samacharsecretary.com

बालाघाट पहुंचेंगे राहुल गांधी, पीड़ित आदिवासी परिवारों से करेंगे मुलाकात

बालाघाट. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी एक बार फिर से मध्य प्रदेश के दौर पर रहेंगे। वह एक अक्टूबर को बालाघाट जाएंगे और आदिवासी बच्चों की मौतों को लेकर पीड़ित परिवार से मुलाकात करेंगे। कांग्रेस नेता बैहर और बिरसा के प्रभावित आदिवासी इलाकों में जाकर मृत बच्चों के परिवारों से बातचीत करेंगे। बालाघाट में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक 32 बच्चों की मौत हो चुकी है। इंदौर कार्यक्रम में हुए थे शामिल काग्रेस सांसद का 13 दिन में मध्य प्रदेश का यह दूसरा दौरा रहने वाला है। इससे पहले वह 19 सितंबर को इंदौर के कार्यक्रम 'छात्रों की गूंज' में शामिल हुए थे। कार्यक्रम से पहले उन्होंने लिखा था कि 30 से ज्यादा आदिवासी बच्चों की बीमारी, कुपोषण से मौतें हो रही हैं, लेकिन कार्रवाई सुस्त रही। सरकार सोती रही। विक्रांत भूरिया ने की थी बातचीत आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉक्टर विक्रांत भूरिया ने केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना से प्रभावितों के आंदोलन, बालाघाट में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से बैगा आदिवासी बच्चों की मौत, देवास सहित अन्य जिलों में आदिवासियों को भूमि से बेदखल करने, वनाधिकार पत्र अब तक प्राप्त न होने सहित अन्य मामलों के बारे में बताया था। कुपोषण और स्वास्थ्य बदहाली पर उठे सवाल सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने पार्टी पदाधिकारियों से बातचीत की और कहा कि वह एक अक्टूबर को बालाघाट आएंगे और प्रभावितों से मिलेंगे। इसके बहाने वे आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य, कुपोषण और सरकारी सेवाओं की स्थिति पर सरकार को घेरने के साथ यह संदेश देने का प्रयास करेंगे कि भाजपा केवल आदिवासी हितैषी होने की बात करती है मगर वास्तविकता तो बालाघाट, पन्ना, छतरपुर, सिंगरौली और देवास में दिखाई देती है।

झारखंड के मांदर को मिली आधिकारिक पहचान, GI टैग से कारीगरों को भी फायदा

 रांची  झारखंड की लोकसंस्कृति, आदिवासी जीवन और पारंपरिक नृत्य की पहचान बन चुका मांदर अब आधिकारिक रूप से झारखंड के नाम से दर्ज हो गया है। भारत सरकार के भौगोलिक संकेतक (जीआई) रजिस्ट्री, चेन्नई ने ‘मांदर ऑफ झारखंड’ को जीआई का दर्जा प्रदान किया है। इसके साथ ही मांदर को बनाने वाले पारंपरिक कारीगरों और सदियों पुरानी इसकी निर्माण परंपरा को भी नई पहचान मिली है। जीआई रजिस्ट्री के अभिलेख में इसका आवेदन नंबर 777 है। आवेदन 24 सितंबर 2021 को दाखिल किया गया था और इसका भौगोलिक क्षेत्र झारखंड दर्ज है। देवघर के पेड़ा को भी जल्द जीआइ टैग मिल सकता है। प्रक्रिया अंतिम चरण में है। लाल मिट्टी, पारंपरिक निर्माण और विशिष्ट आवाज बनी आधार मांदर को जीआई पहचान दिलाने के लिए दाखिल आवेदन में इसकी विशिष्ट बनावट, स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण पद्धति और खास ध्वनि को प्रमुख आधार बनाया गया। आवेदन में झारखंड के विभिन्न जनजातीय समुदायों के संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन से मांदर के लंबे जुड़ाव का भी प्रमाण प्रस्तुत किया गया था। विशेष रूप से स्थानीय लाल मिट्टी के इस्तेमाल और पीढ़ियों से चली आ रही निर्माण परंपरा को दर्ज किया गया। 1915 से 1956 तक के दस्तावेज बने मजबूत साक्ष्य मांदर के झारखंड से पुराने और विशिष्ट सांस्कृतिक संबंध को साबित करने के लिए आवेदन के साथ कई ऐतिहासिक दस्तावेज लगाए गए। इनमें मानवशास्त्री सरत चंद्र राय की 1915 की कृति, तारकचंद्र दास की 1931 की कृति और डब्ल्यू. जी. आर्चर की 1940 में प्रकाशित पुस्तक ‘द ब्लू ग्रोव’ में मांदर के उल्लेख को प्रमुख साक्ष्य बनाया गया। इसके अलावा 1920 की पटना संग्रहालय की वार्षिक रिपोर्ट, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की 1956 की फोक डांसेज इन इंडिया तथा बिहार जिला गजेटियर, रांची समेत अन्य अभिलेख भी प्रस्तुत किए गए। इन दस्तावेजों में मांदर को तत्कालीन झारखंड क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन से जुड़ा वाद्य बताया गया है। गुमला के रैदिह के कारीगरों की भी दर्ज हुई पहचान जीआई आवेदन में रैदिह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, ग्राम जरजट्टा, प्रखंड रैदिह, जिला गुमला को आवेदक बताया गया है। आवेदन में मांदर को हस्तशिल्प की श्रेणी में रखा गया है। दस्तावेज में मांदर निर्माण से जुड़े कारीगरों की सूची भी शामिल है। यानी जीआई टैग केवल मांदर को ही नहीं, बल्कि इसकी पारंपरिक कारीगरी से जुड़े लोगों की पहचान को भी मजबूत करता है। दिल्ली में हुई अंतिम सुनवाई, दस्तावेजों के साथ रखी गई झारखंड की दावेदारी मांदर को जीआई दर्जा दिलाने की प्रक्रिया में बौद्धिक संपदा और भौगोलिक संकेतक के विशेषज्ञ तथा एनयूएसआरएल, रांची के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने आवेदन दाखिल करने से लेकर जीआई रजिस्ट्री के समक्ष मामले की पैरवी, दस्तावेज व अनुपालन प्रस्तुत करने और विभिन्न चरणों में पक्ष रखने का काम किया। जनवरी 2025 में दिल्ली में हुई अंतिम सुनवाई में भी उन्होंने मामले की पैरवी की। इस प्रक्रिया में एनयूएसआरएल, रांची ने कानूनी और प्रक्रियात्मक सहयोग दिया। गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी और जिला प्रशासन ने भी आवश्यक स्थानीय व प्रशासनिक सहयोग उपलब्ध कराया। पहले सोहराय-खोवर, अब मांदर डॉ. सत्यदीप सिंह इससे पहले झारखंड की सोहराय-खोवर चित्रकला को जीआइ पहचान दिलाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। दस्तावेज के अनुसार सोहराय-खोवर झारखंड का पहला जीआइ बना था। इसी वर्ष कोडरमा के केसरिया कलाकंद को जीआइ दर्जा दिलाने की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका रही। मांदर को मिली मान्यता इसी क्रम की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है। अब कारीगरों को बाजार और पहचान मिलने की उम्मीद जीआई दर्जा किसी खास क्षेत्र से जुड़े उत्पाद की विशिष्ट पहचान को औपचारिक मान्यता देता है। मांदर को यह दर्जा मिलने से झारखंड की पारंपरिक कारीगरी, लोकज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में रास्ता मजबूत हुआ है। साथ ही रैदिह और दूसरे क्षेत्रों में मांदर बनाने वाले कारीगरों के उत्पाद को झारखंड के नाम से अलग पहचान मिलने का आधार तैयार हुआ है। दस्तावेज में भी इसे पारंपरिक कारीगरों को पहचान दिलाने और झारखंड की लोकपरंपरा को व्यापक स्तर तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया गया है। फैक्ट फाइल उत्पाद : मांदर ऑफ झारखंड जीआई आवेदन संख्या : 777 आवेदन की तिथि : 24 सितंबर 2021 स्थिति : पंजीकृत श्रेणी : हस्तशिल्प भौगोलिक क्षेत्र : झारखंड आवेदक :रैदिह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, गुमला

