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खूबसूरत त्वचा का दुश्मन! ये 3 फूड्स अंदर से कर रहे हैं स्किन डैमेज, तीसरा सबसे खतरनाक

अगर आप सोचते हैं कि सिर्फ महंगी क्रीम और सीरम आपकी स्किन को हेल्दी बनाए रखेंगे, तो आप सिर्फ एक पहलू पर ध्यान दे रहे हैं। दरअसल, हमारी स्किन की हेल्थ इस बात पर ज्यादा निर्भर करती है कि हमारा खान-पान सही है या नहीं। सही खान-पान आपकी त्वचा को चमकदार और स्वस्थ बना सकता है, लेकिन गलत डाइट इसे गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। इनसे परहेज करना आपकी स्किन को हेल्दी और जवां बनाए रखने के लिए जरूरी है। आइए जानें इनके बारे में। फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप यह एक आर्टिफिशियल स्वीटनर है, जो अक्सर सोडा, पैकेट वाले जूस, बिस्कुट और प्रोसेस्ड जंक फूड में पाया जाता है। डॉक्टर के अनुसार, यह चीनी की तुलना में 10 गुना ज्यादा खतरनाक है और आपकी त्वचा के प्रोटीन को तेजी से नुकसान पहुंचाता है। यह शरीर में AGE (Advanced Glycation End products) बनाता है, जो सीधे आपकी त्वचा के कोलेजन को खत्म कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि त्वचा सख्त हो जाती है, झुर्रियां तेजी से बनने लगती हैं और यह आपके लिवर को भी नुकसान पहुंचाता है। अगर आप पैकेट बंद प्रोसेस्ड फूड ज्यादा खाते हैं, तो आप प्रीमैच्योर एजिंग को बुलावा दे रहे हैं। बार-बार गर्म किया गया रिफाइंड तेल अक्सर हम बाहर के समोसे या डीप-फ्राइड स्नैक्स का आनंद लेते हैं, लेकिन समस्या यह है कि दुकानदार एक ही तेल को बार-बार गर्म करते हैं। बार-बार गर्म करने से तेल की संरचना बदल जाती है। डॉ. रेड्डी बताती हैं कि हर बार तेल गर्म होने पर उसमें मौजूद सुरक्षात्मक विटामिन-ई डैमेज हो जाता है। इस ऑक्सीडाइज्ड फैट से शरीर और त्वचा में अंदरूनी सूजन पैदा होती है। क्रिस्पी और ज्यादा तले हुए फूड्स फ्रेंच फ्राइज, पकौड़े और चिप्स का सुनहरा भूरा रंग और कुरकुरा टेक्सचर हमें बहुत लुभाता है। लेकिन यही कुरकुरापन सेहत के लिए खतरनाक है। डॉक्टर के अनुसार, जब खाने को बहुत अधिक तापमान पर कुरकुरा किया जाता है, तो उसमें एक्रिलामाइड बनता है। खाना जितना गहरा और क्रिस्पी होगा, उसमें AGEs की मात्रा उतनी ही ज्यादा होगी। ये तत्व सीधे आपकी त्वचा की संरचना को नुकसान पहुंचाते हैं और कोलेजन को तेजी से डैमेज करते हैं, जिससे त्वचा अपनी फ्लेक्सिबिलिटी खो देती है।  

