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मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री के लिए मोदी सरकार का बड़ा ऐलान, एडवांस टेस्टिंग उपकरणों की लागत उठाएगी सरकार

नई दिल्ली  केंद्र सरकार ने देश के मेडिकल डिवाइस (चिकित्सा उपकरण) क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है।वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस क्षेत्र में उन्नत परीक्षण उपकरणों के लिए सरकार की ओर से 100 प्रतिशत फंडिंग सहायता देने की घोषणा की है।सरकार के इस फैसले का एसोसिएशन आफ इंडियन मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री (एआइएमईडी) ने दिल खोलकर स्वागत किया है। एआइएमईडी ने इस प्रतिबद्धता को भारत को वैश्विक विनिर्माण हब बनाने की दिशा में एक बड़ा 'गेम-चेंजर' बताया है।संगठन का कहना है कि यह निर्णय भारत के मेडिकल डिवाइस उद्योग को न केवल लागत के मामले में, बल्कि तकनीक और गुणवत्ता के मामले में भी दुनिया में सबसे आगे खड़ा करेगा। मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत के साथ MSME के लिए संजीवनी घोषणा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एआइएमईडी के फोरम समन्वयक राजीव नाथ ने कहा कि यह घोषणा भारत को दुनिया के शीर्ष पांच मेडिकल डिवाइस विनिर्माण केंद्रों में शामिल करने के हमारे साझा दृष्टिकोण को मान्यता देती है। अब तक उन्नत परीक्षण बुनियादी ढांचे की कमी एक बड़ी बाधा थी। 100 प्रतिशत सरकारी सहायता मिलने से भारतीय निर्माता अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतर सकेंगे। उन्होंने आगे कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कामन टेस्ट सुविधाओं से छोटे और मध्यम उद्योगों के साथ-साथ स्टार्टअप्स को सबसे ज्यादा फायदा होगा। इससे विदेशी लैब पर निर्भरता कम होगी, परीक्षण की भारी लागत से राहत मिलेगी और परीक्षण रिपोर्ट को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता मिलेगी। 'ब्रांड इंडिया' को मिलेगा बड़ा बढ़ावा राजीव नाथ ने इस कदम को सरकार का एक "समझदारी भरा निवेश" करार देते हुए कहा कि इसका सीधा लाभ 'ब्रांड इंडिया' की साख मजबूत करने के रूप में मिलेगा। संगठन ने उम्मीद जताई है कि इस नीति के क्रियान्वयन में उद्योग जगत के सुझावों को शामिल किया जाएगा ताकि वास्तविक जरूरतों के अनुसार सुविधाओं का विकास हो सके।  

यात्री परिवहन के विस्तार पर मंथन, इंदौर में विजन समिट से निवेश और उद्योग को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

इंदौर  मध्य प्रदेश सरकार ने वर्ष 2005 में घाटे का हवाला देकर सड़क परिवहन निगम (सपनि) को बंद कर दिया था। पत्रिका ने सड़क परिवहन निगम के बंद होने से प्रदेश में बिगड़ी परिवहन व्यवस्था को उजागर किया था। सरकार के सामने वे सभी तथ्य लेकर आए, जिसने सफर की मुश्किलें बढ़ाईं। इसके बाद मोहन सरकार ने सरकारी लोक परिवहन सेवा को शुरू करने ऐलान किया और अब क्रियान्वयन की ओर बढ़ी है। यानी अब मध्य प्रदेश में जल्द ही सरकारी बस परिवाहन सेवा शुरु होगी। आपको बता दें कि, राज्य सरकार प्रदेश के नागरिकों को स्मार्ट, सुरक्षित, सुगम और पर्यावरण-अनुकूल लोक परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ा कदम लेने जा रही है। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा यात्री परिवहन विजन समिट-2026 आयोजित की जाएगी। प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में 11 और 12 सितंबर को आयोजित होने समिट में प्रदेश की यात्री परिवहन व्यवस्था को अधिक आधुनिक, व्यवस्थित और प्रभावी बनाने के साथ-साथ निवेश, रोजगार और उद्योग के नए अवसरों को बढ़ावा देने पर मंथन होगा। इसमें पूरे देश से आने वाले परिवहन विशेषज्ञ, निजी बस ऑपरेटर, उद्योग जगत के प्रतिनिधि और नीति-निर्माता प्रदेश की यात्री परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए विचार-विमर्श करेंगे। विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यात्री परिवहन का रोडमैप तैयार करने में मदद मिलेगी। साथ ही प्रदेश की 75 फीसदी ग्राम पंचायतों को बस सेवा से जोड़कर ग्रामीण कनेक्टिविटी को बेहतर किया जाएगा। मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एवं अधोसंरचना लिमिटेड अंतर्गत 'मोबिलिटी विज़न 2030' का लक्ष्य प्रदेश के दूरस्थ क्षेत्रों तक परिवहन नेटवर्क का विस्तार करना है। इसके अंतर्गत प्रदेश में 15,000 से अधिक आधुनिक सार्वजनिक बसें संचालित की जाएंगी। इससे रोजाना 30 लाख से ज्यादा यात्रियों को सुरक्षित आवागमन की सुविधा मिलेगी। साथ ही 180 से अधिक आधुनिक बस स्टैंड्स, टर्मिनल्स और डिपो का कायाकल्प होगा। इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर विशेष जोर पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के उद्देश्य से समिट में स्वच्छ ईंधन और इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर विशेष जोर दिया जाएगा। मौजूदा समय में 96 पीएम ई-बसें और 120 इंटरसिटी बसें प्रदेश में संचालित हैं। इसके साथ आगामी 6 महीनों में 486 पीएम ई-बसें और 34 इंटरसिटी बसें जोड़ी जाएंगी, जबकि वर्ष 2027 तक यह संख्या बढ़ाकर 1,100 करने का लक्ष्य है। प्रदेश में 100 बसों की क्षमता वाले आधुनिक चार्जिंग डिपो और सोलर इंफ्रॉस्ट्रक्चर भी तैयार किए जा रहे हैं। इससे सालाना 70,000 टन से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी आएगी। यात्री सुरक्षा, स्मार्ट तकनीक और 24×7 निगरानी मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा अंतर्गत संचालित होने वाली सभी बसों की निगरानी इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए होगी। इसके लिए मध्य प्रदेश यात्री परिवहन एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड एवं उसकी 7 सहायक कंपनियों में अत्याधुनिक कमांड-कंट्रोल सेंटर स्थापित किए जाएंगे। इन सेंटरों से बसों के संचालन, लोकेशन, टाइमिंग एवं अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों की रियल टाइम निगरानी सुनिश्चित की जाएगी। साथ ही, सार्वजनिक बसों में महिला और बाल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इससे यात्री परिवहन व्यवस्था अधिक सुरक्षित, सुगम, पारदर्शी और प्रभावी बनाने में भी मदद मिलेगी। सभी बसों को 07 सीसीटीवी कैमरों, पैनिक बटन और रियल-टाइम व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम से लैस किया जा रहा है। इसके अलावा, पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम, ड्राइवरों की तकनीकी ट्रेनिंग और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र के जरिए सुरक्षित एवं समयबद्ध यात्रा सुनिश्चित की जाएगी।