अधिकारियों को दिए निर्देश, तत्परता और संवेदनशीलता से हो जनता की समस्याओं का समाधान

गोरखपुर  सोमवार को गोरखपुर दौरे पर आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार सुबह गोरखनाथ मंदिर में जनसेवा के नियमित प्रकल्प 'जनता दर्शन' में विभिन्न जिलों से आए लोगों से मुलाकात की। गंभीरता से उनकी समस्याएं सुनीं और अधिकारियों को निर्देशित किया कि जन समस्याओं का समाधान तत्परता और संवेदनशील तरीके से किया जाए। इसमें किसी भी तरह की शिथिलता या लापरवाही पाए जाने पर जवाबदेही तय करते हुए संबंधित के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। जनता की समस्याओं का समाधान सरकार की प्राथमिकता है। हर समस्या का निस्तारण गुणवत्तापूर्ण, पारदर्शी और संतुष्टिपरक होना चाहिए। गोरखनाथ मंदिर परिसर के महंत दिग्विजयनाथ स्मृति भवन के सामने आयोजित जनता दर्शन में कुर्सियों पर बैठाए गए लोगों तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद पहुंचे और एक-एक करके सबकी समस्याएं सुनीं। उन्होंने करीब 150 लोगों से मुलाकात की। सबको आश्वस्त किया, घबराइए मत, समस्या का समाधान सुनिश्चित कराया जाएगा।  सबके प्रार्थना पत्रों को अधिकारियों को संदर्भित करते हुए त्वरित निस्तारण के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि किसी के साथ भी अन्याय नहीं होना चाहिए। हर पीड़ित के साथ संवेदनशील व्यवहार अपनाते हुए उसकी सहायता की जानी चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए कि किसी की जमीन पर अवैध कब्जा करने वाले, कमजोरों को उजाड़ने वाले किसी भी सूरत में बख्शे न जाएं। उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। जनता दर्शन में कई लोग इलाज के लिए आर्थिक सहायता की गुहार लेकर पहुंचे थे। सीएम योगी ने उनके प्रार्थना पत्रों को अधिकारियों को हस्तगत करते हुए निर्देश दिया कि इलाज से जुड़ी एस्टीमेट की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूर्ण करा कर शासन में उपलब्ध कराया जाए। गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए सरकार भरपूर मदद उपलब्ध कराएगी। मुख्यमंत्री ने गोशाला में की गोसेवा गोरखनाथ मंदिर प्रवास के दौरान मंगलवार सुबह  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंदिर की गोशाला में जाकर गोसेवा भी की। उन्होंने गायों, गोवंश व नंदी को खूब दुलारा, गुड़ खिलाया और गोशाला के कार्यकर्ताओं को गोवंश की समुचित देखभाल के निर्देश दिए।

