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मोदी कैबिनेट विस्तार को लेकर अटकलें तेज, नौकरशाहों को अहम मंत्रालय मिलने की संभावना

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रस्तावित कैबिनेट विस्तार की चर्चाएं जोरों पर हैं। इस विस्तार में अनुभवी सेवानिवृत्त नौकरशाहों को अहम जिम्मेदारियां मिलने की अटकलें है। सूत्रों का कहना है कि ‘परफॉर्मेंस’ और ‘लॉयल्टी’ के फॉर्मूले पर खरे उतरने वाले अफसरों को पीएम मोदी जल्दी रिटायर नहीं होने देते। ऐसे में कुछ बड़े अधिकारियों के नाम मंत्रिमंडल फेरबदल में शामिल हो सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में शक्तिकांत दास और तपन डेका जैसे आला अधिकारियों के नाम हैं। इनके अलावा भी कुछ अधिकारी महत्वपूर्ण स्थानों पर नजर आ सकते हैं। पूर्ववर्ती सरकारों में भी कभी-कभी ऐसे प्रयोग हुए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में यह व्यवस्थागत रूप ले चुकी है। सेवानिवृत्त अधिकारियों को सेवा विस्तार मिलना सामान्य हो गया है और वे विभिन्न मंत्रालयों तथा सरकार संचालन में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यह मॉडल न केवल प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करता है, बल्कि बड़े सुधारों को गति देने और संकट प्रबंधन में भी सहायक सिद्ध हो रहा है। सरकारों को यह होता है लाभ: दशकों का प्रशासनिक अनुभव, जटिल नीतियों की गहरी समझ, संस्थागत स्मृति का संरक्षण, बड़े सुधारों में निरंतरता, संकट के समय अनुभवी नेतृत्व की उपलब्धता और प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन रिटायर लोगों को जिम्मेदारी देने की बड़ी वजह बताई जाती है। मोदी सरकार का जोर अनुभव, निष्ठा और परिणाम पर रहा है। फाइल क्लियरेंस, प्रोजेक्ट डिलीवरी, खर्च प्रबंधन की दक्षता और शिकायत निवारण जैसे पैमानों पर अधिकारियों को स्कोर कार्ड दिए जा रहे हैं। हालांकि, इस मॉडल की आलोचना भी होती है। आलोचकों का कहना है कि अत्यधिक सेवा विस्तार से नए अधिकारियों के पदोन्नति के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। भारत ही नहीं कई देशों में भी यह प्रयोग यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है। सिंगापुर में स्थायी सचिव सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी कंपनियों और नीति आयोगों का नेतृत्व करते हैं। अमेरिका में जेम्स मैटिस और लॉयड ऑस्टिन (सेवानिवृत्त जनरल) रक्षा मंत्री बने। जेनेट येलेन (पूर्व फेड चेयर) वित्त मंत्री बनीं। जेरोम पॉवेल केंद्रीय बैंक का नेतृत्व कर रहे हैं। पूर्व अधिकारी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल, थिंक टैंक और विशेष दूत के रूप में कार्य करते हैं। ब्रिटेन में सेवानिवृत्त वरिष्ठ सिविल सेवकों को हाउस ऑफ लॉर्ड्स, सार्वजनिक आयोगों और नियामक संस्थाओं में नियुक्त करना सामान्य है। मार्क सेडविल सेवानिवृत्ति के बाद विभिन्न संस्थानों में रणनीतिक भूमिकाएं निभा चुके हैं। फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों स्वयं उच्च सिविल सेवा से आए। जापान में अमकुदरी (स्वर्ग से अवतरण) परंपरा के तहत वरिष्ठ नौकरशाह सेवानिवृत्ति के बाद निजी कंपनियों में नेतृत्व करते हैं।

E20 Fuel Survey: आधे से ज्यादा कार मालिक असंतुष्ट, 66% बोले- माइलेज पर पड़ा बुरा असर

