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नगरी क्षेत्र की जलवायु बनी उपयुक्त, मखाना उत्पादन से बढ़ेगी किसानों की आय

रायपुर वनांचल क्षेत्र में आय के नए स्रोत- मखाना खेती से सशक्त होंगे महिला समूह  मखाना एक ऐसा पौधा है जो तालाबों, दलदलों और आर्द्रभूमि जैसे स्थिर जल निकायों में उगाया जाता है। इसका प्रसार बीजों द्वारा होता है और अंकुरण के लिए पूर्णतः परिपक्व बीजों की आवश्यकता होती है। मखाना की खेती में न्यूनतम खर्च आता है क्योंकि पिछले फसल से बचे हुए बीजों से नए पौधे आसानी से अंकुरित हो जाते हैं। पोषक तत्वों से भरपूर होने और नकदी फसल के रूप में किसानों की आय को दोगुना करने की अपार क्षमता को देखते मिलता है। मखाना खेती से धमतरी की ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक तस्वीर बदलेगी ।  छोटी छोटी डबरी से समृद्धि तक धमतरी की महिलाओं को मखाना खेती में आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई राह दिखायी दे रही है । शासकीय प्रयासों का प्रतिफल है कि मखाना खेती से धमतरी में आर्थिक सशक्तिकरण होगा ।                   उल्लेखनीय है कि केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने धमतरी प्रवास के दौरान जिले को मखाना बोर्ड में शामिल करने की घोषणा की थी। इस घोषणा के बाद जिला प्रशासन द्वारा मखाना उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार की गई है।                   धमतरी जिले के नगरी वनांचल क्षेत्र में आजीविका संवर्धन की दिशा में एक नई पहल के तहत मखाना खेती की तैयारी स्व-सहायता समूहों के माध्यम से प्रारंभ की गई है। जिले में कुल 100 एकड़ भूमि मखाना उत्पादन के लिए चिन्हांकित की गई है। प्रारंभिक चरण में संकरा क्षेत्र में 25 एकड़ रकबे में मखाना की खेती की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।                   विशेषज्ञों के अनुसार नगरी क्षेत्र की जलवायु, पर्याप्त जल उपलब्धता एवं प्राकृतिक वातावरण मखाना उत्पादन के लिए अनुकूल है। इससे स्थानीय किसानों एवं महिला स्व-सहायता समूहों को अतिरिक्त आय के अवसर प्राप्त होंगे। इस पहल से वनांचल क्षेत्र में कृषि विविधीकरण को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।                  कलेक्टर धमतरी बीते दिनों संकरा पहुंचकर मखाना खेती की तैयारियों का अवलोकन किया तथा संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि “मखाना खेती नगरी वनांचल क्षेत्र के लिए आय वृद्धि का प्रभावी माध्यम बन सकती है। स्व-सहायता समूहों को तकनीकी प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण बीज एवं विपणन की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। हमारा प्रयास है कि धमतरी जिला प्रदेश में मखाना उत्पादन का मॉडल विकसित करे।”                   कलेक्टर ने यह भी निर्देशित किया कि कृषि एवं उद्यानिकी विभाग समन्वय बनाकर किसानों को प्रशिक्षण प्रदान करें तथा जल प्रबंधन एवं फसल संरक्षण पर विशेष ध्यान दें। आने वाले समय में चरणबद्ध रूप से रकबे का विस्तार कर अधिक से अधिक समूहों को इस पहल से जोड़ा जाएगा। जिला प्रशासन की इस पहल से नगरी वनांचल क्षेत्र में आर्थिक सशक्तिकरण की नई संभावनाएं साकार होती दिखाई दे रही हैं।

