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ममता बनर्जी के लिए बढ़ी मुश्किलें, TMC के कई सांसद BJP में जाने की तैयारी में?

कलकत्ता बंगाल में बदलाव हो गया. अब बदलाव के दायरे का विस्तार हो रहा है. बंगाल में 206 सीटों के साथ भाजपा ने सरकार बना ली. ममता बनर्जी की टीएमसी 80 पर ही अटक गई. ममता अब भी मानने को तैयार नहीं कि उनकी हार स्वाभाविक है. यह 15 साल से जनता के भीतर पनप रहे असंतोष और आक्रोश की स्वाभाविक परिणति है. पर, ममता टीएमसी की हार को भाजपा और चुनाव आयोग की साजिश मानती हैं. वे अपनी हार पर रोज ही विलाप के अंदाज में दोनों को खरी-खोटी सुनाती हैं. अब तो हालत यह हो गई है कि टीएमसी के उनके साथी भी भरोसेमंद नहीं रहे. नगर निकायों के पार्षद थोक में इस्तीफा दे रहे हैं. टीएमसी के ज्यादातर सांसद और विधायक भाजपा के संपर्क में हैं. पार्टी की बैठकों-कार्यक्रमों में उनकी गैरहाजिरी इसका संकेत है. ममता को भी अब लगने लगा है कि उनके लोग जान-बूझ कर दूरी बना रहे हैं. तभी तो उन्हें कहना पड़ रहा है कि जिन्हें जाना है, वे चले जाएं. बचे-खुचे लोगों से वे टीएमसी को पुनर्जीवित कर लेंगी।  पार्षदों के थोक में इस्तीफे विधानसभा चुनावों में हार के बाद नगरपालिकाओं में टीएमसी पार्षदों के सामूहिक इस्तीफे का सिलसिला शुरू हो गया है. आधा दर्जन से अधिक नगरपालिकाओं में थोक के भाव टीएमसी पार्षदों के इस्तीफे हुए हैं. यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. फालता सीट पर आए नतीजे के बाद डायमंड हार्बर में भी पार्षदों के इस्तीफे का दौर शुरू हो गया है. पार्षदों के इस्तीफे की शुरुआत उत्तर 24 परगना जिले के भाटपाड़ा से हुई थी. कुल 35 में 30 पार्षदों ने एक साथ इस्तीफे सौंप दिए. इसी तरह हालीशहर के 23 पार्षदों में 16 ने एक साथ इस्तीफा दे दिया. उत्तर बैरकपुर, गारुलिया और डायमंड हार्बर में इस्तीफों का सिलसिला जारी है. कई और नगरपालिकाओं और निगमों में भी टीएमसी पार्षदों ने इस्तीफे दिए हैं. कोलकाता नगर निगम में भी टीएमसी के पार्षद पाला बदलने को बेताब दिखते हैं. ममता बनर्जी के खिलाफ बगावती तेवर देखने को मिले।  कब होगा दल बदल! रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल सांसदों की संख्या को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। दरअसल, चर्चाएं इस बात को लेकर हैं कि दल बदल कानून से बचने के लिए कितने सांसदों की जरूतर होगी। कयास लगाए जा रहे हैं कि इसे लेकर मॉनसून सत्र तक स्थिति साफ हो सकती है। कहा यह भी जा रहा है कि दल बदल के कथित प्रयासों में लगे कई सांसद पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के करीबी हैं। विधायक बना रहे हैं दूरी चुनाव में हार के बाद 20 मई को पहली बार टीएमसी ने प्रदर्शन किया था, जिसमें बड़ी संख्या में टीएमसी विधायक शामिल नहीं हुए थे। यह घटनाक्रम पार्टी के आंतरिक विचार-विमर्श के एक दिन बाद सामने आया था, जिसमें कथित तौर पर जनता से जुड़ने के लिए सड़क पर उतरने की राजनीति की ओर लौटने की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी। हालांकि, 80 विधायकों में से केवल 35 ही कार्यक्रम में पहुंचे, जिससे राजनीतिक गलियारों में संगठन के भीतर संभावित मतभेदों को लेकर अटकलें तेज हो गईं। यह ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी चुनावी हार के बाद खुद को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रही है। विपक्ष के नेता पद के लिए पार्टी की पसंद माने जा रहे शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने आंतरिक कलह की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि कई विधायक संगठनात्मक जिम्मेदारियों और अन्य व्यावहारिक कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। एजेंसी वार्ता के अनुसार, फलता में भाजपा की जीत के बाद डायमंड हार्बर नगर पालिका में टीएमसी के आठ पार्षदों ने अपने इस्तीफे सौंप दिए। डायमंड हार्बर नगर पालिका में टीएमसी के 16 पार्षद थे। इस शहरी स्थानीय निकाय में दूसरी किसी पार्टी का एक भी पार्षद नहीं था। आठ पार्षदों ने सोमवार को अलग-अलग कारणों का हवाला देते हुए अपने इस्तीफे सौंपे हैं। बैठकों व कार्यक्रमों से दूरी ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से अब तक जितनी बैठकें की हैं, उनमें पार्टी के सभी विधायक नहीं शामिल हुए. शामिल न होने की कोई वजह बताना भी विधायकों ने मुनासिब नहीं समझा. चूंकि बैठकें टीएमसी चीफ ममता ने बुलाई थीं, इसलिए सबकी उपस्थिति जरूरी थी. खासकर तब, जब पार्टी के सामने अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है. टीएमसी के सांसद भी ममता से दूरी बनाने लगे हैं. चुनाव परिणाम आने के बाद ममता की बुलाई पहली ही बैठक से 10-12 नवनिर्वाचित विधायक नदारद रहे. विरोध प्रदर्शनों में सभी विधायकों की भागीदारी ममता बनर्जी सुनिश्चित नहीं कर पाईं।  अभिषेक के नेतृत्व पर प्रश्न इतना ही नहीं, अब तो ममता बनर्जी और उनके भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर भी सांसद-विधायक खुल कर सवाल उठाने लगे हैं. टीएमसी के सामने 2021 के बाद यह दूसरा बड़ा संकट है. कालीघाट में हुई समीक्षा बैठकों में कुणाल घोष, रितुव्रत बनर्जी जैसे वरिष्ठ विधायकों ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के फैसलों पर सीधे सवाल उठाए. विधायकों का मानना है कि बंद कमरों में रणनीति बनाने से पार्टी फिर से मजबूत नहीं होगी. इसके लिए कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरना होगा. बागी नेताओं का आरोप है कि बंद कमरे में आलाकमान द्वारा लिए गए फैसले जबरदस्ती नेताओं पर थोपे गए, जिससे जमीनी स्तर के नेताओं और पार्षदों ने पार्टी से दूरी बनाना शुरू कर दिया है।  MP काकोली के तल्ख तेवर टीएमसी के संकट को इससे भी समझा जा सकता है. ममता ने 4 बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार से लोकसभा में मुख्य सचेतक का पद छीन कर कल्याण बनर्जी को दे दिया. इससे काकोली की नाराज हुईं. ममता का यह फैसला उन्हें पार्टी के भीतर अपना अपमान लगा. भाजपा ने उनकी नाराजगी को भुना लिया. केंद्र सरकार ने काकोली को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की ‘Y’ श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा मुहैया कराई है. इंटेलिजेंस ब्यूरो की थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर उन्हें यह सुरक्षा दी गई है. सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अब टीएमसी के लिए राजनीतिक रणनीति बनाने वाली आई-पैक (I-PAC) के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी दे दिया है. काकोली की नाराजगी सामान्य बात … Read more

नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ने से कतरा रहे TMC नेता, ममता के सामने नई चुनौती

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं हैं। अब खबर है कि पार्टी को नंदीग्राम में होने वाले उप चुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। फिलहाल, सीट पर उप चुनाव का भी ऐलान नहीं हुआ है। अटकलें हैं कि टीएमसी नेता यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के साथ नंदीग्राम से भी चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी, लेकिन अंत में उन्होंने यह सीट छोड़ने का फैसला किया। खास बात है कि अधिकारी 2021 में भी तत्कालीन सीएम ममता बनर्जी को नंदीग्राम से हरा चुके हैं। 2 नेता कर चुके मना पूर्वी मिदनापुर जिले की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर उप चुनाव की तारीख का ऐलान कभी भी हो सकता है। अब अटकलों का दौर शुरू हो गया है कि यहां टीएमसी ने उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि यहां से टीएमसी को उम्मीदवार खोजने में मुश्किल हो रही है। साथ ही दो नेताओं ने तो यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। 2026 विधानसभा चुनाव में भी अधिकारी ने भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी को हराया है। नंदीग्राम से लड़ने नेता मना क्यों कर रहे अधिकारी के कभी करीबी रहे पवित्र कर भी नंदीग्राम से नहीं लड़ना चाहते। खास बात है कि शुभेंदु ने उन्हें ही इस सीट से हराया है। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, वह कहते हैं, 'कुछ लोग मुझसे बात करने आए थे, लेकिन मैं दोबारा नंदीग्राम से नहीं लड़ सकता। इसका सवाल ही पैदा नहीं होता है।' चुनाव से कुछ समय पहले ही कर भारतीय जनता पार्टी छोड़ टीएमसी में गए थे। 2021 में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी के इलेक्शन एजेंट रहे शेख सूफियान भी यहां से चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा, 'मैंने 2006 में नंदीग्राम का चुनाव लड़ा था। उसके बाद टीएमसी में से किसी ने भी मुझसे चुनाव लड़ने के लिए नहीं कहा। मुझे अब चुनावों में दिलचस्पी नहीं है। मैं मेरे परिवार की सलाह मानकर राजनीति से रिटायर हो रहा हूं।' टीएमसी का क्या है प्लान रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'उम्मीदवार का चुनाव ममता बनर्जी करेंगी और इस पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी। चुनावों का ऐलान होने दीजिए।' फलता जैसा लक्ष्य रखा मुख्यमंत्री बनने के बाद नंदीग्राम के अपने पहले दौरे पर अधिकारी ने अपने समर्थकों को आश्वस्त किया कि सीट खाली करने के बावजूद उनका अपने राजनीतिक गढ़ से जुड़ाव पूरी तरह मजबूत बना हुआ है। उन्होंने अभिनंदन रैली को संबोधित करते हुए अपने समर्थकों से पूछा कि क्या वे नंदीग्राम में भी फाल्टा जैसी जीत का अंतर दोहरा सकते हैं, जहां भाजपा ने एक लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की है।

बिहार राजनीति में बड़ा उलटफेर, RJD छोड़ BJP में शामिल हुईं रितु जायसवाल

पटना  आरजेडी की पूर्व महिला नेता रितु जायसवाल अब भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई हैं. बीजेपी प्रदेश संजय सरावगी ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई. इस मौके पर मंत्री दिलीप जायसवाल भी मौजूद रहे. बता दें कि जायसवाल ने BJP का दामन थामने की औपचारिक घोषणा 24 मई को की थी. आरजेडी छोड़कर रितु जयसवाल के साथ कई अन्य नेता भी बीजेपी में शामिल हुए। इनमें प्रोफेसर राजमणि, सीमा जायसवाल, माया गुप्ता, शकुंतला प्रजापति, संगीता यादव, सुलेखा खातून, पानो देवी, अनिल महतो और शिवशंकर शामिल हैं।  बीजेपी में शामिल होने के बाद ऋतु जयसवाल ने कहा कि आज वह पूरी मजबूती और आत्मविश्वास के साथ पार्टी में शामिल हो रही हैं. उन्होंने कहा कि उनके पुराने वीडियो सामने लाकर उन्हें ट्रोल किया जा सकता है, लेकिन वह डरने वाली नहीं हैं.उन्होंने कहा कि जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया था, तब उन्हें बागी कहा गया था। इसके बावजूद उन्होंने करीब 65 हजार वोट हासिल किए थे।  रितु जायसवाल ने कहा कि बीजेपी राष्ट्रहित की राजनीति करती है और देश से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि वे राष्ट्रहित और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की बात करते हैं।  RJD से क्यों बढ़ी दूरियां? मुखिया दीदी’ के नाम से पहचान बनाने वाली रितु जायसवाल पहले आरजेडी की महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष रह चुकी हैं. उन्होंने 2020 विधानसभा चुनाव में परिहार सीट से चुनाव लड़ा था और बहुत कम अंतर से हार गई थीं. लेकिन बाद में आरजेडी ने उनका टिकट काट दिया था. पार्टी ने उनकी जगह दूसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारा, जिससे नाराज होकर रितु जायसवाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया था. उन्हें 60 हजार से ज्यादा वोट मिले थे और आरजेडी उम्मीदवार तीसरे स्थान पर पहुंच गया था. इसके बाद आरजेडी ने उन्हें 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था।  मुखिया के तौर पर बनाई पहचान रितु जायसवाल का राजनीतिक सफर काफी खास माना जाता है. मुंबई से सीतामढ़ी आकर उन्होंने सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया के रूप में काम किया और अपने काम की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. पढ़ी-लिखी और सक्रिय महिला नेता के रूप में उनकी अच्छी छवि रही है।  वैश्य समाज पर पकड़ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी उन्हें अपने साथ जोड़कर वैश्य समाज और महिला वोटरों के बीच पकड़ मजबूत करना चाहती है. सीतामढ़ी, शिवहर और आसपास के इलाकों में युवाओं और महिलाओं के बीच उनकी अच्छी लोकप्रियता मानी जाती है. बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी भी मिल सकती है। 

