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डॉग लवर संस्था नहीं मिली, नगर निगम ने लिया बड़ा फैसला; चाकुलिया भेजे जाएंगे आवारा कुत्ते

 धनबाद  धनबाद के आवारा कुत्तों का आश्रय गृह अब चाकुलिया होगा क्योंकि धनबाद में डॉग लवर नहीं है और न हीं ऐसी कोई संस्था जो आवारा कुत्तों के लिए कार्य करती है। नगर निगम ने ऐसी संस्था को ढ़ूढने के लिए खूब पसीना बहाया पर न केवल जिले बल्कि आस-पास के जिलों में भी ऐसी कोई संस्थान नहीं मिली। जिसके बाद नगर निगम ने शहर के आवारा कुत्तों को चाकुलिया के डॉग सेल्टर होम में भेजने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य है कि आवश्यकता अनुसार आवारा कुत्तों के लिए सेल्टर होम में भेजने से उपचार एवं देखभाल की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित हो पाएगी। नगर निगम धनबाद शहर में आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रण, डॉग बाइट की घटनाओं में कमी तथा रेबीज उन्मूलन के उद्देश्य से एनिमल बर्थ कंट्रोल कार्यक्रम को प्रभावी तरीके से कर रहा है। नगर निगम ने अब तक लगभग 32,046 आवारा कुत्तों का बंध्याकरण (स्टरलाइजेशन) कर उन्हें एंटी रेबीज वैक्सीन दे चुका है। इसके साथ ही प्रतिदिन औसतन 25 कुत्तों को विभिन्न क्षेत्रों से पकड़कर उनका बंध्याकरण एवं टीकाकरण कराया जा रहा है। एनिमल बर्थ कंट्रोल नियम, 2023 एवं निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया के अनुरूप आवारा कुत्तों का बंध्याकरण, टीकाकरण एवं उपचार किया जा रहा है तथा उन्हें उनके मूल स्थान पर सुरक्षित छोड़ा जा रहा है। डॉग बाइट के मामलों में कमी लाने हेतु पोस्ट बाइट एंटी रेबिज वेक्सिनेशन व्यवस्था सुदृढ़ रूप से संचालित किया जा रहा है। साथ ही प्रीवेंशन एंटी रेबिज वेक्सिनेशन अभियान भी चलाया जा रहा है। 55 स्थलों को फीडिंग जोन के रुप में किया है अधिसूचित नगर निगम क्षेत्र में आवारा कुत्तों के सुव्यवस्थित प्रबंधन हेतु कुल 55 स्थलों को फीडिंग जोन के रूप में अधिसूचित किया गया है। जहां ही डॉग फीडिंग की व्यवस्था की गई है। यह वीडियो भी देखें इन स्थलों पर स्वच्छता एवं व्यवस्था बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। नगर निगम द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि चिह्नित फिडिंग जोन के अतिरिक्त अन्यत्र डॉग फीडिंग किए जाने पर झारखंड नगर पालिका अधिनियम 2011 के प्रावधानों के तहत विधिसम्मत कार्रवाई की जाएगी। यह अभियान सतत प्रक्रिया है। जिसकी नियमित निगरानी की जा रही है, ताकि शहर में आवारा कुत्तों से संबंधित समस्याओं का प्रभावी एवं स्थायी समाधान सुनिश्चित किया जा सके। सेल्टर होम में आवारा कुत्तों का उपचार एवं देखभाल की समुचित व्यवस्था है। धनबाद में काफी प्रयास के बाद भी डॉग लवर संस्था नहीं मिला। शहर के नागरिकों की सुरक्षा को देखते हुए आवारा कुत्तों को चाकुलिया डॉग सेल्टर होम भेजने का निर्णय लिया गया है। आशीष गंगवार, नगर आयुक्त

‘स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे’ भारत में पहले होगी रिलीज, 17 जून से शुरू होगी एडवांस बुकिंग