नंदीग्राम में फिर अग्निपरीक्षा, टूट के बीच TMC को नहीं मिल रहा मजबूत उम्मीदवार; 6 अक्टूबर को उपचुनाव

कलकत्ता पश्चिम बंगाल का नंदीग्राम उपचुनाव रोचक होता जा रहा है। ममता बनर्जी की पार्टी के नेता पहले ही मैदान से दूरी बना रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण वरिष्ठ नेता अबु ताहिर का बयान है, जिसमें उन्होंने साफ कर दिया है कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। साथ ही ममता बनर्जी को ही उतरने के लिए कहा है। खास बात है कि साल 2021 में टीएमसी सुप्रीमो को नंदीग्राम से हार का सामना करना पड़ा था। जबकि, 2026 में भी पार्टी यहां से हारी। दोनों ही चुनावों में अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को जीत मिली थी। नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव के लिए 6 अक्तूबर को वोटिंग होने जा रही है और 9 अक्तूबर को नतीजों का ऐलान हो जाएगा। इधर, ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले टीएमसी के दूसरे गुट ने भी ममता बनर्जी और सांसद अभिषेक बनर्जी को उपचुनाव लड़ने की चुनौती दे दी है। हालांकि, अब तक तय नहीं है कि टीएमसी किसे उम्मीदवार बनाने जा रही है। चुनाव लड़ने से साफ इनकार ताहिर ने कहा, 'ममता बनर्जी को नंदीग्राम उपचुनाव में आकर चुनाव लड़ना चाहिए। जब तृणमूल सत्ता में थी, तब वह चुनाव लड़ने के लिए आई थीं। अब मैं चुनाव क्यों लड़ूं?' पीटीआई भाषा के मुताबिक, उन्होंने कहा, 'टीएमसी के सत्ता में रहने के 15 वर्षों के दौरान मुझे क्या मिला? इन 15 वर्षों में मुझे कभी भी टीएमसी का उम्मीदवार नहीं माना गया। मुझे अयोग्य समझा गया। फिर अब मुझे बलि का बकरा बनाने के लिए क्यों चुना जाना चाहिए?' उन्होंने साफ कर दिया है कि अगर चुनाव लड़ने के बारे में राय ली जाती है, तो 'मैं इनकार कर दूंगा।' क्या ममता बनर्जी लड़ेंगी चुनाव एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कई नेताओं का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी के बंगाल में बढ़ते प्रभाव और टीएमसी में टूट देखते हुए ममता बनर्जी को मैदान में उतरना चाहिए। हालांकि, इसे लेकर उन्होंने आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है। चैनल से बातचीत में नेताओं का कहना है कि विधायक बनकर ममता लोगों के मुद्दे उठा सकती हैं और नेता प्रतिपक्ष बन सकती हैं। अटकलें ये भी हैं कि टीएमसी वरिष्ठ नेता अखिली गिरी पर दांव खेल सकती है। फिलहाल, आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया। मंगलवार को मजिस्ट्रेट ने एक बैठक भी बुलाई थी, जिसमें लगभग सभी दल मौजूद थे। जबकि, टीएमसी गायब रही और इस कदम को उम्मीदवार नहीं मिलने से जोड़कर देखा जाने लगा था। बागी गुट भी चुनौती दे रहा बागी गुट के प्रवक्ता रिजू दत्ता ने उनके बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा ,'अबू ताहेर सही हैं। उन्हें अब चुनाव क्यों लड़ना चाहिए। यदि ममता बनर्जी चुनाव लड़ने की इच्छुक नहीं हैं तो उनके भतीजे और सभी कुछ जानने वाले राजनीतिज्ञ अभिषेक को ही चुनाव लड़ जाना चाहिए।' TMC को दो बार लगी चोट साल 2021 में 1956 वोट से हारी टीएमसी और तब ममता बनर्जी ही पार्टी की उम्मीदवार थीं। इसके बाद टीएमसी को दूसरा झटका 2026 में लगा जब पार्टी के नेता पवित्र कर भी 9 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए। खास बात है कि दोनों ही मौकों पर विजेता शुभेंदु अधिकारी रहे थे। हालांकि, उन्होंने 2026 में दो सीटों पर जीत के बाद भवानीपुर को बरकरार रखा।

