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बंगाल में महाराष्ट्र जैसा ‘खेला’ होने के संकेत? ऋतब्रत बनर्जी की भूमिका पर बढ़ी चर्चा

  कोलकाता पश्चिम बंगाल की सत्ता बदलते ही ममता बनर्जी के सामने सियासी संकट गहराता जा रहा है. चुनाव में मिली करारी हार के बाद एक-एक करके टीएमसी के पत्ते झड़ते जा रहे हैं. टीएमसी के एक के बाद एक नेता बागी तेवर अपनाता जा रहा है. ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. टीएमसी से निष्कासित विधायक रि ऋतब्रत बनर्जी क्या अब टीएमसी के 'एकनाथ शिंदे' साबित होंगे?  साल 2022 का महाराष्ट्र में जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना से बगावत कर उद्धव ठाकरे के हाथों से सरकार और सियासत दोनों ही छीन ली थी. अब ठीक वैसी ही सियासी स्क्रिप्ट अब पश्चिम बंगाल में लिखे जाने की सुगबुगाहट है. इसके केंद्र में टीएमसी से निष्कासित विधायक  ऋतब्रत बनर्जी हैं।   ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने बीती रात कोलकाता स्थित विधायक हॉस्टल में टीएमसी के कई विधायकों से मुलाकात की. टीएमसी के 80 विधायकों में से 60 विधायकों ने ममता बनर्जी की बैठक से दूरी बना ली थी. अब उन्हीं विधायकों से ऋतब्रत बनर्जी की मुलाकात ने बंगाल में सियासी हलचल बढ़ा दी है.  ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई बड़ा खेला होने जा रहा है?  टीएमसी में बगावत के बढ़ते आसार  बंगाल की सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की सियासी चुनौतियां कम होने का नाम नहीं ले रही है. टीएमसी के कार्यकर्ता से लेकर नेता तक का मोहभंग हो रहा है. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को लेकर विरोध के सुर टीएमसी में तेज होते जा रहे हैं.  टीएमसीके कई नेता और विधायक पार्टी की इस हालत के लिए खुले तौर पर उन्हें ही दोषी ठहरा रहे हैं. वे उन पर भ्रष्टाचार, घमंड, परिवारवाद, सीनियर नेताओं को किनारे करने और I-PAC के प्रोफेशनल्स के ज़रिए पार्टी को अपनी जागीर की तरह चलाने का आरोप लगा रहे हैं।  टीएमसी के कुछ नेता खुले तौर पर पार्टी पर आरोप लगा रहे हैं कि 15 साल सत्ता में रहने के बाद पार्टी जमीनी हकीकत से कट गई है. सिंडिकेट और 'कट-मनी' (कमीशन) की आदी हो गई है, और हिंसक रूप से अहंकारी हो गई है. वे जवाबदेही और आत्म-मंथन की मांग कर रहे हैं, जिसका ममता बनर्जी ने जिद के साथ विरोध किया है.  टीएमसी में टूटने का सबसे खतरा वहीं से आ रहा है जहां से तृणमूल कांग्रेस खड़ी हुई थी, मतलब जमीनी स्तर से विरोध तेज हो गया है।  ममता बनर्जी ने रविवार को टीएमसी विधायकों की  पीशी-भाईपो की बुलाई थी, जिसमें 80 में से सिर्फ टीएमसी 20 विधायक ही शामिल हुए. इससे पहले विभिन्न नगर निकायों के लगभग 100 TMC पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है. कई टीएमसी नेता की बीजेपी के साथ बातचीत कर रहे हैं. कुछ लोग, जैसे फिल्म निर्माता और पूर्व विधायक राज चक्रवर्ती, चुनाव में हार के बाद पूरी तरह से राजनीति छोड़ चुके हैं. इस तरह टीएमसी से नेताओं को मोहभंग हो रहा है, जो ममता बनर्जी के लिए सियासी टेंशन का सबब बनता जा रहा है।   ऋतब्रत बनर्जी बनेंगे टीएमसी के 'शिंदे' टीएमसी के टिकट पर विधायक बने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिसके चलते ममता बनर्जी ने दोनों विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. अब इन्हीं दोनों विधायकों ने टीएमसी के साथ खेला करने की कवायद में जुट गए हैं.  टीएमसी के कई विधायकों के साथ  ऋतब्रत बनर्जी ने देर रात मुलाकात की है. इससे यह अटकलें तेज हो गई हैं कि टीएमसी के भीतर एक नया समूह आकार ले सकता है।  विधायक हॉस्टल में  ऋतब्रत बनर्जी से मिलने वालों में पश्चिमी मिदनापुर की एक महिला विधायक भी शामिल थीं.  ऋतब्रत और संदीपन से मिलने वाले टीएमसी के एक विधायक के मुताबिक हम पार्टी तोड़कर कोई अलग दल बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, हम टीएमसी के झंडे तले ही काम करेंगे. ऐसे में साफ है कि टीएमसी के अंदर कुछ सियासी खिचड़ी जरूर पक रही है.  टीएमसी से निष्कासित विधायक जिस तरह से एक्टिव हैं और अभिषेक पर पार्टी को हाईजैक करने का आरोप लगाया, उससे सियासत तेज हो गई है।   ऋतब्रत बनर्जी ने खोला सियासी मोर्चा  ऋतब्रत बनर्जी ने आजतक से बात करते हुएअभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को सीधे तौर पर चुनौती दी है. मुख्य मुद्दा पार्टी में IPAC के संबंध में जूनियर बनर्जी की भूमिका अहम थी. TMC विधायक कुणाल घोष ने आरोप लगाया था कि निकाले गए ये दोनों विधायक पार्टी को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और उन्होंने दक्षिण कोलकाता के एक होटल में कुछ विधायकों के साथ एक गुप्त बैठक की थी, बाद में ऋतब्रत ने इस आरोप से इनकार कर दिया।  अभिषेक बनर्जी की घटना ने बढ़ाई टेंशन अभिषेक बनर्जी को जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा. वह सोनारपुर गए थे., उनके ऊपर अंडे और जूते फेंके गए। कल्याण बनर्जी ने अगले दिन आरोप लगाया कि उनके सिर पर एक पत्थर लगा था, लेकिन इन सबसे ऊपर, जहां भी वे गए, चोर, चोर के नारे लगे. इस तरह का दृश्य हर टीएमसी विधायक और सांसद को सियासी तौर पर चिंतित कर रहा है।  टीएमसी के कई नेताओं को डर सता रहा है कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के साथ जुड़ाव उनका राजनीतिक करियर बर्बाद कर सकता है.  इसके चलते ही टीएमसी के नेता ममता बनर्जी की बैठक में शामिल नहीं हुए. इससे ममता बनर्जी की सियासी टेंशन बढ़ गई है, क्योंकि जो विधायक बैठक में नहीं आए, लेकिन उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी से मुलाकात की है. इसके चलते ही माना जा रहा है कि कोई बड़ा खेला होने जा रहा है।  कुणाल घोष की अपील डूबते जहाज न छोड़े टीएमसी के 80 विधायकों और 29 सांसदों में से आधे से ज्यादा (लगभग 40-45 विधायक और 15-18 सांसद) ममता बनर्जी से अलग होकर 'दो घास-फूल' वाले चुनाव चिह्न के लिए चुनाव आयोग से संपर्क करते हैं, तो यह ममता बनर्जी और उनके भतीजे के पार्टी पर दावे को खारिज करने के लिए काफी हो सकता है. सोमवार को MLA कुणाल घोष ने टीएमसी नेताओं से हाथ जोड़कर गुज़ारिश की कि वे डूबते जहाज को छोड़कर न भागें, लेकिन ऐसे मुश्किल समय … Read more

