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NCP(SP) में फूट के बीच कांग्रेस का बड़ा ऑफर, क्या शरद पवार लेंगे विलय पर फैसला?

नई दिल्ली महाराष्‍ट्र से बड़ी खबर आ रही है. सूत्रों के मुताबिक- कांग्रेस हाईकमान ने शरद पवार को ऑफर द‍िया है क‍ि वे अपनी पार्टी एनसीपीएस का कांग्रेस में व‍िलय कर दें. ज‍िस वक्‍त यह खबर आई ठीक उसी वक्‍त शरद पवार की पार्टी में फूट भी सामने आ गई. एनसीपीएस के तीन एमएलए महाराष्‍ट्र बीजेपी अध्‍यक्ष से म‍िले हैं और कहा जा रहा है क‍ि वे बीजेपी ज्‍वाइन कर सकते हैं।  इससे पहले उद्धव गुट के नेता ने सुझाव द‍िया था क‍ि कांग्रेस में TMC और NCP का विलय हो जाना चाह‍िए. इस पर जब शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले से पूछा गया तो उन्‍होंने कहा क‍ि संजय राउत मेरे लिए बड़े भाई जैसे हैं, उन्होंने जो सुझाव दिया है, वो अच्‍छा है. अब आगे क्‍या होगा, कैसे होगा, ये वक्‍त बताएगा.  बीजेपी पर हमला करते हुए सुप्र‍िया ने कहा, जो तृणमूल कांग्रेस में हुआ, वो हैरान करने वाला नहीं है. इन लोगों ने पहले श‍िवसेना तोड़ी, उसके बाद एनसीपी तोड़ी, अब तृणमूल कांग्रेस की बारी है. तो हम ये भुगत चुके हैं. इसील‍िए हम तृणमूल के साथ खड़े द‍िख रहे हैं।  अशोक गहलोत भी इसी सुर में बोले राजस्‍थान के पूर्व मुख्‍यमंत्री और कांग्रेस के द‍िग्‍गज नेता अशोक गहलोत ने कहा क‍ि जो पार्टियां कांग्रेस से अलग हुई हैं, उन्हें वापस कांग्रेस में आ जाना चाहिए. सब पार्टियों को एकजुट होना चाहिए. राहुल गांधी को इंडिया अलायंस का नेता मान लेना चाहिए. संजय राउत की बात में दम है।  संजय राउत ने क्‍या कहा था श‍िवसेना उद्धव गुट के नेता संजय राउत ने कहा था क‍ि जो पार्टियां कांग्रेस से अलग हुई हैं, उन्हें कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए. आज सभी दलों को अपने-अपने राज्यों में लड़ाई लड़ने के लिए कांग्रेस पार्टी की मदद चाहिए।  शरद पवार गुट में बढ़ी बेचैनी, तीन विधायक BJP प्रदेश अध्यक्ष से मिले महाराष्ट्र की सोलापुर विधानसभा सीट पर चुनावी मुकाबले के बीच शरद पवार गुट की एनसीपी में अंदरूनी असंतोष खुलकर सामने आ गया है. पार्टी द्वारा वसंतराव देशमुख को उम्मीदवार बनाए जाने से नाराज तीन विधायकों उत्तमराव जानकर, अभिजीत पाटिल और नारायण पाटिल ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण से मुलाकात की. सोलापुर में महायुति नेताओं की बैठक के दौरान हुई इस मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है. बैठक में सांगोला से शेकप विधायक बाबासाहेब देशमुख भी मौजूद रहे।  दरअसल, सोलापुर विधानसभा सीट पर भाजपा के राजेंद्र राउत का मुकाबला शरद पवार गुट के उम्मीदवार वसंतराव देशमुख से है. टिकट वितरण को लेकर नाराज इन तीनों विधायकों ने पहले भी सार्वजनिक रूप से अपनी आपत्ति जताई थी और भाजपा उम्मीदवार को समर्थन देने के संकेत दिए थे. वसंतराव देशमुख को सांसद धैर्यशील मोहिते पाटिल का करीबी माना जाता है, ऐसे में विधायकों की नाराजगी को मोहिते पाटिल के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। 

TMC-Congress विलय की चर्चा पर बड़ा खुलासा, जानिए क्यों ममता बनर्जी के लिए आसान नहीं है यह फैसला