स्पाइडर मैन को पसंद करने वाले फैंस के लिए एक बड़ी खुशखबरी है। पीटर पार्कर की अगली फिल्म 'स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे' भारत में अपनी तय तारीख से पहले रिलीज होने जा रही है। जानें यह फिल्म कब रिलीज होगी और कब शुरू होगी इसकी एडवांस बुकिंग? रिलीज की तारीख और एडवांस बुकिंग फिल्म 'स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे' अब भारत में 30 जुलाई, 2026 को रिलीज होगी, जबकि दुनिया भर में यह फिल्म 31 जुलाई को रिलीज हो रही है। इस फिल्म की एडवांस बुकिंग के लिए टिकटों की बुकिंग 17 जून से शुरू हो जाएगी। यह फिल्म भारत में 6 भाषाओं में रिलीज होगी- अंग्रेजी, हिंदी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम। क्या है फिल्म की कहानी? यह फिल्म 'स्पाइडर-मैन: नो वे होम' की कहानी के आगे से शुरू होगी। पिछली फिल्म के आखिर में पूरी दुनिया पीटर पार्कर को भूल गई थी। इस बार पीटर बिल्कुल अकेला है और बिना किसी पुराने सहारे के खुद अपनी जिंदगी की मुश्किलें संभाल रहा है। वह भावनात्मक रूप से परेशान है, फिर भी न्यूयॉर्क की रक्षा कर रहा है। फिल्म की स्टार कास्ट 'स्पाइडर-मैन: ब्रांड न्यू डे' में टॉम हॉलैंड (स्पाइडर-मैन), जेंडाया (एमजे) और जैकब बैटलन (नेड लीड्स) के किरदार में फिर साथ दिखेंगे। टॉम हॉलैंड लगभग 5 साल बाद अपनी सोलो स्पाइडर-मैन फिल्म में नजर आ रहे हैं। इस फिल्म में जॉन बर्न्थेल और 'स्ट्रेंजर थिंग्स' फेम की सैडी सिंक भी नजर आएंगी। इस फिल्म के निर्देशक डेस्टिन डेनियल क्रेटन हैं, जिन्होंने 'शांग-ची' जैसी फिल्म बनाई है। एक नया रिकॉर्ड सोनी पिक्चर्स के मुताबिक, इस फिल्म के ट्रेलर को सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मिलाकर 1 अरब यानी 100 करोड़ से ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं। ऐसा रिकॉर्ड बनाने वाला यह दुनिया का पहला फिल्म ट्रेलर है।

‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ रिव्यू: मनोज बाजपेयी की दमदार एक्टिंग, लेकिन कहानी में रह गई कमी

