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Bank Holiday Alert: आज से बैंक बंद रहने का सिलसिला, 11-13 सितंबर की छुट्टियों की पूरी लिस्ट देखें

नई दिल्ली क्या आप भी इस हफ्ते कैश निकालने, केवाईसी (KYC) अपडेट कराने या चेक जमा करने बैंक जाने वाले हैं तो यह खबर आपके बहुत काम की है. आज  यानी 11 सितंबर 2026 शुक्रवार को देशभर में बैंक यूनियनों ने हड़ताल का ऐलान किया है. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इस हड़ताल के ठीक अगले दिन 12 सितंबर को दूसरा शनिवार है और 13 सितंबर को रविवार है. ऐसे में लगातार तीन दिन बैंक से जुड़ा काम प्रभावित हो सकता है।  11, 12 और 13 सितंबर को बैंक खुले रहेंगे या बंद? बता दें कि  11 सितंबर को RBI की तरफ से देशभर के लिए बैंक हॉलिडे नहीं है. इस दिन बैंक यूनियनों की हड़ताल (Bank strike in september 2026) है. वहीं 12 सितंबर को दूसरा शनिवार होने की वजह से बैंक बंद रहेंगे और 13 सितंबर को रविवार की साप्ताहिक छुट्टी होगी.हालांकि,वीकेंड की वजह से 2 दिन तो देश के सभी बैंक बंद रहेंगे लेकिन तीनों दिन देशभर के बैंको में एक जैसी बैंक छुट्टी नहीं रहेगी।  इसलिए बैंक जाने के लिए घर से निकलने से पहले ये जान लें कि कहीं उस दिन बैंक की छुट्टी तो नहीं है? जानिए सितंबर महीने के आने वाले दिनों में आखिरकब-कब और  क्यों बंद रहेंगे बैंक और इस दौरान आप अपने जरूरी काम कैसे निपटा सकते हैं।  11 सितंबर को क्यों होगी बैंक हड़ताल? यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने  5-डे बैंकिंग सिस्टम अन्य मांगों को लेकर 11 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है.बैंक कर्मचारियों ने दूसरे और चौथे शनिवार के अलावा बाकी शनिवार को भी छुट्टी देने की मांग है. इसके बदले वो सोमवार से शुक्रवार तक एक्स्ट्रा काम करने के लिए तैयार हैं ताकि ग्राहकों को किसी तरह की दिक्कत न हो।  बता दें कि सितंबर के महीने में सिर्फ 11 तारीख को ही हड़ताल नहीं है. यूनियनों ने अपनी मांगों को लेकर 28, 29 और 30 सितंबर को भी तीन दिवसीय हड़ताल का प्लान बनाया है. इतना ही नहीं, अगर मांगें नहीं मानी गईं तो 26 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी भी दी गई है।  दिल्ली में 11 सितंबर को बैंक खुलेंगे या नहीं? दिल्ली में रहने वाले लोगों के मन में ये सवाल है कि 11 सितंबर को बैंक की छुट्टी तो नहीं है. बता दें कि 11 सितंबर को आरबीआई की हॉलिडे लिस्ट के हिसाब से तो दिल्ली में बैंक की छुट्टी नहीं है. लेकिन इसी दिन बैंक यूनियनों की हड़ताल भी है. इसलिए खासकर सरकारी बैंकों की शाखाओं में कामकाज प्रभावित हो सकता है. दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को ब्रिक्स सम्मेलन भी है. इसके चलते कोर्ट और स्कूलों को बंद रखने का निर्देश दिया गया है. लेकिन बैंकों में सामान्य दिनों के तरह काम जारी रह सकता है।  12 और 13 सितंबर को कहां-कहां बैंकों की छुट्टी? अगर  11 सितंबर को बैंक का जरूरी काम है, तो आज ही उसे निपटा लेना बेहतर रहेगा. क्योंकि 12 सितंबर को दूसरा शनिवार है. इस दिन देशभर के बैंक बंद रहते हैं. इसके बाद 13 सितंबर को रविवार है. हालांकि 12 सितंबर को दूसरा शनिवार भी है. वैसे बैंक की छुट्टियां शहर के हिसाब से अलग हो सकती हैं. किसी दूसरे शहर में बैंक खुला हो सकता है, जबकि आपके शहर में उस दिन बैंक की छुट्टी हो सकती है।  जैसे- जयपुर में 11 सितंबर को नगर निगम चुनाव की वजह से भी बैंक  में छुट्टी रहेगी.वहीं गुवाहाटी में 12 सितंबर को श्रीमंत शंकरदेव की तिरुभाव तिथि के कारण भी बैंक बंद है. ऐसे में ब्रांच जाकर होने वाले काम के लिए आपको 14 सितंबर तक इंतजार करना पड़ सकता है।  सितंबर में कब-कब बैंक रहेंगे बंद?     14 सितंबर को गणेश चतुर्थी और इससे जुड़े त्योहारों के कारण बेलापुर, बेंगलुरु, भुवनेश्वर, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई, नागपुर, पणजी और विजयवाड़ा समेत कई केंद्रों में बैंक बंद रहेंगे.     