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हिमाचल में भारी बारिश से तबाही, 9 की मौत, 49 सड़कें बंद; भूस्खलन ने बढ़ाई मुश्किलें

 शिमला हिमाचल प्रदेश में मॉनसून जहां राहत लेकर आया है तो वहीं भारी बारिश और भूस्खलन से कई जिलों में जनजीवन प्रभावित है. कई सड़कें बंद हो गई हैं. प्रदेश में अब तक मॉनसून से जुड़े अलग-अलग हादसों में 9 लोगों की मौत हो चुकी है. इस बीच मौसम विभाग (IMD) ने कई जिलों के लिए बारिश का अलर्ट भी जारी किया है।  हिमाचल प्रदेश में 30 जून को मॉनसून ने दस्तक थी. हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्राधिकरण की ओर से जारी एक रिपोर्ट में 30 जून से 2 जून तक कुल 11 लोगों की मौत की जानकारी दी गई है. जिनमें मॉनसून संबंधित घटनाओं में 9 लोगों की जान गई है, जबकि 2 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई है।  मॉनसून में हिमाचल के किन जिलों में हुई मौतें? आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, चंबा में 1, कुल्लू में 1, कांगड़ा में 3, जिला मंडी में 1 और शिमला में 2 लोगों की जान गई है. वहीं, सड़क दुर्घटनाओं में जिला कांगड़ा और लाहौल स्पीति में 1-1 व्यक्ति की जान गई है. इसके साथ ही 30 जून से अब तक मॉनसून में 12 लोग घायल हुए हैं. हिमाचल प्रदेश में मॉनसून की शुरुआत से अब तक 69.65 लाख का नुकसान हुआ है।  हिमाचल में 46 सड़कें बंद, ऑरेंज अलर्ट जारी हिमाचल प्रदेश में मूसलाधार बारिश ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. भारी बारिश के कारण राज्य भर में 46 सड़कें वाहनों के लिए बंद हो गई हैं. मौसम विभाग ने लोगों को सावधान रहने की सलाह दी है।  शिमला मौसम केंद्र ने 5 जुलाई तक भारी से बहुत भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट जारी किया है. हालांकि, 3 जुलाई को हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है. राज्य आपातकालीन संचालन केंद्र (SEOC) के अनुसार, सबसे ज्यादा कुल्लू जिले में 18 सड़कें बंद हैं. मंडी में 15, सिरमौर में 9, लाहौल-स्पीति और ऊना में 2-2 सड़कें बंद हैं।  इसके अलावा बारिश से बिजली और पानी की व्यवस्था भी प्रभावित हुई है. पूरे राज्य में 181 बिजली ट्रांसफार्मर बंद हो गए हैं और 6 पानी की योजनाएं प्रभावित हुई हैं।  सबसे ज्यादा बारिश कहां हुई? पोंटा साहिब में सबसे ज्यादा 100.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है. इसके बाद कसौली में 86 मिमी, धर्मपुर में 83.4 मिमी, जट्टों बैराज में 77 मिमी, धौलाकुआं में 69 मिमी, पचहड़ में 60 मिमी, रामपुर में 53 मिमी, ऊना में 50.4 मिमी, नाहन में 38.3 मिमी, पालमपुर में 37.8 मिमी और धर्मशाला में 34.1 मिमी बारिश हुई है। 

हिंदू युवती होटल में मृत मिली, साथ मौजूद फारूक से पुलिस की पूछताछ; मौत की गुत्थी सुलझाने में जुटी जांच

 हैदराबाद हैदराबाद के लंगर हौज थाना क्षेत्र स्थित एक होटल में 26 साल की युवती की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत का मामला सामने आया है. घटना के बाद इलाके में सनसनी फैल गई. शुरुआती जानकारी के अनुसार, युवती एक परिचित युवक के साथ होटल में ठहरी थी. कुछ घंटों बाद उसकी मौत हो गई, जिसे लेकर अब हत्या और आत्महत्या दोनों पहलुओं से जांच की जा रही है।  मृतका की पहचान अलवाल निवासी 26 साल की रेनुका के रूप में हुई है. पुलिस के अनुसार, रेनुका की पहचान गोलकोंडा निवासी 34 साल के फारूक से थी. दोनों रात लंगर हौज इलाके में स्थित होटल ग्रैंड लॉज पहुंचे और एक कमरा लिया. इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे मामले को रहस्यमय बना दिया।  फारूक ने पुलिस को बताया कि वह कुछ देर के लिए होटल से बाहर गया था. लौटने पर उसने कमरे के अंदर रेनुका को फंदे से लटका हुआ देखा. उसने तत्काल होटल प्रबंधन और पुलिस को इसकी सूचना दी. सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और कमरे का निरीक्षण किया। हालांकि, रेनुका के परिजनों ने फारूक के इस दावे पर सवाल उठाए हैं. उनका आरोप है कि यह आत्महत्या नहीं, बल्कि सुनियोजित हत्या का मामला है. परिजनों ने फारूक की भूमिका पर गंभीर संदेह जताते हुए निष्पक्ष और गहन जांच की मांग की है. उनका कहना है कि पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने लाई जानी चाहिए।  पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है. साथ ही होटल के कमरे से साक्ष्य जुटाए गए हैं और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी खंगाली जा रही है. फारूक को हिरासत में लेकर उससे पूछताछ की जा रही है ताकि घटनाक्रम की कड़ियां स्पष्ट हो सकें।  जांच अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक जांच और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि युवती की मौत आत्महत्या थी या उसके साथ कोई आपराधिक घटना हुई. पुलिस का कहना है कि मामले के हर पहलू की गंभीरता से जांच की जा रही है और साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।   

EPFO Rule Change: PF निकासी की 3 नई कैटेगरी, करोड़ों कर्मचारियों के लिए बदले नियम