खाली पेट लहसुन खाने का दावा कितना सही? कोलेस्ट्रॉल पर असर जानिए

नसों में जमा हो रहा 'बैड कोलेस्ट्रॉल' आपके दिल के लिए एक खतरे की घंटी है। अगर बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल समय रहते काबू में न आए, तो यह हार्ट अटैक जैसी जानलेवा स्थिति भी पैदा कर सकता है। खासतौर से, जिन लोगों का कोलेस्ट्रॉल हाई है, उन्हें अपनी सेहत को लेकर बेहद सतर्क रहने की जरूरत होती है। हालांकि, अच्छी बात यह है कि केवल दवाइयां ही नहीं, बल्कि कुदरत के पास भी इसका इलाज मौजूद है। रिसर्च के मुताबिक, आपकी रसोई में मौजूद लहसुन इस खतरे को कम करने की ताकत रखता है। आइए जानते हैं कैसे। लहसुन में छिपा है सेहत का राज लहसुन में 'एलिसिन' नाम का एक बायोएक्टिव कंपाउंड पाया जाता है, जिसे कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए जिम्मेदार माना जाता है। केवल खराब कोलेस्ट्रॉल (Bad Cholesterol) को घटाने के अलावा, लहसुन के कई अन्य फायदे भी हैं, जैसे:     ब्लड प्रेशर को कम करना     रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार     शरीर को भरपूर एंटीऑक्सीडेंट्स देना कैसे कोलेस्ट्रॉल को कम करता है लहसुन? ऐसा माना जाता है कि सुबह के समय लहसुन की एक कली छीलकर चबाने से 15 से 20 दिनों के भीतर हाई कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद मिल सकती है। इस बारे में इजराइल के 'इंस्टिट्यूट ऑफ लिपिड एंड एथेरोस्क्लेरोसिस रिसर्च' ने एक राय भी दी है। स्टडी में बताया गया है कि लहसुन में मौजूद 'एलिसिन' लिवर की कोशिकाओं पर मौजूद रिसेप्टर्स के साथ जुड़कर खराब कोलेस्ट्रॉल के उत्पादन को रोक देता है। यह प्रक्रिया सेलुलर स्तर पर होती है। हालांकि, अच्छी बात यह है कि इसका गुड कोलेस्ट्रॉल के स्तर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। क्या है इसे खाने का सही तरीका? अध्ययन बताते हैं कि दिन में एक से दो कलियां कच्चा लहसुन खाना सुरक्षित होता है। आप इसे भोजन के साथ या उसके बिना भी खा सकते हैं। हालांकि, लहसुन के सेवन को लेकर कोई सख्त गाइडलाइंस नहीं हैं, लेकिन सप्लीमेंट्स लेने वालों को सावधान रहना चाहिए, क्योंकि ज्यादा मात्रा में सेवन करने से कुछ साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। जैसे- गैस और बदहजमी, सीने में जलन, डायरिया और मुंह से बदबू आना इत्यादि। सावधानी है जरूरी लहसुन में खून को पतला करने वाले गुण होते हैं। इसलिए, यह उन लोगों के लिए बिल्कुल भी सही नहीं है जो किसी प्रकार के ब्लीडिंग डिसऑर्डर से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, लहसुन कुछ दवाओं के असर को भी कम कर सकता है। इसलिए, डाइट में कुछ भी बदलाव करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहद जरूरी है।  