PIN Code के बाद DigiPIN की एंट्री, 4×4 मीटर तक की लोकेशन को मिलेगा 10-अक्षरों-अंकों का यूनिक कोड

भोपाल  भारतीय डाक ने देश में जगहों की डिजिटल पहचान के लिए ‘डिजिपिन’ यानी डिजिटल पोस्टल इंडेक्स नंबर शुरू किया है। इसके तहत हर जगह को 10 अक्षरों और अंकों का एक खास कोड मिलेगा। इससे किसी जगह की पहचान मौजूदा 6 अंकों वाले पिन कोड से ज्यादा सटीक तरीके से की जा सकेगी। खास बात यह है कि डिजिपिन मौजूदा पिन कोड की जगह नहीं लेगा। इसे पुराने पते और पिन कोड के साथ इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसे डाक विभाग ने आईआईटी हैदराबाद और इसरो के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के साथ मिलकर तैयार किया है। भारतीय डाक विभाग (इंडिया पोस्ट) ने देशभर में पते (एड्रेस) की खोज और डिलीवरी सेवाओं को अधिक सटीक और आधुनिक बनाने के लिए एक नया डिजिटल पोस्टल इंडेक्स नंबर यानी 'डिजिपिन' (DigiPIN) लॉन्च किया है। यह एक जियो-कोडेड एड्रेसिंग सिस्टम है, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) और आईआईटी हैदराबाद के सहयोग से तैयार किया गया है। यह टैक्नोलॉज देश के किसी भी कोने में मौजूद किसी खास स्थान की सटीक पहचान करने में मदद करेगी। 6-अंकों वाले पिन कोड से कैसे अलग है डिजिपिन? हमारा पारंपरिक 6-अंकों का पिन कोड एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र, जैसे किसी पूरे इलाके, डाकघर या गांवों के समूह को दर्शाता है। इससे किसी खास मकान या जगह तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता। इसके विपरीत, डिजिपिन पूरे भारत को करीब 4 मीटर x 4 मीटर के छोटे-छोटे ग्रिड में बांटता है। हर ग्रिड को 10 अक्षरों और अंकों (अल्फान्यूमेरिक) से मिलकर बना एक यूनिक कोड दिया गया है। यह कोड अक्षांश और देशांतर (लैटीट्यूड और लोंगिट्यूड) के आधार पर तैयार होता है, जिससे किसी भी सटीक स्थान को चंद मीटर के दायरे में पहचाना जा सकता है। क्या बंद हो जाएगा पुराना पिन कोड? डिजिपिन के आने से पुराना पिन कोड बिल्कुल बंद नहीं होगा। डाक विभाग ने स्पष्ट किया है कि डिजिपिन पुराने 6-अंकों वाले पिन कोड या पारंपरिक पते की जगह नहीं लेगा, बल्कि यह उनके साथ एक अतिरिक्त डिजिटल लेयर के रूप में काम करेगा। आम नागरिक अपने पारंपरिक पते और पुराने पिन कोड के साथ डिजिपिन का उपयोग भी कर सकेंगे, ताकि कोरियर या अन्य सेवाएं बिना किसी भटकाव के उनके दरवाजे तक पहुंच सकें। ऑफलाइन सुविधा और आम नागरिक को होने वाले फायदे डिजिपिन का सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों में होगा जहां मकान नंबर, गली या सड़क का नाम सही तरीके से दर्ज नहीं है। गांवों, दूर-दराज के इलाकों और बिना नाम वाली गलियों में भी अब सटीक पता खोजना आसान हो जाएगा। इस सिस्टम की एक खास बात यह भी है कि यह ऑफलाइन काम कर सकता है। एक बार लोकेशन के आधार पर डिजिपिन कोड जनरेट हो जाने के बाद, इसे इस्तेमाल करने के लिए इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती है। इमरजेंसी सेवाओं और डिलीवरी में क्रांतिकारी बदलाव ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए डिजिपिन बेहद मददगार साबित होगा। पार्सल डिलीवरी में लगने वाला समय और पते न मिलने की समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पुलिस, एम्बुलेंस, फायर ब्रिगेड और आपदा राहत टीमों को आपात स्थिति में तुरंत और सटीक जगह पर पहुंचने में आसानी होगी। इसके अलावा, डिजिटल केवाईसी (KYC), सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन और सरकारी संपत्तियों की मैपिंग में भी डिजिपिन की बड़ी भूमिका होगी। पना डिजिपिन (DigiPIN) कैसे खोजें? डाक विभाग ने यूजर्स के लिए 'नो योर डिजिपिन' (Know Your DIGIPIN) नाम से एक वेब एप्लिकेशन लॉन्च किया है। इसे इस्तेमाल करने के लिए किसी भी अकाउंट या लॉगिन की जरूरत नहीं है। नागरिक इंडिया पोस्ट की वेबसाइट पर जाकर अपने मोबाइल या डिवाइस की लोकेशन ऑन करके तुरंत अपनी वर्तमान जगह का डिजिपिन हासिल कर सकते हैं। यह पूरा सिस्टम ओपन-सोर्स है, ताकि अन्य संस्थाएं भी इसे आसानी से अपना सकें।

