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अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा के लिए हाई अलर्ट, यात्रा मार्ग का निरीक्षण करेंगी विशेष टीमें

 जम्मू  श्री अमरनाथ यात्रा की तैयारियों को लेकर जिला प्रशासन अनंतनाग ने व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। उपायुक्त अनंतनाग एवं यात्रा अधिकारी पहलगाम मार्ग बिलाल मोहुउद्दीन भट्ट ने बुधवार को अधिकारियों की बैठक लेकर यात्रा मार्ग, बेस कैंपों और अन्य महत्वपूर्ण स्थलों पर एडवांस पार्टियों की तैनाती की योजना की समीक्षा की। यात्रा तीन जुलाई से शुरु हो रही है। बैठक में एडीसी, एसीआर, एसडीपीओ पहलगाम, तहसीलदारों सहित राजस्व, पुलिस, आरडीडी, एसडीआरएफ, अग्निशमन एवं आपात सेवा, पीडब्ल्यूडी और अन्य विभागों के अधिकारी मौजूद रहे। प्रशासन ने राजस्व, पुलिस, एसडीआरएफ, आरडीडी, आईएफसी और पीडब्ल्यूडी विभागों के अधिकारियों की चार विशेष टीमें गठित की हैं, जो नुनवान बेस कैंप से पवित्र गुफा तक पूरे यात्रा मार्ग का भौतिक निरीक्षण करेंगी। टीमों को मार्ग की स्थिति, संवेदनशील क्षेत्रों, स्वास्थ्य शिविरों, लंगरों, दुकानों और टेंटों के लिए सुरक्षित स्थानों की पहचान करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। हर छोटे-बड़े पहलू का किया जा रहा विस्तृत आकलन उपायुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि यात्रा मार्ग पर हर छोटे-बड़े पहलू का विस्तृत आकलन किया जाए, ताकि यात्रियों को सुरक्षित और सुगम यात्रा अनुभव उपलब्ध कराया जा सके। उन्होंने फ्लैश फ्लड संभावित क्षेत्रों की पहचान करने और असुरक्षित स्थानों पर किसी भी प्रकार की स्थापना रोकने के निर्देश भी दिए। इसी क्रम में जिला विकास आयुक्त ने खनाबल में यात्रा के अंतर्गत पूंजीगत व्यय और अन्य कार्यों की प्रगति की भी समीक्षा की। बैठक में पीडब्ल्यूडी, जल शक्ति, स्वास्थ्य, पर्यटन, बिजली, एफसीएस एंड सीए सहित विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। 223 कार्यों को मंजूरी, 193 आवंटित, 69 प्रगति पर अधिकारियों ने बताया कि यात्रा से संबंधित कुल 272 कार्य स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें 100 पूंजीगत व्यय और 172 रेवेक्स परियोजनाएं शामिल हैं। इनमें से 223 कार्यों को प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है, 215 कार्यों के टेंडर जारी किए जा चुके हैं और 193 कार्य आवंटित किए गए हैं। वर्तमान में 69 कार्य प्रगति पर हैं जबकि दो कार्य पूरे हो चुके हैं। बैठक में सड़क संपर्क, पेयजल, बिजली, स्वास्थ्य सेवाएं, स्वच्छता और यात्रियों के लिए अन्य आवश्यक सुविधाओं की तैयारियों की विस्तार से समीक्षा की गई। उपायुक्त ने संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि यात्रा शुरू होने से पहले सभी जरूरी कार्य गुणवत्ता के साथ समयबद्ध तरीके से पूरे किए जाएं। प्रशासन ने कहा कि विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय और नियमित निगरानी के जरिए अमरनाथ यात्रा 2026 को सुरक्षित, व्यवस्थित और सुचारु बनाने के प्रयास जारी हैं।  

शहजाद भट्टी गैंग पर शिकंजा: ISI कनेक्शन वाले नेटवर्क को सुरक्षा एजेंसियों ने तोड़ा