15 सितंबर को अहमदाबाद, भुवनेश्वर और पणजी में क्षेत्रीय त्योहारों के कारण बैंक की छुट्टी है.      21 सितंबर को गुवाहाटी और कोच्चि में बैंक बंद रहेंगे.      22 सितंबर को रांची और 23 सितंबर को जम्मू और श्रीनगर में बैंक बंद रहेगा.      25 सितंबर को गंगटोक में इंद्रजात्रा के कारण बैंक बंद रहेंगे.     26 सितंबर को चौथा शनिवार है. इस दिन भी देशभर में बैंक शाखाएं बंद रहेंगी. बैंक की छुट्टी और हड़ताल में डिजिटल बैंकिंग का करें इस्तेमाल हालांकि, डिजिटल बैंकिंग सर्विस बैंक की छुट्टी या हड़ताल के दौरान भी पर चलती रहेंगी. यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग और इंटरनेट बैंकिंग के जरिए पेमेंट और पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं. एटीएम से भी कैश निकाल पाएंगे.एसबीआई ने ग्राहकों को इंटरनेट बैंकिंग, योनो, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और एटीएम जैसी सेवाओं का इस्तेमाल करने की सलाह दी है.लेकिन अगर आपको कैश जमा करना या निकालना है, केवाईसी अपडेट,चेक जमा करने  या लोन से जुड़ा कोई जरूरी काम है, तो उसे हड़ताल और छुट्टियों के बाद ही करा पाएंगे।  बैंक जाने से पहले आरबीआई हॉलिडे लिस्ट के मुताबिक अपने शहर की छुट्टी की लिस्ट जरूर चेक कर लें. इससे बेवजह भागदौड़ भी नहीं होदा और आपका समय खराब भी नहीं होगा। 

AI और रोबोट से बदलेगी कैंसर जांच की तस्वीर, इंदौर में 12 सेकंड में रिपोर्ट और मुफ्त स्क्रीनिंग

इंदौर  देश भर में तेजी से ओरल कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं. ऐसे में समय रहते बीमारियों की जांच में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काफी मददगार साबित हो रहा है. रोबोट डिवाइस मुंह से जुड़ी बीमारियों और खासतौर पर कैंसर का पता आसानी से और समय रहते लगा रहा है, जिससे मरीज को बीमारी के गंभीर होने से पहले इलाज मिल सकेगा।  हर साल कैंसर की चपेट में आ रहे हजारों लोग भारत में धूम्रपान की लत के अलावा, तंबाकू का सेवन और तरह-तरह के जानलेवा शौक से कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं. हर साल हजारों मरीज डायग्नोज हो रहे हैं, इनमें से अधिकांश थर्ड और फोर्थ स्टेज कंडीशन में होते हैं. इसलिए इनमें से हर साल 50 हजार लोगों की इलाज के बावजूद बीमारी फैलने के कारण मौत हो जाती है. हॉस्पिटल और ऑन्कोलॉजिस्ट वाले कैंसर सहित कई अन्य गंभीर बीमारियों को प्री स्टेज में पता करने के लिए स्कैन ओ एयर नामक रोबोटिक मशीन का उपयोग कर रहे हैं. यह मशीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए बीमारी का 96% तक पता लगाने में सक्षम है।  फ्री में होगी जांच इंदौर स्थित एक निजी अस्पताल में पहली बार यह मशीन स्थपित किया गया है. जहां मुंह की किसी भी समस्या का निशुल्क जांच किया जा रहा है. जांच के बाद फौरन रिपोर्ट मरीज के मोबाइल नंबर में आ जाता है. अस्पताल के ऑन्कोलॉजिस्ट अमय बियानी ने कहा, "अधिकांश मरीजों को यह पता नहीं होता कि उनके मुंह की छोटी सी तकलीफ कभी भी कैंसर का रूप ले सकती है. अस्पताल में किसी भी तरह की तकलीफ में आने वाले लोग अपने मुंह की प्री मेलेनिन स्टेज में ही जांच कर सकें. इसलिए यह रोबोटिक मशीन स्थापित की गई है।  ओरल कैंसर के लिए क्रांतिकारी साबित इस रोबोटिक मशीन की खोज साल 2020 में पुणे की डेंटिस्ट विधि भानुशाली और रजत कबाड़े ने किया था, इसका उद्देश्य दांतों और मसूड़े की 40 तरह की बीमारियों की पहचान के लिए किया गया था. इस रोबोटिक मशीन से तरह-तरह की मुंह की जांच के अलावा, कैंसर की प्री स्टेज से संबंधित बीमारी और स्थितियां भी डायग्नोज होने लगी हैं, जिससे यह मशीन ओरल कैंसर के डायग्नोज के लिए क्रांतिकारी साबित हो रही है।    मेडिकल प्रोफेशनल के लिए सहायक कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतिभा पवार ने कहा, "रोबोटिक मशीन की जांच रिपोर्ट से काफी हद तक मरीज की बीमारी का पता चल जाता है. जिससे यह डॉक्टर और मेडिकल प्रोफेशनल के लिए भी सहायक सिद्ध होगी. मशीन की जांच रिपोर्ट के बाद सिर्फ उन मरीजों को सीटी स्कैन अथवा बायोप्सी करनी जरूरी होगी. जिनका डायग्नोज मशीन द्वारा ओरल कैंसर के रूप में किया गया है इससे लोगों को अनावश्यक जांच के खतरे और आर्थिक समस्या से बचाव हो सकेगा। 