प्रकृति और आध्यात्म का संगम: जशपुर के चाय बागान व सोगड़ा आश्रम बना रहे खास पहचान

बिलासपुर                                                              चाक पर रखी मिट्टी को सुन्दर सुराही का आकार देने का कार्य एक सिद्धहस्त कुम्हार ही कर सकता  है। मिट्टी से घड़ा बनाने का हुनर सीखते हुए  इस कुम्हार ने न  जाने कितने मिट्टी के घड़े और रोशनी देने वाले दिए तोड़े होंगे लेकिन उसकी भी जिद थी कि मुझे इस चाक पर काम करना है।  लगातार मिट्टी के साथ जुड़े रहकर कुम्हार इतना निपुण हो जाता है कि एक छोटा दिया भी अपनी खूबसूरती के साथ चाक से नीचे उतरने लगता है।  इसी तरह जंगलों पहाड़ों को भगवान मानने वाले आदिवासियों को अपने जंगलों की मिट्टी की पहचान खूब होती है।  पहाड़ों की ढलान पर पथरीली दोमट मिट्टी  की बार-बार खुदाई करके इसे सरस और  भुरभुरी बनाने की जिद ने इसे सोना बना दिया। ऐसी स्थिति में इन मेहनतकश  हाथों को चाय बागानों का  हुनर प्राप्त करने से कौन रोक सकता था। आदिवासी श्रम की पहचान जशपुर की सारुडीह पहाड़ियों के ढलान पर हंसते खिलखिलाते चाय के बगीचे अब छत्तीसगढ़ का हिस्सा बन चुके हैं।  साल वनों के बीच पहाड़ों की ढलान पर फैली चाय बागान की हरियाली पर्यटकों की अब पसंदीदा जगह बनती जा रही हैं।  इसी बगीचे की सारुडीह चाय और उसके बागान का सौंदर्य  यदि आप भी नजदीक से देखना चाहते हैं, तब आपको उत्तरी छत्तीसगढ़ के पूर्वी प्रवेश द्वार जशपुर की यात्रा करनी होगी।                                       जशपुर छत्तीसगढ़ का एक ऐसा जिला है जो झारखंड के गुमला, छत्तीसगढ़ के रायगढ़ एवं अंबिकापुर जिले की सीमा को आपस में साझा करता है।  विशाल भारत के मध्य प्रांत छत्तीसगढ़ के उत्तर पूर्व अंचल में बसा जशपुर ब्रिटिश शासन काल मे ब्रिटिश कमिश्नरी रांची का एक हिस्सा था। झारखंड राज्य से छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक वादियों में प्रवेश करने वालों के लिए जशपुर का यह पूर्वी द्वार स्वागत करता है। ऐतिहासिक विरासत के पन्नों में जशपुर की जानकारी स्पष्ट नहीं है लेकिन जितनी जानकारी उपलब्ध है वह इतनी रोचक है कि आप इसे जरूर जानना चाहेंगे।  कहते हैं कि 18 वीं सदी में डोम राजवंश का यहां शासन था  जिसे राजा सूर्यवंशी के बड़े बेटे सुजन राय ने हरा कर यहां अपना राज्य स्थापित किया।  विद्वान ज्योतिषी ठीक कहते हैं कि जिसके हाथों की भाग्य रेखा में राजयोग लिखा हो वह सन्यासी बनकर भी राजा बन जाएगा। एक छोटे से राज्य बंसवाड़ा में सुजन राय के पिता राज किया  करते थे।   शिकार के लिए निकले  सुजन राय की अनुपस्थिति में उनके पिता की अचानक मृत्यु हो गई। राजा की मृत्यु की सूचना से पहले राजगद्दी सूनी नहीं रहनी चाहिए, ऐसा कह कर वहां के बुजुर्गों ने छोटे भाई को राजगद्दी पर बैठा दिया। शिकार से लौटने के बाद सुजान राय को स्थितियों से अवगत कराया गया और सुजान राय को उनके पिता के राजगद्दी संभालने का प्रस्ताव दिया गया।  सुजन राय ने छोटे भाई को सौंपी सत्ता वापस लेना उचित नहीं है ऐसा सोचकर वे सन्यासी बनकर जंगलों की ओर प्रस्थान कर गए। अपने संन्यासी जीवन में यहां वहां  घूमते हुए वे खुड़िया गांव पहुंचे।  