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चुनावी झटके के बाद बदला राजनीतिक गणित, कांग्रेस के सहयोगी ही सरकार के लिए बने मददगार

नई दिल्ली लोकसभा में परिसीमन विधेयक पर झटका लगने के बाद केंद्र सरकार ने अब नई रणनीति के साथ वापसी की तैयारी शुरू कर दी है. हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति का गणित बदल दिया है और इसी बदले हुए समीकरण के बीच सरकार अपने दो बड़े ड्रीम प्रोजेक्ट परिसीमन (डिलिमिटेशन) और ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ बिल को आगे बढ़ाने में जुट गई है।  इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि संसद में पहले विपक्षी एकता की वजह से अटक गए परिसीमन बिल को अब नए स्वरूप में लाने की तैयारी चल रही है. गृह मंत्रालय इस संबंध में नए विधेयक पर काम कर रहा है. माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव परिणामों के बाद विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पहले जैसी नहीं रही, जिसका फायदा सरकार उठाना चाहती है।  बदले राजनीतिक हालात के बाद नई रणनीति दरअसल, जिस विपक्षी मोर्चे ने संसद में एकजुट होकर सरकार की राह रोकी थी, अब उसी खेमे में दरार की चर्चाएं तेज हैं. बीजेपी की नजर खास तौर पर डीएमके और टीएमसी की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर है. पार्टी को उम्मीद है कि कुछ क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर भले विपक्ष के साथ रहें, लेकिन विशेष मुद्दों पर सरकार का समर्थन कर सकते हैं।  सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हालिया विधानसभा चुनावों के बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. इन चुनावों में विपक्षी दलों को लगे झटकों के बाद बीजेपी अब क्षेत्रीय दलों के साथ नए सिरे से बातचीत की कोशिश कर रही है. पार्टी का मानना है कि संसद में कुछ मुद्दों पर समर्थन जुटाने के लिए नए राजनीतिक समीकरण बनाए जा सकते हैं।  बीजेपी की नजर खास तौर पर तमिलनाडु की राजनीति पर है. सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने डीएमके के साथ भी संपर्क साधा है और ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ विधेयक के मौजूदा मसौदे में बदलाव के संकेत दिए हैं, ताकि दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर किया जा सके।  डीएमके ने रखी अपनी शर्तें डीएमके के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी का रुख हमेशा तमिलनाडु के हितों को ध्यान में रखकर तय होता है. पार्टी का मानना है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनकी संसदीय हिस्सेदारी कम नहीं होनी चाहिए।  इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, डीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अगर केंद्र सरकार यह भरोसा दिलाती है कि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित नहीं होगा और संसद में उनकी आवाज कमजोर नहीं पड़ेगी, तो प्रस्तावों पर विचार किया जा सकता है. हालांकि उन्होंने बीजेपी के साथ किसी राजनीतिक गठजोड़ की संभावना को फिलहाल समय से पहले बताया।  वन नेशन-वन इलेक्शन पर भी काम जारी उधर, ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ विधेयक पर भी काम तेजी से आगे बढ़ रहा है. फिलहाल यह प्रस्ताव 39 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास है. समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी का कहना है कि रिपोर्ट पर तेजी से काम हो रहा है और निर्धारित समय के भीतर इसे संसद को सौंप दिया जाएगा।  बीजेपी नेताओं का मानना है कि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था चरणबद्ध तरीके से लागू की जा सकती है. इसके तहत विभिन्न राज्यों की विधानसभा चुनाव समयसारिणी को धीरे-धीरे लोकसभा चुनावों के साथ समायोजित किया जा सकता है।  विपक्ष ने उठाए सवाल उधर कांग्रेस ने साफ किया है कि परिसीमन जैसे संवैधानिक महत्व के मुद्दे पर सरकार को सभी दलों से व्यापक चर्चा करनी चाहिए. पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि सरकार को पहले सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए और अपने प्रस्ताव लिखित रूप में सामने रखने चाहिए।  कांग्रेस का आरोप है कि पिछली बार सरकार ने कुछ क्षेत्रीय दलों से अनौपचारिक बातचीत तो की, लेकिन मुख्य विपक्षी दलों को विश्वास में नहीं लिया. पार्टी का कहना है कि संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण मामलों में जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए।  बंगाल की राजनीति पर भी नजर सूत्रों के अनुसार बीजेपी पश्चिम बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियों पर भी करीबी नजर बनाए हुए है. पार्टी नेताओं का मानना है कि बंगाल चुनाव रिजल्ट के बाद टीएमसी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि और आंतरिक मतभेद भविष्य में संसद के भीतर नए राजनीतिक समीकरण पैदा कर सकते हैं।  हालांकि ममता बनर्जी लगातार बीजेपी पर राजनीतिक दबाव और प्रताड़ना के आरोप लगाती रही हैं. उनका कहना है कि उनकी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन टीएमसी इससे डरने वाली नहीं है।  बड़ा सियासी मुद्दा बन सकते हैं दोनों बिल राजनीतिक जानकारों का मानना है कि परिसीमन और ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ दोनों ही मुद्दे आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रह सकते हैं. एक ओर केंद्र सरकार इन्हें प्रशासनिक सुधार और चुनावी खर्च कम करने से जोड़ रही है, वहीं विपक्षी दल इन्हें संघीय ढांचे और राज्यों के प्रतिनिधित्व से जुड़े संवेदनशील मुद्दे के रूप में देख रहे हैं. ऐसे में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले इन दोनों प्रस्तावों पर देशभर में व्यापक राजनीतिक बहस देखने को मिल सकती है।   

