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FASTag और AI की मदद से अब टोल पर बिना रुकें कटेगा शुल्क, जानें सरकार की योजना

 नई दिल्ली देश के हाईवे पर अब वो दिन खत्म होने वाले हैं जब टोल प्लाजा पर लंबी लाइन में खड़े होकर आपका मूड और माइलेज दोनों खराब होता था. अब गाड़ी दौड़ेगी और टोल अपने आप कट जाएगा. यानी ना रुकना, ना बहस, ना चिल्ल-पों. सरकार एक ऐसा सिस्टम ला रही है जिसमें कैमरा नंबर पढ़ेगा और पैसा सीधे आपके खाते से कटेगा. यदि सबकुछ योजना के मुताबिक रहा तो दिसंबर तक ये बदलाव जमीन पर दिखने लगेगा और आपके सफर का एक्सपीरियंस पूरी तरह बदल जाएगा. आइये विस्तार से जानें क्या है पूरा मामला-  देशभर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर जल्द ही टोल प्लाजा पर रुकने की झंझट खत्म होने वाली है. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की है कि दिसंबर 2026 तक कई हाईवे पर सीमलेस और बैरियर-फ्री (Barrier-Free) टोल सिस्टम लागू कर दिया जाएगा. इससे सफर तेज, आसान और बिना किसी झंझट के आगे बढ़ेगा।  लॉजिस्टिक्स पॉवर समिट एंड अवॉर्ड्स 2026 में बोलते हुए गडकरी ने कहा कि, देश में लॉजिस्टिक्स लागत कम करने के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है. उन्होंने बताया कि सरकार दिसंबर तक कई नेशनल हाईवे पर बिना बैरियर वाला टोल सिस्टम लागू करने की योजना पर काम कर रही है. इससे टोल प्लाजा पर लगने वाला समय बचेगा और ट्रैफिक भी कम होगा।  AI और FASTag से होगा ऑटोमैटिक टोल कट इस नए सिस्टम में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. इसमें ऑटोमेटिक नंबर प्लेट रिकॉग्ननिशन (ANPR) और RFID बेस्ड FASTag शामिल होंगे. हाई-परफॉर्मेंस कैमरे गाड़ियों की नंबर प्लेट पहचानेंगे और FASTag के जरिए टोल अपने आप कट जाएगा. ड्राइवर को कहीं रुकने की जरूरत नहीं होगी।  अगर कोई वाहन नियमों का पालन नहीं करता है तो उसे ई-नोटिस भेजा जाएगा. समय पर भुगतान नहीं करने पर FASTag को सस्पेंड किया जा सकता है और VAHAN से जुड़े अन्य जुर्माने भी लग सकते हैं. गडकरी ने कहा कि अगर भारत को ग्लोबल पावर बनना है तो लॉजिस्टिक्स लागत को सिंगल डिजिट तक लाना होगा।  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मद्रास और कानपुर, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बेंगलुरु की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक्सप्रेसवे और इकोनॉमिक कॉरिडोर बनने से भारत की लॉजिस्टिक्स लागत 16 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत तक आ गई है. उन्होंने बताया कि अमेरिका और यूरोप में यह करीब 12 प्रतिशत है, जबकि चीन में 8 से 10 प्रतिशत के बीच है।  ग्रीन फ्यूल पर जोर गडकरी ने कहा कि भारत अपनी 87 प्रतिशत तेल जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है. हर साल करीब 22 लाख करोड़ रुपये का फॉसिल फ्यूल आयात किया जाता है, जिससे प्रदूषण भी बढ़ता है. ऐसे में वैकल्पिक ईंधन और बायोफ्यूल को बढ़ावा देना जरूरी है. उन्होंने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन फ्यूचर का फ्यूल है, लेकिन इसे किफायती बनाने के लिए हाइड्रोजन स्टेशन की लागत कम करनी होगी।  गडकरी ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है. सरकार का सपना है कि देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाया जाए. बेहतर सड़क नेटवर्क और कम लॉजिस्टिक्स लागत इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।   

बंगाल चुनाव में अहम मुकाबला, कोलकाता, हावड़ा और 24 परगना की 91 सीटें होंगी निर्णायक

