samacharsecretary.com

शोएब अख्तर के भाई के जनाजे पर विवाद, वायरल वीडियो में आतंकी संगठन से जुड़े चेहरों को लेकर उठे सवाल

इस्लामाबाद पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शोएब अख्तर एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह क्रिकेट नहीं बल्कि उनके बड़े भाई शाहिद अख्तर का जनाजा है. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दावा किया जा रहा है कि नमाज-ए-जनाजा में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और उससे जुड़े राजनीतिक संगठन पाकिस्तान मरकज़ी मुस्लिम लीग (PMML) के कई नेता और कार्यकर्ता मौजूद थे।  रिपोर्ट्स के मुताबिक, शाहिद अख्तर का जनाजा इस्लामाबाद के H-8 कब्रिस्तान में हुआ. वायरल वीडियो में पाकिस्तान मरकज़ी मुस्लिम लीग के अध्यक्ष इनाम-उर-रहमान समेत कई लोगों के दिखाई देने का दावा किया गया है. सोशल मीडिया पर यह भी कहा जा रहा है कि वीडियो PMML से जुड़े आधिकारिक प्लेटफॉर्म पर साझा किया गया।  इनाम-उर-रहमान का नाम पहले भी चर्चा में रहा है. पाकिस्तान मरकज़ी मुस्लिम लीग को लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद से जुड़ा राजनीतिक मंच बताया जाता रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल कुछ तस्वीरों में इनाम-उर-रहमान को पहलगाम हमले के कथित मास्टरमाइंड सैफुल्लाह कसूरी के साथ भी दिखाए जाने का दावा किया जा रहा है।  हाफिज सईद करीबी थे शामिल  शोएब अख्तर के भाई शाहिद अख्तर के जनाजे में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) की पॉलिटिकल पार्टी से जुड़े नेताओं की मौजूदगी देखी गई. जिसमें आतंकी हाफिज सईद के कई करीबी हुए जनाजे में शामिल हुए हैं. पीएमएमएल इस्लामाबाद के अध्यक्ष इनाम-उर-रहमान कम्बोह के शामिल होने की तस्वीरें सामने आई हैं. यह तस्वीरें और वीडियो लश्कर-ए-तैयबा  और पीएमएमएल की तरफ से आधिकारिक रूप से जारी किया गया है. शहीद अख्तर की जनाजे की नमाज पर पाकिस्तान सेंट्रल मुस्लिम लीग इस्लामाबाद के अध्यक्ष इनाम-उर-रहमान कंबोह, उप महासचिव अब्दुल्ला तूर, जोनल महासचिव हाफिज उमर, खिदमत कमेटी के अध्यक्ष अमजद भट्टी और अन्य मित्र उपस्थित थे।  कौन-कौन थे शामिल  शोएब अख्तर के भाई के जनाजे में इनाम उर रहमान काम्बोह दिखा था. यह इस्लामाबाद में संगठन का बड़ा चेहरा है. जिसके साथ कई जनाजे में शामिल दूसरे लोग भी लश्कर ए तैयबा से जुड़े हैं. बता दें कि पीएमएमएल पार्टी आतंकी हाफिज सईद के समर्थन से बनी पार्टी मानी जाती है. क्योंकि उसके संगठन लश्कर-ए-तैयबा पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रतिबंध लग चुका है. ऐसे में पाकिस्तान की राजनीति में एक्टिव रहने के लिए हाफिज सईद के समर्थन से पीएमएमएल को बनाया गया था. लेकिन इस पार्टी से जुड़े लोग जब शोएब अख्तर के जनाजे में पहुंचे तो सवाल उठना लाजिमी है।  नेशनल असेंबली के स्पीकर और आतंकी भी जनाजे में शामिल इसी बीच पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर सरदार अयाज़ सादिक भी शोएब अख्तर के घर पहुंचे और शाहिद अख्तर के निधन पर परिवार के प्रति संवेदना जाहिर की. नेशनल असेंबली की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि स्पीकर ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की और परिवार को इस दुख की घड़ी में हिम्मत देने की कामना की।  आतंकी पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं जनाजे में कथित तौर पर प्रतिबंधित संगठन से जुड़े लोगों की मौजूदगी के दावों ने पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों और उनके राजनीतिक नेटवर्क को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं. पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आरोप लगते रहे हैं कि कुछ प्रतिबंधित संगठन अलग-अलग नामों और मंचों के जरिए अपनी गतिविधियां जारी रखते हैं।  बता दें कि शोएब अख्तर के भाई शाहिद अख्तर की मौत के बाद पाकिस्तान में बड़ी-बड़ी हस्तियों ने दुख जताया है. देश के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी शोक संदेश भेजा है. जबकि पाकिस्तान की राजनीति से जुड़े दूसरे कई लोग और सेलिब्रिटीज और क्रिकेटर्स ने भी दुख जताया है. लेकिन जनाजे में पीएमएमएल और लश्कर ए तैयबा से जुड़े लोगों के पहुंचने से अब सवाल खड़े हो रहे हैं. क्योंकि पाकिस्तान में शोएब अख्तर बड़ा नाम माने जाते हैं। 

DA Hike Update: 8वां वेतन आयोग लागू होने से पहले बढ़ सकता है महंगाई भत्ता, लाखों कर्मचारियों को मिलेगा फायदा