मुजफ्फरपुर में नदियां उफान पर, गंडक खतरे के निशान तक पहुंची

पटना बिहार के कई जिले बाढ़ का कहर झेल रहे हैं। खासकर गंडक नदी ने बड़ी तबाही ला दी है। अब मुजफ्फरपुर जिले से गुजरने वाली तीनों प्रमुख नदियों का जलस्तर चिंताजनक बना हुआ है। जिला आपातकालीन संचालन केंद्र द्वारा आज मंगलवार सुबह 6 बजे जारी दैनिक जलस्तर एवं बाढ़ पूर्वानुमान आंकड़े के अनुसार, गंडक नदी रेवाघाट में खतरे के निशान पर पहुंच गई है, जबकि बागमती नदी दो स्थानों पर खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही है। रेवाघाट (गंडक) – खतरे के निशान पर, बढ़ोतरी जारी गंडक नदी का उच्चतम जलस्तर 55.46 मीटर (वर्ष 2020) है। इसका खतरे का निशान 54.41 मीटर है। आज सुबह 6 बजे यह ठीक 54.41 मीटर पर पहुंच गई है और बढ़ने की प्रवृत्ति में है। यानी अगले कुछ घंटों में यह लाल निशान को पार कर जाएगी। इससे साहेबगंज और पारू प्रखंड में चिंता की स्थिति बन रही है। कटौझा (बागमती) – 1.30 मीटर ऊपर, पर अब घट रही बागमती नदी का कटौझा में खतरे का निशान 55.00 मीटर है, जबकि आज का जलस्तर 56.30 मीटर है। यह खतरे से 1.30 मीटर ऊपर है। हालांकि राहत की बात है कि इसकी प्रवृत्ति घटने की है। उच्चतम स्तर 58.34 मीटर (2024) से अभी नीचे है। बेनीबाद (बागमती) – 1.24 मीटर ऊपर, स्थिर बेनीबाद में बागमती का खतरे का निशान 48.68 मीटर है। आज का स्तर 49.92 मीटर है, जो खतरे से 1.24 मीटर ऊपर है। प्रवृत्ति स्थिर है। इससे कटरा और गायघाट प्रखंड के तटबंध पर दबाव बना हुआ है। इसका सर्वकालिक उच्च स्तर 50.12 मीटर (2025) है। सिकंदरपुर (बूढ़ी गंडक) – खतरे से नीचे, पर बढ़ रही शहर के बीच से गुजरने वाली बूढ़ी गंडक सिकंदरपुर में खतरे के निशान 52.53 मीटर से नीचे है। आज का स्तर 48.90 मीटर है, लेकिन यह बढ़ने की प्रवृत्ति में है। लगातार हो रहीl बारिश के अब थमने से थोड़ी राहत मिली है। इसका उच्चतम स्तर 54.29 मीटर (1987) रहा है। गंडक बराज की क्या है स्थिति बता दें कि वाल्मिकीनगर स्थित गंडक बराज पर नदी का जलस्त्राव 13 घंटे तक 5 लाख क्युसेक से अधिक तथा 32 घंटे तक 4 लाख क्युसेक से अधिक बना रहा। दिनांक 26 एवं 27, सितम्बर के बीच बिहार स्थित गंडक नदी के सीमावर्ती जिलों यथा पश्चिम चम्पारण, पूर्वी चम्पारण एवं गोपालगंज में भी काफी अधिक वर्षापात हुई है, जिसके कारण गंडक बराज के निम्नप्रवाह में नदी का जलस्तर पूर्व से ही बढ़ा हुआ है। इस बार बराज से प्रवाहित जलस्त्राव कुछ कम रहने के बावजूद नदी द्वारा बगहा गेजस्थल पर 91.25 मीटर का अब तक का नया उच्चतम जलस्तर दर्ज किया गया है, जो पूर्व के उच्चतम जलस्तर 90.90 मीटर (वर्ष 2024) से 0.35 मीटर अधिक है। गंडक नदी से प्रवाहित अत्यधिक जलस्त्राव के फलस्वरुप नदी पर निर्मित तटबंधों पर भारी दबाव की स्थिति बनी हुई है तथा कई स्थलों पर सीपेज, पाईपिंग एवं ओवर-टाॅपिंग की समस्या भी उत्पन्न होती रही। अभी तक 169 बिन्दुओं पर हुए सीपेज/पाईपिंग को तत्काल कार्य कराते हुए सुरक्षित किया गया है। गंडक नदी के बढ़े हुए जलस्तर के कारण 28-29, सितम्बर के मध्यरात्रि में, पश्चिम चम्पारण जिला अंतर्गत, गंडक नदी के बांयें तट पर निर्मित चम्पारण तटबंध 02 स्थलों पर (1. ग्राम-खैरतवा, प्रखंड-बगहा-1 एवं 2. ग्राम-फुलियाखाड़, प्रखंड-बैरिया) क्षतिग्रस्त हुआ है। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश प्रभाग में कुशीनगर जनपद अंतर्गत गंडक नदी के दायें तट पर निर्मित तटबंध एक स्थल पर क्षतिग्रस्त हुआ है।

