samacharsecretary.com

बच्चों के लापता होने की बढ़ती घटनाएँ: सुप्रीम कोर्ट ने कहा—स्थिति बेहद गंभीर

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने देश में बच्चों के लापता होने से संबंधित एक रिपोर्ट पर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। इस पर सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इसे बेहद चिंताजनक बताया। गोद लेने की प्रक्रिया बेहद कठिन – सुप्रीम कोर्ट जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि उन्होंने अखबार में पढ़ा है कि इतनी अधिक संख्या में बच्चे गायब हो जाते हैं, और यदि यह सच है तो स्थिति बेहद गंभीर है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि देश में गोद लेने की प्रक्रिया इतनी कठिन और लंबी है कि लोग इसका अवैध विकल्प खोजने लगते हैं, जो स्थिति को और खराब करता है। केंद्र को 9 दिसंबर तक नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से मौजूद अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने राज्यों में नोडल अधिकारी नियुक्त करने के लिए छह सप्ताह का समय मांगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इतनी लंबी अवधि देने से इंकार कर दिया और 9 दिसंबर तक प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। पहले भी दिए जा चुके हैं निर्देश 14 अक्टूबर को अदालत ने केंद्र सरकार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को लापता बच्चों के मामलों को देखने के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करने का आदेश दिया था। साथ ही, इन अधिकारियों के नाम और संपर्क विवरण 'मिशन वात्सल्य' पोर्टल पर उपलब्ध कराने को भी कहा गया था ताकि किसी बच्चे की गुमशुदगी की जानकारी तुरंत साझा की जा सके। लापता बच्चों के लिए अलग पोर्टल का सुझाव सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र को गृह मंत्रालय के तहत एक विशेष ऑनलाइन पोर्टल बनाने का सुझाव दे चुकी है। अदालत का मानना है कि राज्यों के बीच पर्याप्त समन्वय नहीं होने से बच्चों की तलाश में देरी होती है। एक केंद्रीकृत पोर्टल से यह समस्या काफी हद तक दूर हो सकती है। NGO ने उठाया था मामला यह मामला तब सामने आया जब एनजीओ 'गुरिया स्वयंसेवी संस्थान' ने बच्चों की तस्करी और अपहरण के मामलों में कार्रवाई न होने का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाया। याचिका में बताया गया कि कई राज्यों में बच्चों को अपहरण के बाद बिचौलियों के नेटवर्क के जरिए दूसरे राज्यों में तस्करी किया जा रहा था।  

ट्रंप की आलोचना: अमेरिकियों पर सवाल, चिप उत्पादन तक में असफल

वाशिगटन   अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने एक और बड़ा बयान दिया है. इस बार, उन्‍होंने अमेरिकी इंडस्‍ट्री को चिप मेकिंग्‍स को लेकर खूब खरी-खोटी सुनाई. इसके अलावा, उन्‍होंने एच-1बी प्रवासी श्रमिकों के प्रति अपने समर्थन का बचाव करते हुए भी कहा कि अमेरिकियों को 'माइक्रोचिप बनाना नहीं आता'.  ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका अपने घरेलू सेमीकंडक्‍टर चिप के पुननिर्माण का प्रयास कर रहा है. ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी वर्कफोर्स में सेमीकंडक्‍टर विनिर्माण के लिए आवश्‍यक तकनीक कौशल का अभाव है. यह एक महत्‍वपूर्ण उद्योग है. ट्रंप का दावा है कि इस सेक्‍टर में अमेरिका बड़े स्‍तर पर वापसी करेगा.  ताइवान के कंट्रोल में पूरी इंडस्‍ट्री ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अब ज्‍यादा चिप का निर्माण नहीं करता है, लेकिन अगर आप चिप बनाने जा रहे हैं तो हमें अपने लोगों को चिप बनाने की ट्रेनिंग देनी होगी, क्‍योंकि हमने चिप वाला कारोबार ताइवान के हाथों बहुत ही मूर्खतापूर्ण तरीके से गंवा दिया है.  जल्‍द उबरेगा अमेरिका का चिप मार्केट  ट्रंप ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिकी चिप मार्केट जल्‍द ही उबर जाएगा और उन्‍होंने कुछ और सालों के भीतर घरेलू उत्‍पादन में ग्रोथ का अनुमान लगाया है. हालांकि उन्होंने 2022 चिप्स अधिनियम को खारिज कर दिया, जिसका उद्देश्य अमेरिकी विनिर्माण को बढ़ावा देना था.  चिप बनाने में सबसे आगे होगा अमेरिका  ट्रंप ने कहा कि चिप्‍स एक्‍ट एक आपदा थी. सभी चिप बनाने वाली कंपनियां वापस आ रही हैं और शायद दुनिया में ज्‍यादातर चिप निर्माण अमेरका में ही होगा. ट्रंप का यह बयान उनके रिपब्लिकन सहयोगियों की बढ़ती आलोचना के बीच आया है. ट्रंप के इस बयान के बाद अमेरिका में सियासत गरमा गई है. फ्लोरिडा के गवर्नर डेसेंटिस ने 13 नवंबर को एक पोस्ट कहा कि कांग्रेस में रिपब्लिकन बहुमत में हैं और वे H1B को समाप्त करने के लिए कानून बना सकते हैं. उन्‍होंने कहा कि यहां शब्दों का नहीं, बल्कि कार्यों का महत्व है.   एक और अधिकारी ने कहा कि माइक्रोचिप का आविष्कार करने का श्रेय जिन दो लोगों को दिया जाता है, उसमें जैक किल्बी और रॉबर्ट नॉयस हैं, जो अमेरिकी इंजीनियर थे और अमेरिका की धरती पर काम कर रहे थे. फिर भी ट्रंप को अपनी इंडस्ट्री नजरिए पर पूरा भरोसा है. उन्होंने कहा, 'अच्छी खबर यह है कि सब कुछ वापस आ रहा है। यह तो हमेशा से यहीं होना चाहिए था.'