 नई दिल्ली कहते हैं बदलाव की कीमत चुकानी पड़ती है. लेकिन जब कीमत हर बार आम आदमी की जेब से ही निकले, तो सवाल उठना तय है. सरकार E20 पेट्रोल के फायदे गिना रही है, उधर पुराने पेट्रोल वाहन चलाने वाले लोग घटते माइलेज और बढ़ते रिपेयर बिल का हिसाब लगा रहे हैं. अब एक बड़े सर्वे ने इस बहस को और हवा दे दी है. सर्वे में 53 प्रतिशत लोगों ने E20 लागू करने के तरीके पर नाराजगी जताई, 66 प्रतिशत ने माइलेज गिरने की शिकायत की और 45 प्रतिशत ने कहा कि गाड़ी का मेंटेनेंस पहले से ज्यादा महंगा हो गया है।  लोकल सर्किल्स (LocalCircles) के सर्वे में देश के 316 जिलों के 22,567 पेट्रोल वाहन मालिकों ने हिस्सा लिया. सर्वे के अनुसार 53 प्रतिशत लोगों ने सड़क परिवहन मंत्रालय और पेट्रोलियम मंत्रालय की E20 पेट्रोल लागू करने की प्रक्रिया को या तो "बेहद खराब" या "असरहीन" बताया. इनमें 42 प्रतिशत लोगों ने इसे "बेहद खराब" करार दिया, जबकि सिर्फ 13 प्रतिशत लोगों ने इस पहल को थोड़ी अच्छी रेटिंग दी।  10% घटा माइलेज सर्वे में सबसे बड़ी चिंता 2023 से पहले बनी पेट्रोल गाड़ियों को लेकर सामने आई. ऐसे वाहन मालिकों में 66 प्रतिशत लोगों का कहना है कि E20 पेट्रोल आने के बाद उनकी गाड़ी का माइलेज 10 प्रतिशत से ज्यादा कम हो गया है. वहीं 45 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनकी गाड़ियों के कंपोनेंट में समस्या बढ़ी है और मरम्मत पर पहले के मुकाबले ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।  इस सर्वे में यह भी सामने आया है कि, लोग इथेनॉल ब्लेंडिंग का पूरी तरह विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्हें अपनी जरूरत के हिसाब से विकल्प चाहिए. 2023 से पहले बनी पेट्रोल गाड़ियों के करीब 31 प्रतिशत मालिकों ने कहा कि अगर E0 या E10 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाए तो वे E20 से महंगा होने पर भी उसे खरीदना पसंद करेंगे. इससे साफ है कि पुराने वाहन मालिक कम इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल के लिए रेडी हैं, भले ही इसके लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़े।  सरकार E20 के फायदे गिना रही है दूसरी ओर केंद्र सरकार लगातार इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम का बचाव कर रही है. सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम होगी, प्रदूषण घटेगा, एनर्जी सिक्योरिटी मजबूत होगी और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी. बीते दिनों सरकार ने दिग्गज वाहन निर्माताओं के अधिकारियों का एक पूरा पैनल बठाया था. जिसमें सभी कंपनियों ने एक सुर में इथेनॉल के फायदे गिनाए थे।  सर्वे में कहा गया है कि भारत की सड़कों पर अभी भी बड़ी संख्या में ऐसी पेट्रोल गाड़ियां चल रही हैं जिन्हें कम इथेनॉल वाले फ्यूल को ध्यान में रखकर बनाया गया था. अप्रैल 2023 से पहले बनी ज्यादातर गाड़ियां E10 पेट्रोल के लिए डिजाइन की गई थीं, जबकि अप्रैल 2025 के बाद बनने वाले नए मॉडल पूरी तरह E20 कम्पलायंट माने जाते हैं. ऐसे में पुराने वाहन मालिकों को माइलेज और मेंटेनेंस से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।  अपग्रेड करना भी आसान नहीं रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर पुरानी गाड़ियों को E20 कम्पलायंट बनाना हो, तो फ्यूल सिस्टम के ऐसे कई पार्ट बदलने पड़ सकते हैं जो ज्यादा इथेनॉल को लंबे समय तक सहन नहीं कर पाते. इससे वाहन मालिकों का खर्च और बढ़ सकता है. हाल ही में इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) के डायरेक्टर जनरल दीपक बलानी ने आजतक से ख़ास बातचीत में बताया कि, एक ख़ास तरह की फ्लेक्स-फ्यूल कन्वर्जन किट की टेस्टिंग की गई है. जिसके नतीजे काफी हद तक पुरानी बीएस4 और बीएस6 कारों के लिए सकारात्मक रहे हैं।  दीपक बलानी ने ये भी बताया कि, इस कन्वर्जन किट की टेस्टिंग रिपोर्ट सरकार को भेज दी गई है. हालांकि इसे इंपोर्ट कर के लाया गया था तो इसकी कीमत 50,000 रुपये है. लेकिन अगर इसे स्थानीय स्तर पर डेवलप किया जाता है तो इसकी कीमत तकरीबन 20,000 रुपये तक हो सकती है. ISMA ने इस किट को मारुति डिजायर कार में टेस्ट किया था।  कैसे किया गया सर्वे लोकलसर्किल्स का यह सर्वे देश के 316 जिलों के 22,567 पेट्रोल वाहन मालिकों के बीच किया गया. इसमें 69 प्रतिशत पुरुष और 31 प्रतिशत महिलाओं ने हिस्सा लिया. करीब 46 प्रतिशत लोग टियर-1 जिलों से, 32 प्रतिशत टियर-2 जिलों से और बाकी 22 प्रतिशत टियर-3, टियर-4, टियर-5 और ग्रामीण इलाकों से थे. लोकल सर्किल्स के अनुसार सर्वे में शामिल सभी लोग उसके प्लेटफॉर्म के रजिस्टर्ड और सर्टिफाइड यूजर थे। 

Apple Crisis in Himachal: 40% तक घट सकता है सेब उत्पादन, जानें कौन बन रहा ₹5000 करोड़ के कारोबार का सबसे बड़ा ‘खलनायक’

 नई दिल्ली एक कहावत है कि 'रोज एक सेब खाएं और डॉक्टर को दूर भगाएं', लेकिन अब लग रहा है कि डॉक्टर को भगाने के लिए सेब ही नहीं बचेंगे. ये हम नहीं कह रहे, बल्कि रिपोर्ट्स में अधिकारियों के हवाले से ये डराने वाले अनुमान जाहिर किए जा रहे हैं. सेब के उत्पादन के लिए सबसे बड़ा खलनायक बन रहा है मौसम का मिजाज, जिसके चलते हिमाचल प्रदेश में इस साल सेब उत्पादन में 40 फीसदी की बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है।  Apple इकोनॉमी खतरे में है बिजनेस टुडे पर छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हिमाचल प्रदेश की 5,000 करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था (Apple Economy) इस समय अभूतपूर्व जलवायु संकट का सामना कर रही है. मौसम की अनियमितता के चलते इस साल सेब उत्पादन में लगभग 40% की गिरावट आने की आशंका है और ये सेब की फसल पर निर्भर जिससे इस फसल पर निर्भर करीब  25 लाख किसान परिवारों की आजीविका पर संकट मंडरा रहा है।  अधिकारियों को सता रही चिंता हिमाचल प्रदेश राज्य के बागवानी अधिकारियों ने अनुमान जाहिक करते हुए कहा कि राज्य में सेब का उत्पादन 2025 में 6.99 लाख मीट्रिक टन से घटकर 2026 में लगभग 4.36 लाख मीट्रिक टन (लगभग 2.15 करोड़ बक्से) रह जाएगा, यानी 2.63 लाख मीट्रिक टन की गिरावट आएगी. इसके साथ ही इसी अनुपात में सेब अर्थव्यवस्था में भी गिरावट देखने को मिल सकती है।  सेब उत्पादन में इस बड़ी गिरावट को लेकर अधिकारियों ने कारण बताते हुए कहा कि सर्दियों में अपर्याप्त हिमपात, बेमौसम  बारिश, लगातार ओलावृष्टि और तापमान में अनियमित उतार-चढ़ाव से ये हालात पैदा हुए हैं. बागवानों की मानें, तो मौसम ने उत्पादन लागत बढ़ाने और पैदावार घटाने की चुनौतियां पैदा कर दी हैं. दूसरी ओर कीटनाशक दवाओं और मशीनरी समेत अन्य एग्रीकल्चर उपकरणों की कीमतों में बढ़ोतरी ने उनका बोझ बढ़ा दिया है।  किसानों ने सरकार से लगाई गुहार राज्य के भारी भरकम 5000 करोड़ रुपये के करीब के सेब कारोबार पर संकट बढ़ता देख, किसानों ने सरकार से मदद की गुहार लगाई है. उन्होंने फसल बीमा योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने का आग्रह किया है, ताकि नुकसान की भरपाई में मदद मिल सके।  मौसम का बदलता मिजाज न सिर्फ राज्य की इकोनॉमी, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी मुसीबत माना जा रहा है, इसका प्रभाव सिर्फ सेब तक ही सीमित नहीं है. तमाम एक्सपर्ट शेयर बाजार पर भी मौसम के प्रभाव का अनुमान जता रहे हैं।  मौसम बनता जा रहा खलनायक? बीते कुछ महीनों में कच्चे तेल की कीमतों ने महंगाई का जोखिम बढ़ाया था, लेकिन अब अमेरिका-ईरान में बात बनते ही तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लगातार गिरावट देखने को मिली है. बीते दिनों आई एक रिपोर्ट में तेल सस्ता होने के बाद अब एक्सपर्ट भी मानते नजर आए थे कि मौसम इकोनॉमी के लिए खलनायक बनता जा रहा है।  इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट डॉ. मनोरंजन शर्मा ने कहा था कि आज देश में महंगाई का सबसे बड़ा जोखिम तेल नहीं, बल्कि मानसून है. कमजोर मानसून अब भारत के लिए कच्चे तेल की तुलना में महंगाई का बड़ा खतरा पैदा कर रहा है, क्योंकि देश में महंगाई की कैलकुलेशन में Fuel Price से कहीं ज्यादा खाद्य पदार्थों का रोल रहता है और भारत की करीब आधी एग्रीकल्चर लैंड बारिश पर निर्भर है, इसमें अनियमितता से अनाज, दालों, सब्जियों, फलों और तिलहन के प्रोडक्शन में कमी आ सकती है, जिससे महंगाई दर में तेज इजाफा हो सकता है और घरेलू बजट गड़बड़ा सकता है। 