मानसून की विदाई तय, 15 साल में दूसरी बार औसत से कम बारिश

भोपाल मानसून सीजन की विदाई अब लगभग तय हो चुकी है, आईएमडी एक सप्ताह में इसकी घोषणा कर सकता है। इस साल बारिश का औसत कोटा भी अब तक पूरा नहीं हुआ है। अब भी जिले की औसत बारिश के लिए चार इंच वर्षा की दरकार है। पिछले 15 साल में ये दूसरी बार है जब औसत से कम बारिश हुई है। कम बारिश से आगामी रबी सीजन में किसानों को गेहूं-चना की फसल में सिंचाई के लिए पानी की परेशानी हो सकती है। इस साल 15 वर्ष में पहली बार इंदिरा सागर बांध के गेट तक नहीं खुले। सितंबर में 86 मिमी ही बारिश हई जिले की औसत बारिश 808.8 मिमी है। इस साल मानसून सीजन में अब तक 708 मिमी बारिश ही दर्ज हो पाई है। इसके पूर्व वर्ष 2017 में सितंबर के अंत तक 758 मिमी बारिश हुई थी। सितंबर माह की देखी जाए तो इस साल सितंबर माह में कुल 86 मिमी बारिश ही हुई है। इसके पूर्व वर्ष 2015 में सितंबर माह में कुल 85 मिमी बारिश दर्ज की गई थी। पिछलेे कुछ वर्षों में बारिश का ट्रैक रिकार्ड देखा जाए तो सितंबर में हुई बारिश से औसत बारिश का कोटा पूरा होता आया है। इस बार स्थिति नहीं बन रही है। कृषि विभाग कम पानी वाली फसल फसलों की दे रहा सलाह इस साल समय अंतराल में हुई बारिश से खरीफ की फसलों को तो फायदा पहुंचा है, लेकिन आगामी रबी सीजन में किसानों के सामने परेशानी आ सकती है। जिले के छोटे-बड़े कुल 49 तालाब 94.14 प्रतिशत भरे हैं। वहीं, दो प्रमुख बांधों में इंदिरा सागर बांध भी अपनी पूर्ण जल भराव क्षमता के करीब सवा मीटर नीचे है। हालांकि बरगी से छोड़े गए पानी से इसका एफआरएल पूरा होता दिख रहा है। ओंकारेश्वर बांध भी दो मीटर खाली है। आगामी रबी सीजन की स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग अभी से किसानों को कम पानी वाली फसलों की बुआई की समझाइश दे रहा है। पांच साल में बारिश की स्थिति वर्ष मानसून सीजन सितंबर में बारिश 2022 1049 मिमी 273 मिमी 2023 918 मिमी 480 मिमी 2024 964 मिमी 212 मिमी 2025 866 मिमी 205 मिमी 2026 708 मिमी 86 मिमी -28 सितंबर तक दोनों प्रमुख बांधों की स्थिति ओंकारेश्वर बांध जल भराव क्षमता 196.60 मी., वर्तमान में 294.57 मी., दो मीटर खाली इंदिरा सागर बांध जल भराव क्षमता 262.13 मी., वर्तमान में 261.07 मी., सवा मीटर खाली यह है जिले के तालाबों की स्थिति भगवंत सागर बांध कुल जल भराव क्षमता 78.06 एमसीएम, वर्तमान में 75.07 एमसीएम भाम मध्यम योजना कुल जल भराव क्षमता 29.73 एमसीएम, वर्तमान में 27.71 एमसीएम आवलियां तालाब कुल जल भराव क्षमता 22.199 एमसीएम, वर्तमान में 17.72 एमसीएम 46 छोटी परियोजनाएं कुल जल भराव क्षमता 40.82, वर्तमान में 39.729 एमसीएम अब बारिश की संभावना एक प्रतिशत जिले में बारिश का कोई नया सिस्टम अब नजर नहीं आ रहा है। स्थानीय सिस्टम से एक प्रतिशत बारिश की संभावना है। इस साल औसत से कम बारिश हुई है। गर्मियों की फसल को सिंचाई के लिए पानी की परेशानी आ सकती है। डॉ. सौरव गुप्ता, कृषि एवं मौसम विशेषज्ञ बिजली उत्पादन में कोई परेशानी नहीं इस बार डैम के गेट नहीं खुल है। बरगी बांध से छोड़े गए पानी से इंदिरा सागर बांध का जल स्तर 262 तक पहुंच जाएगा। सीजन में बिजली उत्पादन को लेकर कोई परेशानी नहीं आएगी। अरमेंद्र सिंह, डीजीएम, इंदिरा सागर परियोजना

यूके से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर लौटे तन्मय तिवारी ने कानपुर में शुरू किया कारोबार

ग्रेटर नोएडा उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर किस तरह युवाओं और नए उद्यमियों को रक्षा एवं एयरोस्पेस विनिर्माण से जोड़ रहा है, इसकी प्रेरक कहानी डेटम एडवांस्ड कंपोजिट्स के सह-संस्थापक एवं उप प्रबंध निदेशक तन्मय तिवारी ने यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में यूपीडा के विशेष सत्र में साझा की। यूके में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटे तन्मय ने महज वन बीएचके फ्लैट से अपना कारोबार शुरू किया और आज उनकी कंपनी रक्षा क्षेत्र के लिए उन्नत और हल्के कंपोजिट उपकरण तैयार कर रही है। तन्मय तिवारी ने बताया कि उन्होंने ब्रिटेन में करीब पांच वर्ष बिताए और वहीं