AIIMS दिल्ली की बड़ी पहल: स्ट्रोक से जूझ रहे मरीज अब घर पर ही कर सकेंगे रिकवरी

नई दिल्ली भारत में आज स्ट्रोक एक गंभीर और तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ता स्ट्रेस, गलत खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण स्ट्रोक के मामले हर साल लगातार बढ़ रहे हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि हर साल लाखों भारतीय स्ट्रोक का शिकार होते हैं, जिनमें से कई लोगों की जान चली जाती है. जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ और एक्टर मिथुन चक्रवर्ती, हाल के कुछ सालों में कई जानी-मानी हस्तियां स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारी का सामना कर चुकी हैं. इससे साफ है कि यह बीमारी अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. स्ट्रोक के बाद कई मरीजों में शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या लकवा, बोलने-समझने में परेशानी, चलने-फिरने में दिक्कत और रोजमर्रा के कामों में दूसरों पर निर्भरता बढ़ जाती है.  AIIMS की नई स्टडी से नई उम्मीद ऐसे में AIIMS दिल्ली की एक नई स्टडी स्ट्रोक के मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है. इस स्टडी के अनुसार, रोजाना सिर्फ 30 मिनट धूप में समय बिताना स्ट्रोक से उबर रहे मरीजों की रिकवरी, नींद और मूड में सुधार कर सकता है. वो भी बिना किसी अधिक खर्च के… एम्स की यह स्टडी नवंबर 2023 से अप्रैल 2025 के बीच की गई और इसे संस्थान के पांचवें रिसर्च डे पर पेश किया गया. इसमें पाया गया कि जिन स्ट्रोक मरीजों को नियमित इलाज और फिजियोथेरेपी के साथ सनलाइट थेरेपी दी गई, उनकी जिंदगी की गुणवत्ता उन मरीजों की तुलना में काफी बेहतर रही जिन्हें केवल सामान्य इलाज दिया गया.  कैसे की गई स्टडी? इस स्टडी में 18 से 80 वर्ष के उन मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें पिछले एक महीने के अंदर मिडियम लेवल का स्ट्रोक हुआ था.     200 से ज्यादा मरीजों की स्क्रीनिंग के बाद 40 मरीजों को चुना गया और फिर उन्हें दो ग्रुप में बांटा गया.      पहला ग्रुप सिर्फ स्टैंडर्ड मेडिकल ट्रीटमेंट और रिहैबिलिटेशन और दूसरा ग्रुप स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट और करीब दो हफ्तों तक हर दूसरे दिन 30 मिनट धूप में बैठना.      धूप की तीव्रता 10,000 से 25,000 लक्स के बीच रखी गई, जो हल्की आउटडोर डे-लाइट के बराबर होती है. सुरक्षा के लिए लक्स मीटर से लगातार निगरानी की गई.     तीन महीने तक मरीजों की शारीरिक क्षमता, मूड, नींद, रोजाना के काम करने की शक्ति और ओवरऑल वेल-बीइंग को देखा गया. स्टडी का नतीजा क्या हुआ? डॉक्टरों के मुताबिक, सनलाइट थेरेपी लेने वाले मरीजों में नींद की क्वालिटी  बेहतर हुई. नींद के साथ मूड और मानसिक स्थिति में सुधार देखा गया और खुद रोजाना के काम में आत्मनिर्भरता बढ़ी. एक्सपर्ट्स का मानना है कि धूप शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक को ठीक करती है, विटामिन D बढ़ाने में मदद करती है और सूजन को कम कर सकती है, जो स्ट्रोक रिकवरी में अहम रोल निभाते हैं.  भारतीयों के लिए क्यों है खास? भारत में स्ट्रोक रिकवरी एक लंबा और महंगा प्रोसेस माना जाता है, जिसकी वजह से कई बार लोग इसको अफोर्ड नहीं कर पाते हैं. कई मरीजों को लंबे समय तक फिजियोथेरेपी और देखभाल की जरूरत होती है, जो हर किसी के लिए पॉसिबल नहीं. ऐसे में 30 मिनट की धूप जैसी फ्री, सुरक्षित और आसानी से मौजूद थेरेपी खासतौर पर गांव के इलाकों और घर पर रिकवरी कर रहे मरीजों के लिए बेहद  उपयोगी हो सकती है. हालांकि स्टडी का सैंपल साइज छोटा था और यह एक ही सेंटर पर की गई, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अगर आगे बड़े लेवल पर इस पर रिसर्च होती है, तो सनलाइट थेरेपी पोस्ट-स्ट्रोक केयर का अहम हिस्सा बन सकती है. स्ट्रोक पर क्या कहते हैं ICMR के आंकड़े ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में भारत में करीब 12 लाख नए स्ट्रोक के मामले सामने आए. इतना ही नहीं, लगभग 94 लाख लोग ऐसे थे जो स्ट्रोक के बाद इसके लंबे समय तक रहने वाले असर जैसे कमजोरी, बोलने में दिक्कत या याददाश्त की समस्या से जूझ रहे थे. ICMR के 2021 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्ट्रोक आज मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण बन चुका है. यह डिसेबिलिटी की छठी सबसे बड़ी वजह भी है, यानी बड़ी संख्या में लोग स्ट्रोक के बाद नॉर्मल जिंदगी नहीं जी पाते हैं. 2023 में लैंसेट जर्नल में पब्लिश एक स्टडी, जो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ की गई थी. उस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो साल 2050 तक कम और मिडियम इनकम वाले देशों में करीब 1 करोड़ लोगों की मौत स्ट्रोक की वजह से हो सकती है, और इस खतरे से भारत भी बाहर नहीं है.

Amazon Deal: OnePlus फोन की कीमत में भारी कटौती, सीधे 12 हजार रुपये की बचत

मुंबई  OnePlus 13 पर आकर्षक ऑफर मिल रहा है. इस फोन को आप कई हजार रुपये के डिस्काउंट पर खरीद सकते हैं. स्मार्टफोन पर 12 हजार रुपये का डिस्काउंट मिल रहा है, जिसे आप आसानी से भुना सकते हैं. डिस्काउंट के साथ ये फोन Amazon पर मिल रहा है. ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर ये फोन 61,999 रुपये की कीमत पर लिस्ट है. कंपनी ने इस फोन को 69,999 रुपये की शुरुआती कीमत पर लॉन्च किया था. ये कीमत फोन के 12GB RAM + 256GB स्टोरेज वेरिएंट की है. ऐमेजॉन पर ये फोन 8 हजार रुपये के फ्लैट डिस्काउंट पर मिल रहा है. इसके अलावा आप बैंक ऑफर का फायदा उठा सकते हैं. फोन पर 4 हजार रुपये का बैंक डिस्काउंट मिल रहा है.          इसके अलावा आप स्मार्टफोन पर एक्सचेंज ऑफर और लो-कॉस्ट EMI का भी फायदा उठा सकते हैं. सभी ऑफर्स के बाद फोन की कीमत घटकर 57,999 रुपये हो जाती है. OnePlus 13 में 6.82-inch का AMOLED डिस्प्ले मिलता है, जो 120Hz रिफ्रेश रेट सपोर्ट करता है. स्क्रीन की प्रोटेक्शन के लिए सिरेमिक गार्ड ग्लास इस्तेमाल किया गया है.         फोन Qualcomm Snapdragon 8 Elite पर काम करता है. इसमें 50MP + 50MP + 50MP का ट्रिपल रियर कैमरा सेटअप मिलता है. वहीं फ्रंट में कंपनी ने 32MP का सेल्फी कैमरा दिया है.             फोन को पावर देने के लिए 6000mAh की बैटरी दी गई है. इसमें 100W की वायर्ड चार्जिंग और 50W की वायरलेस चार्जिंग मिलती है. स्मार्टफोन वायरलेस रिवर्स चार्जिंग भी सपोर्ट करता है. 