शादी के नाम पर रेप मामलों पर पूर्व चीफ जस्टिस का बयान: समाज में हैं सीता भी और शूर्पणखा भी

नई दिल्ली पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस यूयू लालित ने एकम न्याय सम्मेलन में पुलिस और न्याय व्यवस्था की खामियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि देश के जांच अधिकारियों को न तो सही पेशेवर उपकरण मिले हैं और न ही जरूरी शिक्षा, जिसके वे हकदार हैं। प्रकाश सिंह मामले के फैसले का जिक्र करते हुए उन्होंने दोहराया कि जांच विंग को कानून-व्यवस्था शाखा से पूरी तरह अलग करना जरूरी है। जस्टिस लालित ने चिंता जताई कि देश में दोषसिद्धि दर कभी 20 प्रतिशत से अधिक नहीं रही। 5 में से 4 विचाराधीन कैदी अंततः बरी हो जाते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हम निर्दोष लोगों को हिरासत में लेकर उनकी जिंदगी बर्बाद नहीं कर रहे? क्या समाज का यह कर्तव्य नहीं कि निर्दोषों को जीवनभर की परेशानी से बचाया जाए और उन्हें कानूनी-नैतिक हक दिलाया जाए? जस्टिस यूयू ललित ने 'एकम' न्याय की अवधारणा को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन और कार्यकर्ता दीपिका नारायण भारद्वाज का नजरिया महिला विरोधी नहीं है। समाज में सीता मैया के साथ-साथ शूर्पणखा भी हैं। इसलिए जांच तंत्र को इस तरह मजबूत करना होगा कि निर्दोषों को अदालत के चक्कर न लगाने पड़ें और वे पूरे मुकदमे से थककर हांफ न जाएं। बलात्कार जैसे मामलों में पीड़िता के बयान को सर्वोच्च सम्मान देने की मौजूदा न्यायिक मान्यता सही है। हालांकि, जस्टिस लालित ने सुझाव दिया कि अगर आरोप झूठा साबित हो तो झूठी शिकायत करने वाले को अलग से दूसरा मुकदमा चलाने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए। ट्रायल कोर्ट का जज खुद ही झूठे मुकदमेबाज को सजा देने का फैसला दर्ज कर सके, ऐसी सुरक्षा व्यवस्था हर स्तर पर होनी चाहिए। 'प्रॉमिस टू मैरी' रेप मामलों पर जताई चिंता पूर्व सीजेआई ललित ने प्रेम संबंधों से उत्पन्न होने वाले 'प्रॉमिस टू मैरी' रेप मामलों पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा, 'कई बार युवक-युवती खुले मन से रिश्ते में आते हैं। बाद में कुछ गलत हो जाता है और एक-दो साल बाद शिकायत आती है कि शादी का झांसा देकर शोषण किया गया। ऐसे मामलों में भी ग्रे एरिया होता है। बिना सोचे-समझे गिरफ्तारी करके व्यक्ति की आजादी छीनना जांच के हित में नहीं होता।' अंत में जस्टिस लालित ने आयोजकों, विशेष रूप से दीपिका नारायण भारद्वाज को बधाई दी। उन्होंने कहा कि एकम न्याय सम्मेलन जैसे मंच समाज की वर्तमान जरूरत हैं। यह अमृत मंथन समाज में सकारात्मक बदलाव लाएगा और न्याय के हित में काम करेगा। उन्होंने सम्मेलन को पूर्ण सफलता की शुभकामनाएं दीं।

याचिका पर भड़का सुप्रीम कोर्ट: क्या हर मामला अब कोर्ट ही निपटाएगा?

