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केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर! 8वां वेतन आयोग इस स्कीम में कर सकता है बदलाव, जानें असर

नई दिल्ली  केंद्रीय कर्मचारियों के लिए गठित आठवां वेतन आयोग मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन' (MACP) स्कीम की समीक्षा कर रहा है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो इस योजना में बदलाव की मांग की गई है। अब वेतन आयोग इस मांग पर गंभीरता से विचार कर रहा है। क्या है मामला? मिनिस्टीरियल स्टाफ एसोसिएशन (MSA), सर्वे ऑफ इंडिया ने अपने ज्ञापन में मांग की है कि MACP के तहत फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (वित्तीय लाभ) केवल अगले पे मैट्रिक्स लेवल पर नहीं, बल्कि कर्मचारी के अगले प्रमोशनल पद के पे लेवल के हिसाब से दिया जाना चाहिए। MSA ने यह भी कहा कि अपग्रेडेशन की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच की जानी चाहिए, जो नौकरी के 8, 15, 22, 28 और 32 साल पूरे होने पर मिलें। MSA के अनुसार, मौजूदा नियमों के तहत MACP में असल 'प्रमोशनल हायरार्की' के अगले वेतनमान के बजाय 'पे मैट्रिक्स' में अगला लेवल दिया जाता है। इसके अलावा, फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन्स (FNPO) ने 6, 12, 18, 24 और 30 वर्षों में पांच बार प्रमोशन का प्रस्ताव रखा। FNPO ने एक और अहम बदलाव की मांग की है। संगठन के मुताबिक अगर कोई कर्मचारी किसी प्रमोशन को स्वीकार नहीं करता है, तो उसके MACP लाभ को रोका या टाला नहीं जाना चाहिए। यानी MACP का लाभ प्रमोशन से अलग रखा जाना चाहिए। उदाहरण से समझें मिनिस्टीरियल स्टाफ एसोसिएशन ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई कर्मचारी लेवल-7 पर है और उसका अगला प्रमोशनल पद लेवल-10 का है, तो मौजूदा व्यवस्था में उसे MACP के तहत केवल लेवल-8 मिल सकता है। इससे वास्तविक प्रमोशन और वित्तीय लाभ के बीच बड़ा अंतर पैदा हो जाता है। एसोसिएशन ने कहा कि इससे कर्मचारियों का मनोबल गिरा है। ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहाँ ज्यादा जिम्मेदारियों (जैसे ऑफिस सुपरिटेंडेंट) पर प्रमोट किए गए जूनियर स्टाफ लेवल 6 में ही बने रहते हैं जबकि उनके जूनियर, जिन्हें प्रमोशन नहीं मिला, उन्हें MACP के तहत लेवल 7 मिल जाता है। इसके अलावा, राष्ट्रीय परिषद-जेसीएम स्टाफ साइड ने मांग की है कि प्रमोशन क्रम में MACP प्रोवाइड किया जाए, जिसका समर्थन कई अन्य यूनियनों ने भी किया है। रेलवे वरिष्ठ नागरिक कल्याण समिति ने 10 साल के अंतराल के मानवीय नुकसान को उजागर करते हुए कहा कि फाइनेंशियल अपग्रेडेशन के बीच 10 साल का लंबा अंतराल लंबे समय तक गतिरोध का कारण बनता है, खासकर उन कैडरों में जहां प्रमोशन के पद सीमित हैं। बता दें कि पिछले साल आठवें वेतन आयोग का गठन हुआ था। वेतन आयोग को 18 महीने में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपने की डेडलाइन मिली हुई है।

राजस्थान में किडनी मरीजों को बड़ी राहत, मुफ्त डायलिसिस योजना के तहत पूरे हुए 1.17 लाख से अधिक सेशन

जयपुर  मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा एवं चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेन्द्र सिंह खींवसर के निर्देशन में प्रदेश में किडनी रोगियों को आसानी से और निःशुल्क डायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। प्रदेश में अब तक 16,003 मरीजों को कुल 1,17,258 डायलिसिस सेशन की निःशुल्क सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इन सेवाओं के तहत मरीजों को उपलब्ध कराई गई उपचार सुविधा का कुल अनुमानित मूल्य करीब 21.11 करोड़ रुपए है। प्रधानमंत्री नेशनल डायलिसिस कार्यक्रम के तहत प्रदेश के 35 जिला चिकित्सालयों में 149 डायलिसिस मशीनें संचालित हैं। प्रमुख शासन सचिव चिकित्सा एवं स्वास्थ्य गायत्री राठौड़ ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2026-27 में अप्रैल से अगस्त 2026 तक प्रदेश में 4,265 मरीजों को 31,675 डायलिसिस सेशन की निःशुल्क सुविधा दी जा चुकी है। इनमें प्रधानमंत्री नेशनल डायलिसिस कार्यक्रम के तहत 35 केंद्रों पर 3,489 मरीजों के 25,860 सेशन तथा बजट घोषणा के तहत चिन्हित चिकित्सा संस्थानों में 776 मरीजों के 5,815 सेशन शामिल हैं। उन्होंने बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में 11,738 मरीजों को 85,583 डायलिसिस सेशन की निःशुल्क सुविधा उपलब्ध कराई गई। इनमें प्रधानमंत्री नेशनल डायलिसिस कार्यक्रम के 35 केंद्रों पर 8,507 मरीजों के 65,148 सेशन तथा बजट घोषणा के तहत चिन्हित चिकित्सा संस्थानों में 3,198 मरीजों के 19,187 सेशन शामिल हैं। राठौड़ ने कहा कि राज्य बजट घोषणा वर्ष 2022-23 की अनुपालना में प्रदेश के 182 चिकित्सा संस्थानों में हीमोडायलिसिस सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में काम किया जा रहा है। इनमें से 102 चिकित्सा संस्थानों में सुविधा उपलब्ध है। शेष संस्थानों में चिकित्सकों एवं कार्मिकों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है तथा 30 सितम्बर 2026 तक सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। प्रमुख शासन सचिव ने बताया कि सरकारी व्यवस्था के साथ सीएसआर के माध्यम से भी निःशुल्क डायलिसिस सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। जिला चिकित्सालय नदबई (भरतपुर) एवं उपजिला चिकित्सालय सिवाना (बालोतरा) में हंस फाउंडेशन, गुरुग्राम के सहयोग से यह सुविधा संचालित है। सिवाना में 3 मशीनों के माध्यम से 12 मरीजों के 575 सेशन तथा नदबई में 3 मशीनों के माध्यम से 21 मरीजों के 673 सेशन आयोजित किए गए हैं। राठौड़ ने कहा कि सरकार का प्रयास है कि डायलिसिस की जरूरत वाले मरीजों को उपचार के लिए दूर नहीं जाना पड़े। इसी उद्देश्य से जिला चिकित्सालयों के साथ अन्य चिकित्सा संस्थानों में भी डायलिसिस सेवाओं का विस्तार किया जा रहा है। भविष्य में सीएचसी स्तर तक डायलिसिस सेवाओं की पहुंच बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि डायलिसिस किडनी रोगियों के लिए नियमित और जीवनरक्षक उपचार है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग का प्रयास है कि जरूरतमंद मरीजों को समय पर, उनके नजदीक ही पूरी तरह निःशुल्क डायलिसिस सुविधा मिले। सरकारी व्यवस्था के साथ निजी जनसहभागिता और सीएसआर के सहयोग से इन सेवाओं को लगातार और मजबूत किया जा रहा है।