2027 चुनाव के लिए BJP का बड़ा प्लान, 125 मौजूदा विधायकों पर संकट; 2024 के नतीजों से लिया सबक

लखनऊ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब छह महीने से भी कम वक्त बचा है. इस चुनाव में 10 साल से सत्तारूढ़ योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली भाजपा सरकार के सामने हैट्रिक लगाने की चुनौती है. भाजपा ने स्थानीय विधायकों के कामकाज और लोकप्रियता का सर्वे कराते हुए जनता का मूड भांपने की कोशिश की है. 2024 के लोकसभा चुनाव से लगे झटके से सबक लेकर भाजपा ने 403 विधानसभा सीटों पर एक गोपनीय और बहुस्तरीय आंतरिक सर्वे कराया है. इस सर्वे रिपोर्ट ने सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।  भाजपा का आंतरिक सर्वे सूत्रों की मानें तो इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में करीब 125 से 128 मौजूदा विधायकों के खिलाफ उनके ही क्षेत्रों में जबर्दस्त एंटी इनकंबेंसी है. सीधे तौर पर कहें तो करीब भाजपा में 128 सीटों पर मौजूदा विधायकों के टिकट काटा या बदला जा  सकता है. पश्चिम यूपी से लेकर पूरब तक मंत्रियों से लेकर दिग्गज विधायकों तक के नाम इस रेड लिस्ट में शामिल हैं. भाजपा यूपी को अपने संगठन के लिहाज से 6 क्षेत्रों में बांटती है. ऐसे में कहां किस क्षेत्र से कितने टिकट कट सकते हैं, ये आंकड़ा चौंकाने वाला है. यूपी विधानसभा चुनाव 2027 को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल माना जा रहा है।      पश्चिम क्षेत्र की 71 सीटों में 23-25 टिकट कटने के आसार     ब्रज क्षेत्र कुल 65 सीटों में 24-26 टिकट कटने की संभावना     अवध क्षेत्र में कुल 82 सीट में 26-28 टिकट कटने का संकेत     कानपुर क्षेत्र की कुल 52 सीट में 22-24 कटने के कयास     काशी क्षेत्र में कुल 72 सीट में 19-21 का पत्ता कट सकता है     गोरखपुर क्षेत्र की 62 सीटों में 18-22 टिकट कटने की संभावना यूपी में भाजपा की हैट्रिक की चुनौती भाजपा यूपी में हैट्रिक लगाने को पूरी ताकत झोंक रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले एक-डेढ़ महीने में ही राज्य के ज्यादातर जिलों का दौरा कर विकास परियोजनाओं की झड़ी लगा दी है.2022 की जीत की बात करें तो 1985 के बाद यूपी में यह पहला मौका था जब किसी मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी ने लगातार दूसरी बार पूरे बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की थी. वहीं सपा-कांग्रेस गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित है. अखिलेश यादव जहां पीडीए के सामाजिक समीकरणों पर ध्यान केंद्रित किए हैं, वहीं कांग्रेस दलित-मुस्लिम वोटों को एकजुट करके अपना जनाधार बढ़ाने में जुटी है।  2022 विधानसभा चुनाव में किसको कितनी सीटें भारतीय जनता पार्टी (BJP)- 255 अपना दल (सोनेलाल)-1 2 निषाद पार्टी (NISHAD)- 06 एनडीए (NDA)-  273 कुल सीटें 403: बहुमत 202 गठबंधन में सीटों का बंटवारा भी चुनौती उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी लहर को कायम रखते हुए भाजपा को अकेले 41.29% वोट मिले थे. भाजपा का पिछले चुनाव में अपना दल सोनेलाल, निषाद पार्टी जैसे दलों के साथ गठबंधन रहा है. अब एनडीए के खेमे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय लोकदल शामिल है. एनडीए का सपा-कांग्रेस गठबंधन से मुख्य मुकाबला होना तय है. मायावती की बहुजन समाज पार्टी, आजाद समाज पार्टी, एआईएमआईएम जैसे दल भी ताल ठोकने को तैयार हैं। 

बच्चों के अपहरण की जांच में एकरूपता की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र-राज्यों से जवाब तलब किया