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को वकीलों के पहनने वाले बैंड्स से जुड़ी एक याचिका पहुंची। इसमें कहा गया था कि इस्तेमाल के बाद इन बैंड्स के निपटान के लिए एक समान व्यवस्था करने के निर्देश दिए जाएं। खास बात है कि शीर्ष न्यायालय ने याचिका पर विचार से इनकार कर दिया है। साथ ही बेंच ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या अब रुमालों का कैसे उपयोग किया जा रहा है, इसपर भी हम नजर रखें?   याचिकाकर्ता साक्षी विजय ने जनहित याचिका दाखिल की थी। उन्होंने मांग की थी कि इन बैंड्स को इकट्ठा करने और निपटान के लिए एक समान और ईको-फ्रैंडली व्यवस्था बनाई जाए। CJI यानी भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस विनोद चंद्रन की बेंच याचिका पर सुनवाई कर रही थी। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका देख अदालत ने कहा, 'हमारा काम फिर कहां खत्म होगा? इसकी निगरानी करना कि रुमालों का इस्तेमाल कैसे हो रहा है? या गांव में कचरे का किया जा रहा है?… हमें रिट कहां जारी करनी चाहिए।' याचिकाकर्ता जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। याचिका में क्या थी मांग याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्हें कोर्ट के बाहर कचरे के डिब्बे के पास, फुटपाथ के पास सिंथैटिक बैंड्स पड़े मिले थे। इसमें कहा गया है कि हालात पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं और पेशे की गरिमा को दिखाती हैं। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया था कि सफेद बैंड्स के सम्मान के साथ निपटान की कोई नीति नहीं है। साथ ही पर्यावरण के लिहाज से भी मौजूदा हालात पर सवाल उठाए गए थे। …तो 200 साल से ज्यादा समय लगेगा याचिका में कहा गया कि पहले के समय में वकील कॉटन के बैंड्स का इस्तेमाल करते थे, जो धुलकर दोबारा इस्तेमाल किए जा सकते थे। जबकि, मौजूदा स्थिति में बैंड्स सिंथैटिक के हैं और नॉन बायोडिग्रेडेबल हैं। ये 10 रुपये के आते हैं और कई वकील एक बार के इस्तेमाल के बाद इन्हें फेंक देते हैं। याचिका में कहा गया कि ऐसे हजारों बैंड्स रोज फेंके जा रहे हैं, जिन्हें डिकम्पोज होने में 200 साल से ज्यादा का समय लगेगा। याचिका में पर्यावरण (सुरक्षा) कानून, 1986 का हवाला दिया गया था। उनकी मांग की थी कि भारतीय बार काउंसिल और संबंधित सरकारी मंत्रालयों को बैंड डिस्पोजल बिन लगाने के निर्देश दिए जाएं।  