ChatGPT का नया ट्रांसलेट फीचर लॉन्च: जरूरत के हिसाब से अनुवाद, गूगल ट्रांसलेशन को देगा टक्कर?

 नई दिल्ली OpenAI ने एक और नया टूल लॉन्‍च कर दिया है जो बहुत से लोगों के लिए बेहतर साबित हो सकता है। ChatGPT Translate नाम से आए टूल का मुख्‍य काम अनुवाद करना है, लेकिन इस टूल की सबसे खास बात है कि यह जरूरत देखकर अनुवाद करता है। उदाहरण के लिए आप किसी आर्टिकल को बिजनेस के लिए फॉर्मल ट्रांसलेट करवा सकते हैं जबकि बच्‍चों के लिए उसे और आसान भाषा में तैयार कराया जा सकता है। चैटजीपीटी ट्रांसलेट अभी लगभग 50 भाषाओं में अनुवाद कर सकता है। इसमें हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाएं शामिल हैं। गूगल ट्रांसलेट जैसा इंटरफेस चैटजीपीटी ट्रांसलेट का इंटरफेस, गूगल ट्रासंलेट जैसा ही है। इसमें दो बॉक्‍स हैं। एक बॉक्‍स में कंटेंट डालना होगा। दूसरे बॉक्‍स में आप भाषा का चुनाव करेंगे, जिसमें आपको ट्रांसलेशन चाहिए। वैसे तो चैटजीपीटी में पहले से ट्रांसलेशन की सुविधा मिल रही थी, लेकिन अब इसे एक अलग प्रोडक्‍ट के तौर पर ले आया गया है। यह वेबसाइट और मोबाइल दोनों पर काम करेगा। एनबीटी टेक ने जब इस टूल को टेस्‍ट किया तो यह वेब ब्राउजर पर काम कर रहा था। ओपनएआई ने इस टूल के बारे में ज्‍यादा जानकारी नहीं दी है। यह भी नहीं बताया है कि उसने इसमें कौन सा मॉडल इस्‍तेमाल किया है। इन भारतीय भाषाओं में सपोर्ट चैटजीपीटी ट्रांसलेट अभी हिंदी, मराठी, पंजाबी, गुजराती, तम‍िल, तेलेगु, ऊर्दू जैसी प्रमुख भारतीय भाषाओं को सपोर्ट कर रहा है। यानी यह लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में अनुवाद की सुविधा दे रहा है। ChatGPT ट्रांसलेट VS Google ट्रासंलेट ChatGPT ट्रांसलेट में टेक्‍स्‍ट, इमेज और वॉइस ट्रांसलेशन की सुविधा देने की बात कही गई है। हालांकि खबर लिखे जाने तक हमें इमेज ट्रांसलेशन काम करता हुआ नहीं दिखा। यह फीचर अगले कुछ दिनों में आ सकते हैं। अच्‍छी बात यह है कि ट्रांसलेशन को अपने मुताबिक बदला जा सकता है। गूगल ट्रांसलेशन में एक बार जो ट्रांसलेट हो जाता है, वह बदला नहीं जाता। चैटजीपीटी ट्रांसलेशन में आप एआई से यह कह सकते हैं कि उसे किस अंदाज में बदले। यह फीचर भविष्‍य की ओर इशारा करता है जिसका मुख्‍य मकसद किसी बात को सिर्फ अनुवाद की शक्‍ल में पेश ना करके उसे आसान और समझने वाली बातचीत में बदलना है।