 नई दिल्ली कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी (EPFO) ने अपने लगभग आठ करोड़ एक्टिव सदस्यों से संबंधित नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं. इनमें एक सबसे अहम ये है कि 12% पीएफ अंशदान सिर्फ 15,000 रुपये प्रति माह की वेतन सीमा तक ही अनिवार्य है. इससे अधिक अंशदान अब स्वैच्छिक माना जाएगा. इससे कर्मचारियों को यह तय करने के लिए अधिक आजादी मिलेगी कि वे अपनी सैलरी का कितना हिस्सा अपने पीएफ खाते में जमा करना चाहते हैं।  EPFO Rule 2026 में संगठन ने अनिवार्य पीएफ कंट्रीब्यूशन के रूप में 1,800 रुपये की लिमिट को बरकरार रखा है. इसलिए अब 1 लाख रुपये प्रति माह का मूल वेतन पाने वाले कर्मचारी को भी, ईपीएफ के तहत भविष्य निधि में सिर्फ 1,800 रुपये का योगदान देना होगा, जबकि ऐसे कर्मचारी जो रिटायरमेंट के लिए अधिक बचत (Saving) करना चाहते हैं, वे इस अनिवार्य राशि से अधिक योगदान कर सकते हैं, लेकिन इसको स्वैच्छिक माना जाएगा. ये अनिवार्य और अतिरिक्त पीएफ कंट्रीब्यूशन के बीच स्पष्ट अंतर दर्शाएगी।  कम या खत्म कर सकेंगे एक्स्ट्रा कंट्रीब्यूशन बीते कारोबारी दिन नोटिफाई EPF Scheme 2026 के प्रावधानों पर नजर डालें, तो एक कर्मचारी वैधानिक वेतन सीमा से अधिक वेतन पर स्वैच्छिक आधार पर एक्स्ट्रा पीएफ कंट्रीब्यूशन का ऑप्शन चुन सकता है. वहीं एंप्लॉयर चाहे तो स्वैच्छिक अंशदान के बराबर राशि दे सकते हैं, लेकिन ऐसा करना उनके लिए अनिवार्य बिल्कुल भी नहीं है. कर्मचारी और नियोक्ता किसी भी समय एक्स्ट्रा कंट्रीब्यूशन को कम या बंद कर सकते हैं।  पीएफ निकासी कैटेगरी में कटौती पीएफ में जमा पैसों की निकासी के लिए पहले से तय 13 कैटेगरी को अब तीन तक सीमित कर दिया गया है. नई ईपीएफ योजना में केंद्रीय न्यासी बोर्ड यानी CBT द्वारा अक्टूबर में अनुमोदित निकासी सुधारों को भी लागू किया गया है. इन बदलावों का उद्देश्य निकासी प्रक्रिया को और सरल बनाना और सालाना निकासी की संख्या को बढ़ाना है।      Essential Needs: बीमारी, शिक्षा और विवाह     Housing Needs: खरीद, निर्माण और आवास संबंधित अन्य खर्च     Special Circumstances: पहले की तमाम कैटेगरी में शामिल अन्य आपात स्थितियां खाते में रखनी होगी 25% राशि  EPFO सदस्यों को कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के अंशदान सहित अपनी पात्र राशि का 100% तक निकालने की अनुमति होगी. हालांकि, उन्हें खातों में कुल योगदान का कम से कम 25% हिस्सा रखना होगा. इसका उद्देश्य रिटायरमेंट फंड का एक हिस्सा सुरक्षित रखना है. बता दें कि ईपीएफओ की सदस्यता से संबंधित नियमों में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है।  नियोक्ताओं के लिए क्या बदलेगा?  हर नियोक्ता को EPF Scheme 2026 के लागू होने के 15 दिनों के भीतर Form-V में कंसोलिडेटेड रिटर्न डिटेल पेश करनी होगी. रिटर्न में सभी कर्मचारियों का डेटा शामिल होना चाहिए, इनमें आधार कार्ड, पैन कार्ड, UAN नंबर, ग्रॉस वेजेस और ईपीएफ वेजेस शामिल होंगे। 

राम मंदिर और चंद्रशेखर सरकार का अनसुना किस्सा, क्यों कहा जाता है कि राजीव गांधी ने गिरा दी थी सरकार?

