरक्षण, संवर्धन और खुद की सुरक्षा के गुर सिखाए जाएंगे। यह महत्वपूर्ण फैसला वन विभाग के प्रमुख सचिव संदीप यादव की अध्यक्षता में मंत्रालय में आयोजित 'मध्य प्रदेश टाइगर फाउंडेशन समिति' की 22वीं बैठक में लिया गया। प्रमुख सचिव ने स्पष्ट निर्देश दिए कि फील्ड में पारदर्शिता और काम की रफ्तार बढ़ाने के लिए अब हर तीन महीने में यह बैठक अनिवार्य रूप से आयोजित की जाए। 22.79 करोड़ से सुधरेंगे जंगल के हालात बैठक में वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके रहन-सहन (आवास विकास) को बेहतर बनाने के लिए 22.79 करोड़ रुपये के बड़े बजट को मंजूरी दी गई। इस राशि का उपयोग इन मुख्य कामों में होगा: मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करना: इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव रोकने के लिए आधुनिक तकनीक और स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान। ब्लैक बक कैप्चर ऑपरेशन: काले हिरणों के संरक्षण और उनके सुरक्षित रेस्क्यू/स्थानांतरण के लिए विशेष अभियान चलाना। रिसर्च और क्षमता संवर्धन: वन्यजीवों के व्यवहार पर अध्ययन करना और वन अमले को आधुनिक तकनीकों से लैस करना। वार्षिक कार्ययोजना मंजूर: इसके साथ ही समिति ने वर्ष 2026-27 के लिए अपनी एनुअल प्लानिंग को भी हरी झंडी दे दी है। बैठक के दौरान प्रदेश के तमाम टाइगर रिजर्वों (जैसे कान्हा, बांधवगढ़, पेंच आदि) के संचालकों ने भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हिस्सा लिया और अपने-अपने क्षेत्रों की जमीनी रिपोर्ट पेश की। बैठक में वन बल प्रमुख सुभरंजन सेन, मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक डॉ. समीता राजौरा, टाइगर सेल के अध्यक्ष एवं अपर पुलिस महानिदेशक सहित राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के सदस्य सचिव भी शामिल हुए। प्रदेश के विभिन्न टाइगर रिजर्वों के संचालकों ने वर्चुअल माध्यम से बैठक में भागीदारी की।  

क्या बेन स्टोक्स की जाएगी कप्तानी? संभावित कार्रवाई की खबरों से इंग्लैंड में हड़कंप

लंदन  लॉर्ड्स में जीत का जश्न अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि इंग्लैंड क्रिकेट में फिर से हलचल मच गई है. कप्तान बेन स्टोक्स नाइटक्लब विवाद को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में आ गए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस घटना के बाद न सिर्फ उनकी कप्तानी पर बल्कि पूरे करियर पर भी ‘फुल स्टॉप’ लगने की अटकलें तेज हो गई हैं।  कहानी यूं शुरू होती है- इंग्लैंड ने न्यूजीलैंड को 115 रनों से हराया, स्टेडियम में तालियां गूंजीं और ड्रेसिंग रूम में जश्न का माहौल था. लेकिन असली ड्रामा उसके बाद शुरू हुआ. ‘टॉकस्पोर्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, देर रात एक नाइटक्लब में स्टोक्स और साथी खिलाड़ी  गस एटकिंसन की मौजूदगी में विवाद हो गया, जिसमें टीम प्रोटोकॉल के उल्लंघन की बात सामने आई।  अब इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) ने जांच शुरू कर दी है. बोर्ड ने साफ कहा है कि मामला टीम अनुशासन और कर्फ्यू तोड़ने से जुड़ा है और सभी तथ्यों की जांच के बाद ही आगे फैसला लिया जाएगा. यानी फिलहाल गेंद ECB के पाले में है और खिलाड़ी 'ड्रेसिंग रूम' में इंतजार कर रहे हैं।  इस बीच पूर्व इंग्लिश तेज गेंदबाज स्टीव हार्मिसन ने स्टोक्स का बचाव किया है. उनका कहना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरा सच सामने आना चाहिए. उनके मुताबिक, स्टोक्स सिर्फ खिलाड़ी नहीं बल्कि एक जिम्मेदार इंसान भी हैं और जल्दबाजी में फैसला लेना सही नहीं होगा।  लेकिन दूसरी तरफ क्रिकेट गलियारों में चर्चा गर्म है- क्या यह मामला सिर्फ एक 'लेट नाइट आउटिंग' है या फिर इंग्लिश क्रिकेट के सबसे बड़े चेहरे के लिए बड़ा मोड़? कुछ रिपोर्ट्स तो यहां तक दावा कर रही हैं कि स्टोक्स कप्तानी छोड़ सकते हैं और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास भी ले सकते हैं।  फिलहाल स्थिति यह है कि जांच जारी है, अटकलें तेज हैं, और इंग्लिश क्रिकेट एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ा है जहाँ सवाल ज्यादा हैं और जवाब कम। 