रोबोटिक्स में क्रांति: NVIDIA के वर्ल्ड मॉडल से रोबोट पाएंगे इंसानी जैसी समझ

नई दिल्ली रोबोट समय के साथ-साथ स्मार्ट होते जा रहे हैं। अब वो दिन भी ज्यादा दूर नहीं जब रोबोट इंसानों की तरह सोच-समझ पाएंगे। जी हां, NVIDIA ने कॉसमॉस पॉलिसी  पेश की है। यह कुछ और नहीं बल्कि रोबोट को कंट्रोल करने का एक नया तरीका है। यह NVIDIA के उस बड़े प्लान का हिस्सा है, जिसमें वे फिजिकल AI सिस्टम के लिए कुछ ऐसे मॉडल बना रहे हैं, जिनकी मदद से फिजिकल एआई सिस्टम दुनिया को समझ पाएं। यह फ्रेमवर्क इस तरह से डिजाइन किया गया है कि कंट्रोल और प्लानिंग टास्क के लिए बड़े वीडियो प्रेडिक्शन मॉडल को अडैप्ट करके रोबोट आसानी से तय कर पाएं कि उन्हें कौन सी हरकत करनी है। रोबोट्स के लिए पॉलिसी क्या होती है? बता दें कि रोबोटिक्स में, 'पॉलिसी' का मतलब उस दिमाग से होता है, जो तय करता है कि क्या करना चाहिए। यह रोबोट को मिलने वाली जानकारी जैसे कैमरे की फोटोज और सेंसर के डेटा को रोबोट की हरकत में बदलता है। पुराने रोबोट की पॉलिसी अक्सर खास काम के लिए बनाए गए न्यूरल नेटवर्क होती थीं। इनमें अलग-अलग हिस्से जैसे चीजों को समझना, प्लान बनाना और कंट्रोल करना शामिल होते थे। इन सिस्टम को हर रोबोट या माहौल के लिए बहुत सारा लेबल किया हुआ डेटा चाहिए होता था और खास तौर पर ट्यूनिंग करनी पड़ती थी। कैसे काम करती है Cosmo Policy? Cosmos Policy इससे काफी अलग है। NVIDIA शुरू से एक नया कंट्रोल मॉडल बनाने के बजाय, डेमोंस्ट्रेशन डेटा पर पहले से सीखे हुए वीडियो वर्ल्ड मॉडल को पोस्ट-ट्रेन यानी फिर से ट्रेन करती है। इसे Cosmos Predict कहते हैं। यह मॉडल पहले से ही जानता है कि फिजिकल दुनिया समय के साथ कैसे बदलती है, क्योंकि इसने बड़े पैमाने पर वीडियो डेटा से सीखा है। इस अतिरिक्त ट्रेनिंग के दौरान, रोबोट के एक्शन, फिजिकल स्टेट और टास्क के नतीजों को मॉडल के इंटरनल टेम्परल रिप्रेजेंटेशन का हिस्सा माना जाता है, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि रोबोट को आगे क्या करना चाहिए और इसके नतीजे क्या होंगे। अलग-अलग मॉडल जोड़ने की नहीं होती जरूरत इस डिजाइन की वजह से Cosmos Policy एक ही आर्किटेक्चर में एक साथ हरकतें, भविष्य की स्थितियां और काम के सफल होने की उम्मीद का अंदाजा लगा पाता है। सिर्फ एक बार की ट्रेनिंग पर निर्भर रहने से, यह फ्रेमवर्क आर्किटेक्चर की जटिलता को कम करता है और परसेप्शन व कंट्रोल के लिए कई अलग-अलग मॉडल को जोड़ने की जरूरत नहीं होती है। ये इमेज NVIDIA की ऑफिशियल साइट से ली गई है। क्या असकरदार है यह नई पॉलिसी? बेंचमार्क के नतीजे बताते हैं कि यह तरीका असरदार है। रोबोटिक मैनिपुलेशन के स्टैंडर्ड बेंचमार्क पर Cosmos Policy ने उन मल्टी-स्टेपकामों में, जिनमें लंबे समय तक सोचने की जरूरत होती है, बहुत अच्छे सक्सेस रेट हासिल किए। कुछ मामलों में, इसने मौजूदा तरीकों के बराबर या उनसे बेहतर परफॉर्म किया, जबकि ट्रेनिंग के लिए बहुत कम डेमो का इस्तेमाल किया। यह डेटा एफिशिएंसी रोबोटिक्स में बहुत जरूरी है, क्योंकि असली दुनिया का ट्रेनिंग डेटा इकट्ठा करना महंगा और समय लेने वाला होता है। बड़े वीडियो मॉडल में पहले से मौजूद जानकारी का फायदा उठाकर Cosmos Policy भरोसेमंद कंट्रोल बिहेविअर सीखने के लिए रोबोट के खास डेटा की जरूरत को कम करता है। पॉलिसी की खास बात Cosmos Policy की एक और खास बात यह है कि यह इन्फेरेंस टाइम पर प्लानिंग कर सकता है। सिर्फ अगली तुरंत होने वाली हरकत बताने के बजाय, मॉडल कई संभावित एक्शन सीक्वेंस बना और उनका मूल्यांकन कर सकता है। इन सीक्वेंस के भविष्य में नतीजों और रिवॉर्ड का अंदाजा लगाकर, रोबोट ऐसी हरकतें चुन सकता है, जिनके लंबे समय तक सफल होने की ज्यादा संभावना हो। यह प्लानिंग क्षमता रोबोट को ज्यादा रिएक्टिव होने के बजाय ज्यादा स्ट्रेटेजिक बनने में मदद करती है, खासकर जब वे मुश्किल काम कर रहे हों। सोच-समझकर ले पाएंगे सही फैसला यह एक बहुत ही अच्छा और जरूरी डेवलपमेंट है। रोबोट सिर्फ वही नहीं करेंगे, जो उन्हें सिखाया गया है। बल्कि वे खुद सोच-समझकर, प्लान बनाकर बेहतर फैसले ले पाएंगे। यह सब इसलिए मुमकिन हो रहा है क्योंकि NVIDIA ने एक ऐसा सिस्टम बनाया है जो वीडियो देखकर दुनिया को समझता है, ठीक वैसे ही जैसे हम इंसान देखते और सीखते हैं।