यहां के डोम राजा के कार्यों से वहां के निवासी असंतुष्ट थे और बगावत के लिए पूरी तैयारी कर ली थी।  बगावती लोगों के अनुरोध को मानकर सुजन राय ने इस संगठन का  नेतृत्व करना स्वीकार किया और डोम राजा रायबन को हराकर स्वयं वहां के राजा बन बैठे।  इसी खुड़िया का विस्तार बाद में जशपुर रियासत कहलाया। राज्य और सत्ता का यह खेल समय-समय पर  रियासतों के साथ हमेशा से होता रहा है।  सूजन राय जशपुर रियासत के अंतिम दिनों तक राजा रहे।  1905 तक ब्रिटिश शासन के छोटा नागपुर कमिश्नरी के अधीन रहने वाला जशपुर छत्तीसगढ़ के 14 रियासतों में से एक था।  कुछ छोटी रियासतों के साथ इसे भी सरगुजा ग्रुप में रखा गया था। प्रत्येक रियासत अपनी सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार को वार्षिक शुल्क टिकोली, रैयतवाड़ी या खिराज के नाम से देती थी।  यह शुल्क लेकर ब्रिटिश शासन रियासतों को सुरक्षा देने का वादा  करती थी।  अपने रियासत में सत्तारूढ़ रहते हुए स्वतंत्र रूप से राज करने तथा व्यापारियों और किसानों से शुल्क वसूलने की स्वतंत्रता देती थी।                                आजादी के बाद मध्य प्रदेश बनने पर जशपुर  रायगढ़ जिले का हिस्सा था और 25 मई 1998 को  नया जिला घोषित किया गया। सघन साल वनों से घिरा लगभग 6200 वर्ग किलोमीटर का जशपुर जिला अपने क्षेत्रफल का लगभग 900 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र का जंगल समेटे हुए है।  उत्तर से दक्षिण तक डेढ़ सौ किलोमीटर एवं पूर्व पश्चिम में 85 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला यह जिला अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ झील और झरनों के पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहा है। दो भागों में बंटा हुआ जशपुर भौगोलिक रूप से ऊपरी घाट एवं दक्षिणी भाग को नीच घाट के नाम से जाना जाता है ऊपरी घाट पन्डरा पाठ का हिस्सा ज्यादा ठंडा है। इसी घाट से गुजरते हुए  जशपुर से कुनकुरी और कैलाश गुफा (बगीचा) जाने वाले रास्ते का घुमाव "लोरो घाटी"  कहलाता है। घाट की ऊंचाई से नीचे गुजरते हुए बस से देखने पर ऐसा लगता है मानो किसी बच्चे ने अपनी काले स्लेट पर स्लेट पेंसिल से टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें खींच दी हो। प्रकृति के खींचे गए इस तरह के प्राकृतिक दृश्य और बिम्ब एक सिद्ध हस्त कलाकार की ऐसी पेंटिंग है जो बिरले देखने को मिलती है।                              जशपुर के प्राकृतिक स्थलों में रानी दाह झरना, रजपुरी जलप्रपात,  अवधूत भगवान श्री राम का सोगड़ा अघोर आश्रम और सारुडीह चाय बागान जैसे पर्यटन स्थल पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं।  विश्व का सबसे बड़ा प्राकृतिक शिवलिंग  "मधेसर पहाड़"  भी जशपुर जिले का हिस्सा है। पर्यटन के क्षेत्र में जशपुर जिला अपनी चाय बागानों के कारण पर्यटको की पसंदीदा जगह बनता जा रहा है।   जशपुर जिला  मुख्यालय से  साल वनों के … Read more