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026: 300 स्पेशल ट्रेनों का ऐलान, लाखों श्रद्धालुओं को मिलेगी राहत

भुवनेश्वर  रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ओडिशा के पुरी में 16 जुलाई से शुरू होने वाले भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के लिए 300 से ज़्यादा विशेष ट्रेनें चलाने की घोषणा की है। ओडिशा के एक दिवसीय दौरे पर पहुंचे श्री वैष्णव ने भगवान जगन्नाथ की आगामी रथ यात्रा को लेकर रेलवे की ओर से की गयीं तैयारियों का जायज़ा लिया और अधिकारियों को श्रद्धालुओं की यात्रा को सुखद और आरामदायक बनाने को लेकर निर्देश दिया। गौरतलब है कि भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को 16 जुलाई से शुरू होगी और 24 जुलाई को सम्पन्न होगी। इस दौरान उन्होंने पुरी-कोरापुट एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस ट्रेन के परिचालन से ओडिशा के आंतरिक हिस्से में रेल सम्पर्क मजबूत होगा। इसके साथ ही उन्होंने ओडिशा और गुजरात के बीच चलने वाली ब्रह्मपुर-उधना अमृत भारत एक्सप्रेस (रोज़ाना चलने वाली) को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। रेल मंत्री ने बताया कि इस साल रथ यात्रा के लिए 300 से ज़्यादा स्पेशल ट्रेनें चलाने की योजना है। ये ट्रेनें नियमित रूप से चलने वाली 800 से ज़्यादा ट्रेनों के अलावा होंगी। उन्होंने कहा, " केरल में इस साल ओणम के मौके पर हम 100 से ज़्यादा विशेष ट्रेनें चलाएंगे। उन्होंने कहा, "इस साल 30 जून को खत्म हुए गर्मी के मौसम के दौरान रिकॉर्ड 15,000 विशेष ट्रेनें चलाई गयीं। जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए 300 से ज़्यादा विशेष ट्रेनें चलाई जाएंगी। केरल में ओणम के लिए 100 से ज़्यादा विशेष ट्रेनें चलाई जाएंगी। रेलवे, केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोशिश है कि हमारे नागरिकों को सस्ती और सुरक्षित यात्रा की सुविधा मिलें।" श्री वैष्णव ने आज नांदेड़-मुंबई और टनकपुर-नांदेड़ एक्सप्रेस ट्रेनों को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। उन्होंने कहा, "आज उत्तराखंड के टनकपुर से हजूर साहिब, नांदेड़ के लिए एक नई ट्रेन सेवा शुरू की गई है। तराई क्षेत्र में रहने वाले हमारे सिख भाई-बहनों की लगातार मांग थी। आज वाशिम और हिंगोली होते हुए नांदेड़ को मुंबई से जोड़ने वाली एक ट्रेन सेवा भी शुरू की गयी है, जिससे विदर्भ और मराठवाड़ा के कई ज़िलों का मुंबई से सम्पर्क बेहतर होगा। पीलीभीत, आगरा और टनकपुर को जोड़ने वाली कुछ ट्रेन सेवाएँ भी शुरू की गयी हैं।"

इस्लामी दुनिया में बढ़ी खाई? खामेनेई के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचे 3 प्रमुख मुस्लिम देश, चर्चा तेज