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आगामी 4 मई को सामने आ जाएंगे। इससे पहले राज्य में सियासी पारा हाई है। पहले चरण के चुनावों में बंपर वोटिंग के बाद जहां भारतीय जनता पार्टी को इस बार बंगाल में बदलाव की उम्मीद है, वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर जीत का दावा कर रही हैं। ऐसे में मतगणना के दिन का बेसब्री से इंतजार है। इतिहास की बात करें तो उत्तरी बंगाल की पहाड़ियों या जंगलमहल के वनक्षेत्र की सरकार बनाने में बहुत कम भूमिका होती है। यहां आमतौर पर सत्ता का फैसला दक्षिणी बंगाल के घनी आबादी वाले मैदानी इलाकों से ही होता है और इस बार भी निगाहें इन्हीं सीटों पर टिकी हैं। उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिले इस चुनावी जंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। यह दोनों जिले कोलकाता और हावड़ा के साथ तृणमूल कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह सत्ता हासिल करने का महत्वपूर्ण रास्ता है। भाजपा सत्तारूढ़ पार्टी के दक्षिणी गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, जिसके साथ दो सबसे बड़े जिले, 33 सीट वाला उत्तर 24 परगना और 31 सीट वाला दक्षिण 24 परगना, एक बार फिर बंगाल के चुनाव जीतने की कुंजी साबित होंगे। ये हैं सबसे निर्णायक क्षेत्र कोलकाता की 11 सीट और हावड़ा की 16 सीट के साथ, ये चार जिले बंगाल विधानसभा की 294 सीट में से 91 सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सदन का लगभग एक तिहाई हिस्सा होने के कारण 2026 के चुनावों में सबसे निर्णायक क्षेत्र बन जाते हैं। वहीं उत्तर और दक्षिण 24 परगना उस मुकाबले का केंद्र बने हुए हैं, जिसे बंगाल के राजनेता अक्सर ''बंगाल के उत्तर प्रदेश का चुनावी नक्शा'' कहते हैं। यह वह क्षेत्र है जो राज्य सचिवालय नबान्न में सत्ता बना या बिगाड़ सकता है। प्रेसिडेंसी प्रभाग में कोलकाता, हावड़ा, नादिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना शामिल है तथा यहां 111 सीट है, जो तृणमूल कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ बना हुआ है। पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के मजबूत प्रयासों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस ने इन 111 में से 96 सीट जीतीं, जबकि भाजपा को केवल 14 और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) को एक सीट ही मिल पाई। भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी पकड़ मजबूत की और यहां की 21 सीट पर बढ़त हासिल की, जबकि तृणमूल कांग्रेस 90 सीट में आगे रही। TMC-BJP दोनों को उम्मीद तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनावी गणित बिल्कुल स्पष्ट है। वह अगर इस स्थिति को बरकरार रखती है तो उसका लगातार चौथी बार सत्ता में आने का रास्ता खुला रहेगा। तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा, “अगर हम उत्तर और दक्षिण 24 परगना, कोलकाता और हावड़ा को अपने पास बनाए रखते हैं, तो बंगाल हमारे पास रहेगा। ये सिर्फ सीट नहीं हैं, ये ममता बनर्जी की राजनीति का सामाजिक आधार हैं।” जबकि भाजपा इसी भौगोलिक क्षेत्र को सत्ता परिवर्तन का मार्ग मानती है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "उत्तर 24 परगना, कोलकाता और हावड़ा में पैठ बनाए बिना हमारे लिए सत्ता तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है। मतुआ और शरणार्थी वोट के कारण उत्तर 24 परगना ही हमारे लिए सत्ता का प्रवेश द्वार है।"

हिमालय के ग्लेशियरों पर बढ़ी गर्मी का असर, 50 करोड़ लोगों के लिए बढ़ा संकट

 नई दिल्ली दुनिया भर में इस समय ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन का असर जमीन पर साफ-साफ दिख रहा है.  पर्वतीय क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है. दो अरब लोगों को भोजन और पानी देने वाले हिंदूकुश हिमालय से लेकर समुद्र की गहराई तक पृथ्वी गर्म हो रही है. विश्व के सभी पहाड़ पृथ्वी की सतह के लगभग 20% के क्षेत्रफल पर फैले हुए हैं।  ये पहाड़ दुनिया की कुल जनसंख्या के 10% लोगों को घर और 50% लोगों को खेती की जमीन को सिंचाई हेतु जल, औद्योगिक उपयोग और घरेलू उपभोग के लिए मीठा पानी प्रदान करते हैं. पर्वतीय क्षेत्र आनुवांशिक एवं जैव विविधता के भंडार रहे हैं. पर्वतीय क्षेत्र अन्य आवश्यक संसाधन जैसे लकड़ी, खनिज, जल-विद्युत और मनोरंजक पर्यटन स्थल आदि उपलब्ध कराते है, किन्तु पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन और बढ़ती हुई जनसंख्या, जंगलों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक इस्तेमाल और अवैज्ञानिक कृषि पद्धति  के कारण पर्वतीय क्षेत्रों के मौसम को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ रहा है।  ग्लोबलाइजेशन के बाद प्राकृतिक संपदा के दोहन से जो औद्योगिक विकास हुआ है, उससे उत्सर्जित कॉर्बन ने इनके पिघलने की तीव्रता को बढ़ा दिया है. एक शताब्दी पूर्व भी हिमखण्ड पिघलते थे, लेकिन बर्फ गिरने के बाद इनका दायरा निरंतर बढ़ता रहता था. इसलिए गंगा और यमुना जैसी नदियों का प्रवाह सतत बना रहा. किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा तीन से चार मीटर प्रति वर्ष घटना शुरू हो गया था।  गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे घटने की औसत दर 30-60 मीटर प्रति दशक है जो एक चिंता का विषय है. ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में प्रसिद्ध गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा का मुख्य स्रोत भी है, तेजी से प्रति वर्ष 28-30 मीटर की दर से पीछे को घट रहा है. 1935 से 2022 के बीच यह लगभग 1700 मीटर पीछे हट चुका है. पिछले दो दशकों में पिघलने की दर भी दोगुनी हो गई है।  यह हिमालय के ईकोसिस्टम और उत्तर भारत की वाटर सिक्योरिटी के लिए एक गंभीर संकट है. देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. पीछे हट रहे हैं. सिक्किम और लद्दाख (जांस्कर) के ग्लेशियरों पर की गई स्टडी में पाया गया है कि गर्मी के मौसम तापमान में वृद्धि और कम हिमपात इसके मुख्य कारण हैं।  हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में बसे देश भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान जहां दुनिया की खासी आबादी रहती है, यहां इन प्रभावों का अधिक जोखिम बना हुआ है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिंदूकुश हिमालय  क्षेत्र के ग्लेशियरों  के तेजी से पिघलने के कारण सदी के अंत तक 75% बर्फ के खत्म होने का खतरा है. भारतीय हिमालय में कुल 9,975 ग्लेशियर हैं. इनमें 900 उत्तराखंड में आते हैं।  ग्लेशियर पिघलेंगे तो नदियों का क्या होगा? इन ग्लेशियरों से ही ज्यादातर नदियां निकली हैं, जो देश की 40 प्रतिशत आबादी को पीने, सिंचाई व आजीविका के अनेक संसाधन उपलब्ध कराती हैं. किंतु ग्लेशियरों के पिघलने और टूटने का यही सिलसिला बना रहा तो देश के पास ऐसा कोई उपाय नहीं है कि वह इन नदियों से जीवन-यापन कर रही 50 करोड़ आबादी को रोजगार व आजीविका के वैकल्पिक संसाधन दे सके?   पड़ोसी देश नेपाल, जो जलवायु परिवर्तन के जोखिम के मामले में दुनिया में चौथा सबसे संवेदनशील देश माना जाता है. नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं, जिसमें तेजी से पिघलते ग्लेशियर, अनियमित मानसून और बाढ़/भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी शामिल है. हिमालयी ईकोसिस्टम में बदलाव के कारण कृषि उत्पादन कम हो रहा है. पानी के स्रोत सूख रहे हैं. जैव विविधता को नुकसान हो रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा जोखिम में है. नेपाल  जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पिछले दो दशकों से अनुकूलन और कम करने के प्रयास भी कर रहा है।  बढ़ता तापमान ही है मुसीबत की जड़ आईसीआईएमओडी (ICIMOD), एकीकृत पर्वतीय विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्र आठ सदस्य देशों (अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान) के सहयोग से पर्वतीय आजीविका और पर्यावरण के संरक्षण के लिए काम करता है।  ICIMOD की चेतावनी के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि को  1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं रोका गया, तो इस सदी के अंत तक हिमालय के 80% ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं, जिसका सीधा असर पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर पड़ेगा. क्योंकि हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला है जो एशिया के 8 देशों में फैली हुई है. इसे तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है. आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाहर यहां बर्फ का सबसे बड़ा भंडार है।  ग्लोबल चेंज बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन अगर बिना रोक टोक इसी रफ्तार से बढ़ता गया तो बढ़ते तापमान की वजह से पिघल रहे अंटार्कटिक बर्फ के चलते एंपरर पेंग्विन की 98 आबादी इक्कीसवीं सदी तक गायब हो सकती है।  जैसे-जैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे जलवायु  परिवर्तन गति पकड़ रहा है. दुनिया भर की आबादी चरम मौसम और जलवायु घटनाओं से गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है. अल-नीनो या ला-नीना जो समझ में आता हो या ना आता हो, लेकिन इस बार जिस तरह से प्रचंड गर्मी ने हालात पैदा किए हैं. उसने कुछ जरूर सिखा दिया होगा. बढ़ते तापमान को रोकना आसान काम नहीं है।  स्नो हार्वेस्टिंग का समय आ रहा है बावजूद इसके हम अपने हिमखंडों को टूटने और पिघलने से बचाने के उपाय औद्योगिक गतिविधियों को विराम देकर एक हद तक रोक सकते हैं. पर्यटन के रूप में मानव समुदायों की जो आवाजाही हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही है. उस पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है. इसके अलावा वाकई हम अपनी बर्फीली शिलाओं को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमारी ज्ञान परंपरा में हिमखंडों के सुरक्षा के जो उपाय उपलब्ध हैं, उन्हें भी महत्व देना होगा।  हिमालय के शिखरों पर रहने वाले लोग आजादी के दो दशक बाद तक बरसात के समय छोटी-छोटी क्यारियां बनाकर पानी रोक देते थे. तापमान … Read more