नई दिल्ली  पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से कथित तौर पर जुड़े गैंगस्टर शहजाद भट्टी के नेटवर्क को लेकर देशभर में सुरक्षा एजेंसियों ने बड़ी कार्रवाई शुरू की है. महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वॉड (ATS) समेत कई केंद्रीय और राज्य एजेंसियों ने महाराष्ट्र सहित देश के कई राज्यों में व्यापक छापेमारी कर एक ऐसे कथित स्लीपर सेल मॉड्यूल का खुलासा किया है, जिसमें सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म और डार्क वेब के जरिए भारतीय युवाओं को जोड़ने की साजिश सामने आई है. पाकिस्‍तान बॉर्डर से लेकर दिल्‍ली, हरियाणा, मध्‍य प्रदेश , उत्‍तर प्रदेश समेत अन्‍य जगहों पर एक्‍शन लिया गया है।  पाकिस्तानी गैंगस्टर शहजाद भट्टी के कई ठिकानों पर एक साथ दबिश दी गई है. सूत्रों के मुताबिक, महाराष्ट्र ATS ने मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक, नवी मुंबई, कल्याण, भंडारा और चंद्रपुर समेत राज्य के 9 जिलों में 50 से अधिक ठिकानों पर एक साथ दबिश दी. इस कार्रवाई में अब तक 57 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की जा रही है. जांच एजेंसियों का दावा है कि ये सभी युवक इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए शहजाद भट्टी गैंग के संपर्क में आए थे और कथित तौर पर उन्हें भारत के संवेदनशील ठिकानों से जुड़ी सूचनाएं जुटाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था. जांच एजेंसियों के अनुसार, संदिग्धों को सैन्य ठिकानों, महत्वपूर्ण सरकारी इमारतों, सार्वजनिक स्थलों और अन्य संवेदनशील इंफ्रास्ट्रक्चर की फोटो और वीडियो जुटाने के टास्क दिए जाते थे. सूत्रों का कहना है कि इन सूचनाओं को सीमा पार बैठे हैंडलर्स तक पहुंचाने के बदले पैसे दिए जाते थे. एजेंसियों का दावा है कि कुछ युवाओं को भविष्य में युद्ध जैसी स्थिति के लिए तैयार रहने के निर्देश भी दिए गए थे।  सुरक्षा एजेंसियों से बचने का गजब तरीका खुफिया सूत्रों के मुताबिक, यह नेटवर्क छोटे-छोटे मॉड्यूलर सेल्स में काम करता था. यानी एक समूह को दूसरे समूह की गतिविधियों या पहचान की जानकारी नहीं दी जाती थी, ताकि किसी एक सदस्य के पकड़े जाने पर पूरा नेटवर्क उजागर न हो सके. जांचकर्ताओं का मानना है कि इस स्‍ट्रक्‍चर का इस्तेमाल सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए किया गया. ATS की जांच में यह भी सामने आया है कि डार्क वेब ब्राउजर और ऑटो-डिलीट मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर बातचीत को छिपाया जाता था. कार्रवाई के दौरान कई मोबाइल फोन, लैपटॉप और डिजिटल डिवाइस जब्त किए गए हैं. शुरुआती फॉरेंसिक जांच में कुछ उपकरणों में ऐसे ऐप्स मिले हैं, जिनमें संदेश पढ़ने के बाद खुद ही डिलीट हो जाते थे. अधिकारियों का मानना है कि इन तकनीकों का इस्तेमाल एजेंसियों की निगरानी से बचने के लिए किया जा रहा था।  युवाओं को ऐसे करते थे ट्रेन जांच एजेंसियों को यह भी जानकारी मिली है कि ऑनलाइन गेमिंग सर्वरों के भीतर निजी चैट रूम बनाए गए थे. आरोप है कि इन प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवाओं को सुरक्षा व्यवस्था से बचने, मूवमेंट प्लानिंग और हथियारों के इस्तेमाल जैसी जानकारियां दी जा रही थीं. एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क का विस्तार महाराष्ट्र से बाहर किन राज्यों तक था और कितने लोग इसके संपर्क में आए थे. विदर्भ क्षेत्र के भंडारा और चंद्रपुर जिलों में कथित भर्ती अभियान चलाए जाने की बात भी सामने आई है. सूत्रों के अनुसार, भंडारा में एक मोबाइल दुकान के जरिए युवा लड़कों को इस नेटवर्क से जोड़ने की कोशिश की जा रही थी. सोशल मीडिया के माध्यम से पहले संपर्क बनाया जाता था और फिर धीरे-धीरे उन्हें कथित तौर पर देश विरोधी गतिविधियों के लिए प्रेरित किया जाता था।  हवाला नेटवर्क का इस्‍तेमाल सूत्रों के मुताबिक, पैसों के लेन-देन के लिए हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया. जांच एजेंसियों को शक है कि कुछ स्थानीय व्यापारियों और कमीशन एजेंटों के बैंक खातों का उपयोग धन पहुंचाने के लिए किया गया. अब इन खातों की विस्तृत जांच की जा रही है. जांच में यह भी सामने आया है कि महाराष्ट्र के प्रमुख शहरों की जनसंख्या, संवेदनशील इलाकों और स्थानीय गतिविधियों से जुड़ी जानकारियां भी साझा की जा रही थीं. एजेंसियों का कहना है कि नेटवर्क का एक हिस्सा लॉजिस्टिक सपोर्ट देने में लगा था. सूत्रों के अनुसार, डोगरा गैंग नाम से पहचाने जा रहे एक समूह पर संदिग्धों के ठिकाने तैयार करने, यात्रा की व्यवस्था करने और जरूरत पड़ने पर उन्हें राज्य से बाहर निकालने की जिम्मेदारी होने का संदेह है।  पाकिस्‍तान बॉर्डर के आसपास भी एक्‍शन देशभर में चल रही कार्रवाई के तहत केंद्रीय एजेंसियों ने महाराष्ट्र के अलावा मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में भी छापेमारी की है. सूत्रों के मुताबिक, 300 से अधिक संदिग्धों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया या राउंड-अप किया गया है. पंजाब में पाकिस्तान सीमा से सटे इलाकों से 40 से ज्यादा संदिग्धों को पकड़ा गया है. वहीं हरियाणा STF ने करीब 90 युवकों को हिरासत में लेकर उनके सोशल मीडिया अकाउंट हटवाए हैं और उनकी काउंसलिंग की जा रही है. दिल्ली पुलिस ने भी करीब 20 युवकों को राउंड-अप किया है. अधिकारियों का कहना है कि इन युवाओं को सोशल मीडिया के जरिए भड़काने और पैसों का लालच देकर कथित तौर पर नेटवर्क से जोड़ा गया था. कुछ मामलों में महत्वपूर्ण स्थानों की रेकी और कॉन्ट्रैक्ट किलिंग जैसे टास्क दिए जाने की भी आशंका जताई जा रही है।  500 से ज्‍यादा डिजिटल प्रोफाइल सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय एजेंसियों को 500 से ज्यादा संदिग्ध मोबाइल नंबर और डिजिटल प्रोफाइल मिले थे, जिसके बाद यह बड़ा ऑपरेशन शुरू किया गया. जांच एजेंसियों का दावा है कि पाकिस्तान में बैठे आईएसआई से जुड़े कथित ऑपरेटिव आबिद जट्ट और अजमल गुजर सोशल मीडिया के जरिए भारतीय युवाओं से संपर्क करते थे. शुरुआती बातचीत के बाद उन्हें गैंगस्टर शहजाद भट्टी से जोड़ा जाता था, जो कथित तौर पर उन्हें पैसों और दूसरे लालच देकर अलग-अलग टास्क सौंपता था।  महत्‍वपूर्ण जगहों को निशाना बनाने की साजिश ATS की तकनीकी टीम को कुछ ऐसे डिजिटल संकेत भी मिले हैं, जिनसे आशंका जताई जा रही है कि आने वाले महीनों में महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर और संवेदनशील ठिकानों को निशाना बनाने की साजिश रची जा रही थी. हालांकि जांच एजेंसियों ने अभी तक आधिकारिक तौर पर सभी जानकारियां सार्वजनिक नहीं की हैं. कई डिजिटल डिवाइस की फॉरेंसिक … Read more