टेनिस खिलाड़ियों ने अंडरवियर में पहन लिया फिटनेस ट्रैकर, जानें क्यों बैन हुआ हाथ पर पहनना

टेनिस के सबसे बड़े टूर्नामेंट ऑस्टेलियन ओपन 2026 में एक बहुत ही अजीब मुद्दा विवाद का विषय बन गया है। बता दें कि विवाद किसी खिलाड़ी के व्यवहार को लेकर नहीं बल्कि हाथ में फिटनेस बैंड पहनने को लेकर है। दरअसल पिछले दिनों दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी कार्लोस अल्काराज और एरिना सबालेंका जैसे दिग्गजों को अंपायरों ने बीच मैच में अपना फिटनेस बैंड उतारने को कहा था। बता दें कि यह विवाद Whoop नाम की कंपनी के फिटनेस बैंड को लेकर हुआ है। इस कंपनी का फिटनेस बैंड खुद विराट कोहली भी पहनते हैं। हालांकि अचानक यह फिटनेस बैंड ग्रैंड स्लैम के नियमों की भेंट चढ़ गया है। एक र‍िपोर्ट के अनुसार, अब Whoop ने खिलाड़ियों के लिए बैंड पहनने के लिए खास अंडरवियर लॉन्च किया है, ताकि किसी को उनका बैंड हाथों में दिखे नहीं। क्यों हुआ विवाद? बता दें कि ATP और WTA के अन्य टूर्नामेंट्स में टेनिस खिलाड़ी Whoop जैसे फिटनेस बैंड का इस्तेमाल आराम से करते आए हैं। हालांकि ऑस्ट्रेलियन ओपन जैसे ग्रैंड स्लैम के नियम थोड़े अलग और सख्त हैं। X पर दावे किए गए हैं कि इंटरनेशनल टेनिस फेडरेशन (ITF) ने दिसंबर 2025 में इस डिवाइस को टेनिस खेलते हुए पहनने की मंजूरी दी थी, फिर भी टूर्नामेंट अधिकारियों ने सुरक्षा और डेटा नियमों का हवाला देते हुए इसे कलाई पर पहनने से मना कर दिया। खिलाड़ियों के लिए काफी चौंकाने वाला मामला था क्योंकि खेल के दौरान अपनी परफॉर्मेंस से जुड़ा डेटा इक्ट्ठा करना खिलाड़ियों के लिए आम बात है। अंडरवियर में लगेगा फिटनेस ट्रैकर ऑस्टेलियन ओपन 2026 में हाथों में Whoop फिटनेस ट्रैकर पहनने को लेकर हुए विवाद के बाद कंपनी ने एक खास स्टाइल का अंडरवियर लॉन्च कर दिया है, ताकि खिलाड़ी अंडरवियर में ट्रैकर पहनकर खेल के दौरान अपना डेटा कलेक्ट कर सकें। बता दें कि WHOOP एक ऐसा फिटनेस ट्रैकर है जिसमें कोई डिस्प्ले नहीं होता और यह सिर्फ शरीर की रिकवरी और स्ट्र्रेन यानी कि तनाव को मापने के काम में लिया जाता है। इसका डिजाइन और ट्रैकिंग की सटीकता के चलते कई मशहूर खिलाड़ी इसका इस्तेमाल करते हैं। टेनिस स्टार्स के लिए हाथों में फिटनेस ट्रैकर पहनने की मनाही के बाद कंपनी ने 'WHOOP Body' कलेक्शन खिलाड़ियों को भेजी है। इस कलेक्शन में खास अंडरवियर भी शामिल है, जिसमें ट्रैकर फिट करने के लिए पॉकेट बनी होगी। अब आगे क्या? अंपायर्स द्वारा हाथों में बैंड पहनने से मना करने और कंपनी द्वारा बैंड को छिपा कर पहनने वाले कपड़े बनाने के बाद भी खिलाड़ियों के लिए खेल के दौरान डिवाइस का इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है। दरअसल फिलहाल नियम यही है कि टेनिस खेलते समय खिलाड़ी के शरीर पर डेटा इक्ट्ठा करने वाला कोई डिवाइस नहीं हो सकता। ऐसे में खिलाड़ी अगर अंडरवियर में भी डिवाइस पहनते हैं, तो इसे नियमों का उल्लंघन ही माना जाएगा। ऐसा करने पर खिलाड़ियों पर भारी जुर्माना या पेनल्टी लग सकती है। अब जब तक अधिकारियों की ओर से बैंड के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं आती, तब तक खिलाड़ियों को ऐसे डिवाइसेज से दूरी बना कर रखनी होगी।