वर्ष 2025 में 820 विदेशी पर्यटकों ने की छत्तीसगढ़ की यात्रा

रायपुर विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का नया केन्द्र बन रहा छत्तीसगढ़ प्राकृतिक सौंदर्य, समृद्ध जनजातीय संस्कृति, घने वन, झरनों की कलकल ध्वनि और ऐतिहासिक धरोहरों से परिपूर्ण छत्तीसगढ़ अब धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बना रहा है। वर्ष 2025 के दौरान कुल 820 विदेशी पर्यटकों ने छत्तीसगढ़ की यात्रा की, जो यह संकेत देता है कि राज्य की अनछुई प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक विविधता विदेशी सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल द्वारा विकसित की जा रही आधुनिक पर्यटन सुविधाएँ तथा बेहतर होती सुरक्षा व्यवस्था आने वाले समय में विदेशी पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावनाओं को और मजबूत कर रही है। छत्तीसगढ़ को “पर्यटकों का स्वर्ग” कहा जाता है, क्योंकि यहाँ प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जैसे भव्य जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान की जैव विविधता, सिरपुर और रतनपुर जैसे ऐतिहासिक-धार्मिक स्थल, बस्तर की अद्वितीय जनजातीय परंपराएँ और लोकनृत्य, सरगुजा के पर्वतीय क्षेत्र तथा जशपुर की शांत और हरित वादियाँ विदेशी सैलानियों को एक अलग अनुभव प्रदान करती हैं। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ उन पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है, जो प्रकृति के करीब रहकर स्थानीय संस्कृति को समझना चाहते हैं। राज्य सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अनेक महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। प्रमुख पर्यटन स्थलों तक बेहतर सड़क संपर्क, पर्यटक सूचना केंद्रों की स्थापना, होटल और होम-स्टे सुविधाओं का विस्तार, पर्यटक मार्गदर्शकों का प्रशिक्षण, डिजिटल प्रचार-प्रसार तथा बुनियादी सुविधाओं के विकास जैसे प्रयासों से पर्यटकों को अधिक सुगम और सुरक्षित अनुभव मिल रहा है। इसके साथ ही राज्य में ग्रामीण पर्यटन, ईको-टूरिज्म और सांस्कृतिक पर्यटन को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं। बस्तर क्षेत्र विदेशी सैलानियों के लिए अत्यंत संभावनाशील पर्यटन गंतव्य के रूप में उभर रहा है। यहाँ के प्राकृतिक जलप्रपात, घने वन, राष्ट्रीय उद्यान, आदिवासी जीवन शैली और प्रसिद्ध बस्तर दशहरा जैसे सांस्कृतिक आयोजन विश्वभर के पर्यटकों के लिए अनूठा अनुभव प्रस्तुत करते हैं। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान की जैव विविधता, चित्रकोट जलप्रपात की भव्यता और तीरथगढ़ की प्राकृतिक सुंदरता बस्तर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान देते हैं। चित्रकोट फॉल्स के पास तीर्था गांव में प्रीमियम लक्जरी टेंट सिटी प्रस्तावित है। चित्रकोट इंडिजिनस नेचर रिट्रीट नामक एक व्यापक प्रस्ताव पर्यटन मंत्रालय को प्रस्तुत करने के लिए तैयार किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य चित्रकोट को एक वैश्विक स्तर की प्रकृति और संस्कृति गंतव्य के रूप में पुनर्विकसित करना है। राज्य सरकार की इन योजनाओं से बस्तर आने वाले वर्षों में विदेशी पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केन्द्र होगा।  बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था में आए सकारात्मक बदलाव भी पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं। बस्तर अब नक्सलवाद से मुक्त होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और क्षेत्र में शांति एवं विकास का नया वातावरण निर्मित हो रहा है। बेहतर सुरक्षा, सड़क संपर्क और पर्यटन सुविधाओं के विस्तार से न केवल देशी बल्कि विदेशी पर्यटकों का विश्वास भी बढ़ रहा है। इससे आने वाले समय में बस्तर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में पर्यटन गतिविधियों को नई गति मिलने की उम्मीद है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की मेंटर एवं हिवा कोचिंग एंड कंसल्टिंग की संस्थापक सु किर्सी ह्यवैरिनेन की बस्तर की छह दिवसीय यात्रा ने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ पर्यटन की संभावनाओं को नई पहचान दिलाई है। उन्होंने बस्तर की जनजातीय संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और स्थानीय समुदायों की जीवन शैली की सराहना करते हुए इसे विश्व के लिए एक अनूठा पर्यटन अनुभव बताया। इस प्रकार की अंतरराष्ट्रीय यात्राएँ और सकारात्मक अनुभव विदेशों में छत्तीसगढ़ की छवि को और मजबूत करेंगे तथा भविष्य में अधिक विदेशी सैलानियों को आकर्षित करने में सहायक होंगे। सरगुजा और जशपुर क्षेत्र भी विदेशी सैलानियों के लिए अपार संभावनाएँ समेटे हुए हैं। सरगुजा के पर्वतीय वन क्षेत्र, मैनपाट का शांत और मनोहारी वातावरण, जशपुर की हरित घाटियाँ तथा वहाँ की प्राकृतिक जैव विविधता प्रकृति प्रेमी पर्यटकों को विशेष रूप से आकर्षित करती है। इन क्षेत्रों में ईको-टूरिज्म और एडवेंचर टूरिज्म की संभावनाएँ भी तेजी से विकसित हो रही हैं, जिससे विदेशी पर्यटकों के लिए नए अनुभवों के द्वार खुल रहे हैं। छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार-प्रसार, पर्यटन मेलों में भागीदारी, डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से प्रचार तथा पर्यटन अवसंरचना के विकास जैसे कई कदम उठा रही है। साथ ही, स्थानीय संस्कृति, हस्तशिल्प, लोकनृत्य और पारंपरिक उत्सवों को पर्यटन से जोड़कर छत्तीसगढ़ को एक विशिष्ट सांस्कृतिक पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित करने की दिशा में भी निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ विदेशी सैलानियों के लिए एक नया और आकर्षक पर्यटन केंद्र बनेगा।  प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक विविधता, बेहतर होती सुविधाएँ और सुरक्षित वातावरण मिलकर राज्य को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर एक नई पहचान दिलाने की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं।