राज्यसभा चुनाव को लेकर BJP की बड़ी रणनीति, तीसरी सीट जीतने पर भी नजर

भोपाल  मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार बीजेपी रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी इस बार 'सवर्ण' चेहरे पर दांव लगाने की तैयारी में है। बीजेपी अपनी दो सुरक्षित सीटों के साथ कांग्रेस के कब्जे वाली तीसरी सीट पर भी नजर रखे हुए है। पार्टी तीसरी सीट जीतकर दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) को 'गिफ्ट' देना चाहती है। इसके लिए बीजेपी कांग्रेस से आए किसी नेता को चेहरा बना सकती है। पार्टी की नजर उन विधायकों पर भी है जो कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकते हैं। पहली सीट का गणित सामान्य वर्ग को मौका देने की वजह मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनका कार्यकाल 26 जून 2026 को समाप्त होगा। इनमें दो सीटें बीजेपी (डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन) और एक सीट कांग्रेस (दिग्विजय सिंह) के पास है। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, पिछले चुनावों में पार्टी ने दलित, ओबीसी और महिला कार्ड खेलकर सामाजिक संतुलन साधा था। इस बार समीकरण बदल रहे हैं। पार्टी अब ठाकुर या ब्राह्मण कोटे से किसी कद्दावर चेहरे को राज्यसभा भेजना चाहती है। इसी कड़ी में अरविंद भदौरिया और कांतदेव सिंह के नाम चर्चा में हैं। दोनों नेता आरएसएस के करीबी माने जाते हैं और संगठन में गहरी पकड़ रखते हैं। 1. कांतदेव सिंह (प्रदेश उपाध्यक्ष): विंध्य क्षेत्र से आने वाले कांतदेव सिंह की जमीनी पकड़ मजबूत मानी जाती है। यदि बीजेपी किसी क्षत्रिय चेहरे को चुनती है तो वे सबसे प्रबल दावेदार हैं। वे प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के करीबी हैं। उज्जैन संभाग के प्रभारी रहने के साथ सिंगरौली निकाय चुनाव में भी उनकी अहम भूमिका रही है। 2. अरविंद भदौरिया: पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया का नाम भी इस रेस में बना हुआ है। संगठन और सरकार में काम करने का उनका लंबा अनुभव पार्टी के काम आ सकता है। 2020 में मप्र में हुए सत्ता परिवर्तन में अरविंद भदौरिया की अहम भूमिका थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे। तत्कालीन कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई थी। 22 विधायकों को बैंगलुरू के एक रिसॉर्ट में रखा गया था। विधायकों को अलग-अलग जगहों से बैंगलुरू ले जाने और वहां रुकवाने की जिम्मेदारी अरविंद भदौरिया के पास थी। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सरकार में भदौरिया को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। हालांकि, वे 2023 का विधानसभा चुनाव हार गए थे। एससी-एसटी वर्ग को एडस्ट किया जा सकता है सवर्ण कार्ड की चर्चा के बीच बीजेपी अन्य वर्गों को भी नजरअंदाज नहीं कर रही है। एससी वर्ग: चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी को देखते हुए लाल सिंह आर्य का नाम चर्चा में है। एसटी वर्ग: बेहतर प्रदर्शन के आधार पर डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी को दोबारा मौका मिल सकता है। मालवा के आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए रंजना बघेल का नाम भी चर्चा में है। जॉर्ज कुरियन: भरोसेमंद चेहरा फिर हो सकता है रिपीट केंद्रीय राज्यमंत्री जॉर्ज कुरियन को बीजेपी दोबारा राज्यसभा भेज सकती है। 1980 से पार्टी से जुड़े कुरियन उन वफादार नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने जनसंघ के दौर से पार्टी का झंडा थामे रखा है। वे फिलहाल मत्स्य पालन, पशुपालन और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। तीसरी सीट के राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए राज्यसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न को समझना जरूरी है। न गुप्त मतदान, न ही ईवीएम का इस्तेमाल राज्यसभा चुनाव में न गुप्त मतदान होता है और न ही ईवीएम का इस्तेमाल होता है। राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों के नाम के आगे एक से चार तक नंबर लिखा होता है। इसमें विधायकों को वरीयता के आधार पर उस पर चिह्न लगाना होता है। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए जरूरी वोटों की संख्या पहले से तय होती है। यह संख्या कुल विधायक और राज्यसभा सीटों के आधार पर तय होती है। इसमें एक विधायक के वोट की वैल्यू 100 होती है। कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है राज्यसभा चुनाव में एक फॉर्मूला इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है। इसके बाद राज्यसभा सीटों की संख्या में एक जोड़कर भाग दिया जाता है। फिर कुल संख्या में एक जोड़ा जाता है। अंत में जो संख्या निकलती है, वही जीत के लिए जरूरी होती है। कांग्रेस के पास संख्या बल, लेकिन क्रॉस वोटिंग का डर मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट कांग्रेस के खाते में मानी जा रही है। हालांकि, बीजेपी इस सीट पर भी उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। कांग्रेस को आशंका है कि कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं या मतदान से अनुपस्थित रह सकते हैं। इससे तीसरी सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है।     दतिया से विधायक राजेंद्र भारती का चुनाव रद्द होने के बाद यह सीट फिलहाल खाली है।     विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता समाप्त करने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है। हालांकि, वे राज्यसभा चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे।     बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे हाल के दिनों में बीजेपी के कार्यक्रमों में नजर आई हैं। हालांकि, उन्होंने अब तक इस्तीफा नहीं दिया है। कांग्रेस उनसे संपर्क बनाए हुए है, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी भूमिका को लेकर असमंजस है।     अटेर से कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे बजट सत्र में उप नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उन्होंने इसके पीछे पारिवारिक कारण बताए थे।     टिमरनी से कांग्रेस विधायक अभिजीत शाह हाल ही में आरएसएस से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया।     सुसनेर से कांग्रेस विधायक भैंरो सिंह परिहार ने हाल ही में कहा था कि उनका संघ से वैचारिक जुड़ाव है।     कांग्रेस को आशंका है कि बीजेपी हाल ही में पार्टी छोड़कर आए किसी नेता को उम्मीदवार बना सकती है। संभावित नामों में सुरेश पचौरी की चर्चा सबसे ज्यादा है। माना जाता है कि उनके दोनों दलों के नेताओं से अच्छे संबंध हैं। कमलनाथ हो सकते हैं उम्मीदवार कांग्रेस आलाकमान … Read more