मेट्रो स्टेशन पर हड़कंप: पद्मिनी को लेकर आतंकी नाम से आई ब्लास्ट की धमकी

नई दिल्ली  BMRCL यानी बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को एक धमकी भरा ईमेल मिला है। खबर है कि मेल भेजने वाले ने मेट्रो के अधिकारियों को चेतावनी दी है कि उसकी पूर्व पत्नी को तंग न किया जाए। आगे कहा गया है कि अगर बात नहीं मानी गई, तो स्टेशन उड़ा दिया जाएगा। इस अजीबो गरीब धमकी से अधिकारी हैरान हैं। फिलहाल, इसे भेजने वाले की तलाश की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार, धमकी 13 नवंबर को सुबह 11 बजकर 25 मिनट पर मिली थी। इसमें कहा गया था, 'अगर मुझे पता चला कि आपके मेट्रो कर्मचारी मेरी पूर्व में तलाक ले चुकी पत्नी पद्मिनी को ड्यूटी के समय के बाद तंग कर रहे हैं, तो ध्यान रहें आपके एक मेट्रो स्टेशन में धमाका कर दिया जाएगा…। मैं भी कन्नड़ लोगों के खिलाफ देशभक्त जैसा आतंकवादी हूं।' रिपोर्ट के अनुसार, BMRCL के एक बड़े अधिकारी ने इस संबंध में पुलिस शिकायत दर्ज करा दी है। फिलहाल, धमकी देने वाले की पहचान की जा रही है। साथ ही जिस स्थान से मेल किया गया था, उसका पता लगाया जा रहा है। खास बात है कि ये धमकी ऐसे समय पर आई है, जब दिल्ली में लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास हुए धमाके की जांच जारी है। पुलिस लगातार गिरफ्तारियां कर रही हैं। इस घटना के तार हरियाणा के फरीदाबाद में पकड़े गए टेरर मॉड्यूल से जुड़ रहे थे। दिल्ली के स्कूलों को मिली बम की धमकी राष्ट्रीय राजधानी स्थित सीआरपीएफ के दो स्कूलों को मंगलवार सुबह ई-मेल के जरिए बम की धमकी मिली, जो बाद में फर्जी निकली। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी। दिल्ली अग्निशमन सेवा ने बताया कि ये स्कूल प्रशांत विहार और द्वारका में स्थित हैं और बम की धमकी की जानकारी देने वाली कॉल उन्हें सुबह करीब नौ बजे आई। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, 'हमने दोनों स्कूलों की गहन जांच की और कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला। इसे फर्जी घोषित कर दिया गया है।'

तारीफ कम पड़ जाए… बिहार में कांग्रेस की जीत पर INDIA ब्लॉक की तीखी टिप्पणी

मुंबई  BMC यानी बृह्नमुंबई महानगरपालिका चुनाव से पहले महाविकास अघाड़ी में खटपट शुरू हो गई है। उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना (UBT) ने बिहार चुनाव का जिक्र कर कांग्रेस पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि बिहार के चुनाव में राज ठाकरे नहीं थे, तो भी कांग्रेस ने खराब प्रदर्शन किया। खास बात है कि 61 सीटों पर बिहार में चुनाव लड़ रही कांग्रेस 6 पर सिमट गई थी। खास बात है कि शिवसेना (यूबीटी) की तरफ से यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है, जब कुछ दिन पहले ही कांग्रेस ने बीएमसी चुनाव अकेले लड़ने की बात कही है। फिलहाल, चुनाव की तारीख तय नहीं है। बिहार चुनाव प्रदर्शन पर कसा तंज सामना में प्रकाशित संपादकीय के अनुसार, 'कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व ने घोषणा की है कि वह मुंबई महानगरपालिका चुनाव अपने दम पर लड़ेगी। बिहार के नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी में जो आत्मविश्वास पैदा हुआ है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। कांग्रेस एक स्वतंत्र पार्टी है। महाविकास आघाडी में वह एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी है। इसलिए उसे समय-समय पर राष्ट्रीय पार्टी होने का तेवर दिखाना पड़ता है। मुंबई महानगरपालिका चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ने की घोषणा उनका अपना मुद्दा है।' मनसे का नाम लेकर घेरा आगे कहा गया, 'कांग्रेस का कहना है कि शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना एक साथ आ रही हैं। चूंकि मनसे इंडिया गठबंधन या महाविकास आघाडी का हिस्सा नहीं है इसलिए कांग्रेस राज ठाकरे से हाथ नहीं मिला सकती। कांग्रेस को लगता है कि अगर राज ठाकरे साथ आते हैं तो कांग्रेस को झटका लगेगा। बिहार चुनाव में शिवसेना या राज ठाकरे नहीं थे। फिर भी कांग्रेस को दारुण पराजय का सामना करना पड़ा। मुंबईकर कांग्रेसियों का इस बारे में क्या कहना है?' 'सिर्फ कांग्रेस नहीं करती संविधान की चिंता' लेख में कहा गया, 'मुंबई कांग्रेस की नेता सांसद वर्षा गायकवाड कहती हैं, ‘हम देश के संविधान का सम्मान करनेवाला समूह हैं। कुछ दल लगातार मारपीट कर कानून अपने हाथ में लेने की बात करते हैं। यह हमारी संस्कृति के अनुकूल नहीं है।’ श्रीमती गायकवाड ने कांग्रेसी संस्कृति का जो लेखा-जोखा पेश किया है, उसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ कांग्रेस ही संविधान की चिंता करती है और बाकी दल चुप बैठे हैं।' मुस्लिम वोटर दूर होने का दावा शिवसेना (यूबीटी) ने कहा कि चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन में राज ठाकरे भी साथ थे। पार्टी ने सवाल किया कि इसमें वामपंथी दल और कांग्रेस भी साथ थे, 'दरअसल, वामपंथी दल को इस बात से लेकर ज्यादा नाराजगी रहती है। लेकिन उन्हें राज ठाकरे और उनकी पार्टी की भागीदारी पर कोई आपत्ति नहीं दिख रही है। फिर मुंबई के राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं के मन में ‘स्वतंत्र’ विचार क्यों आ रहे हैं?' उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दल का कहना है, 'कांग्रेस को डर है कि उत्तर भारतीय और मुस्लिम मतदाता हमसे दूर हो जाएंगे। मुस्लिम समुदाय ने लोकसभा और विधानसभा में महाविकास आघाडी को वोट दिया। कोरोना काल में उद्धव ठाकरे ने जाति-धर्म की परवाह किए बिना जो मदद की, उसका नतीजा यह हुआ कि मुसलमानों के वोट शिवसेना को मिले और कांग्रेस चाहे जितना भी डरे, मुसलमानों के ये वोट शिवसेना सहित महाविकास के ही पास आते रहेंगे हमें पूरा विश्वास है। कांग्रेस को मुंबई के मुसलमानों और उत्तर भारतीयों की चिंता नहीं करनी चाहिए….।' साथ चुनाव लड़ने की अपील शिवसेना (यूबीटी) के मुताबिक, खैर, आप मुंबई में स्वतंत्र रूप से लड़ेंगे। फिर बाकी सत्ताईस महानगरपालिकाओं का क्या? क्या आप वहां भी ‘एकला चलो रे’ की भूमिका निभाते रहेंगे? ऐसा नहीं लगता। समझदारी इसी में है कि सभी मराठीजन महाराष्ट्र धर्म के रूप में एक साथ आएं और भाजपा के अडानी-शाह के खिलाफ यलगार करें। महाराष्ट्र का हित इसी में है। संयुक्त महाराष्ट्र की लड़ाई में कांग्रेस ने जो किया वो इस बार न करे…।  