लाल सागर में हूतियों की बढ़त से बढ़ा Bab-el-Mandeb पर खतरा, भारत के Oil Trade पर पड़ेगा बड़ा असर

 नई दिल्‍ली दुनिया भर में एनर्जी का संकट बढ़ता ही जा रहा है, क्‍योंकि होर्मुज पहले से ही प्रभावित है और अब सऊदी अरब ने इराकी क्षेत्र से किए गए कई ड्रोन हमलों के बाद अपनी कच्चे तेल की पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है. इसके साथ यमन के लाल सागर तट पर 18 घंटे तक चले भीषण हमले में हूती विद्रोही बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर कंट्रोल करने के कगार पर पहुंच चुके हैं।  ये तीनों रास्‍ते दुनिया की तेल सप्‍लाई के लिए काफी महत्‍वपूर्ण माने जाते हैं. स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का 20 फीसदी तेल आयात करता था, जबकि सऊदी अरब के पाइपलाइन से हर दिन 40 से 50 लाख बैरल तेल सप्‍लाई होती थी. वहीं बाब अल-मंडेब से भी दुनिया के कुल समुद्री तेल और गैस व्यापार का लगभग 5% से 12% हिस्सा यानी 4 से 5 मिलियन बैरल हर दिन तेल सप्‍लाई होता है।  इसका मतलब है कि इन तीनों रास्‍ते से करीब 30 फीसदी सप्‍लाई प्रभावित होगी, क्‍योंकि होर्मुज और बाब अल मंडेब के बाद ईरान तेल सप्‍लाई को अपने तरीके से चला सकता है और वह मिडिल ईस्‍ट से आने वाले तेल-गैस को रोक सकता है।  भारत के ऑयल ट्रेड पर बढ़ेगा खतरा भारत से  3,000 किलोमीटर दूर मौजूद बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पर अगर हूतियों का पूरी तरह कंट्रोल हो जाता है, तो इसका सीधा असर भारत के तेल आयात, यूरोप को होने वाले एक्सपोर्ट और सामान की ढुलाई पर पड़ सकता है।  बाब-अल-मंदेब लाल सागर और गल्फ ऑफ एडन को जोड़ने वाला करीब 29 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता है. यह रास्ता सुएज नहर के जरिए यूरोप को हिंद महासागर और एशिया से जोड़ता है. भारत के लिए यह रास्ता इसलिए अहम है क्योंकि कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के साथ-साथ दवाइयां, मशीनरी, टेक्सटाइल और दूसरे सामान भी इसी रूट से यूरोप पहुंचते हैं।  कैसे बढ़ा हूतियों का कंट्रोल? हूती संगठन अंसार अल्लाह ने 2014 में यमन की राजधानी सना पर कब्जा करने के बाद देश के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में अपना कंट्रोल मजबूत किया. लाल सागर का बड़ा हिस्सा भी उनके प्रभाव में आया. 2015 में सऊदी अरब की अगुवाई में हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई हुई, लेकिन उन्हें पूरी तरह पीछे नहीं हटाया जा सका।  अब हूतियों के पास बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन और दूसरे आधुनिक हथियार हैं. ताजा घटनाक्रम में स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने करीब 18 घंटे में यमन के लाल सागर तट पर तेजी से बढ़त बनाई।  रॉयटर्स के मुताबिक हूतियों ने रणनीतिक बंदरगाह शहर मोचा पर कब्जा किया और हनिश द्वीपों की ओर बढ़े. एपी ने मायून यानी पेरिम द्वीप पर हूतियों के कब्जे की खबर दी. फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक हूती जूकर और हनिश द्वीपों तक भी पहुंचे हैं. हूती नेता मोहम्मद अल-बुखैती ने कहा कि उन्होंने बाब-अल-मंदेब पर कंट्रोल कर लिया है. हालांकि ईरान ने हूतियों को ताजा मदद देने और ईरानी अधिकारियों को यमन भेजने की खबरों का खंडन किया है।  रास्ता बंद हुआ तो भारत पर क्या असर? अगर बाब-अल-मंदेब से जहाजों का आना-जाना मुश्किल होता है तो शिपिंग और इंश्योरेंस का खर्च तेजी से बढ़ सकता है. 2023 के आखिर में हूती हमलों के बाद करीब 2,000 जहाजों ने सुएज नहर से बचते हुए अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप का रास्ता अपनाया था. इससे भारत आने वाले सामान की सप्लाई में देरी हुई।  भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता तेल की कीमतों को लेकर है. बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की मात्रा 2023 में करीब 9.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन थी, जो 2025 की पहली छमाही में घटकर करीब 4.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गई. हूतियों की ताजा बढ़त की खबर के बाद ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया और बाद में करीब 99 डॉलर के आसपास रहा. भारत रूस जैसे दूसरे स्रोतों से तेल खरीद सकता है, लेकिन वैश्विक बाजार में तेल महंगा होने का असर भारत पर भी पड़ेगा।  एक्सपोर्ट पर भी पड़ेगा असर भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता यूरोप को होने वाला एक्सपोर्ट है. अगर जहाजों को अफ्रीका के चारों तरफ जाना पड़ा तो मुंबई से रॉटरडैम की दूरी करीब 15,700 किलोमीटर से बढ़कर लगभग 23,000 किलोमीटर हो सकती है. इससे ईंधन, बीमा और माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और भारतीय सामान यूरोप में महंगा हो सकता है।  ऐसे में 3,000 किलोमीटर दूर यमन में बाब-अल-मंदेब पर बढ़ता हूती कंट्रोल भारत के लिए सिर्फ पश्चिम एशिया का संकट नहीं है. इसका असर तेल की कीमत, शिपिंग खर्च और यूरोप के साथ भारत के कारोबार पर पड़ सकता है. होर्मुज स्ट्रेट पर पहले से दबाव के बीच बाब-अल-मंदेब का संकट भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और एक्सपोर्ट, दोनों मोर्चों पर बड़ी चुनौती बन सकता है।  ये तीनों रास्‍ते पूरी तरह बंद हुए तो कितना बड़ा संकट?  अब अगर इन तीनों रास्‍तों को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है तो दुनिया की लगभग 30 फीसदी सप्‍लाई पूरी तरह ठप हो जाएगी. इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यूरोप, भारत और चीन जैसे देशों को जाने वाली एनर्जी सप्‍लाई ज्‍यादा प्रभावित हो जाएंगी और अगर ये लंबे समय तक बंद रहता है तो दुनिया भर को एक भारी संकट का सामना करना पड़ सकता है।  जैसे पेट्रोल-डीजल और एलपीजी के दाम तेजी से बढ़ेंगे. सप्‍लाई चेन प्रभावित होने से अंतरराष्‍ट्रीय बाजारों से आने वाली चीजें काफी महंगी हो जाएंगी, भारत से इन देशों को निर्यात भी प्रभावित होगा. कच्‍चा माल महंगा होने से प्रोडक्‍ट्स की कीमतें बढ़ जाएंगी, जिससे बाजार में खरीदारी कम होगी और महंगाई के कारण इकोनॉमी प्रभावित होगी।  शेयर बाजार भी इससे अछूता नहीं रहेगा. जियो-पॉलिटिकल तनाव बढ़ने से महंगाई बढ़ेगी. कंपनियों की कमाई भी तेजी से घट सकती है, जिससे इनके शेयरों पर असर होगा. ऐसे में भारत से लेकर ग्‍लोबल लेवल पर बाजारों में मंदी की स्थिति आ सकती है. आइए समझते हैं कौन सा रास्‍ता कितना अहमियत रखता है…  सऊदी पाइपलाइन का रास्‍ता सबसे पहले सऊदी अरब का तेल, उसके पूर्वी क्षेत्र से होते हुए Arabian Peninsula के अंदर से पश्चिम की ओर Yanbu Port की ओर जाता है, फिर यहां से लाल सागर में जाकर मिलता है और वहां … Read more