सेवारत शिक्षकों के लिए TET जरूरी, अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिका ग्वालियर हाईकोर्ट ने ठुकराई

ग्वालियर  सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिका एमपी में ग्वालियर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने खारिज कर दी है। जस्टिस जीएस आहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता का मामला सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले से पूरी तरह कवर होता है। ऐसे में उसे अलग से कोई राहत नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 29 मई 2026 के रिव्यू आदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि टीईटी हासिल करने की समय-सीमा दो साल से बढ़ाकर तीन साल कर दी गई है। अब संबंधित इन-सर्विस शिक्षकों को 31 अगस्त 2028 तक टीईटी की योग्यता हासिल करनी होगी। बता दें, पहले परीक्षा पास करने की यह समय-सीमा 31 अगस्त 2027 थी। पुराने शिक्षकों को राहत की मांग याचिकाकर्ता राजेश मिश्रा ने मांग की थी कि आरटीई एक्ट की धारा 23(2) और उसके प्रावधान उन शिक्षकों पर पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किए जाएं, जिनकी नियुक्ति टीईटी की अनिवार्यता लागू होने से पहले हुई थी। उन्होंने टीईटी पास नहीं करने के आधार पर सेवा से हटाने, अनिवार्य सेवानिवृत्ति या अन्य दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाने की भी मांग की थी। टीईटी औपचारिकता नहीं, आवश्यक योग्यता कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टीईटी केवल पात्रता की औपचारिकता नहीं, बल्कि शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यता है। शिक्षक पद पर नियुक्ति चाहने वाले व्यक्ति को टीईटी पास करना होगा। इसके बाद ही वह नियुक्ति के लिए पात्र माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने पुराने शिक्षकों की परिस्थितियों को देखते हुए कुछ राहत भी दी है। जिन इन-सर्विस शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से कम समय बचा है, वे टीईटी पास किए बिना सेवानिवृत्ति की आयु तक सेवा में रह सकते हैं। हालांकि, ऐसे शिक्षक टीईटी पास किए बिना पदोन्नति के लिए पात्र नहीं होंगे। 5 साल से अधिक सेवा बाकी तो टीईटी जरूरी कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से अधिक समय बचा है, उनके लिए निर्धारित अवधि में टीईटी पास करना अनिवार्य है। निर्धारित समय में योग्यता हासिल नहीं करने पर सेवा में बने रहने का अधिकार प्रभावित भी हो सकता है।

Bank Holiday Alert: आज से बैंक बंद रहने का सिलसिला, 11-13 सितंबर की छुट्टियों की पूरी लिस्ट देखें