नई दिल्ली बच्चों के गुम होने, अपहरण और उन्हें जबरन ले जाने के मामलों की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में पूरे देश में ऐसी घटनाओं की जांच के लिए एक जैसी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। इसके साथ ही जांच को तय समयसीमा में पूरा करने, विशेष जांच प्रक्रिया अपनाने और मामलों की जल्द सुनवाई के लिए समर्पित अदालतें बनाने की मांग की गई है। याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा है। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ शिक्षा मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और विधि आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता की मुख्य मांग क्या? यह जनहित याचिका अधिवक्ता और याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दाखिल की है। इसे अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड अश्वनी कुमार दुबे के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। याचिका में मांग की गई है कि बच्चों के अपहरण और उन्हें जबरन ले जाने के मामलों की जांच के लिए पूरे देश में एक समान व्यवस्था हो। इसमें खास तौर पर समयबद्ध जांच और विशेष जांच प्रक्रिया की मांग रखी गई है।  ​समर्पित अदालतें बनाने की पैरवी याचिका में केवल जांच तक ही बात सीमित नहीं रखी गई है, बल्कि त्वरित न्याय के लिए समर्पित विशेष अदालतें गठित करने का भी अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब तक बच्चों के खिलाफ होने वाले इन अपराधों के लिए अलग से विशेष अदालतें नहीं होंगी, तब तक पीड़ितों को त्वरित न्याय मिलना कठिन होगा और दोषियों में कानून का डर कायम नहीं हो सकेगा। ​मौजूदा व्यवस्था की खामियों पर उठाये सवाल सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में यह रेखांकित किया गया है कि वर्तमान समय में राज्यों के बीच जांच एजेंसियों के समन्वय और सूचना साझा करने में काफी ढिलाई देखने को मिलती है। कई मामलों में पुलिस की धीमी और असंवेदनशील कार्रवाई के कारण अपहृत बच्चों को सही समय पर सुरक्षित वापस नहीं लाया जा पाता। याचिका में कहा गया है कि अंतरराज्यीय नेटवर्क के जरिए बच्चों का अपहरण कर उन्हें बाल मजदूरी या मानव तस्करी में धकेल दिया जाता है, जिसके लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय तंत्र की सख्त जरूरत है। ​सुप्रीम कोर्ट का रुख और आगे की कार्रवाई सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका में उठाए गए बिंदुओं को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है। राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से दाखिल होने वाले जवाबों के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर आगे की सुनवाई करेगा और बच्चों की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश तय कर सकता है। याचिका में ये प्रमुख मांगें रखी गई हैं:-     बच्चों के अपहरण और जबरन ले जाने के मामलों की जांच के लिए देशभर में एक समान व्यवस्था हो।     जांच को तय समयसीमा में पूरा करने के लिए समयबद्ध प्रक्रिया लागू की जाए।     ऐसे मामलों की जांच के लिए विशेष और समर्पित जांच प्रक्रिया तैयार की जाए।     मामलों की सुनवाई तेजी से पूरी करने के लिए समर्पित अदालतों की व्यवस्था हो। याचिका में मौजूदा व्यवस्था को लेकर क्या कहा गया? याचिका में लापता, अपहृत और जबरन ले जाए गए बच्चों से जुड़े मामलों को संभालने में व्यवस्था की खामियों का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है, जिससे ऐसे मामलों में जांच एजेंसियां तेजी से और आपसी तालमेल के साथ कार्रवाई कर सकें। याचिका का जोर इस बात पर है कि बच्चों से जुड़े इन मामलों में जांच और कार्रवाई के लिए एक समान और समन्वित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। याचिका में कहा गया है कि बच्चों के गुम होने, अपहरण या उन्हें जबरन ले जाने के मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई तेज और आपस में समन्वित होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की है। फिलहाल अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। केंद्र, राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों के जवाब के बाद मामले में आगे की कार्रवाई होगी। 