कास्टिंग के नाम पर चौंकाने वाला खुलासा, डायरेक्टर ने एक्ट्रेस के सामने रखी ऐसी शर्त कि उड़ गए होश

मुंबई  टीवी शो जोधा अकबर में रुकैया बेगम के रोल में दिखीं लवीना टंडन ओटीटी प्लेटफॉर्म को एक्सप्लोर कर रही हैं. लवीना ने फिल्मों से दूरी बनाई हुई है। इसकी अहम वजह कास्टिंग काउच है. जिसे उन्होंने 2 बार झेला. मेकर्स की डिमांड को लवीना ने सिरे से ठुकराया. अपने उसूलों पर काम करने का फैसला किया। लवीना को 2 बार कॉम्प्रोमाइज के लिए अप्रोच किया गया. स्विच संग बातचीत में वो कहती हैं- एक बार साउथ के डायरेक्टर ने मुझे कहा था 10-15 दिन का काम है।         मैंने जब उनसे बजट पूछा तो कहते हैं- 5 लाख तक होगा. उन्होंने कहा अगर कॉम्प्रोमाइज करने के लिए तैयार हो तो, 7 लाख बजट होगा। लवीना सुनकर चौंकीं. उन्होंने कहा- मैं आपकी ईमानदारी की कद्र करती हूं. लेकिन मैं ये सब चीजें नहीं करती हूं।  अगर आपके पास कभी कोई साफ काम होगा तो प्लीज मुझे कॉल करना, वरना तो कभी कॉल नहीं करना।  लवीना ने कहा कि हाल ही में किसी और ने उन्हें डिमांड के लिए अप्रोच किया था. एक्ट्रेस ने उन्हें साफ इनकार किया था।लवीना ने कहा- हर कोई सोचता है ग्लैमर इंडस्ट्री से हो तो सब कुछ कर लोगे. क्योंकि हम बहुत आदमियों संग काम करते हैं. हमारे रोमांटिक सीन्स होते हैं।   लवीना ने माना कि कास्टिंग काउच हर इंडस्ट्री में होता है. लेकिन एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री को लेकर चीजें बाहर आती हैं, तो लोग समझते हैं हम शरीफ नहीं हैं। 

स्ट्रीट वेंडर्स के लिए बड़ी राहत, मुख्यधारा से जोड़ने की मुहिम तेज, 30 जून तक विशेष अभियान