1991 का आर्थिक संकट भारत के इतिहास के सबसे मुश्किल दौर में से एक था. इसी अहम अध्याय को बड़े पर्दे पर लाने की कोशिश करती है मनोज बाजपेयी स्टारर 'गवर्नर: द साइलेंट सेवियर'. डायरेक्टर चिन्मय डी. मांडलेकर की ये फिल्म एक ऐसे शख्स की कहानी दिखाती है, जिसने देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने में बड़ी भूमिका निभाई. दमदार विषय और अच्छे कलाकारों के बावजूद क्या फिल्म दर्शकों को बांधकर रख पाती है? आइए जानते हैं हमारे इस रिव्यू में. फिल्म में ए. रामनन (मनोज बाजपेयी) को अचानक राष्ट्रीय बैंक का गवर्नर बनाया जाता है. वो भी तब जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है. दिवालिया घोषित होने की कगार पर है. उनकी नियुक्ति पर सवाल उठते हैं क्योंकि उन्हें अर्थशास्त्र (इकोनॉमिक्स) का विशेषज्ञ नहीं माना जाता. लेकिन हालात ऐसे हैं कि देश को बचाने के लिए उन्हें बड़े और साहसी फैसले लेने पड़ते हैं. IMF से बातचीत, विदेशी कर्ज और देश के गोल्ड रिजर्व को गिरवी रखने जैसे फैसलों के जरिए कहानी आगे बढ़ती है. डायरेक्शन: इरादा बड़ा, असर थोड़ा कम डायरेक्टर चिन्मय डी. मांडलेकर ने एक बेहद महत्वपूर्ण विषय चुना है. इंस्पेक्टर जेंडे के बाद ये मनोज बाजपेयी और चिन्मय डी. मांडलेकर की साथ में दूसरी फिल्म है और दोनों की जोड़ी फिर से एक गंभीर विषय लेकर आई है. हालांकि, जहां कहानी में स्वाभाविक रूप से तनाव, राजनीतिक दबाव और सस्पेंस की भरपूर गुंजाइश थी, वहां फिल्म कई बार जरूरत से ज्यादा आसान और इंस्पायर करने वाली बन जाती है. देश आर्थिक संकट में है, लेकिन स्क्रीन पर वो बेचैनी और घबराहट पूरी ताकत से महसूस नहीं होती. फिल्म कई बार ऐसे आगे बढ़ती है जैसे कोई मुश्किल पहेली धीरे-धीरे सुलझ रही हो, जबकि असल में हालात कहीं ज्यादा गंभीर थे. स्क्रीनप्ले: दिलचस्प विषय, लेकिन कमजोर पकड़ फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसका सब्जेक्ट है. आर्थिक संकट जैसी जटिल घटना को आसान भाषा में समझाने की कोशिश की गई है, जिससे आम दर्शक भी कहानी से जुड़ सके. लेकिन स्क्रीनप्ले कई जगहों पर सतही महसूस होता है. कई अहम राजनीतिक और प्रशासनिक टकरावों को सिर्फ छूकर छोड़ दिया गया है. संकट से जूझ रही पूरी टीम की बजाय कहानी लगभग पूरी तरह गवर्नर और उनके डिप्टी के इर्द-गिर्द घूमती रहती है. यही वजह है कि फिल्म का दायरा बड़ा होने के बावजूद उसका प्रभाव सीमित रह जाता है. एक्टिंग: मनोज बाजपेयी फिर भी संभाल लेते हैं मोर्चा मनोज बाजपेयी अपने किरदार में पूरी ईमानदारी के साथ नजर आते हैं. दक्षिण भारतीय लहजे और बॉडी लैंग्वेज को पकड़ने की उनकी कोशिश दिखती है, हालांकि ये हर जगह एक जैसी नहीं लगती. फिर भी जब भी फिल्म कमजोर पड़ती है, बाजपेयी अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से उसे संभालने की कोशिश करते हैं. डिप्टी गवर्नर के किरदार में नौशाद मोहम्मद कुंजू काफी प्रभाव छोड़ते हैं. उनके और बाजपेयी के बीच के दृश्य फिल्म के मजबूत हिस्सों में गिने जा सकते हैं. मधु शाह को ज्यादा स्क्रीन स्पेस नहीं मिला है, लेकिन वो अपने सीमित किरदार में सहज हैं. वहीं पत्रकार के रोल में अदा शर्मा का किरदार कहानी में बहुत खास योगदान नहीं दे पाता और कई बार गैरजरूरी सा महसूस होता है. फिल्म के यादगार पल फिल्म में कुछ छोटे लेकिन प्रभावशाली सीन हैं जो लंबे समय तक याद रहते हैं. ट्रैफिक सिग्नल पर एक बच्ची से पेन खरीदने वाला सीन हो या फिर ऑफिस के चपरासी की कर्ज मांगने की आदत से जन्म लेने वाला एक बड़ा आइडिया, ये पल कहानी में 'ह्यूमन टच' जोड़ते हैं और फिल्म को भावनात्मक गहराई देते हैं. फाइनल वर्डिक्ट: देखने लायक लेकिन अधूरी उड़ान 'गवर्नर' एक महत्वपूर्ण और कम चर्चा वाले ऐतिहासिक अध्याय को सामने लाती है. फिल्म का प्लॉट दमदार है, कलाकारों की मेहनत भी नजर आती है, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले और कम महसूस होने वाला तनाव इसे एक बेहतरीन फिल्म बनने से रोक देता है. अगर आपको भारत के आर्थिक इतिहास, राजनीतिक ड्रामा और मनोज बाजपेयी की परफॉर्मेंस पसंद है तो ये फिल्म देखी जा सकती है. लेकिन जिस रोमांच, गहराई और प्रभाव की उम्मीद इसके विषय से की जाती है, वहां 'गवर्नर' थोड़ी पीछे रह जाती है.