तेहरान  यह एक ऐसा दृश्य था, जिसकी ओर पूरी मुस्लिम उम्मा की निगाहें टिकी थीं. ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में दुनिया भर से प्रतिनिधिमंडल पहुंचे. भारत के केंद्रीय मंत्री पहुंचे. चीन ने अपना विशेष दूत भेजा, रूस की ओर से वरिष्ठ प्रतिनिधि मौजूद रहे, तुर्की के उपराष्ट्रपति तेहरान पहुंचे, पाकिस्तान का तो पूरा कुनबा ही वहां था. मध्य एशिया के कई देशों ने भी शिरकत की. लेकिन इस भीड़ में तीन नामों की अनुपस्थिति सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी. ये तीन देश थे- संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और कुवैत।  ये तीनों देश न केवल मुस्लिम बहुल राष्ट्र हैं, बल्कि खाड़ी क्षेत्र की राजनीति और अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ भी हैं. विशुद्ध इस्लामिक देश होने के बावजूद इन 3 देशों ने आखिर मुस्लिम दुनिया के एक बड़े चेहरे को श्रद्धांजलि देने के लिए अपना प्रतिनिधिमंडल नहीं भेजा? लेकिन क्यों? वो भी तब जब दुनिया के कई देश तेहरान में मौजूद थे।  ये वो सवाल है जिसमें गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल  (GCC) की राजनीति, खाड़ी में मुस्लिम देशों के बीच की प्रतिद्वंद्विता और आपसी टकराव की कहानी छिपी है।  तीन कट्टर मुस्लिम देशों ने खामेनेई को नहीं दी श्रद्धांजलि GCC की स्थापना 25 मई 1981 को हुई थी. इसके कुल 6 सदस्य देश हैं. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान. इसकी स्थापना का उद्देश्य मुस्लिम उम्मा समेत पूरी दुनिया में ईरान के बढ़ते प्रभाव को कम करना था. यहां यह भी जानना जरूरी है कि  बहरीन को छोड़कर GCC के सभी 5 देश सुन्नी बहुल हैं, जब ईरान शिया बहुल इस्लामिक राष्ट्र् है. इसलिए भी इनके बीच प्रतियोगिता चलती रहती है।  बहरीन की कहानी थोड़ी अलग है. यह देश है तो शिया बहुल लेकिन यहां शासन सुन्नी अल खलीफा परिवार के पास है. इसलिए बहरीन का ईरान से तनाव रहता है. बहरीन की सुन्नी राजशाही लंबे समय से ईरान पर देश के शिया समुदाय को प्रभावित करने का आरोप लगाती रही है।   वहीं UAE और ईरान के बीच अबू मूसा तथा टुंब द्वीपों को लेकर पुराना क्षेत्रीय विवाद मौजूद है. कुवैत के संबंध अपेक्षाकृत संतुलित रहे हैं, लेकिन उसने भी हमेशा ईरान के साथ एक सावधानीपूर्ण दूरी बनाए रखी है।  लंबे समय तक ईरान और GCC के बीच संबंध अविश्वास, प्रतिस्पर्धा और धार्मिक वैचारिक टकराव से प्रभावित रहे. ईरान खुद को क्षेत्रीय शक्ति मानता है, जबकि खाड़ी देशों को अक्सर लगता रहा है कि तेहरान अपनी क्रांतिकारी विचारधारा और क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिए अरब दुनिया में प्रभाव बढ़ाना चाहता है।  हाल के ईरान-अमेरिका इजरायल युद्ध के दौरान ईरान ने GCC के इन सभी 6 देशों पर अपने शाहेद ड्रोनों से तबाही मचा दी. तुलनात्मक रूप से ताकतवर माने जाने वाले सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पर भी ईरान ने हमले किए. ईरान के इन हमलों के दौरान खाड़ी के देश असहाय और मजबूर बने रहे।  सबसे ज्यादा नुकसान UAE, कतर, कुवैत, बहरीन को हुआ. ईरान ने सऊदी में भी बम गिराकर उसकी औकात बता दी. ओमान को सीमित नुकसान हुआ।  UAE, बहरीन और कुवैत क्यों गायब रहे? अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में UAE, बहरीन और कुवैत की अनुपस्थिति महज एक प्रोटोकॉल संबंधी फैसला नहीं थी, बल्कि यह खाड़ी क्षेत्र की जटिल कूटनीति का संकेत भी थी. ऐसा करके UAE, बहरीन, कुवैत ने ईरान के हमले के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई है।  जंग में ईरान ने इन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और रणनीतिक परिसंपत्तियों को निशाना बनाया था. इससे इन देशों की सुरक्षा चिंताएं और बढ़ गईं. UAE की विदेश नीति अब "सुरक्षा पहले" पर आधारित है. अबू धाबी ईरान को क्षेत्रीय खतरा मानता है और अपनी सुरक्षा के लिए इजरायल, अमेरिका के साथ सैन्य-आर्थिक गठबंधन मजबूत कर रहा है।  बहरीन लंबे समय से ईरान पर अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाता रहा है. बहरीन में अमेरिका का नौसैनिक अड्डा है, इसलिए उसका झुकाव भी अमेरिका की ओर है।  कुवैत के संबंध अपेक्षाकृत संतुलित हैं, लेकिन वह भी ईरान के प्रति सतर्क नीति अपनाता है. इन तीनों देशों के लिए अमेरिका सुरक्षा का प्रमुख साझेदार है, इसलिए तेहरान में उच्च-स्तरीय उपस्थिति एक गलत राजनीतिक संदेश दे सकती थी।  ईरान ने इस अनुपस्थिति को "अमेरिकी दबाव" से जोड़ा. तस्नीम न्यूज एजेंसी ने दावा किया कि अमेरिका ने कई अरब देशों पर दबाव डाला. UAE, बहरीन और कुवैत ने इसे खारिज नहीं किया, लेकिन चुप्पी साध ली।  अगर इन हमलों के बावजूद UAE अपना प्रतिनिधिमंडल तेहरान भेजता तो इससे संयुक्त अरब अमीरात की घरेलू राजनीति में गलत संदेश जाता. इससे ऐसा लगता कि UAE ईरान के सामने झुक गया है, इसलिए ईरानी हमले झेलने के बावजूद ईरानी नेता को श्रद्धांजलि देने को विवश है. यहां बात सुन्नी और शिया विचारधाराओं के टकराव की भी बात थी. इसे सुन्नी आबादी की बहुलता वाले UAE को शिया बहुल ईरान के सामने झुकने के तौर पर देखा जाता।  सऊदी अरब, कतर और ओमान ने क्यों भेजे प्रतिनिधि? सऊदी अरब, कतर और ओमान ने ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के जनाजे में आधिकारिक प्रतिनिधि भेजकर क्षेत्रीय कूटनीति का नया संकेत दिया है.  सऊदी अरब ने उपविदेश मंत्री वलीद अल खुरैजी के नेतृत्व में डेलिगेशन भेजा. सऊदी प्रतिनिधिमंडल की ओर से खामेनेई को श्रद्धांजलि की तस्वीरें पूरी दुनिया में देखी गईं. इसे दुनिया के कट्टर सुन्नी राष्ट्र द्वारा एक शिया देश को बराबरी का मान्यता देने जैसा था. वो भी तब जब ईरान ने इस जंग में सऊदी अरब पर ड्रोन बरसाए।  लेकिन सऊदी द्वारा इस अपमान को भूलाकर तेहरान अपने प्रतिनिधि को भेजना इस बात को दर्शाता है कि रियाद ईरान के साथ तनाव कम करना चाहता है. जनाजा में भागीदारी "संवाद" की नीति को मजबूत करती है, जबकि इजरायल के साथ संबंधों को संतुलित रखती है. ईरान में अपना प्रतिनिधिमंडल भेजकर सऊदी ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया है और हो सकता है कि ऐसा करते हुए सऊदी ने अमेरिका की नाराजगी भी मोल ली हो।  कतर लंबे समय से ईरान के साथ व्यावहारिक और संतुलित संबंध बनाए हुए है, कतर का रोल इस समय एक मध्यस्थ की तरह है. हालांकि ईरान ने उस पर भी हमले किए थे. बावजूद कतर ने इसे ज्यादा तवज्जो न … Read more

cSupply Boost: मोदी सरकार का बड़ा दांव, रसोई गैस की उपलब्धता बढ़ाने को लिया अहम फैसला