से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में स्नातक और परास्नातक की डिग्री पूरी की। वर्ष 2020 में लखनऊ में आयोजित डिफेंस एक्सपो के दौरान उन्होंने भारत के रक्षा एवं एयरोस्पेस विनिर्माण इकोसिस्टम को करीब से देखा। डिफेंस एक्सपो में पांच दिन बिताने के बाद उन्होंने तय किया कि कंपनी की शुरुआत यूके के बजाय भारत में ही की जाएगी। उन्होंने वर्ष 2021 में परास्नातक की थीसिस पूरी करने के बाद भारत लौटकर डेटम एडवांस्ड कंपोजिट्स की शुरुआत की। उन्होंने बताया कि कंपनी की शुरुआती गतिविधियां एक बीएचके फ्लैट से शुरू हुईं। शुरुआत में कंपनी ने नागरिक क्षेत्र पर ध्यान दिया और कृषि ड्रोन, ऑटोमोबाइल तथा उच्च श्रेणी की सुपरबाइक्स में इस्तेमाल होने वाले कार्बन फाइबर और ग्लास फाइबर के कंपोजिट पुर्जे तैयार किए। आईआईटी कानपुर की टेस्टिंग से खुला रक्षा क्षेत्र का रास्ता तन्मय तिवारी ने बताया कि नागरिक क्षेत्र से रक्षा प्रौद्योगिकी की ओर उनका रुख तेजी से हुआ। कंपनी ने आईआईटी कानपुर के संपर्क में आकर अपने कंपोजिट नमूने और परीक्षण कूपन जांच के लिए भेजे। परीक्षण के बाद यह पुष्टि हुई कि कंपनी द्वारा तैयार किए जा रहे उत्पाद रक्षा क्षेत्र में उपयोग के लिए आवश्यक मानकों को पूरा करने में सक्षम हैं। इसके बाद कंपनी ने रक्षा क्षेत्र के लिए उत्पादन शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी विनिर्माण क्षमता का विस्तार किया। एक छोटे शेड से शुरू हुई कंपनी आज कानपुर में करीब 20 हजार वर्गफुट की फैक्ट्री से संचालित हो रही है और इसमें लगभग 40 लोगों की टीम काम कर रही है। उन्होंने बताया कि कंपनी एएस 9100 प्रमाणित है, जो एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग में गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली से जुड़ा प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मानक है। कंपनी का यह प्रमाणन ब्यूरो वेरिटास द्वारा किया गया है। डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर से मिला विस्तार का अवसर तन्मय तिवारी ने बताया कि कंपनी अब भारतीय रक्षा इकोसिस्टम के साथ-साथ उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में कार्यरत अन्य कंपनियों को भी अपने उत्पादों की आपूर्ति कर रही है। कंपनी विमान के ढांचे के निर्माण और हल्के आयुध से जुड़े प्रोजेक्ट में भी योगदान दे रही है। उन्होंने बताया कि अब कंपनी लखनऊ नोड स्थित उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में एक नई अत्याधुनिक इंजीनियरिंग एवं विनिर्माण सुविधा स्थापित करने जा रही है। इस नई इकाई का निर्मित क्षेत्र करीब 70 से 80 हजार वर्गफुट होगा, जो कंपनी की मौजूदा सुविधा से लगभग चार गुना बड़ा होगा। नई इकाई से करीब 200 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार और लगभग 1,500 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की उम्मीद है। निवेश पर 25 प्रतिशत तक पूंजीगत सब्सिडी तन्मय तिवारी ने उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में मिल रहे प्रोत्साहनों का उल्लेख करते हुए बताया कि नई इकाई में किए जाने वाले पूंजी निवेश पर 25 प्रतिशत तक पूंजीगत सब्सिडी का लाभ मिलेगा। इसके अलावा विदेश से आयात किए जाने वाले उपकरणों पर परिवहन संबंधी सब्सिडी तथा पेटेंट और ट्रेडमार्क के लिए प्रतिपूर्ति जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि इन नीतिगत प्रोत्साहनों और सरकार के सहयोग से युवा उद्यमियों के लिए रक्षा एवं एयरोस्पेस क्षेत्र में प्रवेश तथा विस्तार के नए अवसर तैयार हुए हैं। तन्मय तिवारी ने कहा कि एक छोटे से बीएचके फ्लैट से शुरू हुई कंपनी का आज हजारों वर्गफुट की अत्याधुनिक रक्षा विनिर्माण इकाई की ओर बढ़ना इस बात का उदाहरण है कि नई तकनीक, युवा प्रतिभा और सरकारी सहयोग के साथ उत्तर प्रदेश में रक्षा विनिर्माण का नया इकोसिस्टम आकार ले रहा है। उन्होंने उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर से मिले सहयोग के लिए प्रदेश सरकार और संबंधित अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें इस इकोसिस्टम का हिस्सा होने पर गर्व है।