Instagram-Facebook पर नाबालिगों की एंट्री होगी बंद? बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर SC ने केंद्र से पूछा सवाल

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें मांग की गई है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. याचिका में सोशल मीडिया के इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षा उपायों की भी मांग की गई है, जिसमें माता-पिता या लीगल गार्जियन की सहमति जरूरी होनी चाहिए.  याचिकामें कहा गया है कि मेटा और दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों ने बच्चों के अकाउंट बनाने की आयुसीमा 13 साल तय की है, जो अमेरिकी कानून के मुताबिक है।  याचिका में क्या कहा गया है? NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की फाइल की गई याचिका में कहा गया है कि फेसबुक और स्नैपचैट (इंडिया) जैसे प्लेटफॉर्म यूजर्स को 13 साल की उम्र से अकाउंट बनाने की इजाजत देते हैं, जबकि भारतीय कानून 18 साल से कम उम्र के लोगों को नाबालिग मानता है.  याचिका में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में बदलाव करने या खास गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है. जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी डिजिटल प्लेटफॉर्म माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति के बिना 18 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ सोशल मीडिया कॉन्ट्रैक्ट न कर सके, या ये कॉन्टेक्ट माता-पिता या अभिभावक के वेरिफिकेशन/e-KYC के अधीन होनी चाहिए।  बच्चों को सीधे एक्सेस देने पर सवाल याचिका में ये भी मांग की गई है कि ऐसी गाइडलाइंस बनाई जाएं जो ये जरूरी करें कि जहां भी किसी नाबालिग को डिजिटल प्लेटफॉर्म एक्सेस करने या इस्तेमाल करने की इजाजत हो, तो ऐसा एक्सेस कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त तरीके से हो, जिसमें माता-पिता या कानूनी अभिभावक शामिल हों. इसमें भी माता-पिता या अभिभावक का वेरिफिकेशन/e-KYC शामिल हो, जो सर्विस के नेचर और रिस्क के हिसाब से हो।  याचिका में कहा गया है कि बच्चों का डिजिटल प्लेटफॉर्म तक खुद से एक्सेस उन्हें ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, ट्रैफिकिंग, बिहेवियरल प्रोफाइलिंग, पर्सनल डेटा का गलत इस्तेमाल, साइबरबुलिंग और उम्र के हिसाब से गलत कंटेंट जैसे रिस्क के खतरे में डालता है। 

यूरोप की ऊर्जा जरूरतों का नया समाधान! समुद्र में बना आर्टिफिशियल आइलैंड, 3.5 GW विंड पावर का होगा हब

ब्रसेल्स  सौ बात की एक बात कि बिजली पैदा करने को लेकर यूरोप के देश बेल्जियम से एक ऐसी ख़बर आई जिस पर ज़्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया लेकिन सबको ध्यान देने की ज़रूरत है. बिजली पैदा करने के लिए दुनिया में क्या-क्या किया जा रहा है, इस पर सब को नज़र रखने की ज़रूरत है. क्योंकि दुनिया में ताक़त का खेल इसी आधार पर होता जा रहा है कि किसके पास कितनी ऊर्जा बनाने की कपैसिटी है. ईरान युद्ध में सारा खेल ही तेल के व्यापार को कंट्रोल करने का है. AI की जंग जो चल रही है, उसमें दुनिया के डेटा सेंटरों पर कंट्रोल करने के लिए बड़ी भारी मात्रा में बिजली की ज़रूरत पड़ेगी, ये सब देश समझ रहे हैं. ऊधर रूस और यूक्रेन युद्ध में यूरोप ने देख लिया कि उसके हाथ इसलिए बंधे हुए हैं क्योंकि उसको सर्दियों में अपने हीटिंग सिस्टम चलाने के लिए रूस की गैस की ज़रूरत पड़ती है. और यूरोप में अब जिस हिसाब से गर्मी पड़ने लग गई है तो वो ये भी समझ रहे हैं कि अब तो वहां भी AC लगाने पड़ेंगे आगे चल कर।  