गधों की वजह से बदली रेगिस्तान की तस्वीर, 44 साल में बंजर जमीन पर फिर लौटी हरियाली

यरुशलम गधों को लेकर जितनी तरह का कहावतें प्रचलित हैं उनसे लगता है कि यह दुनिया के बहुत ही सुस्त और अनुपयोगी जीव है। हालांकि गधे हमेशा से ही इंसानों के लिए उपयोगी रहे हैं। बोझा ढोने के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी गधों के अंदर अद्वितीय क्षमता होती है। सबसे बड़ी बात यह ऐसा जीव है जिसमें खूब सहनशक्ति और धैर्य होता है। रेमन क्रेटर के रेगिस्तान में तो 28 जंगली गधों ने ऐसा कमाल किया कि रेत में भी हलियाली लौट आई। आज यहां 500 से 600 गधे कुलाचे भर रहे हैं। जरूरत के हिसाब से गधों का शरीर भी परिवर्तित हो गया। आज ये गधे देखने मे छोटे-छोटे घोड़ों की तरह नजर आते हैं। ईरान से मंगवाए गए गधे लगभग 44 साल पहले इजरायल ने नेगेव रेगिस्तान में ईरानी और अफ्रीकी नस्ल के जंगली गधों को छोड़ा था। दरअसल 20 शताब्दी में शिकार की वजह से यहां गधों की संख्या लगभग खत्म हो गई थी। ईरान और इजरायल में अब भले ही दुश्मनी हो लेकिन उस समय इजरायल ने पर्यावरण बचाने के लिए तत्कालीन शाह मोहम्मद रजा पहलवी से बात की। 1968 में ईरान से 28 गधे भेजे गए। इन्हें पहले योतवाता वाइल्डलाइफ रिजर्व में लाया गया और कुछ दिन यहां रखा गया। 1982 में 28 गधे सूखे रेगिस्तान में छोड़ दिए गए। आज इस इलाके के नक्शा बदल चुका है। यहां कई तरह की वनस्पतियां विकसित होने लगी हैं। वहीं गधे भी इस माहौल में अच्छी तरह सर्वाइव कर गए। इजरायली अधइकारियों का कहना था कि इस इलाके में गधों को छोड़ने से एक तो इस प्रजाति की सुरक्षा होगी दूसरा रेगिस्तान में फिर से जीवन लौट आएगा। जिन दो नस्लों को यहां छोड़ा गया था, दोनों ही खत्म होने की कगार पर थीं। ईरान में इस्लामिक क्रांति के दौरान इजरायल के साथ संबंध अच्छे थे। इसीदौरान शाह ने इजरायल को गधे गिफ्ट किए थे। इन्हें हवाई जहाज से इजरायल लाया गया था। इसके बाद कुछ गधे इथियोपिया से मंगवाए गए। जब इन्हें रामोन क्रेटर में छोड़ा गया तो यहीं उनका पसंदीदा अड्डा बन गया। गधों ने यहां भयंकर गर्मी और शुष्क जलवायु का सामना किया। इन गधों के आकार में परिवर्तन हो गया और ये छोटे-छोटे घोड़े जैसे दिखने लगे। गधे अब सुस्त जीव नहीं बल्कि 70 किमी प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ने वाले घोड़ बन गए थे। अब ये यहां 45 डिग्री के तापमान में भी सर्वाइव कर लेते हैं और बिना पानी के भी कई दिनों तक रह सकते हैं। इसके अलावा इन गधों को अब गड्ढा खोदने की कला भी आ गई है। गड्ढे में पानी भर जाता है तो दूसरे जीव भी पानी पीते हैं। इसके अलावा गड्ढे के आसपास हरियाली भी हो जाती है।  

Delhi Teachers Transfer Policy: शिक्षकों के तबादले को लेकर नई नीति लाएगी सरकार, जल्द हो सकती है घोषणा