नई दिल्ली क्या आप भी इस हफ्ते कैश निकालने, केवाईसी (KYC) अपडेट कराने या चेक जमा करने बैंक जाने वाले हैं तो यह खबर आपके बहुत काम की है. आज  यानी 11 सितंबर 2026 शुक्रवार को देशभर में बैंक यूनियनों ने हड़ताल का ऐलान किया है. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इस हड़ताल के ठीक अगले दिन 12 सितंबर को दूसरा शनिवार है और 13 सितंबर को रविवार है. ऐसे में लगातार तीन दिन बैंक से जुड़ा काम प्रभावित हो सकता है।  11, 12 और 13 सितंबर को बैंक खुले रहेंगे या बंद? बता दें कि  11 सितंबर को RBI की तरफ से देशभर के लिए बैंक हॉलिडे नहीं है. इस दिन बैंक यूनियनों की हड़ताल (Bank strike in september 2026) है. वहीं 12 सितंबर को दूसरा शनिवार होने की वजह से बैंक बंद रहेंगे और 13 सितंबर को रविवार की साप्ताहिक छुट्टी होगी.हालांकि,वीकेंड की वजह से 2 दिन तो देश के सभी बैंक बंद रहेंगे लेकिन तीनों दिन देशभर के बैंको में एक जैसी बैंक छुट्टी नहीं रहेगी।  इसलिए बैंक जाने के लिए घर से निकलने से पहले ये जान लें कि कहीं उस दिन बैंक की छुट्टी तो नहीं है? जानिए सितंबर महीने के आने वाले दिनों में आखिरकब-कब और  क्यों बंद रहेंगे बैंक और इस दौरान आप अपने जरूरी काम कैसे निपटा सकते हैं।  11 सितंबर को क्यों होगी बैंक हड़ताल? यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने  5-डे बैंकिंग सिस्टम अन्य मांगों को लेकर 11 सितंबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है.बैंक कर्मचारियों ने दूसरे और चौथे शनिवार के अलावा बाकी शनिवार को भी छुट्टी देने की मांग है. इसके बदले वो सोमवार से शुक्रवार तक एक्स्ट्रा काम करने के लिए तैयार हैं ताकि ग्राहकों को किसी तरह की दिक्कत न हो।  बता दें कि सितंबर के महीने में सिर्फ 11 तारीख को ही हड़ताल नहीं है. यूनियनों ने अपनी मांगों को लेकर 28, 29 और 30 सितंबर को भी तीन दिवसीय हड़ताल का प्लान बनाया है. इतना ही नहीं, अगर मांगें नहीं मानी गईं तो 26 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी भी दी गई है।  दिल्ली में 11 सितंबर को बैंक खुलेंगे या नहीं? दिल्ली में रहने वाले लोगों के मन में ये सवाल है कि 11 सितंबर को बैंक की छुट्टी तो नहीं है. बता दें कि 11 सितंबर को आरबीआई की हॉलिडे लिस्ट के हिसाब से तो दिल्ली में बैंक की छुट्टी नहीं है. लेकिन इसी दिन बैंक यूनियनों की हड़ताल भी है. इसलिए खासकर सरकारी बैंकों की शाखाओं में कामकाज प्रभावित हो सकता है. दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को ब्रिक्स सम्मेलन भी है. इसके चलते कोर्ट और स्कूलों को बंद रखने का निर्देश दिया गया है. लेकिन बैंकों में सामान्य दिनों के तरह काम जारी रह सकता है।  12 और 13 सितंबर को कहां-कहां बैंकों की छुट्टी? अगर  11 सितंबर को बैंक का जरूरी काम है, तो आज ही उसे निपटा लेना बेहतर रहेगा. क्योंकि 12 सितंबर को दूसरा शनिवार है. इस दिन देशभर के बैंक बंद रहते हैं. इसके बाद 13 सितंबर को रविवार है. हालांकि 12 सितंबर को दूसरा शनिवार भी है. वैसे बैंक की छुट्टियां शहर के हिसाब से अलग हो सकती हैं. किसी दूसरे शहर में बैंक खुला हो सकता है, जबकि आपके शहर में उस दिन बैंक की छुट्टी हो सकती है।  जैसे- जयपुर में 11 सितंबर को नगर निगम चुनाव की वजह से भी बैंक  में छुट्टी रहेगी.वहीं गुवाहाटी में 12 सितंबर को श्रीमंत शंकरदेव की तिरुभाव तिथि के कारण भी बैंक बंद है. ऐसे में ब्रांच जाकर होने वाले काम के लिए आपको 14 सितंबर तक इंतजार करना पड़ सकता है।  सितंबर में कब-कब बैंक रहेंगे बंद?     14 सितंबर को गणेश चतुर्थी और इससे जुड़े त्योहारों के कारण बेलापुर, बेंगलुरु, भुवनेश्वर, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई, नागपुर, पणजी और विजयवाड़ा समेत कई केंद्रों में बैंक बंद रहेंगे.     15 सितंबर को अहमदाबाद, भुवनेश्वर और पणजी में क्षेत्रीय त्योहारों के कारण बैंक की छुट्टी है.      21 सितंबर को गुवाहाटी और कोच्चि में बैंक बंद रहेंगे.      22 सितंबर को रांची और 23 सितंबर को जम्मू और श्रीनगर में बैंक बंद रहेगा.      25 सितंबर को गंगटोक में इंद्रजात्रा के कारण बैंक बंद रहेंगे.     26 सितंबर को चौथा शनिवार है. इस दिन भी देशभर में बैंक शाखाएं बंद रहेंगी. बैंक की छुट्टी और हड़ताल में डिजिटल बैंकिंग का करें इस्तेमाल हालांकि, डिजिटल बैंकिंग सर्विस बैंक की छुट्टी या हड़ताल के दौरान भी पर चलती रहेंगी. यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग और इंटरनेट बैंकिंग के जरिए पेमेंट और पैसे ट्रांसफर कर सकते हैं. एटीएम से भी कैश निकाल पाएंगे.एसबीआई ने ग्राहकों को इंटरनेट बैंकिंग, योनो, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और एटीएम जैसी सेवाओं का इस्तेमाल करने की सलाह दी है.लेकिन अगर आपको कैश जमा करना या निकालना है, केवाईसी अपडेट,चेक जमा करने  या लोन से जुड़ा कोई जरूरी काम है, तो उसे हड़ताल और छुट्टियों के बाद ही करा पाएंगे।  बैंक जाने से पहले आरबीआई हॉलिडे लिस्ट के मुताबिक अपने शहर की छुट्टी की लिस्ट जरूर चेक कर लें. इससे बेवजह भागदौड़ भी नहीं होदा और आपका समय खराब भी नहीं होगा। 