अंडे-पत्थर फेंकने की घटना पर विवाद, सोनारपुर हमले की जांच में जुटी पुलिस

पश्चिम बंगाल पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले को लेकर सियासत गर्म हो गई है. एक तरफ टीएमसी इसे बीजेपी का सुनियोजित हमला बता रही है, तो दूसरी तरफ बीजेपी ने पलटवार करते हुए इसे टीएमसी के अंदरूनी गुटबाजी का नतीजा बताया है. आरोप-प्रत्यारोप के बीच पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया है और जांच जारी है. दरअसल, शनिवार को अभिषेक बनर्जी दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर में चुनाव बाद हिंसा में मारे गए एक टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुंचे थे. इसी दौरान रास्ते में कुछ लोगों ने उनके काफिले को रोक लिया. उन पर अंडे और पत्थर फेंके गए. मौके पर मौजूद लोगों ने 'चोर-चोर' के नारे भी लगाए. हालात बिगड़ते देख सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें सुरक्षा घेरे में लिया. इस दौरान अभिषेक क्रिकेट हेलमेट पहने भी नजर आए. घटना के बाद अभिषेक बनर्जी ने आरोप लगाया कि बीजेपी कार्यकर्ता उन्हें जान से मारने की कोशिश कर रहे थे. हालांकि बीजेपी ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया. TMC ने BJP पर लगाया सुनियोजित हमले का आरोप घटना के तुरंत बाद टीएमसी ने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर साझा की. पार्टी का दावा है कि बीजेपी के मंडल अध्यक्ष अभिजीत बिस्वास खुद मौके पर मौजूद रहकर भीड़ को उकसा रहे थे. टीएमसी ने यह सवाल उठाया कि अगर यह जनता का स्वाभाविक गुस्सा था, तो फिर इतनी भीड़ किसने जुटाई? यह हमला आखिर किसके इशारे पर हुआ? पार्टी ने बाद में एक और तस्वीर जारी करते हुए आकाश गयान नाम के एक शख्स को हमलावर बताया. टीएमसी का दावा है कि वह बीजेपी से जुड़ा कार्यकर्ता है. पार्टी ने सोशल मीडिया गतिविधियों का हवाला देते हुए बीजेपी पर हमला करवाने का आरोप दोहराया. BJP का पलटवार, बोली- यह अंदरूनी गुटबाजी का नतीजा बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने टीएमसी के आरोपों को खारिज किया. उन्होंने दावा किया कि इस मामले में गिरफ्तार किए गए लोग पहले टीएमसी की पूर्व विधायक लवली मैत्रा के करीबी रहे हैं. मालवीय ने सवाल उठाया कि कहीं यह टीएमसी की अंदरूनी खींचतान का मामला तो नहीं. वहीं, बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समीक भट्टाचार्य ने कहा कि उनकी पार्टी का इस घटना से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं स्वस्थ समाज के लिए ठीक नहीं हैं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि यह कई सालों से परेशान स्थानीय लोगों के गुस्से का नतीजा हो सकता है. पुलिस क्या कह रही है? पुलिस के मुताबिक, घटना के बाद रातभर छापेमारी की गई और वीडियो फुटेज के आधार पर कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है. अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच जारी है. अब तक न तो अभिषेक बनर्जी और न ही टीएमसी की तरफ से कोई औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई थी. पुलिस ने अपने स्तर पर मामला दर्ज कर कार्रवाई शुरू की है.

अभिषेक बनर्जी पर हमले की जांच तेज, वीडियो के आधार पर 5 लोग गिरफ्तार

  पश्चिम बंगाल पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में अभिषेक बनर्जी के ऊपर हुए हमले के मामले में नया मोड़ आ गया है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद के ऊपर हमले के आरोप में गिरफ्तार किए गए पांच लोग टीएमसी की पूर्व विधायक और इस बार प्रत्याशी रहीं लवली मैत्रा के करीबी हैं। लवली मैत्रा 2021 विधानसभा चुनाव में सोनारपुर दक्षिण से सीट से जीतकर आई थीं। इस बार भी तृणमूल कांग्रेस ने उन पर भरोसा जताया था, लेकिन वह भाजपा की रूपा गांगुली के सामने हार गईं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, बंगाल पुलिस ने बनर्जी के ऊपर हुए हमले के वीडियो के आधार पर पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान तपन मैती, निर्मल्य सेनगुप्ता उर्फ जॉय, काजल दास, देबासिस दत्ता और आकाश गायन के गयान के रूप में हुई है। सूत्रों के मुताबिक निर्मल्य और तपन को टीएमसी की पूर्व विधायक और अंतिम विधानसभा चुनाव में रूपा गांगुली से चुनाव हारने वाली लवली मैत्रा के करीबी हैं। इसके अलावा पुलिस ने काजल दास और देबासिस दत्ता के तार भी टीएमसी की पूर्व विधायक के जुड़े बताए जा रहे हैं। अभिषेक बनर्जी पर हमला करने का कोई कारण नहीं: हमलावर की मां इन सब में सबसे बड़ा नाम आकाश गयान का है। उसके परिवार के मुताबिक उनका बेटा टीएमसी का नियमित कार्यकर्ता था और वह इस चुनाव में लगातार टीएमसी की बूथ लेवल मीटिंग्स में जाता रहता था। आकाश की मां के मुताबिक, शनिवार दोपहर की घटना के बाद वह हमेशा की तरह ही घर आया और खाना खाकर मैदान में फुटबॉल खेलने के लिए चला गया। इसके बाद रात में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, पुलिस ने अभी तक परिवार को आकाश की गिरफ्तारी का कोई कारण नहीं बताया। बता दें, शनिवार को टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी चुनावी हिंसा में मारे गए कार्यकर्ता के घर जा रहे थे। इसी दौरान उन पर हमला हो गया था। उनके ऊपर अंडे और पत्थर फेंके गए। साथ में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने हेलमेट पहना कर उन्हें बचाने की कोशिश की लेकिन इसके बाद भी कुछ लोगों ने उन्हें खींच लिया और उनके साथ मारपीट की। इस झूमा झटकी में बनर्जी की शर्ट भी फट गई। इसके बाद भी वह कार्यकर्ता के घर पहुंचे और उसके परिवार के साथ वक्त निकाला। अभिषेक बनर्जी समेत टीएमसी के तमाम नेताओं ने इस घटना का आरोप भाजपा के ऊपर लगाया। दूसरी तरफ भाजपा ने पलटवार करते हुए इसे लोगों के 15 साल गुस्से का नतीजा बताया। हालांकि, अब शुरुआती जांच में अलग ही कहानी निकलकर सामने आ रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अभिषेक बनर्जी जैसे दिग्गज नेता के ऊपर हमले के आरोप टीएमसी के पूर्व कार्यकर्ताओं के ऊपर ही लग रहे हैं ऐसे में तृणमूल कांग्रेस के अंदर ही असंतोष की बात एक बार फिर से सामने आ रही है। हालांकि, अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि अभिषेक पर हमला करने के पीछे की क्या वजह थी।