फलता ने बढ़ाई ममता की टेंशन! TMC के लिए भवानीपुर से ज्यादा बड़ा झटका क्यों माना जा रहा नतीजा

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में फलता विधानसभा सीट पर हुए पुनर्मतदान के नतीजों ने पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार देबांशू पांडा ने इस सीट पर 1.09 लाख से भी ज्यादा वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की है. यह जीत सिर्फ भाजपा की मजबूती को नहीं दिखाती, बल्कि 15 साल सत्ता में बैठी रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक ऐसा बड़ा झटका है जिसने पार्टी के भीतर एक गंभीर संकट का इशारा कर दिया है. जहां टीएमसी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गई. ये प्रत्याशी कोई और नहीं, टीएमसी संगठन में सबसे पावरफुल अभिषेक बनर्जी के राइट हैंड मैन कहे जाने वाले जहांगीर खान थे. जिन्होंने आखिरी वक्त मुकाबले से खुद को अलग कर लिया, और अपना वोट भी नहीं डाला।  ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि टीएमसी के लिए ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर की हार ज्यादा गंभीर थी, या फलता का नतीजा? भवानीपुर में होने वाले किसी भी राजनैतिक उतार-चढ़ाव को लोग अक्सर ममता बनर्जी के पर्सनल जादू और शहर के वोटर्स के मिजाज से जोड़कर देखते हैं, जहां हार-जीत का अंतर कभी-कभी पार्टी की ढिलाई की वजह से बदल सकता है. लेकिन फलता की हार तृणमूल कांग्रेस की उस 'ग्रासरूट मशीनरी' यानी जमीनी संगठन की नाकामी को सामने लाती है, जिसके दम पर पार्टी पिछले कई सालों से बंगाल पर राज कर रही है. यह हार इसलिए भी ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि फलता सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के 'नंबर दो' और ममता के उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र 'डायमंड हार्बर' का एक मुख्य हिस्सा है।  इस क्षेत्र के पुराने इतिहास को देखें तो दक्षिण 24 परगना जिला हमेशा से टीएमसी का सबसे मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है. इस जिले ने हमेशा तृणमूल कांग्रेस का बढ़-चढ़कर साथ दिया है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में, जब अभिषेक बनर्जी ने डायमंड हार्बर सीट से रिकॉर्ड अंतर से जीत हासिल की थी, तब इसी फलता विधानसभा क्षेत्र ने उन्हें अकेले 1.68 लाख वोटों की बड़ी लीड दी थी. उस चुनाव में अभिषेक बनर्जी का वोट शेयर फलता में लगभग 89% था, यानी  एकतरफा मुकाबला. लेकिन, सिर्फ दो साल के भीतर तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर गिरकर सिर्फ 3.7% पर आ जाना और पार्टी उम्मीदवार का चौथे नंबर पर खिसककर अपनी जमानत तक गंवा देना, किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिए बहुत बड़ी नाकामी है. फलता सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि यह वह इंडस्ट्रियल और ग्रामीण इलाका है जहां टीएमसी का बूथ मैनेजमेंट सबसे अचूक माना जाता था. इस सीट पर मिली करारी हार यह साफ करती है कि पार्टी का वह जमीनी ढांचा, जो कभी हर वोटर के घर तक पकड़ रखता था, अब पूरी तरह से बिखर चुका है।  अभिषेक का 'डायमंड हार्बर मॉडल' ध्वस्त यह हार सीधे तौर पर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की राजनैतिक साख और उनकी लीडरशिप पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है. अभिषेक बनर्जी लगातार खुद को पार्टी के मॉडर्नाइजेशन और पार्टी ऑर्गेनाइजेशन में खुद को नए के लीडर के रूप में पेश करते रहे हैं. उन्होंने बार-बार 'डायमंड हार्बर मॉडल' की तारीफ की है. एक ऐसा मॉडल जिसे वे अच्छे गवर्नेंस, तुरंत एक्शन और अचूक चुनावी रणनीति का प्रतीक बताते थे. चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में, 2 मई को अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय नेतृत्व और भाजपा को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि भाजपा को उनके डायमंड हार्बर मॉडल में एक मामूली खरोंच लगाने के लिए भी 10 जन्म लेने होंगे, और अगर हिम्मत है तो दिल्ली से अपने नेताओं को बुलाकर फलता में मुकाबला करके दिखाएं. इस तरह की आक्रामक चुनौती के बाद जब नतीजे पूरी तरह उल्टे आते हैं, तो राजनैतिक नुकसान सिर्फ एक सीट का नहीं होता, बल्कि नेता की साख पूरी तरह प्रभावित हो जाती है।  शुभेंदु अधिकारी ने इस नतीजे के तुरंत बाद तंज कसते हुए कहा कि कुख्यात 'डायमंड हार्बर' मॉडल अब तृणमूल के 'हार-बार' मॉडल में बदल चुका है. फलता की हार ने यह साबित कर दिया है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की 35 कंपनियों की तैनाती और कड़े इलेक्शन मैनेजमेंट के बीच, जब सरकारी मशीनरी का अनुकूल सहयोग मुमकिन नहीं हो पाता, तब संगठन की असली परीक्षा होती है. यह नतीजा अभिषेक बनर्जी के उस दावे को कमजोर करता है कि उनका संगठन बिना किसी अतिरिक्त मदद के भी अजेय है।  अंतर्कलह का अंत नहीं इसके साथ ही, फलता के नतीजे टीएमसी के भीतर पिछले काफी समय से चल रहे 'पुराने वफादार बनाम नए कॉर्पोरेट-शैली के रणनीतिकार' के अंदरूनी संघर्ष को और ज्यादा तेज करेंगे. ममता बनर्जी की राजनीति हमेशा से संघर्ष करने, सड़क पर उतरकर आंदोलन करने और जमीनी स्तर के पुराने नेताओं को साथ लेकर चलने पर टिकी रही है. इसके उलट, अभिषेक बनर्जी पर उन्हीं की पार्टी के लोग आरोप लगा रहे हैं कि उनका मॉडल कॉर्पोरेट इलेक्शन मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स और पारंपरिक नेताओं को दरकिनार कर नए चेहरों को आगे बढ़ाने की वकालत करता है. फलता की इस ऐतिहासिक पराजय से पार्टी के भीतर ममता बनर्जी के पुराने खेमे को अभिषेक के खिलाफ मुंह खोलने का एक और मौका मिल गया है. पार्टी के भीतर यह आवाजें उठने लगी हैं कि संगठन के फैसलों से पुराने और जमीनी नेताओं को साइडलाइन करने का नतीजा ही फलता में देखने को मिला है।  ममता की चुनौती अभिषेक को बचाना चुनाव प्रचार के आखिरी चरण में टीएमसी उम्मीदवार का अचानक पीछे हटने की घोषणा करना यह इशारा करता है कि लोकल लीडरशिप और शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिकारों के बीच गहरा अविश्वास था. ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है. एक तरफ उन्हें अपने घोषित उत्तराधिकारी की साख को बचाना है, तो दूसरी तरफ पार्टी के बिखरते जा रहे कार्यकर्ताओं और पुराने नेताओं की नाराजगी को दूर करना है. भवानीपुर की जीत या हार ममता के अपने कंट्रोल में होती है, लेकिन फलता का बिखरना यह दिखाता है कि पार्टी पर उनकी पकड़ के बावजूद ऑर्गेनाइजेशन पर कंट्रोल कमजोर हो रहा है।  इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू मतगणना के दिन तृणमूल की गैरमौजूदगी रही. टीएमसी जैसी मजबूत पार्टी का मतगणना केंद्रों पर अपने काउंटिंग एजेंट तक तैनात न … Read more