भोपाल  सड़कों और फुटपाथों पर दुकान चलाकर अपनी आजीविका चलाने वाले छोटे कारोबारियों (पथ विक्रेताओं) को डिजीटल, वित्तीय और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। 'प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि' (पीएम स्वनिधि) योजना का लाभ हर पात्र व्यक्ति तक पहुंचाने के लिए पूरे प्रदेश में 1 जून से 30 जून तक एक विशेष महा-अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत जहां एक ओर जिला मुख्यालयों पर उत्सव का माहौल रहेगा, वहीं दूसरी ओर नगरीय निकायों में 'सेवाएं आपके द्वार' की तर्ज पर काम होगा। बताई जाएंगी प्रेरक कहानियां ना के सफल लाभार्थियों और उनके परिवारों की प्रेरक सफलता की कहानियों को साझा किया जाएगा। साथ ही उत्कृष्ट कार्य करने वाले पथ विक्रेताओं को सम्मानित कर अन्य हितग्राहियों को आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित किया जाएगा। अभियान का उद्देश्य योजना के प्रति व्यापक जागरूकता बढ़ाना और अधिक से अधिक पात्र लोगों को लाभ पहुंचाना है। प्रदेश में राज्य शासन, नगरीय निकायों और ऋणदाता संस्थाओं के सहयोग से अब तक 10 लाख से अधिक पथ विक्रेताओं को योजना का लाभ मिल चुका है। लोक कल्याण मेलों में मिलेगी वित्तीय और डिजिटल सहायता नगरीय निकाय स्तर पर आयोजित लोक कल्याण मेलों के माध्यम से पथ विक्रेताओं को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इनमें- – बिना गारंटी के 15 हजार रुपये तक का ऋण – न्यूनतम ब्याज दर पर वित्तीय सहायता – क्रेडिट कार्ड संबंधी जानकारी – डिजिटल लेन-देन के लिए मार्गदर्शन – बैंकिंग सेवाओं तक आसान पहुंच जैसी सुविधाएं शामिल हैं। बैंकर्स-वेंडर्स बैठकें और शिकायतों का समाधान अभियान के दौरान बैंकर्स और पथ विक्रेताओं की विशेष बैठकें आयोजित की जाएंगी, जिससे बैंकिंग सेवाओं की पहुंच अंतिम व्यक्ति तक सुनिश्चित हो सके। वहीं नगरीय निकाय सहायता केंद्रों के माध्यम से वेंडर्स की समस्याओं और शिकायतों का त्वरित निराकरण भी किया जाएगा। दूरस्थ क्षेत्रों में लगेंगे स्वनिधि कैंप सेंसस टाउन स्तर पर “स्वनिधि कैंप” आयोजित कर दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले पथ विक्रेताओं को योजना से जोड़ा जाएगा। विशेष शिविरों में नए और छूटे हुए पात्र हितग्राहियों की पहचान कर उनका पंजीयन कराया जाएगा तथा ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया को तेज किया जाएगा, ताकि कोई भी पात्र वेंडर योजना के लाभ से वंचित न रहे।  

गर्भवती महिलाओं के लिए हीट अलर्ट! गर्मी और उमस से प्रभावित हो सकता है शिशु का विकास