पुतिन का 150 साल जीने का सपना, वैज्ञानिक कर रहे हैं उसे साकार, क्या थम जाएगी उम्र?

मॉस्को  रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन उम्र बढ़ाने वाली नई दवा पर बहुत ध्यान दे रहे हैं. कुछ महीने पहले नवंबर में एक एआई समिट में 73 साल के पुतिन ने कहा था कि इंसान 150 साल तक जी सकता है. अब रूस के विज्ञान और शिक्षा मंत्री डेनिस सेकिरिंस्की ने दावा किया है कि उनके देश के वैज्ञानिक दुनिया की पहली जीन थेरेपी दवा बना रहे हैं जो बूढ़ा होने के प्रोसेस को रोक सकती है।  यह दवा RAGE नाम के जीन को ब्लॉक करेगी जो कोशिकाओं को बूढ़ा बनाने का काम करती है. सेकिरिंस्की ने कहा कि इस जीन को सक्रिय होने से कोशिकाएं बूढ़ी हो जाती हैं लेकिन इसे रोकने से कोशिकाओं की जवानी लंबी हो सकती है. यह खबर पुतिन की लंबी उम्र की चाहत से जुड़ी हुई लग रही है।  RAGE जीन क्या है और दवा कैसे काम करेगी RAGE का पूरा नाम रिसेप्टर फॉर एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंडप्रोडक्ट्स है. यह एक रिसेप्टर है जो कोशिकाओं में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया शुरू कर देता है. रूस के वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि जीन थेरेपी से इस रिसेप्टर को ब्लॉक किया जाए ताकि कोशिकाएं ज्यादा समय तक युवा रहें. सेकिरिंस्की ने सरांस्क शहर में लॉन्गेविटी मेडिसिन फोरम में यह बात कही।  उन्होंने कहा कि यह जीन थेरेपी उम्र बढ़ने के खिलाफ लड़ाई में सबसे आशाजनक क्षेत्र है. यह दवा बायोलॉजी ऑफ एजिंग एंड मेडिसिन इंस्टीट्यूट में विकसित की जा रही है. अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया है लेकिन यह पुतिन के लंबे समय के लक्ष्यों से मेल खाता है।  पुतिन और शी जिनपिंग की अमरता वाली अफवाह पुतिन सिर्फ 150 साल तक जीने से संतुष्ट नहीं हैं. उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बातचीत में कहा था कि इंसान के अंगों को बार-बार ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. जितना ज्यादा जीएंगे उतने युवा लगेंगे. दोनों नेताओं की यह बातचीत सुन ली गई थी. पुतिन लंबे समय से उम्र बढ़ाने के शौकीन हैं. उनके दुश्मन डरते हैं कि वे दशकों तक सत्ता में रहना चाहते हैं. फिर अपनी सबसे बड़ी बेटी या बेटे इवान स्पिरोडोनोव को सत्ता सौंपेंगे. इवान अभी सिर्फ 11 साल के हैं।  वैज्ञानिकों पर दबाव और पुतिन का आदेश रूसी वैज्ञानिकों को हाल ही में आदेश दिया गया कि वे उम्र बढ़ाने से लड़ने वाली अपनी सारी रिसर्च तुरंत सरकार को सौंप दें. एक सूत्र ने बताया कि सबसे बड़े बॉस यानी पुतिन ने टास्क दिया और अधिकारी हर तरीके से इसे लागू कर रहे हैं. वैज्ञानिकों को कहा गया कि कोशिकाओं के खराब होने को रोकने की नई तकनीक, दिमाग और इंद्रियों की कमजोरी रोकने वाले उपाय, इम्यून सिस्टम सुधारने के तरीके और बायोप्रिंटिंग जैसी नई मेडिकल टेक्नोलॉजी के प्रपोजल भेजें।  पुतिन ने रूस में एक नेशनल मिशन शुरू किया है जिसका लक्ष्य नागरिकों की सेहत बचाना और उम्र बढ़ने से लड़ना है. 2030 तक 1 लाख 75 हजार जानें बचाने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन वहीं यूक्रेन युद्ध में लाखों जानें जा चुकी हैं. पुतिन के सभी महलों में आधुनिक अस्पताल बने हैं ताकि उनकी सेहत हमेशा अच्छी रहे. उनकी सबसे बड़ी बेटी मारिया वोरोन्त्सोवा जो 40 साल की एंडोक्रिनोलॉजिस्ट हैं वे भी इस उम्र बढ़ाने वाली रिसर्च में शामिल बताई जाती हैं।  पुतिन के एंटी-एजिंग गुरु की मौत पिछले साल पुतिन को बड़ा झटका लगा जब उनके लंबे समय के एंटी-एजिंग गुरु प्रोफेसर व्लादिमीर खाविन्सन की 77 साल की उम्र में अचानक मौत हो गई. खाविन्सन ने दावा किया था कि वे इंसानों को 110-120 साल तक जीने का राज बता रहे थे. उन्होंने पुतिन को तीन पुराने सोवियत नेताओं से बेहतर बताया था।  पुतिन और उनकी प्रेमिका अलिना काबाएवा दोनों खाविन्सन के एंटी-एजिंग कॉकटेल लेते रहे हैं जो सोवियत आर्मी के समय से तैयार किए गए थे. इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर इलिया दावल्याटचिन का कहना है कि पुतिन वास्तव में 150 नहीं बल्कि 97 साल तक जीना चाहते हैं।  2050 में उनका बेटा इवान 35 साल का हो जाएगा जो रूसी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने की उम्र है. कुल मिलाकर पुतिन उम्र बढ़ाने की दवा को अपने और अपने करीबियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं लेकिन यह अभी प्रयोग की स्टेज पर है और कोई गारंटी नहीं है. दुनिया देख रही है कि क्या रूस सच में उम्र बढ़ाने की दुनिया की पहली दवा बना पाएगा। 

तुर्की में रहने वालों के लिए शानदार मौका, 20 साल तक टैक्स में छूट!

अंकारा  तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने देश की इकोनॉमी को नई रफ्तार देने के लिए एक ऐतिहासिक दांव खेला है. सरकार ने विदेशी नागरिकों और टैलेंटेड प्रोफेशनल्स को लुभाने के लिए 20 साल के ‘टैक्स फ्री’ पैकेज का ऐलान किया है. इस बड़े फैसले का मकसद तुर्की को ग्लोबल ट्रेड और इन्वेस्टमेंट का नया सेंटर बनाना है. तुर्की सरकार के नए प्लान के मुताबिक, जो विदेशी नागरिक पिछले 3 साल से तुर्की के टैक्स रेजिडेंट नहीं रहे हैं और अब यहां शिफ्ट होने का फैसला करते हैं, उन्हें बड़ी राहत मिलेगी. ऐसे लोग अगले 20 सालों तक अपनी विदेशी इनकम और कैपिटल गेन्स पर एक भी रुपया टैक्स नहीं देंगे।  सीधे शब्दों में कहें तो अगर आप तुर्की में रहकर दुनिया के किसी भी दूसरे देश से पैसा कमाते हैं, तो उस पर तुर्की की सरकार कोई टैक्स नहीं लेगी. टैक्स केवल उसी इनकम पर देना होगा जो तुर्की की सीमा के भीतर कमाई जाएगी. इसके अलावा, इन लोगों के लिए इनहेरिटेंस और गिफ्ट टैक्स की दर को घटाकर सिर्फ 1 परसेंट कर दिया गया है।  क्या बिजनेस सेक्टर को भी मिलेगी बड़ी राहत? इस्तांबुल में आयोजित एक प्रोग्राम के दौरान एर्दोगन ने साफ किया कि यह राहत सिर्फ व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है. मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्टर्स के लिए कॉर्पोरेट टैक्स की दर 25 परसेंट से घटाकर सीधे 9 परसेंट कर दी गई है. वहीं, अन्य एक्सपोर्टर्स के लिए यह दर 14 परसेंट तय की गई है।  इस्तांबुल फाइनेंस सेंटर को दुबई और लंदन जैसे ग्लोबल हब के मुकाबले खड़ा करने की तैयारी है. इस सेंटर के अंदर ट्रांजिट ट्रेड करने वाली कंपनियों को कॉर्पोरेट टैक्स से 100 परसेंट की छूट दी जाएगी. सेंटर से बाहर काम करने वाली कंपनियों को भी 95 परसेंट तक की छूट का फायदा मिलेगा।  कैसे आसान होगा तुर्की में निवेश करना? एर्दोगन ने निवेशकों की राह आसान करने के लिए ‘सिंगल-स्टॉप इन्वेस्टमेंट ब्यूरो’ बनाने की घोषणा की है. यह एक डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा जहां कंपनी रजिस्ट्रेशन, वर्क परमिट और टैक्स फाइलिंग जैसे सभी काम एक ही जगह हो सकेंगे. राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि तुर्की अब सिर्फ पूर्व और पश्चिम के बीच का पुल नहीं है, बल्कि दुनिया के एनर्जी और ट्रेड रूट्स का केंद्र है।  क्या यह स्कीम गेम-चेंजर साबित होगी? दुनियाभर के अमीर निवेशक और मल्टीनेशनल कंपनियां अब तुर्की की ओर रुख कर सकती हैं. 20 साल की लंबी अवधि के लिए टैक्स छूट देना एक बहुत बड़ा फैसला है, जो तुर्की को एक सुरक्षित और फायदेमंद इन्वेस्टमेंट डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित कर सकता है. जल्द ही इस पैकेज को संसद में पेश किया जाएगा, जिसके बाद इसे कानून के रूप में लागू कर दिया जाएगा। 

