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संपत्ति के बाद नौकरी में भी बेटियों के अधिकार मजबूत, जानिए Supreme Court का अहम फैसला

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने विवाह के बाद बेटियों के अधिकार को लेकर बड़ा फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विवाह के बाद भी बेटी परिवार का ही अंग है. किसी बेटी को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए सिर्फ इसलिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि वह विवाहित है. सुप्रीम कोर्ट के इस बड़े फैसले ने विवाहित बेटियों के अधिकार को लेकर छाई भ्रम की धुंध हटा दी है।  सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस दलील को खारिज कर दिया कि निवास एक अलग पात्रता शर्त है, जिसका मूल्यांकन प्रत्येक मामले के तथ्यों पर किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी विवाहित बेटियों के अधिकार खारिज किए जाने को इस धारणा के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता कि हर विवाहित बेटी जरूरी रूप से कहीं और रहती है।  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक निर्णय उन अनुमानों पर आधारित नहीं किया जा सकता, जो व्यापक हैं और जीवंत वास्तविकताओं से कटे हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता निशा ने तर्क दिया कि विवाहित बेटियों को एक लाभकारी योजना से बाहर करने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है और यह समानता की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करता है. सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि विवाहित बेटियाँ आम तौर पर अपने वैवाहिक घरों में चली जाती हैं।  सरकार की ओर से दलील यह भी दी गई कि विवाह के बाद बेटियां स्थानीय निवास की आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा का उद्देश्य उत्तराधिकार का अधिकार बनाना नहीं, एक मृतक के परिवार को तत्काल वित्तीय राहत देना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में निरंतरता सुनिश्चित करना है. एक बार जब निर्भरता को मानक रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, तो एक विवाहित बेटी को केवल इसलिए बहिष्कृत करना तर्कहीन हो जाता है।  सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फैसला सुनाया कि क्या विवाहित बेटियों को संवैधानिक रूप से 'परिवार' की परिभाषा से बाहर रखा गया है? क्या अनुकंपा के आधार पर उन्हें उचित मूल्य की दुकान का लाइसेंस दिया जा सकता है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 में दिए अपने निर्णय में कहा था कि केवल अविवाहित बेटी को ही अनुकंपा के आधार पर माता या पिता के नाम से लाइसेंस वाली उचित मूल्य की राशन दुकान का आवंटन अनुकंपा के आधार पर ट्रांसफर हो सकता है।  याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. अपनी याचिका में विवाहित बेटी ने यह तर्क दिया था कि वह अपने पिता की मृत्यु के बाद मां और एक विकलांग बहन की देखभाल कर रही है। 

आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर में भक्तों की आस्था का अनोखा रिकॉर्ड, 12.4 लाख लोगों ने करवाया मुंडन

तिरुपति  आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध तिरुमाला तिरुपति मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर को बाल चढ़ाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।मंदिर प्रबंधन तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के अनुसार, 1 से 27 मई तक कुल 12,43,063 श्रद्धालुओं ने अपने बाल अर्पित किए। यह आंकड़ा पिछले वर्षों को पीछे छोड़ते हुए नया रिकॉर्ड बना है। पिछले सालों से तुलना मई 2024 में यह संख्या लगभग 10.65 लाख थी, जबकि इससे पहले की अवधि में 10.18 लाख भक्तों ने बाल चढ़ाए थे। मंदिर अधिकारियों का कहना है कि गर्मियों की छुट्टियों, हफ्ते के आखिरी मे भीड़ और देश-विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों के आने से इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक दिन का रिकॉर्ड 18 से 23 मई के बीच रोजाना 50,000 से अधिक भक्तों ने मुंडन करवाया। खासतौर पर 23 मई को 57,580 बाल चढ़ावे दर्ज किए गए, जो हाल के वर्षों में एक दिन का सबसे अधिक आंकड़ा है। 24 घंटे मुंडन सेवाएं भीड़ को ठीक तरीके से संभालने के लिए TTD ने मुख्य कल्याणकट्टा सहित 11 मिनी मुंडन केंद्रों पर सेवाएं 24 घंटे चालू रहती हैं। 1,150 से अधिक नाई (जिनमें 269 महिला नाई शामिल हैं) शिफ्ट में काम कर रहे हैं ताकि भक्तों को बिना इंतजार के समय में सेवा मिल सके। 167 करोड़ के बाल धार्मिक आस्था के साथ-साथ ये बाल TTD के लिए बड़े राजस्व का स्रोत भी बन गए हैं। इन्हें 'काला सोना' कहा जाता है। इकट्ठा किए गए बालों को सॉर्टिंग और ग्रेडिंग के बाद चीन, इटली, अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों में नीलाम किया जाता है, जहां इनका उपयोग विग, हेयर एक्सटेंशन और ब्यूटी प्रोडक्ट्स में होता है। आंकड़ों के मुताबिक, 2020-21 में बाल नीलामी से 67 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी, जो 2023-24 में बढ़कर 167 करोड़ रुपये हो गई। 2024-25 में यह 190 करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान है और अगले वित्तीय वर्ष में 200 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार करने की उम्मीद है। भक्तों की सुविधा पर जोर TTD ने मुंडन केंद्रों पर स्वच्छता, स्टरलाइज्ड ब्लेड, गर्म पानी, पीने का पानी, बैठने की व्यवस्था और टोकन सिस्टम जैसी सुविधाएं बढ़ा दी हैं ताकि भक्तों को सुरक्षित और आरामदायक अनुभव मिले।