 नई दिल्ली ज्यादा गर्मी और उमस भरा मौसम गर्भ में पल रहे बच्चे को भी नुकसान कर सकता है. इसका सीधा असर उसके शारीरिक विकास पर पड़ने का खतरा है. इससे बच्चा ठिगनेपन का शिकार हो सकता है. जर्नल Science Advances में पब्लिश हुई स्टडी में यह दावा किया गया है. स्टडी में कहा गया है कि केवल बढ़ती गर्मी ही नहीं बल्कि उमस भी होने वाले बच्चे की सेहत के लिए बड़ा खतरा है. अगर इसको काबू करने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो साल 2025 तक दक्षिण एशिया में होने वाले बच्चों में ठिगनेपन के मामले लाखों में बढ़ सकते हैं।  यह रिसर्च दक्षिण एशिया के लगभग दो लाख बच्चों पर की गई है. इसमें अधिकतर बच्चे भारत के थे. रिसर्च में प्रेग्नेंसी के दौरान ज्यादा गर्मी और उमस का संबंध बच्चों में होने वाली स्टंटिंग ( ठिगनेपन) से पाया गया है। . क्या है स्टंटिंग? ये क्यों होती है  दिल्ली AIIMS में पीडियाट्रिक विभाग में डॉ. हिमांशु भदानी बताते हैं कि जब किसी बच्चे का शारीरिक विकास ठीक तरीके से नहीं होता है तो इसको स्टंटिंग कहते हैं. इसमें बच्चे की लंबाई उसके उम्र के हिसाब से कम रह जाती है. इसको आम भाषा में ठिगनापन भी कहते हैं. ये समस्या सिर्फ शारीरिक विकास तक ही सीमित नहीं रहती है, बल्कि इसमें बच्चे की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है और उसकी सीखने की क्षमता भी सामान्य बच्चों की तुलना में कम रहती है. इसका कारण कुपोषण होता है।  गर्मी और उमस का प्रेग्नेंसी पर असर रिसर्च में बताया गया है कि जब कोई गर्भवती महिला बहुत उमस और गर्मी वाले तापमान में रहती है तो उसके शरीर पर इसका असर पड़ता है. इससे डिहाइड्रेशन से लेकर हीट स्ट्रोक का रिस्क होता है. लंबे समय तक गर्म तापमान में रहने पर शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए काफी मेहनत करता है.इससे शरीर पर ज्यादा प्रेशर पड़ने लगता है।  इसका एक असर महिला के प्लेसेंटा पर होता है. शरीर पर बढ़े प्रेशर के कारण प्लेसेंटा में ब्लड सर्कुलेशन सामान्य की तुलना में कम होने लगता है. इससे गर्भ में पल रहे बच्चे तक जरूरी पोषण नहीं पहुंच पाता और ऑक्सीजन भी कम जाता है. इससे उसकी ग्रोथ पर असर पड़ता है क्योंकि बच्चे को जरूरत के हिसाब से पोषण नहीं मिल पाता है।  गर्भावस्था की अंतिम तिमाही में सबसे ज्यादा खतरा इस रिसर्च में दावा किया गया है कि प्रेग्नेंसी की आखिरी तीमाही यानी 28 वें हफ्ते से लेकर 40 वें हफ्ते तक गर्मी का असर बच्चे पर ज्यादा होता है. क्योंकि ये वो समय होता है जब बच्चे को पोषण की जरूरत ज्यादा होती है और उसका विकास हो रहा होता है.अगर इसी समय जरूरत के हिसाब से पोषण न मिले तो इसका असर बच्चे पर होता है।  भारत के इन राज्यों पर ज्यादा असर स्टडी में पाया गया कि भारत में बिहार, पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाकों में रहने वाली महिलाओं में ये रिस्क अधिक है.ऐसा इसलिए क्योंकि इन इलाकों में उमस और गर्मी अधिक रहती है. रिसर्च में यह भी कहा गया है कि अभी तक जलवायु परिवर्तन का असर केवल आम लोगों पर देखा जा रहा था, लेकिन अब गर्भ में पल रहे बच्चे भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।  इस समस्या से बचने के लिए क्या किया जाना चाहिए रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इस समस्या का समाधान भी बताया है. वैज्ञानिकों ने कहा है कि इस समस्या से बचने के लिए पहला कदम यह है कि गर्भवती महिलाओं को ज्यादा गर्म और उमस भरे वातावरण से बचाएं, साथ ही तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन पर ध्यान देने की जरूरत है. अगर ऐसा न किया गया तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ी पर होगा. साल 2025 तक दक्षिए एशिया में ठिगनेपन के लाखों मामले बढ़ जाएंगे। 

Parimal Nathwani को हरी झंडी, झारखंड राज्यसभा चुनाव में मुकाबला हुआ और दिलचस्प

रांची  झारखंड राज्यसभा चुनाव में भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को बड़ी राहत मिली है. उनके नामांकन पर कांग्रेस की ओर से दर्ज कराई गई आपत्तियों पर बुधवार को हुई सुनवाई पूरी हो गई. रिटर्निंग ऑफिसर (RO) ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद नाथवानी की ओर से दिए गए जवाब को संतोषजनक माना और उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी दे दी।  दरअसल, नामांकन पत्रों की जांच के दौरान नाथवानी के दस्तावेजों में कुछ बिंदुओं को लेकर आपत्तियां उठाई गई थीं. कांग्रेस ने उनके नामांकन की वैधता पर सवाल खड़े किए थे, जिसके बाद रिटर्निंग ऑफिसर ने मामले को सुनवाई के लिए रखा था. सुनवाई के दौरान नाथवानी की ओर से सभी आपत्तियों का बिंदुवार जवाब प्रस्तुत किया गया. इसके बाद निर्वाचन पदाधिकारी उनके स्पष्टीकरण से संतुष्ट नजर आए।  बता दें, इस आपत्ति के बाद परिमल नाथवानी का नामांकन पहले होल्ड पर रखा गया था और इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज था. माना जा रहा था कि नाम और दस्तावेजों में कथित विसंगतियों को लेकर उनकी उम्मीदवारी पर संकट आ सकता है, लेकिन अब स्थिति साफ हो गई है।  झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए अब मुकाबला और रोचक हो गया है. चुनावी मैदान में एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी, इंडिया गठबंधन के 2 उम्मीदवारों और अन्य दावेदारों के बीच राजनीतिक गणित पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं. नाथवानी की एंट्री ने पहले ही चुनाव को दिलचस्प बना दिया था और अब उनका नामांकन वैध पाए जाने के बाद मुकाबला और भी रोमांचक हो गया है। 