ममता सरकार को बड़ा राजनीतिक झटका, स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को दी नई जिम्मेदारी

कोलकाता विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बड़े संकट से जूझ रही है। इसी कड़ी में बुधवार को टीएमसी के 58 बागी विधायकों ने पार्टी से निष्कासित ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता मानते हुए विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। सूत्रों ने बताया कि ऋतब्रत बनर्जी ने संदीपन साहा और कई अन्य बागी विधायकों के साथ विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात की और 58 विधायकों के हस्ताक्षर वाले समर्थन पत्र सौंपे। उन्होंने एक नई नेतृत्व टीम का प्रस्ताव भी रखा, जिसमें ऋतब्रत को विधायक दल का नेता, जावेद खान, संदीपन साहा और शिउली साहा को उप-नेता और रघुनाथगंज के विधायक अखरुज्जमां को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा है. पश्चिम बंगाल विधानसभा स्पीकर रवीन्द्र नाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी है. ममता बनर्जी ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष घोषित किया था. इसके बाद पार्टी में बगावत हो गई है. 80 में से 60 विधायकों ने शोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष मानने से इंकार कर दिया. इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 60 विधायकों ने स्पीकर रवीन्द्र नाथ बोस से मुलाकात कर उनसे कहा कि वे TMC के असली गुट हैं और ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी जाए. विधायकों की अपील पर विचार करते हुए स्पीकर ने  ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दे दी है।  गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से चुनाव नतीजे आने के बाद ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह को TMC से निलंबित कर दिया था। इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी ने ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत कर दिया।  स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के कमरे की चाबी दे दी है. टीएमसी के इस गुट में चार उप नेता प्रतिपक्ष बनाए गए हैं. इनके नाम हैं- जावेद अहमद खान, शबीना यास्मीन, शीलू साह, और संदीपन साह. अकीरजम्मा सदन में टीएमसी के चीफ व्हिप होंगे।  स्पीकर के इस फैसले से साफ हुआ है उन्होंने ऋतब्रत बनर्जी की अगुआई वाली टीएमसी को असली तृणमूल कांग्रेस माना है।   यह घटनाक्रम विधानसभा में बागी विधायकों की एक बैठक के बाद सामने आया। विधानसभा में हुई इस बैठक में शामिल कोई भी विधायक मंगलवार को मध्य कोलकाता में पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी के धरने में मौजूद नहीं था। दूसरी ओर, शोभनदेव चट्टोपाध्याय, नयना बंद्योपाध्याय, मदन मित्रा और कुणाल घोष जैसे नेता बागी विधायकों की बैठक से दूर रहे।बागियों ने ममता को माना पार्टी सुप्रीमोबागी विधायकों द्वारा विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र में ममता बनर्जी को पार्टी का अध्यक्ष बताया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि बागी विधायक अपनी लड़ाई को टीएमसी सुप्रीमो के खिलाफ नहीं, बल्कि मौजूदा विधायक दल के नेतृत्व के खिलाफ पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। बागी गुट के सूत्रों ने बताया कि विधायकों ने यह भी साफ कर दिया है कि वे विधायक दल के मामलों पर फैसले लेने के संबंध में अभिषेक बनर्जी के अधिकार को स्वीकार नहीं करते हैं।पार्टी के साथ विश्वासघात हुआ। टीएमसीटीएमसी नेतृत्व ने इस पूरी कवायद को विश्वासघात करार देते हुए खारिज कर दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता और विधायक कुणाल घोष ने कहा कि संगठन के भीतर बातचीत से किसी भी मतभेद को सुलझाया जा सकता था। अगर उन्हें कोई समस्या थी, तो वे पार्टी के भीतर इस पर चर्चा कर सकते थे। इसके बजाय उन्होंने पार्टी को धोखा देना चुना। बागी विधायकों और उनके समर्थकों को गद्दार बताते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि टीएमसी इस संकट से उबर जाएगी और ममता बनर्जी के नेतृत्व में एकजुट रहेगी।अयोग्य होने से बच जाएंगे बागी विधायकदल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी अलग हुए गुट को अयोग्य घोषित होने से बचने के लिए विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है। चूंकि, विधानसभा में टीएमसी के 80 विधायक हैं, इसलिए यह सीमा 54 विधायकों की है। यदि बागी गुट का दावा स्वीकार कर लिया जाता है, तो वे आसानी से इस आंकड़े को पार कर लेंगे और सदन में एक अलग गुट के रूप में मान्यता पाने के अपने दावे को मजबूत करेंगे। यह है मामलाघटनाक्रम की जड़ें छह मई को ममता बनर्जी के आवास पर चुने गए विधायकों की एक बैठक में थीं, जहां विधायकों ने कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व को विपक्ष के नेता, उप-नेता और मुख्य सचेतक के नामों पर फैसला करने का अधिकार दिया था। इसके बाद टीएमसी ने विधानसभा को सूचित किया कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय विपक्ष के नेता होंगे, नयना बंद्योपाध्याय और आशिमा पात्रा उप-नेता होंगी और फिरहाद हकीम मुख्य सचेतक होंगे। हालांकि, विधानसभा सचिवालय ने इस सूचना पर कोई कार्रवाई नहीं की और प्रक्रियागत जरूरतों का हवाला दिया कि ऐसे पदाधिकारियों का चुनाव विधायक दल की एक औपचारिक बैठक में होना चाहिए।हस्ताक्षर पर उठे थे सवालविवाद तब और बढ़ गया जब बागी विधायकों ने आरोप लगाया कि विधानसभा सचिवालय को भेजे गए पत्र पर किए गए हस्ताक्षर सही नहीं हैं। पार्टी नेतृत्व ने इस आरोप को खारिज कर दिया और बागियों पर चुनावी झटके के बाद संगठन को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। इसी क्रम में टकराव तब और तेज हो गया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निकाल दिया गया।

ममता बनर्जी को बड़ा झटका? TMC के 59 विधायक ऋतब्रत बनर्जी के खेमे में जाने की चर्चा