नई राफेल डील में ‘मेक इन इंडिया’ पर जोर, 50% स्वदेशी पुर्जों के साथ भारत में तैयार होंगे 90 विमान

 नई दिल्ली भारतीय रक्षा क्षेत्र और वायु सेना (IAF) के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ने जा रहा है. भारत सरकार ने फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट्स (Rafale Fighter Jets) खरीदने की मेगा डील की दिशा में सबसे बड़ा और औपचारिक कदम उठा लिया है।  रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस सरकार को लेटर ऑफ रिक्वेस्ट (LoR – Letter of Request) जारी कर दिया है, जो सरकारी स्तर (G-to-G) पर होने वाले रक्षा समझौतों की आधिकारिक शुरुआत है. लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की लागत वाली यह मेगा डील भारत का अब तक का सबसे बड़ा फाइटर जेट खरीद कार्यक्रम है।  यह सौदा न केवल भारतीय वायु सेना की घटती 'स्कवाड्रन क्षमता' को मजबूत करेगा, बल्कि देश को एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग के मामले में एक वैश्विक हब के रूप में स्थापित करेगा. इस सौदे की सबसे खास बात यह है कि यह 'बाय ग्लोबल, मेक इन इंडिया' नीति के तहत आ रहा है, जिसका सीधा असर भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था, रक्षा उत्पादन और रोजगार के अवसरों पर पड़ेगा।  क्यों खास है 114 राफेल की नई डील? यह नई राफेल डील साल 2016 में हुई 36 राफेल विमानों की खरीद से बिल्कुल अलग और कई गुना बड़ी है. पिछली बार भारत ने सभी 36 विमान फ्रांस से तैयार स्थिति (Fly-away condition) में खरीदे थे. लेकिन इस बार भारत सरकार की प्राथमिकता देश को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना है. इस नई मेगा डील की सबसे मुख्य विशेषताएं हैं… 22 से 24 जेट्स फ्रांस से तैयार होकर आएंगे: वायुसेना की आपातकालीन जरूरतों को देखते हुए लगभग 22 से 24 राफेल लड़ाकू विमान सीधे फ्रांस में डसॉल्ट एविएशन की मैरिनेक फैक्ट्री से पूरी तरह तैयार स्थिति में उड़कर भारत आएंगे. इससे वायुसेना को तुरंत आधुनिक कॉम्बैट क्षमता मिलेगी।  90 से 94 जेट्स का निर्माण भारत में होगा: इस डील की असली ताकत यह है कि कुल 114 विमानों में से करीब 90 से 94 फाइटर जेट्स का उत्पादन भारत में किया जाएगा. यह इतिहास में पहली बार होगा जब राफेल जैसे विश्वस्तरीय 4.5 जेनरेशन के लड़ाकू विमान का निर्माण फ्रांस की धरती से बाहर किसी अन्य देश में किया जाएगा।  50% स्वदेशी पुर्जों का होगा इस्तेमाल: भारत में बनने वाले इन राफेल विमानों में कम से कम 50 प्रतिशत सामग्री, तकनीक और पुर्जे पूरी तरह से भारतीय यानी 'स्वदेशी' होंगे. इसके साथ ही, इस समझौते के तहत भारत को यह अधिकार और तकनीकी पहुंच मिलेगी कि वह अपनी स्वदेशी मिसाइल प्रणालियों (जैसे अस्त्र और ब्रह्मोस मिसाइल को राफेल जेट में सीधे इंटीग्रेट कर सके) . कौन सी भारतीय कंपनियां बनेंगी डसॉल्ट एविएशन की पार्टनर? फ्रांस की दिग्गज एयरोस्पेस कंपनी डसॉल्ट एविएशन अकेले भारत में इतने बड़े पैमाने पर विमानों का निर्माण नहीं कर सकती. इसके लिए उसे भारतीय रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों के साथ हाथ मिलाना होगा।  साझेदारी की रेस में सबसे आगे टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (Tata Advanced Systems Limited – TASL) का नाम है. जून 2025 में ही डसॉल्ट एविएशन और टाटा (TASL) ने राफेल के फ्यूजलेज (विमान का मुख्य धड़ या बॉडी) को भारत में बनाने के लिए एक बड़े रणनीतिक समझौते की घोषणा की थी।  