कोलकाता  तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के बाद टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की मुलाकात के बाद दोनों पार्टियों का आपस में विलय की अटकलें शुरू हो गई. इन मुलाकातों के बाद कांग्रेस की ओर से अपने तमाम प्रदेश अध्यक्ष को मीटिंग के लिए बुलावा भेजे जाने के बाद टीएमसी का कांग्रेस में विलय की अटकलें और तेज हो गई. हालांकि टीएमसी की तरफ से इन अटकलों को खारिज कर दिया गया है और कांग्रेस ने भी प्रदेश अध्यक्षों के साथ अपनी बैठक को टाल दिया है. अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है कि कांग्रेस और टीएमसी के बीच विलय को लेकर बातचीत में किसी बिंदु पर गतिरोध है. इन चर्चाओं के बीच विशेषज्ञों ने अपनी बात सामने रखी है. संविधान विशेषज्ञ का कहना है कि ममता बनर्जी के चाहने के बावजूद वह अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में नहीं कर पाएंगी।  सुप्रीम कोर्ट के वकील ने समझाया पार्टियों के विलय का पूरा समीकरण सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी दुबे ने कहा कि राजनीतिक दलों का विलेय दो तरह से होता है. एक विधायी विलय, जिसको हम लेजिस्लेटिव मर्जर कहते हैं. दूसरा होता है ऑर्गेनाइजेशनल मर्जर, जिसको हम सांगठनिक विलय कहते हैं. दोनों परिस्थितियों में दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है. जब आप विधायी विलय करते हैं तो लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा के दो तिहाई सदस्यों का सहमति पत्र होना चाहिए. वहीं सांगठनिक विलय में भी तमाम राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय और जिला स्तरीय पार्टी पदाधिकारियों का दो तिहाई समर्थन चाहिए।  उन्होंने कहा की तारीख में ममता बनर्जी पार्टी प्रमुख होने के नाते अगर टीएमसी का विलय करना भी चाहती हैं तो उन्हें सबसे पहले इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को यह आश्वस्त करना होगा कि उनके इस फैसले के साथ पार्टी पदाधिकारी या सांसद-विधायकों में दो तिहाई समर्थन प्राप्त है।  वरिष्ठ अधिवक्ता इसके अलावा विलय के लिए दोनों दलों के मुख्य संगठन माने पार्टी हाईकमान आपस में औपचारिक विलय का प्रस्ताव पारित करते हैं. मूल पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सहमति से विलय होता है. तभी एंटी डिफेक्शन लॉ (दल-बदल विरोधी कानून) और मर्जर क्लॉज कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी (विलय की संवैधानिक वैधता) कार्यान्वयन में मदद करेगा. इसके बिना लेजिसलेटिव मर्जर कर देते हैं और दो तिहाई सदस्य नहीं है तो वह भी नहीं माना जाएगा. संगठन का विलय कर देते हैं तो भी नहीं माना जाएगा।  उन्होंने समझाया कि विलय में यह भी देखना होगा कि जिन लोगों ने खुद को अलग गुट घोषित कर दिया है, वह कहां हैं. चुनाव आयोग को आश्वस्त होना पड़ेगा कि विलय के समय ब्लॉक से लेकर केंद्रीय स्तर के संगठन और उसके जो ऑफिस बियरर्स हैं वो किसके साथ है. क्योंकि वो रिप्रेजेंट करते हैं कितनी मेंबरशिप है. तभी यह ऐसा हो सकता है और हमने हाल ही में महाराष्ट्र के केस में दोनों पॉलिटिकल पार्टीज के केस में इलेक्शन कमीशन का फैसला देखा भी है. क्योंकि संगठन और विधायिका दोनों के मर्जर के बाद इलेक्शन कमिशन ने जो निर्णय लिया था।  अश्विनी दुबे ने बताया कि अयोग्यता केवल लोकसभा, राज्य सभा और विधानसभा सदस्यों का कहा सकता है. लेकिन संगठन के लोगों का डिसक्वालीफिकेशन नहीं हो सकता है. दूसरी पार्टी की मान्यता तब मिलेगी जब उसमें भी दो तिहाई सदस्य जो पार्टी के सदस्य हैं वो वो तैयार हो जाएं करें।  उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में शिवसेना की टूट और एनसीपी की टूट सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कह दिया था कि सिर्फ अगर विधायक चाहे और सांसद चाहें तो वो अपने हिसाब से पार्टी को ले जाकर मर्ज नहीं कर सकते. अलग पार्टी नहीं बना सकते तो वो विलय भी नहीं कर सकते।  कहा कि चाहे लोकसभा हो, चाहे राज्यसभा हो, चाहे विधानसभा हो, इनसाइड द हाउस तो बागी गुट अपना नेता चुन सकता है अपने फैसले ले सकता है, लेकिन पार्टी का वो रिप्रेजेंटेटिव नहीं माना जाएगा. ये नहीं माना जाएगा कि बाहर भी वो पार्टी का रिप्रेजेंटेटिव है. लेकिन जैसे लोकसभा के अंदर विधानसभा के अंदर जो तो तिहाई बहुमत वो बहुमत अगर पार्टी जो मूल पार्टी है मूल पार्टी पर दावा करते हैं कि हम ही यहां विधानसभा या लोकसभा में रिप्रेजेंट करते हैं. कहेंगे कि ये हमारे चुनाव में जीते हुए लोगों के नंबर हैं, तो वहां उनकी वैद्यता मानी जाएगी. लेकिन बाहर संगठन में वो रिप्रेजेंट नहीं कर सकते. संगठन के रिप्रेजेंटेशन के लिए संगठनिक विलय और संगठनिक विलय के लिए ऑर्गेनाइजेशनल मर्जर के लिए वह जो सदस्यों की संख्या है वो इंश्योर करना जरूरी है रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट के मुताबिक तो अंदर वो कर सकते हैं बाहर नहीं और यही सुप्रीम कोर्ट में अभी मामला पेंडिंग है।  . कहां से शुरू हुई टीएमसी और कांग्रेस के विलय की खबरें बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के महज 80 सीटों पर सिमटने के बाद पार्टी में भगदड़ मच गई है. ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में 58 विधायकों ने बागी गुट बना लिया और पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपनी अलग मान्यता प्राप्त कर ली है. उनका दावा है कि उनके बागी गुट में अब तक तृणमूल कांग्रेस 65 विधायक आ चुके हैं. लोकसभा में काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में 20 सांसदों की सूची स्पीकर ओम बिरला को सौंपे जाने का दावा किया गया है. दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के इन बागी सांसदों ने एनडीए सरकार का सपोर्ट करने की बात कही है. उधर, राज्य सभा में अब तक टीएमसी के तीन सांसदों सुखेंदु शेखर राय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बराइक अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं।  इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच विपक्षी दलों के संगठन इंडिया ब्लॉक की बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुंची ममता बनर्जी ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात कीं. इसके अलावा टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की, जिसके बाद खबरें उड़ने लगी कि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होने जा रहा है. हालांकि करीब 24 घंटे बाद कांग्रेस की तरफ से जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने ऐसे किसी विलय से इनकार कर दिया है।   

TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह! कल्याण बनर्जी के अल्टीमेटम से ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ीं