नई दिल्ली दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार 17 सितंबर से शुरू होने वाले 'सेवा पखवाड़े' के दौरान सरकारी स्कूलों के टीचर्स के नई ट्रांसफर पॉलिसी की घोषणा कर सकती है। सरकार इसके लिए एक अलग पोर्टल भी बना सकती है, जिसमें पॉइंट्स-बेस्ड सिस्टम को शामिल किया जा सकता है। अधिकारियों ने शुक्रवार को इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सरकार की योजना इस प्रस्तावित पॉलिसी के जरिये सरकारी स्कूलों में टीचर्स के ट्रांसफर की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और टेक्नोलॉजी पर आधारित बनाना है। एचटी की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में टीचर्स के लिए पहले से ही ट्रांसफर पॉलिसी मौजूद है, लेकिन इसे सही ढंग से और पूरी तरह लागू नहीं किया गया है। हालांकि, ऐसा माना जा रहा है कि नई पॉलिसी के जरिये पूरे प्रोसेस को एक सेंट्रलाइज्ड ऑनलाइन प्लैटफॉर्म बनाकर इन खामियों को दूर किया जाएगा। टीचर्स को मिलेगी यूनिक आईडी प्रस्तावित पॉलिसी में सभी टीचर्स को एक यूनिक आईडी देने पर विचार किया जा सकता है, जिसके जरिये उनके सर्विस रिकॉर्ड, पोस्टिंग हिस्ट्री, टेन्योर और दूसरी जरूरी जानकारियां एक सेंट्रल डेटाबेस में रखी जा सकेंगी। अधिकारियों ने बताया कि टीचर अपनी जानकारी देख सकेंगे और जब ट्रांसफर विंडो खुलेगी तो पोर्टल के जरिये इस प्रक्रिया में हिस्सा ले सकेंगे। एक अधिकारी ने कहा कि अभी ट्रांसफर का ऑनलाइन प्रोसेस शिक्षा निदेशालय के पोर्टल के जरिये किया जाता है, लेकिन नई पॉलिसी को लागू करने के लिए सरकार एक अलग पोर्टल बनाया सकता है। ट्रांसफर में इन बातों का रखा जाएगा ध्यान इस प्रस्तावित पॉलिसी की एक मुख्य विशेषता पॉइंट्स-बेस्ड सिस्टम होने की उम्मीद है। अधिकारी ने बताया कि टीचर्स को अलग-अलग कैटेगरी में पॉइंट्स दिए जाएंगे और उनके कुल स्कोर के आधार पर और खाली जगहों के हिसाब से ट्रांसफर की प्राथमिकता तय होगी।इसमें सर्विस की अवधि, मौजूदा स्कूल में कार्यकाल और व्यक्तिगत या पारिवारिक परिस्थितियों जैसी बातों को भी ध्यान में रखा जाएगा। दिल्ली ने टीचर्स ट्रांसफर पॉलिसी बनाते समय हरियाणा के ऑनलाइन ट्रांसफर मॉडल के कुछ पहलुओं का भी ध्यान रखा है। हरियाणा में उम्र के हिसाब से पॉइंट और महिला कर्मचारियों के लिए अलग से प्रावधान शामिल हैं। अधिकारियों ने कहा कि दिल्ली सरकार हरियाणा के ट्रांसफर फॉर्मूले को हूबहू अपनाने के बजाय इस सिस्टम के कुछ हिस्सों को अपना सकती है। दिल्ली का सिस्टम उन टीचर्स को अतिरिक्त वेटेज दे सकता है, जिन्होंने एक ही स्कूल में लंबा समय बिताया है। साथ ही इसमें महिला टीचर, सिंगल पेरेंट, विधवा या विधुर, दिव्यांग टीचर और गंभीर बीमारी या परिवार से जुड़ी मुश्किल स्थितियों का सामना कर रहे टीचर्स को भी ध्यान में रखा जा सकता है। अधिकारियों ने बताया कि ऐसे जोड़ों को भी अतिरिक्त पॉइंट देने पर विचार किया जा सकता है, जिनमें पति-पत्नी दोनों सरकारी कर्मचारी हों।

राफेल-F-35 पर भारी पड़ेगा ये फाइटर जेट? भारत को मिला बड़ा ऑफर, पाकिस्तान में मची खलबली

नई दिल्ली रूस के राष्‍ट्रपति व्‍लादिमीर ब्रिक्‍स समिट में हिस्‍सा लेने के लिए इन दिनों भारत की यात्रा पर हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पुतिन से मुलाकात भी हुई है. दोनों देशों ने आपसी संबंधों को और मजबूत करने पर जोर दिया. दोनों नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब भारत ने रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्‍टम की 5 और यूनिट खरीदने का फैसला किया है. इस तरह भारत के पास इस अल्‍ट्रा मॉडर्न एयर डिफेंस सिस्‍टम के कुल 10 स्‍क्‍वाड्रन हो जाएंगे. ऑपरेशन सिंदूर में S-400 ने पाकिस्‍तान को नानी याद दिला थी. अब रूस ने भारत दो बड़े ऑफर दिए हैं. पहला, पांचवीं पीढ़ी का Su-57 फाइटर जेट और दूसरा बेहद ताकतवर 177S जेट इंजन. 177S फाइटर जेट इंजन दुनिया के ताकतवर इंजन में शुमार है. रूस की ओर से दिए गए ऑफर में Su-30MKI को 177S जेट इंजन के साथ अपग्रेड करने का ऑफर दिया गया है. यदि इसपर बात बनती है तो Su-30MKI रफ्तार के मामले में अमेरिका के 5th जेनरेशन जेट F-35 और राफेल लड़ाकू विमान से और भी ज्‍यादा ताकतवर हो जाएगा. बता दें कि Su-30MKI फाइटर जेट ने ही पाकिस्‍तान पर ब्रह्मोस बरसाया था।  रूस ने भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमानों के बेड़े के आधुनिकीकरण के लिए अपने एडवांस Izdeliye 177S इंजन की पेशकश की है. इस इंजन को मौजूदा Su-30MKI में बड़े ढांचागत बदलाव के बिना इंटीग्रेशन करने की संभावना जताई जा रही है. इससे भारत को पुराने इंजन की जगह अधिक क्षमता वाले पावरप्लांट को अपनाने का विकल्प मिल सकता है. रूसी प्रस्ताव के अनुसार, 177S इंजन 14.5 टन तक का थ्रस्ट दे सकता है. इसका आकार और वजन AL-31F/FP इंजन के समान बताया गया है, जिससे Su-30 परिवार के विमानों में इसके इंटीग्रेशन को अपेक्षाकृत आसान बनाने में मदद मिल सकती है. इंजन की सेवा अवधि करीब 6,000 घंटे और अलग-अलग परिचालन परिस्थितियों में ईंधन खपत में लगभग 7 प्रतिशत कमी का दावा किया गया है।  भारत के लिए क्‍यों अहम भारत के लिए इस प्रस्ताव का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) पहले से ही रूस के साथ लाइसेंस के तहत AL-31FP इंजन का उत्पादन और रखरखाव (Production and Maintenance) करता है. ऐसे में 177S पर सहयोग भारतीय एयरोस्पेस उद्योग की घरेलू क्षमता को आगे बढ़ाने का अवसर दे सकता है. यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब भारत और रूस के बीच Su-57E पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को लेकर भी बातचीत जारी है. ऐसे में फाइटर जेट इंजन सहयोग दोनों देशों के बीच व्यापक लड़ाकू विमान और एयरोस्पेस साझेदारी का अगला चरण बन सकता है।  F-35 और राफेल से भी ताकतवर हो जाएगा Su-30MKI Su-30MKI एक ट्विन इंजन हेवी फाइटर जेट है. इसमें फिलहाल दो AL-31FP टर्बोफैन इंजन लगे हुए हैं. हर इंजन की ताकत 123 KN की है. इस तरह Su-30MKI लड़ाकू विमान 246 KN थ्रस्‍ट के साथ उड़ान भरने में सक्षम है. रूसी टर्बो फाइटर जेट मैक-2 यानी 2469 KMPH से भी ज्‍यादा की रफ्तार से टार्गेट की तरफ भाग सकता है. अब बात करते हैं राफेल फाइटर जेट की. इसमें 75 KN के थ्रस्‍ट वाले दो इंजन लगे हैं. ट्विन इंजन होने की वजह से फ्रांस का यह जेट 150 KMPH की रफ्तार से उड़ान भर सकता है. वहीं, अमेरिका का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान F-35 भी इस मामले में Su-30MKI से पीछे है. F-35 फाइटर जेट 191 KN थ्रस्‍ट से उड़ान भर सकता है. फ्लाइट मोड में इसकी रफ्तार मैक-1.6 यानी 1975 KMPH होती है। 

