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राजस्थान में कोयले की महंगाई से राहत की उम्मीद, नागौर लिग्नाइट माइंस दोबारा होंगी शुरू

भीलवाड़ा देश के प्रमुख टेक्सटाइल हब भीलवाड़ा का कपड़ा प्रोसेस उद्योग इन दिनों ईंधन की आसमान छूती कीमतों और घटती उपलब्धता के चलते गहरे संकट में घिर गया है। उत्पादन लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी से वैश्विक और घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो गया है। इसी बीच, नागौर स्थित राजस्थान स्टेट माइंस एंड मिनरल्स लिमिटेड (आरएसएमएम) की लिग्नाइट माइंस की नीलामी होने के बावजूद अनुमतियों के नवीनीकरण में देरी के कारण संचालन ठप हो गया। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए लघु उद्योग भारती के प्रतिनिधिमंडल ने राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने मामले की गंभीरता को समझते हुए नागौर लिग्नाइट माइंस को तत्काल प्रभाव से दोबारा शुरू करने के निर्देश जारी किए हैं। इससे संकट से जूझ रहे कपड़ा उद्योग को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद जगी है। कागजी अड़चनों की भेंट चढ़ी नीलामी, आपूर्ति रुकते ही उछले दाम नागौर स्थित आरएसएमएम की लिग्नाइट माइंस की नीलामी प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, लेकिन संबंधित दस्तावेजों और पर्यावरणीय एवं प्रशासनिक अनुमतियों का समय पर नवीनीकरण नहीं कराया गया। यदि समय रहते आवश्यक कागजी प्रक्रिया पूरी कर ली जाती, तो माइंस के संचालन में यह गतिरोध उत्पन्न नहीं होता। माइंस बंद होते ही बाजार में स्थानीय लिग्नाइट की किल्लत पैदा हो गई और उपलब्ध विकल्पों की कीमतों में भारी उछाल आ गया। आयातित कोयले की किल्लत, बीकानेर पर बढ़ा पूरा दारोमदार वर्तमान में भीलवाड़ा के कपड़ा प्रोसेस उद्योगों में ऊर्जा की जरूरतों के लिए मुख्य रूप से घरेलू कोयले और बीकानेर से आने वाले लिग्नाइट पर निर्भरता है। वहीं, इंडोनेशिया से आयात होने वाले कोयले की आपूर्ति वैश्विक कारणों से बुरी तरह प्रभावित हुई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कमी और स्थानीय स्तर पर नागौर से आपूर्ति ठप होने के कारण उपलब्ध कोयले के दाम तेजी से बढ़े हैं। इसका सीधा वित्तीय भार प्रोसेस हाउसों पर पड़ रहा है। वस्त्र नगरी के लिए संजीवनी बनेगी नागौर माइंस व्यापारियों का मानना है कि नागौर की आरएसएमएम लिग्नाइट माइंस का दोबारा संचालन भीलवाड़ा के कपड़ा उद्योग के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होगा। नागौर से भीलवाड़ा की भौगोलिक दूरी कम होने के कारण परिवहन पर होने वाले भारी खर्च में कटौती होगी। भीलवाड़ा के उद्यमियों को ऐसे मिलेगी राहत भीलवाड़ा में प्रतिमाह लगभग 75 हजार टन कोयले और लिग्नाइट की खपत होती है। वर्तमान में बीकानेर से आने वाले लिग्नाइट, घरेलू कोयले और इंडोनेशिया से आयातित कोयले की कीमत 8,500 से 12,000 रुपए प्रति टन है। वहीं, नागौर के लिग्नाइट की कीमत मात्र 6,000 रुपए प्रति टन बताई जा रही है। ऐसे में यदि उद्यमियों को प्रतिमाह लगभग 50 हजार टन लिग्नाइट नागौर से मिलने लगे, तो भीलवाड़ा के कपड़ा उद्योग को बड़ी राहत मिल सकती है और उत्पादन लागत में कमी आएगी। लघु उद्योग भारती ने उठाया मुद्दा लघु उद्योग भारती ने संगठन के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री प्रकाश चंद्र के माध्यम से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से विशेष आग्रह कर उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया। मुख्यमंत्री ने उद्योगों के हित में संवेदनशीलता दिखाते हुए नागौर माइंस को तत्काल शुरू कराने के प्रशासनिक निर्देश जारी किए हैं। — रवीन्द्र जाजू, संयुक्त सचिव, राजस्थान प्रदेश, लघु उद्योग भारती

PM मोदी से मिले CM भजनलाल शर्मा, पंचायत चुनाव से पहले मुलाकात के निकाले जा रहे कई मायने