‘हम इसका ख्याल रखेंगे’ अस्पताल CEO को ममता की कथित चेतावनी वायरल, भाजपा ने घेरा

कोलकाता तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के मामले में राजनीति तेज होती जा रही है। अभिषेक को कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराए जाने के दौरान ममता बनर्जी का हॉस्पिटल सीईओ को धमकाते हुए एक ऑडियो क्लिप वायरल हो रहा है। इस क्लिप के वायरल होते ही राजनीति तेज हो गई है। वायरल रिकॉर्डिंग में, ममता बनर्जी कथित तौर पर बेले व्यू अस्पताल के सीईओ प्रदीप टंडन पर जमकर बरस रही हैं,उन पर गलत काम करने का आरोप लगा रही हैं और उन्हें अंजाम भुगतने की चेतावनी दे रही हैं। दक्षिण 24 परगना के सोनारपुर में अभिषेक पर हुए हमले के बाद उन्हें बेले व्यू हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। ममता का आरोप है कि हॉस्पिटल ने अभिषेक की चोटों को कम करके दिखाया। इतना ही नहीं सरकार के निर्देश पर उन्होंने अभिषेक बनर्जी को भर्ती करने से भी इनकार कर दिया। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक वायरल ऑडियो क्लिप में ममता बनर्जी को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “माफ कीजिए मिस्टर टंडन, आपने गलत काम किया है।” ममता बनर्जी आगे कहती हैं, "याद रखिए कि हमने आपकी कितनी मदद की है। भगवान आपको माफ नहीं करेंगे। आप लोगों को गुमराह कर रहे हैं। आपको शर्म आनी चाहिए। हर कोई आपके अहंकार को याद रखेगा। आप अस्पताल चला रहे हैं और भाजपा सत्ता में है। कल, अगर केंद्र सरकार नहीं रही, तो हम इसका ख्याल रखेंगे।" गौरतलब है कि ममता बनर्जी का यह वीडियो ऐसे समय में लीक हुआ है, जब बंगाल के भाईपो (बंगाली में भतीजा) पर सोनारपुर में हमला हुआ था। चुनावी हिंसा में मारे गए तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता के परिवार वालों से मिलने के लिए पहुंचे अभिषेक के सामने लोगों ने चोर-चोर के नारे लगाए। इसके बाद उन पर अंडे और पत्थर फेंके गए। सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी में ही अभिषेक के साथ मारपीट कर दी गई। इतना ही नहीं उनकी शर्ट को भी फाड़ डाला गया। सोशल मीडिया पर इस घटना से जुड़े कई वीडियो सामने आए हैं, जिनमें अभिषेक के सुरक्षाकर्मी उन्हें हेलमेट पहनाकर सुरक्षित निकालते हुए दिख रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम के बाद अभिषेक बनर्जी ने हमले का आरोप भारतीय जनता पार्टी के ऊपर लगाया। उन्होंने कहा, "यह सब भाजपा की किया हआ है। यह इनका लोकतंत्र है। अभी सत्ता में आए 6 महीने नहीं हुए हैं। यह कानून व्यवस्था है। मेरी सुरक्षा में तैनात कर्मियों ने घटनाक्रम से पहले ही अपने अधिकारियों को सूचित कर दिया था लेकिन इसके बाद भी कोई अतिरिक्त फोर्स नहीं भेजी गई।" इस घटना के बाद अभिषेक कार्यकर्ता के घर गए और फिर वहां से उन्हें कोलकाता के अपोलो हॉस्पिटल ले जाया गया। वहां से उन्हें बैले व्यू हॉस्पिटल शिफ्ट कर दिया गया। यहां पर पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सामने आईं और उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और एक पुलिस अधिकारी ने अस्पताल को फोन करके अभिषेक को जल्द से जल्द डिस्चार्ज करने के लिए दबाव डाला है। ममता ने कहा कि अभिषेक की चोटें गंभीर हैं, लेकिन इसके बाद भी उन्हें भर्ती नहीं करने दिया गया। बता दें, इस मामले में बंगाल पुलिस ने अभी तक पांच लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस के मुताबिक घटना के दौरान के वीडियो और लोगों से पूछताछ के आधार पर 5 संदिग्ध लोगों को अभिषेक बनर्जी पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। फिलहाल इस मामले की जांच की जा रही है।