 अयोध्या   उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की हलचल है. केंद्र की राजनीति में इंडिया गठबंधन के नाम पर विपक्षी पार्टियां भारी मन से ही सही, लेकिन एकजुट होने का प्रयास कर रही हैं. ऐसे समय में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की नीतियां और उनकी कही बातें एक बार फिर से मौजूं नजर आने लगी हैं. साल 2026 चंद्रशेखर की 100वीं जयंती है, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल ने इस अवसर पर कोई बड़ा आयोजन करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई है।  मौजूदा समय में देश की राजनीति में दो घटनाक्रम सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है. पहला मामला क्षेत्रीय पार्टियों का टूटना और दूसरा राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला. दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों मुद्दों में चंद्रशेखर की भूमिका रही है. 17 अप्रैल, 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्में चंद्रशेखर देश के वो इकलौते नेता हैं जिन्होंने जीवन में कभी भी कोई पद नहीं संभाला, सीधे देश के प्रधानमंत्री बने।  जब इंदिरा गांधी से चंद्रशेखर ने कहा वो कांग्रेस को तोड़ेंगे पहले बात करते हैं छोटी पार्टियों के टूटने की घटना पर. हाल ही में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) में टूट हुई है. याद करा दूं चंद्रशेखर ने भी विश्वनाथ प्रताप सिंह की पार्टी जनता दल के 63 सांसदों को तोड़कर नई पार्टी बनाई थी और कांग्रेस की मदद से प्रधानमंत्री बने थे. उस समय राजीव गांधी की अगुवाई में चल रही कांग्रेस ने ही चंद्रशेखर को प्रधानमंत्री के पद पर बिठाया और बाद में गिरा भी दिया।  राज्य सभा में डिप्टी स्पीकर और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने चंद्रशेखर के जीवन पर किताब लिखी है उसमें, जिक्र है कि 1965 में चंद्रशेखर कांग्रेस में शामिल हुए थे. उनकी भेंट इंदिरा गांधी से हुई. उस समय लाल बहादुर शास्त्री के नेतृत्व में चल रही सरकार में इंदिरा गांधी सूचना और प्रसारण मंत्री थीं. राजीव गांधी ने चंद्रशेख से पूछा कि वह कांग्रेस में क्यों आए हैं. इस पर, उन्होंने जवाब दिया कि वह कांग्रेस को समाजवादी टर्न देना चाहते हैं. इसपर इंदिरा ने पूछा कि अगर वह सफल नहीं हुए तो क्या करेंगे. तभी चंद्रशेखर ने तपाक से जवाब दिया था- ‘उस मामले में, मैं कांग्रेस को तोड़ने की कोशिश करूंगा.’ चंद्रशेखर का जवाब सुनकर हैरान होकर इंदिरा गांधी ने पूछा, ‘क्यों?’. इस पर युवा चंद्रशेखर ने कहा, ‘कांग्रेस एक बरगद का पेड़ बन गया है, जिसके नीचे कुछ भी नया नहीं उग सकता।  साल 1969 में जब इंदिरा गांधी ने पुराने कांग्रेसियों से पार्टी को अलग कर नई कांग्रेस बनाने की कोशिश की तो चंद्रशेखर ने सबसे ज्यादा उनकी मदद की थी. आगे चलकर इंदिरा भारतीय राजनीति में दुर्गा कहलाईं और चंद्रशेखर ‘यंग तुर्क’ कहलाए।  राम मंदिर का मुद्दा सुलझाने के कगार पर थे चंद्रशेखर, राजीव गांधी ने रोक दिया! दूसरा राम मंदिर में दान की चोरी का मुद्दा गरमाया हुआ है. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी बताती हैं कि चंद्रशेखर के साथ उनकी बातचीत उन्होंने उनसे पूछा था कि अगर वे 6 दिसंबर 1992 को प्रधानमंत्री होते जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिराई थी, तो वे क्या करते. इसपर पूर्व पीएम ने कहा कि वे ऐसा कभी नहीं होने देते. लेकिन जब उनसे कहा गया कि अगर कारसेवकों को रोकने के लिए बल प्रयोग किया गया होता, तो उस दिन हजारों लोग मारे जाते, तो उन्होंने वही बात दोहराई जो उन्होंने कही थी. वरिष्ठ पत्रकार बताती हैं कि चंद्रशेखर के साथ काम करने वाले अधिकारियों जैसे कैबिनेट सेक्रेटरी नरेश चंद्रा और श्याम सरन, जो बाद में विदेश सचिव बने का भी यही कहना था कि वे इस मुद्दें पर सख्त रुख ही अपनाते।  वो कहती हैं कि कई लोगों का मानना ​​है कि कांग्रेस ने चंद्रशेखर की सरकार इसलिए गिरा दी क्योंकि वे बातचीत के जरिए अयोध्या विवाद को सुलझाने के करीब पहुंच गए थे. चंद्रशेखर विवादित जगह पर मंदिर बनाने के इर्द-गिर्द समझौता कराने में सफल होने वाले थे, लेकिन इस भरोसे के साथ कि विश्व हिंदू परिषद (VHP) भविष्य में काशी और मथुरा जैसे मुद्दे नहीं उठाएगी. 36 साल बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राम मंदिर में दान के रुपये की चोरी के मुद्दे को उठाया तो यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने मथुरा में कृष्णजन्मभूमि का मुद्दा उठा दिया है।  वरिष्ठ पत्रकार लिखती हैं कि चंद्रशेखर ने यह महसूस करते हुए कि उनकी अल्पमत सरकार के पास ज्यादा समय नहीं होगा, उन्होंने नवंबर 1990 में प्रधानमंत्री बनने के पहले दिन ही वीएचपी और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी दोनों से संपर्क किया था. उस समय, राजीव गांधी को उनके सलाहकारों ने बताया था कि अगर चंद्रशेखर सफल होते हैं, तो वे न केवल देश भर में लोकप्रिय हो जाएंगे, बल्कि कांग्रेस में भी अपनी जगह बना लेंगे, जहां उनकी अच्छी छवि थी, क्योंकि वे कभी इसका हिस्सा थे. इसके तुरंत बाद, हरियाणा के दो सब-इंस्पेक्टर 10 जनपथ के आसपास जासूसी करते हुए पाए गए, और कांग्रेस ने यह काम रोक दिया।  भारत में 14 प्रधानमंत्री हुए हैं. लगभग उतने ही लोग सत्ता के शिखर के करीब पहुंचे, लेकिन टॉप पर नहीं पहुंच पाए. चंद्रशेखर जैसी एक और कैटेगरी थी, जो सबसे ऊंचे पद पर तो पहुंचे लेकिन, ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए, उनका कार्यकाल 223 दिन चला। 

AMCA के जरिए भारत मजबूत करेगा एयर पावर, 100 कंपनियों की होगी भागीदारी; नतीजों में लगेगा समय

