samacharsecretary.com

मोजतबा खामेनेई का अंत! ईरान में जो डर था, वही हुआ, IRGC ने किया बड़ा कांड, क्या ट्रंप का सपना सच हुआ?

तेहरान  ईरान में जिसका डर था, लगता है वह खेल हो गया. अमेरिका ने ईरान पर अटैक कर सियासी तौर पर दो फाड़ करवा दिया है. अमेरिका ईरान में रिजीम चेंज करना चाहता था. ईरानी सरकार और सेना में तकरार से ऐसा लग रहा कि डोनाल्ड ट्रंप का मकसद पूरा होने वाला है. जी हां, ईरान में खामेनेई की सत्ता पर अब किसी और का कंट्रोल हो गया है. खुद ईरान की सेना यानी आईरजीसी ने ही ईरान की सत्ता पर कंट्रोल कर लिया है. ईरान में अब मोजतबा खामेनेई की नहीं चल पा रही है. उन्हें साइडलाइन कर दिया गया है. पेजेशकियान भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. आईआरजीसी ने खामेनेई को सरकार से अलग-थलग कर दिया है और सरकारी कामकाज पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है. कई रिपोर्ट में यह दावा किया गया है. ईरान में यह सबकुछ तब हो रहा, जब अमेरिका बातचीत का दूसरा दौर शुरू करने को बेताब है. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में आज यानी बुधवार को अमेरिका-ईरान की वार्ता होने वाली है।  दरअसल, जब से अमेरिका-इजरायल ने मिलकर ईरान पर अटैक किया है, तब से तेहरान में सियासी अनिश्चितता छाई हुई है. ईरान पर अभी किसका कंट्रोल है, किसी को कुछ नहीं समझ आ रहा. आपसी सियासी तकरार अब उभरने लगी हैं. 28 फरवरी को इजराइल और अमेरिका के हमलों में पुराने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई थी. इसके बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर बना दिया गया. लेकिन उनकी हालत और जगह के बारे में साफ जानकारी नहीं मिल रही है. वे पिछले कई हफ्तों से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं. कुछ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि वे गंभीर रूप से घायल या असमर्थ हो सकते हैं।  ईरान की सत्ता पर किसका कंट्रोल? टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट्स के हवाले से दावा किया कि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने कथित तौर पर देश के प्रमुख कामकाज पर नियंत्रण कर लिया है. ऐसा करके ईरानी सेना ने राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान को किनारे कर दिया है. उन्हें पूरी तरह से राजनीतिक गतिरोध में धकेल दिया है, क्योंकि सेना देश के सत्ता के मुख्य केंद्रों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है. इतना ही नहीं, मोजतबा खामेनेई के दखल को भी रोक दिया है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, आईआरजीसी (IRGC) ने राष्ट्रपति की नियुक्तियों और फैसले को रोक दिया है. साथ ही सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना दिया है, जिससे खामेनेई सरकार प्रभावी रूप से कार्यकारी नियंत्रण से बाहर हो गई है।  IRGC ने खुफिया मंत्री की नियुक्ति रोक दी फॉक्स न्यूज और ईरान इंटरनेशनल ने बताया कि ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान पिछले गुरुवार को एक नए खुफिया मंत्री को नियुक्त करना चाहते थे. मगर आईआरजीसी के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने इसमें हस्तक्षेप किया और उनके प्रयास को विफल कर दिया. हुसैन देहगान सहित सभी प्रस्तावित उम्मीदवारों को खारिज कर दिया गया।  