नई दिल्ली केंद्र सरकार के कर्मचारी, पेंशनभोगी और उनसे जुड़े सभी हितधारक इस समय दो बड़े फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। पहला, महंगाई भत्ते (DA) में संशोधन की घोषणा और दूसरा, 8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया में हो रही प्रगति। चूंकि 8वां वेतन आयोग अभी विचार-विमर्श के दौर में है, इसलिए मौजूदा 7वें वेतन आयोग के ढांचे के तहत जल्द ही एक और डीए में इजाफे की घोषणा हो सकती है। डीए में बढ़ोतरी सेवारत कर्मचारियों और पेंशनर्स को साल में दो बार दी जाती है। आइए, 26 जून 2026 तक के सबसे ताजा अपडेट को समझते हैं… DA की चर्चा क्यों हो रही है? महंगाई भत्ते में संशोधन साल में दो बार किया जाता है, एक बार जनवरी में और दूसरी बार जुलाई में। ऐसा बढ़ती जीवन लागत की भरपाई के लिए किया जाता है और सरकार इसे केंद्रीय कर्मचारियों व पेंशनभोगियों के लाभ के लिए प्रदान करती है। यह संशोधन अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-IW) के 12 महीने के औसत से जुड़ा होता है। चूंकि 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें अभी तक लागू नहीं हुई हैं, कर्मचारियों को 7वें वेतन आयोग के ढांचे के तहत ही डीए संशोधन मिलता रहेगा। जुलाई 2026 के डीए संशोधन की आज व्यापक चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि महंगाई और CPI-IW के ट्रेंड एक और इजाफे की ओर इशारा कर रहे हैं। महंगाई के लेटेस्ट आंकड़े क्या बताते हैं? सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के ताजा आंकड़े साफ दिखाते हैं कि खुदरा महंगाई लगातार ऊंची बनी हुई है और खाने-पीने की चीजों की कीमतें अब भी अहम वजह बनी हुई हैं। मई 2026 में खुदरा महंगाई अप्रैल 2026 की तुलना में बढ़ गई। समग्र सीपीआई मुद्रास्फीति मई में 3.93 प्रतिशत रही, जो अप्रैल के 3.48 प्रतिशत से अधिक है। ग्रामीण इलाकों में महंगाई दर 3.74 प्रतिशत से बढ़कर 4.25 प्रतिशत हो गई, जबकि शहरी महंगाई 3.16 प्रतिशत से उछलकर 3.53 प्रतिशत पर पहुंच गई। खाद्य महंगाई भी अप्रैल के 4.20 प्रतिशत के मुकाबले मई में 4.78 प्रतिशत दर्ज की गई। महंगाई में खासकर खाने-पीने की कीमतों में आई यह तेजी इस उम्मीद को बल देती है कि सरकार जल्द ही डीए में एक और संशोधन और समायोजन पर विचार कर सकती है। हालांकि, अंतिम वृद्धि का निर्णय सीपीआई-आईडब्ल्यू के आंकड़ों और कैबिनेट की मंजूरी पर ही निर्भर करेगा। अभी कितना महंगाई भत्ता मिल रहा है और कितना बढ़ सकता है? सभी केंद्र सरकार के कर्मचारियों को इस समय नवीनतम संशोधन के बाद मूल वेतन का 58 प्रतिशत महंगाई भत्ता मिल रहा है। जुलाई 2026 की डीए वृद्धि की घोषणा अभी तक नहीं हुई है, जबकि महीना शुरू होने में बस कुछ ही दिन बाकी हैं। मुद्रास्फीति के रुझानों और CPI-IW की गतिविधियों के आधार पर 2 से 3 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद बन रही है, लेकिन अंतिम आंकड़ा आधिकारिक गणना और केंद्र सरकार के अपडेट के बाद ही तय होगा। यह लाभ केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों दोनों पर समान रूप से लागू होता है। 8वें वेतन आयोग के लिए कर्मचारी संगठनों की क्या मांगें हैं? पिछले कुछ महीनों से कर्मचारी संघों, स्टेक होल्डर ग्रुप्स और विभिन्न संगठनों ने 8वें वेतन आयोग के समक्ष कई मुद्दे उठाए हैं। इनमें महंगाई से निपटने के लिए उच्च न्यूनतम वेतन, कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने, भत्तों में संशोधन और भुगतान ढांचे में बदलाव जैसी मांगें शामिल हैं। केंद्रीय सरकारी कर्मचारी एवं कामगार परिसंघ ने ज्यादा न्यूनतम वेतन, बेहतर पेंशन लाभ और भत्तों की समीक्षा की बात रखी है। ऑल इंडिया डिफेंस एम्पलाइज फेडरेशन ने सैलरी स्ट्रक्चर में संशोधन, विसंगतियों को दूर करने और बेहतर सेवा लाभों की मांग की है। वहीं, नेशनल ज्वाइंट काउंसिल ऑफ एक्शन (NJCA) से जुड़े समूह बेहतर फिटमेंट फैक्टर, वेतन असमानताओं में सुधार और कर्मचारी-हितैषी सुधारों पर जोर दे रहे हैं। कर्मचारी समूहों का मानना है कि अगली वेतन संरचना तय करते समय बढ़ती लागत, लगातार बढ़ती महंगाई, कर्मचारियों का मनोबल, उनकी आजीविका का भविष्य और जीवन-यापन के खर्चों में हो रहे बदलावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। 8वें वेतन आयोग की प्रक्रिया पर ताजा अपडेट 8वां वेतन आयोग अब विचार-विमर्श के चरण में प्रवेश कर चुका है। 3 नवंबर 2025 को गठन के बाद से इसे सात महीने पूरे हो चुके हैं। आयोग सिफारिशें तैयार करने से पहले फीडबैक जुटाने के लिए दिल्ली, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हितधारकों से मुलाकात कर रहा है। हाल ही में 22-23 जून 2026 को लखनऊ में बैठकें हुईं, जिनमें कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों और वेतन संबंधी चिंताओं पर चर्चा की गई। आयोग के ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भी विचार-विमर्श जारी रखने की उम्मीद है। यह प्रक्रिया अभी शुरुआती दौर में है और फिटमेंट फैक्टर, संशोधित सैलरी मैट्रिक्स, पेंशन सुधार या लागू होने की तारीख को लेकर अब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

मोदी कैबिनेट में बदलाव की आहट! कई मंत्रियों की छुट्टी तय?, TMC और शिवसेना के बागियों की एंट्री की चर्चा