नई दिल्ली भारत सरकार अब रसोई गैस (LPG) की सप्लाई को और सुरक्षित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश की सरकारी तेल कंपनियां अब अमेरिका (US) से एलपीजी की खरीद को मौजूदा स्तर से लगभग दोगुना करने की तैयारी में हैं। इसका मुख्य उद्देश्य गल्फ देशों (मध्य पूर्व) पर निर्भरता कम करना और भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट के दौरान देश में गैस की कमी न होने देना है। आइए जरा विस्तार से इसकी डिटेल्स जानते हैं। फिलहाल, भारत हर साल अमेरिका से करीब 22 लाख टन (2.2 मिलियन टन) एलपीजी खरीदता है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार अब इस मात्रा को लगभग दोगुना करने पर विचार कर रही है। इसके साथ ही भारत अल्जीरिया जैसे अन्य देशों से भी एलपीजी आयात बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है, ताकि गैस सप्लाई के लिए किसी एक क्षेत्र पर अधिक निर्भर न रहना पड़े। दरअसल, इस साल पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़े तनाव और ईरान-इजरायल-अमेरिका से जुड़े घटनाक्रम के दौरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले कई एलपीजी जहाज प्रभावित हुए थे। उस समय भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता रसोई गैस की उपलब्धता थी। ऐसे मुश्किल समय में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा वैकल्पिक एलपीजी सप्लायर बनकर सामने आया और उसने लगातार गैस की आपूर्ति जारी रखी। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि कच्चे तेल (Crude Oil) की उपलब्धता को लेकर उतनी चिंता नहीं थी, लेकिन एलपीजी की सप्लाई प्रभावित होने का खतरा काफी बड़ा था। दुनिया में गल्फ देशों के अलावा बहुत कम देश बड़े पैमाने पर एलपीजी का उत्पादन करते हैं। ऐसे में अमेरिका से अतिरिक्त सप्लाई मिलने से भारत को काफी राहत मिली। अब सरकार सिर्फ आयात बढ़ाने तक सीमित नहीं रहना चाहती। पेट्रोलियम मंत्रालय ने तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को 30 दिनों का स्ट्रेटजिक LPG रिजर्व (Strategic Reserve) तैयार करने की योजना पर काम करने को कहा है। इसका मतलब है कि यदि भविष्य में किसी कारण से आयात कुछ समय के लिए रुक भी जाए, तब भी देश में कम से कम 30 दिनों तक रसोई गैस की सप्लाई बिना किसी परेशानी के जारी रखी जा सके। यह नया स्ट्रेटजिक रिजर्व पहले से मौजूद 45 दिनों के सामान्य स्टॉक के अतिरिक्त होगा, जिसे तेल कंपनियां घरेलू और कमर्शियल गैस सिलेंडरों की मांग पूरी करने के लिए हमेशा बनाए रखती हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2025 में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 8% से भी कम थी। लेकिन, नवंबर 2025 में हुए एक साल के समझौते के बाद तस्वीर तेजी से बदल गई। जनवरी 2026 में यह हिस्सा बढ़कर 12% हुआ, फरवरी में 13% पहुंचा और पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के बाद मार्च में यह 37% तक पहुंच गया। अप्रैल में अमेरिका की हिस्सेदारी 40% मई में 55% और जून में रिकॉर्ड 65% तक पहुंच गई। इसका मतलब है कि अब भारत की एलपीजी जरूरतों को पूरा करने में अमेरिका की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। इसके अलावा भारत ने अर्जेंटीना, नाइजीरिया और मलेशिया जैसे देशों से भी गैस खरीदकर अपनी सप्लाई चेन को मजबूत किया है। एक्सपर्ट का मानना है कि सप्लाई के सोर्स में विविधता लाने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। अगर भविष्य में फिर से किसी क्षेत्र में युद्ध, राजनीतिक तनाव या समुद्री मार्ग बाधित होता है, तो देश को रसोई गैस की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। साथ ही अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ने से भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध भी और मजबूत हो सकते हैं। सरकार का यह कदम सिर्फ गैस खरीद बढ़ाने का फैसला नहीं है, बल्कि यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक तैयारी और आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा और दूरदर्शी कदम माना जा रहा है।  

NATO समिट से पहले रूस का ताबड़तोड़ अटैक, 68 मिसाइल और 351 ड्रोन बरसाए; यूक्रेन में 14 लोगों की मौत