फॉक्स न्यूज के अनुसार, आईआरजीसी के मुख्य कमांडर अहमद वाहिदी ने जोर देकर कहा कि युद्ध जैसी स्थितियों को देखते हुए सभी महत्वपूर्ण और संवेदनशील नेतृत्व पदों का चयन और उन पर निगरानी सीधे आईआरजीसी द्वारा की जानी चाहिए, जब तक कि कोई और आदेश न आ जाए. ईरान की राजनीतिक व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति आमतौर पर खुफिया मंत्रियों को तभी नामित करते हैं जब उन्हें सुप्रीम लीडर की मंजूरी मिल जाती है, क्योंकि इस पद के पास प्रमुख सुरक्षा विभागों पर अंतिम अधिकार होता है।  ईरानी सुप्रीम लीडर कहां हैं?  हाल के समय में सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का कोई अता-पता नहीं है. न तो उनके लोकेशन की जानकारी है और न ही उनके स्वास्थ्य की. कई बार मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि वह तेहरान में ही हैं और घायल हैं. मोजतबा खामेनेई के बारे में स्पष्ट जानकारी न होने के कारण ईरानी सेना प्रभावी रूप से राष्ट्रपति को उनके पसंदीदा उम्मीदवार को आगे बढ़ाने से रोक रहा है, जिससे ईरान की सुरक्षा व्यवस्था पर उसकी पकड़ और मजबूत हो गई है।  गौरतलब है की अमेरिकी अटैक के बाद से मोजतबा खामेनेई अब तक सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने नहीं आए हैं. वह जिंदा हैं या नहीं हैं, कहां हैं और कहां नहीं, इसे लेकर भी अनिश्चितता है. फाइनेंशियल एक्सप्रेस के अनुसार, कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि वे शायद काम करने में असमर्थ हो गए हैं. रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरानी सेना आईआरजीसी के वरिष्ठ कमांडरों के नेतृत्व वाली एक ‘सैन्य परिषद’ ने उन तक पहुंच को सीमित कर दिया है, जिससे वे प्रभावी रूप से सरकारी अधिकारियों से अलग-थलग पड़ गए हैं और सूचनाओं का आदान-प्रदान भी सीमित हो गया है।  खामेनेई की मृत्यु के बाद सत्ता का खालीपन फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद स्थिति और भी गंभीर हो गई है. इससे ईरानी व्यवस्था के शीर्ष पर नेतृत्व का एक खालीपन पैदा हो गया है. हालांकि यह माना जा रहा है कि उनके बेटे मोजतबा खामेनेई ने एक प्रमुख भूमिका संभाल ली है, लेकिन उनकी ओर से सार्वजनिक रूप से बहुत कम उपस्थिति या कोई आधिकारिक संचार देखने को मिला है. विश्वसनीय सूत्रों ने ईरान इंटरनेशनल को बताया कि ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान ने हाल के दिनों में मोजतबा खामेनेई के साथ एक आपात बैठक करने की बार-बार कोशिश की है, लेकिन उनके सभी अनुरोधों का कोई जवाब नहीं मिला है और उनसे कोई संपर्क स्थापित नहीं हो पाया है।  मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक घेरा फॉक्स न्यूज और ईरान इंटरनेशनल ने बताया कि आईआरजीसी के सीनियर अधिकारियों से बनी एक सैन्य परिषद अब मुख्य निर्णय लेने वाली संरचना पर पूर्ण नियंत्रण रखती है. यह परिषद मोजतबा खामेनेई के चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बनाए हुए है और देश की स्थिति पर सरकारी रिपोर्टों को उन तक पहुंचने से रोक रही है. इसी बीच बताया जा रहा है कि मोजतबा खामेनेई के करीबी लोगों के घेरे में एक अभूतपूर्व आंतरिक संकट उभर रहा है. ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, कुछ करीबी सहयोगी अली असगर हेजाजी को हटाने के लिए जोर डाल रहे हैं. हेजाजी … Read more