नई दिल्ली केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संगठन में अगले कुछ दिनों में बड़े स्तर पर फेरबदल हो सकता है. सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार में मंत्रिमंडल के विस्तार और संगठनात्मक बदलाव दोनों पर गंभीरता से मंथन चल रहा है. इस कवायद में कुछ नए चेहरों को सरकार में जगह मिल सकती है, जबकि कुछ मौजूदा मंत्रियों की जिम्मेदारियां बदली जा सकती हैं।  सूत्रों के अनुसार, हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद एनडीए का कुनबा मजबूत हुआ है. ऐसे में सहयोगी दलों और हाल में एनडीए के साथ आए नेताओं को भी सरकार में प्रतिनिधित्व देने की तैयारी की जा रही है. इसी क्रम में महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल से कुछ अहम नेताओं के नाम चर्चा में हैं।  टीएमसी के एक बागी को कैबिनेट में जगह सूत्रों का कहना है कि शिवसेना (शिंदे गुट) के सांसद श्रीकांत शिंदे को केंद्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट रैंक के साथ शामिल किया जा सकता है. वहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों में काकोली घोष, सुदीप बंदोपाध्याय और शताब्दी राय के नामों पर भी विचार चल रहा है. इनमें से किसी एक को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है।  इसके अलावा शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) से अलग हुए सांसद संजय दीना पाटिल का नाम भी संभावित मंत्रियों की सूची में बताया जा रहा है. माना जा रहा है कि सहयोगी दलों और नए राजनीतिक साथियों को उचित प्रतिनिधित्व देकर एनडीए अपने राजनीतिक विस्तार को और मजबूत करना चाहता है।  कुछ मंत्रियों का बदलेगा रोल सूत्रों के मुताबिक, केवल नए मंत्रियों की नियुक्ति ही नहीं, बल्कि कुछ मौजूदा मंत्रियों की जिम्मेदारियां भी बदली जा सकती हैं. उत्तर प्रदेश और दिल्ली बीजेपी की कमान संभाल चुके पंकज चौधरी और हर्ष मल्होत्रा को संगठन में अधिक सक्रिय भूमिका देने के लिए केंद्र सरकार से मुक्त किया जा सकता है. यदि ऐसा होता है तो उनके स्थान पर नए चेहरों को मंत्री बनाया जा सकता है।  जानकारी यह भी है कि भाजपा सरकार में शामिल कुछ वरिष्ठ नेताओं को संगठन में अहम जिम्मेदारी देने की रणनीति पर काम कर रही है. इसके बदले सरकार में अपेक्षाकृत युवा नेताओं को अवसर देकर नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार करने की कोशिश की जा सकती है।  सिर्फ सरकार ही नहीं, बीजेपी के संगठनात्मक ढांचे में भी व्यापक बदलाव की संभावना जताई जा रही है. सूत्रों के अनुसार, पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर कम से कम दो महिला उपाध्यक्षों की नियुक्ति कर सकती है. इसके अलावा त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं को भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद दिए जाने पर विचार चल रहा है। 

SC ने खत्म किया 70 साल पुराना भूमि विवाद, पीढ़ियां बीत गईं, अब जाकर मिला अंतिम फैसला

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे अनोखे और 70 साल पुराने जमीन विवाद का निपटारा किया है, जो देश के सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल से होकर गुजरा है। दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में फैसला सुनाने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच के दोनों जजों का तब जन्म भी नहीं हुआ था, जब यह कानूनी विवाद शुरू हुआ था। यह पूरा मामला साल 1957 की एक सेल डीड (बिक्री विलेख) से जुड़ा हुआ है। क्या है 70 साल पुराना यह जमीन विवाद? टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विवाद 4 जून 1957 को हरिद्वार के नरसीपुर कलां गांव में 15.5 बीघा जमीन की खरीद से जुड़ा है। इस जमीन को अपीलकर्ता शराफत अली के पूर्वजों ने खरीदा था। उस समय शराफत अली के पूर्वज नाबालिग थे, इसलिए जमीन की यह खरीद उनके पिता ने की थी। शुरुआत में यह मामला दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की कार्यवाही के रूप में शुरू हुआ, जो बाद में यूपी जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 और चकबंदी ढांचे (कंसोलिडेशन फ्रेमवर्क) के दायरे में चला गया। चार पीढ़ियों ने लड़ी कानूनी लड़ाई, गुजर गए लोग इस केस का सफर इतना लंबा रहा कि इस दौरान एक के बाद एक पीढ़ियां गुजर गईं। मुकदमे की इस लंबी और घुमावदार यात्रा के दौरान अपीलकर्ता शराफत अली का भी निधन हो गया। इसके बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट तक इस लड़ाई को लड़ा। इस तरह एक ही परिवार की चार पीढ़ियां इस 70 साल पुरानी मुकदमेबाजी में उलझी रहीं। सुप्रीम कोर्ट ने पलटा निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए अहम फैसला सुनाया। इससे पहले निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) और हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अपीलकर्ता इस सेल डीड के निष्पादन को साबित करने में विफल रहे हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट दोनों के निष्कर्षों को खारिज कर दिया और डीड को वैध माना। म्यूटेशन और चकबंदी में कैसे उलझा था मामला? जमीन की खरीद के बाद जब खरीदार के नाम पर दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) का समय आया, तो बेचने वाले ने शुरुआत में आपत्ति जताई। हालांकि, बाद में उसने आपत्ति वापस ले ली ताकि राजस्व अधिकारी अपीलकर्ताओं के पक्ष में जमीन का म्यूटेशन कर सकें। लेकिन, जब गांव में चकबंदी की प्रक्रिया शुरू हुई, तो अपीलकर्ताओं ने पाया कि खरीदी गई जमीन के मालिक के रूप में उनका नाम रिकॉर्ड से गायब था और वह अभी भी बेचने वाले के नाम पर ही दर्ज थी। चकबंदी अधिकारी ने म्यूटेशन रिकॉर्ड के आधार पर अपीलकर्ताओं का नाम जमीन के मालिक के रूप में दर्ज कर दिया। लेकिन बेचने वालों ने इसे फिर से चुनौती दी, जिसके बाद चकबंदी अधिकारी ने नए सिरे से फैसला करने का आदेश दिया था। आखिरकार, अब 70 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का अंतिम समाधान हो गया है।

Solar Power से चमका उत्तर रेलवे, 2 महीने में 3.4 मिलियन यूनिट बिजली बनाई, ₹2.2 करोड़ की बचत