AI और रोबोट से बदलेगी कैंसर जांच की तस्वीर, इंदौर में 12 सेकंड में रिपोर्ट और मुफ्त स्क्रीनिंग

इंदौर  देश भर में तेजी से ओरल कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं. ऐसे में समय रहते बीमारियों की जांच में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस काफी मददगार साबित हो रहा है. रोबोट डिवाइस मुंह से जुड़ी बीमारियों और खासतौर पर कैंसर का पता आसानी से और समय रहते लगा रहा है, जिससे मरीज को बीमारी के गंभीर होने से पहले इलाज मिल सकेगा।  हर साल कैंसर की चपेट में आ रहे हजारों लोग भारत में धूम्रपान की लत के अलावा, तंबाकू का सेवन और तरह-तरह के जानलेवा शौक से कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे हैं. हर साल हजारों मरीज डायग्नोज हो रहे हैं, इनमें से अधिकांश थर्ड और फोर्थ स्टेज कंडीशन में होते हैं. इसलिए इनमें से हर साल 50 हजार लोगों की इलाज के बावजूद बीमारी फैलने के कारण मौत हो जाती है. हॉस्पिटल और ऑन्कोलॉजिस्ट वाले कैंसर सहित कई अन्य गंभीर बीमारियों को प्री स्टेज में पता करने के लिए स्कैन ओ एयर नामक रोबोटिक मशीन का उपयोग कर रहे हैं. यह मशीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए बीमारी का 96% तक पता लगाने में सक्षम है।  फ्री में होगी जांच इंदौर स्थित एक निजी अस्पताल में पहली बार यह मशीन स्थपित किया गया है. जहां मुंह की किसी भी समस्या का निशुल्क जांच किया जा रहा है. जांच के बाद फौरन रिपोर्ट मरीज के मोबाइल नंबर में आ जाता है. अस्पताल के ऑन्कोलॉजिस्ट अमय बियानी ने कहा, "अधिकांश मरीजों को यह पता नहीं होता कि उनके मुंह की छोटी सी तकलीफ कभी भी कैंसर का रूप ले सकती है. अस्पताल में किसी भी तरह की तकलीफ में आने वाले लोग अपने मुंह की प्री मेलेनिन स्टेज में ही जांच कर सकें. इसलिए यह रोबोटिक मशीन स्थापित की गई है।  ओरल कैंसर के लिए क्रांतिकारी साबित इस रोबोटिक मशीन की खोज साल 2020 में पुणे की डेंटिस्ट विधि भानुशाली और रजत कबाड़े ने किया था, इसका उद्देश्य दांतों और मसूड़े की 40 तरह की बीमारियों की पहचान के लिए किया गया था. इस रोबोटिक मशीन से तरह-तरह की मुंह की जांच के अलावा, कैंसर की प्री स्टेज से संबंधित बीमारी और स्थितियां भी डायग्नोज होने लगी हैं, जिससे यह मशीन ओरल कैंसर के डायग्नोज के लिए क्रांतिकारी साबित हो रही है।    मेडिकल प्रोफेशनल के लिए सहायक कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रतिभा पवार ने कहा, "रोबोटिक मशीन की जांच रिपोर्ट से काफी हद तक मरीज की बीमारी का पता चल जाता है. जिससे यह डॉक्टर और मेडिकल प्रोफेशनल के लिए भी सहायक सिद्ध होगी. मशीन की जांच रिपोर्ट के बाद सिर्फ उन मरीजों को सीटी स्कैन अथवा बायोप्सी करनी जरूरी होगी. जिनका डायग्नोज मशीन द्वारा ओरल कैंसर के रूप में किया गया है इससे लोगों को अनावश्यक जांच के खतरे और आर्थिक समस्या से बचाव हो सकेगा। 

2027 चुनाव के लिए BJP का बड़ा प्लान, 125 मौजूदा विधायकों पर संकट; 2024 के नतीजों से लिया सबक