निर्वाचन आयोग ने मांगी 400 बसें, HRTC ने रखी शर्त- पहले करें अग्रिम भुगतान

 शिमला  हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया आरंभ हो गई है। पहले चरण का मतदान 26 मई को होगा। राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव में पोलिंग पार्टियों और मत पेटियों को पहुंचाने के लिए हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) से 400 बसों की मांग की है। एचआरटीसी ने आयोग को स्पष्ट किया है कि बसों की बुकिंग तभी की जाएगी जब 50 प्रतिशत अग्रिम भुगतान किया जाएगा। इस संबंध में प्रबंधन ने नियमों का हवाला दिया है। बस बुकिंग पर कितना खर्च आएगा बसों की बुकिंग पर लगभग सात करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। अग्रिम बुकिंग के लिए आयोग ने निगम से साढ़े तीन करोड़ रुपये की मांग की है। आयोग ने निगम को पत्र लिखकर बसों की मांग की है, जिसमें यह भी कहा गया है कि बसें अच्छी स्थिति में होनी चाहिए, ताकि यात्रा के दौरान कोई समस्या न आए। पहले चरण का मतदान 26 मई को होगा, और पोलिंग पार्टियों को 24 और 25 मई को रवाना किया जाएगा। मतदान समाप्त होने के बाद बसें मत पेटियों के साथ वापस लौटेंगी।  लोगों को पेश आ सकती है दिक्कत हालांकि, एचआरटीसी की बसों के चुनावी ड्यूटी पर जाने से आम लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। कई रूट बाधित हो सकते हैं, क्योंकि एचआरटीसी के पास पहले से ही बसों की कमी है। अक्सर बसें रूट पर खराब हो जाती हैं, और एक साथ 400 बसों का चुनावी ड्यूटी पर जाना रूट को प्रभावित कर सकता है।  तीन चरणों में होंगे पंचायत चुनाव हिमाचल प्रदेश में 31182 पदों के लिए तीन चरणों में पंचायत चुनाव होंगे। कुल 3754 पंचायतों में प्रधान, उपप्रधान, सदस्य, बीडीसी और जिला परिषद के लिए चुनाव होंगे। पहले चरण का मतदान 26 मई को, दूसरे चरण का मतदान 28 मई को और तीसरे चरण का मतदान 30 मई को होगा। मतदान के दिन ही चुनावों की गणना होगी और प्रधान उप प्रधान तथा वार्ड सदस्यों के नतीजे उसी दिन घोषित कर दिए जाएंगे।  तीन नवंबर, 2024 को बदला था नियम एचआरटीसी ने तीन नवंबर, 2024 को नियमों में बदलाव किया था। इसके अनुसार, बसें किसी समारोह, कार्यक्रम या रैली के लिए तभी बुक की जाएंगी जब 50 प्रतिशत अग्रिम भुगतान किया जाए। पहले सरकारी कार्यक्रमों और चुनावी रैलियों के लिए बसें बुक की जाती थीं, लेकिन भुगतान नहीं होता था। वित्तीय स्थिति ठीक न होने के बावजूद निगम बसें भेज देता था, लेकिन कई महीनों तक पैसा न आने के कारण निगम को समस्याओं का सामना करना पड़ता था।  

‘हम दुश्मन नहीं पार्टनर बनें’… जिनपिंग ने ट्रंप को दिया ग्लोबल लीडरशिप का पाठ

बीजिंग  चीन की राजधानी बीजिंग में अमेरिका और चीन के बीच हुई हाई-स्टेक्स समिट में दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने टकराव नहीं, बल्कि साझेदारी का संदेश देने की कोशिश की. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई मुलाकात ऐसे वक्त में हुई, जब दोनों देशों के रिश्ते पिछले कई वर्षों से ट्रेड वॉर, टेक्नोलॉजी बैन, ताइवान और वैश्विक प्रभाव की लड़ाई को लेकर तनावपूर्ण रहे है।  बैठक की शुरुआत में शी जिनपिंग ने बेहद संतुलित और कूटनीतिक अंदाज में दुनिया के सामने बड़ा संदेश रखा. उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय एक नए मोड़ पर खड़ी है और ऐसे समय में चीन और अमेरिका की जिम्मेदारी पहले से ज्यादा बढ़ जाती है।  जिनपिंग ने ट्रंप की तरफ देखते हुए कहा, "क्या हम मिलकर वैश्विक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं और दुनिया को ज्यादा स्थिरता दे सकते हैं? क्या हम अपने लोगों के हित और मानवता के भविष्य को ध्यान में रखते हुए द्विपक्षीय रिश्तों का बेहतर भविष्य बना सकते हैं?" अमेरिका-चीन को दुश्मन नहीं, साझेदार होना चाहिए! राष्ट्रपति जिनपिंग ने कहा कि ये सिर्फ दो देशों के सवाल नहीं हैं, बल्कि इतिहास, दुनिया और पूरी मानवता से जुड़े सवाल हैं, जिनका जवाब दोनों नेताओं को मिलकर देना होगा. चीनी राष्ट्रपति ने साफ कहा कि चीन और अमेरिका के साझा हित उनके मतभेदों से कहीं ज्यादा बड़े हैं. जिनपिंग ने कहा, "एक देश की सफलता दूसरे के लिए अवसर है. चीन और अमेरिका के रिश्तों में स्थिरता पूरी दुनिया के लिए अच्छी बात है।  शी जिनपिंग ने आगे कहा कि दोनों देशों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि साझेदार बनना चाहिए. उनके मुताबिक, टकराव दोनों देशों के लिए नुकसानदायक होगा, जबकि सहयोग से दोनों को फायदा मिलेगा. जिनपिंग ने यह भी कहा कि नई सदी में बड़ी शक्तियों को साथ रहने और साथ आगे बढ़ने का रास्ता तलाशना होगा।  शी जिनपिंग ने 2026 को चीन-अमेरिका रिश्तों के लिए "ऐतिहासिक और निर्णायक साल" बनाने की अपील भी की. उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश पुराने तनाव पीछे छोड़कर नए भविष्य की तरफ बढ़ेंगे।  राष्ट्रपति ट्रंप ने शी जिनपिंग की सराहना की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बैठक के दौरान जिनपिंग की खुलकर तारीफ की. उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को शानदार बताते हुए कहा कि जिनपिंग एक महान नेता हैं. ट्रंप ने कहा, "आपका दोस्त होना मेरे लिए सम्मान की बात है. चीन और अमेरिका के रिश्ते पहले से बेहतर होने जा रहे हैं." ट्रंप ने यह भी कहा कि जब भी दोनों देशों के बीच कोई समस्या आई, उन्होंने और जिनपिंग ने सीधे बातचीत कर उसे जल्दी सुलझाया. उन्होंने चीन की उपलब्धियों और नेतृत्व क्षमता की भी सराहना की।  हालांकि, दोनों नेताओं के सार्वजनिक बयानों में नरमी दिखी, लेकिन बंद कमरे में हुई बातचीत में व्यापार, ईरान, चिप टेक्नोलॉजी, स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज और वैश्विक शक्ति संतुलन जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। 