इसके अलावा, भारत की सरकारी रक्षा कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) भी इसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, जिसके पास लड़ाकू विमान बनाने का दशकों पुराना अनुभव है।  निजी क्षेत्र की अन्य बड़ी कंपनियां जैसे लार्सन एंड टुब्रो, महिंद्रा डिफेंस और भारत फोर्ज भी इस विशाल सप्लाई चेन का हिस्सा बन सकती हैं. ये भारतीय कंपनियां राफेल के विंग्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, रडार कंपोनेंट्स, केबिन और अन्य महत्वपूर्ण प्रणालियों के निर्माण में डसॉल्ट के साथ मिलकर काम करेंगी।  कहां होगा इन फाइटर जेट्स का प्रोडक्शन और मेंटेनेंस? 90 से अधिक राफेल विमानों का उत्पादन भारत के किन शहरों में होगा, इसे लेकर औद्योगिक गलियारों में भारी उत्साह है. सबसे बड़ा हब हैदराबाद बनने जा रहा है, जहां टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और डसॉल्ट एविएशन मिलकर राफेल के फ्यूजलेज और मुख्य बॉडी पार्ट्स के निर्माण के लिए एडवांस्ड फैसिलिटी स्थापित कर रहे हैं।  इसके अलावा, विमानों की अंतिम असेंबली लाइन (Final Assembly Line) को लेकर भी कयास जारी हैं, जिसके लिए महाराष्ट्र या कर्नाटक के रक्षा औद्योगिक पार्कों पर विचार किया जा सकता है।  उत्पादन के साथ-साथ, विमानों के रख-रखाव को लेकर भी भारत ने बाजी मार ली है. डसॉल्ट एविएशन ने उत्तर प्रदेश के नोएडा के पास एक अत्याधुनिक 'मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल' (MRO) फैसिलिटी स्थापित की है, जिसका नाम DAMROI (Dassault Aviation Maintenance, Repair and Overhaul India) है।  यह सेंटर पहले से ही चालू हो चुका है. वर्तमान में भारतीय वायु सेना के पास मौजूद मिराज-2000 और 36 राफेल विमानों की सर्विसिंग का काम संभाल रहा है. भविष्य में भारत में बनने वाले 94 राफेल विमानों की सर्विसिंग और अपग्रेडेशन भी इसी एमआरओ हब के जरिए देश के भीतर ही संभव होगी।  रक्षा क्षेत्र में लगेंगी कितनी नौकरियां? यह निवेश भारतीय रोजगार बाजार के लिए एक गेम चेंजर साबित होने वाला है. रक्षा विशेषज्ञों और आर्थिक विश्लेषकों के मुताबिक इस मेगा प्रोजेक्ट से भारत में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों नौकरियां पैदा होंगी।      हाई-टेक इंजीनियरिंग नौकरियां: विमान के डिजाइन, सॉफ्टवेयर इंटीग्रेशन और असेंबली के लिए हजारों एयरोस्पेस इंजीनियरों, डेटा साइंटिस्ट्स और तकनीशियनों की सीधी भर्ती होगी।      एमएसएमई (MSME) सेक्टर को बढ़ावा: 50% स्वदेशी पुर्जों की शर्त के कारण भारत की सैकड़ों छोटी और मध्यम (MSME) कंपनियों को कलपुर्जे बनाने के ऑर्डर मिलेंगे. इससे स्थानीय स्तर पर वेल्डिंग, मशीनिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में काम करने वाले कुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार की बाढ़ आ जाएगी।      कौशल विकास (Skill Development): फ्रांस की तकनीक भारत में ट्रांसफर (Transfer of Technology) होने से भारतीय कार्यबल को वैश्विक स्तर की हाई-टेक ट्रेनिंग मिलेगी, जो भविष्य में भारत के अपने पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) के विकास में काम आएगी।  भारतीय वायु सेना के लिए क्यों जीवनदान है यह सौदा? वर्तमान में भारतीय वायु सेना (IAF) लड़ाकू विमानों की भारी किल्लत से जूझ रही है. दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान) पर एक साथ सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए वायुसेना के पास 42 लड़ाकू विमान स्क्वॉड्रन होने चाहिए. लेकिन पुराने मिग-21 जैसे … Read more