“हाव-भाव देखकर गर्भ का अंदाजा नहीं लगा” दलील पर HC की कड़ी टिप्पणी, अपील खारिज

 चंडीगढ़ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अपने दायित्वों में लापरवाही को इस आधार पर नहीं छिपा सकती कि संबंधित महिला का हाव-भाव देखकर उसे गर्भवती होने का आभास नहीं हुआ था। अदालत ने गर्भवती महिला की मौत के मामले में सेवा से हटाई गई आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए उसकी अपील खारिज कर दी। जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने हरियाणा सरकार व अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि अपीलकर्ता द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण उसकी सेवाओं में गंभीर कमी को उजागर करता है। ऐसे में उसकी संविदात्मक नियुक्ति समाप्त करने के प्रशासनिक निर्णय में कोई खामी नहीं पाई जा सकती। क्या है मामला? मामले के अनुसार, पंचकूला निवासी कौशल्या देवी अपने निर्धारित क्षेत्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में कार्यरत थी। उसकी जिम्मेदारी क्षेत्र के घरों में जाकर गर्भवती महिलाओं की पहचान करना, उनकी निगरानी करना तथा आवश्यक स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी सेवाओं से जोड़ना था। इसी दौरान उसके कार्यक्षेत्र में रहने वाली एक गर्भवती महिला की मृत्यु हो गई। हैरानी की बात यह रही कि महिला की गर्भावस्था के संबंध में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की ओर से कोई रिपोर्ट या सूचना विभाग को नहीं दी गई थी। खंडपीठ ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि इससे पहले एकल पीठ भी सेवा समाप्ति आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर चुकी थी। एकल पीठ का मानना था कि कार्यकर्ता अपनी सेवा में कमी के लिए कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी। मृतक परिवार ने नहीं दी जानकारी: अपीलकर्ता सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता ने दलील दी कि मृतक के परिवार ने उसे गर्भावस्था के बारे में कुछ जानकारी नहीं दी थी। उसने कारण बताओ नोटिस के जवाब में कहा था कि घर के दौरे के दौरान उसने महिला को छत पर तेजी से जाते और गीला भारी कंबल उठाकर घरेलू काम करते देखा था। उसके अनुसार महिला के हाव-भाव से ऐसा प्रतीत नहीं होता था कि वह गर्भवती है। इस दलील पर कड़ी टिप्पणी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यह स्पष्टीकरण पूरी तरह अविश्वसनीय और वास्तविकता से परे है। अदालत ने कहा कि यह जवाब स्वयं दर्शाता है कि अपीलकर्ता अपने कर्तव्यों का निर्वहन अपेक्षित स्तर पर नहीं कर रही थी। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता का दायित्व केवल परिवार से सूचना मिलने का इंतजार करना नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से क्षेत्र में गर्भवती महिलाओं की पहचान और निगरानी करना है। खंडपीठ ने कहा कि जब सेवाओं में इतनी गंभीर कमी सामने आई और कारण बताओ नोटिस देने के बाद ही संविदात्मक नियुक्ति समाप्त की गई, तो इस कार्रवाई में कोई कानूनी त्रुटि नहीं मानी जा सकती। इसी आधार पर अदालत ने अपील को खारिज करते हुए सेवा समाप्ति के आदेश को बरकरार रखा।