अभी तक पंखे भी नहीं देखे थे उन्होंने. तो बिजली कहां से आएगी इतनी? कोयले से बना नहीं सकते क्योंकि कोयला जला-जला कर ही तो 100 साल में दुनिया का ये हाल हो गया है कि दुनिया भर में गर्मी बढ़ गई है. यूरोप दूसरों को नसीहत दे रहा है कि कोयला मत जलाओ तो ख़ुद कैसे जला लेगा? तेल और गैस के लिए या तो रूस के सामने झुकना पड़ता है या अरब देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. परमाणु बिजली के लिए यूरेनियम की मारामारी है. सोलर बिजली के लिए ज़मीन भी चाहिए जो यूरोप के कई देशों में उतनी है नहीं और बड़ी बात ये कि सूरज तो वहां निकलता ही कितने दिन है साल में? तो यूरोप के कई देश बनाते हैं बिजली हवा से।  हवा से मतलब विंडमिल से. पवन चक्कियों से. वो देखा है ना आपने बड़ा से पंखा लगा देते हैं ऊंचाई पर और वो हवा से चलता है तो नीचे चक्की चलती है और उससे बिजली बनाते हैं. लेकिन उसके लिए क्या चाहिए? एक तो बहुत सारी पवन चक्कियां एक साथ लगाने के लिए ख़ाली मैदान चाहिएं जहां खुली हवा तेज़ी से चलती हो. इतनी ज़मीन कहां से लाएं एक साथ? और ज़मीन पर पवन चक्कियां लगा दें तो खेती नहीं कर सकते वहां फिर. वो अलग नुक़सान है. क्योंकि अगर पवन चक्कियां वहां लगाएं जहां पर भी थोड़ी-बहुत जगह मिले तो वो तो कर सकते हैं लेकिन फिर ये दूर-दूर लगे पंखों से बिजली बनाकर एक जगह लाने के लिए इतना सारी केबल लगानी पड़ेगी, नहीं तो उसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कैसे करेंगे? और यूरोप के बेल्जियम जैसे देशों के पास तो वैसे भी इतनी सारी खुली ज़मीन नहीं है एक साथ. तो जानते हैं बेल्जियम क्या कर रहा है? बेल्जियम ने लगाया टापू वाला दिमाग बेल्जियम ने देखा कि सबसे ज़्यादा खुली और तेज़ हवा बिना किसी रुकावट के कहां चलती है? दिन हो रात कौन-सी ऐसी जगह है जहां पवन चक्कियों के पंखे फ़र्र-फ़र्र चलते रहेंगे और बिजली बनाते रहेंगे? और ज़मीन भी नहीं छोड़ने पड़ेगी उनके लिए? समुद्र में. जी, बेल्जियम ने सोचा कि अगर समुद्र में पवन चक्कियां लगा दें तो? पानी में ताल बिछाकर बिजली ज़मीन तक ले आएंगे. लेकिन समुद्र में पवन चक्कियां लगाएंगे कहां? तैरते हुए प्लैटफ़ॉर्म पर तो लगा नहीं सकते क्योंकि वो तो हवा से डोल जाएंगे. तो बेल्जियम क्या कर रहा है कि समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है. जी, पूरा नया टापू समुद्र के अंदर. ये अपने आप में दुनिया का एक नया अजूबा बनाया जा रहा है.  वो समुद्र में एक पूरा टापू बना रहा है बिजली पैदा करने के लिए।  कहां बन रहा यह आइलैंड? नॉर्थ सी में, उत्तर सागर में, बेल्जियम अपने तट से क़रीब 45 km दूर एक आर्टिफ़िशियल एनर्जी आइलैंड बना रहा है. प्रिंसेस एलिज़ाबेथ आइलैंड के नाम से. ये दुनिया का पहला ऐसा टापू बन रहा है. और ये टापू बनाया कैसे जा रहा है वो असली समझने वाली बात है. जैसे बच्चों के खिलौने होते हैं ना जिनमें ब्लॉक जोड़-जोड़ कर कोई बिल्डिंग बनाई जाती है या कुछ भी बनाया जाता है? वैसे बना रहा है. सिमेंट के, कॉन्क्रीट के बड़े-बड़े ब्लॉक बना रहा है, बक्से बना रहा है. और इन बक्सों में समंदर में डाल दिया जाएगा और उनको जोड़कर पूरा टापू बना देंगे. द नेदरलैंड्स के फ़्लिसिंगेन बंदरगाह में 23 ऐसे बड़े-बड़े कॉन्क्रीट के डिब्बे बनाए गए हैं. बड़े-बड़े मतलब एक-एक डिब्बा क़रीब 58m लंबा है, 28m चौड़ा है और 23 से 32m ऊंचा है. 58x28x32 समझ रहे हैं आप? मतलब एक 7 मंज़िला बिल्डिंग समझ लीजिए चौड़ी वाली. दो को जोड़ दो एक फ़ुटबॉल के मैदान जितनी जगह से भी ज़्यादा घेर लें, इतने बड़े-बड़े डिब्बे हैं. और हर डिब्बे का वज़न कितना? हर एक का वज़न है क़रीब 22,000 टन।  कैसे बन रहा आइलैंड मतलब समझ लो कोई 15,000 गाड़ियों जितना वज़न एक डिब्बे का. इतना सिमेंट लगा कर बने हैं ये डिब्बे. और ये तो अभी ख़ाली डिब्बों की बात हो रही है. खोखले बनाए गए हैं. 