मुख्यमंत्री बदलने की अटकलें तेज, 3 जून को DK शिवकुमार की ताजपोशी और कैबिनेट फेरबदल संभव

बेंगलुरु  कर्नाटक में चल रही सियासी उथल-पुथल के बीच बड़ा अपडेट सामने आया है। सूत्रों का कहना है कि डीके शिवकुमार 3 जून यानी बुधवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। उनके साथ 10 अन्य मंत्री भी शपथ ले सकते हैं। इसके बाद 18 जून के बाद कैबिनेट का विस्तार किया जा सकता है। राज्यसभा चुनाव होने के बाद कर्नाटक में कैबिनेट विस्तार की संभावना है। कैबिनेट में भी बड़ा फेरबदल राज्य सरकार में चल रहे नेतृत्व परिवर्तन के बीच पार्टी नेतृत्व शनिवार को होने वाली कांग्रेस विधायक दल (CLP) की एक महत्वपूर्ण बैठक की तैयारी कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि डीके शिवकुमार की कैबिनेट में 50 फीसदी नए चेहरे हो कते हैं कर्नाटक विधान परिषद के चीफ विप सलीम अहमद ने शुक्रवार को कहा कि कैबिनेट के गठन, क्षेत्रीय एवं सामाजिक (जातीय) प्रतिनिधित्व और संभावित उप-मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति के संबंध में अंतिम निर्णय सीएलपी बैठक के बाद कांग्रेस आलाकमान की ओर से लिया जाएगा। शाम तक हो सकती है औपचारिक घोषणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला इस बैठक में शामिल होने वाल हैं। शाम तक मुख्यमंत्री के नाम की औपचारिक घोषणा भी हो सकती है। इसके बाद शपथ ग्रहण की तारीख का भी ऐलान किया जा सकता है। बता दें कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के कांग्रेस आलाकमान के निर्देशों के बाद अपना इस्तीफा सौंप दिया है और राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने शुक्रवार को इस्तीफा स्वीकार कर लिया। कम नहीं होगा सिद्धारमैया का दबदबा राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधायकों, पिछड़ा वर्ग समूहों और जमीनी कार्यकर्ताओं पर श्री सिद्दारमैया की मजबूत पकड़ सत्ता के औपचारिक हस्तांतरण के बाद भी राज्य कांग्रेस की दिशा तय करती रहेगी। कांग्रेस आलाकमान सिद्दारमैया के प्रभावशाली 'अहिंडा' सामाजिक गठबंधन (जिसमें अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित शामिल हैं) को छेड़ने से बच रहा है। यह गठबंधन कर्नाटक में पार्टी की चुनावी सफलता का मुख्य केंद्र रहा है। राज्यसभा का ऑफर क्यों नकारा? राज्यसभा की भूमिका स्वीकार करने के बजाय कर्नाटक की राजनीति में ही सक्रिय रहने का सिद्दारमैया का फैसला साफ संकेत देता है कि वे राज्य के राजनीतिक मामलों में अपना सीधा प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं। कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब दो शक्ति केंद्रों के बीच संतुलन बनाने का कठिन काम है – सरकार पर शिवकुमार का नियंत्रण और पार्टी के सामाजिक व संगठनात्मक आधार पर सिद्दारमैया का प्रभाव। इसके अलावा, कांग्रेस के रणनीतिकारों को डर है कि इस नेतृत्व परिवर्तन से पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों का समर्थन कमजोर हो सकता है, क्योंकि ये वर्ग वर्षों से सिद्दारमैया के साथ मजबूती से जुड़े रहे हैं। सीएम बनने के बाद शुरू होगी असली चुनौती जानकारों का मानना है कि डीके शिवकुमार की असली परीक्षा पद संभालने के बाद शुरू हो सकती है, जहां उन्हें प्रशासनिक नियंत्रण सुनिश्चित करना होगा और साथ ही सिद्दारमैया के खेमे को कर्नाटक कांग्रेस के भीतर एक समानांतर राजनीतिक व्यवस्था के रूप में विकसित होने से रोकना होगा।

MP राज्यसभा चुनाव में बड़ा सस्पेंस, कमलनाथ या किसी बाहरी चेहरे पर दांव लगाएगी कांग्रेस?