दिल्ली में हर घर में स्मोक डिटेक्टर और स्प्रिंकलर अनिवार्य करने की सिफारिश

नई दिल्ली राजधानी दिल्ली में आग की बढ़ती घटनाओं पर काबू पाने के लिए दिल्ली फायर डिपार्टमेंट ने हर घर में स्मोक डिटेक्टर, वॉटर स्प्रिंकलर लगाना अनिवार्य करने की सिफारिश की है। विभाग का मानना है कि अगर ऐसा होता है तो आग से हो रही मौतों पर 97 फीसदी तक काबू पाया जा सकता है। फायर डिपार्टमेंट ने आग से निपटने के लिए अगले 25 साल की तैयारियों के लिए मास्टर प्लान भी तैयार कर लिया है। विवेक विहार की घटना के बाद सीएम ने खुद संभाली थी कमान फायर विभाग के सूत्रों की मानें तो अगले एक-दो दिन में इसे होम डिपार्टमेंट के पास भेज दिया जाएगा। बता दें कि विवेक विहार की घटना के बाद सीएम रेखा गुप्ता ने विभागों के साथ बैठक कर आग से निपटने के लिए फायर मास्टर प्लान बनाने का निर्देश दिया था। फायर डिपार्टमेंट की माने तो अगर यह दावा लागू हुआ तो 97 फीसदी तक मौत का आंकड़ा घट जाएगा। दिल्ली के चीफ फायर ऑफिसर ए. के. मलिक के मुताबिक एक-दो दिन में इस मास्टर प्लान को होम डिपार्टमेट के पास भेज दिया जाएगा और मालवीय नगर जैसी घटनाओं में आग से होने वाली मौत को रोकने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे। उसी को लेकर हमने सरकार को कुछ सिफारिशें भेजी हैं, जिससे आग से हो रही मौतों में 97 फीसदी की कमी लाई जा सकती है। दिल्ली के हर घर में स्मोक डिटेक्टर, वॉटर स्प्रिंकलर अनिवार्य करने पर जोर इसके लिए सबसे पहले हर घर में स्मोक डिटेक्टर, वॉटर स्प्रिंकलर अनिवार्य करने के साथ-साथ विल्डिंग में सीढ़ियों के आस-पास बिजली के मीटर लगाने और बिल्डिंग के बेसमेंट या स्टिल्ट पार्किंग में एग्जिट गेट के पास EV चार्जिग पॉइंट पर रोक लगानी होगी। उन्होंने कहा कि ज्यादातर आग की घटनाएं बिजली मीटर के या EV चार्जिंग पॉइंट के साथ हो रही है। इससे आग लगने के बाद लोग बाहर नहीं निकल पाते है। उन्होंने कहा कि पहले से बने घरों में स्मोक डिटेक्टर लगाने के लिए सरकार को प्रोत्साहित करने के लिए भी योजना लानी चाहिए। स्मोक डिटेक्टर, वॉटर स्प्रिंकलर हो तो लोग आग फैलने से पहले खुद को बचा सकते हैं। इससे कैजुएलटी पर काबू पाया जा सकता है। दिल्ली में अभी आग से हर साल करीब 100 लोगों की मौत हो जाती है। इस साल ही जनवरी से जून में अब तक 66 से अधिक लोगों की आग के कारण मौत हो चुकी है।  