23 ऐसे डिब्बे. और इनको उतार दिया गया है समुद्र में. इन भारी डिब्बों को जहाज़ों से खींचकर समुद्र में ले जाया गया और वहां समुद्र के तल में डुबो दिया गया. और अब इनकी दीवारों के अंदर भरी जाएगी रेत. क़रीब बीस लाख क्यूबिक मीटर रेत भरी जा रही है. और ऐसे बनाया जा रहा है समुद्र के अंदर एक 6 हेक्टेयर का ठोस टापू. 6 हेक्टेयर मतलब लगभग 15 एकड़ का टापू बनेगा. मतलब समझ लो फ़ुटबॉल के 12 मैदानों जितना. उस पर बंदरगाह बनाया जाएगा, हेलीपैड बनाया जाएगा. और एक साथ 250 से ज़्यादा पवन चक्कियां लगाई जाएंगी, उनकी टर्बआइन लगाई जाएंगीं जिससे बिजली बनेगी और तारें बिछाई जाएंगी तट तक. डिब्बे समुद्र में उतार दिये गए हैं. बाक़ी काम में 5 साल लग जाएंगे. 2031 से बिजली मिलना शुरू हो जाएगी बेल्जियम को इससे।  कैसे बिजली पैदा होगी? यानी समुद्र में लगने वाली सैकड़ों पवन … Read more

भारत में बढ़ेगा क्षेत्रीय विमान निर्माण, रूस से IL-114-300 पर डील की तैयारी; SJ-100 पर भी बातचीत

 नई दिल्ली रूस अब भारत के साथ सिर्फ पारंपरिक रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं रहना चाहता. वह नागरिक विमानन क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. रूस एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन (यूएसी) के सीईओ वादिम बाडेखा ने हाल ही में बताया कि पिछले छह महीनों में भारतीय कंपनियों के साथ बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है।  नई दिल्ली में चल रहे इन्नोप्रोम इंडिया प्रदर्शनी के दौरान कई महत्वपूर्ण समझौते औपचारिक रूप लेने वाले हैं. इस प्रदर्शनी में 120 से ज्यादा रूसी और भारतीय कंपनियां हिस्सा ले रही हैं. यह आयोजन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हो रहा है, जिससे दोनों देशों के औद्योगिक सहयोग को गति मिलने की उम्मीद है।  सबसे ज्यादा चर्चा आईएल-114-300 क्षेत्रीय यात्री विमान को लेकर हो रही है. यह विमान छोटी और मध्यम दूरी की उड़ानों के लिए बनाया गया है. रूसी कंपनियां भारतीय एयरलाइंस और ऑपरेटरों को यह विमान बेचने के लिए सक्रिय हैं।  प्रस्तावित सौदों में पिनेकल एयर के लिए 50 विमान, एयर केरल के लिए 20 विमान और स्लीक एविएशन से जुड़े एमओयू के तहत 35 विमान शामिल हैं. इन आंकड़ों से साफ है कि रूस पक्ष भारत में कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाले विमानों की बड़ी मांग देख रहा है।  आईएल-114-300: क्षेत्रीय उड़ानों का संभावित गेम चेंजर आईएल-114-300 एक टर्बोप्रॉप क्षेत्रीय यात्री विमान है जिसे रूस यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने विकसित किया है. यह विमान मुख्य रूप से छोटे शहरों और क्षेत्रीय मार्गों को जोड़ने के लिए उपयुक्त माना जाता है. भारत जैसे विशाल देश में जहां कई छोटे शहर अभी भी अच्छी हवाई कनेक्टिविटी का इंतजार कर रहे हैं, ऐसे विमान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।  जनवरी में विंग्स इंडिया एविएशन एग्जीबिशन के दौरान हैदराबाद में यूएसी ने भारतीय कंपनी फ्लेमिंगो एयरोस्पेस के साथ छह आईएल-114-300 विमानों की संभावित आपूर्ति के लिए प्रारंभिक समझौता किया था. अब इन्नोप्रोम के दौरान इससे बड़े सौदे होने की संभावना जताई जा रही है।  अगर ये समझौते सफल होते हैं तो यह न सिर्फ रूसी विमानों के लिए भारतीय बाजार का दरवाजा खोलेगा बल्कि भारत की क्षेत्रीय हवाई सेवाओं को भी नई दिशा देगा. भारतीय पक्ष के लिए यह आकर्षक इसलिए भी है क्योंकि कई घरेलू ऑपरेटर छोटे विमानों की तलाश में हैं जो कम यात्री क्षमता वाले मार्गों पर आर्थिक रूप से प्रैक्टिकल हों. बड़े जेट विमान इन मार्गों पर घाटे में चलते हैं, जबकि टर्बोप्रॉप विमान ईंधन की बचत और संचालन लागत कम रखने में मदद कर सकते हैं।  