मुंबई हमले का आरोपी, फिर भी नागरिकता बरकरार! कनाडा क्यों नहीं ले पा रहा बड़ा एक्शन?

 टोरंटो भारतीय समेत दुनियाभर के कई लोग बसने के लिए कनाडा को इसलिए भी पसंद करते हैं क्योंकि एक बार यहां की नागरिकता हासिल कर ली जाए तो इस देश से निकाले जाने का खतरा लगभग खत्म हो जाता है और फिर यहां के मूल निवासियों की तरह यहां के अधिकार भी हासिल किए जा सकते हैं. कुछ मिलाकर कनाडा में नागरिकता छीनी जानी इतनी आसान नहीं है. इसका बड़ा उदाहरण मुंबई 26/11 आतंकी हमले के आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा का केस है।  अमेरिका से भारत प्रत्यर्पित किए जाने के बाद अब उस पर भारत में मुकदमा चलने की तैयारी है लेकिन इसी बीच कनाडा में उससे जुड़ा एक दूसरा बड़ा सवाल भी लगातार उठ रहा है. अगर कनाडाई एजेंसियों को सालों पहले ही शक हो गया था कि राणा ने झूठ बोलकर नागरिकता हासिल की थी, तो उसकी नागरिकता अब तक रद्द क्यों नहीं हुई? यह सवाल केवल राणा तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ सालों में सामने आए मामलों से पता चलता है कि कनाडा में एक बार नागरिकता मिलने के बाद उसे वापस लेना बेहद लंबी, जटिल और धीमी प्रक्रिया बन जाती है. कई मामलों में सरकार को 10 से 20 साल तक लग जाते हैं।  तहव्वुर राणा पर क्या हैं आरोप? तहव्वुर हुसैन राणा पर आरोप है कि उसने 2000 में कनाडाई नागरिकता के लिए आवेदन करते समय गलत जानकारी दी थी. उसने दावा किया था कि वह ओटावा में रह रहा है और कनाडा में लगातार मौजूद था. लेकिन बाद में RCMP और अमेरिकी एजेंसियों की जांच में ऐसे दस्तावेज सामने आए जिनसे पता चला कि वह उस दौरान अमेरिका के शिकागो में रह रहा था. कनाडा में दिए गए उसके पते पर दूसरे लोग रहते थे और पड़ोसियों ने भी कहा कि उन्होंने राणा को वहां कभी नहीं देखा।  जांच में यह भी सामने आया कि राणा शिकागो में कई कारोबार चला रहा था. इसके बावजूद उसे 2001 में कनाडाई नागरिकता और पासपोर्ट दोनों मिल गए. बाद में भारतीय एजेंसियों ने आरोप लगाया कि उसने इसी कनाडाई पासपोर्ट का इस्तेमाल करते हुए मुंबई हमले से पहले भारत की यात्रा की थी।  आखिर कनाडा में नागरिकता रद्द करना इतना मुश्किल क्यों? नागरिकता “अधिकार” बन जाती है कनाडा में एक बार नागरिकता मिलने के बाद व्यक्ति को लगभग वही संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा मिलती है जो जन्म से कनाडाई नागरिकों को मिलती है. यही वजह है कि सरकार किसी की नागरिकता बिना मजबूत कानूनी प्रक्रिया के नहीं छीन सकती. अदालतें यह सुनिश्चित करती हैं कि हर व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिले।  इसी वजह से नागरिकता रद्द करने के मामलों में विस्तृत जांच होती है, अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड जुटाए जाते हैं, अदालत में सबूत पेश होते हैं और अपील की कई परतें होती हैं. इन सबमें सालों लग जाते हैं।  बार-बार बदलते रहे कानून यह देरी सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की वजह से नहीं हुई. कनाडा में नागरिकता कानून खुद कई बार बदले गए. 2015 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Stephen Harper की कंजर्वेटिव सरकार ने कानून बदलकर आतंकवाद, जासूसी और राजद्रोह जैसे मामलों में नागरिकता रद्द करना आसान बना दिया था. सरकार का तर्क था कि जो व्यक्ति कनाडा के खिलाफ गंभीर अपराध करे, उसे नागरिकता रखने का अधिकार नहीं होना चाहिए।  लेकिन 2015 चुनाव में जस्टिन ट्रूडो और लिबरल पार्टी ने इसका विरोध किया. उनका प्रसिद्ध नारा था- “A Canadian is a Canadian is a Canadian.” लिबरल सरकार का कहना था कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को अलग तरीके से ट्रीट करना गलत है।  इसके बाद 2017-18 में नियम फिर बदले गए. अब कनाडा में नागरिकता केवल इन आधारों पर छीनी जा सकती है:     धोखाधड़ी     गलत जानकारी     तथ्यों को छिपाना यानी आतंकवाद में दोषी ठहराया जाना अपने आप नागरिकता खत्म करने का आधार नहीं रह गया. सरकार के पास सीमित संसाधन इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि कनाडा के पास ऐसे मामलों को तेजी से निपटाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. हर मामले में विदेशों से रिकॉर्ड मंगाने पड़ते हैं, पुराने दस्तावेजों की जांच होती है, गवाहों से पूछताछ होती है और अदालत में लंबी सुनवाई चलती है. राणा केस में जांच 2009 में शुरू हुई थी, लेकिन 2024 में जाकर सरकार ने संघीय अदालत से अंतिम फैसला मांगा।  आरोपी के बचाव का हिस्सा बन जाती है लंबी देरी दिलचस्प बात यह है कि सालों की देरी बाद में आरोपियों के लिए कानूनी बचाव भी बन जाती है. राणा ने भी अदालत में कहा कि इतने पुराने मामलों की घटनाएं अब उसे याद नहीं हैं. कई मामलों में आरोपी यह दलील देते हैं कि सबूत पुराने हो चुके हैं, गवाह उपलब्ध नहीं हैं और सरकार ने कार्रवाई में अत्यधिक देरी की. इससे प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।  सुरक्षा और अधिकारों के बीच फंस गया कनाडा तहव्वुर राणा केस ने कनाडा के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या देश नागरिक अधिकारों की रक्षा करते-करते राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में बहुत धीमा हो गया है? मानवाधिकार विशेषज्ञ कहते हैं कि नागरिकता छीनना बेहद गंभीर कदम है और इसमें जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए. दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि अगर किसी ने धोखे से नागरिकता हासिल की हो, तो कार्रवाई दशकों तक नहीं चलनी चाहिए. यही कारण है कि यह मामला अब केवल एक आतंकी आरोपी का नहीं, बल्कि कनाडा की पूरी इमिग्रेशन और नागरिकता प्रणाली की परीक्षा बन चुका है।  दूसरे देशों से कनाडा कितना अलग?     ब्रिटेन ने 2010 के बाद से 1,500 से ज्यादा लोगों की नागरिकता रद्द की है, जिनमें बड़ी संख्या आतंकवाद और धोखाधड़ी के मामलों की थी।      अमेरिका भी हाल के सालों में ऐसे मामलों में आक्रामक रुख दिखा रहा है. इसके मुकाबले कनाडा में नागरिकता रद्द करने के मामले बेहद कम हैं. 2024 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक-     दो दर्जन मामलों में कार्रवाई हुई     सात मामले अदालत में लंबित हैं     90 से ज्यादा मामलों में सरकार ने कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई अब आगे क्या होगा? राणा की नागरिकता रद्द करने का मामला अभी भी कनाडा की संघीय अदालत में लंबित है. अगर अदालत सरकार के पक्ष में फैसला देती है, … Read more