योजना में गड़बड़ी का खुलासा, पुरुषों और लखपति महिलाओं को भी मिल रही थी राशि

मुंबई  महाराष्ट्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मुख्यमंत्री माझी लाड़की बहन योजना’ की जांच में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं सामने आई हैं. दस्तावेजों की जांच और ई-केवाईसी प्रक्रिया के बाद सरकार ने करीब 80 लाख लाभार्थियों को योजना से बाहर कर दिया है. जांच में यह भी खुलासा हुआ कि हजारों पुरुष महिलाओं के नाम पर इस योजना का लाभ उठा रहे थे।  मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बताया कि योजना शुरू करते समय पात्रता के लिए कुछ शर्तें तय की गई थीं, लेकिन शुरुआती चरण में स्व-प्रमाणन (Self Certification) के आधार पर आवेदन स्वीकार किए गए थे. बाद में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने लाभार्थियों के सत्यापन को लेकर सवाल उठाए, जिसके बाद राज्य सरकार ने व्यापक जांच और केवाईसी अभियान शुरू किया।  जांच में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े सरकार की तरफ से कराए गए विभिन्न सरकारी डेटाबेस के मिलान के बाद कई तरह की गड़बड़ियां सामने आईं. जांच में पता चला कि करीब 16 हजार पुरुषों ने खुद को महिला बताकर योजना का लाभ लिया. इसके अलावा लगभग 5 लाख सरकारी कर्मचारी, 10 लाख आयकरदाता और 4 से 5 लाख ऐसे लाभार्थी पाए गए जिनके परिवार के पास चार पहिया वाहन मौजूद है, जबकि योजना के नियमों के तहत वे पात्र नहीं थे।  सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 74 हजार ऐसी महिलाएं भी पाई गईं, जिनकी उम्र 21 वर्ष से कम थी, जबकि करीब 2 लाख महिलाओं की उम्र 65 वर्ष से अधिक निकली. दोनों ही श्रेणियां योजना की पात्रता शर्तों से बाहर हैं।  ई-केवाईसी नहीं कराने वालों पर भी कार्रवाई जांच में यह भी सामने आया कि करीब 62 लाख लाभार्थियों ने बार-बार मौका दिए जाने के बावजूद ई-केवाईसी नहीं कराया. सरकार ने ई-केवाईसी की समय-सीमा तीन बार बढ़ाई थी और करीब पांच महीने तक लोगों को दस्तावेज सत्यापन का अवसर दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लाभार्थियों ने प्रक्रिया पूरी नहीं की।  सरकार का कहना है कि ई-केवाईसी पहचान सत्यापन की एक अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य फर्जी खातों, पहचान की चोरी और वित्तीय धोखाधड़ी को रोकना है।  अब भी 1.60 करोड़ महिलाओं को मिल रहा लाभ उधर मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री फडणवीस ने स्पष्ट किया कि अपात्र लाभार्थियों को हटाने के बावजूद योजना का लाभ अभी भी करीब 1.60 करोड़ पात्र महिलाओं को मिल रहा है. उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य योजना को पारदर्शी बनाना और यह सुनिश्चित करना है कि सहायता राशि केवल वास्तविक और पात्र महिलाओं तक ही पहुंचे।  राज्य सरकार का दावा है कि इस कार्रवाई से योजना में पारदर्शिता बढ़ेगी और सरकारी धन का दुरुपयोग रोका जा सकेगा. वहीं विपक्ष इस पूरे मामले को लेकर सरकार से जवाब मांग रहा है कि शुरुआती चरण में इतनी बड़ी संख्या में अपात्र लोगों के आवेदन कैसे स्वीकृत हो गए। 

घरों में रखा सोना बनेगा देश की ताकत? PM मोदी सरकार की नई रणनीति पर चर्चा तेज

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों जनता से सालभर सोना नहीं खरीदने की अपील करके सभी को चौंका दिया था. सरकार का तर्क था कि सोने की बढ़ती खपत से देश का आयात बिल काफी बढ़ रहा है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ रहा है. इस अपील का कितना असर हुआ या होगा, ये तो नहीं पता लेकिन सरकार ने सोने की वजह से आयात बिल पर पड़ने वाले बोझ को कम करने का दूसरा प्‍लान बना लिया है. सरकार की न‍िगाह देश के घरों और मंदिरों में जमा करीब 32 हजार टन सोने पर है. उसका मानना है कि इसमें से अगर 1 फीसदी सोना भी हर साल बाजार में आ जाए तो आयात बिल को एक तिहाई से भी ज्‍यादा कम किया जा सकता है।  भारत में सोने की खरीद निवेश कम और जरूरत ज्‍यादा लगती है. त्‍योहार हो या शादी अथवा अन्‍य कोई मौका, सोने के गहने खरीदना परंपरा से जुड़ा होता है. हालांकि, हर साल सोने की यह खरीद धीरे-धीरे उनके पास ऐसे गोल्‍ड का भंडार तैयार कर देती है, जिसका लंबे समय तक कोई इस्‍तेमाल नहीं होता है. पीएम मोदी ने भी अपनी अपील में इसी तरफ इशारा किया था कि लोग विदेश से नया सोना आयात करने के बजाय, घरों में कैद सोने को ही बाजार में लाएं और रीसाइकिल कराएं।  देश में कितना है सोने का भंडार गोल्‍ड इंडस्‍ट्री से जुड़े एक्‍सपर्ट का मानना है कि भारतीय घरों में करीब 30 से 32 हजार टन सोने का भंडार है, जिसकी कीमत 3.8 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है. यह आंकड़ा कई देशों की जीडीपी से भी ज्‍यादा है. कुछ एक्‍सपर्ट का तो दावा है कि यह आंकड़ा 35,000 टन तक जा सकता है. इसमें से ज्‍यादातर सोने का भंडार बैंक लॉकर्स, अलमारियों और तिजोरियों में भरा हुआ है. अगर इसमें से छोटा सा हिस्‍सा भी इकनॉमी में वापस आ जाए तो इसका बड़ा असर पड़ेगा. सरकार की मंशा भी यही है कि इस सोने को वापस सिस्‍टम में लाया जाए।  आखिर क्‍या है गोल्‍ड रीसाइकलिंग यह बात तो समझ में आती है कि सरकार की मंशा गोल्‍ड रीसाइकलिंग करने की है, लेकिन यह काम होगा कैसे और इसका फायदा क्‍या होगा. गोल्‍ड रीसाइकलिंग का मतलब है पुराने या टूटे गहनों, सिक्‍कों, बार, उद्योगों के स्‍क्रैप और इलेक्‍ट्रॉनिक प्रोडक्‍ट में इस्‍तेमाल किए गए सोने को वापस रिफाइन करके शुद्ध सोने में बदलना. सबसे पहले इन प्रोडक्‍ट की शुद्धता मापी जाती है और फिर उसे पिघलाकर रिफाइन किया जाता है. इस प्रक्रिया से उच्‍च मानक वाला 99.9 फीसदी शुद्धता का सोना प्राप्‍त होता है. फिर इस गोल्‍ड का इस्‍तेमाल ज्‍वैलरी बनाने, सिक्‍के व अन्‍य बुलियन प्रोडक्‍ट को तैयार करने में किया जाता है।  रीसाइकिल से कितना होगा फायदा देश में आयात बिल के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि वित्‍तवर्ष 2025-26 में सोने की डिमांड पूरी करने के लिए 72.4 अरब डॉलर (6.87 लाख करोड़ रुपये) आयात पर खर्च करने पड़े. बाजार एक्‍सपर्ट का मानना है कि अगर देश में मौजूद सोने के भंडार में से 1 फीसदी भी बाजार में वापस लाया जा सके तो आयात को 30 फीसदी से ज्‍यादा कम किया जा सकता है. इस कदम से 300 टन सोने को हर साल वापस सिस्‍टम में लाया जा सकता है, जो आयात बिल का बोझ 2.29 लाख करोड़ रुपये तक कम कर सकता है। 