एसजे-100 का स्थानीय उत्पादन: मेक इन इंडिया की दिशा में कदम आईएल-114-300 के अलावा रूस पक्ष एसजे-100 क्षेत्रीय जेट के भारत में स्थानीय उत्पादन पर भी गंभीरता से काम कर रहा है. यूएसी के अनुसार इस विषय पर बातचीत लगभग 80% पूरी हो चुकी है. जल्द ही समझौता होने की उम्मीद है. इससे पहले यूएसी और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने एसजे-100 के संयुक्त लाइसेंस प्राप्त उत्पादन से संबंधित समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।  एसजे-100 एक आधुनिक क्षेत्रीय जेट है जिसे रूस ने विकसित किया है. भारत में इसका उत्पादन शुरू होने से न सिर्फ तकनीक का हस्तांतरण होगा बल्कि स्थानीय निर्माण क्षमता भी बढ़ेगी. भारतीय कंपनियां अगर इस विमान का बड़ा हिस्सा देश में ही बना पाती हैं तो लागत कम होगी, रोजगार बढ़ेगा और भविष्य में निर्यात की संभावनाएं भी खुलेंगी। स्थानीय उत्पादन की बातचीत इतनी आगे बढ़ना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दोनों देशों के बीच सिर्फ खरीदार-विक्रेता का रिश्ता नहीं बल्कि साझा विनिर्माण साझेदारी बनेगी. रक्षा क्षेत्र में लंबे समय से चले आ रहे सहयोग के बाद नागरिक विमानन में भी ऐसा मॉडल अपनाना दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।  भारत-रूस सहयोग का नया अध्याय भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग दशकों पुराना है. लड़ाकू विमान, हेलिकॉप्टर, मिसाइल सिस्टम और अन्य प्लेटफॉर्म दोनों देशों के रिश्ते की रीढ़ रहे हैं. अब रूस नागरिक विमानन क्षेत्र में भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है. पश्चिमी देशों पर प्रतिबंधों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों के बीच रूस नए बाजारों की तलाश में है. भारत उसकी नजर में एक बड़ा और स्थिर बाजार है।  इन्नोप्रोम इंडिया प्रदर्शनी इसी रणनीति का हिस्सा लगती है. यहां सिर्फ विमान सौदों की बात नहीं हो रही बल्कि औद्योगिक सहयोग के कई अन्य क्षेत्रों पर भी चर्चा हो रही है. 120 से अधिक कंपनियों की भागीदारी से साफ है कि दोनों देश सिर्फ सरकारी स्तर पर नहीं बल्कि निजी क्षेत्र से भी रिश्ते मजबूत करना चाहते हैं।  क्षेत्रीय कनेक्टिविटी भारत सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है. उड़ान योजना के तहत छोटे शहरों को हवाई सेवा से जोड़ने के प्रयास चल रहे हैं. रूसी क्षेत्रीय विमान अगर प्रतिस्पर्धी कीमत और विश्वसनीय सेवा के साथ आते हैं तो वे इस लक्ष्य को पूरा करने में मददगार साबित हो सकते हैं. साथ ही स्थानीय उत्पादन से भारत की विमानन विनिर्माण क्षमता भी मजबूत होगी।  संभावनाएं और चुनौतियां दोनों मौजूद ये प्रस्ताव आशाजनक जरूर हैं लेकिन कई चुनौतियां भी हैं. सबसे पहले प्रमाणन और नियामक मंजूरी का मुद्दा. किसी भी नए विमान को भारतीय आसमान में उड़ान भरने के लिए सख्त सुरक्षा और प्रमाणन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. दूसरी चुनौती रखरखाव और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता है. लंबे समय तक विमानों को सुचारू रूप से चलाने के लिए मजबूत सपोर्ट सिस्टम जरूरी होता है।  तीसरी चुनौती कॉम्पीटिशन है. भारतीय बाजार में अन्य देशों के क्षेत्रीय विमान भी मौजूद हैं या आने की कोशिश कर रहे हैं. कीमत, फ्यूल एफिसिएंसी, यात्री सुविधा और आफ्टर सेल्स सपोर्ट जैसे मुद्दे फैसला करने वाले साबित होंगे. चौथी बात फाइनेंशियल सपोर्ट की है. बड़े सौदों के लिए आसान ऋण सुविधा या लीजिंग व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।  इन चुनौतियों के बावजूद रूस पक्ष आशावादी नजर आ रहा है. पिछले छह महीनों में हुई प्रगति और इन्नोप्रोम में संभावित समझौते इस बात का संकेत देते हैं कि दोनों देश व्यावहारिक सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. अगर आईएल-114-300 के बड़े ऑर्डर और एसजे-100 का स्थानीय उत्पादन दोनों सफल होते हैं तो यह भारत-रूस एयरोस्पेस संबंधों का नया अध्याय साबित हो सकता है।  आगे की राह और रणनीतिक महत्व भारत के लिए यह सहयोग कई मायनों में फायदेमंद हो … Read more