शाकाहारी महिला को सैंडविच में झींगा मिलने पर स्विगी और रेस्टोरेंट को ₹1 लाख का जुर्माना

बेंगलुरु बेंगलुरु की 37 वर्षीय निशा (पूरी तरह शाकाहारी ) ने 10 जुलाई 2024 को स्विगी से एक शाकाहारी सैंडविच ऑर्डर किया. लेकिन एक निवाला लेते ही उन्हें अजीब स्वाद आया और अंदर से झींगे के टुकड़े मिले. यह देखकर वे घबरा गईं और उन्हें आध्यात्मिक और भावनात्मक झटका लगा. अगले दिन वे रेस्टोरेंट पहुंचीं. मैनेजर ने गलती मानते हुए इसे भीड़ के समय की गड़बड़ी बताया और बदले में खाना देने की पेशकश की, जिसे निशा ने ठुकरा दिया. निशा ने भेजा कानूनी नोटिस 20 जुलाई को उन्होंने स्विगी और रेस्टोरेंट दोनों को कानूनी नोटिस भेजा, पर कोई जवाब नहीं मिला. इसके बाद 22 अगस्त 2024 को उन्होंने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज की और 2 लाख रुपये का मुआवजा मांगा. स्विगी ने कहा कि वह सिर्फ ऑर्डर कराने का माध्यम है और असली जिम्मेदारी रेस्टोरेंट की है. वहीं, रेस्टोरेंट ने गलती स्वीकार की, लेकिन यह भी कहा कि उनका रेस्टोरेंट दोनों तरह का खाना परोसता है, इसलिए आमतौर पर शाकाहारी लोग वहां से खाना नहीं लेते. आयोग ने अपने फैसले में कहा कि शाकाहारी व्यक्ति को मांसाहारी भोजन देना गंभीर लापरवाही है और इससे व्यक्ति को मानसिक, धार्मिक और भावनात्मक नुकसान हो सकता है. फैसला क्या आया? उपभोक्ता आयोग ने स्विगी और रेस्टोरेंट दोनों को कुल 1,00,000 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. 50,000 रुपये लापरवाही के लिए और 50,000 रुपये मानसिक पीड़ा के लिए और 5,000 रुपये मुकदमेबाजी खर्च के लिए.  इसके बाद 146 रुपये की सैंडविच की कीमत 12% वार्षिक ब्याज के साथ वापस किया गया और कहा गया कि दोनों पक्षों को साझा रूप से यह राशि चुकानी होगी. यह मामला बताता है कि खाने-पीने की सेवाओं में जरा-सी लापरवाही भी उपभोक्ता के अधिकारों का उल्लंघन बन सकती है.