इंटरनेट की ‘मास्टर चाबी’ ईरान के पास! खतरे में पड़ सकते हैं WhatsApp, UPI और ऑनलाइन सेवाएं

तेहरान  दुनिया का इंटरनेट क्या अब ईरान के कंट्रोल में जा सकता है? पिछले कुछ दिनों से मिडिल ईस्ट से जुड़ी एक खबर ने टेक दुनिया में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान अब समुद्र के नीचे बिछी उन इंटरनेट केबल्स पर कंट्रोल बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, जिनसे दुनिया का बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है। मामला सिर्फ इंटरनेट स्पीड का नहीं है, बल्कि ग्लोबल डेटा, ऑनलाइन बैंकिंग, क्लाउड सर्विस और अरबों डॉलर की डिजिटल इकॉनमी का भी है।  शिप्स ही नहीं, इंटरनेट के लिए भी ईरान लेगा टोल? असल कहानी फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी है. यही वह समुद्री रास्ता है जहां से तेल के बड़े जहाज गुजरते हैं. लेकिन कम लोग जानते हैं कि इसी रास्ते के नीचे दुनिया की कई अहम अंडरसी इंटरनेट केबल्स भी गुजरती हैं. यही केबल्स एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट को इंटरनेट से जोड़ती हैं।  अब ईरान से जुड़े मीडिया नेटवर्क और IRGC यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से जुड़ी रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इन इंटरनेट केबल्स से कमाई की जा सकती है. ये ठीक वैसा ही होगा जैसे ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले शिप्स से टोल वसूलने का फैसला किया है।  कुछ रिपोर्ट्स में इसे डिजिटल टोल बूथ जैसा मॉडल बताया गया है. यानी जो विदेशी कंपनियां या नेटवर्क इन केबल्स का इस्तेमाल करेंगे, उनसे फीस ली जा सकती है।  रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान से जुड़े मीडिया आउटलेट्स ने दावा किया कि इन केबल्स के जरिए हर दिन भारी मात्रा में डिजिटल ट्रैफिक गुजरता है. इसमें बैंकिंग ट्रांजैक्शन, क्लाउड डेटा, सोशल मीडिया ट्रैफिक और AI सर्विस तक शामिल हैं।  समुद्र के नीचे से ट्रैवल करता है डेटा इस खबर ने इसलिए चिंता बढ़ा दी है क्योंकि दुनिया पहले ही अंडरसी केबल्स पर बढ़ते खतरे को लेकर परेशान है. इंटरनेट का करीब 95 से 99 प्रतिशत ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर केबल्स से गुजरता है. अगर इनमें बड़ी खराबी आ जाए या जानबूझकर नुकसान पहुंचाया जाए तो कई देशों में इंटरनेट, बैंकिंग और क्लाउड सर्विस पर असर पड़ सकता है।  पोर्ट्स में बताया गया कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अब सिर्फ तेल का रास्ता नहीं रहा, बल्कि डिजिटल दुनिया का भी बड़ा सेंटर बन चुका है. यहां कई अहम केबल्स गुजरती हैं जो एशिया और यूरोप को जोड़ती हैं।  क्या टेक कंपनियां मानेंगी ईरानी कानून? मामला सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं है. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ईरान फ्यूचर में विदेशी टेक कंपनियों को अपने नियम मानने के लिए मजबूर कर सकता है. यहां तक कि केबल्स की मरम्मत और मेंटेनेंस का काम भी अपने नियंत्रण में लेने की बात सामने आई है।  टेक एक्सपर्ट्स का डर यह है कि अगर किसी दिन इन केबल्स पर तनाव बढ़ा या उन्हें नुकसान पहुंचा, तो उसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा. भारत समेत एशिया के कई देशों की इंटरनेट कनेक्टिविटी भी प्रभावित हो सकती है. वीडियो कॉल से लेकर UPI पेमेंट और AI सर्वर तक असर महसूस हो सकता है।  अब दुनिया की चिंता यह है कि अगर भविष्य में इंटरनेट भी तेल की तरह जियोपॉलिटिकल हथियार बन गया, तो हालात कितने बदल सकते हैं. अभी तक देश तेल सप्लाई रोकने की धमकी देते थे, लेकिन आने वाले समय में इंटरनेट केबल्स भी दबाव बनाने का बड़ा जरिया बन सकती हैं।  यानी जिस इंटरनेट को लोग सिर्फ मोबाइल डेटा और WiFi समझते हैं, उसके पीछे समुद्र के नीचे फैला हजारों किलोमीटर लंबा एक ऐसा नेटवर्क है, जिस पर अब दुनिया की राजनीति भी उतर आई है। 