12वीं पुण्यतिथि पर बुधवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में होगी श्रद्धांजलि सभा, देशभर के संत-धर्माचार्य होंगे शामिल

गोरखपुर  गोरक्षपीठ में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की 57वीं और राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की 12वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित साप्ताहिक श्रद्धांजलि समारोह का समापन बुधवार, 30 सितंबर को होगा। आश्विन कृष्ण चतुर्थी के अवसर पर गोरक्षपीठाधीश्वर एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। गोरखनाथ मंदिर स्थित महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में देशभर के प्रतिष्ठित साधु-संत और धर्माचार्य भी शामिल होंगे। ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ का जीवन रामकाज और सामाजिक समरसता की स्थापना को समर्पित रहा। सामाजिक समरसता को अपने जीवन का ध्येय बनाने वाले महंत अवेद्यनाथ श्रीराम मंदिर आंदोलन के प्रमुख संत नेताओं में रहे। नाथपंथ की लोककल्याणकारी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के साथ राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वह पांच बार मानीराम विधानसभा और चार बार गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके थे। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन को निर्णायक पड़ाव तक पहुंचाने में उनकी भूमिका के लिए उन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा। 18 मई 1919 को गढ़वाल, उत्तराखंड के ग्राम कांडी में जन्मे महंत अवेद्यनाथ जी का बचपन से ही धर्म और अध्यात्म के प्रति गहरा झुकाव था। गोरक्षपीठ में उन्हें महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज का सानिध्य मिला। 8 फरवरी 1942 को उन्होंने गोरक्षपीठ में विधिवत दीक्षा ली। वर्ष 1969 में महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज की चिरसमाधि के बाद 29 सितंबर को वह गोरखनाथ मंदिर के महंत और पीठाधीश्वर बने। योग एवं दर्शन के मर्मज्ञ पीठाधीश्वर के रूप में उन्होंने अपने गुरुदेव के लोककल्याण और सामाजिक समरसता के आदर्शों को आगे बढ़ाया। वर्ष 2014 में आश्विन कृष्ण चतुर्थी को चिरसमाधि लेने तक उनका यह अभियान निरंतर जारी रहा। अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण रहा जीवन का प्रमुख मिशन अयोध्या में प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के बाद मंदिर आंदोलन की कमान महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने संभाली। नब्बे के दशक में उनके नेतृत्व में श्रीराम मंदिर आंदोलन को व्यापक स्वरूप मिला और यह आंदोलन गांव-गांव तक पहुंचा। महंत अवेद्यनाथ ने विभिन्न मत-पंथों के धर्माचार्यों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। इसी क्रम में 21 जुलाई 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ और सर्वसम्मति से महंत अवेद्यनाथ जी को इसका अध्यक्ष चुना गया। वह जीवनभर इस समिति के अध्यक्ष रहे।श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति और श्रीराम जन्मभूमि निर्माण उच्चाधिकार समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संतों, राजनीतिज्ञों और आमजन को आंदोलन से जोड़ने में भूमिका निभाई। अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग आगे चलकर उनके शिष्य और वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में पूर्णता तक पहुंचा। सामाजिक समरसता को मजबूत करने के लिए चलाया अभियान महंत अवेद्यनाथ ने सामाजिक समरसता को अपने जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाया। उन्होंने हिंदू समाज में छुआछूत और ऊंच-नीच के भेदभाव को दूर करने के लिए लगातार अभियान चलाया। अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारहपंथ योगी महासभा के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देशभर के संतों को भी इस अभियान से जोड़ा।दक्षिण भारत के मीनाक्षीपुरम में दलित समाज के सामूहिक धर्मांतरण की घटना से वह बेहद चिंतित हुए। इसके बाद उन्होंने हिंदू समाज की सामाजिक कुरीतियों और जातिगत विभाजन को दूर कर समाज को एकजुट करने पर विशेष जोर दिया।उन्होंने दलित बस्तियों में सहभोज की परंपरा शुरू की, जहां जातिगत भेदभाव से अलग सभी लोग एक साथ भोजन करते थे। काशी में डोमराजा के घर संतों और साधु समाज के साथ भोजन कर उन्होंने सामाजिक समरसता का संदेश दिया। राम मंदिर के भूमिपूजन के दौरान दलित कामेश्वर चौपाल के हाथों पहली शिला रखवाने को भी इसी सामाजिक समरसता के संदेश से जोड़कर देखा जाता है। दलितों और वंचितों के घर सहभोज के जरिए सामाजिक एकता का संदेश देने का सिलसिला उनके जीवनकाल में लगातार चलता रहा। सामाजिक एकता के सवाल पर महंत अवेद्यनाथ अपने स्पष्ट विचारों के लिए जाने जाते थे और अस्पृश्यता तथा सामाजिक भेदभाव के खिलाफ मुखर रहे। श्रीराम और मां दुर्गा के उदाहरणों से समझाते थे सामाजिक एकता की ताकत नाथपंथ और गोरक्षपीठ के अध्येता तथा महंत अवेद्यनाथ के जीवन के शोधार्थी डॉ. प्रदीप कुमार राव के अनुसार, महंत अवेद्यनाथ सामाजिक समरसता का संदेश सरल उदाहरणों के माध्यम से देते थे। वह प्रभु श्रीराम और देवी दुर्गा के प्रसंगों के जरिए समाज में एकता की ताकत समझाते थे। महंत जी बताते थे कि प्रभु श्रीराम ने शबरी के बेर खाए, निषादराज को गले लगाया, गिद्धराज जटायु का अंतिम संस्कार अपने हाथों किया और वनवास के दौरान वनवासियों से मित्रता की। उनके अनुसार, इन प्रसंगों में समरस समाज की भावना दिखाई देती है।इसी तरह वह देवी दुर्गा की आठ भुजाओं का उदाहरण देते हुए समाज के चारों वर्णों की एकता को शक्ति का प्रतीक बताते थे। उनका संदेश था कि समाज के विभिन्न वर्ग एकजुट होकर सामूहिक शक्ति का निर्माण कर सकते हैं। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को दिया व्यापक विस्तार शिक्षा के क्षेत्र में भी महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने अपने गुरुदेव महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज के प्रयासों को आगे बढ़ाया। अपनी निष्ठा, दीर्घकालीन तपस्या और अनुभव के माध्यम से उन्होंने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद को व्यापक स्वरूप प्रदान किया। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के अंतर्गत प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक के शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान, चिकित्सा संस्थान और सेवा संस्थान संचालित हो रहे हैं। पारंपरिक शिक्षण संस्थानों के साथ तकनीकी और स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़े संस्थानों में भी बड़ी संख्या में विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। राजनीति में भी रहा लंबा और प्रभावी सफर महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति के क्षेत्र में भी लंबा सफर तय किया। उन्होंने 1962, 1967, 1969, 1974 और 1977 में मानीराम विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया। इसके बाद 1970, 1989, 1991 और 1996 में गोरखपुर सदर संसदीय सीट से सांसद रहे। वह अखिल भारतीय हिंदू महासभा के उपाध्यक्ष और महासचिव के रूप में भी सक्रिय रहे। राजनीतिक जीवन में उन्होंने राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा, शैक्षिक पुनर्जागरण और हिंदू समाज की एकता जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी। महंत अवेद्यनाथ की 12वीं पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि समारोह उनके धार्मिक, … Read more

अखिलेश की परमिशन के बिना शिवपाल और धर्मेंद्र यादव को सपा दफ्तर में नहीं मिलती एंट्री, राजभर का बड़ा हमला