कोलकाता पश्चिम बंगाल की सत्ता का 15 साल तक सिरमौर रहीं ममता बनर्जी और उनकी अगुवाई वाली पार्टी तृणमूल कांग्रेस मुश्किल में हैं. एक के बाद एक नेता टीएमसी से किनारा कर रहे हैं. 60 से ज्यादा विधायक बागी हो गए हैं. दिल्ली में लोकसभा सदस्यों ने भी पार्टी में बगावत का बिगुल फूंक दिया है. वहीं, ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका अब कल्याण बनर्जी का ताजा रुख है।  ममता बनर्जी ने जिन कल्याण बनर्जी को चीफ व्हिप बनाने के लिए 40 साल पुरानी सहयोगी काकोली घोष को पद से हटा दिया, अब वही कल्याण बनर्जी भी बगावत का झंडा बुलंद करते दिख रहे हैं. कल्याण बनर्जी ने टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी को यह अल्टीमेटम दे दिया है कि या तो वह अभिषेक को चुन लें, या फिर मेरे जैसे वफादारों को।  कल्याण बनर्जी ने कहा है कि ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी को हटाएं. नहीं तो हम पार्टी में नहीं रह सकते. उन्होंने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ फर्जी हस्ताक्षर केस से भी खुद को अलग करने का ऐलान किया और कहा कि अभिषेक बनर्जी ने कभी भी मुझपर भरोसा नहीं किया और आगे भी नहीं करेंगे. कल्याण बनर्जी ने कहा कि हम कल अभिषेक के केस के लिए तैयारी कर रहे थे और आधी रात मुझे बताया गया कि वकील बदल दिया गया है।  उन्होंने कहा कि यह बहुत ही अपमानजनक है. अभिषेक बनर्जी को वरिष्ठों का सम्मान करना नहीं आता. कल्याण बनर्जी ने अभिषेक को घमंडी व्यक्ति बताया और तल्ख लहजे में कहा कि वह हैं कौन? अभिषेक बनर्जी की वजह से पार्टी को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि मैं ममता बनर्जी के साथ हूं. लेकिन दीदी को अब फैसला करना होगा कि उनको पार्टी और वफादार नेता चाहिए या बच्चा और परिवार।  कल्याण का बागी रुख ताबूत में आखिरी कील? कल्याण बनर्जी की गिनती ममता बनर्जी के विश्वस्त नेताओं में होती है. पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद कल्याण बनर्जी कई अहम मामलों में कोर्ट के भीतर भी टीएमसी से जुड़े मामलों की पैरवी करते नजर आए हैं. फर्जी हस्ताक्षर से संबंधित जिस केस में अभिषेक बनर्जी भी आरोपी हैं, उस मामले में भी कल्याण बनर्जी ही वकील थे. कल्याण बनर्जी के बागी रुख को टीएमसी के ताबूत में आखिरी कील की तरह देखा जा रहा है।  बिछड़ रहे सब बारी-बारी ममता बनर्जी और उनकी पार्टी से सांसद-विधायक और नेता बारी-बारी बिछड़ रहे हैं. कल्याण बनर्जी के बागी रुख अख्तियार करने से कुछ घंटे पहले ही ममता बनर्जी को दो बड़े झटके लगे. पहले प्रकाश चिक बराइक ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. वहीं, कल तक ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आए प्रसून बनर्जी भी बागी काकोली गुट के साथ हो लिए. काकोली गुट को लोकसभा में अलग गुट के तौर पर मान्यता देने की मांग वाले पत्र पर प्रसून बनर्जी ने हस्ताक्षर भी कर दिए हैं।   

बंगाल की राजनीति में हलचल: TMC सांसद प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे से मचा सियासी भूचाल