नई दिल्ली  नॉर्दर्न रेलवे पर्यावरण संरक्षण और बिजली की लागत कम करने के मकसद से सोलर एनर्जी को बढ़ावा दे रहा है। इस पहल के तहत, अप्रैल और मई के दौरान रूफटॉप सोलर क्षमता में 2.2 MW की बढ़ोतरी की गई है। आने वाले दिनों में सोलर पैनल लगाने के काम को और तेज करने की कोशिश की जाएगी। चीफ पब्लिक रिलेशंस ऑफिसर हिमांशु शेखर उपाध्याय ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी, एनर्जी सिक्योरिटी, कार्बन उत्सर्जन में कमी और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए, नॉर्दर्न रेलवे ने अपने रिन्यूएबल एनर्जी सफर में एक और अहम उपलब्धि हासिल की है। कुल सोलर क्षमता बढ़कर लगभग 28.35 MW  इस फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती दो महीनों में, अलग-अलग रेलवे स्टेशनों और सर्विस बिल्डिंग्स में लगभग 2.2 MW क्षमता वाले ग्रिड-कनेक्टेड रूफटॉप सोलर पावर प्लांट चालू किए गए। इन नए प्लांट के लगने से, नॉर्दर्न रेलवे की कुल सोलर क्षमता बढ़कर लगभग 28.35 MW हो गई है। यह उपलब्धि कार्बन उत्सर्जन कम करने, नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को पूरा करने और पर्यावरण के अनुकूल ट्रांसपोर्टेशन को बढ़ावा देने की इंडियन रेलवे की कोशिशों को और मजबूत करती है। इस फाइनेंशियल ईयर के शुरुआती दो महीनों में, नॉर्दर्न रेलवे के सोलर पावर प्लांट से लगभग 3.4 मिलियन यूनिट बिजली पैदा हुई, जिससे एनर्जी की लागत में लगभग ₹2.2 करोड़ की बचत हुई। इस सोलर पावर जनरेशन से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 2,820 टन की कमी आने की उम्मीद है।  

High Court Verdict: इस्लाम अपनाने के बाद OBC दर्जा और आरक्षण का लाभ नहीं, कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

चेन्नई मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में धर्म परिवर्तन और आरक्षण को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिसके तहत हिंदू धर्म की पिछड़ी, अति-पिछड़ी या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को 'बैकवर्ड क्लास मुस्लिम' का दर्जा और आरक्षण देने की बात कही गई थी। जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस पी बी बालाजी की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ एक मुस्लिम होता है। पीठ ने कहा, “कोई भी शख्स इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ 'एक मुसलमान' रह जाता है, बस बात यहीं खत्म। वह बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के दर्जे या आरक्षण का दावा कतई नहीं कर सकता।" क्या था मामला? यह मामला थूथुकुडी जिले के रहने वाले समीर अहमद की याचिका के बाद सामने आया। पहले उसका नाम परमशिवम था। परमशिवम का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। 2015 में उसने इस्लाम धर्म अपनाकर अपना नाम समीर अहमद रख लिया और मुस्लिम रीति-रिवाजों से शादी की। धर्म परिवर्तन के बाद समीर ने तहसीलदार के पास 'मुस्लिम लेब्बाई' जाति का कम्युनिटी सर्टिफिकेट पाने के लिए आवेदन किया। इस जाति को तमिलनाडु में 'पिछड़े वर्ग के मुसलमानों' का दर्जा प्राप्त है। तहसीलदार ने समीर का आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद समीर ने हाईकोर्ट का रुख किया और तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें कनवर्टेड मुस्लिमों को आरक्षण देने की बात कही गई थी। तमिलनाडु सरकार ने दलील दी कि कनवर्ट होने वाले व्यक्ति को आरक्षण इसीलिए दिया जा रहा है ताकि वह अपनी पुरानी आरक्षित श्रेणी का लाभ उठा सके। हालांकि हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की दलील को खारिज कर दिया। क्या बोला मद्रास हाईकोर्ट? कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि मुस्लिम समाज में भी कई ऐसे समुदाय मौजूद हैं, लेकिन इन समुदायों की सदस्यता केवल जन्म से तय होती है। बेंच ने कहा, “बेझिझक यह कहा जा सकता है कि वे हिंदू धर्म की जातियों के समान हैं। जैसे जाति जन्म से तय होती है, वैसे ही कोई व्यक्ति जन्म से ही राउथर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम होता है। यह कहना बेतुका है कि किसी को राउथर मुस्लिम में बदला जा सकता है।” मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के इस सरकारी आदेश को संविधान और इस्लाम दोनों के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। बेंच ने साल 1951 के 'जी माइकल बनाम एस वेंकटेश्वरन' मामले का हवाला दिया, जिसमें साफ कहा गया था कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपनाता है, तो वह 'सिर्फ एक मुसलमान' बनता है और मुस्लिम समाज में उसका स्थान उसकी पिछली जाति से तय नहीं होता। सिर्फ आरक्षण के लिए नहीं दे सकते लाभ अदालत ने कहा, "ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक उपदेशकों ने दशकों और सदियों तक यह प्रचार किया कि उनके धर्मों में सामाजिक समानता है, जबकि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था है। धर्म-परिवर्तन के लिए ऐसा रुख अपनाने के बाद, अब यह दावा करना गलत है कि इस्लाम में भी ऊंच-नीच है। हमारी राय में, कुछ समुदायों को 'पिछड़ा' और बाकी को 'अगड़ा' मानना ​​कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है। इस्लाम एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें सब बराबर हों। अल्लाह की नजर में सब समान हैं। वहां कोई सामाजिक ऊंच-नीच नहीं है।" अदालत ने कहा कि राज्य सरकार सिर्फ इसलिए विभिन्न जातियों के कनवर्टेड मुस्लिमों का एक समूह बनाकर उन्हें आरक्षण नहीं दे सकती कि वे लाभ उठाते रहें।

Saudi Real Estate बना भारतीय निवेशकों की पहली पसंद, शानदार रिटर्न और नए अवसरों ने बढ़ाया आकर्षण