शुभेंदु अधिकारी की उम्मीदवारी को लेकर हाई कोर्ट ने दिया बड़ा फैसला, याचिका पर क्या हुआ निर्णय

कोलकाता पश्चिम बंगाल में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी की उम्मीदवारी के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर बड़ा फैसला आया है। कोलकाता हाई कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने शुभेंदु अधिकारी के खिलाफ भड़काऊ टिप्पणियों का आरोप लगाया था। मुख्य न्यायाधीश की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट रूप से कहाकि संविधान की किसी विशेष धारा का उल्लेख न होने के कारण यह याचिका मान्य नहीं है। जवाब नहीं दे सके वकील प्रधान न्यायाधीश सुजॉय पाल और न्यायाधीश पार्थ सारथी सेन ने मामले के वादी से पूछा कि वह संविधान की किस धाराओं के तहत प्रत्याशी की उम्मीदवारी रद्द करने के लिए आवेदन कर रहे हैं? इसके जवाब में वादी के पक्ष के वकील कोई उत्तर नहीं दे सके। इसके चलते प्रधान न्यायाधीश की बेंच ने मामला खारिज कर दिया। गौरतलब है शुभेंदु अधिकारी भवानीपुर से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। दोनों के बीच यह मुकाबला बेहद दिलचस्प और कांटे का माना जा रहा है। भाजपा का दावा है कि ममता बनर्जी के मुकाबले शुभेंदु को मनौवैज्ञानिक बढ़त हासिल है। नंदीग्राम में दे चुके हैं ममता को मात ममता बनर्जी के करीबी समझे जाने वाले शुभेंदु ने 2021 में तृणमूल छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था और उन्होंने भाजपा उम्मीदवार के रूप में नंदीग्राम सीट पर बनर्जी को हराया था। पांच साल बाद, अब यह चुनावी मुकाबला बनर्जी के गढ़ में हो रहा है। तृणमूल कांग्रेस के लिए, भवानीपुर सीट बरकरार रखना मुख्यमंत्री के अपने ही क्षेत्र में उनकी राजनीतिक सत्ता को बरकरार रखने जैसा है। भाजपा के लिए, इसे भेदना बंगाल की सबसे शक्तिशाली नेता के इर्द-गिर्द बनी ‘अजेय’ की छवि को तोड़ने जैसा होगा। भवानीपुर कहलाता है ‘मिनी इंडिया’ कोलकाता नगर निगम के आठ वार्ड में फैला भवानीपुर अक्सर ‘मिनी इंडिया’ कहलाता है, एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र जहां बंगाली, गुजराती व्यापारी, पंजाबी और सिख परिवार, मारवाड़ी और जैन परिवार, साथ ही बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता रहते हैं। बिहार, ओडिशा और झारखंड से आए प्रवासी इस सामाजिक विविधता में एक और आयाम जोड़ते हैं। भवानीपुर में लगभग 42 प्रतिशत मतदाता बंगाली हिंदू हैं, 34 प्रतिशत गैर-बंगाली हिंदू और लगभग 24 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो इस निर्वाचन क्षेत्र को सामाजिक रूप से विविध और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बनाते हैं। ऐसा लगता है कि इसी समीकरण ने अधिकारी को बनर्जी को उनके गृह क्षेत्र में चुनौती देने के लिए प्रोत्साहित किया है। बूथ-दर-बूथ आंकड़ा भाजपा ने महीनों से भवानीपुर में बूथ-दर-बूथ का आंकड़ा तैयार किया है। पार्टी नेताओं का दावा है कि मतदाताओं में कायस्थ 26.2 प्रतिशत, मुस्लिम 24.5 प्रतिशत, पूर्वी भारत का प्रवासी समुदाय 14.9 प्रतिशत, मारवाड़ी 10.4 प्रतिशत और ब्राह्मण 7.6 प्रतिशत हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, इस कवायद से यह पता लगाने में मदद मिली कि बंगाली हिंदू बहुसंख्यक क्षेत्र कौन से हैं, हिंदी भाषी व्यापारी समुदाय कहां केंद्रित हैं और किन बूथ पर मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव रहने की संभावना है।

कर्नाटक में कुकर बम मामले में आतंकी शारिक को 10 साल की सजा, मंदिर में रखने से पहले हुआ था धमाका