DA एरियर पर खुशखबरी! केंद्रीय कर्मचारियों के खाते में आ सकता है 4 महीने का बकाया

नई दिल्ली केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स को जुलाई 2026 छमाही के महंगाई भत्ता (DA) और महंगाई राहत (DR) का इंतजार है। बीते छमाही में कर्मचारियों के DA में 2 पर्सेंट की बढ़ोतरी हुई थी और यह 60 फीसदी हो गया। अब ऐसा अनुमान है कि सरकार डीए में 3 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकती है। अगर ऐसा हुआ तो केंद्रीय कर्मचारियों का डीए बढ़कर 63 फीसदी हो जाएगा। डीए की बढ़ोतरी जुलाई से लागू होगी लेकिन इसका सितंबर या अक्टूबर में ऐलान होने की उम्मीद है। अगर सितंबर में ऐलान होता है तो तीन महीने- जुलाई, अगस्त और सितंबर का एरियर मिलेगा। वहीं, अक्टूबर में ऐलान होता है तो चार महीने- जुलाई, अगस्त, सितंबर और अक्टूबर का एरियर मिलेगा। आइए डिटेल जान लेते हैं। क्यों 3 पर्सेंट का है अनुमान? लेबर ब्यूरो की ओर से जारी ताजा महंगाई के आंकड़ों के बाद संकेत मिल रहे हैं कि सरकार DA में करीब 3 फीसदी की बढ़ोतरी कर सकती है। अप्रैल 2026 के लिए जारी ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स फॉर इंडस्ट्रियल वर्कर्स (CPI-IW) बढ़कर 149.9 पर पहुंच गया है। इसी के आधार पर DA की गणना होती है। शुरुआती चार महीनों के आंकड़ों के बाद अनुमान है कि जून तक यह गणना 63 फीसदी के ऊपर बनी रह सकती है। आमतौर पर DA को पूरे अंक में लागू किया जाता है, इसलिए जुलाई से 63 फीसदी महंगाई भत्ता मिलने की संभावना जताई जा रही है। कितनी होगी बढ़ोतरी? अगर 3 फीसदी बढ़ोतरी होती है तो न्यूनतम बेसिक वेतन ₹18,000 पाने वाले कर्मचारी का DA हर महीने ₹540 बढ़ जाएगा। ऐसे में सितंबर के महीने में एरियर 1500 रुपये से ज्यादा और अक्टूबर के महीने में 2000 रुपये से ज्यादा मिलेगा। आठवें वेतन आयोग के दौर में ऐलान यह बढ़ोतरी ऐसे समय पर हो रही है जब 8वें वेतन आयोग को लेकर चर्चा तेज है। कर्मचारी संगठन लगातार मांग कर रहे हैं कि नए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से पहले कम से कम 50 फीसदी DA को बेसिक पे में मर्ज किया जाए। बता दें कि सरकार ने पिछले साल आठवें वेतन आयोग का गठन किया था। यह वेतन आयोग सिफारिशें अगले साल की पहली छमाही तक सरकार को सौंप सकता है। हालांकि, सिफारिशें बैकडेट में जाकर एक जनवरी 2026 से लागू होने की उम्मीद की जा रही हैं। अगर ऐसा होता है तो केंद्रीय कर्मचारियों को सरकार एरियर के तौर पर मोटी रकम दे सकती है। यह एरियर 18 से 20 महीने तक का हो सकता है।