दुबई  खाड़ी देशों के रियल एस्टेट बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सऊदी अरब ने पहली बार विदेशी नागरिकों और विदेशी कंपनियों के लिए अपने प्रॉपर्टी बाजार के दरवाजे खोल दिए हैं। नए विदेशी रियल एस्टेट स्वामित्व कानून के लागू होने के साथ ही सरकार ने पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाने के लिए ‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ पोर्टल भी शुरू कर दिया है। इस फैसले को सऊदी अरब के आर्थिक परिवर्तन कार्यक्रम ‘विजन 2030’ का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य विदेशी निवेश बढ़ाना, वैश्विक पूंजी आकर्षित करना और देश को अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश का प्रमुख केंद्र बनाना है। यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के असर से दुबई का रियल एस्टेट बाजार दबाव में दिखाई दे रहा है। ऐसे माहौल में सऊदी अरब का नया कानून भारतीय प्रवासियों, एनआरआई निवेशकों और वैश्विक खरीदारों के लिए एक नए विकल्प के रूप में उभरकर सामने आया है। दशकों बाद विदेशियों को मिला प्रॉपर्टी का मालिक बनने का अधिकार सऊदी अरब (Saudi Arabia Property News) में लंबे समय से लाखों विदेशी नागरिक काम करते रहे हैं, लेकिन उन्हें केवल किराए के मकानों में रहने की अनुमति थी। अब पहली बार विदेशी नागरिकों को कानूनी रूप से आवासीय और निर्धारित श्रेणी की व्यावसायिक संपत्तियों का स्वामित्व प्राप्त करने का अवसर दिया गया है। भारतीय समुदाय सऊदी अरब में सबसे बड़े प्रवासी समुदायों में शामिल है। ऐसे में इस फैसले का सबसे बड़ा लाभ भारतीय पेशेवरों, कारोबारियों और लंबे समय से वहां रह रहे परिवारों को मिलने की संभावना जताई जा रही है। अब वे केवल किराएदार नहीं बल्कि निर्धारित नियमों के तहत संपत्ति के मालिक भी बन सकेंगे। दुबई बाजार की सुस्ती के बीच सऊदी बना नया विकल्प पिछले कुछ समय से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर दुबई के रियल एस्टेट बाजार पर भी देखने को मिला है। विशेषज्ञों के अनुसार निवेशकों की सतर्कता बढ़ने से वहां संपत्तियों की खरीद-बिक्री की गति कुछ धीमी हुई है। इसी बीच सऊदी अरब ने विदेशी निवेशकों के लिए अपने बाजार को खोलकर क्षेत्रीय निवेश के समीकरण बदल दिए हैं। हालांकि एक्सपर्ट व्यू से दुबई की तुलना में सऊदी का रियल एस्टेट बाजार अभी शुरुआती चरण में है। यहां भविष्य की संभावनाएं मजबूत हैं, लेकिन रीसेल मार्केट और लिक्विडिटी को परिपक्व होने में अभी समय लग सकता है। इसके बावजूद विजन 2030 के तहत हो रहे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट इस बाजार को तेजी से आगे बढ़ा सकते हैं। ‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ पोर्टल से पूरी प्रक्रिया होगी ऑनलाइन रियल एस्टेट जनरल अथॉरिटी (REGA) ने विदेशी रियल एस्टेट स्वामित्व कानून के साथ ‘सऊदी प्रॉपर्टीज’ नाम का डिजिटल पोर्टल लॉन्च किया है। इसका उद्देश्य आवेदन प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और पूरी तरह ऑनलाइन बनाना है। विदेशी खरीदारों को अब विभिन्न सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं होगी। आवेदन, सत्यापन और पात्रता की अधिकांश प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से पूरी की जाएगी, जिससे निवेश प्रक्रिया पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो जाएगी। किन लोगों को मिलेगा संपत्ति खरीदने का अधिकार नई नीति के तहत सऊदी अरब में वैध रूप से रह रहे विदेशी निवासी अपने रेजिडेंसी नंबर यानी इकामा के आधार पर सीधे आवेदन कर सकेंगे। पोर्टल पर उनकी पात्रता का डिजिटल सत्यापन किया जाएगा। सऊदी अरब से बाहर रहने वाले विदेशी नागरिक भी निवेश कर सकेंगे, लेकिन उन्हें अपने देश में स्थित सऊदी दूतावास या वाणिज्य दूतावास से डिजिटल पहचान प्राप्त करनी होगी। इसके बाद वे ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पूरी कर सकेंगे। विदेशी कंपनियों को भी पहली बार सऊदी अरब में सीधे प्रॉपर्टी खरीदने की अनुमति दी गई है। इसके लिए उन्हें निवेश मंत्रालय (MISA) के ‘इन्वेस्ट सऊदी’ प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कर राष्ट्रीय एकीकृत नंबर प्राप्त करना होगा। भारतीय निवेशकों के लिए क्यों अहम है यह फैसला भारतीय निवेशकों के लिए यह निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सऊदी अरब में पहले से बड़ी भारतीय आबादी मौजूद है, जिससे किराए की मांग और आवासीय जरूरतें लगातार बनी रहती हैं। इसके अलावा देश में तेजी से विकसित हो रहे स्मार्ट शहर, औद्योगिक कॉरिडोर और पर्यटन परियोजनाएं भविष्य में प्रॉपर्टी की मांग को और बढ़ा सकती हैं।     रियल एस्टेट एक्स्पर्ट्स की माने तो लंबे समय के निवेश की सोच रखने वाले भारतीय निवेशकों के लिए यह बाजार बेहतर अवसर प्रदान कर सकता है। हालांकि निवेश से पहले स्थानीय कानून, कर व्यवस्था, स्वामित्व नियम और रीसेल शर्तों का विस्तृत अध्ययन करना आवश्यक होगा।     सऊदी अरब ने जिन क्षेत्रों को विदेशी निवेश के लिए खोला है, उनमें दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें रेड सी प्रोजेक्ट, दिरियाह, अलउला और भविष्य का स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट नियोम (NEOM) प्रमुख हैं। सरकार इन क्षेत्रों को पर्यटन, व्यापार, तकनीक और वैश्विक निवेश का केंद्र बनाने की दिशा में बड़े पैमाने पर निवेश कर रही है।     इन परियोजनाओं के विकसित होने के साथ आवासीय, व्यावसायिक और होटल सेक्टर में भी बड़े निवेश की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। मक्का और मदीना के लिए अलग नियम हालांकि नई नीति के साथ कुछ महत्वपूर्ण प्रतिबंध भी लागू किए गए हैं। धार्मिक महत्व को देखते हुए मक्का और मदीना में संपत्ति स्वामित्व के नियम अलग रखे गए हैं। इन दोनों पवित्र शहरों में संपत्ति खरीदने का अधिकार सीमित श्रेणी के पात्र व्यक्तियों और सऊदी कंपनियों तक ही रखा गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले क्षेत्रों की विशेष पहचान को सुरक्षित बनाए रखना है। सऊदी अरब के इस फैसले के प्रमुख फायदे     विदेशी नागरिकों को पहली बार कानूनी रूप से प्रॉपर्टी खरीदने का अवसर।     भारतीय प्रवासियों और एनआरआई निवेशकों के लिए नया निवेश विकल्प।     पूरी आवेदन प्रक्रिया डिजिटल और पारदर्शी बनाई गई।     विजन 2030 के तहत विकसित हो रहे मेगा प्रोजेक्ट्स में निवेश की संभावना।     विदेशी कंपनियों को भी रियल एस्टेट बाजार में प्रवेश की अनुमति।     वैश्विक निवेश आकर्षित करने और अर्थव्यवस्था को विविध बनाने की दिशा में बड़ा कदम। किन बातों का रखना होगा ध्यान     निवेश से पहले स्थानीय संपत्ति कानूनों का अध्ययन आवश्यक होगा।     शुरुआती वर्षों में बाजार … Read more