कोलकत्ता  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के महज एक महीने के भीतर राज्य की राजनीति में अब तक का सबसे बड़ा और अप्रत्याशित भूचाल आ चुका है. पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) आधिकारिक तौर पर दोफाड़ होने की कगार पर पहुंच गई है. कोलकाता के सियासी गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, टीएमसी के भीतर की गुटबाजी अब एक खुली जंग में तब्दील हो चुकी है, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस का आड़ा-तिरछा विभाजन तय माना जा रहा है. इस बड़े उलटफेर ने राज्य से लेकर देश भर के राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है।  59 विधायक हुए बागी? मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, बुधवार सुबह ठीक 10 बजे ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा के नेतृत्व में टीएमसी के बागी विधायकों का एक बहुत बड़ा हुजूम अचानक विधानसभा पहुंच गया. सूत्रों का दावा है कि पार्टी के कुल 80 विधायकों में से दो-तिहाई से कहीं अधिक, यानी कुल 59 नाराज विधायक अब ऋतब्रता बनर्जी के पाले में खड़े हो चुके हैं. इन सभी विधायकों ने एक संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बसु को सौंपने की तैयारी की जा चुकी है।  ममता के धरने में दिखी कम संख्या इस अभूतपूर्व टूट के बीच सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा ममता बनर्जी के खेमे का सामने आया है. राजनीतिक गलियारों में दावा किया जा रहा है कि अब पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के साथ महज 21 विधायक ही शेष बचे हैं. इस दावे को मंगलवार को तब और हवा मिल गई जब कोलकाता के वाई चैनल पर आयोजित ममता बनर्जी के धरने में पूरी पार्टी से सिर्फ 6 विधायक और 5 सांसद ही शामिल होने पहुंचे. विधायकों की इस बेहद कम संख्या ने खुद टीएमसी नेतृत्व को भी गहरे संकट में डाल दिया है।  ऋतब्रता को विपक्ष का नेता बनाने का दांव ऋतब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाला यह बागी गुट अब पूरी ताकत के साथ विधानसभा में खुद को असली तृणमूल कांग्रेस के रूप में स्थापित करने की कोशिश में जुट गया है. बागी विधायकों के दस्तखत वाले पत्र के जरिए विधानसभा अध्यक्ष से मांग की जा रही है कि ऋतब्रता बनर्जी को आधिकारिक तौर पर विपक्ष का नेता घोषित किया जाए. इसके साथ ही संदीपान साहा को उप-विपक्ष का नेता और मुर्शिदाबाद के विधायक अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।  ममता के पास सिर्फ 21 विधायक? सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक 59 विधायकों के बागी रुख अख्तियार कर लेने के बाद अब आधिकारिक तौर पर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के पास सिर्फ 21 विधायक बचे हैं. विधायकों का ये नंबर गेम बताता है कि टीएमसी इस वक्त पूरी तरह से मुश्किलों में घिरी हुई।  बताया जा रहा है कि टीएमसी के ये बागी विधायक विधानसभा पहुंच गए हैं, जहां वह विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से मुलाकात करेंगे. इसके लिए स्पीकर भी सदन पहुंच गए हैं. बताया जा रहा है कि स्पीकर से मुलाकात के दौरान ऋतब्रत नेता प्रतिपक्ष के लिए अपनी बात रखेंगे।  क्या है बागी विधायकों की मांग टीएमसी के इन बागी विधायकों की मांग है कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय के बजाय पार्टी के किसी अन्य बेहद वरिष्ठ नेता को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (लीडर ऑफ अपोजिशन) की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाए, जिसके लिए उन्होंने ये कड़ा रुख अपनाया है। उधर, टीएमसी के बागी विधायकों में शामिल मुस्तफिजुर रहमान ने कहा कि टीएमसी के 59 विधायकों ने हस्ताक्षर किया है. हम सभी ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है, लेकिन हम चाहते हैं कि किसी वरिष्ठ नेता को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाए। विधानसभा के मौजूदा समीकरणों को देखें तो इस अभूतपूर्व बगावत के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के पास अब केवल 21 वफादार विधायक ही बचे हैं, जिससे पार्टी के पूरी तरह विभाजित होने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। आपको बता दें कि हाल ही में संपन्न हुए बंगाल विधानसभा में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 207 सीटों पर शानदार जीत दर्ज कर टीएमसी को सत्ता से बेदखल कर दिया।  दिग्गज और अल्पसंख्यक नेताओं की बड़ी बगावत इस विद्रोह की सबसे खास बात यह है कि इसमें ममता बनर्जी के पुराने और सबसे भरोसेमंद सिपहसालार शामिल हैं. बागी गुट में पूर्व मंत्री जावेद खान, शूलि साहा, वीरभूम के कद्दावर नेता काजल शेख, पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा, मुर्शिदाबाद के विधायक नियामत शेख, सामशेरगंज के विधायक मोहम्मद नूर आलम, उत्तर दिनाजपुर के विधायक गुलाम रब्बानी, डोमजूर के विधायक तापस मैती और हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय जैसे कद्दावर नाम शामिल हैं. मालदा की विधायक और पूर्व मंत्री साबीना यास्मीन ने खुलेआम ऋतब्रता बनर्जी का समर्थन कर दिया है. इसके अलावा, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों के अधिकांश अल्पसंख्यक विधायक भी इसी बागी गुट के साथ खड़े नजर आ रहे हैं।  फर्जी हस्ताक्षर पर छिड़ी कानूनी जंग इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में एक बड़ा कानूनी मोड़ तब आया, जब अभिषेक बनर्जी की तरफ से विधानसभा भेजे गए एक पत्र पर बागी विधायकों ने अपने फर्जी हस्ताक्षर होने का आरोप लगा दिया. ऋतब्रता बनर्जी और संदीपान साहा ने स्पीकर से लिखित शिकायत की है कि विधायकों की मर्जी के बिना उनके दस्तखत का गलत इस्तेमाल किया गया है. इस गंभीर शिकायत के बाद राज्य की सीआईडी (CID) ने मामले की जांच शुरू कर दी है। 

पार्टी में फूट की चर्चाओं के बीच TMC में बड़ा संगठनात्मक बदलाव, ममता ने लिया बड़ा एक्शन

कोलकत्ता   पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के टूटने और महाराष्ट्र की तरह पार्टी के सिंबल पर कब्जे की खबरों के बीच ममता बनर्जी के सबसे वफादार शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने मोर्चा संभाल लिया है. टीएमसी के पहले निर्वाचित विधायक और विधानसभा में मनोनीत नेता प्रतिपक्ष (LoP) चट्टोपाध्याय ने मंगलवार को दल-बदल और बगावत की सभी अटकलों को खारिज कर दिया. उन्होंने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस का बहुमत आज भी ममता बनर्जी के साथ मजबूती से खड़ा है. संगठन पर पार्टी के पुराने वफादारों का ही नियंत्रण रहेगा।  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने बड़ा एक्शन लेते हुए तृणमूल कांग्रेस की सभी कमेटियों, पार्टी से जुड़े संगठनों को तत्काल प्रभाव से विलय कर दिया है. टीएमसी ने कहा है कि सभी कमेटियों और फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन का पुनर्गठन किया जाएगा।  टीएमसी ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा है कि गहन विचार-विमर्श के बाद, यह निर्णय लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी समितियां, साथ ही इसके सभी अनुषांगिक संगठन, तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएंगे।  TMC ने कहा कि पार्टी हर स्तर पर आत्म-निरीक्षण, कार्य-निष्पादन समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन की एक व्यापक प्रक्रिया चलाएगी. इस प्रक्रिया के निष्कर्षों के आधार पर मुख्य संगठन और सभी अनुषांगिक संगठनों की संगठनात्मक संरचना का पुनर्गठन किया जाएगा और उचित समय पर इसकी घोषणा की जाएगी।  पार्टी अपने संगठन को सुदृढ़ बनाने और उसे नए उत्साह तथा उद्देश्य के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने हेतु पूरी तरह प्रतिबद्ध है। बता दें कि बंगाल विधानसभा में हार के बाद पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को TMC में फूट का सामना करना पड़ रहा है. कुछ आनुषांगिक संगठन आलाकमान के फैसले से इतर दूसरे गुट के फैसलों के साथ सहमति जता रहे हैं। टीएमसी ने भंग की सारी कमेटियां और संगठन तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में अपनी सभी कमेटियों के साथ-साथ अपने सभी फ्रंटल संगठनों को भी तत्काल प्रभाव से भंग करने का फैसला किया है. पार्टी ने कहा कि अब वह एक विस्तृत आंतरिक समीक्षा करेगी, जिसमें सभी स्तरों पर कामकाज और संगठनात्मक कार्यप्रणाली का मूल्यांकन शामिल होगा. इस प्रक्रिया के नतीजों के आधार पर, मुख्य संगठन और उससे जुड़े सभी विंग्स के लिए एक नए सिरे से तैयार संगठनात्मक ढाँचे की घोषणा बाद में की जाएगी।  पार्टी ने एक बयान में कहा, ‘गहन विचार-विमर्श के बाद, यह फैसला किया गया है कि पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की सभी कमेटियां, और साथ ही उसके सभी फ्रंटल संगठन, तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएँगे. पार्टी हर स्तर पर आत्म-निरीक्षण, कामकाज की समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन का एक व्यापक अभियान चलाएगी. इस प्रक्रिया से सामने आए नतीजों के आधार पर, मुख्य संगठन और सभी फ्रंटल संगठनों के संगठनात्मक ढांचे का पुनर्गठन किया जाएगा और उचित समय पर इसकी घोषणा की जाएगी।  उन्होंने आगे कहा, ‘पार्टी अपने संगठन को मज़बूत करने और उसे नए जोश और उद्देश्य के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।  TMC के 16 फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन हैं. टीएमसी की फ्रंटल संगठन की संख्या लगभग 16 है. आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार ये संगठन पार्टी के विभिन्न वर्गों जैसे युवा, महिला, छात्र, मजदूर आदि को संगठित करते हैं।   कमेटियों की बात करें तो इसमें TMC की मुख्य कार्यकारी कमेटी है. इसके अलावा कोर कमेटी, स्टेट कमेटी, जिला और ब्लॉक कमेटी और अनुशासन समिति है. अब इन सभी का विलय कर दिया गया है और कमेटियों का गठन किया जाएगा।   पैसे और सत्ता के दम पर बगावत कराने की कोशिश : शोभनदेव शोभनदेव चट्टोपाध्याय का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब निष्कासित और बागी नेताओं (ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा) के गुट 20 से 50 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं. शोभनदेव ने इन दावों के पीछे की इनसाइड स्टोरी को उजागर करते हुए गंभीर आरोप लगाये।  नेता विपक्ष के पद के लिए 58 विधायकों ने रीताब्रता बनर्जी का समर्थन किया टीएमसी विधायकों की बैठक के बाद 58 सदस्यों के हस्ताक्षरों वाला एक संयुक्त पत्र विधानसभा स्पीकर को सौंपा गया है, जिसमें विपक्ष के नेता के तौर पर रीतातब्रता बनर्जी के नाम का प्रस्ताव किया गया है।   टीएमसी के करीब 60 विधायक बैठक के लिए विधानसभा पहुंचे टीएमसी के 80 विधायकों में से लगभग 60 विधायक बैठक के लिए पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंचे, जिससे इस बात की अटकलें तेज़ हो गई हैं कि वे शायद विधायक दल पर नियंत्रण हासिल करने और विपक्ष के नेता के पद पर दावा ठोकने की कोशिश कर सकते हैं।  तो ममता बनर्जी के पास सिर्फ 20 टीएमसी विधायकों का सपोर्ट? रिताब्रता बनर्जी ने 59 टीएमसी विधायकों के समर्थन का दावा किया है. ऐसे में अगर बनर्जी के बताए नंबर सही हैं, तो इससे विधानसभा के राजनीतिक समीकरणों में बड़ा बदलाव दिखेगा, जिससे पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पास सिर्फ 20 MLAs का सपोर्ट बचेगा. हालांकि, इन दावों को अलग से वेरिफाई नहीं किया गया है, और तृणमूल कांग्रेस ने भी अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। 