जयपुर  राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने आज गुरुवार 15 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की। हर बार की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की मुलाकत को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों नेताओं के बीच नई दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री आवास पर हुई ये मुलाक़ात ऐसे समय पर हुई है जब राजस्थान में हाल ही में स्थानीय निकाय चुनाव संपन्न हुए हैं और आगामी दिनों में पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव होने वाले हैं। मुलाक़ात करीब 20 मिनट की रही। शिष्टाचार नहीं, मुलाक़ात के हैं कई मायने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के बीच हुई मुलाक़ात को प्रारंभिक तौर पर शिष्टाचार मुलाकात बताया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसके कई मायने निकाल रहे हैं। गौरतलब है कि फिलहाल राजस्थान से लेकर दिल्ली तक में कई मुद्दे गरमाये हुए हैं। खासतौर पर एसआईआर के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर विपक्ष का भारी विरोध लगातार जारी है। राजस्थान मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्ताव हुआ है पारित मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की अध्यक्षता में बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों के अनवरत सेवाकाल और राष्ट्र निर्माण के ऐतिहासिक सफर पर अभिनंदन प्रस्ताव पारित किया गया है। इसके अलावा भी कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 7 अक्टूबर को सरकार के मुखिया के रूप में राष्ट्रसेवा का ऐतिहासिक पड़ाव पूरा किया है। इस उपलक्ष्य में राजस्थान मंत्रिमंडल ने प्रस्ताव पारित कर प्रधानमंत्री का अभिनंदन किया है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री की सुशासन, विकास और विकसित भारत के संकल्प की यात्रा निरंतर जारी है। लोकतंत्र में जनता-जनार्दन के आशीर्वाद से उन्हें पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और फिर देश के प्रधानमंत्री के रूप में तीन बार प्रचंड जनादेश मिला है। 

Air India Flight में हाईजैक सिग्नल से मचा हड़कंप, जयपुर में इमरजेंसी लैंडिंग के बाद जांच शुरू