गर्लफ्रेंड ने वीडियो बनाई, बॉयफ्रेंड जलता रहा; वेस्टर्न स्टाइल रोमांस के चक्कर में हुई यह घटना

बेंगलुरु किरण और 27 साल की प्रेरणा पिछले एक साल से रिलेशनशिप में थे। दोनों ही एक ही टेलीकॉम कंपनी में साथ काम करते थे।  जब प्रेरणा का भाई और मां घर पर नहीं थे, तब उसने किरण को अपने घर बुलाया। पुलिस जांच के अनुसार, प्रेरणा ने किरण को एक विदेशी स्टाइल में प्रपोजल देने के लिए कहा। उसने किरण को एक कुर्सी पर बैठाया और उसके हाथ-पैर बांधने शुरू कर दिए। जब किरण ने हाथ-पैर कसकर बांधने पर सवाल उठाया, तो प्रेरणा ने उसे यह कहकर शांत कर दिया कि यह एक रोमांटिक सरप्राइज का हिस्सा है। किरण ने अपनी प्रेमिका पर भरोसा किया और विरोध नहीं किया। जैसे ही किरण पूरी तरह असहाय हुआ कि प्रेरणा ने उसके ऊपर पेट्रोल छिड़क दिया और आग लगा दी। कुर्सी से बंधे होने के कारण किरण के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। पुलिस ने खुलासा किया है कि यह केवल एक हत्या नहीं थी, बल्कि एक विकृत मानसिकता का प्रदर्शन था। सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि जब किरण आग की लपटों में घिरा हुआ था तो आरोपी प्रेरणा अपने मोबाइल फोन से पूरी घटना का वीडियो बना रही थी। पुलिस को संदेह है कि पेट्रोल पहले से ही घर में लाकर रखा गया था। यह साबित करता है कि यह क्षण भर के गुस्से में की गई वारदात नहीं बल्कि एक सोची-समझी हत्या थी। हत्या के पीछे का मकसद प्रारंभिक पूछताछ में सामने आया है कि प्रेरणा इस बात से बेहद नाराज थी कि किरण उसे नजरअंदाज कर रहा था और उसने शादी करने से इनकार कर दिया था। इसी गुस्से और बदले की भावना ने उसे इस क्रूर कदम को उठाने के लिए प्रेरित किया। शुरुआत में प्रेरणा ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की। उसने दावा किया कि वह वॉशरूम में थी और बाहर निकलने पर उसने किरण को जलते हुए पाया। हालांकि, सीसीटीवी फुटेज और फोरेंसिक सबूतों ने उसके झूठ की पोल खोल दी, क्योंकि किरण अपने साथ कोई ज्वलनशील पदार्थ लेकर नहीं आया था। पुलिस ने प्रेरणा को हिरासत में ले लिया है। हत्या का मोबाइल वीडियो पुलिस के लिए सबसे बड़ा सबूत बन गया है।