8th Pay Commission News: कर्मचारी कर रहे OPS बहाली की मांग, UPS में सुधार का मिल सकता है विकल्प

नईदिल्ली     8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) में सैलरी-पेंशन को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों की उम्मीदें लगातार बढ़ती जा रही हैं. हालांकि, इसके साथ ही पुरानी पेंशन योजना (OPS) को बहाल करने की मांग भी तेजी से जोर पकड़ रही है. 8वें वेतन आयोग के गठन के बाद से ही केंद्रीय कर्मचारियों और यूनियनों ने पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने पर बड़ा जोर दिया है. कर्मचारी संगठन नई पेंशन योजना (NPS) और यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) को खारिज करते हुए सिर्फ OPS की वापसी चाहते हैं।  ओल्ड पेंशन स्कीम की वापसी की मांग कर्मचारी संगठन और रेलवे यूनियनों का कहना है कि न्यू पेंशन स्कीम(NPS) और यूनिफाइड पेंशन स्कीम  (UPS) कर्मचारियों की सोशल सोक्योरिटी की गारंटी पूरी तरह नहीं देती हैं. इसलिए यूनियनों की ये बड़ी मांग है कि 8वें वेतन आयोग के तहत सभी कर्मचारियों के लिए ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को फिर से लागू किया जाए।  एक तरह कर्मचारी संगठन 8वें वेतन आयोग के तहत ओपीएस लागू करने पर अड़े हुए हैं, जबकि दूसरी तरफ इकनॉमिक एक्सपर्ट और कानूनी जानकार इस मांग पर पूरी तरह सहमत नजर नहीं आ रहे हैं .यूनियनों की इस मांग पर उन्होंने अपनी चिंताएं जताई हैं. उनका मानना है कि पुरानी पेंशन योजना को दोबारा लागू करना व्यावहारिक नहीं है।  कर्मचारियों को NPS और UPS से क्यों है ऐतराज? कर्मचारी यूनियनों की सबसे बड़ी चिंता आर्थिक सुरक्षा को लेकर है. उनका तर्क है कि ओपीएस में निश्चित पेंशन मिलती थी,  जबकि  NPS का रिटर्न पूरी तरह बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है, जिससे रिटायरमेंट के बाद पेंशन पर असर पड़ता है।  लीगल और इकोनॉमिक एक्सपर्ट्स ने क्यों जताई चिंता? एक्सपर्ट के अनुसार, ओपीएस लागू करने से सरकारी खजाने पर बेहद भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा, जिससे देश के विकास कार्यों का बजट प्रभावित हो सकता है.कानूनी रूप से भी सरकार पहले ही NPS को बेहतर करने के लिए यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS) का ऑप्शन ला चुकी है. ऐसे में  पुरानी व्यवस्था पर पूरी तरह लौटना नीतिगत और कानूनी रूप से  उलझाऊ और बेहद मुश्किल है।  ओल्ड पेंशन से लेकर मिनिमम सैलरी तक: कर्मचारियों की 5 बड़ी मांगें 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) की बैठकों का दौर जारी है. हाल ही में चेन्नई में हुई बड़ी बैठक में केंद्रीय कर्मचारियों- पेंशनभोगियों  के लिए पेंशनर्स फोरम ने 5 बड़ी मांगें आयोग के सामने रखा है।      सबसे पहली और बड़ी मांग यह है कि नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) को हटाकर पुरानी पेंशन योजना (OPS) को तुरंत बहाल किया जाए. सालों से जारी इस मांग को चेन्नई बैठक में  सबसे ज्यादा जोर दिया गया।      इसके अलावा, रिटायर हो चुके कर्मचारियों और उनके आश्रितों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए बेसिक पेंशन और फैमिली पेंशन दोनों में सम्मानजनक बढ़ोतरी की अपील की गई है. उनकी मांग है कि न्यूनतम बेसिक सैलरी बढ़ाकर ₹68,000 किया जाए और 10 साल के लंबे इंतजार के बजाय स्थाई 'वेज-रिविजन' सिस्टम बने।      पेंशन कम्यूटेशन या कम्यूटेड पेंशन की रिकवरी के नियमों को लेकर लंबे समय से अस्पष्टता बनी हुई है, जिस पर राहत और आसान नियम बनाने की मांग की है।      वहीं, प्रमोशन और सैलरी इंक्रीमेंट से जुड़े मॉडिफाइड एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (MACP) के तहत मिलने वाले फायदों को रिवाइज करने की मांग उठाई गई है, ताकि डाक कर्मचारियों के करियर ग्रोथ और पे-स्केल में सुधार हो सके।      इसके साथ ही, कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए बेहतर भत्ते, लीव रूल्स और एक मजबूत सोशल सिक्योरिटी कवर देने की बात भी आयोग के समक्ष रखी गई है।  OROP पर क्या कहती हैं लीगल एक्सपर्ट? सशस्त्र बलों की तर्ज पर सिविलियन कर्मचारियों के लिए 'वन रैंक, वन पेंशन' (OROP) लागू करने की मांग पर लीगल फर्म CMS INDUSLAW की पार्टनर अमृता टोंक का कहना है कि सिविल सेवाओं का ढांचा सेना से अलग होता है. हर विभाग, काडर और भर्ती के साल का हिसाब अलग होने के कारण एक समान OROP फॉर्मूला लागू करने से नई असमानताएं पैदा हो सकती हैं।  प्री-2026 पेंशनर्स के अधिकारों पर उनका मानना है कि पेंशन और ग्रेच्युटी कर्मचारियों द्वारा अर्जित किए गए अधिकार हैं. आयोग पुराने पेंशनर्स के लाभों को फ्रीज नहीं कर सकता. कानूनी रूप से सही रास्ता यही है कि नए बदलावों को केवल भविष्य में जुड़ने वाले नए कर्मचारियों पर ही लागू किया जाए।  आगे  क्या रास्ता निकाल सकती है सरकार? जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला यह आयोग मई-जून 2027 के आसपास अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप सकता है. 16 से 18 सितंबर को चंडीगढ़ में अगली बैठक होनी है।  एक्सपर्ट्स के अनुसार, OPS की पूरी तरह बहाली की गुंजाइश भले ही कम हो, लेकिन सरकार कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखते हुए यूपीएस में कुछ और सुधार कर सकती है.हालांकि ओपीएस की पूरी तरह बहाली की संभावना बहुत कम है। 