आरक्षण सीमा पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त नसीहत, 50% से ऊपर नहीं होने की दी चेतावनी

नई दिल्ली आरक्षण से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को चुनाव पर रोक तक लगाने की चेतावनी दे दी है। अदालत ने सोमवार को साफ कर दिया है कि स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा की अनुमति नहीं दी जाएगी। खास बात है कि अदालत की तरफ से चेतावनी ऐसे समय पर आई है, जब निकाय चुनाव के लिए दाखिल नामांकन पत्रों की जांच मंगलवार से शुरू हो रही है। जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाला बगची की बेंच सुनवाई कर रही थी। कोर्ट में क्या कहा गया सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने कहा कि कुछ निकाय ऐसे हैं, जहां OBC यानी अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए 27 आरक्षण ने 50 फीसदी की सीमा पार कर दी है। ऐसे में यह सुप्रीम कोर्ट की तरफ से 6 मई को जारी आदेश का उल्लंघन है। सिंह ने कहा कि आदेश में चुनाव आयोग को जुलाई 2022 में आई बांठिया आयोग की रिपोर्ट से पहले के ओबीसी निर्देशों का पालन करने के आदेश दिए गए थे। एडवोकेट सिंह सिंह और नरेंद्र हुड्डा ने दावा किया कि 40 प्रतिशत से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का उल्लंघन किया गया, जबकि कुछ स्थानों पर यह लगभग 70 प्रतिशत है। क्या बोला कोर्ट बेंच ने कहा कि राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव 2022 की जे के बांठिया आयोग की रिपोर्ट से पहले की स्थिति के अनुसार ही कराए जा सकते हैं, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) श्रेणियों में 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई थी। शीर्ष न्यायालय का कहना है कि अब जब बांठिया आयोग की सिफारिशों को राज्य सरकार ने पूरी तरह लागू नहीं किया है, तो स्थानीय निकाय के चुनाव जुलाई 2010 से पहले लागू क्षेत्रों में ओबीसी आरक्षण के हिसाब से होंगे। महाराष्ट्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अनुरोध पर पीठ ने मामले की सुनवाई 19 नवंबर के लिए तय की, लेकिन राज्य सरकार से कहा कि वह 50 प्रतिशत की सीमा से आगे न बढ़े। शीर्ष अदालत ने कहा, 'अगर दलील यह है कि नामांकन शुरू हो गया है और अदालत को अपना काम रोक देना चाहिए, तो हम चुनाव पर रोक लगा देंगे। इस अदालत की शक्तियों का इम्तिहान न लें।' पीठ ने कहा, “हमारा संविधान पीठ द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा को पार करने का कभी इरादा नहीं था। हम दो न्यायाधीशों वाली पीठ में बैठकर ऐसा नहीं कर सकते। बांठिया आयोग की रिपोर्ट अब भी न्यायालय में विचाराधीन है, हमने पहले की स्थिति के अनुसार चुनाव कराने की अनुमति दी थी।” शीर्ष अदालत ने उन याचिकाओं पर भी नोटिस जारी किया, जिनमें आरोप लगाया गया है कि कुछ मामलों में राज्य के स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण 70 प्रतिशत तक पहुंच गया है। महाराष्ट्र में 246 नगर परिषदों और 42 नगर पंचायतों के लिए चुनाव दो दिसंबर को होंगे, जबकि मतगणना तीन दिसंबर को होगी। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 17 नवंबर थी और 18 नवंबर को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी। 21 नवंबर तक नामांकन वापस लिए जा सकेंगे, जबकि चुनाव चिह्न और उम्मीदवारों की सूची 26 नवंबर को प्रकाशित की जाएगी।

शेख हसीना को मौत की सजा पर बांग्लादेश में बवाल, स्थानीय हिंसा में दो लोगों की जान गई