भोपाल  मध्य प्रदेश में 18 जून को राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव हैं। कांग्रेस के खाते में एक सीट जा रही है। यह सीट दिग्विजय सिंह की है। दिग्विजय सिंह पहले ही राज्यसभा जाने से मना कर चुके हैं। ऐसे में अटकलें हैं कि पूर्व सीएम कमलनाथ को राज्यसभा भेजा सकता है। बुधवार को नई दिल्ली में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की है। इसके बाद चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। राज्यसभा की तीन सीटें हो रही हैं खाली मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनमें दो सीटें बीजेपी की हैं। जनवरी में पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ने घोषणा की थी कि वह मध्य प्रदेश से जून में होने वाले राज्यसभा चुनावों के लिए कांग्रेस की एकमात्र सीट खाली कर देंगे। उम्मीदवारों की है लंबी सूची प्रदेश कांग्रेस सूत्रों के अनुसार जून में होने वाले राज्यसभा चुनावों के लिए एआईसीसी के पास उम्मीदवारों की एक लंबी सूची है। इस सूची में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पवन खेड़ा, पूर्व राज्यसभा सांसद बी के हरिप्रसाद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत सहित कई अन्य नाम शामिल हैं। कांग्रेस की आएंगी पांच सीटें वहीं, इस रेस में कमलनाथ का नाम शामिल होता है तो इससे चयन प्रक्रिया आसान नहीं होगी, क्योंकि राज्यसभा की कुल 26 सीटें खाली होने के बावजूद कांग्रेस के हिस्से में केवल पांच सीटें ही आएंगी। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की एक सीट खाली हो रही है। ऐसे में यह काफी महत्वपूर्ण है। कांग्रेस में नहीं मिला कोई पद दरअसल, 2022-23 में कमलनाथ को कथित रूप से एआईसीसी अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव मिला था। 2024 में कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ को बीजेपी में जाने की चर्चा हुई थी। इसके बाद से कांग्रेस में उन्हें कोई पद नहीं मिला है। कमलनाथ छिंदवाड़ा से सांसद रह चुके हैं। अपनी सीट उन्होंने बेटे के लिए छोड़ दी थी लेकिन 2024 में नकुलनाथ चुनाव हार गए। माना जा रहा है प्रबल दावेदार वहीं, दिग्विजय सिंह के बाद मध्य प्रदेश के कमलनाथ ही कांग्रेस में ऐसे कद्दावर नेता हैं, जिनके नाम पर उम्मीद की जा सकती है कि क्रॉस वोटिंग न हो। इसी साल मार्च में हुए राज्यसभा चुनावों में हरियाणा और ओडिशा में कांग्रेस के लिए क्रॉस-वोटिंग एक बड़ी समस्या बनकर उभरी थी। प्रदेश कांग्रेस के पदाधिकारियों का दावा है कि कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के अलावा किसी अन्य उम्मीदवार को शायद ही 61 विधायकों का समर्थन मिल पाए। दो विधायक हैं वोट से वंचित मध्य प्रदेश में कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता खत्म हो गई है। विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा को वोटिंग का अधिकार नहीं है। तीसरी एमलए निर्मला सप्रे के खिलाफ हाईकोर्ट में दल बदल का मामला लंबित है। ऐसे में हो सकता है कि वह भी वोट न दें। एमपी से राज्यसभा की एक सीट पर जीत के लिए 58 विधायकों की जरूरत है। कांग्रेस के पास इस आंकड़े से सिर्फ तीन वोट अधिक हैं। इसलिए स्थिति नाजुक है। बीजेपी के पास हैं 165 विधायक वहीं, मध्य प्रदेश में बीजेपी के पास 165 विधायक हैं। ऐसे में दो सीटों पर उनकी जीत पक्की है। इसके बाद उनके पास 49 विधायक बचते हैं। राज्य बीजेपी के एक वरिष्ठ प्रवक्ता ने कहा कि अगर कांग्रेस के अंदर गुटबाजी होती है तो बीजेपी तीसरी सीट पर चुनाव करवाने का मौका भुनाने से पीछे नहीं हटेगी।

ममता बनर्जी को बड़ा झटका! अपने बूथ पर ही पिछड़े TMC नेता, EC रिपोर्ट ने खोली पोल

कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल कर ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कई मजबूत किलों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) द्वारा जारी बूथ स्तर के आंकड़ों से पता चलता है कि टीएमसी के प्रमुख 36 नेताओं में से केवल 14 नेता ही अपनी सीट बचा पाए हैं। टीएमसी 22 दिग्गज नेताओं को करारी हार का सामना करना पड़ा है। हैरान करने वाली बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी समेत कई मौजूदा मंत्रियों को अपने ही घरेलू वॉर्डों और उन सीटों पर शिकस्त झेलनी पड़ी है, जिन्हें कभी टीएमसी का अभेद्य गढ़ माना जाता था। 16 वरिष्ठ टीएमसी नेता अपनी सीटों के महज एक-तिहाई या उससे भी कम पोलिंग बूथों पर जीत दर्ज कर सके। भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी का दबदबा भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी ने 2021 के उपचुनाव में बड़ी जीत हासिल की थी। वहां इस बार भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने उन्हें करारी शिकस्त दी। यह लगातार दूसरा विधानसभा चुनाव है जब शुभेंदु ने ममता बनर्जी को पराजित किया है। भवानीपुर के कुल 270 पोलिंग बूथों में से ममता बनर्जी केवल 62 बूथों पर ही बढ़त बना सकीं। ममता बनर्जी ने अपने घरेलू पोलिंग स्टेशन बूथ संख्या 207 पर 63.33% वोट शेयर के साथ जीत जरूर दर्ज की, लेकिन वह पूरी सीट बचाने के लिए नाकाफी रहा। ममता केवल 54 बूथों पर 50% से अधिक वोट हासिल कर पाईं। शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के 197 बूथों पर 50% से अधिक वोट शेयर के साथ एकतरफा जीत हासिल की, जिसमें 44 बूथ ऐसे थे जहां उन्हें 80% से अधिक वोट मिले। 3 मंत्रियों को नहीं मिला 15% बूथों पर भी समर्थन टीएमसी के चार प्रमुख चेहरे और मंत्री सुजीत बोस, ब्रात्य बसु, चंद्रिमा भट्टाचार्य और प्रदीप मजूमदार अपनी सीटों के कुल पोलिंग बूथों में से 15% बूथों पर भी जीत हासिल नहीं कर सके। इन चारों ही मंत्रियों को भाजपा उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से हराया। केवल तीन टीएमसी मंत्री मोहम्मद गुलाम रब्बानी, अखरुज्जमां और सबीना यास्मिन ही ऐसे रहे जिन्होंने अपनी सीटों के 80% से अधिक पोलिंग बूथों पर शानदार जीत दर्ज की। अपने ही घर में घिरे नेता आंकड़ों के मुताबिक, इन 36 प्रमुख नेताओं में से 25 नेता उसी निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में रजिस्टर्ड थे, जहां से वे चुनाव लड़ रहे थे। इन 25 नेताओं में से केवल 9 नेता अपने घरेलू पोलिंग बूथ पर जीत दर्ज कर सके, जिनमें से 6 अंततः अपनी पूरी सीट हार गए और केवल 3 को ही अंतिम जीत मिली। कुल मिलाकर, अपने घरेलू बूथ पर जीतने वाले 16 वरिष्ठ टीएमसी नेताओं में से सिर्फ 6 ही अपनी विधानसभा सीट जीत पाए। भाजपा की रणनीति रही सफल आंकड़े बताते हैं कि टीएमसी के दिग्गजों को बेदखल करने के लिए भाजपा ने बेहद रणनीतिक जीत दर्ज की। जिन 22 सीटों पर टीएमसी के बड़े नेता हारे उनमें से 15 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा ने कुल बूथों के 30% से भी कम हिस्से पर 50% से अधिक वोट शेयर हासिल किया था, फिर भी वे सीट जीतने में कामयाब रहे। भाजपा के सौरव सिकदार ने पूर्व वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य को हरा दिया, जबकि सिकदार केवल 3.78% बूथों पर ही 50% से अधिक वोट शेयर हासिल कर पाए थे। जीत का बड़ा अंतर जिन 22 सीटों पर टीएमसी के दिग्गज हारे, उनमें से 16 सीटों पर आधे से अधिक पोलिंग बूथों में भाजपा उम्मीदवार और टीएमसी उम्मीदवार के बीच 10 प्रतिशत से अधिक वोटों का फासला था। दूसरी तरफ, टीएमसी के जो 14 प्रमुख नेता चुनाव जीते हैं उनमें पूर्व विधानसभा अध्यक्ष चंद्रनाथ सिन्हा (बोलपुर) और पुलक रॉय (उलूबेरिया दक्षिण) शामिल हैं। ये दोनों नेता अपनी सीटों के आधे से अधिक बूथों पर भाजपा से 10% से अधिक वोटों से पिछड़ने के बावजूद अंतिम रूप से सीट जीतने में सफल रहे। टीएमसी के लिए सबसे एकतरफा और बड़ी जीत गोलपोखर में मोहम्मद गुलाम रब्बानी और सुजापुर में सबीना यास्मिन की सीटों पर दर्ज की गई।