क्या कांग्रेस खुद कमजोर कर रही राहुल गांधी की राजनीति? सोनिया गांधी क्यों हैं खामोश

नई दिल्ली हर बच्चा अपने मां बाप के प्यार दुलार में बड़ा होता है. नेता हो आम आदमी. बड़ा राजनीतिक घराना हो या कॉरपोरेट पावर हाउस. गांधी फैमिली में भी यही होता आया. आयरन लेडी होते हुए भी इंदिरा गांधी ने अपने दोनों बेटों को प्यार से पाला. पर संजय गांधी और राजीव गांधी बिल्कुल अलग मिजाज के निकले. संजय गांधी की रुचि पॉलिटिक्स में थी और वो अंदर ही अंदर इतने पावरफुल हो गए कि बड़े से बड़े कैबिनेट मंत्री भी उनकी मर्जी के बिना इंदिरा से नहीं मिल सकते थे. आपातकाल में तो संजय पावर ने जो किया वो सबको पता है. अपनी जिद के आगे वो मां की भी नहीं सुनते थे. सीएम बदलने तक का फैसला संजय गांधी कर सकते थे. अकाल मृत्यु के साथ 23 जून 1980 को संजय का संक्षिप्त सक्रिय इतिहास खत्म हो गया।  इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव को बागडोर तो मिली लेकिन संजय गांधी वाली पकड़ नहीं थी. वो उन्हीं नेताओं की चौकड़ी में आगे बढ़े जो कभी उनकी मां के साथ हुआ करते थे. खुद का रॉयल मृदुभाषी अंदाज. जब 1991 में उनकी हत्या हो गई तो सोनिया गांधी को पार्टी संभालने में समय लगा. पीवी नरसिंह राव की पीएम पारी के बाद 1998 में सीताराम केसरी को धकिया कर वो अध्यक्ष बनीं. इटालियन बेबी पर बवाल न हुआ होता तो मनमोहन सिंह की जगह वही पीएम बनती लेकिन नेशनल एडवाइजरी काउंसिल बनाकर सोनिया ने पार्टी और सरकार दोनों को मुट्ठी में कर लिया।  पर राहुल गांधी कुछ नहीं सीख पाए. 2017 से 2019 तक दो साल अध्यक्ष तो रहे लेकिन न अपनी मां और न ही संजय गांधी वाली बात इनमें दिखाई दी. बल्कि हो इससे उलट रहा है. कहने को तो मल्लिकार्जुन खरगे अभी अध्यक्ष हैं और सोनिया बीमार हैं. इसलिए राहुल गांधी के पास ही पार्टी की चाबी है पर ये किसी काम का नहीं. राहुल लगातार पार्टी में बेइज्जत हो रहे हैं. और ये सिलसिला पिछले 9 साल से चल रहा है।  जब खरगे उनके सामने अड़ गए जब राहुल कोई फैसला करते हैं तो उसे स्टेट यूनिट नहीं मानती. और जब स्टेट यूनिट कोई फैसला करता है तो उसे राहुल गांधी नहीं मानते. इसी कन्फ्यूजन में कांग्रेस खत्म हो रही है. हरियाणा में हुड्डा को छूट दे दी तो जीता चुनाव हार गए. तमिलनाडु में एक्टर विजय से प्री पोल अलाएंस करना चाहते थे तो खरगे जी अड़ गए. सबसे दुखद बात ये रही कि बच्चे के फैसले में मां सोनिया कभी साथ नहीं रही. वो ओल्ड गार्ड के फेवर में रही. केरल में भी खरगे चला लेते लेकिन अंत में राहुल ने जमीनी नेता वीडी सतीशन को सीएम बना दिया. पर किस काम के सीएम. होम मिनिस्ट्री रमेश चेन्नीथला के पास चला गया।  अगर संजय गांधी वाला एक भी गुण राहुल में होता ते इन नेताओं की मजाल थी कि बकार भी निकल पाता. ऊपर से जो नैरेटिव सेट करते हैं राहुल उसी का नाश करते हैं उनके नेता. जब पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी ने मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल को चीफ सेक्रेटरी बना दिया तो राहुल ने जम कर हमला बोला. बीजेपी-चुनाव आयोग को चोर बाजार बता दिया. जो जितना बड़ा चोर उसे उतना बड़ा इनाम. ये उनका सोशल मीडिया पोस्ट था. पर केरल में उन्हीं के सीएम ने वही काम किया जो सुवेंदु ने किया. मुख्य चुनाव अधिकारी रतन केलकर को अपना ही सेक्रेटरी बनाकर राहुल गांधी के मुंह पर तमाचा जड़ दिया. अब बीजेपी सवाल पूछ रही है. क्या केरल में कांग्रेस की जीत चुनाव अधिकारी के कारण हुई है? यहां तो राहुल गांधी के एसआईआर के सारे नैरेटिव पर उन्हीं की पार्टी ने पानी फेर दिया. ऐसी बेइज्जती किसी शीर्ष नेता की हुई है क्या. संजय गांधी होते तो सतीशन नप गए होते। 

‘एक साल में गिर जाएगी मोदी सरकार’— राहुल गांधी के दावे में कितना दम? राहुल गांधी का बड़ा दावा: क्या सच में खतरे में है मोदी सरकार या सिर्फ सियासी बयानबाजी?