जयपुर  फ्रैंकफर्ट से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की अंतरराष्ट्रीय उड़ान AI-2030 में उस वक्त हड़कंप मच गया जब विमान के पायलट से गलती से बटन दबा था, जिससे अचानक हाईजैक का अलर्ट जारी हो गया. सूत्रों के मुताबिक, पायलट की इस गलती के बाद अहमदाबाद एटीसी (ATC) को स्क्वाक-7500 (Squawk 7500) कोड का अलर्ट मिला. सिग्नल मिलते ही सुरक्षा एजेंसियां तुरंत अलर्ट हो गईं और आनन-फानन में फ्लाइट को जयपुर डाइवर्ट कर सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई. हालांकि, पायलट से गलती हुई या किसी टेक्निकल ग्लिच और फॉल्ट की वजह से ऐसा हुआ, इस एंगल पर भी तफ्तीश की जा रही है।  अलर्ट जारी होते ही सुबह करीब 9:45 बजे एयर इंडिया की इस फ्लाइट को जयपुर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के आइसोलेशन बे (Isolation Bay) पर ले जाया गया. आइसोलेशन बे एयरपोर्ट का वह सुरक्षित हिस्सा होता है जहाँ किसी भी संभावित सुरक्षा खतरे या बम/हाईजैक की सूचना पर विमान को बाकी टर्मिनल से दूर पार्क किया जाता है. विमान के उतरते ही सुरक्षा एजेंसियों ने तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी।  दोनों पायलटों को उतारा गया बाहर, यात्रियों की गहन सुरक्षा जांच जारी विमान की सुरक्षित लैंडिंग के बाद दोनों पायलटों को तुरंत प्लेन से बाहर निकाला गया और उनसे पूछताछ की जा रही है. इसके साथ ही विमान में सवार सभी यात्रियों को सुरक्षित तरीके से उतारकर उनकी और उनके सामान की सघन सुरक्षा जांच (Security Screening) की जा रही है. एटीएफ (ATS), स्थानीय पुलिस और अन्य केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों की टीम मौके पर मौजूद हैं. वहीं, किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) की टीम को भी स्टैंडबाय पर रखा गया है।  पायलट की गलती, टेक्निकल ग्लिच या कोई अन्य फॉल्ट? शुरुआती सूत्रों के मुताबिक अहमदाबाद ATC को 7500 स्क्वाक कोड का सिग्नल महज कुछ सेकंड्स (Brief Duration) के लिए ही मिला था. सूत्रों से मिली शुरुआती जानकारी के अनुसार यह सिग्नल पायलट से गलती से बटन दब जाने के कारण या किसी टेक्निकल ग्लिच (तकनीकी खराबी) की वजह से जा सकता है. हालांकि सुरक्षा एजेंसियां किसी भी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहती हैं. फिलहाल इस बात की भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है कि यह बम की धमकी (Bomb Threat) है या हाईजैक अलर्ट. गुजरात ATS और अन्य एजेंसियां इस पूरे मामले की हर एंगल से गहन तफ्तीश कर रही हैं।  फ्लाइट AI-2030 की इमरजेंसी लैंडिंग की पूरी टाइमलाइन और ताजा अपडेट     पिछली रात (13 अक्टूबर शाम): एयर इंडिया की फ्लाइट AI-2030 जर्मनी के फ्रैंकफर्ट से दिल्ली के लिए रवाना हुई. विमान ने लगभग शाम 7:30 बजे फ्रैंकफर्ट से उड़ान भरी थी और इसका दिल्ली पहुंचने का तय समय सुबह करीब 4:15 बजे था।      सुबह (भारतीय एयरस्पेस में प्रवेश): विमान जैसे ही भारतीय हवाई क्षेत्र के पास पहुंचा, अहमदाबाद एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) को कुछ सेकंड के लिए Squawk 7500 (हाईजैक/अवैध दखल का अंतरराष्ट्रीय कोड) का सिग्नल मिला।      सुबह (डायवर्जन का फैसला): अलर्ट मिलते ही विमान को दिल्ली की जगह जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट की ओर मोड़ने का फैसला लिया गया. पायलट और क्रू ने स्थिति को संभालते हुए विमान को आगे बढ़ाया।      करीब सुबह 9:45 बजे: विमान जयपुर एयरपोर्ट पर सुरक्षित लैंड हो गया. इसके तुरंत बाद विमान को आइसोलेशन बे (अलगाव वाले क्षेत्र) में ले जाया गया, जहां सुरक्षा जांच के लिए इसे अन्य प्लेनों से दूर रखा जाता है।      सुबह 9:45 बजे के बाद: विमान के अंदर से मिली धमकी और अलर्ट के बाद यह कदम उठाया गया. विमान में सवार सभी यात्रियों (लगभग 250) और क्रू सदस्यों को सुरक्षित बाहर निकाला गया और टर्मिनल के होल्डिंग एरिया में ले जाया गया. CISF, स्थानीय पुलिस और बम डिटेक्शन एंड डिस्पोजल स्क्वाड (BDDS) ने विमान और सामान की सघन जांच शुरू की।      अभी तक की स्थिति: आधिकारिक तौर पर Squawk 7500 की पूरी पुष्टि या वास्तविक खतरे की पुष्टि अभी नहीं हुई है. सभी यात्री और क्रू मेंबर पूरी तरह सुरक्षित हैं. विमान की पूरी जांच होने के बाद ही इसके दिल्ली के लिए रवाना होने पर फैसला लिया जाएगा।  सुबह 9:45 बजे आइसोलेशन बे में उतरा विमान अहमदाबाद ATC से मिले अलर्ट के बाद सुबह करीब 9:45 बजे एयर इंडिया की इस फ्लाइट को जयपुर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के आइसोलेशन बे (Isolation Bay) पर ले जाया गया. आइसोलेशन बे एयरपोर्ट का वह सुरक्षित हिस्सा होता है जहाँ किसी भी संभावित सुरक्षा खतरे या हाईजैक की सूचना पर विमान को मुख्य टर्मिनल से दूर पार्क किया जाता है. विमान के उतरते ही सुरक्षा तंत्र पूरी तरह सक्रिय हो गया। 

राजस्थान में पशुपालकों को राहत, 1962 हेल्पलाइन से घर बैठे मिलेगी पशु चिकित्सा सेवा