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और पार्टी में भगदड़ मची हुई है. पार्टी के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने आज राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है।   प्रकाश चिक बराइक से पहले टीएमसी के दो और कद्दावर राज्यसभा सांसद- सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव भी संसद के उच्च सदन से इस्तीफा दे चुके हैं. एक के बाद एक हुए इन तीन बड़े इस्तीफों के बाद राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस की ताकत काफी कम हो गई है. आज बराइक के इस्तीफे के बाद अब उच्च सदन में टीएमसी के सांसदों की संख्या घटकर केवल 10 रह गई है।  आने वाले दिनों में और बढ़ सकती हैं मुश्किलें सूत्रों और राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं के अनुसार, टीएमसी के भीतर यह असंतोष यहीं थमने वाला नहीं है. कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले एक हफ्ते के भीतर टीएमसी के तीन और राज्यसभा सांसद अपने पदों से इस्तीफा दे सकते हैं।  अगर ये अटकलें सच साबित होती हैं, तो संसद में ममता बनर्जी की पार्टी का ग्राफ और नीचे गिर जाएगा.फिलहाल इन इस्तीफों के पीछे के स्पष्ट कारणों का खुलासा नहीं हो पाया है, लेकिन विपक्षी दल इसे टीएमसी के भीतर बढ़ती कलह और असंतोष के रूप में देख रहे हैं।  आ गई TMC के बागी सांसदों की लिस्ट! कुछ नाम तो चौंका देंगे अब तक कयास लगाए जा रहे थे क‍ि ममता का साथ क‍ितने सांसद छोड़ने वाले हैं. कोई 10 कह रहा था तो कोई 20… लेकिन अब 19 सांसदों की ल‍िस्‍ट सामने आ गई है. इसमें काकोली घोष दस्‍तीदार के साथ यूसुफ पठान, शत्रुघ्न सिन्हा समेत कई चौंकाने वाले नाम हैं. गौर करने वाली बात है क‍ि इसमें सयानी घोष जैसे कई नाम भी हैं, ज‍िनकी अटकलें लगाई जा रही थीं।  1. यूसुफ पठान (बहरामपुर) क्रिकेटर से नेता बने यूसुफ पठान ने कांग्रेस के गढ़ बहरामपुर में अधीर रंजन चौधरी को हराकर बड़ा उलटफेर किया था. लेकिन राजनीति की पिच पर यूसुफ को दीदी के लोकल नेताओं से वैसी मदद नहीं मिल रही थी, जैसी उम्मीद थी. बहरामपुर के स्थानीय संगठन से उनकी दूरी अब खुलकर सामने आ रही है।  2. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया (कूचबिहार) कूचबिहार की सीट हमेशा से उत्तर बंगाल की राजनीति का केंद्र रही है. जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया यहां टीएमसी के मजबूत राजबंशी चेहरा माने जाते हैं. लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और स्थानीय गुटबाजी के कारण उनके सुर बदले हुए नजर आ रहे हैं. क्षेत्र में अपनी पकड़ के बावजूद संगठन से अनबन की खबरें हैं।  3. खलीलुर रहमान (जंगीपुर) मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर से आने वाले खलीलुर रहमान बीड़ी कारोबारी से राजनेता बने हैं. मुस्लिम बहुल इस इलाके में उनका अच्छा-खासा प्रभाव है. हालांकि, केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में आने और स्थानीय लीडरशिप से तालमेल की कमी के चलते उनके टीएमसी से दूर जाने की चर्चाएं तेज हैं।  4. अबू ताहेर खान (मुर्शिदाबाद) मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता अबू ताहेर खान का इस लिस्ट में होना चौंकाता है. कांग्रेस से टीएमसी में आए अबू ताहेर का क्षेत्र में मजबूत जनाधार है. पिछले कुछ समय से जिला स्तर पर हो रही उपेक्षा और नए नेताओं को तरजीह दिए जाने से वह काफी नाराज बताए जा रहे हैं।  5. पार्थ भौमिक (बैरकपुर) बैरकपुर जैसी हाई-प्रोफाइल और हिंसा प्रभावित सीट से जीतने वाले पार्थ भौमिक ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे. लेकिन अर्जुन सिंह के साथ चलने वाली अंदरूनी खींचतान और पार्टी के भीतर गुटीय समीकरणों के बदलने से पार्थ भौमिक का मोहभंग होता दिख रहा है, जिससे बगावती सुर उठे हैं।  6. काकोली घोष दस्तीदार (बारासात) डॉ. काकोली घोष दस्तीदार टीएमसी की बेहद सीनियर और तेजतर्रार नेता हैं. संसद में अपनी बात मजबूती से रखने वाली काकोली के बारे में कहा जा रहा है कि वह पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव और युवा ब्रिगेड के फैसलों से असहज महसूस कर रही हैं, जिससे दूरियां बढ़ी हैं।  7. बापी हलदार (मथुरापुर) मथुरापुर (SC) सीट से चुनकर आए बापी हलदार जमीनी स्तर के नेता हैं. दक्षिण 24 परगना के सुंदरबन इलाके में उनकी मजबूत पकड़ है. स्थानीय पंचायत चुनावों और विकास कार्यों के फंड को लेकर जिला नेतृत्व के साथ उनकी अनबन अब बगावत के मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है।  8. सायोनी घोष (जादवपुर) टीएमसी की युवा विंग की अध्यक्ष रहीं सायोनी घोष हमेशा से ममता बनर्जी की फेवरेट रही हैं. जादवपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट से जीतकर संसद पहुंचने वाली सायोनी की बगावत की खबरें हैरान करने वाली हैं. बताया जा रहा है कि संगठनात्मक फेरबदल और कुछ आंतरिक फैसलों से वह खुश नहीं हैं।  9. माला रॉय (कोलकाता दक्षिण) कोलकाता दक्षिण सीट खुद ममता बनर्जी का पुराना गढ़ रही है, जहां से माला रॉय सांसद हैं. माला रॉय का नाम इस लिस्ट में आना टीएमसी के लिए सबसे बड़ा झटका है. कोलकाता नगर निगम और सांसद फंड के इस्तेमाल को लेकर पार्टी आलाकमान से उनके मतभेद गहरे हो चुके हैं।  10. मिताली बाग (आरामबाग) आरामबाग की बेहद करीबी मुकाबले वाली सीट से जीत दर्ज करने वाली मिताली बाग एक साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं. लेकिन सांसद बनने के बाद स्थानीय स्तर पर पार्टी के पुराने क्षत्रपों ने उन्हें काम नहीं करने दिया. इसी आंतरिक कलह और उपेक्षा के कारण मिताली ने अपने रास्ते अलग करने का मन बनाया है।  11. देव अधिकारी (घाटाल) बांग्ला सिनेमा के सुपरस्टार दीपक अधिकारी उर्फ देव के बागी तेवर नए नहीं हैं. वह पहले भी राजनीति छोड़ने की इच्छा जता चुके थे. ममता के मनाने पर वह माने तो थे, लेकिन घाटाल के स्थानीय टीएमसी नेताओं के भ्रष्टाचार और दखलअंदाजी से तंग आकर अब वह आर-पार के मूड में हैं।  12. कालीपद सोरेन (झाड़ग्राम) आदिवासी बहुल झाड़ग्राम सीट से सांसद कालीपद सोरेन संथाली साहित्यकार और प्रतिष्ठित चेहरा हैं. टीएमसी ने इन्हें आदिवासी कार्ड के तौर पर उतारा था. लेकिन क्षेत्र में आदिवासियों की बुनियादी समस्याओं पर पार्टी के ढुलमुल रवैए और वादों से मुकरने के कारण कालीपद सोरेन ने बगावती रुख अख्तियार कर लिया है।  13. जून मालिया (मेदिनीपुर) मेदिनीपुर से सांसद और मशहूर अभिनेत्री जून मालिया को टीएमसी का ग्लैमरस लेकिन गंभीर चेहरा … Read more

विपक्षी दलों में बढ़ती खींचतान का BJP को फायदा? जानिए परिसीमन बिल पर क्या बन रहे समीकरण