अल्कोहल के साथ ये चीजें खाना है खतरे की घंटी, जानिए कौन-से फूड्स हैं सबसे खतरनाक

जाम का आनंद लेने वाले अक्सर इस बात पर तो ध्यान देते हैं कि वे क्या पी रहे हैं, लेकिन बोतल के साथ रखी प्लेट में क्या है, इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। जिसे हम बड़े चाव से 'चखना' कहते हैं, वही कभी-कभी हमारे शरीर के लिए एक 'साइलेंट किलर' बन सकता है। शराब खुद शरीर के लिए एक चुनौती है, और गलत भोजन के साथ इसका मेल सेहत के लिए दोहरी मार साबित हो सकता है। अक्सर पार्टियों में हम बेधड़क होकर कुछ भी खाने लगते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि गलत फूड पेयरिंग लिवर और पाचन तंत्र पर बुरा असर डालती है। आयरन से भरपूर चीजें (दाल, बीन्स और मूंगफली) सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन सेहतमंद मानी जाने वाली दालें और बीन्स भी शराब के साथ घातक हो सकती हैं। खासकर रेड वाइन के साथ आयरन वाली चीजें खाने से बचना चाहिए। वाइन में मौजूद 'टेनिन' शरीर को आयरन सोखने से रोकता है, जिससे पेट में ऐंठन और पोषण की कमी हो सकती है। मीठा और चॉकलेट मिठाई या चॉकलेट के शौकीनों के लिए यह बुरी खबर है। चॉकलेट में पाया जाने वाला कैफीन और अधिक चीनी, शराब के साथ मिलकर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं को जन्म देती है। यह न केवल आपके नशे को अनियंत्रित तरीके से बढ़ा सकती है, बल्कि अगले दिन गंभीर हैंगओवर का कारण भी बनती है। फास्ट फूड (पिज्जा और बर्गर) मैदे से बने ये भारी भोजन पेट में एसिड रिफ्लक्स की समस्या पैदा करते हैं। पिज्जा में इस्तेमाल होने वाला सॉस और टमाटर, अल्कोहल के साथ मिलकर सीने में जलन और गैस्ट्रिक अल्सर जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं। यह मिश्रण आपके पाचन तंत्र को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर सकता है। सॉल्टी और स्पाइसी स्नैक्स: प्यास और पेट की आफत अत्यधिक नमक वाले चिप्स या मसालेदार कुरकुरे स्नैक्स शराब के साथ सबसे लोकप्रिय विकल्प हैं। लेकिन ये 'सोडियम बम' आपके शरीर को तेजी से डिहाइड्रेट करते हैं। शराब वैसे ही शरीर से पानी सोखती है, ऊपर से नमक की अधिक मात्रा प्यास बढ़ाती है और एसिडिटी का कारण बनती है।  बेकरी उत्पाद (ब्रेड और सैंडविच) अगर आप शराब के साथ सैंडविच या पिज्जा बेस जैसी ब्रेड वाली चीजें खा रहे हैं, तो रुक जाइए। ब्रेड में मौजूद यीस्ट और शराब का मेल पेट में 'गैंडिडा' जैसे बैक्टीरिया को बढ़ा सकता है। इससे न केवल पाचन धीमा होता है, बल्कि पेट फूलने और लिवर पर दबाव पड़ने की समस्या भी हो सकती है।