नई दिल्ली विपक्ष के नेता राहुल गांधी का यह दावा कि अगले एक साल में पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार गिर जाएगी, राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है. कांग्रेस की एक बैठक में दिए गए इस बयान को बीजेपी ने पूरी तरह हवा-हवाई और राजनीतिक निराशा से जुड़ा बयान बताया है. सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी के इस दावे के पीछे कोई ठोस राजनीतिक आधार है या फिर यह सिर्फ विपक्षी कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश है? अगर मौजूदा राजनीतिक हालात को देखें तो राहुल गांधी का दावा जमीन से ज्यादा राजनीतिक बयानबाजी जैसा नजर आता है. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि केंद्र में एनडीए सरकार अभी भी मजबूत संख्या बल के साथ सत्ता में बनी हुई है. बीजेपी भले अकेले दम पर पहले जैसा आंकड़ा न लाई हो, लेकिन गठबंधन के साथ सरकार पूरी तरह स्थिर दिखाई देती है. सरकार पर किसी तरह का तत्काल राजनीतिक संकट नजर नहीं आता।  दरअसल, हाल के महीनों में हुए कई चुनावों ने यह संकेत दिया है कि बीजेपी का जनाधार अभी भी बेहद मजबूत है. पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में पार्टी को जनता का शानदार समर्थन मिला है. खासतौर पर बंगाल में बीजेपी ने अपनी राजनीतिक मौजूदगी को बेहद मजबूत किया है. असम में भी पार्टी और उसकी सरकार की पकड़ पहले से अधिक मजबूत नजर आ रही है. इन चुनावों ने यह संदेश दिया कि बीजेपी केवल हिंदी पट्टी तक सीमित पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में भी उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता आज भी बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है. राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का चेहरा अभी भी विपक्ष के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रभावी माना जाता है. विपक्ष लगातार महंगाई, बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दे उठा रहा है, लेकिन इसके बावजूद मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता में कोई कमी नहीं दिख रही. उनमें जनता का एक अटूट भरोसा दिखता है. यही वजह है कि बीजेपी लगातार चुनावी राजनीति में भी बढ़त बनाए हुए है।  राहुल गांधी अपने बयान में आर्थिक असंतोष और युवाओं की नाराजगी को सरकार के खिलाफ माहौल बनने का कारण बता रहे हैं. कांग्रेस नीट पेपर लीक और छात्रों की परेशानी जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है. लेकिन, सरकार ने इन मुद्दों पर भी त्वरित कदम उठाते हुए परीक्षा रद्द कर दी. ऐसे में ये मुद्दे भी अब प्रभावी नहीं रहे. वैसे भी भारतीय राजनीति का अनुभव बताता है कि केवल मुद्दों के आधार पर सरकारें नहीं गिरतीं. इसके लिए सत्ता पक्ष के भीतर बड़ा विभाजन, गठबंधन में दरार या व्यापक राजनीतिक संकट होना चाहिए. फिलहाल ऐसी कोई स्थिति दिखाई नहीं देती. इसके बावजूद अगर राहुल गांधी एक मजबूत सरकार के गिरने की भविष्यवाणी कर रहे हैं तो इससे उनकी राजनीतिक समझ पर सवाल उठ सकते हैं।  विपक्ष की स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं राहुल गांधी के बेतुके दावे के साथ विपक्ष की स्थिति भी बहुत मजबूत नहीं मानी जा रही. इंडिया गठबंधन के भीतर कई दलों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित हैं और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष अब तक कोई स्पष्ट चेहरा या ठोस वैकल्पिक एजेंडा पेश नहीं कर पाया है. कई राज्यों में कांग्रेस का संगठन लगातार कमजोर हुआ है. ऐसे में बीजेपी के मुकाबले विपक्ष की चुनौती फिलहाल बिखरी हुई नजर आती है. बीजेपी नेताओं ने भी राहुल गांधी के बयान को इसी नजरिए से देखा है. केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और सांसद संबित पात्रा जैसे नेताओं ने कहा कि विपक्ष जनता के जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहा और इसलिए इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं।  असल में राहुल गांधी का बयान ज्यादा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश लगता है. कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों में यह भरोसा बनाए रखना चाहती है कि बीजेपी को चुनौती दी जा सकती है. लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरण, मोदी की लोकप्रियता, एनडीए का संख्या बल और विपक्ष की कमजोरी को देखते हुए यह दावा फिलहाल वास्तविकता से ज्यादा राजनीतिक कल्पना जैसा दिखाई देता है। 

क्या बदलने वाला है कर्नाटक का CM? सिद्धारमैया की दिल्ली दौड़ और DK शिवकुमार के पोस्टर चर्चा में