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में सफल प्रदेश के अभ्यर्थियों को मुख्यमंत्री ने वीडियो कॉल के जरिए दी बधाई मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

रायपुर  मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय ने  संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा 2025 में सफल छत्तीसगढ़ के अभ्यर्थियों से वीडियो कॉल के माध्यम से संवाद कर उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ दीं। मुख्यमंत्री  साय ने इस दौरान खरसिया (रायगढ़) निवासी  रौनक अग्रवाल, रायपुर निवासी  संजय डहरिया, धमतरी जिले के परसवानी निवासी  डायमंड सिंह ध्रुव तथा एमसीबी जिले के जनकपुर निवासी सु दर्शना सिंह से बातचीत की। मुख्यमंत्री  साय ने उनके परिवारजनों से भी संवाद करते हुए इस उपलब्धि पर उन्हें बधाई दी। मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि आप सभी युवाओं ने अपनी मेहनत, लगन और धैर्य के बल पर प्रतिष्ठित यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में सफलता प्राप्त कर प्रदेश का मान बढ़ाया है। आपकी यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है और यह संदेश देती है कि निरंतर परिश्रम और लक्ष्य के प्रति समर्पण से किसी भी ऊँचाई को प्राप्त किया जा सकता है। मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ से युवाओं का सिविल सेवा में चयन होना प्रदेश के लिए गौरव की बात है। इससे यह सिद्ध होता है कि छत्तीसगढ़ के दूरस्थ क्षेत्रों में भी प्रतिभा की कोई कमी नहीं है और हमारे युवा अपने परिश्रम के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं। मुख्यमंत्री  साय ने सभी सफल अभ्यर्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए कहा कि यह सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह प्रदेश के लाखों विद्यार्थियों के सपनों को नई ऊर्जा और दिशा देने वाली प्रेरणा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ये सभी प्रतिभाशाली युवा प्रशासनिक सेवाओं में रहते हुए पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ जनसेवा करेंगे तथा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