पहलगाम नरसंहार रोक सकते थे ये दो लोग, 3000 रुपये के लालच में इन्होंने की गद्दारी

पहलगाम  22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए खौफनाक आतंकी हमले में 26 नागरिकों को उनके परिवारों के सामने ही बेरहमी से भून दिया गया था। अब इस मामले की जांच में एक बेहद चौंकाने वाला और दुखद पहलू सामने आया है। जांच से पता चला है कि अगर जेल में बंद दो स्थानीय कश्मीरी निवासियों ने समय रहते पुलिस को सूचना दी होती, तो इस भीषण नरसंहार को आसानी से रोका जा सकता था। चंद रुपयों के लिए आतंकियों को दी पनाह इस मामले में गिरफ्तार किए गए दो स्थानीय लोगों की पहचान परवेज अहमद और बशीर अहमद जोथड के रूप में हुई है। जांच में यह बात सामने आई है कि इन दोनों ने महज 3000 रुपये के लालच में तीन पाकिस्तानी आतंकियों को अपने घर में पनाह दी थी और उनकी मदद की थी। 21 अप्रैल की रात यानी हमले से ठीक एक रात पहले तीनों आतंकी इन दोनों के घर आए थे। उन्होंने वहां करीब 5 घंटे बिताए और खाना भी खाया। बातचीत के दौरान आतंकी पाकिस्तानी लहजे वाली उर्दू-पंजाबी मिश्रित भाषा बोल रहे थे। उनके पास अत्याधुनिक हथियार थे और वे 'अली भाई' नाम के शख्स का जिक्र कर रहे थे। अली भाई असल में लश्कर-ए-तैयबा के द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) का शीर्ष कमांडर और मुख्य आरोपी साजिद जट्ट है, जो पाकिस्तान के कसूर इलाके का रहने वाला है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, रात करीब 10:30 बजे आतंकी वहां से निकले। जाते समय उन्होंने अपने साथ कुछ खाना पैक किया और खाना पकाने का बर्तन, कंबल व तिरपाल भी साथ ले गए। इन सब संदिग्ध हरकतों के बावजूद परवेज और बशीर ने चुप्पी साधे रखी। हमले वाले दिन आतंकियों को देखा, फिर भी रहे खामोश हमले वाले दिन (22 अप्रैल, 2025) दोपहर करीब 12:30 बजे- यानी कत्लेआम शुरू होने से कुछ घंटे पहले परवेज और बशीर ने तीनों आतंकियों को बैसरन में एक बाड़ के पीछे छिपते हुए देखा था। इन आतंकियों की पहचान बाद में फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान शाह, हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान और हमजा अफगानी के रूप में हुई। यह पूरी तरह से स्पष्ट था कि इलाके में एक बड़ा आतंकी हमला होने वाला है। वे चाहते तो तुरंत पुलिस या स्थानीय टूरिस्ट ऑपरेटर्स एसोसिएशन को इसकी सूचना दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे अपने घोड़ों (टट्टुओं) के साथ वहां से दूर चले गए और अपने पर्यटक ग्राहकों के लौटने का इंतजार करने लगे। दोपहर 1:00 बजे से 1:30 बजे के बीच, उन्होंने पर्यटकों को घोड़ों पर बिठाकर वापस पहलगाम सुरक्षित पहुंचा दिया। हमले के बाद फरार और एनआईए की कार्रवाई जब इन दोनों को बैसरन में हुए दिल दहला देने वाले कत्लेआम की खबर मिली, तो वे समझ गए कि यह काम उन्हीं आतंकियों ने किया है जिन्हें उन्होंने पनाह दी थी। खुद को बचाने के लिए वे तुरंत अपनी 'ढोक' (पहाड़ों पर बनी अस्थायी झोपड़ी) छोड़कर वहां से भाग गए और छिप गए। राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) ने आखिरकार उन्हें ढूंढ निकाला और 22 जून, 2025 को दोनों को गिरफ्तार कर लिया। पाकिस्तान का सीधा कनेक्शन और चार्जशीट दिसंबर 2025 में एनआईए ने इस मामले में चार्जशीट (आरोप पत्र) दायर की। इस चार्जशीट में परवेज अहमद और बशीर अहमद के साथ-साथ मुख्य साजिशकर्ता साजिद जट्ट, तीनों पाकिस्तानी हमलावरों (जो अब मारे जा चुके हैं) और लश्कर/TRF को एक आतंकी संगठन के तौर पर नामजद किया गया है। खुफिया एजेंसियों के सूत्रों ने बताया कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान का सीधा हाथ होने की पुष्टि फेसबुक द्वारा दी गई जानकारी से भी हुई है। भारत में एक भ्रामक पोस्ट फैलाई गई थी जिसमें दावा किया गया था कि 'जिब्रान हमारा आदमी था'। फेसबुक की जांच में यह पोस्ट पाकिस्तान के रावलपिंडी और बहावलपुर के फोन नंबरों से जुड़ी पाई गई, जो इस हमले में पाकिस्तानी साजिश का एक और पुख्ता सबूत है।

पाकिस्तानी मिसाइल दिल्ली की ओर बढ़ी, लेकिन कैसे रास्ते में हुई ढेर? ऑपरेशन सिंदूर ने खोला राज