सिद्धारमैया के बेटे की कैबिनेट एंट्री के संकेत, कांग्रेस में चार डिप्टी CM मॉडल पर चर्चा

बेंगलुरु  मुख्यमंत्री सिद्दरमैया के इस्तीफे के बाद से कर्नाटक की राजनीति में बड़ा उलफेर देखने को मिल रहा है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक में डीके शिवकुमार के नेतृत्व में बनने जा रही नई सरकार में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने के लिए चार डिप्टी सीएम बनाए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार आज दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मिलकर राज्य मंत्रिमंडल में फेरबदल पर चर्चा करेंगे। जिसमें चार डिप्टी सीएम को लेकर भी मंथन होगा। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कर्नाटक के पूर्व सीएम सिद्दरमैया, डीके शिवकुमार और AICC के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ चर्चा करेंगे। सूत्रों ने बताया कि इस बैठक के दौरान राज्यसभा उम्मीदवारों, MLC उम्मीदवारों और मंत्रिमंडल में फेरबदल पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाएगा। चार डिप्टी सीएम बनाने की संभावना सूत्रों ने आगे बताया कि सिद्दरमैया के मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों को डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में जगह मिलने की संभावना कम है। पार्टी सूत्रों ने संकेत दिया कि सरकार में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए चार उपमुख्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। सिद्दरमैया के बेटे को मिल सकती है अहम जिम्मेदारी सूत्रों के अनुसार, सिद्दरमैया के बेटे और विधान परिषद के सदस्य यतींद्र को डीके शिवकुमार की कैबिनेट में शामिल किए जाने की पूरी उम्मीद है। उन्हें कोई अहम मंत्रालय मिलने की संभावना है, ताकि सिद्दरमैया की विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश दिया जा सके। कांग्रेस विधायक दल की बैठक की तारीख आज तय की जाएगी जो कि अब महज एक औपचारिकता ही लगती है। इसके बाद, कर्नाटक के मुख्यमंत्री के तौर पर डीके शिवकुमार के शपथ ग्रहण समारोह की तारीख तय की जाएगी। कर्नाटक की चार राज्यसभा सीटों पर होने हैं चुनाव कर्नाटक में राज्यसभा की जिन चार सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें से कांग्रेस दो सीटें आसानी से जीतती दिख रही है। तीसरी सीट पर भी उसे बढ़त हासिल है, जिसके लिए उसे बस कुछ और वोटों की जरूरत है। सूत्रों ने बताया कि AICC के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला तीन में से दो राज्यसभा सीटों के लिए नामों का पैनल पेश करेंगे, और खड़गे को राज्यसभा में दोबारा मौका दिया जाएगा। इसके अलावा, राज्य में विधान परिषद (MLC) की सात सीटों पर होने वाले चुनावों के लिए भी संभावित नामों का एक पैनल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सौंपा जाएगा। राज्यपाल ने स्वीकार किया इस्तीफा कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने बीते गुरुवार अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने गुरुवार दोपहर तीन बजे लोकभवन जाकर अपना इस्तीफा सौंप दिया, लेकिन राज्यपाल की अनुपस्थिति के कारण उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ था। आज राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सिद्दरमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। राज्यपाला ने इस्तीफा स्वीकार करते हुए लिखा, "मैं थावरचंद गहलोत भारत के संविधान के अनुच्छेद 164(1) के तहत कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है और उनके नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है।" 