बेंगलुरु  कर्नाटक में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर खींचतान की खबरों के बीच अब कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को दिल्ली बुलाया है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को 26 मई यानी मंगलवार को दिल्ली पहुंचने का फरमान जारी किया गया है। चर्चा है कि यहां सिद्धारमैया और पार्टी आलाकमान के बीच बंद कमरे में एक अहम बैठक होगी। इससे पहले सिद्धारमैया ने कहा था कि वे सिर्फ आलाकमान के बुलाने पर ही दिल्ली जाएंगे। वहीं, डीके शिवकुमार ने हाल ही में कहा है कि आलाकमान जो भी फैसला करेगा, दोनों नेता उसका पूरी तरह पालन करेंगे। ऐसे में यह बैठक कर्नाटक कांग्रेस के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। इससे CM पद को लेकर जारी सस्पेंस भी खत्म हो सकता है। गौरतलब है कि यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल के 3 साल पूरे कर लिए हैं। इससे पहले सरकार बनने के समय से ही चर्चा है कि सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच पावर-शेयरिंग का फॉर्मूला तय हुआ था। इसके बाद जब सरकार ने ढाई साल पूरे किए, तब से ही शिवकुमार का खेमा लगातार उनको CM बनाने की मांग कर रहा है। बीते साल नवंबर में तनाव तब चरम पर पहुंच गया था जब शिवकुमार ने खुलकर अपनी मांग सामने रखी थी। डीके शिवकुमार के लिए लगे पोस्टर्स अब एक बार फिर कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में मैसूर में शिवकुमार के जन्मदिन के जश्न के दौरान उनके समर्थकों ने खास केक काटा, जिस पर लिखा था- ‘नेक्स्ट सीएम डी के बॉस’, यानी ‘अगले मुख्यमंत्री डीके बॉस।’ वहीं राजधानी बेंगलुरु से लेकर बेलगावी तक, पूरे कर्नाटक में शिवकुमार के बड़े-बड़े पोस्टरों और कट-आउट्स भी लगाए गए हैं जिनमें ऐसे ही नारे लिखे हैं। दिल्ली दरबार में किन मुद्दों पर होगी बातचीत? न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस सूत्रों ने बताया है कि दिल्ली में होने वाली बैठक में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी जैसे शीर्ष नेता शामिल हो सकते हैं। इस दौरान दोनों गुटों के बीच जारी तनाव को कम करने की कोशिश की जाएगी। वहीं राज्य में कैबिनेट में भी बड़े फेरबदल पर चर्चा होने की संभावना है। सरकार के 3 साल पूरे होने पर कई मौजूदा मंत्रियों की छुट्टी की जा सकती है और नए और युवा चेहरों को मौका दिया जा सकता है, ताकि दोनों गुटों के विधायकों को संतुष्ट रखा जा सके।

फाल्टा के नतीजों ने बढ़ाई ममता-राहुल की टेंशन, आखिर BJP ने कैसे पलट दिया खेल?

कलकत्ता पश्च‍िम बंगाल के फाल्टा व‍िधानसभा चुनाव का नतीजा आया और सब शॉक्‍ड रह गए. क्‍योंक‍ि यह सिर्फ एक सीट का रिजल्ट नहीं, मुस्‍ल‍िमों के वोट बैंक को अपना हक समझने वाली पार्टियों के ल‍िए मैसेज है. क्‍योंक‍ि यहां कुल वोट पड़े 2,10,192… और इसमें से 72% वोट अकेले बीजेपी के कैंड‍िडेट को म‍िल गए. सवाल ये क‍ि जब हिंदू आबादी यहां करीब 63से 65% के आसपास है, तो बीजेपी को 71% वोट कैसे मिल गए? व‍िपक्ष इसे ध्रुवीकरण कह सकता है, लेकिन नतीजे बताते हैं क‍ि या तो बीजेपी को एक-एक ह‍िन्‍दू वोट म‍िल गए और व‍िपक्ष को स‍िर्फ मुसलमानों के वोट म‍िले, एक भी ह‍िन्‍दू ने वोट नहीं क‍िया और या फ‍िर तमाम मुसलमानों ने भी खुलकर बीजेपी को सपोर्ट क‍िया. लेकिन असली कहानी इतनी सीधी नहीं है ।  फाल्टा विधानसभा में इस बार र‍िकॉर्ड 87% वोट‍िंग हुई थी. यानी लोगों ने इस बार वोट डालने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी. ये भी नहीं कह सकते क‍ि मुस्‍ल‍िम वोटर घर से नहीं न‍िकले. अब नतीजा भी देख लीजिए. वोटिंग पैटर्न को देखें तो यह मुकाबला कई उम्मीदवारों के बीच था, लेकिन असल बढ़त बीजेपी को तब मिली जब मैदान में मुकाबला पूरी तरह एकतरफा होता दिखाझ बीजेपी ने लगभग हर बूथ पर मजबूत प्रदर्शन किया और बड़े वोट शेयर में तब्दील किया।  क‍िसे क‍ितने वोट म‍िले बीजेपी: 149666 वोट (71.2%) सीपीएम: 40645 वोट (19.34%) कांग्रेस: 10084 वोट (4.8%) टीएमसी: 7778 वोट (3.7%) अन्य/NOTA: बाकी हिस्सा आप सोच रहे होंगे क‍ि इसमें क्‍या खास है. लेकिन ठहरिए! असली पेंच यहीं छुपा है. फाल्टा विधानसभा में हिंदू मतदाता करीब 62 से 65% हैं और मुस्लिम मतदाता लगभग 34% से 36% के बीच हैं।  गणित के सामान्य नियम से भी देखें, तो अगर 100% हिंदू बीजेपी को वोट दे देता, जो कि आज तक कभी नहीं हुआ, तब भी बीजेपी का आंकड़ा 62-65% पर आकर थम जाना चाहिए था. लेकिन देवांग्शु पांडा को मिले हैं 71.2% वोट! यानी सीधे-सीधे हिंदू आबादी के कुल अनुपात से भी 10% से 11% ज्यादा वोट।  तो क्या फाल्टा के मुस्लिमों ने भी चुपके से कमल के बटन पर उंगली दबाई? या फिर कांग्रेस और लेफ्ट का वोट बैंक पूरी तरह मटियामेट होकर बीजेपी में समा गया? और सबसे बड़ा सस्पेंस… दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान को सिर्फ 3.7% वोट क्यों मिले? खेल हुआ कैसे?  तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार जहांगीर खान ने ऐन वक्त पर मुकाबले से अपना नाम वापस ले लिया था या यूं कहें कि वे चुनावी रेस से तकनीकी या राजनीतिक कारणों से बाहर हो गए. लेकिन चूंकि तब तक बैलट पेपर प्रिंट हो चुके थे और ईवीएम सेट हो चुकी थी, इसलिए उनका नाम और सिंबल ‘दो फूल’ मशीन पर मौजूद रहा. नतीजा? मैदान में न होने के बावजूद जहांगीर खान के नाम पर 7,783 वोट (3.7%) पड़ गए. इसमें दिलचस्प बात ये है कि उन्हें ईवीएम से सिर्फ 6,257 वोट मिले, लेकिन पोस्टल बैलट से 1,526 वोट मिले, जो दिखाता है कि सरकारी कर्मचारियों या ड्यूटी पर तैनात लोगों का एक हिस्सा आंख मूंदकर टीएमसी के नाम पर बटन दबा गया।  दीदी के कैंडिडेट का मैदान से हट जाना ही इस चुनाव का टर्निंग पॉइंट बना. डायमंड हार्बर जैसी हाई-प्रोफाइल लोकसभा सीट के तहत आने वाले फाल्टा में टीएमसी का जमीन पर सक्रिय न होना एक बड़ा वैक्यूम पैदा कर गया. जब सत्ताधारी दल का मुख्य चेहरा ही गायब हो गया, तो टीएमसी का जो कोर वोटर था-विशेषकर मुस्लिम आबादी और सरकारी योजनाओं के लाभार्थी… वे पूरी तरह असमंजस में आ गए।  जहां पुरानी थ्योरी फेल हो गई फाल्टा विधानसभा मुख्य रूप से एक ग्रामीण इलाका है. इसके सामाजिक ढांचे को समझने के लिए हमें इसके डेमोग्राफी के आंकड़ों को देखना होगा।      धार्मिक समीकरण: इस निर्वाचन क्षेत्र में हिंदू मतदाताओं की संख्या लगभग 52% से 65% के बीच है. वहीं मुस्लिम मतदाताओं की आबादी काफी निर्णायक है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 34% से 36% (कुछ अनुमानों में 38% तक) हिस्सा बनाती है. हासिमनगर, गोपालपुर, फतेहपुर, और भदुरा जैसे क्षेत्र मुस्लिम बहुल माने जाते हैं, जहाँ पारंपरिक रूप से टीएमसी की मजबूत पकड़ रही है।      जातीय समीकरण (SC फैक्टर): धार्मिक विभाजन के अलावा, यहां की स्थानीय जातियों में अनुसूचित जाति (SC) का बहुत बड़ा प्रभाव है. 2011 की जनगणना और मतदाता सूची के विश्लेषण के अनुसार, फाल्टा विधानसभा में अनुसूचित जाति (SC) के मतदाताओं की संख्या लगभग 25.66% है. स्थानीय ग्रामीण अंचलों और गांवों (जैसे फाल्टा गांव) में कई जगह SC आबादी 80% से भी अधिक है. शेष लगभग 33% से 35% आबादी सामान्य और अन्य पिछड़ी जातियों जैसे कि महिष्य, सद्गोप व अन्य बंगाली हिंदू समुदाय की है।  तो क्या मुस्लिमों ने भी बीजेपी को वोट दिया? पश्चिम बंगाल में यह राजनीतिक धारणा बहुत मजबूत है कि मुस्लिम समुदाय कभी भी किसी भी परिस्थिति में बीजेपी को वोट नहीं देता. लेकिन फाल्टा में परिस्थितियां बिल्कुल जुदा थीं. जब टीएमसी का उम्मीदवार मैदान में सक्रिय नहीं था, तो मुस्लिम मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि उनका पारंपरिक ठिकाना गायब था. उनके पास दो ही रास्ते बचे थे या तो वे कांग्रेस के अब्दुर रज्जाक मोल्ला या सीपीआई(एम) के शंभू नाथ कुर्मी की तरफ जाएं, या फिर स्थानीय सत्ता विरोधी लहर का हिस्सा बन जाएं . आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस को मात्र 10,084 वोट (4.8%) मिले और सीपीआई(एम) को 40,645 वोट (19.34%) मिले. अगर मुस्लिम आबादी ने एकमुश्त लेफ्ट या कांग्रेस को वोट दिया होता, तो इन दोनों पार्टियों का योग बहुत बड़ा होता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ग्राउंड रिपोर्ट इशारा करती है कि मुस्लिम बहुल पॉकेट्स (जैसे हासिमनगर और फतेहपुर) के कुछ हिस्सों में, विशेषकर युवा मुस्लिम मतदाताओं ने, रोजगार, स्थानीय विकास और केंद्रीय योजनाओं के प्रभाव में आकर पहली बार ‘कमल’ का बटन दबाया. हालांकि यह कोई सामूहिक बदलाव नहीं था, लेकिन इस ‘साइलेंट शिफ्ट’ ने बीजेपी के वोट शेयर को अप्रत्याशित ऊंचाई पर पहुंचा दिया . हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण 71.2% के जादुई आंकड़े के पीछे की जो दूसरी और सबसे सटीक थ्योरी है वह है हिंदू वोटों का शत-प्रतिशत कंसॉलिडेशन. जब किसी क्षेत्र में 87% मतदान होता है, तो इसका मतलब है कि सामान्य … Read more