बेंगलुरु  भारत का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) सिर्फ एक नया लड़ाकू विमान नहीं है. इसे भारत के रक्षा उद्योग के लिए उस बुनियादी बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है, जो आने वाले एक-दो दशकों में देश को पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट बनाने में आत्मनिर्भर बना सकता है. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक आगे बढ़ता है तो भविष्य में भारत अपेक्षाकृत कम लागत पर अमेरिका के F-35 जैसी श्रेणी के आधुनिक लड़ाकू विमान विकसित और निर्मित करने की भी क्षमता हासिल कर सकता है।  हालांकि, यह लक्ष्य रातोंरात हासिल नहीं होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि AMCA का असली परिणाम अगले कुछ वर्षों में नहीं, बल्कि अगले 10 से 20 वर्षों में दिखाई देगा. लेकिन जिस औद्योगिक ढांचे की नींव आज रखी जा रही है, वही भारत के भविष्य के सैन्य विमानन उद्योग की सबसे बड़ी ताकत बनेगी।  सिर्फ फाइटर जेट नहीं, पूरा इकोसिस्टम तैयार हो रहा अब तक भारत के अधिकांश लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में सरकारी कंपनियों की भूमिका सबसे प्रमुख रही है. लेकिन AMCA इस मॉडल को बदल रहा है. रक्षा मंत्रालय ने पहली बार निजी क्षेत्र के कंसोर्टियम को फ्रंटलाइन फाइटर जेट के प्रोटोटाइप निर्माण के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया है. यानी सरकार अब सिर्फ विमान नहीं बनाना चाहती, बल्कि उसके पीछे ऐसा औद्योगिक नेटवर्क खड़ा करना चाहती है जिसमें 100 से अधिक भारतीय कंपनियां अलग-अलग तकनीकों पर काम करें. यही मॉडल अमेरिका और यूरोप के रक्षा उद्योगों की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है।  क्यों महत्वपूर्ण हैं 100 कंपनियां? किसी 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ विमान का निर्माण केवल एयरफ्रेम बनाने तक सीमित नहीं होता. इसमें हजारों अलग-अलग पुर्जे, सॉफ्टवेयर, सेंसर, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, इंजन, कंपोजिट मटेरियल और मिशन कंप्यूटर शामिल होते हैं. AMCA परियोजना में बड़ी कंपनियों के साथ-साथ टियर-1, टियर-2 और टियर-3 सप्लायरों का विशाल नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।  एयरफ्रेम और कंपोजिट स्ट्रक्चर के लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी, डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज, काइनेको एयरोस्पेस और टाटा एडवांस्ड मैटेरियल्स जैसी कंपनियां अहम भूमिका निभा सकती हैं. रडार, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के क्षेत्र में एलआरडीई, एस्ट्रा माइक्रोवेव, डेटा पैटर्न्स और अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज जैसी संस्थाएं योगदान देंगी. वहीं इंजन सपोर्ट इकोसिस्टम विकसित करने में गोदरेज एयरोस्पेस, एमटीएआर टेक्नोलॉजीज और वालचंदनगर इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।  F-35 जैसी क्षमता का रास्ता दुनिया में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाना बेहद जटिल और महंगा काम माना जाता है. अमेरिका का F-35 कार्यक्रम इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. इस परियोजना में हजारों कंपनियां और दशकों का अनुसंधान शामिल रहा है. भारत फिलहाल उसी स्तर पर नहीं है, लेकिन AMCA के जरिए वह उसी दिशा में बुनियादी क्षमता विकसित कर रहा है।  स्टील्थ डिजाइन, इंटरनल वेपन बे, सेंसर फ्यूजन, एडवांस्ड मिशन कंप्यूटर, नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और एआई आधारित प्रणालियां- ये सभी तकनीकें AMCA का हिस्सा होंगी. एक बार भारतीय उद्योग इन तकनीकों में दक्ष हो गया तो भविष्य के और अधिक उन्नत विमानों का विकास अपेक्षाकृत कम लागत और कम विदेशी निर्भरता के साथ किया जा सकेगा. यही वजह है कि कई रक्षा विशेषज्ञ AMCA को केवल एक विमान नहीं, बल्कि भारत का फ्यूचर एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म मान रहे हैं।  इंजन अभी विदेशी, लेकिन लक्ष्य आत्मनिर्भरता AMCA के शुरुआती प्रोटोटाइप में अमेरिका के GE-F414 इंजन लगाए जाएंगे. इस संबंध में सह-उत्पादन और तकनीकी सहयोग पर बातचीत भी आगे बढ़ चुकी है. हालांकि, भारत का अंतिम लक्ष्य केवल विदेशी इंजन पर निर्भर रहना नहीं है. समानांतर रूप से स्वदेशी इंजन तकनीक विकसित करने और इंजन निर्माण की घरेलू क्षमता बढ़ाने पर भी काम जारी है. यानी शुरुआत विदेशी तकनीक से होगी, लेकिन मंजिल पूरी तरह स्वदेशी क्षमता हासिल करना है।  परिणाम आने में क्यों लगेगा समय? रक्षा परियोजनाओं में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक का विकास और परीक्षण होता है. सरकार की योजना के अनुसार निजी भागीदार के चयन के बाद पांच उड़ान योग्य प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे. लक्ष्य है कि पहला प्रोटोटाइप 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक तैयार हो और पहली उड़ान 2028 में हो. इसके बाद व्यापक परीक्षण, हथियारों का एकीकरण, स्टील्थ सत्यापन और विभिन्न परिस्थितियों में उड़ान परीक्षण होंगे. यही वजह है कि वास्तविक परिचालन क्षमता हासिल करने में कई वर्ष लग सकते हैं. लेकिन, रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कार्यक्रमों में सबसे बड़ी उपलब्धि अंतिम विमान नहीं, बल्कि उसके निर्माण के दौरान विकसित होने वाला औद्योगिक और तकनीकी आधार होता है।  आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की सबसे बड़ी परीक्षा AMCA देश की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ रणनीति की सबसे कठिन परीक्षा भी होगी. यदि यह कार्यक्रम सफल रहता है तो भारत केवल अपनी वायुसेना की जरूरतें पूरी नहीं करेगा, बल्कि भविष्य में वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है. इससे देश में उच्च तकनीक विनिर्माण, अनुसंधान, रोजगार और निर्यात के नए अवसर पैदा होंगे.आज जिन 100 से अधिक कंपनियों को इस कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है, वही आने वाले वर्षों में भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता की रीढ़ बन सकती हैं. इसलिए AMCA को केवल एक विमान परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि उस नींव के रूप में देखा जाना चाहिए। 

Modi Cabinet Reshuffle: किन मंत्रियों की होगी छुट्टी, किसे मिलेगा मौका? 4 बड़े समीकरणों से तय होगा फैसला

 नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार बहुत जल्द होने जा रहा है. पीएम मोदी अपने तीसरे कार्यकाल में पहली बार कैबिनेट विस्तार के साथ कई मंत्रियों के विभाग में फेरबदल कर सकते हैं, जिसकी स्क्रिप्ट लिख जा रही है. केंद्रीय सचिवों संग प्रधानमंत्री की बैठक को मंत्रिमंडल विस्तार के साथ छोड़कर देखा जा रहा है।  पीएम मोदी की केंद्रीय सचिवों के साथ हुई बैठक में उनके विभागों का रिपोर्ट कार्ड लिए हैं ताकि पता चल सके कि किसने कितने कदम उठाए? केंद्रीय सचिवों को आगे के रोडमैप के लिए प्रधानमंत्री तैयार कर रहे हैं, जिन्हें अमलीजामा पहनाने के नई कैबिनेट बनने जा रही हैं। मोदी कैबिनेट विस्तार की फेहरबदल होने का कारण है यह कि 9 मंत्री पद पहले खाली हैं. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी यूपी और हर्ष मल्होत्रा दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष बन गए हैं. जार्ज कुरियन मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके हैं और रवनीत सिंह बिट्टू बहुत जल्द ही कुर्सी छोड़ सकते हैं. इसके अलावा कई दलों के बागी सांसद का सियासी मिजाज बदलता है, जिसके चलते कैबिनेट विस्तार के कयास लगाए जा रहे?  मोदी कैबिनेट का कब होगा विस्तार मानसून सत्र से पहले पांच जुलाई या फिर पीएम मोदी के 3 देशों की यात्रा से 11 जुलाई को लौटने के बाद कभी भी मंत्रिमंडल का विस्तार किया जा सकता है.केंद्रीय सचिवों की बैठक करते प्रधानमंत्री ने क्या यह भी तय कर लिया है कि जो जिम्मेदारी वो मंत्रिमंडल में फेरबदल करके देने वाले हैं, उससे पहले सचिवों की टीम का खाका तैयार हो जाए।  मोदी सरकार का मंत्रिमंडल अभी देखें तो प्रधानमंत्री 30 कैबिनेट मंत्री 5 राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) 36 राज्यमंत्री हैं. इस तरह कुल 72  मंत्री हैं, लेकिन लोकसभा सांसदों के लिहाज से केंद्र सरकार में अधिकतम 81 मंत्री हो सकते हैं. इस तरह से 9 मंत्री पद अभी खाली हैं और जॉर्ज कुरियन इस्तीफा दे चुके हैं. इस लिहाज से दस मंत्री पद तो साफ साफ खाली हैं।   केंद्रीय मंत्रिमंडल के दो सदस्य पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश और हर्ष मल्होत्रा दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष बन गए हैं, जिनकी कैबिनेट से छुट्टी हो सकती हैं. इसके अलावा दो मंत्रियों रवनीत सिंह बिट्टू और जार्ज कुरियन का राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होना है. इनमें कुरियन ने इस्तीफा दे दिया और जल्द ही रवनीत सिंह बिट्टू मंत्री पद छोड़ सकते हैं. इसके अलावा कुछ मंत्री की छुट्टी उनकी खराब परफॉर्मेंस की वजह से हो सकती है।  कैबिनेट विस्तार में क्या बागी फैक्टर का रोल?  मोदी कैबिनेट विस्तार में में पुराने दोस्तों का कोटा बढ़ेंगे या नए समर्थक सांसदों को मिलेगी एंट्री? आम आदमी पार्टी से लेकर टीएमसी से और शिवसेना (यूबीटी) के जिन बागी सांसदों ने मोदी सरकार का समर्थन कर चुके हैं, उनमें से किसे-किसे मंत्री पद मिलेगा?  ममता बनर्जी की पार्टी के बीस बागी लोकसभा सांसद स्पीकर से मिलकर बताते हैं कि वो एनसीपीआई नाम की पार्टी में शामिल हो चुके हैं और देश के विकास में योगदान के लिए नरेंद्र मोदी सरकार को समर्थन करते हैं. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों का बीजेपी में शामिल होना और शिवसेना (यूबीटी) के 6 लोकसभा सदस्यों का एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना में शामिल होकर सत्तापक्ष की संख्याबल में इजाफा किया है।  सहयोगी दलों को सियासी अहमियत मिलेगी बागी सांसदों के समर्थन में आने से बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की संख्याबल बढ़ गई.  टीएमसी के 20 बागी सांसद के साथ आने से एनडीए के समर्थन करने वाली सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बन चुकी है. टीएमसी के बागी सांसद अब नीतीश, नायडू की पार्टी से भी ज्यादा हैं, जिसमें से मोदी सरकार किसे मंत्री बनाएगी. इसके अलावा राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के साथ टूटकर आए नेताओं में से किसी को मंत्रिमंडल में जगह दी जा सकती है।  उद्धव ठाकरे की पार्टी छोड़कर शिंदे वाली शिवसेना में शामिल हो चुके हैं, जिनकी पार्टी की संसद में राजनीतिक ताकत बढ़ने पर मुहर खुद गृह मंत्री अमित शाह तक लगा चुके हैं. ऐसे में मोदी मंत्रिमंडल में क्या शिंदे के खाते में नए मंत्री पद वाली ताकत बढ़ेगी? शिवसेना शिंदे के सांसदों की संख्या अब 13 हो चुकी है, जो जेडीयू से ज्यादा सांसद हो चुके हैं. जेडीयू को अभी दो सीट एक कैबिनेट, एक राज्य मंत्री की मिली है. इसी तरह टीडीपी से दो मंत्री हैं,जिसके चलते शिंदे की पार्टी का कोटा क्या बढ़ेगा।  चुनावी राज्यों का फैक्टर का रखा जाएगा ख्याल? मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार-फेरबदल का दूसरा कारण अगले वर्ष सात राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं. यूपी, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव है. पंजाब और हिमाचल को छोड़कर सभी राज्य में बीजेपी की सरकार है. ऐसे में चुनावी राज्यों के सियासी समीकरण को साधे रखने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में इन राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है।  केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल-विस्तार की चर्चा इसलिए भी हो रही है कि मंत्रियों के लगभग दो साल के कामकाज की समीक्षा संभावित थी. इस समीक्षा के तहत मंत्री पदोन्नत या पदावनत हो सकते हैं. यूपी से अभी 10 मंत्री हैं तो हिमाचल और उत्तराखंड से एक-एक मंत्री हैं. इसके अलावा पंजाब कोटे से रवनीत सिंह बिट्टू मंत्री हैं, जिनकी जगह पर किसी नए चेहरो को लाया जा सकता है।   सामाजिक समीकरण के फैक्टर का ख्याल सियासत में कोई भी पार्टी हो या सरकार, उसे सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरण को साधना होता है. माना जा रहा है कि मोदी सरकार भी कैबिनेट विस्तार में अपने मंत्रियों का चयन करते समय सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों के फैक्टर का खास ख्याल रखेगी. हालांकि, ऐसा करते समय योग्यता को प्रथम वरीयता दी जा सकती है,क्योंकि कोई सरकार अपने मंत्रियों के कामकाज के आधार पर ही जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में समर्थ हो सकती है।  सियासत और सरकार में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो केवल सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों में संतुलन बैठाने का काम करते हैं, जिसे मोदी सरकार के लिए अपने मंत्री कसौटी पर खरे साबित करने की है. दलित और ओबीसी की सियासत जिस तरह से विपक्ष उठा रहा, उसके लिहाज से कैबिनेट का गठन किया जा सकता है। 

Indus Water Dispute: सिंधु पर PAK की दलीलों का भारत ने दिया जवाब, अमेरिका-रूस-चीन का उदाहरण बना आधार