West Bengal Politics: सुवेंदु अधिकारी के नए कानून पर सियासी घमासान, अपराधियों पर सख्त कार्रवाई का दावा

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार का दिन एक बड़े धमाके की तरह होगा. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी राज्य के 54 साल पुराने कानून में बदलाव करने जा रही है. एक ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ लाने जा रहे हैं, जो अपराधियों की रीढ़ तोड़ देगा. इस नए कानून को उत्तर प्रदेश के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी कई गुना अधिक घातक और सख्त माना जा रहा है. इसे लेकर पूरे बंगाल के गुंडा-बवालियों में अभी से मौत का खौफ है. जानते हैं पूरी कहानी।  54 साल पुराने कानूनों की विदाई बंगाल राज्य सरकार1972 में बने कानून The West Bengal Maintenance of Public Order Act, 1972 उसमें संशोधन करने जा रही है.  इसे 1972 में पश्चिम बंगाल विधानसभा द्वारा पारित किया गया था और उसी वर्ष राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून लागू हुआ था।  इस कानून का संक्षिप्त इतिहास 1960 और 70 का दशक के दौर में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक अस्थिरता, हिंसक आंदोलन और कानून-व्यवस्था की भारी समस्याएं थीं. सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को बनाए रखने, उग्रवादी गतिविधियों को रोकने और अवैध हथियारों पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार को विशेष शक्तियों की जरूरत थी, जिसके लिए यह कानून 1972 में लाया गया था।   ‘पश्चिम बंगाल में नया कानून? लेकिन अब बंगाल सरकार ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ को विधानसभा में पेश करने जा रही है. उसने दशकों पुराने ढर्रे को बदल दिया है. 1972 के कानून अब आधुनिक संगठित अपराध और दंगाई मानसिकता से लड़ने के लिए नाकाफी साबित हो रहे थे. सुवेंदु अधिकारी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अब बंगाल में ‘कानून का राज’ होगा, न कि ‘सिंडिकेट का राज’. 54 सालों से चली आ रही ढील अब हमेशा के लिए खत्म होने वाली है।  7 पीढ़ियों तक होगी वसूली, कोई नहीं बचेगा! इस कानून का सबसे खौफनाक पहलू इसका ‘रिकवरी मैकेनिज्म’ है. यदि कोई दंगाई सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, तो उसकी भरपाई सिर्फ अपराधी से नहीं, बल्कि उसकी संपत्ति से होगी. कानून विशेषज्ञों का मानना है कि इसके प्रावधान इतने कड़े हैं कि एक बार दंगा करने पर अपराधी की आने वाली सात पीढ़ियां हर्जाना भरते-भरते कंगाल हो जाएंगी. यह केवल दंड नहीं, बल्कि ‘आर्थिक खात्मा’ है, जो दंगाइयों को कानून हाथ में लेने से पहले सोचने पर मजबूर कर देगा।  बुलडोजर मॉडल का भी ‘बाप’ है ये बिल उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ के मॉडल ने देशभर में दंगाइयों के बीच खौफ पैदा किया था, लेकिन सुवेंदु अधिकारी का यह नया बिल उससे भी दो कदम आगे है. इसमें ‘प्रिवेंटिव डिटेंशन’ (बिना मुकदमे हिरासत) और ‘एक्सटर्नमेंट’ (जिले से निष्कासन) जैसी शक्तियां पुलिस को असीमित अधिकार देती हैं. यह बिल दंगाइयों को पनाह देने वालों के खिलाफ भी ‘जीरो टॉलरेंस’ रखता है. किसी को पनाह देना भी अब दो साल की सीधी जेल का निमंत्रण होगा।  विपक्ष की रूह क्यों कांप रही है? जैसे ही इस बिल का ड्राफ्ट सामने आया, विपक्ष के गलियारों में सन्नाटा पसर गया है. जिन नेताओं को लगता था कि वे दंगों के जरिए अपनी राजनीति चमका लेंगे, उनकी रूह अब कांप रही है. वे जानते हैं कि यह कानून न केवल गुंडों को खत्म करेगा, बल्कि उन बड़े चेहरों को भी बेनकाब करेगा जो दंगों को स्पॉन्सर करते हैं. सुवेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि दंगा करना है, तो कीमत चुकाने के लिए तैयार रहो।  शांति और सुरक्षा का नया युग यह बिल बंगाल की बदलती तस्वीर का गवाह है. सरकार का कहना है कि यह कानून शरीफ नागरिकों की रक्षा के लिए एक ढाल है. जो बंगाल कल तक अराजकता की आग में जलता था. वह अब अपराधियों के लिए एक बड़ी जेल साबित होगा. सोमवार को जब यह कानून विधानसभा में बहस के लिए आएगा तो देखना यह होगा कि असल में क्या हुआ। 

क्या शुरू होने वाली है नई जंग? नेतन्याहू के बयान से भड़का ईरान, लेबनान में युद्ध के आसार तेज