जयपुर पशुपालन, गोपालन एवं मत्स्य विभाग के प्रमुख शासन सचिव विकास सीतारामजी भाले ने मंगलवार को राजस्थान संपर्क 181 हेल्पलाइन का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने हेल्पलाइन पर प्राप्त परिवादों, उनके निस्तारण की प्रगति तथा विभागीय कार्यप्रणाली की विस्तृत जानकारी ली। उन्होंने अधिकारियों को लंबित परिवादों का प्राथमिकता के आधार पर शीघ्र निस्तारण करने तथा परिवादियों को अधिकतम राहत उपलब्ध करवाने के निर्देश दिए। भाले ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी समस्या के समाधान की उम्मीद में परिवाद दर्ज करवाता है। कई बार परिवाद दर्ज करवाना उसके लिए अंतिम विकल्प होता है। ऐसे में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्रत्येक परिवाद को गंभीरता से लेते हुए उसका समयबद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण किया जाए। उन्होंने निर्देश दिए कि अन्य विभागों अथवा अधिकारियों के स्तर पर कार्रवाई अपेक्षित होने पर संबंधित परिवादों को बिना विलंब उचित स्तर पर प्रेषित किया जाए, ताकि उनके निस्तारण में अनावश्यक देरी न हो। निरीक्षण के दौरान भाले ने चूरू जिले के भूराराम के दुग्ध वाहन के लंबित भुगतान तथा पाली जिले के गुलाबचंद की अनुदान राशि के लंबित भुगतान की समस्या को सुना एवं संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्यवाही करते हुए शीघ्र समाधान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। इसी क्रम में उन्होंने डीग जिले के आबिद से मत्स्य पालन प्रशिक्षण की समस्या की जानकारी ली तथा उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण उपलब्ध करवाने के लिए आश्वस्त किया। वहीं, बाड़मेर जिले के महिपाल एवं मोतीलाल से गोवंश के लिए चारा-पानी की व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं की जानकारी लेते हुए इनके समाधान के लिए आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान भाले ने राजस्थान संपर्क एआई की कार्यप्रणाली एवं उसके उपयोग की विस्तृत जानकारी भी ली। उन्होंने कहा कि संपर्क एआई के प्रभावी उपयोग के लिए विभागीय अधिकारियों को आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, ताकि परिवादों के निस्तारण की प्रक्रिया को अधिक सुगम एवं तेज बनाया जा सके। 1962 हेल्पलाइन से घर पर उपलब्ध हो रही पशु चिकित्सा सेवा इस अवसर पर उन्होंने परिवादियों को 1962 हेल्पलाइन के विषय में जागरूक करते हुए कहा कि बीमार एवं जरूरतमंद पशुओं को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करवाना विभाग की प्राथमिकता है। पशुपालक हेल्पलाइन नंबर 1962 पर कॉल करके मोबाइल वेटरनरी वैन की सुविधा प्राप्त कर सकते हैं। इस सेवा के माध्यम से पशुपालकों के घर पर ही पशु चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध करवाकर बीमार पशुओं को समय पर उपचार एवं राहत प्रदान की जा रही है।

रबी बुवाई से पहले कृषि विभाग अलर्ट, खाद की कालाबाजारी रोकने के लिए दुकानों का निरीक्षण

  जैसलमेर  रबी सीजन की बुवाई से पहले किसानों को रासायनिक उर्वरकों की किल्लत से बचाने और वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कृषि विभाग ने जिले में निगरानी बढ़ा दी है। अगले सात दिनों में जिले की सभी उर्वरक, बीज और कीटनाशक विक्रय दुकानों का निरीक्षण किया जाएगा। जांच के दौरान मौके पर उपलब्ध स्टॉक का भौतिक सत्यापन कर विवरण ऑनलाइन दर्ज किया जाएगा। विभाग के अनुसार जिले की निजी दुकानों और सहकारी समितियों के पास यूरिया के 1,27,437 बैग, डीएपी के 38,530 बैग, एनपीके के 12,653 बैग तथा सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) के 14,522 बैग उपलब्ध हैं। विभाग का उद्देश्य रबी बुवाई के दौरान किसानों को जरूरत के अनुसार खाद उपलब्ध कराना है। लाइसेंस नंबर डालते ही खुलेगी विक्रेता की प्रोफाइल डिजिटल निरीक्षण प्रक्रिया में जांच अधिकारी मौके पर पहुंचकर विक्रेता का लाइसेंस नंबर ऐप में दर्ज करेंगे। इससे संबंधित डीलर की प्रोफाइल सामने आएगी। इसके बाद दुकान में उपलब्ध यूरिया, डीएपी, एसएसपी और अन्य कृषि आदानों के स्टॉक की गिनती कर विवरण ऐप पर अपलोड किया जाएगा। इससे निरीक्षण रिपोर्ट ऑनलाइन दर्ज होगी और उच्चाधिकारी उपलब्ध रिकॉर्ड की निगरानी कर सकेंगे। बिल, स्टॉक रजिस्टर और मूल्य सूची रखनी होगी अपडेट कृषि विभाग ने सभी खाद-बीज विक्रेताओं को खरीद-बिक्री के बिल, स्टॉक रजिस्टर और मूल्य सूची अद्यतन रखने के निर्देश दिए हैं। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को संबंधित दस्तावेज दिखाना अनिवार्य होगा। अभियान के जरिए खाद की कालाबाजारी, निर्धारित दरों से अधिक कीमत वसूलने और खाद के साथ अनावश्यक उत्पाद खरीदने के लिए किसानों पर दबाव डालने जैसी अनियमितताओं पर अंकुश लगाने का प्रयास किया जाएगा। नियमों का उल्लंघन करने और जांच में सहयोग नहीं करने वाले विक्रेताओं के खिलाफ नियमानुसार कानूनी एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। गड़बड़ियों को रोकने की कवायद औचक जांच अभियान का मुख्य उद्देश्य ब्लैक मार्केटिंग पर लगाम लगाना, कृषकों को सरकार की ओर से निर्धारित उचित मूल्यों पर ही खाद उपलब्ध कराना और खाद के साथ जबरन अन्य गैर-जरूरी उत्पाद थमाने (टैगिंग) जैसी गड़बड़ियों को प्रभावी ढंग से रोकना है – महावीर प्रसाद छींपा, संयुक्त निदेशक कृषि (विस्तार) जिला परिषद जैसलमेर  