बिहार राजनीति में हलचल: सम्राट चौधरी की सीमांचल यात्रा से बढ़ा सियासी तापमान

 पूर्णिया  भाजपा की अगुवाई में बिहार में बनी पहली सरकार के मुखिया की यह पहली सीमांचल यात्रा है। पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे इस इलाके का राजनीतिक समीकरण कुछ अलग है। बड़ी मुस्लिम आबादी फिर बांग्लादेश व नेपाल की सीमा से जुड़ाव से यहां का राजनीतिक गणित अलग है। ऐसे में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की यात्रा की प्रबल संभावना से राजनीतिक गलियारों की नजर भी सजग हो गई है। उनकी यात्रा 16 जून् को प्रस्तावित है। वे सहयोग शिविर के माध्यम आम लोगों को मिल रही राहत को देखने पहुंचेंगे। शिविर का उद्देश्य धरातल पर कितना सफल हो रहा है, इसका फीडबैक वे लेंगे। उनकी यह यात्रा धमदाहा प्रखंडके रंगपुरा दक्षिण पंचायत से शुरू होगी। धमदाहा विधानसभा क्षेत्र से लगातार छह जीत दर्ज करने वाली बिहार सरकार की मंत्री लेशी सिंह के चुनाव प्रचार के दौरान के भी उनका आगमन हुआ था। मुख्यमंत्री ने क्षेत्र में उनके विकास की सराहना भी की थी। इस यात्रा से एक बड़ा संदेश भी देना है। मुख्यमंत्री की डायरी में भी विकास ही प्राथमिकता है। सीमांचल विधानसभा चुनाव के पूर्व से ही केंद्र सरकार की प्राथमिकता में रहा है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह यहां तीन दिवसीय प्रवास पर रहे थे। देश की सुरक्षा के लिए भी यह इलाका अहम है और केंद्र की मंशा को जमीन पर उतारने की प्रतिबद्धता भी। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा चुनाव से पूर्व ही इलाके में आयोजित सभा के दौरान अगले मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी का नाम बता चुके थे। यह राजग के राजनीतिक समीकरण को साधने की कला भी थी। निश्चित रूप से सीमांचल में पूर्व मुख्यमंत्री की छवि विकास पुरुष के रूप में थी। सामाजिक समीकरणों को साध राजग की लगातार बड़ी जीत में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। राजनीति की उसी ट्रैक में उनकी भी गाड़ी बढ़ सकती है, यह संभावना पहले से बनी हुई है। प्रशासनिक अमला अपनी तैयारी में है। सहयोग शिविर के मायने की झलक जमीन पर दिखे, यह प्रयास किया जा रहा है। आम लोग भी उत्साहित हैं। इस शिविर के माध्यम उनकी ऐसी समस्याओं के समाधान की उम्मीद बढ़ी है, जिनके लिए वे सरकारी दफ्तर की दौड़ लगा रहे थे। कार्यकर्ता मुख्यमंत्री में देखते हैं पूर्व मुख्यमंत्री की छवि: आशीष कुमार बब्बू जदयू के प्रदेश महासचिव आशीष कुमार बब्बू ने कहा कि मुख्यमंत्री के धमदाहा आगमन की संभावना बनी है। यह एक सरकारी कार्यक्रम है। निश्चित रूप से उनके आने की सूचना से कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह है। कार्यक्रम सरकारी है और इसलिए उनका शेड्यूल तय होगा। इन स्थितियों के बीच राजग कार्यकर्ताओं में उनके आने की सूचना मात्र से काफी उत्साह है। कार्यकर्ता मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की छवि देखते हैं। मुख्यमंत्री का एक मात्र उद्देश्य बिना विभेद क्षेत्र के साथ-साथ जन-जन का कल्याण है। धमदाहा इलाके से उनका पुराना नाता रहा है। कई घरों में उनका पूर्व से आना-जाना रहा है। बिहार सरकार की मंत्री लेशी सिंह से भी पारिवारिक रिश्ता रहा है। धमदाहा से उनकी यात्रा की शुरुआत से जदयू के साथ-साथ भाजपा, लोजपा आर, रालोसपा सहित हर घटक दल के कार्यकर्ताओं का उत्साह चरम पर है।

कोचिंग संस्थानों को शिक्षा मंत्री की चेतावनी, खान सर-रौशन आनंद विवाद के बीच दिया बड़ा संदेश

जमुई. पटना के चर्चित कोचिंग संचालक खान सर और रौशन आनंद के बीच उपजे हालिया विवाद पर बिहार सरकार ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। इस मामले पर सूबे के शिक्षा मंत्री मिथलेश कुमार तिवारी ने बड़ा बयान देते हुए दो टूक कहा है कि कोचिंग संस्थान सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई के लिए होते हैं, लड़ाई-झगड़े और व्यक्तिगत वर्चस्व की जंग के लिए नहीं। जमुई पहुंचे शिक्षा मंत्री ने कोचिंग संस्कृति में आ रहे इस भटकाव पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कुछ कोचिंग संचालक अपने मुख्य उद्देश्य यानी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के रास्ते से पूरी तरह भटक चुके हैं। वे पढ़ाई छोड़ विवाद और गुटबाजी की राह पर चल पड़े हैं, जिसे सरकार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी। कोचिंग संस्थानों को दी चेतावनी शिक्षा मंत्री ने बताया कि इस पूरे मामले को सरकार ने बेहद गंभीरता से लिया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के स्पष्ट निर्देश पर ऐसे विवादों में संलिप्त लोगों के खिलाफ कड़ा एक्शन लिया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि भविष्य में भी अगर कोई कोचिंग संचालक इस तरह की अमर्यादित हरकत में शामिल पाया गया, तो उसके खिलाफ कठोरतम कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। "शिक्षा के मंदिरों को राजनीति, व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता और शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा नहीं बनने दिया जाएगा। सरकार छात्रों के भविष्य और उनके हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। कोचिंग सेंटरों का काम छात्रों का भविष्य संवारना मंत्री ने स्पष्ट किया कि बिहार सरकार राज्य की शिक्षा व्यवस्था को अनुशासित, पारदर्शी और बेहतर बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। कोचिंग सेंटरों को यह समझना होगा कि उनका काम छात्रों का भविष्य संवारना है, न कि कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी करना। उन्होंने भरोसा दिलाया कि छात्रों के हित में सरकार आगे भी ऐसे सख्त और आवश्यक कदम उठाती रहेगी।

सफेद, ब्राउन या रेड राइस: सेहत के लिए कौन सा चावल सबसे बेहतर?