Karnataka Politics: डीके-सिद्धारमैया विवाद शांत कराने दिल्ली ने बनाया खास प्लान

नई दिल्ली कर्नाटक में सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. बुधवार शाम चार बजे डीके शिवकुमार सीएम पद की शपथ लेंगे और 13 नेता कैबिनेट मंत्री बनाए जाएंगे.डीके शिवकुमार के अगुवाई वाली सरकार कैसे चलेगी, उसकी पूरी रूपरेखा दिल्ली में तय कर ली गई है. सीएम की कुर्सी छोड़ने वाले सिद्धारमैया को साधे रखने का ही नहीं बल्कि दिल्ली की राजनीति में अहम भूमिका की पटकथा लिख दी गई है।  कांग्रेस हाईकमान ने सिद्धारमैया को मंगलवार को पार्टी के भीतर सबसे शक्तिशाली और सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था कांग्रेस कार्य समिति का स्थायी सदस्य नियुक्त किया है.सिद्धारमैया का यह प्रमोशन न केवल उनके कद को दर्शाता है,बल्कि यह भी साफ संकेत देता है कि आने वाले समय में वे दिल्ली की राजनीति में एक बड़ी राष्ट्रीय भूमिका मिलने जा रही है।  सवाल उठता है कि क्या सिद्धारमैया कांग्रेस के आलाकमान के इस निर्णय से खुश होंगे क्योंकि, उनका मन तो राज्य की राजनीति में रहना था. उन्होंने सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद कहा था कि उनको राष्ट्रीय राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है और राज्य में ही रहकर जनता की सेवा करनी है. ऐसे में कांग्रेस ने डीके सरकार और सिद्धारमैया के बीच सियासी संतुलन बनाए रखने का खाका दिल्ली में ही खींच दिया है ताकि कर्नाटक में किसी तरह का सियासी नाटक न हो सके?  दिल्ली में लिखी गई कर्नाटक की पटकथा कर्नाटक की कमान अब पूरी तरह से नए हाथों में सौंप दी गई है. डीके शिवकुमार कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करेंगे. मंगलवार को शिवकुमार और सिद्धारमैया मंगलवार को दिल्ली में थे. कर्नाटक में बनने जा रहे नए मंत्रिमंडल के स्वरूप को लेकर कांग्रेस हाईकमान से मीटिंग करनी थी, जिसके लिए इंतजार कर रहे थे।  हमेशा की तरह, मैं मंगलवार को कर्नाटक भवन पहुंचा, जो राज्य की सियासी गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है. कर्नाटक भवन में कांग्रेस नेताओं से ऑन-रिकॉर्ड और ऑफ-रिकॉर्ड मुलाकात हुई.इनमें एचके पाटिल और ईश्वर खंडारे भी शामिल थे, जो सिद्धारमैया की पिछली कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री थे. एक बात साफ ज़ाहिर थी कि सिद्धारमैया के जाने के बाद पिछली कैबिनेट में उनके वफ़ादार रहे नेताओं में थोड़ी घबराहट थी कि उन्हें नई कैबिनेट में जगह मिलेगी या नहीं।  सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की मंगलवार को दोपहर सवा एक बजे कांग्रेस हाईकमान के साथ मीटिंग हुई. इस मीटिंग में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे भी शामिल थे. सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार अपनी-अपनी पसंद के नामों के साथ मीटिंग में गए थे, जिन पर वे पहले ही केसी वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला के साथ चर्चा कर चुके थे।   शिवकुमार सरकार के कौन होंगे सिपहसलार कांग्रेस हाईकमान के साथ सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की मीटिंग हुई. इस उच्च-स्तरीय बैठकों के दौरान कैबिनेट के लिए जिन नामों पर मुहर लगी है, उनके आधार पर लगभग 13 मंत्री बनाए जा सकते हैं. सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के खेमों के बीच संतुलन बनाते हुए कांग्रेस हाई कमान ने केजी जॉर्ज, जी परमेश्वर, रामलिंगा रेड्डी, केबी गौड़ा, यूटी खादर, एमपी पाटिल, सतीश जारकीहोली, प्रियंका खड़गे, यतींद्र और केएच मुनियप्पा की बेटी रूपा श्रीधर जैसे नामों को कैबिनेट में शामिल करने मंज़ूरी दे दी है।  डीके सरकार में साफ है कि शुरुआत अनुभवी मंत्रियों के साथ की जाए, लेकिन सूत्रों के अनुसार कैबिनेट को एक नया रूप और कलेवर दिया जाएगा. शिवकुमार की कैबिनेट में कुछ नए चेहरों को शामिल करवाएंगे ताकि मौजूदा कांग्रेस सरकार के खिलाफ 'सत्ता-विरोधी लहर' को कम किया जा सके. शिवकुमार के साथ-साथ 13 मंत्रियों के शपथ लेने की संभावना है. इसके बाद कैबिनेट का बाक़ी विस्तार 8 जून के बाद हो सकता है. राज्यसभा चुनावों के संपन्न होने के बाद कैबिनेट विस्तार होगा ताकि पार्टी के सभी नेता एकजुट और वफ़ादार बने रहें।  नए प्रदेश अध्यक्ष का एजेंडा फाइनल डीके शिवकुमार के सीएम बनने के साथ ही कर्नाटक कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष का पद खाली हो गया है. कैबिनेट के गठन के बाद दूसरी प्राथमिकता नए कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करना है. सूत्रों का कहना है कि पार्टी ने इस अहम पद के लिए सतीश जारकीहोली से संपर्क किया था, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि वह प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी तभी स्वीकार करेंगे जब इसके साथ उन्हें कैबिनेट में कोई मंत्रालय भी दिया जाए।  सूत्रों ने बताया कि चूंकि ऐसा होने की संभावना कम है, इसलिए पार्टी अब उनके अलावा ईश्वर खंड्रे और बीके हरिप्रसाद जैसे अन्य नेताओं के नाम पर भी विचार कर रही है. कर्नाटक में अब मुख्यमंत्री एक प्रभावशाली जाति से आते हैं, इसलिए पार्टी चाहती है कि राज्य इकाई का नेतृत्व कोई OBC, ST या SC नेता करे, ताकि सामाजिक समीकरणों के बारे में सही संदेश दिया जा सके. बीजेपी पहले ही कांग्रेस का मज़ाक उड़ा रही है कि उन्होंने जातिगत भेदभाव के चलते अपने एकमात्र OBC मुख्यमंत्री को हटाकर एक सामान्य जाति के नेता के लिए रास्ता साफ कर दिया है।  राज्यसभा और एमएलसी चुनाव कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि राज्यसभा की 3 सीटों के लिए 80 से ज़्यादा दावेदार है  जबकि MLC की 7 सीटों के लिए 200 से ज़्यादा दावेदार हैं. ऐसे में राज्यसभा की सीटों के लिए केवल एक नाम लगभग तय माना जा रहा है और वह है कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का. इसके अलावा बाकी दो सीटों के लिए YS शर्मिला, सिद्धारमैया, केजे जॉर्ज, वीवी श्रीनिवास और मंसूर अली खान जैसे नामों पर चर्चा चल रही है।  MLC के लिए बीके हरिप्रसाद का नाम भी लगभग तय माना जा रहा है, जबकि वरिष्ठ दलित नेता और पूर्व सांसद एल हनुमंतैया और अनुभवी शिया नेता आगा सुल्तान के नामों की भी चर्चा हो रही है, पार्टी अगले 24-48 घंटों में नामों को अंतिम रूप देने का फैसला ले सकती है।  सिद्धारमैया के लिए राष्ट्रीय रोल की तैयारी सिद्धारमैया को CWC में शामिल करना कांग्रेस की उस दूरगामी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसकी चर्चा राजनीतिक गलियारों में काफी समय से थी. पहले सिद्धारमैया ने साफ तौर पर कहा था कि वे कर्नाटक की राजनीति छोड़कर केंद्र की राजनीति में नहीं जाना चाहते।  कांग्रेस आलाकमान द्वारा उन्हें राज्यसभा भेजने के प्रस्ताव को भी उन्होंने ठुकरा दिया था. लेकिन सूत्रों के अनुसार कांग्रेस … Read more