राज्यसभा में बड़ा बदलाव: राघव चड्ढा बने पिटीशन्स कमेटी के चेयरमैन

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को राज्यसभा की याचिका समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने समिति का पुनर्गठन करते हुए इस संबंध में अधिसूचना जारी की है. राज्यसभा की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि सभापति ने 20 मई से प्रभावी रूप से याचिका समिति का पुनर्गठन किया है. इसके तहत सदन के 10 सदस्यों को पैनल में नामित किया गया है. इसमें लिखा है, "राघव चड्ढा को अध्यक्ष नियुक्त किया गया है." राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के अलावा याचिका समिति में हर्ष महाजन, गुलाम अली, शंभू शरण पटेल, मयंककुमार नायक, मस्तान राव यादव बीधा, जेबी माथेर हिशाम, सुभाशीष खुंटिया, र्वंग्रा नारजरी और संतोष कुमार पी. को सदस्य बनाया गया है. इसी के साथ राज्यसभा सचिवालय की ओर से जारी एक अन्य अधिसूचना में कहा गया कि राज्यसभा के सभापति ने 20 मई 2026 को राज्यसभा सदस्य डॉ. मेनका गुरुस्वामी को 'कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026' पर बनी संयुक्त समिति का सदस्य नामित किया है. वहीं लोकसभा सचिवालय की अलग अधिसूचना में कहा गया कि लोकसभा अध्यक्ष ने 21 मई से प्रभावी रूप से अरविंद गणपत सावंत को 'कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक' पर बनी संयुक्त समिति के लिए नामित किया है. गौरतलब है कि राघव चड्ढा दो तिहाई ज्यादा AAP के राज्यसभा सांसदों के साथ बीजेपी में शामिल हुए थे. उनके साथ हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता, संदीप पाठक, विक्रमजीत साहनी और अशोक मित्तल सहित कई नेता शामिल रहे. उस वक्त राघव चड्ढा ने कहा था, 'पिछले कुछ वर्षों से मुझे यह महसूस हो रहा था कि मैं गलत पार्टी में सही आदमी हूं. हमने यह फैसला किया है कि हम संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए खुद को BJP में मिला लेंगे.'' उन्होंने कहा था कि जिस आम आदमी पार्टी को खून-पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वो अब अपने सिद्धांतों, मूल्यों और मूल नैतिकता से भटक गई है. अब यह पार्टी देश के हित में नहीं, बल्कि अपने निजी फायदे के लिए काम करती है.