80s AI Photo Trend हुआ वायरल, मगर Retro फोटो बनाने में कितनी बिजली-पानी की खपत? जानें पूरा असर

नई दिल्ली इंस्टाग्राम, फेसबुक और X (ट्विटर) पर इन दिनों ChatGPT का 80s AI Photo Trend तेजी से वायरल हो रहा है। लोग अपनी सेल्फी को 1980 के दशक की बॉलीवुड या विंटेज स्टाइल फोटो में बदलकर सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। बड़े हेयरस्टाइल, रेट्रो कपड़े, फिल्म ग्रेन और गर्म रंगों वाली ये तस्वीरें लोगों को खूब पसंद आ रही हैं। भारत में इस ट्रेंड की वजह से ChatGPT से जुड़े सर्च और डाउनलोड में भी बड़ी बढ़ोतरी देखी गई है। लेकिन इस मजेदार ट्रेंड के पीछे एक ऐसा सच भी है जिस पर कम लोग ध्यान दे रहे हैं—हर AI फोटो बनाने में बिजली, डेटा सेंटर और पानी की खपत होती है। आखिर क्या है ChatGPT का 80s AI Photo Trend? इस ट्रेंड में यूज़र अपनी फोटो ChatGPT या किसी AI इमेज जनरेटर पर अपलोड करते हैं और एक प्रॉम्प्ट देकर उसे 1980 के दशक की तस्वीर जैसा बना देते हैं। AI चेहरे को पहचानकर बैकग्राउंड, कपड़े, हेयरस्टाइल, लाइटिंग और फोटो की पूरी स्टाइल बदल देता है। यह ट्रेंड पहले वायरल हुए Ghibli AI Portraits और Barbie AI Photos की तरह ही तेजी से लोकप्रिय हुआ है।  इस ट्रेंड की खास बातें Vintage Bollywood Look Film Camera Grain Effect 80s Fashion और Hairstyles Warm Lighting और Retro Background सोशल मीडिया पर Reels और DP के लिए इस्तेमाल AI फोटो बनाने से पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है? AI फोटो बनाने के लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटर लगातार काम करते हैं। इन सर्वरों को चलाने और ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत होती है। यही वजह है कि एक साधारण AI फोटो भी पर्यावरणीय संसाधनों का उपयोग करती है।  एक AI फोटो की अनुमानित खपत संसाधन अनुमानित उपयोग पानी लगभग 5–50 मिलीलीटर प्रति AI फोटो बिजली लगभग 0.01–0.29 kWh प्रति AI इमेज डेटा सेंटर GPU आधारित हाई-परफॉर्मेंस सर्वर लगातार सक्रिय रहते हैं। जब करोड़ों लोग AI फोटो बनाते हैं, तब क्या होता है?  अगर दुनिया भर में एक दिन में 1 करोड़ AI फोटो बनाई जाएं, तो अनुमान के अनुसार 50,000 से 5 लाख लीटर तक पानी अप्रत्यक्ष रूप से इस्तेमाल हो सकता है। यह पानी मुख्य रूप से डेटा सेंटर की कूलिंग सिस्टम में उपयोग होता है। अनुमानित प्रभाव (Illustrative) यह चार्ट प्रकाशित शोध और रिपोर्टों में दिए गए अनुमानित दायरे पर आधारित है। वास्तविक खपत AI मॉडल और डेटा सेंटर के अनुसार अलग हो सकती है.  सिर्फ बिजली नहीं, कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ता है AI मॉडल जितनी ज्यादा तस्वीरें बनाते हैं, उतनी ज्यादा कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है। इसका मतलब है: अधिक बिजली की खपत। डेटा सेंटर से अधिक कार्बन उत्सर्जन। सर्वर कूलिंग के लिए अधिक पानी। संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के अनुसार AI सिस्टम की रोजमर्रा की गतिविधियां उसकी कुल ऊर्जा मांग का बड़ा हिस्सा होती हैं।  क्या आपकी फोटो और डेटा भी सुरक्षित हैं? विशेषज्ञों का कहना है कि AI प्लेटफॉर्म पर फोटो अपलोड करते समय यूज़र्स को यह समझना चाहिए कि उनकी तस्वीरें और उनसे जुड़ा डेटा प्लेटफॉर्म की नीतियों के अनुसार प्रोसेस और स्टोर किया जा सकता है। इसलिए किसी भी AI टूल पर निजी या संवेदनशील तस्वीरें साझा करने से पहले उसकी Privacy Policy जरूर पढ़ें।  जिम्मेदारी से AI इस्तेमाल करें AI तकनीक रचनात्मकता और मनोरंजन के लिए शानदार है, लेकिन इसका जिम्मेदार उपयोग भी जरूरी है। क्या करें? केवल जरूरत होने पर AI फोटो बनाएं। एक ही फोटो के कई अनावश्यक वर्ज़न जनरेट करने से बचें। निजी और संवेदनशील तस्वीरें अपलोड करने से पहले सावधानी बरतें। भरोसेमंद AI प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें।

भोपाल मेट्रो कॉरिडोर के 500 मीटर क्षेत्र में लागू होगी TDR व्यवस्था, संपत्तियों की कीमतों पर पड़ेगा असर?