अभिनेता विजय और अन्नामलाई के बीच सियासी मुकाबले के संकेत, तमिलनाडु में बढ़ी हलचल

चेन्नई  तमिलनाडु में भाजपा के फायरब्रांड नेता अन्नामलाई ने बड़ा फैसला ले लिया है. अन्नामलाई ने सस्पेंस से पर्दा हटाते हुए भाजपा से अलग होने का मन बना ही लिया है. जी हां, पूर्व तमिलनाडु बीजेपी प्रमुख के. अन्नामलाई ने आज यानी मंगलवार को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात की और अपना इस्तीफा सौंप दिया. हालांकि उम्मीद है कि वे शाम 4 बजे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी मिलेंगे. अमित शाह से मुलाकात में ही फाइनल फैसला हो पाएगा।  भाजपा चीफ नितिन नबीन और संगठन सचिव बीएल संतोष के साथ अहम बैठक में अन्नामलाई ने कथित तौर पर पार्टी से अच्छे संबंधों के साथ अलग होने की इच्छा जताई. उन्होंने पार्टी नेतृत्व से कहा कि वे अब अपना रास्ता खुद बनाना चाहते हैं. हालांकि, बीजेपी नेतृत्व उन्हें मनाने की कोशिश कर रहा है और उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई भूमिका भी तय की जा सकती है. सूत्रों के मुताबिक, अन्नामलाई को अगली सूचना तक दिल्ली न छोड़ने के लिए कहा गया है।  तमिलनाडु में बड़ा राजनीतिक उलटफेर अगर अन्नामलाई का इस्तीफा मंजूर होता है तो यह भाजपा के लिए बड़ा झटका होगा. बीजेपी से अन्नामलाई का जाना राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है, खासकर अभिनेता से नेता बने विजय के मुख्यमंत्री बनने के बाद. अन्नामलाई के करीबी सूत्रों के मुताबिक, उनका मानना है कि विजय के राजनीतिक ताकत बनने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है. आज विजय से लड़ने के लिए कोई नेता नहीं है. द्रविड़ युग खत्म हो गया है. अब सिर्फ भाषा आधारित राजनीति नहीं चलेगी. राज्य की राजनीति बदल चुकी है।  ऐसी अटकलें तेज थीं कि अन्नामलाई सहमति से पार्टी छोड़ना चाहते हैं. रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि अब वे बीजेपी में अपना भविष्य नहीं देख रहे हैं. अन्नामलाई को नैनार नागेन्द्रन के तमिलनाडु बीजेपी प्रमुख बनने के बाद से कम सक्रिय देखा जा रहा था. गौरतलब है कि तमिलनाडु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई के राजनीतिक भविष्य को लेकर बीते कुछ दिनों से अटकलों का बाजार गर्म है।  क्यों अटकलों का बाजार हुआ गर्म दरअसल कोयंबटूर में उनके समर्थकों द्वारा लगाए गए विशाल पोस्टरों से अफवाहें फैल रही हैं कि वे एक अलग राजनीतिक मंच बनाने जैसी कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक पहल करने की तैयारी कर रहे हैं. 4 जून को अन्नामलाई के जन्मदिन से पहले प्रमुख सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर ‘हमारे नेता, आइए और हमारा नेतृत्व कीजिए’ जैसे नारों वाले ये पोस्टर लगाए गए थे।  अन्नामलाई ने क्यों कहा था 2 दिन इंतजार कीजिए दिल्ली रवाना होने से पहले अन्नामलाई ने अपने बारे में चल रही अटकलों पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. पत्रकारों से संक्षिप्त बातचीत में उन्होंने कहा कि कृपया प्रतीक्षा करें. हम दो दिन में बैठकर बात करेंगे. इस टिप्पणी ने संभावित घोषणा को लेकर उत्सुकता को और बढ़ा दिया है।  कौन हैं अन्नामलाई? भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी अन्नामलाई 2020 में भाजपा में शामिल हुए और तेजी से तमिलनाडु में पार्टी के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक बन गए. 2021 से 2025 तक राज्य भाजपा अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कई राज्यव्यापी अभियानों का नेतृत्व किया और युवा मतदाताओं और सोशल मीडिया फॉलोअर्स के बीच एक मजबूत समर्थन आधार बनाया।  एक भी चुनाव नहीं लड़े 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद उनके भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गईं, जिसमें भाजपा के सबसे जाने-माने चेहरों में से एक होने के बावजूद उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा. कक्षा नौ के छात्रों के लिए त्रिभाषा नीति को आगे बढ़ाने के केंद्र के फैसले की उनकी हालिया आलोचना ने भी राजनीतिक बहस छेड़ दी और पार्टी नेतृत्व के साथ उनके संबंधों को लेकर नई अफवाहें पैदा कर दीं।  41 साल के अन्नामलाई के पास समय और राजनीतिक ऊर्जा दोनों हैं. जहां कुछ पर्यवेक्षकों का मानना ​​है कि अन्नामलाई भाजपा में अधिक प्रमुख भूमिका तलाश सकते हैं, वहीं अन्य का अनुमान है कि वे एक अलग राजनीतिक मंच बना सकते हैं. हालांकि, भाजपा नेताओं ने किसी भी विभाजन की अटकलों को खारिज कर दिया है, और उनका कहना है कि अन्नामलाई पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता बने रहेंगे. मंगलवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ उनकी बैठक निर्धारित होने के कारण, राजनीतिक विश्लेषक अन्नामलाई के अगले कदम को स्पष्ट करने वाले संकेतों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। 