नई दिल्ली सिंधु जल समझौते पर पाकिस्तान बिलबिला रहा है. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस समझौते को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया है. अब पाकिस्तान गीदड भभकियां दे रहा है, और सीधे तौर पर हिंसा का सहारा लेने की बात कर रहा है. लेकिन बड़बोले पाकिस्तान को ये पता नहीं है कि भारत के पास अमेरिका, रूस और चीन द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक तर्क है. इसी तर्क का सहारा लेकर ये तीनों बड़े देश अंतर्राष्ट्रीय समझौते से बाहर निकल गए और अपनी राष्ट्रीय चिंताओं और हित को ज्यादा तवज्जो दी।  अभी हाल ही में पाकिस्तान के मंत्री ने अताउल्लाह तरार ने एक सेमिनार में कहा है कि भारत इंडस वॉटर ट्रीटी (IWT) यानी सिंधु जल समझौते को संशोधित, रद्द या निलंबित नहीं कर सकता है. लेकिन पाकिस्तान ने भारत की चिंता आतंकवाद पर मुंह सिल लिया है।  हालांकि भारतीय रक्षा विशेषज्ञों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़े देशों द्वारा किए गए समझौतों के उल्लंघन के उदाहरण देकर भारत के वैध अधिकार पर जोर दिया है और कहा है कि भारत को आतंकवाद को लेकर अपनी चिंता दूर करने के लिए हर कदम उठाने का अधिकार है।  पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर (रिटायर्ड) ने एक्स पर ट्वीट कर कहा कि अगर अमेरिका JCPOA से हट सकता है, रूस INF ट्रीटी से दूर जा सकता है और चीन दक्षिण चीन सागर पर हेग के फैसले को खारिज कर सकता है, तो भारत भी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में IWT को अस्थायी रूप से निलंबित कर सकता है।  कहने का अर्थ है कि दुनिया की बड़ी ताकतों ने अंतरराष्ट्रीय समझौतों को तब नज़रअंदाज़ किया या उनसे बाहर निकल गए, जब वे उनके राष्ट्रीय हितों के काम के नहीं रहे. रक्षा विशेषज्ञ पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर (रि) का कहना है कि ताकतवर देश संधियों का सख्ती से पालन करने के बजाय रणनीतिक/राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों को ज़्यादा अहमियत देते हैं, इसलिए भारत भी IWT के मामले में ऐसा कर सकता है।  सिंधु जल समझौता 1960 में भारत और Pakistan के बीच हुआ एक ऐतिहासिक जल-बंटवारा समझौता है, जिसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी. इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया. रावी, ब्यास और सतलुज का अधिकांश जल भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चेनाब का मुख्य उपयोग पाकिस्तान को दिया गया।  पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के संदर्भ में भारत लंबे समय से इस समझौते की समीक्षा की मांग कर रहा है।  आइए समझते हैं कि दुनिया की बड़ी ताकतें कब अपने राष्ट्रीय हित में अंतर्राष्ट्रीय समझौते से बाहर निकल गईं।  ईरान डील (JCPOA) से 2018 में अलग हुआ अमेरिका  क्या हुआ: राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका 2015 के 'जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन' (JCPOA) से 2018 में एकतरफ़ा तौर पर खुद को अलग कर लिया और दूसरे हस्ताक्षरकर्ताओं (UK, फ्रांस, जर्मनी, रूस, चीन, EU) के विरोध के बावजूद फिर से ईरान पर प्रतिबंध लगा दिए।  अमेरिका क्या तर्क दिए: अमेरिका का तर्क था कि यह डील बुनियादी तौर पर खराब थी. ट्रंप ने इसे अबतक का सबसे खराब डील कहा. अमेरिका का कहना है कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी गतिविधियों और "सनसेट क्लॉज़" (समय-सीमा वाली शर्तें) जैसे मुद्दों को ठीक से नहीं सुलझाया गया था, जिनकी वजह से ईरान को आगे चलकर एडवांस्ड न्यूक्लियर काम फिर से शुरू करने की इजाज़त मिल जाती. ट्रंप इसे एक बुरा सौदा मानते थे जिससे ईरान तो मजबूत हुआ, लेकिन उसके न्यूक्लियर इरादों या अमेरिका के सहयोगियों पर कोई खास रोक नहीं लगी. इसे एक राजनीतिक प्रतिबद्धता माना गया जिसका लागू होना अमेरिका की इच्छाशक्ति पर निर्भर था. मौका देखकर अमेरिका इस डील से बाहर निकल गया. 2025-2026 में इसी मुद्दे को लेकर भयंकर युद्ध हुआ है।  INF (Intermediate-Range Nuclear Forces) से बाहर निकला रूस  क्या हुआ: अमेरिका ही नहीं दुनिया के दूसरे देश भी अंतरराष्ट्रीय संधियों का अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करते रहे हैं. 1987 में अमेरिका और सोवियत संघ (अब रूस) के बीच एक समझौता हुआ. यह एक परमाणु नियंत्रण समझौता था, इसमें 500 से 5500 किलोमीटर रेंज वाली जमीन से लॉन्च होने वाली मिसाइलों को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया था. यह शीत युद्ध को कम करने वाला ऐतिहासिक समझौता था।  इसके बावजूद दोनों देश अपने मिशन पर गुप्त रूप से लगे रहे. अमेरिका ने 2019 में अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछ हट गया. फिर रूस ने भी ऐसा ही किया. इसके बाद'इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेस ट्रीटी' खत्म हो गई।  दोनों देशों ने क्या तर्क दिए: अमेरिका ने रूस पर संधि का गंभीर उल्लंघन करने का आरोप लगाया और कहा कि रूस प्रतिबंधित 9M729/SSC-8 मिसाइल बना रहा है।  रूस ने तर्क दिया कि अमेरिका/नाटो की गतिविधियों (जैसे यूरोप में मिसाइल डिफेंस सिस्टम) और सुरक्षा के बदलते माहौल के कारण यह संधि अब पुरानी हो चुकी है. चीन द्वारा बिना किसी रोक-टोक के इंटरमीडिएट-रेंज मिसाइलें बनाई जा रही हैं. इसलिए अब इस संधि का कोई मतलब नहीं है. यानी कि इस संधि को लेकर किसी देश की प्रतिबद्धता नहीं थी।  दोनों पक्षों ने संधि का पालन करना बंद कर दिया, जिससे यह संधि खत्म हो गई।  UN संधि के फैसले को चीन ने ठुकराया क्या हुआ दुनिया की एक और महाशक्ति चीन भी अपनी सुविधा के अनुसार ही संधियों का पालन किया. फ़िलीपींस की ओर से लाए गए एक मामले में  UNCLOS ने चीन के खिलाफ फैसला सुनाया और दक्षिण चीन सागर में चीन की ओर से कृत्रिम द्वीप बनाने को गलत करार दिया. चीन ने इस फैसले को पूरी तरह से खारिज कर दिया. UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) संयुक्त राष्ट्र का समुद्री कानून पर अंतरराष्ट्रीय संधि है।  चीन ने क्या तर्क दिया: चीन ने कभी भी ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया. उसका तर्क था कि इस विवाद में संप्रभुता का मामला शामिल है, जिस पर ट्रिब्यूनल कोई फैसला नहीं दे सकता है. और द्विपक्षीय बातचीत ही सही रास्ता है. उसने इस फैसले को गैर-कानूनी और राजनीतिक मकसद से प्रेरित माना और कहा कि यह उसकी "निर्विवाद" क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों पर बाध्यकारी नहीं है. इसके बावजूद चीन ने अपनी गतिविधियां जारी रखीं।  ये उदाहरण दिखाते … Read more