 नई दिल्ली केंद्र की बीजेपी सरकार को विधानसभा चुनावों के बीच बड़े जोर का झटका लगा था. लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल गिर गया था. कांग्रेस के विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण राहुल गांधी भले ही क्रेडिट लें, लेकिन असल बात तो यह है कि तब तमिलनाडु में डीएमके और पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका थी।  तृणमूल कांग्रेस और डीएमके के नए सिरे से जिक्र की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि दोनों ही दल अपने अपने राज्यों में सत्ता से बेदखल हो गए हैं. और, बेदखल ही नहीं हुए हैं. विधायकों के बाद टीएमसी के सांसद भी बगावत पर उतर आए हैं, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मॉनसून सत्र में मिल सकता है।  रिपोर्ट के मुताबिक, बीजेपी मॉनसून सत्र में फिर से महिला आरक्षण संशोधन बिल और परिसीमन विधेयक संसद में पेश कर सकती है – सवाल यह है कि बदले राजनीतिक हालात में दोनों विधेयकों के पास होने की कितनी संभावना है।  मॉनसून सेशन में महिला आरक्षण – परिसीमन बिल की संभावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीते 12 साल के कार्यकाल में पहला मौका था जब केंद्र सरकार की तरफ से पेश कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन में गिरा हो. संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए कानून में संशोधन और परिसीमन विधेयक के समर्थन में 298 मत पड़े, जबकि बिलों के विरोध में 230 मत पड़े थे. दरअसल, महिला आरक्षण लागू करने के लिए लोकसभा क्षेत्रों की संख्या फिर से निर्धारित करने के मकसद से लाया गया परिसीमन विधेयक भी महिला आरक्षण संशोधन के साथ जुड़ा हुआ था।  बीजेपी वैसे तो विधानसभा चुनावों के बीच मिले जोरदार झटके की पूरी तरह भरपाई कर चुकी है, लेकिन नेतृत्व को मिशन तब तक अधूरा लग रहा होगा, जब तक कि दोनों विधेयक संसद से पास नहीं हो जाते – और यही वजह है कि बीजेपी सरकार मॉनसून सत्र में फिर से दोनों बिल लाने और उन्हें पास कराने के लिए प्रयासरत है।  पश्चिम बंगाल की चुनावी जीत का तो बीजेपी को लंबे समय से इंतजार था. कई बार के गंभीर प्रयासों के बाद जीत संभव भी हो पाई. तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के साथ भले ही थलपति विजय की सरकार बन गई हो, लेकिन डीएमके की हार तो बीजेपी को सुकून देने वाली ही है. AIADMK अगर सत्ता में लौट पाती तो गठबंधन पार्टनर बीजेपी के लिए और अच्छी बात होती. डीएमके ने तो संसद में बिल गिर जाने को वोटिंग से पहले ही जीत की तरह जश्न मनाया था, और चुनाव कैंपेन की स्ट्रैटेजी तक बदल डाली थी।  तृणमूल कांग्रेस में जो तबाही का दौर शुरू हुआ, चल ही रहा है. डीएमके नेतृ्त्व भी सशंकित है. वैसे भी आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के छोड़कर चले जाने के बाद तो विपक्षी खेमे के शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा जो डरा हुआ न हो. खबर है कि बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों से नए सिरे से संपर्क किया है. और, इस मामले में डीएमके की तरफ से भी नरम रुख अपनाए जाने की बात सामने आई है. वैसे भी गठबंधन तोड़कर कांग्रेस के मुख्यमंत्री विजय की टीवीके के साथ चले जाने के बाद डीएमके नए रास्ते और समीकरण तलाशने के लिए आजाद भी हो गई है. सुनने में आया है कि डीएमके केंद्र सरकार के बिल के नए ड्राफ्ट और लिखित प्रस्ताव का इंतजार कर रही है. अचानक डीएमके के लिए पलटना तो संभव भी नहीं होगा, लेकिन बीच का रास्ता तो निकाला ही जा सकता है।  राज्यसभा चुनाव से कितना फर्क पड़ेगा देश के 10 राज्यों में राज्यसभा की 24 सीटों के लिए 18 जून को चुनाव होने जा रहे हैं. और, इनमें से 10 सीटों पर पहले से ही बीजेपी की जीत पक्की मानी जा रही थी. अब इसमें मध्य प्रदेश से एक सीट और भी जुड़ रही है. मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद मध्य प्रदेश से बीजेपी को राज्यसभा की 3 सीटें मिलना पक्का माना जाने लगा है. गुजरात से राज्यसभा की चारों सीटें बीजेपी को मिलना पक्का है. राजस्थान से 2 सीटें मिल सकती हैं. मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश से 1-1 सीटें मिलने वाली हैं. झारखंड में नंबर कम होने के कारण बीजेपी नेता बाबूलाल मरांडी ने निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा कर रखी है।  राज्यसभा में बीजेपी के पास 113 सांसद हैं. और, पूरे एनडीए की बात करें तो ये नंबर 148 है. फिर भी दो तिहाई बहुमत के लिए 15 सीटें कम पड़ रही हैं. राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत के लिए 163 सांसदों की जरूरत पड़ती है. मुद्दे की बात यह है कि टीएमसी के दो सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है, फिर तो बहुमत का आंकड़ा भी घट जाएगा. टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के बाद सुष्मिता देव ने भी इस्तीफा दे दिया है. सुष्मिता देव ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से मुलाकात भी की है, जिससे आगे का प्लान स्पष्ट हो गया है।  लोकसभा में बदल रहा नंबर गेम बदले माहौल में लोकसभा में नंबर गेम भी बदल रहा है. तृणमूल कांग्रेस के सांसदों की बगावत के बाद तो पक्का ही हो गया है. टीएमसी के बागी सांसदों ने काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में स्पीकर को अलग बैठने और अलग गुट के रूप में मान्यता देने के लिए पत्र भी दे दिया है।  काकोली घोष दस्तीदार को नेता मानने वाले ऐसे ही 19 सांसदों की लिस्ट सामने आई है, जिनमें यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा  के साथ सयानी घोष का नाम भी शामिल है. जिस तरह से काकोली घोष प्रशासनिक मीटिंग में इलाके के विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ शामिल हुई थीं, इरादे तभी साफ हो गए थे।  अब अगर डीएमके सपोर्ट के लिए तैयार हो जाए, और टीएमसी के बागी सांसदों का साथ हो जाए तो बीजेपी के लिए दोनों बिल पास कराना आसान हो जाएगा. अगर कुछ कम पड़ा तो उसे भी मैनेज करने की कोशिश हो ही सकती है। 

लोकसभा में अलग ब्लॉक की मांग, TMC में 20 सांसद बागी गुट में शामिल

पश्चिम बंगाल TMC लोकसभा सांसद प्रसून बनर्जी पार्टी के बागी 'काकोली ग्रुप' में शामिल हो गए हैं. उन्होंने संसद में एक अलग ब्लॉक बनाने की मांग वाले पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. उनके इस कदम से तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल में विभाजन का संकट और गहरा गया है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) में चल रही बगावत रूकने का नाम नहीं ले रही है. बुधवार तक जो लोकसभा सांसद प्रसून बनर्जी ममता के साथ खड़े थे उन्होंने अब पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावती रुख अपनाते हुए बागी सांसदों के 'काकोली ग्रुप' का दामन थाम लिया है. प्रसून बनर्जी ने संसद में एक अलग गुट बनाने की मांग करने वाले पत्र पर अपने हस्ताक्षर (साइन) भी कर दिए हैं. टीएमसी के भीतर का बागी गुट लोकसभा में खुद को एक अलग ब्लॉक के रूप में मान्यता दिलाने की कोशिशों में जुटा है. इस गुट में अभी तक प्रसून को मिलाकर 20 लोकसभा सांसद शामिल हो चुके हैं. वहीं अब ममता के खेमे में 8 सांसद बचे हैं. बागी गुट अपने कुनबे को बढ़ाने के लिए लगातार सांसदों का समर्थन जुटा रहा है. प्रसून बनर्जी हावड़ा से लगातार तीसरी बार सांसद चुने गए हैं और खेल जगत के साथ-साथ राजनीति में भी उनका बड़ा कद है. TMC के बागी सांसदों की लिस्ट आई सामने! शत्रुघ्न सिन्हा और यूसुफ पठान का भी नाम इससे पहले राज्यसभा से कई सांसदों के इस्तीफे और कुछ अन्य सांसदों के बागी गुट के संपर्क में होने की खबरें आई थीं. हालांकि, कुछ सांसदों ने इन खबरों का खंडन भी किया था, लेकिन प्रसून बनर्जी के इस कदम ने बागी गुट के दावों को मजबूत कर दिया है. 