कीव  यूक्रेन एक बार फिर रूसी से हमले से दहला उठा है। राजधानी कीव पर ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन हमले में कम से कम 14 लोगों की मौत हो गई। इस घटना में 46 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हं। कीव इलाके के सैन्य प्रशासन के प्रमुख तिमुर तकाचेंको ने इस घटना की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि रूसी हमलों में कम से कम 14 लोगों की मौत हो गई और 46 लोग घायल हुए हैं, जिनमें पांच बच्चे शामिल हैं। आपातकालीन सेवाओं ने बताया कि शहर के विभिन्न इलाकों में तीन और लोगों की मौत हुई है। तकाचेंको ने टेलीग्राम पर लिखा कि 20 से अधिक जगहों पर बचाव अभियान चल रहे हैं। वहीं, मेयर विटाली क्लिट्स्को ने बताया कि रूसी बैलिस्टिक मिसाइलों ने कई इमारतों को क्षतिग्रस्त किया, अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में आग लग गई और गोदामों तथा गैरेज वर्कशॉप को नुकसान पहुंचा। सुबह तक तीन बड़ी इमारतें आंशिक रूप से ढह गईं। बचावकर्मी मलबे में फंसे लोगों को निकालने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि हेलीकॉप्टर नदी से पानी लेकर आग बुझाने की कोशिश की जा रही है नाटो शिखर सम्मेलन से ठीक पहले हमला बता दें कि ये हमले तुर्की में होने वाले नाटो शिखर सम्मेलन से महज पहले हुए हैं, जहां यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की उम्मीद है। हमलों से कुछ घंटे पहले जेलेंस्की ने चेतावनी दी थी कि गुरुवार के हमले (जिसमें 30 लोग मारे गए) के बाद रूस एक और बड़ा हमला करने की तैयारी कर रहा है। रूस ने दागीं 68 मिसाइलें और 351 ड्रोन यूक्रेन की वायु सेना के अनुसार, रूस ने 23 बैलिस्टिक मिसाइलें, छह सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों सहित कुल 68 मिसाइलें तथा 351 ड्रोन दागे। यूक्रेनी वायु रक्षा ने 37 मिसाइलों और 326 ड्रोनों को नष्ट या निष्क्रिय कर दिया, लेकिन बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों में से कोई भी रोक नहीं पाई। इस हमले के बाद जेलेंस्की ने पश्चिमी देशों से पैट्रियट मिसाइल इंटरसेप्टर सिस्टम की और मांग की है, जिसे वे बैलिस्टिक मिसाइलों के खिलाफ एकमात्र प्रभावी सुरक्षा मानते हैं। क्या बोला रूस? दूसरी ओर रूस के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की है कि उसने हवा, जमीन और समुद्र से लॉन्च किए गए लंबी दूरी के सटीक हथियारों और ड्रोनों से हमला किया। मॉस्को का दावा है कि उसने कीव समेत यूक्रेन के कई इलाकों में सैन्य, ऊर्जा और रक्षा औद्योगिक सुविधाओं को निशाना बनाया। बता दें कि यह हमला कीव पर हाल ही में हुए सबसे घातक हमले के महज कुछ दिनों बाद हुआ है, जिसमें 31 लोग मारे गए थे। इस सप्ताह तुर्की के अंकारा में नाटो शिखर सम्मेलन होना है, जहां ट्रंप जेलेंस्की से मुलाकात के अलावा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी बातचीत कर सकते हैं। यूक्रेन का जवाबी हमला रात भर यूक्रेन ने भी रूस के अंदर ड्रोन हमले किए। रॉयटर्स के अनुसार, यूक्रेनी ड्रोनों ने बाल्टिक सागर के वायसोटस्क और उस्त-लुगा बंदरगाहों को नुकसान पहुंचाया, जो रूस का प्रमुख तेल निर्यात टर्मिनल है। क्रीमिया के सेवस्तोपोल में अस्थायी रूप से बिजली आपूर्ति ठप हो गई। रूस ने इन हमलों को यूक्रेन के हालिया हमलों का जवाब बताया, जबकि यूक्रेन का आरोप है कि रूस जानबूझकर नागरिक इलाकों को निशाना बना रहा है।

EC ने जारी किया कार्यक्रम, WB की 3 राज्यसभा सीटों पर 24 जुलाई को उपचुनाव; इस्तीफों के बाद खाली हुई थीं सीटें

कोलकाता पश्चिम बंगाल से राज्यसभा की तीन खाली सीटों के लिए उपचुनाव का ऐलान कर दिया गया है. ये सीटें सांसद सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे के बाद खाली हुई थीं।  इन तीनों सीटों पर 24 जुलाई 2026 (शुक्रवार) को सुबह 9:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक मतदान होगा. ये उपचुनाव राज्यसभा की तीन आकस्मिक सीटों को भरने के लिए कराए जाएंगे।  कब हुआ था इस्तीफा? तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले सुखेंदु शेखर रॉय ने सबसे पहले 8 जून को राज्यसभा की सदस्यता और टीएमसी, दोनों से इस्तीफा दिया था. अपने इस्तीफे में उन्होंने पार्टी में कथित भ्रष्टाचार, महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा और ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाए. उन्होंने आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना का भी जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है, जबकि विवादों में रहे लोगों को आगे बढ़ाया जा रहा है।  इसके दो दिन बाद, 10 जून को सुष्मिता देव ने भी टीएमसी छोड़ने का ऐलान कर दिया. इस्तीफा देने के तुरंत बाद उन्होंने दिल्ली में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गईं कि वह बीजेपी का दामन थाम सकती हैं और पार्टी उन्हें असम से राज्यसभा भेज सकती है।  भाजपा की झोली में जा सकती है तीनों सीट तृणमूल कांग्रेस के तीन राज्यसभा सांसदों ने कुछ दिनों पहले ही अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. चुनाव आयोग ने बताया है कि 24 जुलाई को इन तीनों सीटों के लिए चुनाव होंगे और उसी दिन नतीजे भी आ जाएंगे. इस बात की पूरी उम्मीद है कि जिन तीन सांसदों ने इस्तीफा दिया उन्हीं को अब भारतीय जनता पार्टी अपना उम्मीदवार बना सकती है और अपने विधायकों की संख्या के आधार पर उसके तीनों उम्मीदवार आसानी से जीत भी सकते हैं।  तीनों पूर्व सांसदों को उम्मीदवार बनाने की चर्चा इस्तीफा देने वाले नेताओं में सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक के नाम शामिल हैं. अभी तक ये तीनों नेता बीजेपी में शामिल तो नहीं हुए हैं, लेकिन इस्तीफा देने के तुरंत बाद से ही ये नेता बीजेपी नेताओं से मिलते नजर आए हैं. ये लोग खुलकर बीजेपी की तारीफ भी करने लगे हैं. इनमें से सुखेंदु शेखर रे और प्रकाश चिक बड़ाईक वाली सीटों का कार्यकाल मार्च 2029 और सुष्मिता देव वाली सीट का कार्यकाल अप्रैल 2030 तक है. इन तीनों ने जून के महीने में अपनी सदस्यता से इस्तीफा देने के साथ ही टीएमसी का साथ भी छोड़ दिया था।  अकेले दम पर 117 के आंकड़े तक पहुंचेगी बीजेपी  सुष्मिता और प्रकाश दोनों ही बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. संभावना है कि दोनों को ही बीजेपी अपना कैंडिडेट बनाए. तीन जीतों के बाद बीजेपी की राज्यसभा में संख्या बढ़कर 117 हो जाएगी।  मॉनसून सत्र में कई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक ला सकती है सरकार. पश्चिम बंगाल में तीनों सीटों पर जीत के बाद राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के नजदीक पहुंच जाएगी एनडीए. वहीं, बीजेपी के इतिहास में राज्यसभा में यह सर्वाधिक संख्या होगी. बीजेपी अपने बूते ही राज्य सभा में सामान्य बहुमत के नजदीक पहुंच जाएगी. गौरतलब है कि पिछले चालीस साल में किसी भी दल को राज्यसभा में अपने बूते बहुमत नहीं मिला है. पूर्व पीएम राजीव गांधी के कार्यकाल में कांग्रेस को इससे पहले थी राज्य सभा में सबसे अधिक सीटें थीं।  चुनाव आयोग 7 जुलाई को राज्यसभा उपचुनाव का नोटिफिकेशन जारी करेगा. नामांकन करने की अंतिम तारीख 14 जुलाई होगी. नामांकन पत्रों की जांच 15 जुलाई को होगी. 17 जुलाई तक नामांकन वापस लिया जा सकेगा. 24 जुलाई को वोटिंग होगी. सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक वोटिंग होगी. 25 जुलाई को ही शाम 5 बजे काउंटिंग होगी. 27 जुलाई तक चुनाव की पूरी प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। 