भोपाल  भोपाल में मेट्रो रेल परियोजना के आसपास विकास व्यवस्था को लेकर एक अहम बदलाव की तैयारी चल रही है। भोपाल विकास योजना 2005 के तहत मेट्रो कॉरिडोर के दोनों ओर 500-500 मीटर के क्षेत्र को ‘रीसिविंग एरिया’ के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव सामने आया है। इस व्यवस्था का सीधा संबंध हस्तांतरणीय विकास अधिकार यानी TDR से है। प्रस्ताव को लेकर आपत्तियां और चिंताएं सामने आई हैं, क्योंकि इसके लागू होने से मेट्रो कॉरिडोर के आसपास निर्माण क्षमता, व्यावसायिक गतिविधियों और जमीन-मकान के मूल्य पर असर पड़ सकता है। मेट्रो के आसपास होगा रीसिविंग एरिया विकसित प्रस्ताव के अनुसार मेट्रो लाइन के दोनों तरफ 500 मीटर तक के क्षेत्र को रीसिविंग एरिया के रूप में विकसित किया जा सकता है। इसके तहत संबंधित क्षेत्रों में अतिरिक्त विकास अधिकार का उपयोग करके भवन निर्माण की क्षमता बढ़ाई जा सकेगी। मौजूदा विकास व्यवस्था की तुलना में अतिरिक्त एफएआर उपलब्ध होने से मेट्रो के आसपास अधिक घनत्व वाला आवासीय और व्यावसायिक विकास संभव होगा। भोपाल की विकास योजना में भी मेट्रो के दोनों ओर 500 मीटर क्षेत्र को ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट से जोड़ने की अवधारणा पहले से मौजूद है। इस व्यवस्था का उद्देश्य मेट्रो के आसपास ऐसी शहरी संरचना तैयार करना है, जहां आवास, कारोबार और अन्य सुविधाएं सार्वजनिक परिवहन के करीब विकसित हों। इससे मेट्रो का उपयोग बढ़ाने और निजी वाहनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत भोपाल मेट्रो परियोजना में भी TDR और ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट को परियोजना से जुड़े मूल्य संवर्धन और शहरी विकास के साधन के रूप में शामिल किया गया था। रहवासियों के लिए चिंता का कारण हालांकि, प्रस्तावित बदलाव को लेकर रहवासियों की चिंताएं भी सामने आ रही हैं। मेट्रो कॉरिडोर के आसपास निर्माण की अनुमति और एफएआर बढ़ने से जमीन तथा संपत्तियों की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसका असर उन मध्यम और निम्न-मध्यम आय वर्ग के परिवारों पर पड़ने की आशंका है, जो इन क्षेत्रों में पहले से रह रहे हैं। अधिक निर्माण क्षमता के कारण क्षेत्र में आबादी और व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ने पर यातायात, पार्किंग और बुनियादी सुविधाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहेगा। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अतिरिक्त विकास अधिकार खरीदने के बाद निर्माण क्षमता में कई गुना वृद्धि संभव होने की बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा एफएआर की तुलना में यह क्षमता तीन से पांच गुना तक पहुंच सकती है। ऐसे में मेट्रो स्टेशनों के आसपास ऊंची इमारतों, अधिक आवासीय इकाइयों और व्यावसायिक परियोजनाओं के विकास का रास्ता खुल सकता है। TDR व्यवस्था नई नहीं भोपाल में TDR की अवधारणा नई नहीं है। मध्यप्रदेश में हस्तांतरणीय विकास अधिकारों के लिए 2018 में नियम बनाए गए थे और भोपाल मेट्रो परियोजना के लिए उत्पादन क्षेत्र तथा TDR व्यवस्था से संबंधित अधिसूचनाएं पहले भी जारी की जा चुकी हैं। राज्य के नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के रिकॉर्ड में भोपाल मेट्रो के लिए TDR नियमों के तहत उत्पादन क्षेत्र अधिसूचित किए जाने की प्रक्रिया का उल्लेख मौजूद है। मेट्रो परियोजना से जुड़े भूमि और पुनर्वासन के मामलों पर भी प्रशासन की प्रक्रिया जारी है। जिला भोपाल की आधिकारिक वेबसाइट पर अगस्त 2026 में ऑरेंज लाइन के स्वीकृत मेट्रो मार्ग से जुड़े भूमि अधिग्रहण संबंधी नोटिस प्रकाशित किए गए हैं। इससे स्पष्ट है कि परियोजना के विभिन्न हिस्सों में भूमि और विकास से जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रियाएं अभी भी आगे बढ़ रही हैं। आपत्तियों और सुझावों पर हो सकती है सुनवाई अब प्रस्तावित रीसिविंग एरिया को लेकर नगर तथा ग्राम निवेश विभाग में आपत्तियों और सुझावों पर सुनवाई की प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार सुनवाई के बाद प्राप्त आपत्तियों का निराकरण किया जाएगा और उसके आधार पर मास्टर प्लान में संशोधन का अधिसूचना प्रस्ताव आगे बढ़ सकता है। यदि संशोधन लागू होता है तो भोपाल मेट्रो कॉरिडोर के आसपास भविष्य के निर्माण और भूमि उपयोग की तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

FASTag नियम सख्त: गलत लेन या बिना एक्टिव FASTag टोल पार किया तो देना होगा दोगुना शुल्क