बेंगलुरु खदान हादसा: ग्रेनाइट चट्टान गिरने से 6 मजदूरों की मौत, मृतकों में MP के 5 और छत्तीसगढ़ का 1 श्रमिक

बेंगलुरु कर्नाटक के बेंगलुरु शहरी जिले में गुरुवार को एक ग्रेनाइट खदान में हुए भीषण हादसे में सात प्रवासी मजदूरों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि पांच अन्य घायल हो गए। मृतकों में पांच मजदूर मध्य प्रदेश, एक छत्तीसगढ़ और एक कर्नाटक के यादगीर जिले का निवासी था। पुलिस ने शुरुआती जांच में हादसे के पीछे गंभीर लापरवाही की आशंका जताई है। यह हादसा बेंगलुरु शहरी जिले के मडापट्टना क्षेत्र में हुआ, जहां खदान में ऊपर से ग्रेनाइट का विशाल पत्थर खिसककर नीचे काम कर रहे मजदूरों पर आ गिरा। पत्थर की चपेट में आने से सात मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई। हादसे के समय खदान में कुल 16 मजदूर काम कर रहे थे, जिनमें चार मजदूर सुरक्षित बच गए। खदान में ऊपर और नीचे दो क्रशर संचालित हो रहे थे सेंट्रल रेंज के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल एस. गिरीश ने बताया कि खदान में ऊपर और नीचे दो क्रशर संचालित हो रहे थे। ऊपरी हिस्से में ड्रिलिंग का काम चल रहा था, तभी अचानक एक बड़ा ग्रेनाइट पत्थर नीचे खिसक गया और वहां काम कर रहे मजदूरों पर गिर पड़ा। उन्होंने कहा कि इस हादसे में घायल सभी पांच मजदूरों की हालत फिलहाल खतरे से बाहर है। शुरुआती जानकारी में हुई थी मृतकों की पहचान में गलती हादसे के तुरंत बाद पुलिस सूत्रों ने बताया था कि अधिकांश मृतक बिहार के रहने वाले हैं, लेकिन बाद में जांच के दौरान स्पष्ट हुआ कि पांच मृतक मध्य प्रदेश के निवासी थे। वहीं, कुछ समय के लिए मृतकों की संख्या आठ होने की भी चर्चा रही, लेकिन पुलिस ने इसकी पुष्टि नहीं की। अधिकारियों के अनुसार हादसे में कुल सात लोगों की ही जान गई है। मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये मुआवजा खान एवं भू-विज्ञान विभाग के अधिकारी रंगप्पा ने बताया कि खदान संचालक ने मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये तथा घायलों को पांच-पांच लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने पर सहमति जताई है। नई खनन गाइडलाइन बनाएगी सरकार हादसे पर शोक जताते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा कि राज्य सरकार पूरे प्रदेश में खनन गतिविधियों के लिए नई सुरक्षा गाइडलाइन लागू करेगी ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार हादसा ब्लास्टिंग से नहीं, बल्कि मिट्टी और चट्टान के खिसकने के कारण हुआ है। विस्तृत जांच रिपोर्ट आने के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। मुआवजे की घोषणा भी की जाएगी मुख्यमंत्री ने कहा कि फिलहाल सरकार की पहली प्राथमिकता हादसे के कारणों का पता लगाना और भविष्य में ऐसे हादसों को रोकना है। मुआवजे की घोषणा भी की जाएगी, लेकिन उससे पहले सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है। जांच के आदेश, जिम्मेदारों पर होगी कार्रवाई उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने कहा कि हादसे की विस्तृत जांच कराई जाएगी और यह पता लगाया जाएगा कि खदान संचालन की अनुमति किस स्तर पर दी गई थी। यदि किसी अधिकारी या संबंधित विभाग की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने राज्य में अवैध खनन गतिविधियों पर भी चिंता जताते हुए कहा कि सरकार इन्हें रोकने के लिए कड़े कदम उठाएगी। विपक्ष और केंद्रीय मंत्री ने सरकार को घेरा केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि राज्य में खनन माफिया और प्रभावशाली लॉबी मजदूरों की सुरक्षा की अनदेखी कर केवल मुनाफे पर ध्यान दे रही है। उन्होंने सरकार से सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन कराने की मांग की। वहीं, कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक ने भी राज्य सरकार को हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने अस्पताल पहुंचकर घायलों का हालचाल जाना और कहा कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में मजदूरों की जान से खिलवाड़ न हो। घटनास्थल का मंजर था बेहद भयावह हादसे के बाद घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई। विशाल ग्रेनाइट पत्थर के नीचे आने से माल ढोने वाले वाहन पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए, जबकि एक ट्रैक्टर भी बुरी तरह चकनाचूर हो गया। मृतकों और घायलों के परिजनों के विलाप से पूरे इलाके में मातम पसरा रहा। यादगीर निवासी एक मृतक के परिजन ने बताया कि वह परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था और बेटियों की शादी के बाद कर्ज चुकाने के लिए बेंगलुरु में मजदूरी कर रहा था। उसकी मौत से परिवार के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।  

उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के लिए खुशखबरी, लगातार 7वें साल नहीं बढ़ेंगी बिजली दरें