ममता को एक और बड़ा झटका? देर रात बागी नेताओं ने शुभेंदु से की मुलाकात, सायोनी घोष की मौजूदगी से बढ़ी चर्चा

नई दिल्‍ली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस तिनका-तिनका होती नजर आ रही है. विधायकों के एक बड़े ग्रुप के ऋतब्रत बनर्जी के साथ जाने के बाद अब टीएमसी लोकसभा सांसदों का एक ग्रुप भी ममता बनर्जी का साथ छोड़ने जा रहा है, जल्‍द ही इसका ऐलान हो सकता है. बीती रात टीएमसी सांसद प्रतिमा मंडल, माला रॉय, मिताली बाग और सायोनी घोष केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पहुंचे. इस बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्‍यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी पहुंचे, जिससे नई अटकलों का दौर शुरू हो गया है. क्‍या टीएमसी के बागी लोकसभा सदस्‍य बीजेपी का हाथ थामने जा रहे हैं? भूपेंद्र यादव के घर एक घंटा चली बागी TMC सांसदों की बैठक  भूपेंद्र यादव के घर मुख्‍यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ हुई बागी टीएमसी सांसदों की बैठक में क्‍या बात हुई, ये तो सामने नहीं आई है. लेकिन इतने जरूर संकेत मिल रहे हैं कि टीएमसी बिखर रही है और जल्‍द ही कोई बड़ा ऐलान हो सकता है. बताया जा रहा है कि सायोनी घोष समेत 4 से 5 टीएमसी सांसद इस बैठक में शामिल हुए. ये बैठक लगभग एक घंटे तक चली. हैरानी की बात ये रही कि इस बैठक में टीएमसी के बागी लोकसभा सांसदों का नेतृत्‍व करने का दावा कर रहीं काकोली घोष इस बैठक में नहीं पहुंचीं. सूत्रों की मानें तो अब टीएमसी के बागी ग्रुप में ज्‍यादा से ज्‍यादा समर्थन जुटाने पर जोर है. टीएमसी के कुल 28 लोकसभा सांसदों में से 19 बागी हो गए हैं।  बागियों में शत्रुघ्‍न सिन्‍हा और यूसुफ पठान का भी नाम!   सूत्रों की मानें तो आने वाले दिनों में बीजेपी संग टीएमसी नेताओं की और भी बैठकें हो सकती हैं. बता दें कि बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को हस्ताक्षर करके एक पत्र भी सौंपा है, जिसमें 19 सांसदों के नाम हैं. इन नामों में शत्रुघ्‍न सिन्‍हा और यूसुफ पठान का भी नाम है. काकोली घोष इस बागी सांसदों के ग्रुप का नेतृत्‍व कर रही हैं. हालांकि, तृणमूल कांग्रेस की ओर से ऐसी कोई लिस्‍ट जारी नहीं की गई है, जिसमें ये कहा गया हो कि उनकी पार्टी के सांसद बागी हो रहे हैं।  ममता बनर्जी ने 1 जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की. उन्होंने देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व पर पश्चिम बंगाल में तत्कालीन सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ आंदोलन संगठित करने में अनिच्छा का आरोप लगाया था।  क्‍या TMC का कांग्रेस में होने जा रहा विलय? ममता बनर्जी की दिल्ली में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से हुई मुलाकात के बाद दोनों पार्टियों के संभावित गठजोड़ को लेकर चर्चा तेज हो गई हैं. इसी बीच टीएमसी के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने इन चर्चाओं पर तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि अभी हमारे पास 64 विधायक है और आगे ये संख्या बढ़ेगी, लेकिन कोई भी कांग्रेस में शामिल होने वाले नहीं है. ममता बनर्जी की कांग्रेस नेता सोनिया गांधी से हुई बैठक और बुधवार को नई दिल्ली में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से अभिषेक बनर्जी की अलग से हुई बैठक के बाद टीएमसी के कांग्रेस में पुनर्विलय की अटकलों को बल मिला. ममता बनर्जी के कोलकाता लौटने के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर इंतजार कर रहे मीडियाकर्मियों ने उनसे तृणमूल कांग्रेस के कांग्रेस में पुनर्विलय की संभावना के बारे में पूछा. हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री बिना कुछ कहे जल्दी से अपनी गाड़ी में बैठकर वहां से चली गईं। 

एक-एक कर छूटते गए साथी, क्या ममता बनर्जी की पकड़ TMC पर कमजोर पड़ गई है?