क्या फिर एक होगी शिवसेना? शिंदे-उद्धव कैंप के नेताओं के बयान से सियासी हलचल

मुंबई  महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर करवट लेने का इशारा दे रही है। चर्चा है कि 2022 में शिवसेना में हुई बड़ी बगावत के ठीक चार साल बाद अब दोनों धड़ वापस साथ आने की तैयारी कर रहे हैं। उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के गुट के बड़े नेताओं ने इशारा दिया है कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। छत्रपति संभाजीनगर से दोनों गुटों के 2 बेहद सीनियर नेताओं ने सार्वजनिक रूप से बयान देकर हलचल बढ़ा दी है। पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक जहां शिवसेना (UBT) के नेता अंबादास दानवे ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए इसके संकेत दिए हैं, वहीं इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शिवसेना के वरिष्ठ नेता अब्दुल सत्तार ने भी कहा कि भाजपा ने जहां शिवसेना (UBT) के हाथ-पैर काट दिए हैं, वहीं छत्रपति संभाजीनगर जिले में शिवसेना का सिर ही काट दिया है। क्या बोले दोनों नेता? जब दोनों नेताओं से सीधे तौर पर पूछा गया कि क्या शिवसेना के दोनों गुटों को दोबारा मिल जाना चाहिए, इस पर भी उनका जवाब काफी सकारात्मक था। उद्धव गुट के अंबादास दानवे में कहा, "मुझे कई मौकों पर ऐसा महसूस होता है। लेकिन सिर्फ मेरे अकेले चाहने से कुछ नहीं होने वाला, दोनों तरफ से यह इच्छा होनी चाहिए।" वहीं शिवसेना के अब्दुल सत्तार ने कहा, "यह बिल्कुल सही समय है जब हमें एकजुट हो जाना चाहिए। अगर हमारे उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे साहब इस बात के लिए रजामंदी दे देते हैं, तो दोनों पार्टियों को एक होने में जरा भी देरी नहीं लगेगी।" भाजपा है असली वजह दरअसल दोनों गुटों के साथ आने की वजह भाजपा है। शिवसेना की दोनों धरों का मानना है कि भाजपा महाराष्ट्र में क्षेत्रीय दलों का वजूद पूरी तरह खत्म करना चाहती है। अंबादास दानवे ने अपने बयान में कहा, “बड़ी मछली हमेशा छोटी मछली को निगल जाती है। बीजेपी इस वक्त महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी (NCP) दोनों के साथ यही खेल खेल रही है। बीजेपी शिवसेना को सिर्फ एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि अपना दुश्मन मानती है और उसका एकमात्र टारगेट शिवसेना के वजूद को पूरी तरह खत्म करना है। जो लोग पार्टी तोड़कर अलग हुए थे, अब उन्हें भी इस कड़वे सच का अहसास हो रहा होगा।” वहीं शिंदे गुट के अब्दुल सत्तार ने अपनी ही सहयोगी बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर हमारा बड़ा भाई (BJP) ही हमें खत्म करने पर आमादा हो तो गठबंधन में रहने का क्या फायदा? उन्होंने आगे कहा, “भाजपा ने जहां शिवसेना (UBT) के हाथ-पैर काट दिए हैं वहीं छत्रपति संभाजीनगर जिले में शिवसेना का सिर ही काट दिया है।" कैसे बदले समीकरण? अब सवाल यह है कि आखिर राज्य में ऐसे हालात क्यों पैदा हो गए कि शिवसेना फिर एक होने की बात कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक शिवसेना के नेताओं की छटपटाहट के पीछे छत्रपति संभाजीनगर और पूरे राज्य में बदल रहे सत्ता के समीकरण हैं। कभी औरंगाबाद नगर निगम और जिला परिषद पर अविभाजित शिवसेना का एकछत्र राज हुआ करता था। हालांकि 2022 की बगावत के बाद आज इन दोनों प्रमुख निकायों पर बीजेपी ने पूरी तरह अपना कब्जा जमा लिया है। दानवे ने बताया कि औरंगाबाद-जालना की सीट पर पिछले 25-30 सालों से हमेशा शिवसेना ही चुनाव लड़ती आ रही थी। लेकिन इस बार बीजेपी ने शिंदे गुट के दावों को दरकिनार करते हुए वहां अपना खुद का उम्मीदवार खड़ा कर दिया है। इस कदम ने शिंदे गुट के नेताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

राज्यसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने तेज की तैयारी, इन नेताओं के नाम सबसे आगे

नई दिल्ली राज्यसभा की 24 सीटों और कुछ राज्यों की विधान परिषद सीटों के चुनाव को लेकर भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास पर बैठक की। बैठक में उम्मीदवारों के चयन और सहयोगी दलों के साथ सीटों के बंटवारे पर चर्चा हुई। पार्टी ने महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी। दिग्गजों का जमावड़ा प्रधानमंत्री आवास पर दो घंटे से ज्यादा चली केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा समेत चुनाव समिति के सदस्य मौजूद रहे। सूत्रों के अनुसार, बैठक में राज्यसभा की 24 सीटों में भाजपा को मिलने वाली लगभग एक दर्जन सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा की गई। राज्यों से आए नामों को लेकर केंद्रीय चुनाव समिति ने मंथन किया और कई सीटों पर अपनी राय बना ली है। बैठक में महाराष्ट्र और बिहार में विधान परिषद की सीटों को लेकर भी चर्चा की गई। क्या हुई चर्चा आंध्र प्रदेश में राज्यसभा की चार सीटों में भाजपा एक सीट की मांग कर रही है। हालांकि, पार्टी ने संकेत दिए हैं कि इस मामले में राज्य में गठबंधन के प्रमुख सहयोगी मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की राय को प्रमुखता दी जाएगी। गौरतलब है कि टीडीपी भाजपा के बजाय दूसरी सहयोगी जन सेना को एक सीट देना चाहती है। बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गृहमंत्री अमित शाह के साथ अलग से भी बैठक की है। सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में राज्यसभा उम्मीदवारों, विधान परिषद के उम्मीदवार और सहयोगी दलों के साथ सीटों के तालमेल को अंतिम रूप दिया गया। साथ ही पश्चिम बंगाल में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर भी चर्चा की गई। इन नेताओं को टिकट मिलने के आसार सूत्रों के अनुसार, मणिपुर से पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को पार्टी टिकट दे सकती है, जबकि रिटायर हो रहे दो केंद्रीय मंत्रियों जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू को भी टिकट दिए जाने की संभावना है। संगठन की अहम बैठक आज भाजपा की एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक सोमवार को पार्टी मुख्यालय में होगी। पार्टी के केंद्रीय पदाधिकारी के साथ इस बैठक में प्रदेशों के अध्यक्ष और संगठन महामंत्री भी शामिल रहेंगे। बैठक में केंद्र सरकार के सत्ता में 12 साल पूरे होने और मौजूदा कार्यकाल के दो साल पूरे होने पर देशभर में किए जाने वाले कार्यक्रमों पर चर्चा होगी। साथ ही, संगठन के विभिन्न मुद्दों पर देशभर के संगठन मंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों से राष्ट्रीय अध्यक्ष अद्यतन राजनीतिक और संगठनात्मक जानकारी हासिल करेंगे। इन राज्यों में फैली हैं 24 सीटें चुनावी दौर से गुजरने वाली 24 सीटों में आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक से 4-4, मध्य प्रदेश, राजस्थान से 3-3, झारखंड से 2 और अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और मिजोरम से 1-1 सीट है।