राजस्थान के इस देवी धाम का अनोखा इतिहास, 1965 और 1971 की जंग में लोगों का बना था सहारा

 बाड़मेर रेगिस्तान की धरती पर आस्था का एक ऐसा शिखर है, जहां पहुंचते ही श्रद्धा और इतिहास का संगम दिखाई देता है। बाड़मेर शहर के सबसे पुराने देवी मंदिरों में शामिल यह धाम पीढ़ियों से लोगों की आस्था का केन्द्र बना हुआ है। यहां आने वाले भक्त मां के दर्शन कर परिवार की खुशहाली और देश की रक्षा की कामना करते हैं। सैनिक भी मां की आरती में शामिल होकर भवानी से देश की सुरक्षा की अरदास करते हैं। गढ़ की पहाड़ी पर बसा आस्था का इतिहास बाड़मेर के पुराने इतिहास की कड़ियां जूना बाड़मेर से जुड़ी हैं। जानकारों के अनुसार, जूना बाड़मेर के बाद बाहड़मेर बसा, जिसे बाहड़राव ने बसाया था। जूना बाड़मेर शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। इसके बाद 16वीं सदी में रावत भीमा ने ऊंची पहाड़ी पर गढ़ मंदिर का निर्माण करवाया। जोगमाया के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर समय के साथ शहर की धार्मिक पहचान बन गया। जोगमाया मंदिर में की गई सजावट पहाड़ी की तलहटी में पुराना बाड़मेर बसा था। एक ओर सोन तालाब, तो दूसरी ओर कारेली नाडी और नरगासर तालाब इसकी बसावट को खास बनाते थे। पुरानी बावड़ियां और आसपास फैली पहाड़ियां इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को बढ़ाती थीं। सोन तालाब के पास से सूजेश्वर की ओर फैली पहाड़ियों का दृश्य आज भी इस भूभाग की विशिष्ट पहचान है। जोशियों का वास, ढाणी बाजार, जीनगरों की बस्ती और मोक्षमार्ग पुराने बाड़मेर की बसावट के प्रमुख हिस्से थे। शहर की सीमा शहर कोतवाली तक मानी जाती थी। पुराने लोगों के अनुसार, कोतवाली क्षेत्र में घुड़साल हुआ करती थी। गांधी चौक के सामने स्थित ओल्ड स्कूल भी अंग्रेजों के जमाने का बताया जाता है। इसके आगे रेलवे स्टेशन तक का इलाका कभी वीरान रहता था। आस्था के साथ भरोसे का ठिकाना बना गढ़ मंदिर की आस्था केवल धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका जुड़ाव शहर के कठिन दौर से भी रहा है। रावत भीमा की वंश परंपरा से जुड़े रावत त्रिभुवनसिंह बताते हैं कि वर्ष 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जब बाड़मेर शहर पर बमबारी हुई, तब लोग सुरक्षा की आस में मंदिर की सीढ़ियों पर आकर बैठते थे। गढ़ मंदिर स्थिति मंदिर में विराजीं जोगमाया पहाड़ी पर स्थित मंदिर लोगों के लिए आस्था के साथ भरोसे का ठिकाना भी बना। मंदिर परिसर में नागणेच्यां माता का मंदिर भी है। इसके पास बंकर बनाए गए थे। पहाड़ी की संकरी सीढ़ियों और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र के कारण लोगों को यहां आसरा मिलता था। युद्ध की उन यादों के बीच मां के प्रति लोगों की श्रद्धा और विश्वास आज भी कायम है।

राजस्थान में अरावली को भारी नुकसान, अवैध खनन और निर्माण से बिगड़ रहा पर्यावरणीय संतुलन