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने के बाद से ममता बनर्जी का सियासी संकट खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. टीएमसी विधायक से लेकर सांसद तक एक-एक कर ममता बनर्जी का साथ छोड़ते जा रहे हैं. अब हालत यह हो गई है कि सयानी घोष से लेकर युसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे बड़े सितारे भी बागी खेमे के साथ खड़े हो गए हैं।  15 साल तक बंगाल में एकछत्र राज करने के बाद सत्ता हाथ से निकलते ही टीएमसी में असंतोष फूट पड़ा है. टीएमसी में तमाम बड़े सिपहसलार अलग राह पर चल पड़े हैं, जिससे ममता बनर्जी के हाथों से पार्टी निकलती जा रही है।      टीएमसी के 19 बागी सांसदों के नाम सामने आ गए हैं, जो काकोली घोष दस्तीदार के अगुवाई में अलग गुट बनाने का फैसला किया है. इस फेहरिश्त में उन सभी नेताओं के नाम है, जिन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि बंगाल में ममता के पास कितनी ताकत बची है?  TMC के बड़े सितारे छोड़ गए ममता का साथ बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी ने एक जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था. इसके बाद 13 साल तक ममता बनर्जी संघर्ष कर साढे तीन दशक से सत्ता पर काबिज लेफ्ट को उखाड़ फेका था. ममता के इस सियासी संघर्ष के रहे तमाम टीएमसी नेता धीरे-धीरे साथ छोड़ गए. अभिषेक बनर्जी और ममता बनर्जी ने कई नए चेहरों को सियासत में लाए और सियासी पहचान दी, लेकिन सत्ता बदलते ही उनके मोहभग हो गए।  काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई वाले बागी गुट में शत्रुघ्न सिन्हा, जगदीश चंद्र बसुनिया, खलीउर रहमान, यूसुफ पठान, अबू ताहिर खान, पार्थ मौमिक, बापी हलधर, सायोनी घोष, माला रॉय, मिताली बाग, दीपक अधिकारी, कालीपद सोरेन, जून मालिया, अरूप चक्रवर्ती, शर्मिला सरकार, असित कुमार मल्ल, शताब्दी रॉय और रचना बनर्जी शामिल है. ये ऐसे नाम है, जिनकी राजनीतिक को ममता बनर्जी ने सियासी पहचान दी, लेकिन अब बीजेपी खेमे के साथ खड़े होने के लिए बेताब है।  ममता बनर्जी के पास कितने सांसद बचे 2024 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी ने राज्य की कुल 42 लोकसभा सीटों में 29 पर जीत हासिल की थी. बीजेपी 12 और कांग्रेस को एक सीट मिली थी, चुनावों के बाद टीएमसी के बशीरहाट से ससद हाजी नुरुल इस्लाम की मौत हो गई थी. टीएमसी के पास 28 लोकसभा सांसद है, जिसमें से 19 सांसद बागी हो गई है. इसके बाद ममता बनर्जी के साथ सिर्फ 9 लोकसभा सांसद ही बचे हैं।  ममता बनर्जी के पास बचे टीएमसी लोकसभा सांसदों में फिलहाल कीर्ति आजाद, अभिषेक बनर्जी, सौगात राय, प्रसून बनर्जी, प्रतिमा मोंडल, सुदीप बंधोपाध्याय, महुआ मोइत्रा, कल्याण बनर्जी और सजदा अहमद हैं।  टीएमसी के 13 राज्यसभा सांसद हैं, जिसमें  दो सांसदों ने इस्तीफा दिया है. सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव ने राज्यसभा सदस्यता के साथ-साथ टीएमसी से भी इस्तीफा दे दिया है. इन दोनों के अब बीजेपी से राज्यसभा जाने की चर्चा. इस तरह 11 राज्यसभा सांसद बच रहे हैं, लेकिन उनसे में से भी कितने सांसद ममता के साथ रहेंगे, ये कहना मुश्किल है।  ममता बनर्जी के पास कितने विधायक बचे पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव चुनाव में टीएमसी के टिकट पर 80 विधायक जीतकर आए, जिसमें से ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को ममता बनर्जी ने बाहर कर दिया था. इसके बाद  टीएमसी के 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया और अगुवाई ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया. टीएमसी के कुछ अन्य विधायकों ने भी साथ छोड़ा है।  ऋतब्रत बनर्जी का दावा है कि अब उनके पास 64 विधायकों का समर्थन है और एक विधायक के हमारे साथ जुड़ने के बाद संख्या 65 हो जाएगी. इस तरह 80 में से 65 विधायक अब ममता बनर्जी से अलग होकर अपना अलग गुट बना लिया है और  ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता मान लिया है. टीएमसी के 65 विधायकों के बागी होने के बाद ममता बनर्जी के साथ सिर्फ 15  विधायक ही बच रहे हैं. इसके अलावा बंगाल के तमाम बड़े शहरों के मेयर अपना इस्तीफा दे दिए हैं। 

क्या केंद्र की राजनीति में होगा बड़ा उलटफेर? राघव चड्ढा को लेकर चर्चाएं तेज, दो मंत्री हो सकते हैं बाहर

 नई दिल्ली राज्यसभा चुनाव परिणाम से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैबिनेट में फेरबदल की अटकलों ने जोर पकड़ लिया है। हालांकि, अब तक NDA यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है। कहा जा रहा है कि इस दौरान टीम मोदी से कई मंत्री बाहर जा सकते हैं और संगठन में पद संभाल सकते हैं। वहीं, चुनावी राज्यों को ध्यान में रखते हुए नए चेहरों की भी एंट्री हो सकती है। राघव चड्ढा के नाम की अटकलें पंजाब में भारतीय जनता पार्टी खासी सक्रिय नजर आ रही है। इसके साथ ही अटकलें लगाई जा रहीं हैं कि कैबिनेट में पंजाब के चेहरों को शामिल किया जा सकता है। भाजपा ने मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट से महासचिव तरुण चुघ को मैदान में उतारा है। उनके अलावा पूर्व कांग्रेस नेता और राज्य में भाजपा की कमान संभाल चुके सुनील जाखड़ के नाम की भी अटकलें हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आम आदमी पार्टी से आए राघव चड्ढा को भी कैबिनेट में मौका दिया जा सकता है। हालांकि, इसे लेकर चड्ढा या पार्टी नेता की ओर से आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। दरअसल, पंजाब से आने वाले नेता रवनीत सिंह बिट्टू को इस बार भाजपा ने राज्यसभा उम्मीदवार नहीं बनाया है। ऐसे में पंजाब के कई नए चेहरों के मंत्री परिषद में आने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। 2 मंत्रियों का कट सकता है टिकट  रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि 2 मंत्री बाहर किए जा सकते हैं। हालांकि, अब तक साफ नहीं है कि इनमें किन नेताओं नाम शामिल है और इसे लेकर आधिकारिक रूप से भी कुछ नहीं बताया गया है। खास बात है कि भाजपा ने राज्यसभा चुनाव के लिए दो केंद्रीय मंत्रियों को टिकट नहीं दिया है। इनमें बिट्टू के अलावा जॉर्ज कुरियन का नाम भी शामिल है। दक्षिण भारतीय राज्य की किसे मिलेगी कमान रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि कैबिनेट फेरबदल में 10 से 12 मंत्री शामिल या बदले जा सकते हैं। कई मंत्रियों के विभाग बदले जाने की भी अटकलें हैं। इसके अलावा कहा जा रहा है कि भाजपा किसी कैबिनेट मंत्री को कर्नाटक इकाई का प्रमुख भी बना सकती है। हालांकि, नाम अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है। फिलहाल, पार्टी के कर्नाटक प्रमुख बीवाई विजयेंद्र हैं। याचिका समिति के अध्यक्ष हैं राघव चड्डा मई में चड्ढा को उच्च सदन की याचिका समिति का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। तब राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन की तरफ से समिति को दोबारा बनाया गया था और 10 सदस्यों को नामित किया था। समिति में चड्ढा के अलावा हर्ष महाजन, गुलाम अली, शंभू शरण पटेल, मयंक कुमार नायक, मस्तान राव यादव बीडा, जेबी माथेर हिशाम, सुभाशीष खुंटिया, रवंगवरा नारजारी और संदोष कुमार पी अन्य सदस्य हैं।

कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान आई सामने, मीनाक्षी नटराजन का खेल बिगड़ने के पीछे किसका हाथ?