TMC में अनुशासनहीनता पर सख्ती, ममता ने दो नेताओं को पार्टी से निकाला

कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद टीएमसी के अंदर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। एक के बाद एक पार्टी को उसके ही नेता छोड़ रहे हैं। वहीं अब ममता बनर्जी ने ही अपने दो विधायकों पर सख्त एक्शन लिया है। TMC ने अपने दो विधायकों, रितब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निकाल दिया है। बता दें कि इससे पहले टीएमसी सांसद काकोली घोष ने हाल ही में पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दिया था। संदीपन साहा भी बैठक में नहीं आए थे टीएमसी के इस फैसले को राज्य की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है. हालांकि पार्टी की ओर से निष्कासन के पीछे आधिकारिक कारणों का विस्तृत विवरण अभी सामने नहीं आया है. बता दें कि संदीपन साहा भी उन साठ विधायकों में शामिल हैं जो ममता बनर्जी के कालीघाट आवास पर होने वाली बैठक में नहीं पहुंचे थे और बैठक को रद्द कर दिया गया था।  ममता बनर्जी के आवास पर होनी थी बैठक बता दें कि सोमवार को ममता बनर्जी ने कालीघाट स्थित अपने आवास पर सभी विधायकों की बैठक बुलाई थी, जिसमें ज्यादातर विधायक शामिल नहीं हुए. बताया जा रहा है कि करीब 60 विधायक इस मीटिंग में शामिल नहीं हुए, जिसके बाद बैठक को कैंसिल करना पड़ा. उधर TMC प्रवक्ता कुणाल घोष का दावा है कि ज्यादातर विधायकों ने फोन कर बता दिया था की मीटिंग में शामिल नहीं हो पाएंगे क्योंकि वो अपने इलाकों में हिंसा के विरोध में लड़ाई लड़ रहे हैं।  संदीपन साहा ने लगाए ये आरोप लेकिन इस मामले ने तब तूल पकड़ लिया जब TMC विधायक संदीपन साहा ने ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई बैठक में शामिल न होने की वजह सार्वजनिक रूप से बताई. संदीपन साहा उन करीब 60 विधायकों में शामिल थे, जिन्होंने मुख्यमंत्री के आवास पर आयोजित पूर्व निर्धारित बैठक में हिस्सा नहीं लिया था. मीडिया से बातचीत के दौरान साहा ने कहा कि विधानसभा में पार्टी नेता, उपनेता और मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) की नियुक्ति को लेकर पहले ही एक बैठक आयोजित की जा चुकी थी. उस बैठक में इस संबंध में प्रस्ताव भी पारित किया गया था. उनके अनुसार, बाद में यह मामला इसलिए जांच के दायरे में आया क्योंकि प्रस्ताव को विधानसभा में भेजने से पहले जरूरी प्रोसेस फॉलो नहीं की गई थी।  संदीपन साहा ने कहा कि जब एक बार इस विषय पर बैठक हो चुकी थी और प्रस्ताव भी पारित कर दिया गया था, तब दोबारा बैठक बुलाने की जरूरत को लेकर उनके मन में सवाल थे. उन्होंने पूछा कि क्या नई बैठक बुलाने से पहले सभी प्रक्रियाओं और नियमों की समीक्षा की गई थी या नहीं।  बैठक का कोई औचित्य नहीं था- संदीपन साहा टीएमसी विधायक ने कहा, "इस मुद्दे पर पहले ही बैठक हो चुकी थी. उस बैठक में तय किया गया था कि पार्टी नेता, उपनेता और चीफ व्हिप कौन होंगे. लेकिन बाद में यह सामने आया कि प्रस्ताव को विधानसभा में जमा करने की प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार नहीं अपनाई गई थी. इसके बाद मामले की जांच हुई. अब फिर से बैठक बुलाई गई. ऐसे में मेरे मन में सवाल था कि क्या इस बार सभी प्रक्रियाओं की समीक्षा कर ली गई है।  उन्होंने आगे कहा कि इन्हीं कारणों से उन्हें लगा कि बैठक में शामिल होने का कोई विशेष औचित्य नहीं है. इसलिए उन्होंने उसमें हिस्सा नहीं लिया. संदीपन साहा के बयान को टीएमसी के भीतर से सामने आई एक बड़ी असहमति के रूप में देखा जा रहा है. आमतौर पर पार्टी के विधायक सार्वजनिक मंचों पर संगठनात्मक निर्णयों या नेतृत्व की प्रक्रिया पर सवाल उठाने से बचते रहे हैं. ऐसे में साहा की टिप्पणी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गई है।  TMC विधायक अरूप राय भी हैं नाराज उधर, पूर्व मंत्री और सेंट्रल हावड़ा विधानसभा क्षेत्र से टीएमसी विधायक अरूप राय ने भी अपनी ही पार्टी के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है. उन्होंने कहा कि पार्टी के सांसद, विधायक और जमीनी स्तर के कार्यकर्ता लगातार हमलों का शिकार हो रहे हैं, लेकिन पार्टी नेतृत्व उनकी कोई सुध नहीं ले रहा है. यहां तक कि हाल ही में उनके घर पर हुए हमले के बाद भी पार्टी की ओर से किसी ने उन्हें फोन कर हालचाल तक नहीं पूछा।  गौरतलब है कि पिछले शनिवार को सेंट्रल हावड़ा के कासुंदिया फास्ट बाई लेन स्थित अरूप राय के आवास के बाहर भाजपा कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया था. उनके घर के सामने स्थित एक गोदाम से बड़ी मात्रा में सरकारी राहत सामग्री, जिनमें तिरपाल, कंबल, साड़ियां, धोती और अन्य सामान शामिल थे, बरामद होने का दावा किया गया था. इस घटना के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनके घर के सामने "चोर-चोर" के नारे लगाए थे।  इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अरूप राय ने अपने आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. उन्होंने कहा कि विधायक समीर पांजा पर हमला हुआ और उन्हें घर छोड़ना पड़ा. सांसद कल्याण बनर्जी पर भी हमला हुआ. इसके अलावा विभिन्न जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन पार्टी नेतृत्व पूरी तरह चुप है।  पार्टी की ओर से नहीं मिल रहा साथ और समर्थन उन्होंने आरोप लगाया कि प्रभावित नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी की ओर से कोई समर्थन नहीं मिल रहा है. शनिवार को उनके साथ हुई घटना के बाद भी पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता ने उनसे संपर्क नहीं किया. उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी पहले भी चुनाव हारी है, लेकिन उस समय कार्यकर्ता और नेता पूरे आत्मविश्वास के साथ राजनीति करते रहे, रैलियां और सभाएं आयोजित करते रहे. मगर वर्तमान जैसी स्थिति उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में पहले कभी नहीं देखी।  उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में वह पार्टी के आगामी कार्यक्रमों में शामिल होंगे या नहीं, इस पर अभी विचार कर रहे हैं. साथ ही उन्होंने घोषणा की कि शनिवार को हुई घटना को लेकर वह थाने में एफआईआर दर्ज कराएंगे। 