 नई दिल्ली ऑपरेशन सिंदूर के वक्त दिल्ली की तरफ बढ़ती उस पाकिस्तानी मिसाइल को शायद यह अंदाज़ा नहीं था कि वह हिंदुस्तान की सरहद नहीं, बल्कि जज़्बे की दीवार से टकराने जा रही है. हरियाणा के आसमान में ही उसे मिट्टी में मिलाकर इंडियन एयरफोर्स ने साबित कर दिया था कि भारत पर आंख उठाने वालों का अंजाम क्या होता है. ऑपरेशन सिंदूर की यह कहानी सिर्फ एक सैन्य सफलता नहीं, बल्कि दुश्मन के लिए सख्त पैगाम है कि अगर कोई हमारे घर की तरफ बढ़ेगा, तो उसका नाम और निशान दोनों नहीं बचेगा।  इंडियन एयरफोर्स ने मई 2025 में पाकिस्तान की तरफ से दागी गई फतेह या शाहीन सीरीज की बैलिस्टिक मिसाइल को दिल्ली पहुंचने से पहले ही हरियाणा के ऊपर सफलतापूर्वक खत्म कर दिया था. यह कार्रवाई पश्चिमी सीमा के पास रणनीतिक रूप से जरूरी सिरसा एयर बेस पर तैनात वायुसेना की यूनिट ने अंजाम दी थी।  एयर कोमोडोर रोहित कपिल के नेतृत्व में एयर डिफेंस ग्रिड ने तत्काल जवाब देते हुए बराक-8 (Barak-8) सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम का उपयोग किया. सिरसा से बरामद मलबे ने उस वक्त इस बड़े खतरे का इशारा किया था. यह सफल ऑपरेशन भारत की सैन्य तत्परता और आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली की मजबूती को दर्शाता है, जिसने युद्ध के दौरान एक बड़े खतरे को टाल दिया था।  एयर कोमोडोर रोहित कपिल का नेतृत्व इस निर्णायक ऑपरेशन का नेतृत्व 45 विंग के एयर ऑफिसर कमांडिंग, एयर कोमोडोर रोहित कपिल ने किया था. उनके सटीक फैसलों और त्वरित जवाबी कार्रवाई की वजह से ही दिल्ली पर होने वाला हमला नाकाम हो सका. उनकी इस बहादुरी और रक्षात्मक व आक्रामक योजना के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें साल 2025 में 'युद्ध सेवा मेडल' से सम्मानित किया था।  सिरसा की यह घटना भारत के विकसित होते एयर डिफेंस आर्किटेक्चर का एक उदाहरण बन गई है. मौजूदा वक्त में 'सुदर्शन प्रोग्राम' के तहत देश भर में एक मल्टी-लेवल सुरक्षा घेरा तैयार किया जा रहा है. इसमें एस-400, बराक-8 और स्वदेशी इंटरसेप्टर सिस्टम को इंटीग्रेटेड किया जा रहा है. सिरसा इंटरसेप्ट आधुनिक युद्ध में सतर्कता और आपसी कोऑर्डिनेशन की अहमियत की याद दिलाता है। 