इंडोनेशिया दौरे पर PM मोदी का शानदार स्वागत, आसमान में फाइटर जेट्स ने दी सलामी

जकार्ता  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन देशों की यात्रा के पहले चरण में इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता पहुंचे हैं। इस दौरान पीएम मोदी का भव्य स्वागत किया गया। इंडोनेशियाई वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने पीएम मोदी के एयरक्राफ्ट को एस्कॉर्ट किया। इसके बाद एयरपोर्ट पहुंचने पर इंडोनेशियाई राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो ने प्रोटोकॉल तोड़ पीएम मोदी का स्वागत किया। इंडोनेशिया में पीएम मोदी का कार्यक्रम जानें प्रधानमंत्री मोदी इंडोनेशिया में 6 से लेकर 8 जुलाई तक रहेंगे। इस दौरान वह दोनों देशों के बूीच कई क्षेत्रों में साझेदारी को गहरा करने पर जोर देंगे। इसके अलावा, भारतीय समुदाय के लोगों से भी मुलाकात करेंगे। पीएम मोदी के इंडोनेशिया यात्रा के कई उद्देश्य हैं। रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना: पीएम मोदी की इस यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना है। यह प्रधानमंत्री का चौथा दौरा होगा और मई 2018 में व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर पहुंचने के बाद पहली द्विपक्षीय यात्रा होगी। भारत-इंडोनेशिया रक्षा संबंध होंगे मजबूत भारत के रक्षा और सुरक्षा सहयोग में उच्च स्तरीय दौरा, नियमित द्विपक्षीय और बहुपक्षीय एक्सरसाइज और रक्षा उद्योग में गहरे सहयोग (ब्रह्मोस की बिक्री सहित) के जरिए तेजी आई है और इसका दायरा भी बढ़ा है। समुद्री पड़ोसी होने के नाते, दोनों देशों ने 2018 में हिंद-प्रशांत में भारत-इंडोनेशिया समुद्री सहयोग के साझा दृष्टिकोण को अपनाया। आईएफसी-आईओआर में एक इंडोनेशियन लाइजन ऑफिसर की तैनाती से हमारी मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस को और बढ़ावा मिलेगा। भारत एनडीए और डीएसएससी में इंडोनेशियन कैडेट्स और ऑफिसर्स के लिए स्लॉट भी तय करेगा, जिससे रक्षा के क्षेत्र में कैपेसिटी बिल्डिंग बढ़ेगी। व्यापार और निवेश पर भी बनेगी बात इस यात्रा का उद्देश्य व्यापार और निवेश के जरिए विकास को बढ़ावा देना है। विकसित भारत 2047 और एमास (गोल्डन) इंडोनेशिया 2045 के डेवलपमेंट विजन के बीच मजबूत तालमेल है। इंडोनेशिया, आसियान क्षेत्र में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बनकर उभरा है, जिसका 2025-26 में द्विपक्षीय व्यापार 24.78 बिलियन अमेरिकी डॉलर होगा। इंडोनेशिया में अलग-अलग क्षेत्रों में 130 से ज्यादा भारतीय कंपनियों ने निवेश किया है। सांस्कृतिक कार्यक्रम का उठाया लुत्फ हवाई अड्डे पर औपचारिक स्वागत और गॉर्ड ऑफ ऑनर के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां आयोजित एक विशेष पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी अवलोकन किया. इस कार्यक्रम के जरिए इंडोनेशिया की समृद्ध संस्कृति और भारत के साथ उसके सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंधों की झलक पेश की गई।  PM मोदी ने ट्वीट कर क्या कहा? पीएम मोदी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, ''जकार्ता पहुंच गया हूं। राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो के स्नेहपूर्ण व्यवहार से मैं बहुत प्रभावित हुआ। उन्होंने एयरपोर्ट पर पर व्यक्तिगत रूप से मेरा स्वागत किया। 2018 में, हमने दोनों देशों के संबंधों को 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' के स्तर तक पहुंचाया, जिससे हमारे लोगों को बहुत लाभ हुआ है। इस यात्रा के दौरान, राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और मैं विभिन्न क्षेत्रों में इस साझेदारी को और गति देने के उद्देश्य से चर्चा करेंगे।' आगे उन्होंने लिखा है, ''राष्ट्रपति प्राबोवो और मैं योग्याकार्ता में प्रम्बानन मंदिर परिसर का भी दौरा करेंगे। यह यात्रा हमारे दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को और भी मजबूत करेगी। इंडोनेशिया में रहने के दौरान, मैं भारतीय समुदाय के साथ बातचीत करने के अवसर का भी बेसब्री से इंतजार कर रहा हू।' सबसे बड़े हिंदू मंदिर जाएंगे पीएम मोदी पीएम मोदी इंडोनेशिया में 6 से लेकर 8 जुलाई तक रहेंगे। इस दौरान वह इंडोनेशिया के सबसे बड़े हिंदू मंदिर प्रम्बानन जाएंगे। 9वीं शताब्दी में बना यह मंदिर भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित है और यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। इसके अलावा वह भारतीय समुदाय के लोगों से भी मुलाकात करेंगे। पीएम मोदी के इंडोनेशिया यात्रा के कई उद्देश्य हैं। पीएम मोदी की इस यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना है।  85% मुस्लिम फिर भी नोट पर छपी भगवान गणेश की तस्वीर वहीं, आपको बता दें कि इंडोनेशिया दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है, लेकिन वहां की सांस्कृतिक विरासत पर हिंदू-बौद्ध सभ्यता की गहरी छाप आज भी दिखाई देती है। इंडोनेशिया में रामलीला का मंचन होता है और इस देश की मुद्रा पर भगवान गणेश की तस्वीर भी छप चुकी है। 6 से 8 जुलाई तक इंडोनेशिया की यात्रा पर रहेंगे पीएम मोदी राष्ट्रपति प्राबोवो सुबियांतो के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी 6 से 8 जुलाई तक इंडोनेशिया की यात्रा रहेंगे. पीएम मोदी ने कहा, ‘‘2018 में मेरी पहली इंडोनेशिया यात्रा के दौरान भारत और इंडोनेशिया ने द्विपक्षीय संबंधों को ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक बढ़ाया था.’’ प्रधानमंत्री ने कहा कि द्विपक्षीय संबंधों के इस स्तर पर पहुंचने के बाद यह उनकी पहली द्विपक्षीय यात्रा है और यह जनवरी 2025 में गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर राष्ट्रपति प्राबोवो की भारत यात्रा के बाद हो रही है।  इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड की यात्रा पर हैं पीएम मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा पर हैं. 11 जुलाई तक तीन देशों की अपनी यात्रा पर रवाना होने से पहले पीएम मोदी ने कहा था- ‘‘पूर्वी और दक्षिणी हिंद महासागर में इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया और उसके बाद न्यूजीलैंड की मेरी यात्रा भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति, ‘महासागर’ दृष्टिकोण और साथ ही स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत के प्रति हमारे नजरिए को और मजबूत करेगी। 