Chrome में नया फीचर, Google करेगा ऑटो टिकट बुकिंग और फॉर्म फीलिंग की सुविधा

 नई दिल्ली सोचिए, आप किसी वेबसाइट पर टिकट बुक कर रहे हैं. फॉर्म भरना है, सीट चुननी है, पेमेंट करना है. अब तक ये सब आपको खुद करना पड़ता था. लेकिन अब Google एक ऐसा फीचर ला रहा है, जहां Chrome ब्राउज़र खुद ये काम करने में मदद करेगा. वेब ब्राउजिंग का तरीका बदलने वाला है. अगर आपने Perplexity का Comet ब्राउजर यूज किया है तो पता होगा. नहीं किया तो बता दें कि ये Comet एजेंटिक ब्राउजर है. इसमें एक इनबिल्ट Assistant दिया गया है. आपको सिर्फ कमांड लिखना है और ये ब्राउजर खुद से ही सबकुछ करेगा. ऐसे में आपका टाइम भी बचेगा और प्रोडक्टिविटी भी बढ़ेगी.  Perplexity के अलावा OpenAI का भी एजेंटिक ब्राउजर ATLAS चर्चा में रहता है. हालांकि ये फिलहाल एक्सपेरिमेंटल ब्राउजर है, लेकिन ये भी एजेंटि ब्राउजर है. यहां भी आपको सिर्फ कमांड डालना है और ये खुद से ही आपके लिए ब्राउजिंग करता है और तमाम जरूरी काम करता है. एजेंटिक वेब ब्राउजिंग का फ्यूचर एजेंटिक वेब ब्राउजर का बूम आने ही वाला है और गूगल इस रेस में पीछे नहीं रह सकता. गूगल ने Chrome में Gemini ऐड कर दिया है और काफी हद तक ये फीचर रोल आउट होने के बाद ये एजेंटिक ब्राउजर की तरह बन कर तैयार हो जाएगा.  Google ने Chrome में अपने Gemini AI को जोड़ना शुरू कर दिया है. इसका मतलब है कि अब ब्राउज़र सिर्फ वेबसाइट खोलने का टूल नहीं रहेगा, बल्कि एक छोटा डिजिटल असिस्टेंट बन जाएगा, जो आपकी तरफ से वेब पर काम कर सकेगा. ब्राउजर बिना आपके ही करेगा ब्राउज टेक दुनिया में इसे Auto Browse या AI एजेंट फीचर कहा जा रहा है. आसान भाषा में समझें तो, अगर आप Chrome से कहेंगे – 'इस वेबसाइट से मेरा ट्रेन टिकट बुक कर दो'… तो AI पेज को समझेगा, बटन पहचानेगा, जरूरी जानकारी भरेगा और प्रोसेस को आगे बढ़ाएगा. यानी वेबसाइट चलाने की मेहनत कम, काम ज्यादा तेज. Google की तरफ से बताया गया है कि Gemini AI अब Chrome के अंदर सीधे काम करेगा. अभी तक AI टूल सिर्फ चैट तक सीमित थे. आप सवाल पूछते थे, जवाब मिलता था. लेकिन अब Gemini वेब पेज के साथ इंट्रैक्टर भी करेगा. वो स्क्रीन पर दिख रहे टेक्स्ट, बॉक्स और बटन को पहचान सकेगा और आपके निर्देश पर काम करेगा. उदाहरण के तौर पर अगर आप इंटरनेट पर कोई रिसर्च कर रहे हैं तो आप Assistant में लिख सकते हैं. या फिर अगर शॉपिंग कर रहे हैं और आपको प्रोडक्ट समझ नहीं आ रहा है तो भी आप लिख सकते हैं. ब्राउजर खुद से ही आपके पसंद का सामान ढूंढ देगा. कोडिंग में भी ये काफी फायदेमंद होने वाला है. इसका सीधा फायदा उन लोगों को होगा, जो टेक्निकल वेबसाइट्स या ऑनलाइन फॉर्म्स से घबराते हैं. बुजुर्ग यूजर्स, पहली बार इंटरनेट चलाने वाले लोग, या जिन्हें ऑनलाइन प्रोसेस जटिल लगता है… उनके लिए ये फीचर गेमचेंजर हो सकता है. अब सवाल उठता है कि क्या ये सुरक्षित रहेगा? Google का कहना है कि AI सिर्फ तभी काम करेगा जब यूजर अनुमति देगा. यानी बिना पूछे कोई फॉर्म नहीं भरेगा, ना कोई पेमेंट करेगा. हर अहम स्टेप पर यूजर का कंट्रोल रहेगा. साथ ही कंपनी दावा कर रही है कि डेटा ब्राउज़र के अंदर ही प्रोसेस होगा और आपकी निजी जानकारी बिना इजाजत कहीं शेयर नहीं होगी. फिलहाल ये फीचर टेस्टिंग फेज में है. कुछ चुनिंदा यूजर्स के लिए इसे धीरे-धीरे रोलआउट किया जा रहा है. आने वाले महीनों में Chrome यूजर्स को इसका अनुभव मिलने लगेगा. अगर ये टेक्नोलॉजी ठीक से काम करती है, तो इंटरनेट इस्तेमाल करने का तरीका बदल सकता है. अभी हम वेबसाइट चलाते हैं. आने वाले समय में हम AI को बताएंगे क्या करना है..और ब्राउज़र खुद काम करेगा. सीधे शब्दों में कहें तो, Chrome अब सिर्फ ब्राउज़र नहीं रहेगा. वो आपका वेब वाला असिस्टेंट बन जाएगा. और यही वजह है कि टेक इंडस्ट्री में इस अपडेट को लेकर काफी चर्चा है. क्योंकि ये सिर्फ नया फीचर नहीं, बल्कि इंटरनेट इस्तेमाल करने की नई शुरुआत मानी जा रही है.