अजमेर  शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अरावली पर्वतमाला की छोटी चट्टानें संकट में हैं। आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के चलते मैदानी इलाकों में 50 प्रतिशत से अधिक चट्टानें खत्म हो चुकी हैं। इससे जैव विविधता पर असर पड़ रहा है। करीब 2.5 से 3.2 अरब वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला राजस्थान और हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक करीब 700 किलोमीटर में फैली हुई है। अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, देवगढ़ और पाली-सिरोही के मैदानी क्षेत्रों में छोटी चट्टानें हैं। ये चट्टानें मिट्टी के कटाव को रोकने और उसकी उर्वरा क्षमता बनाए रखने में काफी सहायक रही हैं। बीते 30-35 वर्षों में हालात खराब हो गए हैं। चट्टानें काटकर निर्माण अजमेर में वैशाली नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, शास्त्री नगर, एलआईसी कॉलोनी, आंतेड़, कृष्णगंज, पंचशील और लोहागल सहित कई इलाकों में पहले 70 प्रतिशत तक चट्टानें थीं। आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के चलते चट्टानों को ब्लास्टिंग से हटाया गया। अब इन इलाकों में केवल 30 प्रतिशत चट्टानें ही बची हैं। इसी तरह हाथीखेड़ा, बोराज, ब्यावर और किशनगढ़ सहित अन्य इलाकों में भी चट्टानों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। पर्यावरण को पहुंचा नुकसान चट्टानों को काटकर आवासीय और व्यावसायिक निर्माण जारी है। इससे मिट्टी की उर्वरा क्षमता को नुकसान पहुंचा है। चट्टानी इलाकों के 40 प्रतिशत प्राकृतिक झरने बंद हो चुके हैं। गूंदा, खेजड़ी, देसी बबूल, बेर और थोर जैसे पौधे खत्म हो रहे हैं। कई जगह जमीन खोखली हो चुकी है। धीरे-धीरे बढ़ रहे टीले 25-30 साल पहले तक यहां रेत के छोटे-छोटे टीले थे। अब पुष्कर-नागौर सीमा सहित अजमेर के शहरी क्षेत्रों के निकट माकड़वाली, होकरा और कायड़ में रेतीले टीलों का दायरा जिले में 20 किलोमीटर तक फैल चुका है। चाचियावास, नसीराबाद और ब्यावर-उदयपुर मार्ग पर भी कई जगह टीले बढ़ रहे हैं। अरावली को कर रहे छलनी अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, राजसमंद, सावर, सिरोही, चित्तौड़गढ़, नागौर और पाली सहित अन्य इलाकों में अवैध खनन के कारण अरावली का 35 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो चुका है। केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार, कई जगह अरावली खोखली हो चुकी है। यों जरूरी हैं छोटी चट्टानें     मिट्टी का कटाव रोकने में मददगार।     मैदानी इलाकों में तापमान संतुलित रखने में सहायक।     मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों का संरक्षण।     रेत, गाद और चिकनी मिट्टी का संतुलित मिश्रण बनाए रखने में सहायक।     भूमि की उर्वरता और नमी बनाए रखने में मददगार।     उपजाऊ मिट्टी फसल उत्पादन में सहायक।     मिट्टी भूजल के लिए प्राकृतिक फिल्टर का कार्य करती है। इनका कहना है… छोटी चट्टानें प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली ठोस संरचनाएं हैं। इनमें कई खनिजों के अलावा मिट्टी की उर्वरा क्षमता बढ़ाने और अपरदन रोकने की जबरदस्त क्षमता होती है। चट्टानों की कमी ही प्राकृतिक असंतुलन बढ़ा रही है। इनका संरक्षण नहीं किया गया तो मिट्टी का अपरदन और मरुस्थल का फैलाव बढ़ेगा। प्रो. सुब्रोतो दत्ता, रिमोट सेंसिंग एवं पर्यावरण विभाग, एमडीएस विश्वविद्यालय

मां अंबा का ऐसा धाम जहां भक्त की पुकार पर चट्टान पर उभरे कुमकुम पदचिह्न, जानें आरासुरी मंदिर की कथा