भारत के लगभग हर घर में चावल के बिना लंच या डिनर अधूरा रहता है और इसके लिए लोग चावल को किसी न किसी रूप में अपने खाने में शामिल करते हैं. लेकिन जब बात हेल्थ की आती है तो अक्सर लोग कंफ्यूज हो जाते हैं कि सफेद, ब्राउन या रेड राइस में से कौन सा ऑप्शंस चुनें. कोई सफेद चावल को ब्लड शुगर बढ़ाने वाला मानता है तो कोई ब्राउन राइस को अच्छा मानते हैं. इसके साथ ही मार्केट में रेड राइस का भी ट्रेंड जोरों पर है. तो आइए आज हम आपको बताते हैं कि सेहत के लिए कौन सा चावल अधिक फायदेमंद है. प्रोसेसिंग से बदल जाती है न्यूट्रिशन वैल्यू न्यूट्रिशनिस्ट डॉक्टर सीमा गुलाटी के अनुसार, इन तीनों ही चावलों की अपनी खासियत और न्यूट्रिशन वैल्यू है. सफेद चावल रिफाइन और प्रोसेस किया जाता है जिससे इसकी बाहरी परत पूरी तरह निकल जाती है. इस वजह से चावल में सिर्फ स्टार्च वाला हिस्सा ही बचता है और इसके विपरीत ब्राउन राइस में केवल ऊपरी छिलका हटाया जाता है जिससे इसके न्यूट्रिएंट्स और फाइबर बरकरार रहते हैं. वहीं रेड राइस में भी उसकी बाहरी परत बनी रहती है जिसके कारण इसमें फाइबर की मात्रा बहुत अच्छी होती है. शुगर स्पाइक और कैलोरी सफेद चावल में फाइबर कम होने के कारण इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स अधिक होता है इसलिए यह शरीर में ग्लूकोज लेवल को तुरंत बढ़ा देता है. यही वजह है कि राजमा-चावल या बिरयानी खाने के बाद अचानक सुस्ती आने लगती है. दूसरी ओर ब्राउन और रेड राइस स्लो बर्न फूड हैं जो धीरे-धीरे एनर्जी रिलीज करते हैं और शुगर को कंट्रोल में रखते हैं. वैसे 100 ग्राम पके हुए सफेद चावल में करीब 130 कैलोरी होती है जबकि ब्राउन और रेड राइस में लगभग 110 कैलोरी होती है. न्यूट्रिएंट्स के मामले में कौन सा चावल बेस्ट? सफेद, ब्राउन और रेड राइस तीनों ही वैरायटी मैग्नीशियम, पोटेशियम और आयरन से भरपूर होते हैं. हेल्थशॉर्ट की रिपोर्ट के अनुसार, रेड राइस में मौजूद एंथोसायनिन नाम का एंटीऑक्सीडेंट इसे खास लाल रंग देता है जो हार्ट हेल्थ को बेहतर बनाने और सूजन को कम करने में मदद करता है. WebMD का कहना है कि लाल चावल में मौजूद कंपाउंड बुरे कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने और ब्लड सर्कुलेशन को सुधारने में मदद करते हैं. हालांकि, सफेद चावल भी पूरी तरह खराब नहीं है और यह पचाने में सबसे आसान होता है. कौन सा चावल खाएं? अगर आपको डायबिटीज या इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या नहीं है और आप आसानी से पचने वाला खाना चाहते हैं तो लिमिट में सफेद चावल खा सकते हैं. लेकिन यदि आपका गोल ज्यादा फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स वाले चावल खाना हैा तो ब्राउन या रेड राइस बेहतर ऑप्शंस हैं. यदि घर में केवल सफेद चावल ही बनता है तो प्लेट को बैलेंस करने के लिए उसमें फाइबर से भरपूर सब्जियां और दाल की मात्रा बढ़ा दें.