IMF से पाकिस्तान को मिला बड़ा सहारा: 1.3 अरब डॉलर की मदद से बढ़ी उम्मीदें

करांची  आर्थिक तंगी और बढ़ते कर्ज के बोझ से जूझ रहे पाकिस्तान को आईएमएफ यानी इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड से बड़ी राहत मिली है. पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने बुधवार को जानकारी दी कि देश को IMF से कुल 1.3 अरब डॉलर की फंडिंग मिल गई है. यह रकम दो अलग-अलग वित्तीय कार्यक्रमों के तहत जारी की गई है।  पाकिस्तान के स्टेट बैंक के मुताबिक, IMF ने एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी यानी EFF के तहत 1.1 अरब डॉलर और रेजिलिएंस एंड सस्टेनेबिलिटी फैसिलिटी यानी RSF के तहत करीब 22 करोड़ डॉलर जारी किए हैं. यह राशि 12 मई को पाकिस्तान को ट्रांसफर की गई।  दरअसल, IMF ने सितंबर 2024 में पाकिस्तान के लिए 37 महीनों की अवधि वाला 7 अरब डॉलर का EFF पैकेज मंजूर किया था. इसके अलावा जलवायु और पर्यावरण से जुड़े जोखिमों से निपटने के लिए RSF के तहत 1.4 अरब डॉलर की अतिरिक्त मदद देने का भी फैसला किया गया था।  पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर बताया कि IMF के एग्जीक्यूटिव बोर्ड ने 8 मई को हुई बैठक में EFF की तीसरी समीक्षा पूरी की और पाकिस्तान के लिए 76 करोड़ स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स यानी SDR जारी करने को मंजूरी दी. साथ ही RSF के तहत दूसरी किस्त के रूप में 15.4 करोड़ SDR भी मंजूर किए गए।  इन दोनों रकम को मिलाकर पाकिस्तान को कुल 91.4 करोड़ SDR मिले हैं, जिसकी कीमत करीब 1.3 अरब डॉलर बताई जा रही है. स्टेट बैंक ने कहा कि इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी होगी और 15 मई को खत्म होने वाले सप्ताह के रिजर्व आंकड़ों में इसका असर दिखाई देगा।  पिछले हफ्ते भी IMF ने पाकिस्तान के लिए करीब 1 अरब डॉलर की अतिरिक्त सहायता को मंजूरी दी थी. अब तक पाकिस्तान IMF से कुल 8.4 अरब डॉलर के दो बड़े पैकेजों में से लगभग 4.5 अरब डॉलर हासिल कर चुका है।  IMF की यह मंजूरी ऐसे समय आई है, जब पाकिस्तान सरकार ने वित्तीय और मॉनेटरी गोल पर कुछ हद तक बेहतर प्रदर्शन दिखाया है. हालांकि देश की अर्थव्यवस्था अब भी भारी दबाव में है और विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर अलग-अलग राय है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के बाकी महीनों में हालात कितने सुधर पाएंगे।  फिलहाल पाकिस्तान के लिए यह फंडिंग बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि देश लंबे समय से विदेशी मुद्रा संकट, महंगाई और कमजोर आर्थिक वृद्धि जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। 