नई दिल्ली देशभर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर सफर को आसान और तेज बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन व्यवस्था लागू की गई है. हालांकि, जल्दबाजी या लापरवाही में कई वाहन चालक गलत लेन में गाड़ी घुसा देते हैं. ऐसे में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के परिचालन दिशा निर्देशों के मुताबिक अगर कोई पैसेंजर कार ड्राइवर कमर्शियल वाहनों, ओवरसाइज़्ड ट्रांसपोर्ट्स या खास काम के लिए तय FASTag लेन में गलत तरीके से दाखिल होते हैं, तो उससे सामान्य टोल दर का दोगुना टैक्स वसूला जाएगा।  चालान और कानूनी कार्रवाई का भी जोखिम दरअसल, राष्ट्रीय राजमार्गों पर यातायात में रुकावट और जाम जैसे हालात को रोकने के लिए NHAI ने कड़े कदम उठाए हैं. टोल प्लाजा पर लगे आधुनिक हाई-डेफिनिशन सेंसर और कैमरे वाहन के आकार व श्रेणी को खुद बखुद पहचान लेते हैं और गलत लेन में जाने पर सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर देता है. इसके बाद टोल बूथों के आसपास तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मी मोटर वाहन अधिनियम के तहत लेन अनुशासन तोड़ने और खतरनाक ड्राइविंग के आरोप में ऑन-द-स्पॉट या ई-चालान जारी कर सकते हैं।  हाईवे अथॉरिटी के हालिया रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि हर 10 में से एक गाड़ी बिना मान्य FASTag या बिना बैलेंस के इन टोल प्वाइंट्स से गुजर रही है. बता दें कि, दिल्ली के मुंडका, गुजरात के चोरयासी, हरियाणा के घरौंडा और राजस्थान के दौलतपुरा व मनोहरपुरा टोल प्लाजा के आंकड़ों से पता चला है कि मई से जुलाई के बीच करीब 1.10 करोड़ गाड़ियों में से 10.52 लाख गाड़ियों को ई-नोटिस भेजे गए हैं. अगर आप भी अपने FASTag को समय पर रीचार्ज नहीं करते या ब्लैकलिस्टेड टैग के साथ बैरियरलेस टोल पार करते हैं तो आपकी जरा सी लापरवाही जेब पर काफी भारी पड़ सकती है।  दोगुना पेनल्टी का है खतरा बता दें कि, बैरियरलेस टोल प्लाजा पर अगर आपकी कार के FASTag में बैलेंस कम है या टैग काम नहीं कर रहा है तो सिस्टम तुरंत आपकी गाड़ी का चालान काटकर ई-नोटिस जारी कर देता है. यह नोटिस गाड़ी मालिक के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजा जाता है. सरकारी नियमानुसार ई-नोटिस मिलने के बाद आपको सामान्य टोल टैक्स चुकाने के लिए पूरे 72 घंटे यानी 3 दिन का समय दिया जाता है।  यदि अगर आप इस तय समयसीमा के भीतर ऑनलाइन पेमेंट नहीं करते हैं तो 72 घंटे बीतते ही यह रकम दोगुनी कर दी जाती है. यानी जो टोल आप आराम से कम पैसों में दे सकते थे उसके लिए आपको सीधा डबल जुर्माना भरना पड़ेगा। ०  सबसे ज्यादा नियम तोड़ने का रिकॉर्ड जानकारी के लिए आपको बता दें कि, आंकड़ों का विश्लेषण करने पर सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि टोल नियमों को तोड़ने में सबसे आगे कार और जीप वाले ही हैं. मई से जुलाई के बीच जारी हुए कुल 10.52 लाख ई-नोटिस में से 91 परसेंट से भी ज्यादा यानी 9.62 लाख नोटिस सिर्फ निजी कारों को भेजे गए हैं।  वहीं ट्रकों और बसों जैसी भारी गाड़ियों की हिस्सेदारी इसमें केवल 3.5 परसेंट के करीब ही रही है. ज्यादातर कार चालक FASTag का लो बैलेंस नजरअंदाज कर देते हैं या विंडशील्ड पर गलत तरीके से लगा टैग लेकर निकल पड़ते हैं. दिल्ली के मुंडका टोल प्लाजा पर सबसे ज्यादा 4.54 लाख ई-नोटिस जारी किए गए हैं।  ई-नोटिस न भरने पर रुक जाएंगे काम आपको यह भी बता दें कि, कई लोग सोचते हैं कि ई-नोटिस आने के बाद भी अगर भुगतान न करें तो क्या ही फर्क पड़ेगा. लेकिन अथॉरिटी ने इस बार नियम काफी सख्त कर दिए हैं. अगर आपके नाम पर बकाया ई-नोटिस जमा नहीं होता है तो भविष्य में गाड़ी से जुड़े लगभग सभी सरकारी काम पूरी तरह ठप हो जाएंगे।  जब भी आप अपनी गाड़ी का मालिकाना हक किसी दूसरे के नाम ट्रांसफर कराने जाएंगे गाड़ी का रजिस्ट्रेशन रिन्यू कराएंगे या फिटनेस सर्टिफिकेट लेने जाएंगे तो आपको एनओसी जारी नहीं किया जाएगा. जब तक आप अपना सारा बकाया टोल जुर्माना नहीं भर देते तब तक वाहन पोर्टल पर आपकी गाड़ी के सारे काम रोक दिए जाएंगे।  इन गलतियों की वजह से लगता है दोगुना जुर्माना     पैसेंजर कार को ट्रकों और भारी व्यावसायिक वाहनों के लिए रिजर्व लेन में ले जाना.     FASTag वॉलेट में पर्याप्त बैलेंस न होने पर ऑटोमेटिक सेंसर टैग को स्कैन नहीं करता और बैरियर नहीं खुलता, जिससे गाड़ी गलत श्रेणी में आ जाती है.     तय प्रक्रिया के अनुसार फास्टैग को सामने की विंडशील्ड पर सही ढंग से न चिपकाने या हाथ में लेकर दिखाने पर भी दोगुना टोल लिया जा सकता है.     केवाईसी (KYC) अधूरा होने या वाहन नंबर से सही तरीके से लिंक न होने पर टैग ब्लॉक हो जाता है. पेनल्टी और असुविधा से बचने के लिए ये करें     टोल प्लाजा आने से 100-200 मीटर पहले ओवरहेड इलेक्ट्रॉनिक इंडिकेटर और साइन बोर्ड को ध्यान से देखें और केवल अपनी श्रेणी वाली लेन में ही गाड़ी चलाएं.     हाईवे पर निकलने से पहले अपने FASTag से जुड़े बैंक ऐप या वॉलेट में पर्याप्त धनराशि सुनिश्चित करें.     अपने फास्टैग स्टीकर को कार की आगे वाली कांच के ठीक बीच में अंदर की तरफ चिपकाएं. जुर्माना से बचने के लिए करें ये काम अगर आप भी हाईवे पर बिना किसी झंझट और जुर्माने के सफर करना चाहते हैं तो कुछ छोटी-छोटी बातों का हमेशा ध्यान रखें. सबसे पहले जब भी लंबी यात्रा पर निकलें तो  अपने FASTag वॉलेट में हमेशा पर्याप्त बैलेंस बनाकर रखें ताकि रास्ते में लो-बैलेंस की दिक्कत न हो. इसके अलावा FASTag को अपनी गाड़ी की विंडशील्ड पर बिल्कुल सही जगह और सही तरीके से चिपकाएं ताकि हाई-स्पीड एएनपीआर कैमरे उसे एक बार में ही स्कैन कर सकें।  अगर कभी गलत टोल कट जाता है या कोई तकनीकी गड़बड़ी होती है तो घबराने की जरूरत नहीं है. आप 3 दिनों के भीतर संबंधित वेबसाइट पर जाकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जांच के बाद आपका पैसा आपके FASTag में वापस क्रेडिट कर दिया जाएगा।