ग्रेटर नोएडा सोचिए, एक ऐसा अस्पताल जिसे न बड़ी इमारत चाहिए, न भारी-भरकम मशीनों से भरी लैब। उसे कार में रखिए और शहर से गांव या किसी दूर-दराज इलाके तक ले जाइए। मरीज सामने आया तो बीपी और शुगर से लेकर ईसीजी, फेफड़ों, आंख-कान तक की जांच वहीं शुरू। एक बूंद खून से कई जरूरी जांच और महज 10 मिनट में कुल 75 तरह के टेस्ट की सुविधा। भविष्य में होने वाली बीमारियों के जोखिम का समय रहते संकेत देने की क्षमता भी। यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में प्रदर्शित ‘डॉक्टर ऑन ड्यूटी’ इसी सोच को हकीकत में बदलने की कोशिश है। करीब तीन लाख रुपये की यह मशीन स्वास्थ्य सेवाओं को अस्पताल की चारदीवारी से निकालकर मरीज के दरवाजे तक पहुंचाने का मॉडल पेश कर रही है। सीएम योगी की प्रेरणा से यूपी के युवाओं ने भविष्य में होने वाली बीमारियों से बचाने में सक्षम ये मशीन खोजी है। तीन लाख की मशीन से अस्पताल जैसी जांच एमडी इंटरनल मेडिसिन और डॉक्टर्स ऑन ड्यूटी के फाउंडर एवं सीईओ डॉ. श्रेय श्रीवास्तव कहते हैं कि मशीन को इस तरह विकसित किया गया है कि प्राथमिक स्तर पर होने वाली कई महत्वपूर्ण जांच एक ही जगह की जा सकें। इसमें ब्लड प्रेशर, शुगर, बॉडी एनालिसिस, ईसीजी और लंग्स फंक्शन टेस्ट के साथ आंख, नाक और कान की जांच की सुविधा है। उनका कहना है कि सिंगल ड्रॉप ब्लड टेस्ट समेत कुल 75 जांच करीब 10 मिनट में की जा सकती हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका पोर्टेबल होना है। इसे कार में रखकर आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है। यानी जिस गांव में अस्पताल या डायग्नोस्टिक सेंटर नहीं है, वहां जांच की सुविधाएं पहुंचाने के लिए पूरी लैब खड़ी करने की जरूरत नहीं होगी। मशीन बिजली के साथ बैटरी और सोलर पावर से भी संचालित की जा सकती है। महंगी जांच का बोझ घटेगा इस मॉडल के जरिए अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटर में होने वाली कई जांच की तुलना में बेहद कम लागत पर प्राथमिक जांच संभव हो सकती है। कई मामलों में खर्च मौजूदा लागत के करीब 10 प्रतिशत तक सीमित किया जा सकता है। यदि बड़े स्तर पर इसका इस्तेमाल सफल रहता है तो गांव और छोटे शहरों के मरीजों को सामान्य जांच के लिए बार-बार बड़े अस्पतालों की दौड़ लगाने से राहत मिल सकती है। इससे मरीज का पैसा ही नहीं, अस्पताल तक आने-जाने और जांच के इंतजार में लगने वाला समय भी बच सकता है। बीमारी दस्तक दे, उससे पहले मिल सकेगा संकेत ‘डॉक्टर ऑन ड्यूटी’ को केवल जांच मशीन तक सीमित रखने के बजाय एआई आधारित हेल्थ सिस्टम के रूप में विकसित किया गया है। उपलब्ध स्वास्थ्य संकेतकों और जांच रिपोर्ट के आधार पर मरीज में भविष्य में विकसित हो सकने वाले स्वास्थ्य जोखिमों की पहचान में यह सहायक है। इसका उद्देश्य डॉक्टर को शुरुआती स्तर पर अधिक स्वास्थ्य डेटा उपलब्ध कराना और समय रहते मरीज को आगे की चिकित्सकीय सलाह तक पहुंचाना है। इस मॉडल के पीछे सोच है कि बीमारी गंभीर होने के बाद महंगे अस्पताल पहुंचने के बजाय जोखिम की पहचान पहले हो। खासकर ग्रामीण इलाकों में नियमित स्वास्थ्य जांच आसान होने से ऐसे लोगों तक स्क्रीनिंग पहुंचाई जा सकती है, जो दूरी और खर्च के कारण सामान्य जांच भी टाल देते हैं। बड़े अस्पतालों का दबाव घटाने की तैयारी ग्रेटर इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के सेंटर फॉर मेडिकल इनोवेशन के सीईओ डॉ. राहुल सिंह ने बताया कि इस तकनीक का उद्देश्य लोगों की गाढ़ी कमाई के साथ समय बचाना भी है। प्राथमिक जांच स्थानीय स्तर पर होने से हर मरीज को शुरुआती टेस्ट के लिए बड़े अस्पताल जाने की जरूरत कम हो सकती है। इस मॉडल को सेंट्रल और बड़े अस्पतालों पर मरीजों का दबाव घटाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सामान्य जांच और शुरुआती स्क्रीनिंग स्थानीय स्तर पर होने के बाद जरूरत वाले मरीजों को ही विशेषज्ञ या बड़े अस्पताल तक रेफर करने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। स्वास्थ्य सेवा के साथ रोजगार का भी मॉडल ‘डॉक्टर ऑन ड्यूटी’ केवल मेडिकल इनोवेशन तक सीमित नहीं है। करीब तीन लाख रुपये कीमत और पोर्टेबल स्वरूप के कारण इसे मेडिकल क्षेत्र में स्वरोजगार के मॉडल के रूप में भी विकसित करने की योजना है। प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी या उद्यमी मशीन के जरिए स्थानीय स्तर पर हेल्थ स्क्रीनिंग और जांच सेवाएं उपलब्ध करा सकते हैं। स्टार्टअप को ‘स्टार्ट इन यूपी’ के तहत उत्तर प्रदेश सरकार से 10 लाख रुपये की मदद भी मिली है। इंटरनेशनल ट्रेड शो में इसका प्रदर्शन इस बात का उदाहरण है कि प्रदेश के स्टार्टअप अब केवल ऐप और डिजिटल सेवाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की लागत, पहुंच और उपलब्धता जैसी बुनियादी चुनौतियों के समाधान पर भी काम कर रहे हैं। बदल सकती है जांच की तस्वीर भारत जैसे विशाल देश में अस्पताल और विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंच के साथ डायग्नोस्टिक सुविधाओं की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती है। ऐसे में कार में समा जाने वाला, बिजली-बैटरी-सोलर तीनों विकल्पों से चलने वाला और एक ही प्लेटफॉर्म पर दर्जनों जांच उपलब्ध कराने वाला मॉडल बड़े बदलाव की संभावना दिखाता है।