ट्रंप-शी जिनपिंग बैठक से बढ़ी हलचल: जानिए चीन दौरे के पीछे की बड़ी वजह

बीजिंग  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 8 साल बाद चीन दौरे पर जा रहे हैं, जहां उनकी मुलाकात शी जिनपिंग से होगी. दोनों देशों के बीच ट्रेड वॉर, चिप टेक्नोलॉजी और ईरान जैसे मुद्दे बातचीत के केंद्र में रहेंगे. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है जब व्यापार, टेक्नोलॉजी और ईरान जैसे कई बड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच खींचतान जारी है।  ट्रंप ने साफ कहा है कि इस यात्रा का सबसे बड़ा एजेंडा व्यापार होगा. हालांकि उन्होंने यह भी माना कि ईरान पर शी जिनपिंग के साथ लंबी बातचीत हो सकती है. ट्रंप ने कहा कि वह शी को अपना "दोस्त" मानते हैं और उन्हें उम्मीद है कि इस बैठक से अच्छी चीजें निकलकर आएंगी. चीन दौरे पर जाने से पहले उन्होंने यह भी कहा कि ईरान युद्ध खत्म करने के लिए उन्हें शी जिनपिंग की जरूरत नहीं है।  दरअसल, अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही शुरू हो गया था. लेकिन पिछले साल इसमें बड़ा उछाल आया, जब ट्रंप ने चीन के सभी सामानों पर 34 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान किया. इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी सामानों पर जवाबी शुल्क लगा दिए और रेयर अर्थ एक्सपोर्ट पर पाबंदियां बढ़ा दीं. देखते ही देखते टैरिफ 145 प्रतिशत तक पहुंच गए।  हालांकि बाद में दोनों देशों ने समझा कि इतना बड़ा आर्थिक टकराव लंबे समय तक नहीं चल सकता. इसके बाद व्यापारिक संघर्ष को अस्थायी रूप से रोकने के लिए समझौता हुआ. चीन ने अमेरिकी किसानों से सोयाबीन खरीदने का वादा किया, जबकि अमेरिका ने कई टैरिफ कम कर दिए. लेकिन इससे मूल विवाद खत्म नहीं हुआ।  सबसे बड़ा विवाद अब टेक्नोलॉजी और चिप इंडस्ट्री को लेकर है. अमेरिका लगातार चीन पर एडवांस कंप्यूटर चिप्स और उनसे जुड़ी टेक्नोलॉजी के एक्सपोर्ट पर रोक लगाता रहा है. अमेरिका को डर है कि चीन इन तकनीकों का इस्तेमाल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सैन्य ताकत बढ़ाने में कर सकता है।  वहीं चीन अब खुद की चिप इंडस्ट्री को मजबूत करने पर जोर दे रहा है ताकि उसे अमेरिकी तकनीक पर निर्भर न रहना पड़े. यही वजह है कि यह मुद्दा ट्रंप-शी बैठक में अहम रहने वाला है।  इसके अलावा ईरान का मुद्दा भी बातचीत में शामिल हो सकता है. अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव डाले, खासकर होर्मुज स्ट्रेट को लेकर. वह कई बार कह भी चुके हैं कि होर्मुज पर सामान्य ट्रैफिक में चीन मदद कर सकता है लेकिन राष्ट्रपति जिनपिंग ने इसको लेकर कोई कदम नहीं उठाए हैं. अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में कहा था कि चीन ईरानी तेल खरीदकर अप्रत्यक्ष रूप से तेहरान की मदद कर रहा है।  हालांकि चीन ने अब तक इस मामले में सावधानी भरा रुख अपनाया है. बीजिंग खुलकर अमेरिका का समर्थन करने से बच रहा है और खुद को एक संतुलित ताकत के तौर पर पेश करना चाहता है।  राष्ट्रपति ट्रंप की यह चीन यात्रा सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं है. यह वैश्विक व्यापार, टेक्नोलॉजी और मध्य पूर्व की राजनीति से जुड़े कई बड़े सवालों को प्रभावित कर सकती है. दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि ट्रंप और शी जिनपिंग की यह मुलाकात तनाव कम करेगी या नए टकराव की शुरुआत बनेगी। 

हफ्ते में सिर्फ 5 लीटर तेल! क्या भारत में भी लागू हो सकता है फ्यूल राशनिंग नियम?

नई दिल्ली ईरान युद्ध और मध्य पूर्व (Middle East) में तेल आपूर्ति मार्गों में आई रुकावट के कारण पूरी दुनिया एक गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रही है। इस संकट के बीच कई देशों में फ्यूल राशनिंग लागू की जा चुकी है। भारत में भी न‍िजी वाहनों के ल‍िए एक ल‍िमिट में पेट्रोल-डीजल और गैस खरीदने का कोटा तय करना एक उपाय हो सकता है। फिलहाल, भारत सरकार ने अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं किया है। अगर देश में कोटा सिस्टम लागू होता है, तो लोग अपने मन के मुताबिक पेट्रोल, डीजल या गैस नहीं खरीद पाएंगे। बता दें कि श्रीलंका, पाकिस्तान, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में QR Code, ऑड-ईवन नियम और साप्ताहिक फ्यूल लिमिट लागू हो चुकी है। अगर भविष्य में हालात और बिगड़ते हैं, तो भारत समेत कई देशों में भी ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं। सरल शब्दों में कहें तो 'फ्यूल राशनिंग' सरकार द्वारा लगाया गया वह प्रतिबंध है, जिसके तहत आप अपनी मर्जी के मुताबिक जितना चाहें उतना पेट्रोल या डीजल नहीं खरीद सकते हैं। सरकार प्रत्येक नागरिक या वाहन के लिए एक 'कोटा' तय कर देती है। एक निश्चित समय सीमा (जैसे एक हफ्ता) में आप केवल लिमिट में ही ईंधन खरीद पाएंगे। इसके लिए सरकार QR-कोड, कूपन या गाड़ियों के नंबर के हिसाब से 'ऑड-ईवन' (Odd-Even) जैसे तरीके अपनाती है। 2026 के इस वैश्विक संकट में कई देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ईंधन की बिक्री पर सीमा लगा दी है। श्रीलंका: यहां 'नेशनल फ्यूल पास' (QR कोड) सिस्टम लागू है। कारों के लिए हफ्ते में केवल 15-25 लीटर और मोटरसाइकिलों के लिए सिर्फ 5 लीटर पेट्रोल तय किया गया है। पाकिस्तान: यहां स्थिति इतनी गंभीर है कि एक बार में वाहन को केवल 5 लीटर तेल मिल रहा है। साथ ही सरकारी कर्मचारियों के लिए हफ्ते में केवल 4 दिन काम का नियम बनाया गया है। फ्रांस और जर्मनी: यूरोप के संपन्न देश भी अब राशनिंग की कगार पर हैं। फ्रांस के कुछ इलाकों में QR कोड के जरिए हफ्ते में 15-20 लीटर की सीमा तय की गई है, जबकि जर्मनी में कुछ जगहों पर एक बार में केवल 10 लीटर पेट्रोल मिल रहा है। बांग्लादेश और म्यांमार: बांग्लादेश ने ऊर्जा बचाने के लिए स्कूलों को ऑनलाइन कर दिया है और बिजली की रोटेशनल कटौती (Load Shedding) शुरू कर दी है। म्यांमार में 'ऑड-ईवन' सिस्टम से पेट्रोल दिया जा रहा है। स्लोवेनिया और केन्या: स्लोवेनिया ने प्राइवेट ड्राइवरों के लिए हफ्ते में 50 लीटर का कोटा तय किया है, वहीं केन्या ने घरेलू सप्लाई बचाने के लिए तेल के निर्यात पर ही पाबंदी लगा दी है। ईंधन की किल्लत का असर भारत पर भी पड़ा है। लाइव हिंदुस्तान की बिजनेस टीम ने हाल ही में कुछ शहरों में एक सर्वे किया, जिसमें पाया गया कि पेट्रोल पंप संचालकों ने खुद से ही पेट्रोल-डीजल खरीदने की एक सीमा तय कर रखी है। पूछने पर पता लगा कि कुछ दिनों पहले बाइक सवार ग्राहकों को 200 रुपये और कार चालकों को 2,000 रुपये से ज्यादा का तेल नहीं दिया जा रहा था। अभी भी कई शहरों में पेट्रोल पंप पर अपनी गाड़ी की टंकी फुल कराने पहुंच रहे ग्राहकों को निराश होकर वापस लौटना पड़ रहा है। इससे पता चलता है कि बिना किसी आदेश के पहले ही पेट्रोल पंप संचालकों ने अपनी कार्यशैली बदलकर कोटा सिस्टम शुरू कर दिया है। वर्क फ्रॉम होम और 4-डेज वर्किंग:– फिलीपींस, लाओस और पाकिस्तान ने विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सरकारी कर्मचारियों को घर से काम करने या हफ्ते में कम दिन ऑफिस आने का आदेश दिया है। कार-लेस-डेज:– न्यूजीलैंड जैसे देश 'कार-लेस-डेज' (हफ्ते में एक दिन गाड़ी न चलाना) को फिर से शुरू करने पर विचार कर रहे हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट:- वियतनाम और कंबोडिया जैसे देशों में लोगों को कारपूलिंग और बस-मेट्रो का उपयोग करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि लगभग 30% पेट्रोल पंप बंद हो चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही देशवासियों से ईंधन और यात्रा में कटौती करने की भावुक अपील की है। हालांकि, भारत में अभी तक औपचारिक रूप से राशनिंग लागू नहीं हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो भविष्य में 'कोटा सिस्टम' या 'QR कोड आधारित खरीद' की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फ्यूल राशनिंग का विचार डरावना लग सकता है, लेकिन यह संकट के समय तेल के समान वितरण को सुनिश्चित करने का एक तरीका है। फिलहाल, बचाव का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हम निजी वाहनों का कम से कम उपयोग करें और ईंधन की बर्बादी रोकें।