रंगों का साइड इफेक्ट: होली के बाद त्वचा और आंखों की परेशानी से सिम्स में 465 मरीज

बिलासपुर होली के रंगों का असर इस बार लोगों की सेहत पर भी देखने को मिला. मिलावटी और केमिकल युक्त रंगों के इस्तेमाल से कई लोगों को स्किन इंफेक्शन और आंखों से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ा. होली के बाद पिछले दो दिनों में बड़ी संख्या में मरीज उपचार के लिए सिम्स पहुंचे. अस्पताल के रिकॉर्ड के मुताबिक दो दिनों में स्किन ओपीडी में 465 औरओपीडी में 187 यानी कुल 652 मरीज पहुंचे. इनमें 465 मरीज स्किन से जुड़ी समस्याओं और 187 मरीज आंखों में जलन, लालिमा और अन्य परेशानी की शिकायत लेकर इलाज कराने पहुंचे. सिम्स में इन दो दिनों के दौरान स्किन, आई सहित अन्य विभाग में कुल 2958 मरीजों ने ओपीडी में उपचार कराया. गुरुवार को 1292 मरीज अस्पताल पहुंचे, जबकि शुक्रवार को यह संख्या बढ़कर 1666 हो गई. एलर्जी, खुजली और जलन की शिकायत अधिक स्किन विभाग में गुरुवार को 125 मरीज पहुंचे थे, जबकि शुक्रवार को यह संख्या बढ़कर 340 हो गई. वहीं नेत्र विभाग में गुरुवार को 72 मरीजों ने उपचार कराया, जबकि शुक्रवार को 115 मरीज आंखों में रंग जाने, जलन और सूजन की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे. डॉक्टरों के अनुसार होली में केमिकल युक्त रंगों के इस्तेमाल से इस तरह की समस्याएं बढ़ जाती हैं. ऐसे रंग त्वचा पर एलर्जी, खुजली और जलन का कारण बनते हैं. वहीं आंखों में चले जाने पर संक्रमण का खतरा भी रहता है.

यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में 35वीं रैंक प्राप्त करने वाली सु वैभवी अग्रवाल को मुख्यमंत्री ने दी बधाई मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

रायपुर संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में 35वीं रैंक प्राप्त करने वाली सु वैभवी अग्रवाल ने आज मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय से राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में भेंट की।  मुख्यमंत्री  साय ने सु वैभवी को मिठाई खिलाकर उनकी इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ दीं।  मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि सु वैभवी अग्रवाल ने अपनी प्रतिभा, कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प के बल पर यूपीएससी की सिविल सेवा परीक्षा में उत्कृष्ट सफलता प्राप्त कर न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ का मान बढ़ाया है। मुख्यमंत्री  साय ने कहा कि वैभवी की यह सफलता प्रदेश के युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की उपलब्धियाँ यह संदेश देती हैं कि लक्ष्य के प्रति समर्पण,अनुशासन और निरंतर प्रयास से कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि सु वैभवी अग्रवाल भविष्य में प्रशासनिक सेवा में अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए देश और समाज की सेवा में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। उन्होंने उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए आगामी दायित्वों के लिए शुभकामनाएँ दीं। इस अवसर पर सु वैभवी अग्रवाल के पिता  शीतल अग्रवाल और भाई  विनायक अग्रवाल उपस्थित थे।