लखनऊ   उत्तर प्रदेश के करीब 3.70 करोड़ बिजली ग्राहकों के लिए बड़ी राहत भरी खबर है. उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) ने बिजली दरों को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि राज्य में फिलहाल बिजली की दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की जाएगी. इसके साथ ही नोएडा के ग्राहकों को मिलने वाली 10 फीसदी बिजली दर छूट भी पहले की तरह जारी रहेगी. आयोग के इस फैसले से घरेलू, कमर्शियल और औद्योगिक ग्राहकों को महंगाई के दौर में बड़ी राहत मिलेगी।  लगातार 7वें साल नहीं बढ़ीं बिजली दरें आयोग के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश लगातार सातवें वर्ष भी बिजली दरों में बढ़ोतरी नहीं करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है. बीते 7 वर्षों से प्रदेश में बिजली की टैरिफ दरें स्थिर रखी गई हैं, जिससे करोड़ों ग्राहकों पर एक्‍स्‍ट्रा आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा. यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब कई राज्यों में बिजली दरों में संशोधन किए जा चुके हैं।  नियामक आयोग ने नोएडा क्षेत्र के उपभोक्ताओं को मिलने वाली 10 प्रतिशत बिजली दर छूट को भी जारी रखने का फैसला किया है. इससे नोएडा के लाखों घरेलू और व्यावसायिक ग्राहकों को पहले की तरह रियायती दरों पर बिजली मिलती रहेगी।  EV चार्जिंग स्टेशनों को मिलेगा विशेष लाभ उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के मकसद से आयोग ने ईवी चार्जिंग स्टेशनों के लिए भी अहम फैसला लिया है. अब सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक बिजली की खपत पर 20 प्रतिशत की छूट दी जाएगी. माना जा रहा है कि इससे इलेक्ट्रिक वाहनों के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा और ग्रीन एनर्जी को प्रोत्साहन मिलेगा।  उत्तर प्रदेश विद्युत उपभोक्ता परिषद ने आयोग के इस फैसले का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग का आभार व्यक्त किया है. परिषद का कहना है कि बिजली दरों को स्थिर रखने का निर्णय प्रदेश के करोड़ों उपभोक्ताओं के हित में है और इससे आम लोगों के साथ-साथ उद्योगों को भी राहत मिलेगी। 

Trump New Plan: क्या अमेरिका में गर्भवती विदेशी महिलाओं की एंट्री होगी बैन? Birthright विवाद के बाद नई तैयारी

वॉशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले कई सालों से जन्म के आधार पर नागरिकता (बर्थराइट सिटिजनशिप) खत्म करने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन अदालत से उनके इस कदम को बड़ा झटका लगा है. हालांकि फिर भी उन्होंने अपनी कोशिशों को जारी रखा हुआ है. ट्रंप प्रशासन ने इसे लेकर एक नई योजना पर काम करना शुरू किया है. अब इसे उन महिलाओं की तरफ मोड़ा जा रहा है जो बच्चे को जन्म देने के लिए अमेरिका आती हैं, ताकि उनका बच्चा बर्थराइट सिटिजनशिप के तहत अमेरिका का नागरिक बन सके।  बाहरी प्रेग्नेंट महिलाओं की एंट्री बैन की तैयारी अमेरिकी वेबसाइट एक्सिओस की खबर के मुताबिक, अगर ट्रंप प्रशासन इसके खिलाफ नियम बनाने में कामयाब हुआ तो प्रेग्नेंसी, यात्रा और नागरिकता को लेकर एक नया इमिग्रेशन बैटल शुरू हो जाएगा. इससे बहस अमेरिका में चाइल्ड बर्थ के अधिकारों को चुनौती देने से हटकर दूसरे देशों से अमेरिका आने वाली प्रेग्नेंट महिलाओं पर बैन लगाने की ओर मुड़ जाएगी. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को डोनाल्ड ट्रंप के जन्मजात नागरिकता खत्म करने के उनके आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की थी. ट्रंप ने अदालत से अमेरिका में जन्मे उन बच्चों को नागरिकता देने से इनकार करने की मांग की थी जिनके माता-पिता अमेरिकी नागरिक नहीं हैं।  बर्थ राइट सिटीजनशिप पर ट्रंप का नया प्लान कोर्ट से झटका लगने के बाद फेडरलिस्ट पार्टी के संस्थापक शॉन डेविस जैसे MAGA समर्थकों ने सुझाव दिया कि प्रेग्नेंट विदेशी महिलाओं के अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगनी चाहिए. ट्रंप के सलाहकार स्टीफन मिलर ने कोर्ट के  फैसले के बाद कहा कि देश को इस बारे में सावधानी से सोचने की जरूरत है, भले ही यह अस्थायी रूप से ही क्यों न हो. उन्होंने कहा कि बर्थ राइट सिटीजनशिप से दूसरे देशों के नागरिकों के बच्चे अमेरिकी नागरिक बनकर सामाजिक सुरक्षा का लाभ उठा सकते हैं।  उन्होंने कहा कि व्हाइट हाउस की प्रवक्ता एबिगेल जैक्सन ने एक्सियोस को ईमेल से भेजे एक बयान के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रंप बर्थराइट सिटीजनशिप के मूल्य की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, यही वजह है कि अदालत के फैसले के बाद कांग्रेस को इस मामले पर तुरंत एक्शन लेने का निर्देश दिया है. उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास अमेरिकी नागरिकता की सुरक्षा के लिए कई उपाय हैं।  महिलाओं का अमेरिकी नागरिकता वाला प्लान  उन्होंने इसे बर्थ टूरिज्म बताते हुए कहा कि ये तब होता है जब बाहरी महिलाएं अमेरिका में खात तौर पर बच्चे को जन्म देने के लिए आती हैं, ताकि उनके बच्चे को अमेरिकी नागरिकता मिल सके. न्याय विभाग ने  मंगलवार को एक ज्ञापन जारी किया है, जिसमें इस बात की जांच करने की अपील की गई है।  सहायक अटॉर्नी जनरल कॉलिन मैकडॉनल्ड ने एक्स को भेजे गए मैमो में कहा कि अमेरिका के आपराधिक कानून पहले से ही इन तथाकथित बर्थ टूरिज्म स्कीम्स को प्रतिबंधित करते हैं. इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी कई स्कीम्स झूठे वीजा आवेदन से शुरू होती हैं, लोग झूठ बोलकर अमेरिका में रहने का समय और मकसद को छिपाते हैं।  हर साल बाहरी महिलाएं 20,000 से 26,000 बच्चों को देती हैं जन्म उन्होंने कहा कि इनमें से कई मामलों में वीजा धोखाधड़ी के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है, लेकिन  वायर धोखाधड़ी, स्वास्थ्य सेवा धोखाधड़ी, मनी लॉन्ड्रिंग और गंभीर पहचान चोरी के आरोपों पर भी विचार किया जाना चाहिए. आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिकी सरकार विदेशी महिलाओं से पैदा हुए बच्चों की संख्या का रिकॉर्ड नहीं रखती है, लेकिन अनुमान के मताबिक, हर साल 20,000 से 26,000 के करीब बच्चे अमेरिका में जन्म लेते हैं।