अमरनाथ यात्रा के बीच बड़ा अपडेट! बाबा बर्फानी का शिवलिंग घटकर 1 फीट, मौसम का दिखा असर

श्रीनगर  अमरनाथ यात्रा का आज चौथा दिन है। तीर्थ यात्रियों की संख्या रिकॉर्ड तोड़ रही है। वहीं, इसके बीच एक चिंता बढ़ाने वाली खबर भी है। कहा जा रहा है कि पवित्र शिवलिंग का आकार पिघलकर 1 फीट रह गया है। खास बात है कि जून के अंत में ऊंचाई करीब 7 फीट देखी गई थी। खास बात है कि यह यात्रा 57 दिनों तक चलती है। तेजी से पिघल रहे बाबा बर्फानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमरनाथ में शिवलिंग अब पिघलकर करीब 1 फीट बचे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, 23 मई को ऊंचाई 7 फीट थी, जो 29 जून को 5 फीट पर आ गई थी। अब ताजा तस्वीर में देखा जा रहा है कि शिवलिंग की ऊंचाई घटकर 1 फीट के आसपास रह गई है। खास बात है कि शिवलिंग का निर्माण प्राकृतिक रूप से हर साल होता है, जिसे जियोलॉजी में स्टैलेगमाइट कहा जाता है। कैसे होता है शिवलिंग का निर्माण दरअसल, गुफा के ऊपर चूना पत्थर और जिप्सम दरारों से बर्फ और ग्लेशियर के पिघलने से पानी बहता है। पानी जैसे ही गुफा की जमीन तक पहुंचता है, तो बेहद कम तापमान में यह जमना शुरू कर देता है। ऊपर की ओर जमने के क्रम के बाद एक शिवलिंग का आकार तैयार हो जाता है। श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी अमरनाथ यात्रा के तीसरे दिन रविवार को लगभग 24 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने पवित्र अमरनाथ गुफा में प्राकतिक रूप से निर्मित हिम शिवलिंग के दर्शन किए। इसके साथ ही बीते तीन दिन में दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 60 हजार के आसपास पहुंच गई है। तीन जुलाई से शुरू अमरनाथ यात्रा 28 अगस्त तक जारी रहेगी। जम्मू के भगवती नगर आधार शिविर से 1,211 महिलाओं सहित 5,794 तीर्थयात्रियों का एक नया जत्था सोमवार तड़के अमरनाथ यात्रा के लिए रवाना हुआ। उन्होंने बताया कि पांचवें जत्थे में 21 बच्चे, 599 साधु और 76 साध्वियां शामिल हैं। वे तड़के तीन बजकर 10 मिनट से तीन बजकर 45 मिनट के बीच कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में अलग-अलग काफिलों में आधार शिविर से रवाना हुए। इनमें से 139 वाहनों में सवार 3,490 तीर्थयात्री अनंतनाग जिले के पहलगाम में नुनवान आधार शिविर की ओर जा रहे हैं। जबकि 128 वाहनों में 2,304 तीर्थयात्री गांदरबल जिले के बालटाल आधार शिविर के लिए रवाना हुए हैं। कठिन यात्रा और हजारों किमी की ऊंचाई तीर्थयात्री अनंतनाग जिले के पारंपरिक 48 किलोमीटर लंबे नुनवान-पहलगाम मार्ग और गांदरबल जिले के छोटे लेकिन खड़ी चढ़ाई वाले 14 किलोमीटर के बालटाल मार्ग से एक साथ यात्रा कर रहे हैं। यह गुफा मंदिर दक्षिण हिमालय में 3,880 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यात्रा के लिए वैध परमिट है जरूरी उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शनिवार को अमरनाथ यात्रा पर जाने के इच्छुक सभी तीर्थयात्रियों से अपील की कि वे अपनी तय तारीख के लिए वैध पंजीकरण परमिट मिलने के बाद ही यात्रा करें। उन्होंने कहा कि सिर्फ पंजीकृत यात्रियों को ही तय तारीख पर पवित्र गुफा मंदिर तक जाने की अनुमति दी जाएगी। यह अपील जम्मू-कश्मीर में बिना सही पंजीकरण के बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों के पहुंचने की वजह से की गई है। कड़ी सुरक्षा के बीच हो रही है यात्रा सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करने के लिए कई स्तरों वाला सुरक्षा घेरा, दोनों रास्तों पर नो-फ्लाई जोन, वॉचटावर, कड़ी निगरानी और तीर्थयात्रियों के काफिले की रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाएं की गई हैं। पुलिस ने सभी रजिस्टर्ड सर्विस प्रोवाइडर्स को क्यूआर कोड वाले पहचान पत्र जारी किए हैं, ताकि उनके पहचान पत्रों की तुरंत जांच हो सके और उग्रवादियों को सपोर्ट स्टाफ बनकर घुसने से रोका जा सके। इसके अलावा तीर्थयात्रियों, गाड़ियों और सर्विस देने वालों के लिए आरएफआईडी टैग जारी किए गए हैं ताकि उनकी रियल टाइम ट्रैकिंग की जा सके। साथ ही, सीसीटवी कैमरों का एक बड़ा नेटवर्क दोनों तीर्थ मार्गों पर आवाजाही पर नजर रख रहा है।