मानसून की दस्तक तय, 4 जून से केरल में शुरू होगी बारिश की जोरदार शुरुआत

 तिरुवनंतपुरम मॉनसून के आगमन को लेकर बड़ी खबर आ रही है। इसके मुताबिक केरल में मॉनसून 4 जून को दस्तक देगा। इस दिन भारी बारिश की भविष्यवाणी की गई है। आम तौर पर मॉनसून एक जून से शुरू होता है। मौसम विभाग ने कहाकि अगले दो- तीन दिन में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व अरब सागर के कुछ और हिस्सों, लक्षद्वीप, केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं। केरल में सात दिन का अलर्ट केरल में मॉनसून के आगमन पर, भारतीय मौसम विभाग के वैज्ञानिक, नीता के गोपाल ने कहाकि मॉनसून शुरू होने की परिस्थितियां तैयार हो रही हैं। इसलिए हम इसके लिए 4 जून की तारीख घोषित करते हैं। 4 जून की शाम से हम अच्छी बारिश देखेंगे। उन्होंने कहाकि चूंकि भारी बारिश होने की संभावना है, इसलिए पूरे केरल में सात दिन तक ‘ऑरेंज’ या ‘येलो’ अलर्ट रहेगा। साथ ही उन्होंने चेतावनी देते हुए कहाकि अगर भारी बारिश जारी रहती है तो हमें सतर्क रहना चाहिए। इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों के लिए प्रतिबंधों के साथ ऑरेंज अलर्ट रहेगा। अनुकूल हैं हालात मौसम विभाग के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आगे बढ़ने के लिए अनुकूल हालात हैं। इस तरह दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व अरब सागर, लक्षद्वीप द्वीपसमूह, केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों, बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिम, पश्चिम-मध्य, पूर्व-मध्य औरपूर्व हिस्सों और बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पूर्व के शेष हिस्सों में 4 जून के आसपास यह आगे बढ़ सकता है। आईएमडी ने पहले बताई थी यह तारीख गौरतलब है कि आईएमडी ने इससे पहले केरल में मॉनसून के आगमन की तारीख 26 मई बताई थी। हालांकि, मॉनसून के आगे बढ़ने की प्रक्रिया में देरी हुई और विभाग ने 29 मई को कहा था कि इसका आगमन अगले सप्ताह हो सकता है। पिछले हफ्ते जारी अपने संशोधित पूर्वानुमान में आईएमडी ने कहाकि इस मौसम में बारिश सामान्य से कम रहेगी। आईएमडी ने यह भी कहा कि इस वर्ष भारत में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) का 90 फीसदी बारिश होने की संभावना है। क्या है एलपीए एलपीए से आशय किसी क्षेत्र में एक निश्चित अवधि, जैसे एक माह या पूरे मौसम के दौरान हुई वर्षा के उस औसत से है, जिसकी गणना आमतौर पर 30 से 50 वर्षों के दीर्घकालिक आंकड़ों के आधार पर की जाती है। वर्ष 1971 से 2020 के आंकड़ों के आधार पर पूरे भारत में मौसमी वर्षा का एलपीए 87 सेंटीमीटर निर्धारित किया गया है। यदि किसी वर्ष मॉनसून के दौरान होने वाली वर्षा एलपीए के 90 फीसदी से कम रहती है, तो आईएमडी उसे कम वर्षा वाला मॉनसून घोषित करता है। आईएमडी के अनुसार, इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा होने की एक प्रमुख वजह अल नीनो परिस्थितियों का विकसित होना हो सकता है। अल नीनो की स्थिति आमतौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान वर्षा को प्रभावित करती है और बारिश कम होने की आशंका बढ़ जाती है।