बेरूत लेबनान दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व का एक छोटा लेकिन बेहद महत्वपूर्ण देश है. यहां इजरायल की सीमा से लगा दक्षिणी इलाका लंबे समय से तनाव का केंद्र रहा है. हिज्बुल्लाह ईरान समर्थित एक मजबूत संगठन है, यहां सक्रिय है. हाल के वर्षों में इजरायल और हिज्बुल्लाह के बीच कई बार झड़पें हुई हैं।  2026  में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है. इजरायल ने साफ कहा है कि जब तक हिज्बुल्लाह अपने हथियार नहीं छोड़ता, उसके सैनिक लेबनान के दक्षिणी हिस्से से नहीं हटेंगे. वहीं ईरान का रुख है कि इजरायल को पहले पूरी तरह हटना चाहिए और लड़ाई बंद करनी चाहिए. यह जिद दोनों तरफ से नई जंग की स्क्रिप्ट लिख रही है।  विश्लेषकों के अनुसार, यह सिर्फ सीमा विवाद नहीं है. यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, हथियार नियंत्रण और बड़े देशों की रणनीति से जुड़ा मुद्दा है. लेबनान की अर्थव्यवस्था पहले से कमजोर है, लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और अगर नई जंग छिड़ी तो मानवीय संकट और बढ़ जाएगा।  इजरायल का रुख: सुरक्षा पहले, हथियार छोड़ो इजरायल बार-बार कह रहा है कि उसकी सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है. हिज्बुल्लाह के पास हजारों रॉकेट और हथियार हैं जो इजरायल के शहरों को निशाना बना सकते हैं. इजरायली प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने स्पष्ट किया है कि दक्षिणी लेबनान में एक सुरक्षा क्षेत्र बनाए रखना जरूरी है. अगर हिज्बुल्लाह हथियार नहीं छोड़ता तो इजरायली सेना वहां बनी रहेगी।  इजरायल का तर्क है कि पिछले समझौतों में हिज्बुल्लाह ने हथियार छोड़ने का वादा किया लेकिन पूरा नहीं किया. इसलिए अब वे भरोसा नहीं कर रहे. इजरायल के अनुसार, हिज्बुल्लाह का हथियार रखना न सिर्फ इजरायल के लिए खतरा है बल्कि लेबनान की संप्रभुता को भी कमजोर करता है. इजरायल ने कई बार हवाई हमले किए हैं ताकि हिज्बुल्लाह की क्षमता कम हो. लेकिन इससे तनाव और बढ़ा है. अगर हिज्बुल्लाह फिर से हमला करता है तो इजरायल बड़े पैमाने पर कार्रवाई कर सकता है।  हिज्बुल्लाह और लेबनान की स्थिति  हिज्बुल्लाह खुद को लेबनान का रक्षक बताता है. उसके नेता कहते हैं कि इजरायल की मौजूदगी के खिलाफ वे हथियार नहीं छोड़ेंगे. हिज्बुल्लाह का मानना है कि इजरायल पहले लेबनान की जमीन छोड़े, तब बात हो सकती है. उन्होंने कुछ हथियार लेबनानी सेना को सौंपे लेकिन पूरी तरह से हथियार छोड़ने की बात नहीं मानी।  लेबनान सरकार कमजोर है. देश में आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और विभिन्न गुटों के बीच मतभेद हैं. हिज्बुल्लाह लेबनान की राजनीति में भी मजबूत है. अगर इजरायल नहीं हटता तो हिज्बुल्लाह समर्थकों में गुस्सा बढ़ेगा और नई लड़ाई शुरू हो सकती है. लेबनानी सेना दक्षिण में तैनात है लेकिन हिज्बुल्लाह की ताकत के आगे उसकी भूमिका सीमित लगती है।  ईरान का रणनीतिक खेल: इजरायल पहले हटे ईरान हिज्बुल्लाह का मुख्य समर्थक है. वह हथियार, पैसा और प्रशिक्षण देता है. ईरान का कहना है कि इजरायल को लेबनान से पूरी तरह हटना चाहिए और लड़ाई बंद करनी चाहिए. ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर इजरायल हमले जारी रखता है तो वह जवाब देगा. ईरान-इजरायल के बीच अप्रत्यक्ष युद्ध लंबे समय से चल रहा है।  ईरान के लिए लेबनान सिर्फ एक मोर्चा है. वह पूरे क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है. अगर इजरायल लेबनान में बना रहा तो ईरान दूसरे मोर्चों पर भी दबाव डाल सकता है. हाल के बयानों में ईरान ने कहा कि कोई भी समझौता लेबनान को कवर करे. इससे अमेरिका और इजरायल के बीच भी तनाव बढ़ा है।  नई जंग की संभावित स्क्रिप्ट: क्या हो सकता है? विश्लेषक मानते हैं कि अगर बात नहीं बनी तो नई जंग की स्क्रिप्ट इस तरह हो सकती है. पहले छोटी-छोटी झड़पें बढ़ेंगी. हिज्बुल्लाह रॉकेट दागेगा, इजरायल हवाई हमले करेगा. इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान में और अंदर घुस सकती है. ईरान हिज्बुल्लाह को और मदद भेजेगा या दूसरे इलाकों से दबाव डालेगा।  इससे लेबनान में बड़े पैमाने पर तबाही होगी। हजारों लोग मारे जा सकते हैं, लाखों विस्थापित होंगे. बुनियादी ढांचा बर्बाद होगा. इजरायल की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा क्योंकि सैनिकों की तैनाती महंगी है. अमेरिका, जो शांति चाहता है, बीच में फंस सकता है।  संयुक्त राष्ट्र और अन्य देश सीजफायर की कोशिश कर रहे हैं लेकिन दोनों पक्षों की जिद इसे मुश्किल बना रही है. अगर इजरायल हटने से इनकार करता रहा और हिज्बुल्लाह हथियार नहीं छोड़ा तो युद्ध टलना मुश्किल होगा।  लेबनान की जंग सिर्फ दो देशों की नहीं है. यह पूरे मध्य पूर्व को प्रभावित करेगी. सऊदी अरब, तुर्की जैसे देश प्रभावित होंगे. तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ेगा. मानवीय संकट गहराएगा. लेबनान में पहले से लाखों शरणार्थी हैं. नई जंग से भूख, बीमारी और बेघर होने की समस्या बढ़ेगी. बच्चे स्कूल नहीं जा पाएंगे, अस्पताल नष्ट हो जाएंगे।  क्या है समाधान? समाधान मुश्किल लेकिन नामुमकिन नहीं. दोनों पक्षों को समझौता करना होगा. इजरायल को सुरक्षा गारंटी मिले और हिज्बुल्लाह हथियारों का कुछ हिस्सा लेबनानी सेना को सौंप दे. ईरान को भी आश्वासन चाहिए कि उसके हित सुरक्षित हैं. अमेरिका और अन्य शक्तियां मध्यस्थता कर सकती हैं. लेबनान की सरकार को मजबूत होना चाहिए ताकि वह अपने पूरे इलाके पर नियंत्रण रख सके. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आर्थिक मदद देकर लेबनान को स्थिर करना चाहिए। 