लखनऊ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब छह महीने से भी कम वक्त बचा है. इस चुनाव में 10 साल से सत्तारूढ़ योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली भाजपा सरकार के सामने हैट्रिक लगाने की चुनौती है. भाजपा ने स्थानीय विधायकों के कामकाज और लोकप्रियता का सर्वे कराते हुए जनता का मूड भांपने की कोशिश की है. 2024 के लोकसभा चुनाव से लगे झटके से सबक लेकर भाजपा ने 403 विधानसभा सीटों पर एक गोपनीय और बहुस्तरीय आंतरिक सर्वे कराया है. इस सर्वे रिपोर्ट ने सत्ता के गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।  भाजपा का आंतरिक सर्वे सूत्रों की मानें तो इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में करीब 125 से 128 मौजूदा विधायकों के खिलाफ उनके ही क्षेत्रों में जबर्दस्त एंटी इनकंबेंसी है. सीधे तौर पर कहें तो करीब भाजपा में 128 सीटों पर मौजूदा विधायकों के टिकट काटा या बदला जा  सकता है. पश्चिम यूपी से लेकर पूरब तक मंत्रियों से लेकर दिग्गज विधायकों तक के नाम इस रेड लिस्ट में शामिल हैं. भाजपा यूपी को अपने संगठन के लिहाज से 6 क्षेत्रों में बांटती है. ऐसे में कहां किस क्षेत्र से कितने टिकट कट सकते हैं, ये आंकड़ा चौंकाने वाला है. यूपी विधानसभा चुनाव 2027 को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइनल माना जा रहा है।      पश्चिम क्षेत्र की 71 सीटों में 23-25 टिकट कटने के आसार     ब्रज क्षेत्र कुल 65 सीटों में 24-26 टिकट कटने की संभावना     अवध क्षेत्र में कुल 82 सीट में 26-28 टिकट कटने का संकेत     कानपुर क्षेत्र की कुल 52 सीट में 22-24 कटने के कयास     काशी क्षेत्र में कुल 72 सीट में 19-21 का पत्ता कट सकता है     गोरखपुर क्षेत्र की 62 सीटों में 18-22 टिकट कटने की संभावना यूपी में भाजपा की हैट्रिक की चुनौती भाजपा यूपी में हैट्रिक लगाने को पूरी ताकत झोंक रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले एक-डेढ़ महीने में ही राज्य के ज्यादातर जिलों का दौरा कर विकास परियोजनाओं की झड़ी लगा दी है.2022 की जीत की बात करें तो 1985 के बाद यूपी में यह पहला मौका था जब किसी मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी ने लगातार दूसरी बार पूरे बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की थी. वहीं सपा-कांग्रेस गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित है. अखिलेश यादव जहां पीडीए के सामाजिक समीकरणों पर ध्यान केंद्रित किए हैं, वहीं कांग्रेस दलित-मुस्लिम वोटों को एकजुट करके अपना जनाधार बढ़ाने में जुटी है।  2022 विधानसभा चुनाव में किसको कितनी सीटें भारतीय जनता पार्टी (BJP)- 255 अपना दल (सोनेलाल)-1 2 निषाद पार्टी (NISHAD)- 06 एनडीए (NDA)-  273 कुल सीटें 403: बहुमत 202 गठबंधन में सीटों का बंटवारा भी चुनौती उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी लहर को कायम रखते हुए भाजपा को अकेले 41.29% वोट मिले थे. भाजपा का पिछले चुनाव में अपना दल सोनेलाल, निषाद पार्टी जैसे दलों के साथ गठबंधन रहा है. अब एनडीए के खेमे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय लोकदल शामिल है. एनडीए का सपा-कांग्रेस गठबंधन से मुख्य मुकाबला होना तय है. मायावती की बहुजन समाज पार्टी, आजाद समाज पार्टी, एआईएमआईएम जैसे दल भी ताल ठोकने को तैयार हैं। 

बच्चों के अपहरण की जांच में एकरूपता की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र-राज्यों से जवाब तलब किया