कांटों का ताज पहनेंगे डीके शिवकुमार? अगले 24 महीने तय करेंगे कांग्रेस का भविष्य

बेंगलुरु कर्नाटक की राजनीति में सत्ता परिवर्तन सिर्फ चेहरा बदलने की कहानी नहीं है, यह कांग्रेस के भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है. सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने जा रही है. लेकिन यह ताज फूलों का नहीं बल्कि कांटों का माना जा रहा है. कांग्रेस हाईकमान ने यह फैसला ऐसे वक्त में लिया है, जब पार्टी दक्षिण भारत में अपनी सबसे मजबूत सरकार को किसी भी कीमत पर बचाए रखना चाहती है. राहुल गांधी की रणनीति साफ है. कर्नाटक को 2028 चुनाव तक कांग्रेस का मॉडल राज्य बनाना है. लेकिन मुश्किल यह है कि पिछले चार दशक में यहां कोई भी सत्ताधारी दल लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी नहीं कर पाया है. ऐसे में शिवकुमार के सामने सिर्फ सरकार चलाने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि उन्हें इतिहास बदलने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी. यही वजह है कि दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक इस बदलाव को कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक दांव माना जा रहा है।  डीके शिवकुमार को संगठन का मजबूत खिलाड़ी माना जाता है. संकट के समय विधायकों को संभालने से लेकर पार्टी को टूटने से बचाने तक उन्होंने कई बार अपनी उपयोगिता साबित की है. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे. अब उन्हें विपक्ष के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के भीतर असंतोष को भी साधना होगा. सिद्धारमैया भले ही कुर्सी छोड़ चुके हों, लेकिन उन्होंने राज्यसभा जाने से इनकार कर यह संकेत दे दिया है कि वह अभी भी कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. इसका मतलब साफ है कि शिवकुमार को हर फैसले में राजनीतिक संतुलन बनाकर चलना होगा. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता यह भी है कि अगर जातीय समीकरण बिगड़े तो भाजपा और जेडीएस इसका बड़ा फायदा उठा सकते हैं।  40 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ने की चुनौती     कर्नाटक में पिछले 40 सालों से कोई भी सरकार लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में नहीं लौटी है. कांग्रेस चाहती है कि डीके शिवकुमार इस मिथक को तोड़ें. पार्टी का मानना है कि उनकी आक्रामक शैली और संगठन पर पकड़ आगामी चुनावों में फायदा दिला सकती है. लेकिन यह राह आसान नहीं होगी, क्योंकि सत्ता विरोधी लहर को रोकना सबसे मुश्किल काम माना जाता है।      सिद्धारमैया के हटने से कुरुबा समुदाय में नाराजगी की संभावना जताई जा रही है. कांग्रेस इसे संतुलित करने के लिए उनके बेटे यतींद्र को बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है. दूसरी ओर, वोक्कालिगा समुदाय में डीके शिवकुमार की मजबूत पकड़ पार्टी के लिए बड़ा राजनीतिक लाभ बन सकती है. कांग्रेस को उम्मीद है कि जेडीएस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे उसकी तरफ शिफ्ट होगा।      राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवकुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘फाइटर’ वाली छवि है. वह जमीनी नेता माने जाते हैं और गांधी परिवार के बेहद करीबी भी हैं. यही कारण है कि राहुल गांधी उन्हें भविष्य के बड़े चेहरे के रूप में देख रहे हैं. हालांकि भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित खींचतान को मुद्दा बनाना शुरू कर चुकी है।  सिद्धारमैया की मौजूदगी बनेगी दबाव? सिद्धारमैया का दिल्ली राजनीति से दूरी बनाना कई संकेत देता है. वह बेंगलुरु में रहकर अपनी राजनीतिक पकड़ कमजोर नहीं होने देना चाहते. इससे डीके शिवकुमार पर लगातार दबाव बना रहेगा. कांग्रेस नेतृत्व भले इसे सहज परिवर्तन बता रहा हो, लेकिन अंदरखाने दोनों खेमों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।  डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी? डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2028 विधानसभा चुनाव से पहले एंटी-इंकंबेंसी को नियंत्रित करना होगी. कर्नाटक में पिछले चार दशक से कोई भी सरकार दोबारा सत्ता में नहीं लौटी है. ऐसे में उन्हें विकास, संगठन और जातीय संतुलन तीनों मोर्चों पर सफल होना पड़ेगा. अगर सरकार के खिलाफ माहौल बनता है तो इसका सीधा असर कांग्रेस के राष्ट्रीय अभियान पर भी पड़ेगा।  सिद्धारमैया का सक्रिय रहना कांग्रेस के लिए फायदा है या नुकसान? यह दोनों तरह से असर डाल सकता है. सिद्धारमैया का अनुभव और AHINDA वोट बैंक कांग्रेस के लिए बड़ी ताकत है. लेकिन अगर उनके समर्थकों में असंतोष बढ़ता है तो डीके शिवकुमार के लिए फैसले लेना मुश्किल हो सकता है. इसलिए हाईकमान को दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाकर रखना होगा।  राहुल गांधी के लिए कर्नाटक इतना अहम क्यों है? कर्नाटक इस समय दक्षिण भारत में कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ है. पार्टी इसे 2029 लोकसभा चुनाव से पहले ‘गवर्नेंस मॉडल’ के तौर पर पेश करना चाहती है. अगर कांग्रेस यहां दोबारा सत्ता में लौटती है तो राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति को बड़ी मजबूती मिलेगी. इसलिए मुख्यमंत्री परिवर्तन को भविष्य की बड़ी चुनावी तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।  वोक्कालिगा समीकरण से कांग्रेस को उम्मीद डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं. कांग्रेस को भरोसा है कि इससे जेडीएस का प्रभाव कमजोर होगा. दक्षिण कर्नाटक की कई सीटों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. यही वजह है कि पार्टी इस बदलाव को सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि सामाजिक समीकरणों के पुनर्गठन के रूप में भी देख रही है  भाजपा की नजर कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान पर भाजपा पहले ही कांग्रेस के भीतर संभावित गुटबाजी को मुद्दा बनाने की तैयारी में है. पार्टी का मानना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद असंतोष बढ़ सकता है. अगर कांग्रेस अंदरूनी संतुलन नहीं संभाल पाई तो भाजपा इसे अगले चुनाव में बड़ा हथियार बना सकती है।   

दो केंद्रीय मंत्रियों को प्रदेश की कमान मिलने से बढ़ी अटकलें, मोदी सरकार में बदलाव के संकेत?