TMC में अंदरूनी संकट गहराया, बैठक में सिर्फ 20 विधायक पहुंचे, 60 रहे नदारद

कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में सबकुछ ठीक नहीं है। कई विधायक और सांसद नाराज बताए जा रहे हैं। इसको बल रविवार को तब और मिला, जब अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद ममता के घर होने वाली बैठक में 80 में से 60 विधायक पहुंचे ही नहीं। इससे हड़कंप मच गया। सूत्रों के अनुसार, ममता के घर पर रविवार को अहम बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें विधायकों को बुलाया गया था, लेकिन बैठक से 60 विधायक गायब रहे, जिससे उसे रद्द करना पड़ गया। हालांकि, बाद में पार्टी की ओर से सफाई पेश की गई कि अभिषेक और कल्याण बनर्जी पर हुए हमले के मामले में तमाम विधायक व्यस्त थे और यही वजह रही कि वे ममता की बैठक में नहीं पहुंचे। एनडीटीवी ने टीएमसी के सूत्रों के हवाले से बताया कि यह बैठक पार्टी के विधायक दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने ममता बनर्जी के घर पर बुलाई थी। काफी देर तक विधायकों का इंतजार किया गया, लेकिन जब वे नहीं पहुंचे तो आखिरकार बैठक ही रद्द करनी पड़ी। गैर-हाजिर रहे विधायकों से संपर्क भी नहीं हो पा रहा था। इसकी वजह से भी सवाल खड़े होने लगे हैं कि क्या टीएमसी में बड़ी फूट पड़ने वाली है। पिछले महीने हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। खुद भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी चुनाव हार गईं। भाजपा ने कुल 208 सीटें जीतीं, जबकि टीएमसी को महज 80 सीटों से संतोष करना पड़ा। इस हार के बाद से ही दबी जुबान में ममता बनर्जी का और टीएमसी की पूर्व सरकार का खुलकर विरोध होने लगा। खुद टीएमसी के कई सांसद और विधायक अपनी ही पार्टी की पूर्व सरकार के खिलाफ आ गए और उसके कई फैसलों का विरोध किया। छह मई को ममता बनर्जी ने हार को लेकर एक बैठक बुलाई, जिसमें लगभग 10 विधायक पहुंचे ही नहीं। सिर्फ 20 विधायक पहुंचे, गायब हुए 60 नेता हुए ‘नॉट रीचेबल’ टीएमसी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, यह महत्वपूर्ण बैठक विधायी दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय द्वारा ममता बनर्जी के कोलकाता स्थित आवास पर बुलाई गई थी. बैठक का मुख्य उद्देश्य चुनावों में मिली हार और अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद की स्थिति की समीक्षा करना था. लेकिन जब बैठक शुरू होने का समय आया, तो वहां केवल 20 विधायक ही मौजूद थे. सूत्रों ने बताया कि जो 60 विधायक बैठक से अनुपस्थित रहे, जब पार्टी नेतृत्व ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की, तो वे सभी पूरी तरह से ‘इनकम्युनिकेटो’ (संपर्क से बाहर) पाए गए।  इस महा-फियास्को पर पर्दा डालने के लिए टीएमसी के प्रवक्ता कुणाल घोष ने एक कमजोर स्पष्टीकरण देते हुए दावा किया कि जो विधायक बैठक में शामिल नहीं हो सके, वे दरअसल अभिषेक बनर्जी और वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए हमलों के बाद विभिन्न इलाकों में विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करने में व्यस्त थे. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में विधायकों का गायब होना महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि सुनियोजित दूरी है।  फिर्हाद हकीम और मदन मित्रा दीदी के साथ, लेकिन जमीन खिसकी कालीघाट में मचे इस आंतरिक हाहाकार के बीच टीएमसी नेतृत्व के लिए एकमात्र क्षणिक राहत की बात यह रही कि पार्टी के कुछ पुराने और दिग्गज क्षत्रप जैसे फिर्हाद हकीम, नयना बंदोपाध्याय, मदन मित्रा, आशिमा पात्रा और कुणाल घोष बैठक में मौजूद रहे. इन कद्दावर नेताओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि वे संकट की इस सबसे काली घड़ी में ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं।  लेकिन यह एकजुटता भी पार्टी के बिखराव को रोकने के लिए नाकाफी साबित हो रही है. यह आंतरिक विद्रोह ठीक उस समय सामने आया है जब महज 24 घंटे के भीतर सोनारपुर में पार्टी के सेकेंड-इन-कमांड अभिषेक बनर्जी को भीड़ द्वारा पीटा गया और हुगली के चंडीतला में वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी के सिर पर हमला किया गया. इन दोनों सिलसिलेवार हमलों को इस बात का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि वर्ष 2011 में वामपंथियों को उखाड़कर लगातार तीन बार बंगाल पर राज करने वाली टीएमसी की राजनीतिक जमीन और शासन पर से उसकी लोहे जैसी मजबूत पकड़ अब पूरी तरह ढीली हो चुकी है।  भवानीपुर में सुवेंदु से हार और काकोली घोष का इस्तीफा कभी खुद को अजेय समझने वाली तृणमूल कांग्रेस इस बार भाजपा के हाथों बेहद बुरी तरह चुनाव हार चुकी है, जो कुछ साल पहले तक राज्य में अपनी जमीन तलाश रही थी. इस शर्मनाक हार ने पार्टी के भीतर गंभीर अंतर्कलह और गुटबाजी को जन्म दे दिया है, जहां अब वरिष्ठ नेता खुलेआम ममता बनर्जी की चुनावी रणनीतियों पर सवाल उठा रहे हैं. सबसे बड़ा आघात तब लगा जब खुद ममता बनर्जी अपने सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के पोस्टर बॉय और वर्तमान मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से चुनाव हार गईं।  कैसे भड़की अंसतोष? असंतोष की इसी आग में घी डालते हुए पार्टी की वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तदार ने हाल ही में टीएमसी के कार्यकारी अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को एक बेहद गुस्से से भरी चिट्ठी भेजकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. अपनी चिट्ठी में उन्होंने ममता बनर्जी को आड़े हाथों लेते हुए पार्टी को ‘पुराने ढर्रे’ और जमीनी तौर-तरीकों पर वापस लौटने की नसीहत दी है।  कई अन्य टीएमसी नेताओं ने दबी जुबान में स्वीकार किया है कि पार्टी अपने मूल आधार यानी ‘मां, माटी, मानुष’ से पूरी तरह भटक चुकी है और ममता बनर्जी सहित शीर्ष नेतृत्व अब आम कार्यकर्ताओं के लिए पूरी तरह ‘इनएक्सेसिबल’ हो चुका है. हालांकि, पार्टी ने सार्वजनिक रूप से आलोचना करने वाले असंतुष्टों पर नकेल कसने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया है, लेकिन 60 विधायकों की यह खुली बगावत यह साफ बयां कर रही है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है और बंगाल की राजनीति में ममता राज का अंत बेहद करीब है।  हालांकि, पार्टी ने तब भी सफाई दी कि चिंता की कोई बात नहीं है और उन विधायकों ने पहले ही जानकारी दे दी थी। उन्हें उनके अपने क्षेत्रों में फैली अशांति के कारण वहीं रहने को कहा गया था। टीएमसी … Read more