सोशल मीडिया पर नाबालिगों की एंट्री पर रोक, मलेशिया ने लागू किए सख्त नियम

कुआलालंपुर  मलेशिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगाने वाले नए नियम लागू करना शुरू कर दिया है. यह कदम बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत बनाने की ग्लोबल कोशिशों का हिस्सा माना जा रहा है. हालांकि इस फैसले को लेकर सभी लोग सहमत नहीं हैं और कुछ लोगों ने डेटा सुरक्षा तथा संभावित निगरानी को लेकर चिंता भी जताई है. नए नियमों के तहत मलेशिया में कम से कम 80 लाख यूजर्स वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उम्र की जांच करने वाली व्यवस्था लागू करनी होगी. इसमें फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे बड़े प्लेटफॉर्म शामिल हैं. इन कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि 16 साल से कम उम्र के बच्चे नया अकाउंट न बना सकें।  मलेशिया सरकार ने जारी किए निर्देश मलेशिया के कम्युनिकेशन और मल्टीमीडिया कमीशन के अनुसार मौजूदा यूजर्स की उम्र का सत्यापन अगले 6 महीनों के भीतर शुरू किया जाएगा. जिन यूजर्स की उम्र 16 साल से कम है, उन्हें अपने फोटो, वीडियो और अन्य डेटा डाउनलोड या ट्रांसफर करने के लिए एक महीने का समय दिया जाएगा. इसके बाद उनके अकाउंट पर प्रतिबंध या अन्य कार्रवाई लागू की जा सकती है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि जो सोशल मीडिया कंपनियां इन नियमों का पालन नहीं करेंगी, उन पर 1 करोड़ रिंगिट यानी लगभग 25 लाख अमेरिकी डॉलर तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. वहीं यदि कोई बच्चा नियमों को दरकिनार कर अकाउंट बनाने में सफल हो जाता है, तो उसके माता-पिता के खिलाफ कोई सजा नहीं होगी।  मलेशिया के अलावा अन्य देशों में बैन मलेशियाई सरकार का कहना है कि इन नियमों का मुख्य मकसद बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री, साइबर बुलिंग और सोशल मीडिया के अत्यधिक इस्तेमाल से बचाना है. सरकार का मानना है कि कुछ प्लेटफॉर्म फीचर्स बच्चों को लंबे समय तक ऑनलाइन रहने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे उनके मानसिक और सामाजिक जीवन पर असर पड़ सकता है. दुनिया के कई अन्य देश भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर ऐसे कदम उठा रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों ने सोशल मीडिया इस्तेमाल के लिए उम्र आधारित नियम लागू किए हैं या उनकी घोषणा की है. वहीं ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, डेनमार्क, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी इसी तरह की नीतियों पर विचार कर रहे हैं।  सोशल मीडिया को बैन करने का खास मकसद क्या है? मलेशिया के रेगुलेटरी बोर्ड ने कहा है कि इन नियमों का मकसद बच्चों को डिजिटल तकनीक से दूर करना नहीं है. बल्कि सोशल मीडिया कंपनियों को यूजर सुरक्षा बढ़ाने, अत्यधिक उपयोग को रोकने और कम उम्र के यूजर्स व नुकसान पहुंचाने वाले कंटेंट के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने के लिए बाध्य करना है. हालांकि टेक्नोलॉजी कंपनियों ने अभी तक यह नहीं बताया है कि वे इन नियमों का पालन किस तरह करेंगी. इस बीच, क्लारा कोह ने चेतावनी दी है कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर पूरी तरह रोक लगाने से उल्टा असर भी हो सकता है. उनके अनुसार इससे किशोर सुरक्षित और नियंत्रित प्लेटफॉर्म छोड़कर इंटरनेट के ऐसे हिस्सों की ओर जा सकते हैं, जहां निगरानी और सुरक्षा के उपाय कम होते हैं।  ऑस्ट्रेलिया समेत इंडोनेशिया में सोशल मीडिया पर बैन ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया है. यह नियम 10 दिसंबर 2025 से प्रभावी हुआ. इसके बाद इंडोनेशिया ने 28 मार्च 2026 से 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर कानूनी रोक लागू की. फ्रांस में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध का विधेयक निचले सदन से पारित हो चुका है, हालांकि इसे अभी सीनेट की मंजूरी मिलनी बाकी है. डेनमार्क भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन की योजना पर काम कर रहा है।  दुनिया के कई देशों में बैन ग्रीस ने जनवरी 2027 से 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू करने की तैयारी शुरू कर दी है. वहीं स्पेन, ऑस्ट्रिया, पोलैंड, स्लोवेनिया, तुर्की और ब्रिटेन जैसे देश भी बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करने के लिए नए नियमों और संभावित प्रतिबंधों पर विचार कर रहे हैं. इटली में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी है. फ्रांस में पहले से लागू नियमों के तहत 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए अभिभावकों की सहमति आवश्यक है. जर्मनी में भी 13 से 16 साल की उम्र के बीच के बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट बनाने या इस्तेमाल करने के लिए माता-पिता की अनुमति जरूरी है।   

खुद को ‘डीलमेकर’ और नेतन्याहू को ‘हार्डलाइनर’ बता रहे ट्रंप? वायरल दावे से सियासी हलचल