RBI New Rule: ₹25,000 तक का लाभ मिलेगा, भारतीय रिजर्व बैंक ने लागू किए नए नियम

  नई दिल्‍ली सोचिए एक दिन आपके फोन पर एक मैसेज आता है कि आपके 20,000 रुपये कट गए हैं, जबकि आपने कभी इसका पेमेंट नहीं किया था और ना ही कोई अप्रूवल दिया था. फिर तुरंत आप इसकी जांच करते हुए बैंक से बात करते हैं, बैंक भी ये बताने में असमर्थ होता है कि पैसे कैसे मिलेंगे।  आपने शिकायत भी दर्ज करा दी कि आपके खाते से 20,000 रुपये का ऑनलाइन फ्रॉड हो चुका है, लेकिन सवाल हमेशा से रहेगा कि आपको पैसा वापस मिलेगा या नहीं? क्‍योंकि ज्‍यादातर ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में कस्‍टमर्स का पैसा रिकवर नहीं हो पाता है. हालांकि, अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सीधे तौर पर शामिल हो चुका है।   RBI ने एक नया नियम निकाला है, जिसके तहत अगर आपके साथ ऑनलाइन फ्रॉड या UPI के जरिए स्‍कैम होता है तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया आपको मुआवजे का भुगतान करेगा. 24 जून 2026 को, आरबीआई ने नोटिफिकेशन जारी किया है। किस तरह के फ्रॉड पर मिलेगा मुआवजा ये नियम स्‍मॉल फाइनेंस बैंकों, पेमेंट बैंकों, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और स्थानीय क्षेत्र बैंकों को छोड़कर सभी कमर्शियल बैंकों पर लागू होते हैं और 1 जनवरी, 2027 से उस तारीख को या उसके बाद किए गए किसी भी इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन के लिए प्रभावी होंगे।  सरल शब्दों में कहें तो, इसमें आज आप जितने भी प्रकार के डिजिटल भुगतान करते हैं, वे सभी शामिल हैं, जैसे यूपीआई ट्रांसफर, नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान, चाहे वे कार्ड स्वाइप या टैप करके किए गए हों या कार्ड की जानकारी ऑनलाइन दर्ज करके किए गए हों. अगर आपने डिजिटल माध्यम से पैसे का लेन-देन किया है, तो इसे इस कैटेगरी में रखा जाएगा।  कौन करेगा भुगतान?  जब कोई धोखाधड़ी वाला लेनदेन होता है, तो नुकसान के लिए कौन जिम्मेदार है, आप, बैंक, या कोई और? RBI ने यह भी जानकारी दी है कि यह तय किस आधार पर किया जाएगा. आरबीआई का कहना है कि बैंक सिर्फ यह कहकर हट नहीं सकता कि फ्रॉड के दौरान कस्‍टमर्स लापरवाह थे, अब उन्‍हें साबित भी करना होगा।  RBI ने रखा तीन कंडीशन     अगर धोखाधड़ी बैंक की गलती के कारण हुई है, जैसे कि सुरक्षा में चूक, सिस्टम में गड़बड़ी, या बैंक द्वारा आपको धोखाधड़ी की सूचना न भेजना, तो नियम स्पष्ट है. बैंक को पूरे पैसे का भुगतान करना होगा, चाहे कस्‍टमर ने इसकी जानकारी दी हो या नहीं।      अगर धोखाधड़ी किसी तीसरे पक्ष, जैसे कि भुगतान ऐप, भुगतान गेटवे या दूरसंचार प्रदाता के कारण हुई है, न कि आपके या बैंक के कारण, तो भी आपको शून्य दायित्व और पूर्ण धनवापसी प्राप्त होगी, लेकिन केवल तभी जब कस्‍टमर धोखाधड़ी की घटना की तारीख से पांच कैलेंडर दिनों के भीतर बैंक को इसकी सूचना देता है. पांच दिन बाद रिपोर्ट करें, और आपकी देनदारी बैंक की अपनी आंतरिक नीति के अनुसार तय की जाएगी।      अगर धोखाधड़ी आपकी लापरवाही के कारण हुई है, जैसे कि आपने अपना ओटीपी साझा किया, अपने बैंक से मिली स्पष्ट धोखाधड़ी की चेतावनी को अनदेखा किया, या कोई संदिग्ध ऐप डाउनलोड किया, तो नियम अधिक जटिल हैं, और यहीं पर इस अधिसूचना का वास्तव में नया हिस्सा सामने आता है।  आपकी गलती पर भी मिल सकती है रकम नए नियमों के तहत, भले ही आप तकनीकी रूप से लापरवाह रहे हों, जैसे कि आपने किसी फ़िशिंग लिंक पर क्लिक किया हो या कोई ऐसा ओटीपी शेयर किया हो जो आपको नहीं करना चाहिए था, फिर भी आपको मुआवजा मिल सकता है, बशर्ते नुकसान कम हो और आपने तुरंत कार्रवाई की हो।  कितना मिलेगा मुआवजा?  नोटिफिकेशन में कहा गया है कि मुआवजे का भुगतान पूरे लाइफ में एक ही बार किसी एक व्‍यक्ति को किया जाएगा. यह भुगतान 25,000 रुपये या 85 फीसदी जो भी कम हो किया जाएगा. अगर मान लीजिए किसी व्‍यक्ति के साथ 50 हजार रुपये की धोखाधड़ी हुई है और कस्‍टमर ने शिकायत दर्ज कराई है, तो उसे अधिकतम 25,000 रुपये का ही मुआवजा दिया जाएगा. अगर उसके साथ दोबारा फ्रॉड होता है तो उसे कोई मुआवजा नहीं मिलेगा।  कौन कितना करेगा पेमेंट?  छोटे धोखाधड़ी के मामलों में, खासकर 29,412 रुपये से कम के नुकसान वाले मामलों में, जहां मुआवजा नुकसान का 85 प्रतिशत होता है. घरेलू धोखाधड़ी के मामलों में, 65 प्रतिशत रिजर्व बैंक द्वारा, 10 प्रतिशत ग्राहक के बैंक द्वारा और बाकी 10 प्रतिशत लाभार्थी बैंक द्वारा वहन किया जाएगा. लाभार्थी बैंक, वह बैंक है जिसने सबसे पहले आपका चोरी हुआ पैसा प्राप्त किया था।  29,412 रुपये और 50,000 रुपये के बीच के थोड़े बड़े नुकसान के लिए, जहां मुआवजे की अधिकतम सीमा 25,000 रुपये है, RBI, ग्राहक का बैंक और लाभार्थी बैंक क्रमशः 19118 रुपये, 2941 रुपये और 2941 रुपये का योगदान करेंगे।