CM सैनी के बड़े निर्देश, किसानों-महिलाओं और युवाओं तक पहुंचे योजनाओं का लाभ

चंडीगढ़  हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्र लोगों तक पूरी पारदर्शिता के साथ पहुंचे और उनकी जमीनी प्रभावशीलता सुनिश्चित की जाए। उन्होंने कहा कि बेस्ट प्रैक्टिस का उद्देश्य केवल आंकड़े बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों, ग्रामीणों, महिलाओं, युवाओं और आमजन को वास्तविक लाभ देना होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने गोशालाओं को दुग्ध उत्पादक प्रोत्साहन योजना के तहत 10 रुपये प्रति लीटर सब्सिडी देने की संभावना तलाशने के निर्देश दिए हैं। सोमवार को हुई समीक्षा बैठक में कृषि, उद्यान, कृषि विपणन, विकास एवं पंचायत, सिंचाई एवं जल संसाधन तथा सहकारिता विभाग की योजनाओं और तकनीकी सुधारों की समीक्षा की गई। बैठक में बताया गया कि उर्वरक वितरण प्रणाली को ‘मेरी फसल मेरा ब्योरा’ से जोड़ने के बाद सत्यापित किसानों को पीओएस मशीन से खाद मिल रही है। आठ अक्टूबर 2025 से 14 सितंबर 2026 तक इससे 820 करोड़ रुपये की सब्सिडी बचत दर्ज की गई। कृषि वैज्ञानिकों को खेतों में जाकर किसानों से संवाद करने और कीट-रोगों की समस्या पर शोध करने के निर्देश दिए गए। फसलों में कीटों की समय पर पहचान के लिए ई-पेस्ट सर्विलांस सिस्टम विकसित करने के निर्देश सीएम ने दिए हैं। नई फसल किस्मों और कृषि तकनीक पर शोध के लिए विशेष रिसर्च सेंटर स्थापित किया जाएगा। भावांतर भरपाई योजना में फसल उत्पादन और मंडी बिक्री का प्रभावी सत्यापन सुनिश्चित करने को कहा गया, ताकि पात्र किसानों को पूरा भुगतान मिले। किसान जीवन सुरक्षा योजना में बीमा कंपनियों को पात्र किसानों को वास्तविक नुकसान के अनुरूप पूरा लाभ देने के निर्देश दिए गए। गांवों में शिक्षा, रोजगार, पानी और स्वास्थ्य पर फोकस प्रदेश में 996 अटल लाइब्रेरियां स्थापित हो चुकी हैं और 86.6 करोड़ रुपये से 1,000 नई लाइब्रेरियां बनाई जा रही हैं। इनमें से 500 का उद्घाटन 25 दिसंबर 2026 को सुशासन दिवस पर करने के निर्देश सीएम ने दिए। बच्चों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।     स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को शामलात भूमि पर डेयरी से जोड़ने पर जोर। योजना के तहत अब तक 1,005 आवेदन मिले हैं।     468 ग्रामीण इंडोर जिम स्थापित हो चुके हैं और 234 अन्य के आदेश जारी किए गए हैं।     नहरों के अंतिम छोर तक पर्याप्त पानी पहुंचाने तथा माइक्रो-इरिगेशन और जल संरक्षण को बढ़ावा देने के निर्देश।     दूध की गुणवत्ता व मिलावट की नियमित जांच और कैटल फीड की निगरानी के निर्देश दिए गए।     सहकारी समितियों का आनलाइन पंजीकरण तीन कार्य दिवस में किया जाना है। 2019 से अब तक 9,165 समितियां आनलाइन पंजीकृत हुई हैं।     चीनी मिलों में एडवांस टोकन सिस्टम से किसानों का इंतजार 11-15 घंटे से घटकर करीब 1-2 घंटे रह गया है।  

रायपुर को मिलेंगी 100 ई-बसें, दिसंबर तक तैयार होगा चार्जिंग-डिपो

रायपुर छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर में ई-बस सेवा शुरू करने की तैयारियां तेज हो गई हैं। राज्य सरकार ने ई-बसों के संचालन के लिए मार्च तक की डेडलाइन तय की है। इससे पहले दिसंबर तक जरूरी अधोसंरचना, चार्जिंग स्टेशन, डिपो निर्माण और बसों के रूट निर्धारण का काम पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। प्रधानमंत्री ई-बस सेवा के तहत रायपुर को भारत सरकार से 100 ई-बसें मिलेंगी। इनके संचालन से शहरवासियों को किफायती, आरामदायक और पर्यावरण हितैषी सार्वजनिक परिवहन सुविधा मिलने की उम्मीद है। Raipur E-Bus: स्कूल-कॉलेज और अस्पतालों को जोड़कर बन रहे रूट नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग शहरवासियों के साथ रोजाना रायपुर आने वाली फ्लोटिंग पॉपुलेशन की जरूरतों को ध्यान में रखकर ई-बसों के रूट तैयार कर रहा है। रूट निर्धारण में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, प्रमुख बाजार, महत्वपूर्ण संस्थानों और अन्य जनोपयोगी स्थानों को प्राथमिकता दी जा रही है। उद्देश्य यह है कि ई-बस सेवा शहर के प्रमुख हिस्सों को बेहतर तरीके से जोड़ सके। दिसंबर तक पूरा करना है इंफ्रास्ट्रक्चर का काम अधिकारियों के अनुसार छत्तीसगढ़ में ई-बस संचालन का यह पहला बड़ा प्रयास है। इसलिए बसों के संचालन से पहले डिपो, चार्जिंग स्टेशन, बस स्टॉप और अन्य जरूरी सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। डिपो और सिविल वर्क समेत अन्य निर्माण कार्यों के लिए एनएचएआई, रेलवे और संबंधित विभागों से समन्वय कर आवश्यक स्वीकृतियां और तकनीकी प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं। रियल टाइम होगी ई-बसों की मॉनिटरिंग ई-बस सेवा शुरू होने के बाद संचालन की रियल टाइम मॉनिटरिंग की व्यवस्था भी तैयार की जा रही है। इसके तहत रूट प्लानिंग, बस संचालन, डिपो, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बस स्टॉप और कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम को एकीकृत किया जाएगा। शहर की परिवहन जरूरत और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर ई-बस संचालन की प्राथमिकता तय की जा रही है। एचटी लाइन को लेकर लंबित प्रक्रिया का हुआ निराकरण रायपुर में ई-बसों के संचालन के लिए सीएसपीडीसीएल की ओर से एचटी लाइन बिछाने का काम भी जरूरी है। इसके लिए एनएचएआई के पोर्टल पर अनापत्ति से संबंधित आवेदन लंबित था, जिसका अब निराकरण किया जा चुका है। इसके बाद ई-बस संचालन के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। चार शहरों में तय हो रहे परिवहन जरूरत के अनुसार रूट ई-बस सेवा के लिए रायपुर के अलावा बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई और कोरबा में भी रूट निर्धारित किए गए हैं। अधिकारियों के अनुसार इन शहरों में रूट तय करते समय स्थानीय परिवहन जरूरतों और नागरिकों की सुविधा को ध्यान में रखा गया है। सरकार का लक्ष्य निर्धारित समय-सीमा में सभी जरूरी तैयारियां पूरी कर ई-बस सेवा शुरू करना है।