यरुशलम तुम्हारा दिमाग खराब हो चुका है, अगर मैं न होता, तो तुम अब तक जेल में होते. ये मैं हूं जो तुम्हारी जान बचा रहा हूं. अब हर कोई तुमसे नफरत करता है. इसी वजह से हर कोई इजरायल से भी नफ़रत करता है। ये दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्राध्यक्ष की भाषा तो कतई नहीं है. तो फिर क्या हुआ कि ट्रंप अपने सबसे करीबी साथी इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर इस तरह बिफर गए।  हैरान करने वाले ये जुमले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की है. जो उन्होंने फोन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को बेहद गुस्से में कहे. इस टकराव का खुलासा अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस ने अपनी एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में की है।  ये झगड़ा नहीं स्ट्रैटेजिक डिफरेंस है तो क्या अमेरिकी राष्ट्रपति सचुमच इजरायली प्रधानमंत्री से नाराज है. ट्रंप और नेतन्याहू के बीच टकराव मुख्य रूप से ईरान डील और लेबनान/हेजबुल्लाह पर है. यह कोई पुराना व्यक्तिगत झगड़ा नहीं, बल्कि ईरान-इजराइल-यूएस टेंशन के बीच का स्ट्रैटेजिक डिफरेंस है।  दरअसल ट्रंप की प्राथमिकता अब एक ऐसी डील है जिसे वह अपनी विदेश नीति की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकें. ट्रंप ईरान के साथ डील में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से बड़ी लकीर खींचना चाहते हैं।  उन्होंने हाल ही में दावा किया कि ईरान के साथ समझौता निकट हो सकता है और बातचीत तेज गति से चल रही है. लेकिन ये वार्ता बार बार डिरेल हो रही है.  दूसरी ओर इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों और लेबनान में बढ़ते संघर्ष ने इन वार्ताओं को बार-बार बाधित किया है. ईरान ने भी आरोप लगाया है कि इजरायली हमले कूटनीतिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा रहे हैं।  नेतन्याहू 'हार्डलाइनर' और ट्रंप 'डीलमेकर' विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की रणनीति दोहरी हो सकती है. पहला वह ईरान को यह संदेश देना चाहते हैं कि अमेरिका बातचीत के लिए गंभीर है और क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला पक्ष हमेशा वॉशिंगटन नहीं है. तेल अवीव भी ऐसा करता है. दूसरा वह नेतन्याहू पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाना चाहते हैं कि इजरायल की सैन्य कार्रवाइयां अमेरिकी कूटनीतिक लक्ष्यों को बाधित न करें।  कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि ट्रंप को लगता है कि समझौता उनकी राजनीतिक जीत साबित हो सकता है, तो वह नेतन्याहू को "कठोर नेता" की छवि में दिखाकर खुद को "डीलमेकर" के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं. इसलिए वह ट्रंप को कथित रूप से कड़वे शब्द कह रहे हैं।  एक्सियोस के अनुसार लेबनान में ऑपरेशन के लिए ट्रंप ने नेतन्याहू को खरी-खोटी सुनाई और अपशब्दों तक का प्रयोग कर डाला. ट्रंप इजरायल द्वारा लेबनान में शुरू की जा रही सैन्य कार्रवाई से बेहद खफा थे. खासकर बेरूत पर हमले की योजना से. इजरायल का ये कदम  ट्रंप की ईरान के साथ चल रही डिप्लोमेसी को बर्बाद कर सकती थी।  इजरायल को सता रहा अलग डर वहीं इजरायली पक्ष को डर है कि ट्रंप ईरान को कमजोर करने के बजाय अस्थायी डील पर राजी हो जाएंगे, जिससे तेहरान को सांस लेने का मौका मिलेगा और हेजबुल्लाह जैसे प्रॉक्सी मजबूत होंगे।  ट्रंप ईरान के साथ अपनी डील को पूरा करने के लिए इजरायल की कार्रवाइयों को समस्या के रूप में पेश कर सकते हैं. इससे अमेरिकी जनता और गल्फ सहयोगियों में इजरायल पर दबाव बढ़ेगा।  ट्रंप के लिए ईरान युद्ध जल्द खत्म करना राजनीतिक जरूरत है. अमेरिका की इकोनॉमी, तेल कीमतें और 2026 के मध्यावधि चुनावों को देखते हुए ट्रंप इसे किसी भी कीमत पर पूरा करने चाह रहे हैं।  इजरायल को 'प्रॉब्लम' दिखाकर ट्रंप ईरान पर भी डील के लिए राजी होने का अप्रत्यक्ष दबाव डाल रहे हैं. इसके बाद ट्रंप के पास इजरायल को ये कहने का अधिकार होगा कि उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इजरायल को लेबनान पर हमला करने से रोक दिया अब ईरान की बारी है कि वो डील के शर्तों पर राजी हो।  ईरान बातचीत तेज करने का दावा कर रहा है, लेकिन लेबनान में छोटे-मोटे हमले जारी हैं. ट्रंप की 'आर्ट ऑफ डील' फिर परीक्षा की कसौटी पर है. क्या वे इजरायल को काबू में रख ईरान को मना पाएंगे, या क्षेत्र फिर आग की चपेट में आ जाएगा?   

US Federal Appeals Court ने ट्रांसजेंडर सैन्य कर्मियों की बर्खास्तगी पर लगाई रोक

वाशिंगट  अमेरिकी फेडरल अपीलीय कोर्ट ने अमेरिकी सेना (पेंटागन) से ट्रांसजेंडर सैनिकों को हटाने पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने अपने फैसले में ट्रांसजेंडर सैनिकों पर लगाए गए प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया है और सरकार के इस कदम को भेदभावपूर्ण माना है। जज ने ट्रंप प्रशासन को फटकार लगाते हुए साफ कहा कि यह फैसला किसी सेना के भले के लिए नहीं, बल्कि समाज के एक खास तबके को सिर्फ और सिर्फ नुकसान पहुंचाने के लिए लिया गया लगता है। अदालत ने यह फैसला 2-1 के बहुमत से सुनाया और ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने रक्षा मंत्रालय के हाथ बांध दिए थे। जेंडर के आधार पर नहीं जाएगी नौकरी इस फैसले के बाद अब सरकार सेना में पहले से मौजूद किसी भी ट्रांसजेंडर सैनिक को उसकी जेंडर पहचान के आधार पर नौकरी से नहीं निकाल पाएगी। डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिकी सेना में ट्रांसजेंडरों की सेवा पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इससे सेना की युद्ध क्षमता पर असर पड़ता है। ट्रंप के इस फरमान के बाद सेना में हड़कंप मच गया था और नौकरी से निकाले जाने के डर से ट्रांसजेंडर सैनिकों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।