इलेक्ट्रिक व्हीकल सेक्टर को बूस्ट: 503 करोड़ की योजना से EV मालिकों की होगी बल्ले-बल्ले

 नई दिल्ली देश में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मांग बढ़ी है, लेकिन चुनौतियां अभी कम नहीं हुई है. भारतीय ऑटोमोबाइल मार्केट में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की हिस्सेदारी 5.77 फीसदी तक पहुंच गई है. हालांकि, अभी भी लोगों के मन में बैठी रेंज एंजाइटी खत्म नहीं हुई है. ऐसे में सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है, जिससे ईवी वालों की बड़ी चिंता दूर हो जाएगी।  भारत में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए भारी उद्योग मंत्रालय ने चार्जिंग स्टेशन इंस्टॉल करने का ऐलान किया है. मंत्रालय देशभर में 4,874 इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग स्टेशन लगाएगा. इस प्रोजेक्ट के लिए सरकार 503.86 करोड़ रुपये खर्च करेगी. ये प्रोजेक्ट पीएम ई-ड्राइव स्कीम का हिस्सा है.   कई राज्यों में लगेंगे EV चार्जिंग स्टेशन 12 मई को बेंगलुरू में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान केंद्रीय मंत्री एच डी कुमारस्वामी ने इस बारे में जानकारी दी है. इस कदम का उद्देश्य लोगों के मन में बैठी रेंज एंजाइटी को कम करना है. इसके लिए सरकार इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग का एक मजबूत नेटवर्क तैयार करना चाहती है. इससे जब भी लोगों को जरूरत होगी वे अपने व्हीकल को चार्ज कर पाएंगे।  इन चार्जिंग स्टेशन पर इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स, थ्री व्हीलर्स, पैंसेजर कार, बस और हैवी ड्यूटी ट्रक्स को भी चार्ज किया जा सकेगा. सरकार की मानें तो इन चार्जिंग स्टेशन को प्लानिंग के तहत अलग-अलग राज्यों में लगाया जाएगा. इसमें कर्नाटक, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु शामिल हैं।  बढ़ रहा ईवी का दबदबा इस फंडिंग का बड़ा हिस्सा कर्नाटक में खर्च होगा. रिपोर्ट्स की मानें, तो राज्य में 1243 चार्जिंग स्टेशन इंस्टॉल किए जाएंगे, जिसें लगभग 123.66 करोड़ रुपये खर्च होंगे. इस प्रोजेक्टर को पूरा करने में प्रमुख पब्लिक सेक्टर इंटरप्राइसेस का भी योगदान होगा. प्रमुख तेल कंपनियां (जिनके नाम से आप पेट्रोल पंप देखते हैं) इस इंस्टॉलेशन प्रोजेक्ट को लीड करेंगी।  मौजूदा स्थिति की बात करें, तो पैसेंजर व्हीकल कैटेगरी में ईवी की हिस्सेदारी 5.77 फीसदी की है. वहीं टू-व्हीलर कैटेगरी में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की हिस्सेदारी 7.76 फीसदी तक पहुंच गई है. कमर्शियल व्हीकल कैटेगरी में ईवी का शेयर 2.26 फीसदी है. थ्री व्हीलर कैटेगरी में ईवी का दबदबा है. यहां इलेक्ट्रिक व्हीकल की हिस्सेदारी 60.38 फीसदी की है. ये आंकड़े अप्रैल 2026 में हुई सेल के हैं।