नक्सल संगठन को तगड़ा झटका, देवजी के बाद 124 माओवादी आत्मसमर्पण को तैयार

जगदलपुर.  तेलंगाना में शनिवार को होने जा रहा 124 माओवादियों का सामूहिक समर्पण वाम उग्रवाद के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। माओवादी सैन्य प्रमुख थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के प्रभारी मल्लाजी रेड्डी के नेतृत्व में यह समर्पण शाम चार बजे मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के सामने होगा। पुलिस सूत्रों के मुताबिक समर्पण करने वालों में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) से जुड़े कई सक्रिय कैडर शामिल हैं। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इस समर्पण के साथ ही माओवादी संगठन की सैन्य इकाई लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो गई है। दरअसल माओवादियों की सक्रिय और संगठित सैन्य संरचना अब केवल दंडकारण्य क्षेत्र तक सीमित रह गई थी। देवा भी समर्पण कर चुका है सूत्रों के अनुसार माओवादियों की इकलौती सक्रिय बटालियन भी इसी इलाके में संचालित हो रही थी, जिसका प्रभारी हाल ही में मारा गया कुख्यात कमांडर माड़वी हिड़मा और कमांडर बा देवा था। इस बटालियन को संगठन की सबसे ताकतवर सैन्य इकाई माना जाता था। यह छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र की सीमा से लगे जंगलों में सक्रिय रहती थी। बड़ी संख्या में कैडरों के समर्पण के बाद इस बटालियन की संरचना भी लगभग समाप्त मानी जा रही है। हिड़मा के मारे जाने के बाद देवा भी समर्पण कर चुका है। हाल के महीनों में संगठन के शीर्ष नेता देवजी और दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के प्रभारी मल्ला राजी रेड्डी और तेलंगाना के प्रभारी दामोदर के आत्मसमर्पण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद कैडरों में भी संगठन छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है। माओवादी संगठन का ढांचा तेजी से कमजोर पड़ रहा सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि लगातार सुरक्षा अभियानों, मजबूत खुफिया नेटवर्क और पुनर्वास नीति के कारण माओवादी संगठन का ढांचा तेजी से कमजोर पड़ रहा है। अधिकारियों का कहना है कि यह सामूहिक समर्पण दंडकारण्य क्षेत्र में माओवादी संगठन के घटते प्रभाव का संकेत है। आने वाले समय में और भी कैडरों के मुख्यधारा में लौटने की संभावना जताई जा रही है।

मध्यप्रदेश में मालगाड़ी दुर्घटनाग्रस्त, 5 डिब्बे पटरी से उतरे; बिलासपुर-कटनी रूट पर ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित

बिलासपुर. बिलासपुर से कोयला लेकर बड़ोदरा जा रही एक मालगाड़ी बिलासपुर बीना मार्ग पर कटनी मुड़वारा स्टेशन से पहले बेपटरी हो गई। जिससे रूट का रेल आवागमन प्रभावित हुआ है। ट्रैक को सुधारने और पटरी से उतरे डिब्बों को वापस पटरी पर लाने का कार्य जारी है। मौके पर डीआरएम सहित वरिष्ठ अधिकारी और कई स्थानों की राहत टीम मौजूद हैं। बिलासुपर से बड़ोदरा जा रही थी मालगाड़ी जानकारी के अनुसार, बिलासपुर से एक मालगाड़ी कोयला लोड करके बड़ोदरा जा रही थी। लगभग 11 बजे जैसे ही वह एनकेजे से कटनी मुड़वारा की ओर बढी बाबा घाट के पास बने केबिन के पास अचानक से धमाके के साथ मालगाड़ी के एक के बाद एक पांच डिब्बे पटरी से उतर गए और कोयला ट्रैक पर बिखर गया। किसी तरह से चालक ने गाड़ी रोकी और वरिष्ठ अधिकारियों को तत्काल सूचना दी गई। मालगाड़ी के लिए बेपटरी होने की सूचना मिलते ही अफरा-तफरी मच गई और एनकेजे, कटनी सहित जबलपुर और सतना से टीम में मौके पर बुलाई गई है। खाली किया जा रहा कोयला वहीं, जबलपुर डीआरएम कमल तलरेजा सहित मंडल के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंच गए हैं और डिब्बों को काटकर अलग करते हुए पटरी पर बिखरे कोयले को अलग करने का कार्य किया जा रहा है। वहीं डिब्बों में भरे कोयले को भी मजदूर और मशीनों की मदद से खाली कराया जा रहा है ताकि जल्द से जल्द रेलवे ट्रैक का सुधार करते हुए यातायात को बहाल किया जा सके। ट्रेनें प्रभावित वही, बिलासपुर बीना रेलखंड के बंद होने से मुड़वारा से बिलासपुर शहडोल की ओर जाने वाली यात्री ट्रेनें और मालगाड़ी प्रभावित हैं। जिनको अलग-अलग स्टेशनों पर रोका गया है।  