नई दिल्ली बच्चों के गुम होने, अपहरण और उन्हें जबरन ले जाने के मामलों की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिका में पूरे देश में ऐसी घटनाओं की जांच के लिए एक जैसी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। इसके साथ ही जांच को तय समयसीमा में पूरा करने, विशेष जांच प्रक्रिया अपनाने और मामलों की जल्द सुनवाई के लिए समर्पित अदालतें बनाने की मांग की गई है। याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले में केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा है। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ शिक्षा मंत्रालय, कानून एवं न्याय मंत्रालय, गृह मंत्रालय और विधि आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता की मुख्य मांग क्या? यह जनहित याचिका अधिवक्ता और याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दाखिल की है। इसे अधिवक्ता-ऑन-रिकॉर्ड अश्वनी कुमार दुबे के जरिए सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। याचिका में मांग की गई है कि बच्चों के अपहरण और उन्हें जबरन ले जाने के मामलों की जांच के लिए पूरे देश में एक समान व्यवस्था हो। इसमें खास तौर पर समयबद्ध जांच और विशेष जांच प्रक्रिया की मांग रखी गई है।  ​समर्पित अदालतें बनाने की पैरवी याचिका में केवल जांच तक ही बात सीमित नहीं रखी गई है, बल्कि त्वरित न्याय के लिए समर्पित विशेष अदालतें गठित करने का भी अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब तक बच्चों के खिलाफ होने वाले इन अपराधों के लिए अलग से विशेष अदालतें नहीं होंगी, तब तक पीड़ितों को त्वरित न्याय मिलना कठिन होगा और दोषियों में कानून का डर कायम नहीं हो सकेगा। ​मौजूदा व्यवस्था की खामियों पर उठाये सवाल सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में यह रेखांकित किया गया है कि वर्तमान समय में राज्यों के बीच जांच एजेंसियों के समन्वय और सूचना साझा करने में काफी ढिलाई देखने को मिलती है। कई मामलों में पुलिस की धीमी और असंवेदनशील कार्रवाई के कारण अपहृत बच्चों को सही समय पर सुरक्षित वापस नहीं लाया जा पाता। याचिका में कहा गया है कि अंतरराज्यीय नेटवर्क के जरिए बच्चों का अपहरण कर उन्हें बाल मजदूरी या मानव तस्करी में धकेल दिया जाता है, जिसके लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय तंत्र की सख्त जरूरत है। ​सुप्रीम कोर्ट का रुख और आगे की कार्रवाई सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका में उठाए गए बिंदुओं को गंभीर मानते हुए सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है। राज्यों और केंद्र सरकार की ओर से दाखिल होने वाले जवाबों के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर आगे की सुनवाई करेगा और बच्चों की सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश तय कर सकता है। याचिका में ये प्रमुख मांगें रखी गई हैं:-     बच्चों के अपहरण और जबरन ले जाने के मामलों की जांच के लिए देशभर में एक समान व्यवस्था हो।     जांच को तय समयसीमा में पूरा करने के लिए समयबद्ध प्रक्रिया लागू की जाए।     ऐसे मामलों की जांच के लिए विशेष और समर्पित जांच प्रक्रिया तैयार की जाए।     मामलों की सुनवाई तेजी से पूरी करने के लिए समर्पित अदालतों की व्यवस्था हो। याचिका में मौजूदा व्यवस्था को लेकर क्या कहा गया? याचिका में लापता, अपहृत और जबरन ले जाए गए बच्चों से जुड़े मामलों को संभालने में व्यवस्था की खामियों का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है, जिससे ऐसे मामलों में जांच एजेंसियां तेजी से और आपसी तालमेल के साथ कार्रवाई कर सकें। याचिका का जोर इस बात पर है कि बच्चों से जुड़े इन मामलों में जांच और कार्रवाई के लिए एक समान और समन्वित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। याचिका में कहा गया है कि बच्चों के गुम होने, अपहरण या उन्हें जबरन ले जाने के मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई तेज और आपस में समन्वित होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से दखल देने की मांग की है। फिलहाल अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर उनका जवाब मांगा है। केंद्र, राज्यों और अन्य संबंधित पक्षों के जवाब के बाद मामले में आगे की कार्रवाई होगी। 

Instagram-Facebook पर नाबालिगों की एंट्री होगी बंद? बच्चों की सोशल मीडिया पहुंच पर SC ने केंद्र से पूछा सवाल

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को उस याचिका पर नोटिस जारी किया है, जिसमें मांग की गई है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. याचिका में सोशल मीडिया के इस्तेमाल करने के लिए सुरक्षा उपायों की भी मांग की गई है, जिसमें माता-पिता या लीगल गार्जियन की सहमति जरूरी होनी चाहिए.  याचिकामें कहा गया है कि मेटा और दूसरी सोशल मीडिया कंपनियों ने बच्चों के अकाउंट बनाने की आयुसीमा 13 साल तय की है, जो अमेरिकी कानून के मुताबिक है।  याचिका में क्या कहा गया है? NGO जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की फाइल की गई याचिका में कहा गया है कि फेसबुक और स्नैपचैट (इंडिया) जैसे प्लेटफॉर्म यूजर्स को 13 साल की उम्र से अकाउंट बनाने की इजाजत देते हैं, जबकि भारतीय कानून 18 साल से कम उम्र के लोगों को नाबालिग मानता है.  याचिका में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में बदलाव करने या खास गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है. जिससे ये सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी डिजिटल प्लेटफॉर्म माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति के बिना 18 साल से कम उम्र के बच्चे के साथ सोशल मीडिया कॉन्ट्रैक्ट न कर सके, या ये कॉन्टेक्ट माता-पिता या अभिभावक के वेरिफिकेशन/e-KYC के अधीन होनी चाहिए।  बच्चों को सीधे एक्सेस देने पर सवाल याचिका में ये भी मांग की गई है कि ऐसी गाइडलाइंस बनाई जाएं जो ये जरूरी करें कि जहां भी किसी नाबालिग को डिजिटल प्लेटफॉर्म एक्सेस करने या इस्तेमाल करने की इजाजत हो, तो ऐसा एक्सेस कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त तरीके से हो, जिसमें माता-पिता या कानूनी अभिभावक शामिल हों. इसमें भी माता-पिता या अभिभावक का वेरिफिकेशन/e-KYC शामिल हो, जो सर्विस के नेचर और रिस्क के हिसाब से हो।  याचिका में कहा गया है कि बच्चों का डिजिटल प्लेटफॉर्म तक खुद से एक्सेस उन्हें ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, ट्रैफिकिंग, बिहेवियरल प्रोफाइलिंग, पर्सनल डेटा का गलत इस्तेमाल, साइबरबुलिंग और उम्र के हिसाब से गलत कंटेंट जैसे रिस्क के खतरे में डालता है।