पारंपरिक खेती से आगे बढ़ रहे किसान, मालवा-निमाड़ में उद्यानिकी और नवाचार आधारित फसलों पर बढ़ा फोकस

मालवा-निमाड़ लंबे समय तक सोयाबीन और पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहे मालवा-निमाड़ में अब खेती का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। किसान आय बढ़ाने और जोखिम कम करने के लिए फल, सब्जी, औषधीय और उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। इंदौर संभाग की रबी 2025-26 समीक्षा और खरीफ 2026 की तैयारियों को लेकर आयोजित संभागीय समीक्षा बैठक में सामने आए जिला-वार प्रस्तुतिकरणों से स्पष्ट हुआ कि क्षेत्र में फसल विविधीकरण अब नीति और व्यवहार दोनों स्तरों पर गति पकड़ रहा है। कृषि उत्पादन आयुक्त अशोक बर्णवाल ने बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए कि किसानों को कम मूल्य वाली फसलों के बजाय अधिक मूल्य वाली फसलों के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उन्होंने कहा कि उद्यानिकी क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं और इसका रकबा बढ़ाने की दिशा में योजनाबद्ध प्रयास किए जाने चाहिए। साथ ही वैज्ञानिक खेती, नई तकनीकों और कृषि नवाचारों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया। पारंपरिक फसलों से आगे बढ़ रहे किसान आलीराजपुर : फलों और सब्जियों के नए क्लस्टर आलीराजपुर में आम, सीताफल और पपीता जैसी फल फसलों का रकबा लगातार बढ़ रहा है। इसके साथ ही भिंडी और टमाटर जैसी सब्जियों के उत्पादन को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। जिले में नए बागवानी क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं, जिससे अधिक किसानों को उन्नत खेती और बेहतर बाजार से जोड़ा जा सके। झाबुआ : तरबूज से बनी नई पहचान झाबुआ ने तरबूज उत्पादन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान स्थापित की है। बढ़ते उत्पादन और बेहतर विपणन व्यवस्था के कारण किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। तरबूज अब जिले की प्रमुख नकदी फसलों में शामिल हो चुका है। बड़वानी : केले से बढ़ रही समृद्धि बड़वानी में केले की खेती किसानों के लिए लाभकारी व्यवसाय बन गई है। यहां उत्पादित केले की मांग देश के साथ-साथ विदेशों तक पहुंच रही है। इसके अलावा किसानों को मिलेट्स उत्पादन के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। खरगोन : सफेद मूसली बना आय का नया आधार खरगोन में सफेद मूसली जैसी औषधीय फसल किसानों की आय का नया स्रोत बनकर उभरी है। वहीं हाईब्रिड मक्का उत्पादन को आधुनिक कृषि नवाचार के रूप में अपनाया जा रहा है, जिससे उत्पादकता और आमदनी दोनों में वृद्धि हो रही है। खंडवा : चिया और कुसुम की बढ़ती खेती खंडवा में चिया, कोदो और कुटकी जैसी फसलों का रकबा बढ़ रहा है। बाजार में अच्छे दाम मिलने से किसानों का इन फसलों की ओर रुझान बढ़ा है। साथ ही कुसुम की खेती को बढ़ावा देकर फसल विविधीकरण को नई दिशा दी जा रही है। धार : ब्लूबेरी के साथ नए प्रयोग धार जिले में ब्लूबेरी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। यह फसल क्षेत्र में उच्च मूल्य वाली बागवानी के नए प्रयोग के रूप में उभर रही है और किसानों के लिए नई संभावनाएं पैदा कर रही है। बुरहानपुर : ड्रिप सिंचाई से बढ़ा मुनाफा बुरहानपुर में ड्रिप सिंचाई तकनीक के माध्यम से केले की खेती को नई दिशा मिली है। पानी की बचत, बेहतर उत्पादन और कम लागत के कारण किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि दर्ज की जा रही है। सोयाबीन के विकल्पों पर बढ़ा जोर बैठक में कृषि उत्पादन आयुक्त ने सोयाबीन के विकल्प के रूप में अरहर पूसा-16 के उत्पादन को बढ़ाने पर बल दिया। उन्होंने खेतों में केवल बीटी कपास पर निर्भर रहने के बजाय कपास की अन्य प्रजातियों को भी बढ़ावा देने के निर्देश दिए, ताकि कीट प्रकोप की समस्या को कम किया जा सके। उन्होंने किसानों को जैविक खाद के उपयोग, मिट्टी परीक्षण और वैज्ञानिक खेती के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता बताई। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि किसानों को समय पर बीज और उर्वरक उपलब्ध कराए जाएं तथा कृषि योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाए। मालवा-निमाड़ में उभरता यह कृषि परिवर्तन संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में क्षेत्र की पहचान केवल सोयाबीन उत्पादक क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि विविध और उच्च मूल्य वाली फसलों के केंद्र के रूप में भी स्थापित हो सकती है।  