ढाका  बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को पिछले साल हुई हिंसा मामले में मौत की सजा सुनाए जाने के बाद पड़ोसी देश एक बार फिर उबल पड़ा है। न्यायाधिकरण ने पूर्व गृहमंत्री और शेख हसीना को सामूहिक हत्या का दोषी करार दिया था। वहीं अब आवामी लीग के समर्थक सड़कों पर उतर पड़े हैं। ढाका की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। कई जगहों पर पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। स्थानीय मीडिया की बात करें तो हिंसा में अब तक दो लोगों के मारे जाने की खबर है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार को फैसले के बारे में सारी जानकारी थी। इसीलिए ढाका में पहले ही पुलिस और सैन्य बल की तैनाती कर दी गई थी। मोहम्मद यूनुस के आवास की भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है। इसके बावजूद सोमवार को फैसला आने केबाद से ही ढाका की तनाव बढ़ गया है। आवामी लीग का कहना है कि न्यायाधिकरण ने यह फैसला अंतरिम सरकार और सेना के इशारे पर केवल राजनीतिक बदले की भावना से सुनाया है। ऐसे में आवामी लीग ने दो दिन के राष्ट्रव्यापी बंद का आह्वान किया है। शेख हसीना को देश की विशेष अदालत 'अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने पिछले वर्ष जुलाई में हुए व्यापक विद्रोह के दौरान मानवता के विरुद्ध अपराधों के आरोप में मौत की सजा सुनाई थी। न्यायाधिकरण ने पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल को भी मृत्युदंड तथा पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्ला अल मामून को पांच साल की सजा दी है। मामून ने अपराध स्वीकार कर सरकारी गवाह बनने का निर्णय लिया था। न्यायाधिकरण ने हसीना और असदुज्जमां की संपत्तियाँ जब्त करने का आदेश भी दिया है। फैसला उनकी अनुपस्थिति में सुनाया गया क्योंकि शेख हसीना इन दिनों भारत में रह रही हैं। मामून हिरासत में हैं। फैसला आने के तुरंत बाद शेख हसीना ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "यह फैसला राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है और पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है। मैंने कोई आदेश नहीं दिया, न किसी को उकसाया। यदि किसी निष्पक्ष अदालत में साक्ष्यों की ईमानदारी से जांच हो, तो मुझे अपने खिलाफ लगाए गए किसी भी आरोप का सामना करने में कोई डर नहीं है। मुझे न्यायपालिका पर विश्वास है, लेकिन जो प्रक्रिया अपनाई गई, वह न्याय का उल्लंघन है।" अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने कहा कि यह फैसला सिद्ध करता है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है और यह कदम लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि देश को अब कानून, जवाबदेही और भरोसे की नई संरचना तैयार करनी है। फैसला आने के तुरंत बाद शेख हसीना ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "यह फैसला राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है और पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है। मैंने कोई आदेश नहीं दिया, न किसी को उकसाया। यदि किसी निष्पक्ष अदालत में साक्ष्यों की ईमानदारी से जांच हो, तो मुझे अपने खिलाफ लगाए गए किसी भी आरोप का सामना करने में कोई डर नहीं है। मुझे न्यायपालिका पर विश्वास है, लेकिन जो प्रक्रिया अपनाई गई, वह न्याय का उल्लंघन है।" अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने कहा कि यह फैसला सिद्ध करता है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है और यह कदम लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने में मदद करेगा। उन्होंने कहा कि देश को अब कानून, जवाबदेही और भरोसे की नई संरचना तैयार करनी है। बंगलादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत सरकार से शेख हसीना और असदुज्जमां को प्रत्यर्पित करने का औपचारिक अनुरोध भेजने की घोषणा की है। मंत्रालय ने कहा कि मानवता के विरुद्ध दोषी ठहराए गए व्यक्तियों को शरण देना किसी भी देश का गैरदोस्ताना कदम कदम होगा। दोनों देशों के बीच 2016 की प्रत्यर्पण संधि का हवाला दिया गया है। विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने बताया कि प्रत्यर्पण का अनुरोध पत्र ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग या नई दिल्ली स्थित बांग्लादेश उच्चायोग के माध्यम से भेजा जाएगा। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण में शेख हसीना के खिलाफ तीन और मामले लंबित हैं, जिन पर निर्णय अभी बाकी है। जुलाई 2024 में आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी से उपजे छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के कारण हसीना सरकार गिर गयी थी। पाँच अगस्त को वह भारत आ गयीं और प्रोफ़ेसर यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, विद्रोह के दौरान लगभग 1,400 लोग मारे गए। हसीना ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को दिए कई साक्षात्कारों में इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा था कि गोलीबारी "बंगलादेश पुलिस के सामान्य हथियारों जैसी नहीं थी"।