भोपाल  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने राज्यसभा चुनाव में 'सीट चोरी' के आरोपों को नकारते हुए बुधवार को दावा किया कि कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का 'खेल बिगाड़ने' का काम उन्हीं की पार्टी के नेताओं ने किया, क्योंकि उनमें से कई की नजर उस सीट पर थी। राज्यसभा की तीन सीटों पर हो रहे चुनाव में मंगलवार को उस समय नाटकीय मोड़ आ गया, जब शपथपत्र में जानकारी छुपाने के आरोप में नटराजन का नामांकन रद्द कर दिया गया। अधूरा हलफनामा राज्यसभा के निर्वाचन अधिकारी अरविंद शर्मा की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि उपलब्ध दस्तावेजों की जांच के बाद पाया गया कि नटराजन ने नामांकन के साथ जमा किए गए फॉर्म 26 में अदालत की शिकायत का जिक्र नहीं करते हुए अधूरा हलफनामा दाखिल किया था। भाजपा उम्मीदवार ने की थी शिकायत मध्यप्रदेश विधानसभा के एक अधिकारी के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार महेश केवट ने निर्वाचन अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि नटराजन ने अपने हलफनामे में तेलंगाना में उनके खिलाफ दर्ज मामले का उल्लेख नहीं किया है। कांग्रेस ने लगाए सीट चोरी के आरोप कांग्रेस ने इसे लोकतंत्र की हत्या करार देते हुए आरोप लगाया कि यह अब 'वोट चोरी' का मामला नहीं रहा, बल्कि 'सीट चोरी' का मामला बन गया है। साथ ही पार्टी ने इस प्रकरण को अदालत में चुनौती देने का भी फैसला किया है। सीएम मोहन यादव के आरोप मुख्यमंत्री यादव ने इस संबंध में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि कांग्रेस ने 'जानबूझकर' और 'षडयंत्रपूर्वक' नटराजन के फॉर्म में गलतियां कीं। उन्होंने दावा किया, 'इस सीट पर कई सारे कांग्रेसियों की नजर थी। जब सीट नहीं मिली तो नटराजन का खेल बिगाड़ने का काम कांग्रेसियों ने ही कर दिया।' यादव ने कहा कि पंच और सरपंच के चुनाव तक में आपराधिक ब्योरा देना होता है और जब 10 से अधिक बार से चुनाव लड़ चुके लोग राज्यसभा जैसे प्रतिष्ठित चुनाव में ऐसी गलतियां करते हैं तो यह अनायास नहीं है। उन्होंने इसे जानबूझकर किया गया 'षडयंत्र' करार दिया। उन्होंने कहा कि अब कांग्रेस को 'आत्मावलोकन' करने की जरूरत है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे पहले लोकसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को उनके गढ़ छिंदवाड़ा में हराकर भाजपा ने नया रिकॉर्ड बनाया था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ठीक से अपने प्रत्याशी का फार्म नहीं भर सकती, विधायकों को एकजुट नहीं रख सकती और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के फैसलों को स्वीकार नहीं कर सकती तो इसमें भाजपा क्या कर सकती है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अपनी गलतियां देखनी चाहिए और प्रत्याशी घोषित करने से पहले कम से कम उसकी पृष्ठभूमि जांच लेनी चाहिए। इससे पहले, राज्य सरकार के मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने मंगलवार को दावा किया था नटराजन मामले में तेलंगाना के कांग्रेस नेताओं ने ही जरूरी दस्तावेज मुहैया कराए थे। EC से होगी मीनाक्षी के नॉमिनेशन खारिज की शिकायत मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज होने के बाद विवाद गहरा गया है। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस का 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल थोड़ी ही देर में दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात करेगा। प्रतिनिधिमंडल में केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, रणदीप सुरजेवाला, सचिन पायलट, भूपेश बघेल, दीपा दासमुंशी, विवेक तन्खा, मीनाक्षी नटराजन, मोहम्मद अली खान और उमर होडा शामिल हैं। मंगलवार को चुनाव अधिकारियों ने हलफनामे में अनियमितताएं पाए जाने के आधार पर मीनाक्षी नटराजन का नामांकन खारिज कर दिया था। जिसके बाद कांग्रेस नेताओं ने दिल्ली और भोपाल में चुनाव आयोग के दफ्तरों के बाहर धरना दिया था। भाजपा का आरोप था कि उन्होंने शपथ पत्र में हैदराबाद कोर्ट के एक लंबित मामले की जानकारी छिपाई। नटराजन का नामांकन खारिज होने को कांग्रेस ने "लोकतंत्र की हत्या" और "सीट चोरी" बताया।इधर, भोपाल में कांग्रेस के कार्यकर्ता बुधवार को मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (सीईओ) दफ्तर पहुंचे। गेट बंद मिलने पर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गणवेश दफ्तर के बाहर गेट पर टांग दी और लौट गए। कहां से मिले दस्तावेज नटराजन का नामांकन खारिज होने के बाद विजयवर्गीय ने संवाददाताओं से कहा, 'जहां तक हमें मिले दस्तावेजों का सवाल है, उन्हें हमें किसने दिया? आप समझ सकते हैं कि कांग्रेस किस राज्य में है? मुद्दा यह है कि हमें तेलंगाना से संबंधित दस्तावेज प्राप्त हो रहे हैं। एक ऐसा राज्य… जहां वे सत्ता में हैं। हमारे पास खुद कोई जानकारी नहीं थी। यह कांग्रेस के सदस्य होंगे जिन्होंने इसे हमें प्रदान किया होगा।' राज्य में राज्यसभा की तीन खाली सीटों में से सत्तारूढ़ भाजपा के लिए, दो सीटें जीतना तय था लेकिन नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद तीसरी सीट भी उसके खाते में जाती दिख रही है। भाजपा ने अपने महासचिव तरुण चुघ और राज्य इकाई के सचिव रजनीश अग्रवाल को मैदान में उतारा है और तीसरी सीट के लिए मध्य प्रदेश मछुआरा कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष केवट पर दांव लगाया है।