 मंगलुरु मंगलूरु के कुकर बम धमाके के मामले में विशेष NIA अदालत ने आतंकी मोहम्मद शारिक को 10 साल की सजा सुनाई है. शारिक ने अदालत में अपना जुर्म कबूल कर लिया था, जिसके बाद यह फैसला आया।  यह घटना 19 नवंबर 2022 को कर्नाटक के मंगलूरु के कंकनाडी इलाके में हुई थी. जांच में सामने आया कि शारिक कदरी मंजुनाथ मंदिर में बम रखने जा रहा था. लेकिन रास्ते में ही कुकर बम फट गया, जिससे बड़ा हादसा होने से बच गया।  धमाके में शारिक खुद घायल हो गया था. साथ ही ऑटो चालक पुरुषोत्तम पुजारी भी जख्मी हुए थे. दोनों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया।  करीब तीन महीने इलाज के बाद शारिक को एनआईए की हिरासत में लिया गया. पूछताछ और जांच पूरी होने के बाद एजेंसी ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया।  अब अदालत ने उसे 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है. इस फैसले को बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है, क्योंकि समय रहते धमाका होने से एक संभावित बड़ा हमला टल गया। 

चुनाव खत्म होने के बावजूद बंगाल में रहेंगे केंद्रीय सुरक्षा बल, क्या है अमित शाह का प्लान?

पश्चिम बंगाल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार (27 अप्रैल) को कहा कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद भी कम से कम 60 और दिन तक केंद्रीय सुरक्षा बल राज्य में तैनात रहेंगे। उन्होंने मतदाताओं से चुनाव के अंतिम चरण में "दीदी के गुंडों" से डरे बिना मतदान करने की अपील की। शाह बेहाला में रोड शो के बाद एक सभा को संबोधित कर रहे थे, जहां 29 अप्रैल को दूसरे और अंतिम चरण में मतदान होना है। 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को हुआ था, जबकि मतगणना चार मई को होगी। शाह ने कहा, "भाइयों और बहनों, 29 तारीख को जाकर वोट दीजिए, गुंडों से डरने की जरूरत नहीं है। निर्वाचन आयोग ने व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए हैं और मैं आपको बता दूं कि भाजपा के सत्ता में आने पर भी केंद्रीय बल यहां 60 दिन तक रहेंगे।" यह रोड शो बेहाला पूर्व और बेहाला पश्चिम सीटों के भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार के अंतिम दिन आयोजित किया गया था। इस दौरान दक्षिण कोलकाता का यह इलाका भगवा रंग में रंग गया। खुले वाहन पर खड़े होकर शाह ने समर्थकों का अभिवादन किया। "जय श्री राम" तथा "भारत माता की जय" के नारे खुले वाहन पर सवार शाह ने समर्थकों का अभिवादन किया। इस दौरान भाजपा समर्थक "जय श्री राम" तथा "भारत माता की जय" के नारे लगाते रहे। बाद में शाह ने हुगली जिले के चंदननगर में भी एक और भव्य रोड शो किया, जिसमें भारी भीड़ उमड़ी। इस मौके पर गृह मंत्री ने कहा कि राज्य में भाजपा के पक्ष में जबरदस्त लहर है और सत्ता में आने के बाद पार्टी "सभी घुसपैठियों और हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगी। मतदाताओं को डराने-धमकाने की कोशिश न की जाए चंदननगर में एक रोड शो के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री शाह ने कड़े शब्दों में कहा कि 29 अप्रैल को मतदाताओं को डराने-धमकाने की कोशिश न की जाए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि चार मई के बाद दोषियों को सजा दी जाएगी। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर आरोप लगाया कि वह मतदाता सूची से घुसपैठियों के नाम हटाने का विरोध कर रही हैं और वोट बैंक की राजनीति के लिए अवैध प्रवासियों को संरक्षण दे रही हैं। शाह ने कहा कि चार मई के बाद सभी घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें पश्चिम बंगाल से बाहर निकाल दिया जाएगा। भाजपा की सरकार बनने का दावा रोड शो के बाद शाह ने दावा किया कि राज्य में भाजपा की सरकार बनेगी और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की जाएगी। उन्होंने कहा कि चार मई के बाद किसी को भी बहुविवाह की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक चुनाव शांतिपूर्ण रहे हैं और कोई बड़ी हिंसक घटना या मौत नहीं हुई है। तृणमूल कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए शाह ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद का जिक्र किया और निलंबित टीएमसी विधायक व एजेयूपी के संस्थापक हुमांयू कबीर का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि उनके जरिए बंगाल में "बाबरी मस्जिद" बनाने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही उन्होंने राज्य सरकार पर सामाजिक कल्याण योजनाओं में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और कहा कि सत्ता में आने पर दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। शाह ने कहा कि पश्चिम बंगाल को "सोनार बांग्ला" बनाने, कानून-व्यवस्था सुधारने और विकास व सुशासन स्थापित करने के लिए भाजपा को सत्ता में लाना जरूरी है।  

न्यूजीलैंड से FTA समझौते में आम भारतीय के लिए बड़ी राहत, 5000 वीजा और 0 ड्यूटी का फायदा