पटियाला में बीमारी फैलने की आशंका, 16 लोगों में लक्षण मिले, स्वास्थ्य विभाग अलर्ट

पटियाला. पटियाला में पीलिया (हैपेटाइटिस-ए) के फैलने का मामला सामने आया है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अब तक 5 मामले पॉजीटिव पाए गए हैं, जबकि 16 संदिग्ध मामलों की पहचान की गई है। कार्यकारी सिविल सर्जन डॉ. कुशलदीप गिल ने बताया कि ये मामला सरहिंदी गेट के निकट स्थित डोगरा मोहल्ला क्षेत्र से सामने आए हैं। इस इलाके की आबादी 1,119 है, जो 243 घरों में निवास करती है। 10 जून को आई.डी.एस.पी. लैबोरेटरी, माता कौशल्या अस्पताल, पटियाला से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार डोगरा मोहल्ला के 2 मरीजों में हैपेटाइटिस-ए और एक मरीज में हैपेटाइटिस-ई की पुष्टि हुई है। इसके अलावा 2 और मरीजों की पुष्टि हुई है। डॉ. गिल ने बताया कि अब तक पीलिया के 16 संदिग्ध मामले सामने आए हैं। प्रभावित लोगों की आयु 4 वर्ष से 48 वर्ष के बीच है। प्रारंभिक जांच में यह संक्रमण दूषित पानी के माध्यम से फैलने की आशंका जताई गई है। उन्होंने बताया कि फिलहाल 5 मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं। कल शाम पांच एच-2-एस पानी के नमूने जांच के लिए एकत्र किए गए थे और आज पांच अन्य नमूने लेकर सरकारी प्रयोगशाला, खरड़ भेजे गए हैं। प्रभावित मरीजों से कल चार रक्त नमूने लिए गए थे, जिनमें से 3 हैपेटाइटिस-ए पॉजीटिव पाए गए। आज चार और रक्त नमूने एकत्र किए गए हैं, जिनकी जांच कल की जाएगी।

शिक्षा, संस्कार और सपनों की उड़ान ही बच्चों का अधिकार: अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस पर मंत्री राजवाड़े

रायपुर. अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने कहा कि प्रत्येक बच्चे को सुरक्षित, सम्मानजनक और खुशहाल बचपन प्रदान करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। बाल श्रम बच्चों के अधिकारों का हनन है, जो उनके शिक्षा, स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास के अवसरों को छीन लेता है। मंत्री राजवाड़े ने कहा कि बच्चे देश का भविष्य हैं। उनके हाथों में किताबें, खेल और रचनात्मक अवसर होने चाहिए, न कि श्रम का बोझ। किसी भी बच्चे से मजदूरी कराना उसके सपनों और संभावनाओं को सीमित करने के समान है। बाल श्रम केवल सामाजिक बुराई ही नहीं, बल्कि कानूनन दंडनीय अपराध भी है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा और संरक्षण का अधिकार दिलाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। बाल श्रम, बाल तस्करी और बच्चों के शोषण जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जा रही है। लेकिन इस अभियान को सफल बनाने के लिए समाज के प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। राजवाड़े ने नागरिकों से आह्वान किया कि यदि किसी बच्चे से अवैध रूप से कार्य कराया जा रहा हो, उसे शिक्षा से वंचित रखा जा रहा हो अथवा उसके साथ किसी प्रकार का शोषण या दुर्व्यवहार हो रहा हो, तो इसकी सूचना तत्काल पुलिस, चाइल्ड हेल्पलाइन 1098, महिला एवं बाल विकास विभाग या स्थानीय प्रशासन को दें। उन्होंने कहा कि एक संवेदनशील और जागरूक समाज ही बच्चों को सुरक्षित बचपन और उज्ज्वल भविष्य दे सकता है। आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि किसी भी बच्चे का बचपन श्रम में नहीं, बल्कि शिक्षा, सुरक्षा और अवसरों के साथ विकसित हो, ताकि वे अपने सपनों को साकार कर देश और समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।