लखनऊ के इकाना स्टेडियम की जांच के आदेश, LDA खंगालेगा निर्माण और रखरखाव से जुड़े सभी पहलू

 लखनऊ लखनऊ का इकाना स्टेडियम… वही मैदान जहां चौके-छक्कों की गूंज सुनाई देती है, जहां हजारों दर्शक मैच का रोमांच देखने पहुंचते हैं. लेकिन इस बार चर्चा क्रिकेट की नहीं, बल्कि जांच की हो रही है. कारण है- लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) का एक फैसला।  एलडीए ने इकाना इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम के निर्माण, संचालन, रखरखाव और अनुबंध की शर्तों की जांच के लिए एक विशेष समिति गठित कर दी है. यानी अब स्टेडियम में रिकॉर्ड और फाइलें खंगाली जाएंगी. एलडीए यह पता लगाना चाहता है कि स्टेडियम का संचालन उन शर्तों के मुताबिक हो रहा है या नहीं, जिनके आधार पर इसका अनुबंध किया गया था।  सवाल सिर्फ इमारत का नहीं है. जांच का दायरा काफी बड़ा रखा गया है. समिति यह देखेगी कि निर्माण कार्य तय मानकों के अनुसार हुआ या नहीं. रखरखाव व्यवस्था कैसी है. अनुबंध की शर्तों का पालन हो रहा है या नहीं. स्टेडियम परिसर में विकसित खेल सुविधाएं और अन्य ढांचागत परियोजनाएं किस स्थिति में हैं. यानि सिर्फ पिच नहीं, पूरे सिस्टम का निरीक्षण  होगा।  एलडीए ने समिति को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वह 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपे. इस रिपोर्ट में निर्माण की गुणवत्ता, रखरखाव की स्थिति और अनुबंध से जुड़े सभी पहलुओं का विस्तृत ब्योरा होगा. इसके बाद एलडीए रिपोर्ट की स्टडी करेगा और जरूरत पड़ने पर आगे की कार्रवाई तय करेगा।  फिलहाल जांच शुरुआती चरण में है और किसी तरह की अनियमितता की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन अगर समिति की रिपोर्ट में किसी प्रकार की लापरवाही, निर्माण संबंधी कमी या अनुबंध की शर्तों के उल्लंघन की बात सामने आती है, तो संबंधित पक्षों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।  इकाना स्टेडियम सिर्फ लखनऊ ही नहीं, बल्कि देश के प्रमुख क्रिकेट स्टेडियमों में गिना जाता है. यहां अंतरराष्ट्रीय मैचों से लेकर आईपीएल तक के बड़े मुकाबले आयोजित होते हैं. ऐसे में स्टेडियम की निर्माण गुणवत्ता, सुरक्षा और रखरखाव को लेकर किसी भी तरह की जांच स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।