नईदिल्ली  कल तक जो सिर्फ फाइलों का हिस्सा था आज वो हकीकत बन चुका है. दिल्ली और वेलिंगटन के बीच समुद्र की दूरियां अब व्यापार के सेतु से सिमट गई हैं। जब दुनिया के बड़े-बड़े देश ट्रेड वॉर और मंदी के साये में दुबके हैं, तब भारत ने महज 270 दिनों के भीतर न्‍यूजीलैंड के साथ वो महाकरार कर लिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तहलका मचा दिया है। यह सिर्फ सरकारों के बीच का हाथ मिलाना नहीं है बल्कि भारत के उस मध्यमवर्गीय युवा के सपनों की उड़ान है जो विदेश में करियर बनाना चाहता है और उस छोटे उद्यमी की हिम्मत है जो अपना सामान दुनिया के कोने-कोने में बेचना चाहता है। 5000 वीजा का वो ब्रह्मास्त्र और जीरो ड्यूटी की वो चाबी अब आपके हाथ में है। आइए, इसे बहुत आसान भाषा में समझते हैं।  समझौते की 5 सबसे बड़ी ताकत · 5,000 वीजा का ‘एक्सप्रेस-वे’: अब हर साल कम से कम 5,000 ‘Temporary Employment Entry Visa’ की गारंटी मिलेगी. इसके तहत स्किल्ड प्रोफेशनल्स 3 साल तक न्यूजीलैंड में रहकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकेंगे।  · 100% ड्यूटी फ्री एक्सेस: अब न्यूजीलैंड के बाजार में ‘मेड इन इंडिया’ का डंका बजेगा. भारत से जाने वाले टेक्सटाइल, लेदर, प्लास्टिक और इंजीनियरिंग सामान पर अब जीरो ड्यूटी लगेगी, जिससे भारतीय व्यापारियों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा।  · $20 बिलियन का ‘इन्वेस्टमेंट बूस्टर’: अगले 15 वर्षों में न्यूजीलैंड भारत में 20 बिलियन डॉलर (लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम निवेश करेगा जिससे भारत के बुनियादी ढांचे और स्टार्टअप्स को नई उड़ान मिलेगी।  · किसानों के लिए ‘कीवी’ तकनीक: केवल व्यापार ही नहीं बल्कि अब न्यूजीलैंड के विशेषज्ञ भारतीय किसानों को कीवी, सेब और शहद के उत्पादन में वैश्विक स्तर की तकनीक सिखाएंगे. यह साझेदारी भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित होगी।  · शराब और वाइन पर रियायत: भारत से जाने वाली वाइन और स्पिरिट्स को वहां ड्यूटी-फ्री एंट्री मिलेगी, जबकि न्यूजीलैंड की वाइन पर भारत में मिलने वाली रियायतें 10 वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ाई जाएंगी।  कैसे संभव हुआ यह ‘एक्सप्रेस’ एग्रीमेंट? आमतौर पर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) होने में वर्षों का समय लगता है लेकिन न्यूज़ीलैंड के साथ यह महज 9 महीनों में पूरा हो गया. इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित रहे: · रणनीतिक तालमेल: न्यूज़ीलैंड की कृषि और डेयरी विशेषज्ञता और भारत की विशाल मार्केट और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता एक-दूसरे की पूरक (Complementary) हैं।  · चीन से हटकर विकल्प की तलाश: दोनों देश अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं. यह साझा सुरक्षा और आर्थिक हित इस समझौते की सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति बना।  · विश्वास की नींव: पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारतीय टीम ने पिछले साढ़े तीन साल में 7 समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं. यह ‘स्पीड’ भारत के नए वर्क कल्‍चर को दर्शाती है, जहां जटिल मुद्दों को सुलझाने के लिए डेडलाइन पर काम किया गया।  पाइपलाइन में और क्या है? न्यूज़ीलैंड तो बस शुरुआत है. भारत का असली लक्ष्य दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ सीधा व्यापारिक गलियारा बनाना है: · यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका: आने वाले कुछ महीनों में इन दो दिग्गजों के साथ समझौते होने की उम्मीद है. यह भारत के लिए अब तक की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी. ईयू के साथ जनवरी में मदर ऑफ ऑल डील हुई थी. इसके पूरी तरह से लागू होने की प्रक्रियाएं जारी हैं।  · 9 समझौतों का जादुई आंकड़ा: इन समझौतों के बाद भारत के कुल 9 FTA हो जाएंगे. ये कोई साधारण देश नहीं बल्कि 38 विकसित देश होंगे।  · ग्लोबल GDP पर प्रभाव: इसके पूरा होते ही भारत की पहुंच दुनिया के लगभग दो-तिहाई व्यापार और 65-70% वैश्विक जीडीपी तक सीधे तौर पर हो जाएगी।  विकसित भारत 2047 के लिए यह क्यों जरूरी है? 1. मार्केट एक्सेस: भारतीय किसानों, कारीगरों और MSMEs को अब ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बनाने के लिए ऊंचे टैक्स (Tariffs) का सामना नहीं करना पड़ेगा।  2. निवेश का प्रवाह: न्यूज़ीलैंड का $20 बिलियन का वादा केवल शुरुआत है. अमेरिका और EU के साथ समझौते से भारत में अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आएगा।  3. सर्विस सेक्टर की ताकत: भारत के आईटी और सर्विस सेक्टर के युवाओं के लिए इन विकसित देशों में काम करने और सेवा देने के रास्ते और आसान हो जाएंगे।  सवाल-जवाब न्यूज़ीलैंड के साथ FTA इतनी जल्दी (9 महीनों में) कैसे पूरा हो गया? यह दोनों देशों के बीच साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, विश्वास और चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीतिक जरूरत की वजह से संभव हुआ. पीयूष गोयल ने इसे “भरोसे और मजबूत रिश्तों” का परिणाम बताया है।  क्या भारत का अमेरिका के साथ भी कोई समझौता होने वाला है? जी हाँ, वाणिज्य मंत्री के अनुसार आगामी कुछ महीनों में अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ दो बड़े समझौते पाइपलाइन में हैं।  इन 9 FTA समझौतों का भारत की जीडीपी पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इन समझौतों के बाद भारत की पहुंच दुनिया की लगभग 65-70% ग्लोबल जीडीपी तक हो जाएगी, जिससे भारत के एक्सपोर्ट में भारी बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था में तेज उछाल आने की उम्मीद है।  इस समझौते से आम युवाओं को क्या फायदा होगा? यह FTA स्टार्टअप्स, डिजिटल इकोनॉमी और टेक्नोलॉजी सेक्टर में नए मौके पैदा करेगा. साथ ही, युवाओं के लिए ग्लोबल मार्केट में कौशल और प्रतिभा दिखाने के रास्ते खुलेंगे।   