बस्तर में संकटग्रस्त महिलाओं के लिए सहारा बना ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’

जगदलपुर. जगदलपुर में संचालित ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’ संकट में घिरी महिलाओं के लिए सुरक्षा और सहायता का अहम केंद्र बनकर उभरा है। 31 जनवरी 2026 से शुरू हुई इस सेवा के तहत अब तक 1862 मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 1849 मामलों का समाधान कर पीड़ित महिलाओं को राहत दिलाई गई है। केंद्र की सबसे महत्वपूर्ण सुविधा अस्थायी सुरक्षित आश्रय है। घर या समाज में खुद को असुरक्षित महसूस करने वाली महिलाओं को यहां सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था दी जाती है। अब तक 763 महिलाओं को सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराया जा चुका है। इसके साथ ही मनोवैज्ञानिक परामर्श (काउंसलिंग) भी महिलाओं के लिए बड़ी मदद साबित हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक अब तक 1225 महिलाओं की काउंसलिंग की गई है, जिससे वे मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव से बाहर निकलने में सफल रही हैं। जिला महिला संरक्षण अधिकारी के अनुसार घरेलू हिंसा और पारिवारिक विवाद से जूझ रही महिलाओं के लिए भावनात्मक सहारा बेहद जरूरी होता है। यही कारण है कि यह केंद्र अब महिलाओं के लिए सुरक्षा, न्याय और आत्मविश्वास की नई उम्मीद बनकर सामने आया है।

बस्तर में मलेरिया से निपटने के कार्यशाला में बताए उपाय

जगदलपुर. बस्तर संभाग में मलेरिया की चुनौती से निपटने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। 7 मार्च को होने वाले इस कार्यक्रम में देशभर के वरिष्ठ चिकित्सक और विशेषज्ञ हिस्सा लेंगे। यह कार्यशाला एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडिया और शासकीय मेडिकल कॉलेज जगदलपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की जा रही है। मलेरिया के बदलते स्वरूप, जटिल मामलों की पहचान और आधुनिक उपचार पद्धतियों के बारे में चिकित्सकों को अपडेट करना कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य है। विशेषज्ञों के अनुसार बस्तर क्षेत्र में मलेरिया, विशेष रूप से फैल्सीफेरम मलेरिया के मामले अधिक देखने को मिलते हैं, जो गंभीर रूप ले सकते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कई बार बिना स्पष्ट लक्षण वाले मलेरिया और दस्त के मरीजों में भी मलेरिया के संकेत मिलते हैं, जो चिंता का विषय है। कार्यशाला में मलेरिया की एपिडेमियोलॉजी, आधुनिक जांच तकनीक, समय पर निदान और गंभीर मरीजों के उपचार पर विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे। देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञ अपने शोध और अनुभव साझा करेंगे। इस पहल से बस्तर के डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों को मलेरिया प्रबंधन की आधुनिक पद्धतियों को समझने और मरीजों के बेहतर उपचार में मदद मिलेगी।