जयपुर देश के 51 शक्तिपीठों में शुमार जगतजननी मां अम्बा का यह इकलौता ऐसा शक्तिपीठ है, जो भौगोलिक रूप से दो स्थानों पर एक समान आस्था के साथ पूजा जाता है। एक सिरोही जिले में पिंडवाड़ा के समीप स्थित मूल 'आरासुरी अंबा माता मंदिर' और दूसरा गुजरात सीमा पर स्थित विश्वप्रसिद्ध शक्तिपीठ अंबाजी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान शिव सती के पार्थिव देह को लेकर ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे, तब मां पार्वती का पावन 'नाभि' अंग आरासना की इसी सुरम्य पहाड़ी पर गिरा था। आज भी दोनों ही धामों पर मां के नाभि स्वरूप की उपासना होती है। भारतीय इतिहास संकलन समिति के प्रांत उपाध्यक्ष एवं इतिहासकार डॉ. उदयसिंह डिंगार के अनुसार, आरासना अंबाजी देश के प्रमुख शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। इस धाम की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि मुख्य मंदिर में मां की कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है, बल्कि यहां देवी के नाभिकमल रूपी 'चक्र' की पूजा की जाती है। त्रिशूल से किया था नरभक्षी आरासुर का संहार पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस सुरम्य वनक्षेत्र में आरासुर नामक एक भयानक नरभक्षी राक्षस का भारी आतंक था। स्थानीय जनजीवन की रक्षा के लिए मां शक्ति ने अपने त्रिशूल से उस दैत्य का संहार किया और क्षेत्र में शांति स्थापित की। इसी से माता का नाम ‘आरासुरी देवी’ पड़ा। वर्तमान मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित पहाड़ी पर आज भी उस प्राचीन स्थल पर त्रिशूल स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त की पुकार पर चट्टान पर उभरे थे कुमकुम पद-चिह्न जनश्रुति के अनुसार, माली समाज की एक परम भक्त महिला प्रतिदिन दुर्गम पहाड़ी पर चढ़कर मां के त्रिशूल की पूजा करती थीं। वृद्धावस्था में जब वे अशक्त हुईं और पहाड़ी चढ़ने में असमर्थ हो गईं, तो उन्होंने मां से कातर भाव से प्रार्थना की। भक्त की अनन्य साधना से रीझकर आदिशक्ति ने पहाड़ी की तलहटी में एक विशाल चट्टान पर कुमकुम के पद-चिह्न ‘चक्र’ के रूप में प्रकट कर दिए। तब से उस चट्टान पर चक्र की उपासना होने लगी। सदियों पुरानी इस परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी उसी माली परिवार के वंशज पीढ़ी-दर-पीढ़ी मंदिर में सेवा-पूजा का दायित्व निभा रहे हैं। शर्त टूटने से सीमा पर ही स्थापित हो गईं मां इतिहासकार डॉ. डिंगार बताते हैं कि गुजरात के दांता स्टेट के दरबार मां आरासुरी के अनन्य उपासक थे और हर वर्ष दर्शन के लिए यहां आते थे। उन्होंने मां से दांता पधारने की प्रार्थना की। देवी ने शर्त रखी कि मार्ग में पीछे मुड़कर नहीं देखना। यात्रा के दौरान दांता राज्य की सीमा पर जैसे ही राजा ने संशयवश पीछे मुड़कर देखा, मां की शक्ति वहीं ठहर गई। इसके बाद दांता दरबार ने उसी स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज ‘दांता अंबाजी’ के नाम से दुनियाभर में विख्यात है। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के चलते आरासना अंबाजी को ही अंबा भवानी का मूल और आदि प्राकट्य स्थल माना जाता है।

नीम, हल्दी और एलोवेरा वाले प्रोडक्ट्स की बढ़ी मांग, जयपुर बना हर्बल कॉस्मेटिक्स कारोबार का बड़ा केंद्र

जयपुर  चेहरे पर क्या लगाया जाए, अब यह सवाल सिर्फ रंगत और चमक तक सीमित नहीं रहा। जयपुर में ब्यूटी प्रोडक्ट्स खरीदते समय ग्राहक उनकी सामग्री, प्राकृतिक आधार और त्वचा पर असर को भी तवज्जो देने लगे हैं। नीम, हल्दी, गुलाब, चंदन और एलोवेरा जैसे घटकों वाले उत्पादों की ओर बढ़ते रुझान ने बाजार की पसंद बदल दी है। आइएमएआरसी की 2025 रिपोर्ट के अनुसार जयपुर में हर्बल स्किनकेयर उत्पादों की बिक्री में 40 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इस बढ़ते बाजार का सबसे बड़ा फायदा जयपुर को मिला है। आंकड़ों के अनुसार हर्बल कॉस्मेटिक्स से जुड़े कारोबार में जयपुर में करीब 20 हजार रोजगार सृजित हुए हैं। पूरे राजस्थान के 50 हजार रोजगार में 60 फीसदी महिलाएं और 40 फीसदी पुरुष हैं। खास बात यह है कि 18 से 35 वर्ष की उम्र के युवा इस कार्यबल का करीब 70 फीसदी हिस्सा है। यानी हर्बल कॉस्मेटिक्स अब सिर्फ सौदर्य उत्पादों का बाजार ही नहीं, बल्कि युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार का नया क्षेत्र भी बन रहा है। छोटे उत्पाद निर्माताओं के लिए नया बाजार बदलाव सिर्फ खुदरा खरीदारी में नहीं है। सैलूनों में ऑर्गेनिक ट्रीटमेंट्स की मांग भी बढ़ी है। नीम, हल्दी, चंदन और गुलाब आधारित उत्पादों की मांग इस बदलाव का हिस्सा है। ग्राहक अब केवल तत्काल असर वाले उपचार के बजाय त्वचा और बालों की जरूरत के हिसाब से उत्पाद चुनने लगे हैं। इससे सैलून, ब्यूटी प्रोफेशनल्स और छोटे उत्पाद निर्माताओं के लिए भी नया बाजार तैयार हुआ है। गुलाबी नगर सबसे आगे शहरवार बाजार में भी जयपुर सबसे आगे दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार जयपुर में हर्बल स्किनकेयर उत्पादों की बिक्री में 40 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई, जबकि उदयपुर में 35, जोधपुर में 30, कोटा में 25 और अजमेर में 20 फीसदी बढ़ोतरी हुई। जयपुर में हल्दी-गुलाब फेस पैक जैसे त्वचा देखभाल उत्पादों की मांग के साथ हर्बल फेसवॉश, क्रीम और अन्य त्वचा उत्पादों का बाजार भी फैल रहा है। नेचुरल प्रोडक्ट्स को लेकर जागरूकता बढ़ी लोगों में नेचुरल प्रोडक्ट्स को लेकर जागरूकता पहले की तुलना में बढ़ी है। महिलाओं के साथ टीनएजर्स और युवाओं की रुचि भी हर्बल प्रोडक्ट्स में बढ़ रही है। हालांकि, नेचुरल होने का मतलब यह नहीं कि कोई प्रोडक्ट हर स्किन और हेयर टाइप के लिए सही हो। इसलिए जरूरत के अनुसार सही प्रोडक्ट चुनना और इंग्रेडिएंट्स की जानकारी रखना जरूरी है। मोनिका गुप्ता, शोध छात्रा हर्बल उत्पाद Rajasthan : स्रोत: आईएमएआरसी रिपोर्ट 2025 पाँच साल के आंकड़े (2019-2024) वर्ष – कारोबार – निर्यात – रोजगार – महिला स्टार्ट-अप्स -मांग (करोड़)(करोड़) (फीसदी)(फीसदी) 2020 450 180 25,000 22 25 2021 550 220 30,000 25 30 2022 650 260 40,000 30 35 2023 700 280 45,000 33 38 2024 800 320 50,000 35 40 स्रोत: आईएमएआरसी रिपोर्ट 2025