भारत का रक्षा खर्च 8.66 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ा, ऑपरेशन सिंदूर का प्रभाव

  नई दिल्ली स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने 27 अप्रैल 2026 को अपनी नई रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च रिकॉर्ड 28.87 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह 2024 की तुलना में 2.9 प्रतिशत ज्यादा है. दुनिया भर में लगातार संघर्ष और युद्ध बढ़ रहे हैं, इसलिए हर देश अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. यह 11वां साल है जब दुनिया का सैन्य खर्च लगातार बढ़ा है।  भारत 2025 में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा खर्च करने वाला देश रहा. भारत ने अपना सैन्य खर्च 8.9 प्रतिशत बढ़ाकर 8.66 लाख करोड़ रुपये कर लिया. इस बढ़ोतरी के पीछे मुख्य वजह मई 2025 में पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ऑपरेशन सिंदूर था।  इस ऑपरेशन के बाद भारत ने ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और आधुनिक हथियारों की खरीद तेज कर दी। पाकिस्तान का रक्षा खर्च भी 11 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1.12 लाख करोड़ रुपये हो गया।  मध्य पूर्व में खर्च लगभग स्थिर मध्य पूर्व का सैन्य खर्च 2025 में 2.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024 से सिर्फ 0.1% ज्यादा है. इजरायल का खर्च 4.9% घटकर 4.54 लाख करोड़ रुपये रह गया क्योंकि जनवरी 2025 में हमास के साथ संघर्ष विराम हो गया था. लेकिन तुर्की का खर्च 7.2% बढ़कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. ईरान का खर्च दूसरी बार घटा और 5.6% कम होकर 69,560 करोड़ रुपये रह गया।  दुनिया के टॉप तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस दुनिया के सबसे ज्यादा रक्षा खर्च करने वाले तीन देश अमेरिका, चीन और रूस हैं. इन तीनों ने मिलकर 2025 में 13.91 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो पूरी दुनिया के सैन्य खर्च का 51 प्रतिशत है. अमेरिका ने 2025 में लगभग 8.97 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो 2024 से 7.5 प्रतिशत कम है।  मुख्य वजह यह थी कि साल भर में यूक्रेन को नई सैन्य मदद नहीं दी गई. लेकिन अमेरिका ने अपने परमाणु और सामान्य हथियारों में निवेश बढ़ाया ताकि चीन को इंडो-पैसिफिक में रोका जा सके।  यूरोप में 14% की भारी बढ़ोतरी 2025 में यूरोप का सैन्य खर्च सबसे तेजी से बढ़ा. यह 14% बढ़कर 8.12 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. रूस का खर्च 5.9% बढ़कर 1.79 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो उसके कुल जीडीपी का 7.5% है. यूक्रेन ने 20% बढ़ोतरी के साथ 7.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो उसके जीडीपी का 40% है।  NATO के 29 यूरोपीय देशों ने कुल 5.25 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जर्मनी का खर्च 24 प्रतिशत बढ़कर 1.07 लाख करोड़ रुपये हो गया. स्पेन का खर्च तो 50 प्रतिशत बढ़कर 3.78 लाख करोड़ रुपये हो गया।  मध्य पूर्व में खर्च लगभग स्थिर मध्य पूर्व का सैन्य खर्च 2025 में 2.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024 से सिर्फ 0.1% ज्यादा है. इजरायल का खर्च 4.9% घटकर 4.54 लाख करोड़ रुपये रह गया क्योंकि जनवरी 2025 में हमास के साथ संघर्ष विराम हो गया था. लेकिन तुर्की का खर्च 7.2% बढ़कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. ईरान का खर्च दूसरी बार घटा और 5.6% कम होकर 69,560 करोड़ रुपये रह गया।  एशिया और ओशिनिया में सबसे तेज बढ़ोतरी एशिया और ओशिनिया में सैन्य खर्च 8.1 प्रतिशत बढ़कर 6.40 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह 2009 के बाद सबसे तेज सालाना बढ़ोतरी है. चीन ने 7.4 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 3.16 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जापान का खर्च 9.7 प्रतिशत बढ़कर 5.85 लाख करोड़ रुपये हो गया. ताइवान ने 14 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 1.71 लाख करोड़ रुपये खर्च किए।  मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया. इसके बाद भारत सरकार ने रक्षा खरीद को बहुत तेज कर दिया. खासतौर पर ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, एयर डिफेंस और आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म्स पर जोर दिया गया. SIPRI रिपोर्ट साफ बताती है कि भारत अब अपनी सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए लगातार खर्च बढ़ा रहा है।  दुनिया क्यों बढ़ा रही है रक्षा खर्च? SIPRI की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में संघर्ष बढ़ रहे हैं – यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव, चीन-ताइवान की स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव. हर देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. 2026 में अमेरिका का खर्च और बढ़ने की उम्मीद है।  भारत का 8.66 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट दिखाता है कि देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों को प्राथमिकता दे रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह बढ़ोतरी भारत की मजबूत रक्षा नीति का प्रमाण है।  SIPRI की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में संघर्ष बढ़ रहे हैं – यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव, चीन-ताइवान की स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव. हर देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. 2026 में अमेरिका का खर्च और बढ़ने की उम्मीद है।  भारत का 8.66 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट दिखाता है कि देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों को प्राथमिकता दे रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह बढ़ोतरी भारत की मजबूत रक्षा नीति का प्रमाण है।