नई दिल्ली बीजेपी ने एक बार फिर चौंकाते हुए केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्‍होत्रा को प्रदेश की कमान सौंप दी है. उन्‍हें द‍िल्‍ली प्रदेश अध्‍यक्ष बनाया गया है. दिल्ली से पहले बीजेपी ने यूपी में भी भाजपा ने यही फॉर्मूला अपनाते हुए केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी थी. यानी अब दो-दो केंद्रीय मंत्री सीधे राज्यों में संगठन की कमान संभाल रहे हैं. इस बदलाव के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा है क‍ि क्या अब मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल होगा. क्‍योंक‍ि बीजेपी ‘एक व्यक्ति, एक पद’के सिद्धांत को मानतीहै. ऐसे में मंत्रियों को संगठन में भेजे जाने का सीधा मतलब है कि केंद्रीय कैबिनेट में कई महत्वपूर्ण कुर्सियां खाली होने वाली हैं।  हर्ष मल्होत्रा पूर्वी दिल्ली से सांसद हैं और मोदी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री हैं. दिल्ली में अगले कुछ समय में होने वाले एमसीडी चुनाव को देखते हुए उनकी न‍ियुक्‍त‍ि काफी मायने रखती है. द‍िल्‍ली में बीजेपी को एक ऐसे जमीन से जुड़े पंजाबी और वैश्य चेहरे की जरूरत थी, जिसकी प्रशासनिक पकड़ मजबूत हो. केंद्रीय मंत्री को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के लिए वह कोई कसर नहीं छोड़ने वाली. इसके साथ ही बीजेपी ने पंजाबी चेहरे को मौका देकर पंजाब में भी पैठ बनाने की कोश‍िश की है।  ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का सिद्धांत बीजेपी की कार्यशैली दूसरी पार्टियों से थोड़ी अलग है. बीजेपी ‘एक व्यक्ति, एक पद’ का नियम बेहद कड़ाई से लागू करती है. पार्टी का इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी नेता को संगठन से सरकार में या सरकार से संगठन में लाया गया है, उसने बड़े बदलावों का मार्ग प्रशस्त किया है।  जेपी नड्डा का उदाहरण जब जेपी नड्डा को मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, तो उन्होंने तुरंत राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी से दूरी बनाई और पार्टी ने सांगठनिक निरंतरता के लिए नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना. ठीक यही नियम अब राज्यों के स्तर पर भी लागू होने जा रहा है।  उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी कुछ समय पहले देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था. तब भी यह सवाल उठा था कि क्या वे दोनों पद संभालेंगे? भाजपा की नीति के अनुसार, जब कोई मंत्री संगठन के पूर्णकालिक काम में उतरता है, तो उसे सरकारी जिम्मेदारी से मुक्त किया जाता है ताकि वह शत-प्रतिशत समय संगठन को दे सके।  अब हर्ष मल्‍होत्रा अब यही इतिहास दिल्ली में हर्ष मल्होत्रा के साथ दोहराया जा रहा है. हर्ष मल्होत्रा और पंकज चौधरी दोनों केंद्रीय मंत्रालयों में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. चूंकि दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में संगठन का काम 24 घंटे और 365 दिन का होता है, इसलिए इन दोनों मंत्रियों का कैबिनेट से बाहर होना तय माना जा रहा है. यह कदम ही इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि मोदी कैबिनेट में जल्द ही नए चेहरों की एंट्री होने वाली है।  जब-जब संगठन बदला, तब-तब बदली कैबिनेट यदि हम मोदी सरकार के पिछले 12 वर्षों के इतिहास और उससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के दौर के इतिहास पर नजर डालें, तो काफी कुछ क्‍ल‍ियर हो जाता है।      साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब राजनाथ सिंह सरकार में गृहमंत्री बने. ‘एक व्यक्ति, एक पद’ के सिद्धांत के तहत राजनाथ सिंह ने अध्यक्ष पद छोड़ा और अमित शाह को संगठन की कमान मिली. इसके बाद संगठन का पूरी तरह कायाकल्प हुआ और कैबिनेट का भी विस्तार हुआ।      जुलाई 2021 में मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का सबसे बड़ा कैबिनेट फेरबदल किया था. उस समय रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, डॉ. हर्षवर्धन और रमेश पोखरियाल निशंक जैसे 12 बड़े मंत्रियों की छुट्टी कर दी गई थी. इनमें से कई नेताओं को बाद में संगठन के काम में लगाया गया था, जबकि भूपेंद्र यादव, अश्विनी वैष्णव और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नए चेहरों को कैबिनेट में एंट्री मिली थी।      अटल जी के समय भी कुशाभाऊ ठाकरे और जन कृष्णमूर्ती जैसे संगठन के दिग्गजों को सरकार के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए इस्तेमाल किया गया था. प्रमोद महाजन और वेंकैया नायडू जैसे नेताओं को कई बार संगठन से सरकार और सरकार से संगठन में भेजा गया।