राजस्थान के रेगिस्तान में उगने वाला कड़वा फल बढ़ाएगा किसानों की आय, औषधीय गुणों पर वैज्ञानिकों का फोकस

जयपुर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला तुम्बा अब किसानों की अतिरिक्त कमाई का जरिया बन सकता है। कड़वे फल वाली इस जंगली बेल को स्थानीय स्तर पर इंद्रायण भी कहा जाता है। कम पानी, अत्यधिक तापमान और कम उपजाऊ मिट्टी में जीवित रहने की क्षमता के कारण यह शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयोगी फसल बन सकती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) का इंडियन हार्टिकल्चर के सितंबर-अक्टूबर 2026 के अंक में पब्लिश रिसर्च में तुम्बा की औषधीय उपयोगिता और आर्थिक संभावनाओं को रेखांकित किया गया है। शोध के अनुसार, तुम्बा शुष्क और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला एक औषधीय पौधा है, जिसका अब तक सीमित उपयोग किया गया है। यह पौधा सूखे और अत्यधिक गर्मी जैसी कठिन परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम है। इसकी खासियत यह है कि कम उपजाऊ मिट्टी में भी जीवित रह सकता है और उग सकता है। इन विशेषताओं के कारण तुम्बा पश्चिमी राजस्थान जैसे रेगिस्तानी इलाकों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। शोध में इसके व्यवस्थित उत्पादन की संभावनाओं को रेखांकित किया गया है। उचित तरीके से इसकी खेती को बढ़ावा देने पर शुष्क क्षेत्रों में इसके उपयोग और उत्पादन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। औषधीय गुणों पर वैज्ञानिक रुचि शोध के अनुसार तुम्बा में विभिन्न जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। इसके अर्क में मधुमेहरोधी, रेचक, सूजनरोधी और रोगाणुरोधी गुणों की संभावनाएं सामने आई हैं। आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में भी इसका उपयोग होता रहा है। हालांकि, इन गुणों को आधुनिक चिकित्सा में प्रमाणित उपचार मानने से पहले प्रभावशीलता, सुरक्षित मात्रा और दुष्प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन जरूरी है। मधुमेह या किसी अन्य बीमारी के इलाज में इसका इस्तेमाल चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिए। किसानों के लिए ऐसे खुलेगा कमाई का रास्ता तुम्बा की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने से प्राकृतिक रूप से उपलब्ध इस वनस्पति का आर्थिक मूल्य बढ़ सकता है। इसके लिए उपयुक्त किस्मों, खेती की तकनीक, उपज, प्रसंस्करण और बाजार की मांग पर काम करना होगा। औषधीय पौधों के उपयोगी घटकों का मूल्यवर्धन होने पर किसानों और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी बन सकते हैं।