अमित शाह की बैठक के बीच दिल्ली ब्लास्ट जांच में तेजी, 30 स्थानों पर ED और अन्य एजेंसियों की रेड

नई दिल्ली दिल्ली ब्लास्ट और उससे जुड़े फरीदाबाद टेरर मॉड्यूल की जांच में अब केंद्र सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी है. इसी सिलसिले में एक बड़ा कदम उठाते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने हरियाणा के फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क पर औपचारिक रूप से केस दर्ज कर लिया है और शनिवार सुबह से ही देश के तीन राज्यों में बड़े पैमाने पर छापेमारी अभियान चल रहा है. ED के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, मंगलवार सुबह से दिल्ली, हरियाणा के फरीदाबाद और मध्यप्रदेश में कुल 30 लोकेशंस पर एक साथ सर्च ऑपरेशन शुरू किया गया. यह छापेमारी सीधे तौर पर उस नेटवर्क को खंगालने के लिए है जो फरिदाबाद टेरर मॉड्यूल और कथित व्हाइट कॉलर आतंकी फंडिंग के शक के दायरे में आया है. अमित शाह की हाई-लेवल मीटिंग के बाद एक्शन में ED सूत्र बताते हैं कि यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई, बल्कि इसकी पृष्ठभूमि केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक अहम बैठक में तैयार हुई थी. इस बैठक में गृह मंत्री अमित शाह के साथ केंद्रीय खुफिया एजेंसी IB, जांच एजेंसियाँ NIA और ED के शीर्ष अधिकारी मौजूद थे. इस बैठक में दिल्ली ब्लास्ट के बाद सामने आए नए इनपुट्स खासकर टेरर फंडिंग, “व्हाइट कॉलर टेररिज़्म” और मनी लॉन्ड्रिंग रैकेट पर विस्तृत चर्चा हुई थी. इस दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने साफ चेतावनी दी थी कि इस हमले के लिए जिम्मेदार आतंकवादी अगर पाताल में भी छुपे हैं, तो जांच एजेंसियां उन्हें खोज कर निकालेंगी. गृह मंत्री ने बैठक में साफ निर्देश दिया था कि दिल्ली ब्लास्ट से जुड़े हर आर्थिक लिंक की गहराई से जांच की जाए. आतंकी फंडिंग या हवाला नेटवर्क को नहीं छोड़ा जाए. ED और NIA को विशेष अधिकारों के साथ त्वरित और संयुक्त कार्रवाई का “ग्रीन सिग्नल” दिया जाए. इसी मीटिंग के बाद यह तय हो गया था कि टेरर मॉड्यूल की फंडिंग लाइन को तलाशने के लिए ED एक अलग मनी लॉन्ड्रिंग केस दर्ज कर तेज कार्रवाई शुरू करेगी. फरीदाबाद टेरर मॉड्यूल कितना बड़ा? पिछले सप्ताह दिल्ली ब्लास्ट की जांच में यह संकेत मिला था कि मॉड्यूल के तार सिर्फ जमीन पर काम कर रहे आतंकियों से नहीं, बल्कि व्हाइट कॉलर नेक्सस से भी जुड़े हो सकते हैं, जहां शिक्षा संस्थानों, एनजीओ, निजी कारोबारियों और मध्यस्थों के जरिए धन का प्रवाह हो रहा था. इसी शक के बाद एजेंसियों ने अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े लेन-देन, फंड मूवमेंट और संदिग्ध व्यक्तियों की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी. अब जब पर्याप्त इनपुट्स सामने आए, तो ED ने PMLA (मनी लॉन्ड्रिंग कानून) के तहत मामला दर्ज कर छापेमारी शुरू कर दी. अमित शाह की अध्यक्षता वाली हाई-लेवल बैठक के ठीक बाद इतनी बड़ी कार्रवाई से साफ है कि केंद्र सरकार दिल्ली ब्लास्ट को सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं, बल्कि एक संगठित और व्यापक टेरर नेटवर्क की तरह देख रही है. इसी वजह से दिल्ली में धमाका करने वालों के साथ-साथ उन ‘व्हाइट कॉलर’ व्यक्तियों तक पहुंचने की कोशिश है, जो पर्दे के पीछे फंडिंग, लॉजिस्टिक्स और सपोर्ट सिस्टम खड़ा कर रहे थे.