गर्मी ने बढ़ाया ‘मेगा अल नीनो’ का डर, 149 साल पहले 4% आबादी का सफाया हुआ था

 नई दिल्ली 1877 के बाद अब तक का सबसे ताकतवर अल-नीनो बन रहा है. उस वक्त इसने पूरी दुनिया में गर्मी की लहरें, सूखा और महामारी फैलाकर पृथ्वी की 4 प्रतिशत आबादी को मार डाला था. अब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि 2026-27 में यह दोहरा सकता है।  अल-नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय यानी ट्रॉपिकल हिस्से का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. सामान्य अल-नीनो हर 2-7 साल में आता है, लेकिन इस बार यह सुपर या मेगा स्तर का बन रहा है. कारण – समुद्री गर्मी की लहर, पॉजिटिव पैसिफिक मेरिडियनल मोड और गर्म दक्षिणी हवाएं।  बेन नॉल जैसे मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, यह लहर अल-नीनो को और मजबूत बना रही है. गर्मी और नमी बढ़ने से पश्चिमी देशों में गर्मी की लहरें और तेज हो सकती हैं. वैज्ञानिक कह रहे हैं कि यह पैटर्न 140 साल में सबसे ताकतवर हो सकता है।  अभी प्रशांत महासागर में 8046 KM लंबी गर्मी की लहर फैली हुई है. यह माइक्रोनेशिया से शुरू होकर कैलिफोर्निया तक पहुंच चुकी है. कैलिफोर्निया के पास इसे 'द ब्लॉब' कहा जा रहा है. यहां समुद्री सतह का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर है. NOAA की रिपोर्ट के मुताबिक यह जिस लेवल का है वो बेहद विशालकाय है।   यह लहर अल-नीनो को तेजी से मजबूत कर रही है. इससे समुद्री जीव-जंतुओं पर असर पड़ रहा है. मौसम के पैटर्न पूरी तरह बदल रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह गर्मी की लहर अल-नीनो को और बढ़ावा देगी, जिससे पूरे साल मौसम अनियमित रहेगा।  1877 के बाद सबसे बड़ा अल-नीनो? 1877-78 का अल-नीनो इतिहास का सबसे विनाशकारी था. उसने गर्मी की लहरें, सूखा और फसल नष्ट करके लाखों लोगों की जान ली. अब वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2026 का अल-नीनो उससे भी ताकतवर हो सकता है. अप्रैल 2026 के मौसम मॉडल्स में वैज्ञानिक हार्ट पल्पिटेशंस महसूस कर रहे हैं. अगर यह सुपर अल-नीनो बना तो 2027 में वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड तोड़ सकता है. जलवायु परिवर्तन के साथ यह और खतरनाक बन रहा है।  दुनिया भर में कहां-कहां क्या असर होगा? अल-नीनो का असर पूरे विश्व पर पड़ेगा. ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, भारत और अमेजन के जंगलों में सूखा और भयंकर गर्मी बढ़ेगी. आग लगने का खतरा ज्यादा होगा. अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में भारी बारिश और बाढ़ आ सकती है. उत्तरी अमेरिका में गर्मी बढ़ेगी।  दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ेगा. एशिया और अफ्रीका के कई देशों में फसलें प्रभावित होंगी. समुद्री गर्मी की लहर से तूफान और भारी बारिश की संभावना बढ़ेगी. कुल मिलाकर मौसम के पैटर्न पूरी तरह उलट जाएंगे।  भारत पर क्या होगा असर? गर्मी में तापमान बढ़ेगा? भारत इस मेगा अल-नीनो से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल है. वैज्ञानिकों के अनुसार 2026 की गर्मी में तापमान सामान्य से काफी ज्यादा रहेगा. दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान और उत्तर भारत में पहले ही अप्रैल में 40 डिग्री सेल्सियस पार हो चुका है. अल-नीनो की वजह से प्री-मानसून गर्मी और तेज होगी।  जून-सितंबर का मानसून कमजोर हो सकता है, जिससे सूखा पड़ने का खतरा बढ़ेगा. उत्तर-पश्चिम भारत में सूखे की स्थिति बन सकती है. कृषि प्रभावित होगी, फसलें कम हो सकती हैं. गर्मी की लंबी और तेज होगी. नमी ज्यादा होने से गर्मी और ह्यूमिड महसूस होगी. कुल मिलाकर इस गर्मी में तापमान जरूर बढ़ेगा और लोगों को भारी गर्मी का सामना करना पड़ेगा।  सरकार और लोग दोनों को तैयार रहना होगा. पानी की बचत, सूखा प्रबंधन और फसल बीमा पर जोर देना जरूरी है. किसानों को सूखा सहन करने वाली फसलें लगाने की सलाह दी जा रही है. स्वास्थ्य विभाग को हीट वेव अलर्ट जारी करने चाहिए. शहरों में कूलिंग सेंटर्स बनाए जाएं. वैज्ञानिक लगातार मॉनिटरिंग कर रहे हैं. अगर अल-नीनो सुपर लेवल का बना तो 2027 तक असर रहेगा। 

भारत का बड़ा कदम: होर्मुज नाकेबंदी के बीच रूसी तेल की खरीद अब सरल, 2030 तक की किचकिच खत्म

नई दिल्ली अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी से उभरे तेल-गैस संकट के बीच भारत ने बड़ा रणनीतिक दांव खेला है. भारत सरकार ने रूसी तेल की सप्लाई को निर्बाध बनाए रखने के लिए समुद्री बीमा देने वाली रूसी कंपनियों की संख्या बढ़ा दी है, जिससे आने वाले वर्षों तक तेल आयात में आने वाली बाधाएं काफी हद तक खत्म हो जाएंगी।  डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (DGS) के फैसले के मुताबिक, अब 8 की जगह 11 रूसी बीमा कंपनियों को भारत के बंदरगाहों पर आने वाले जहाजों को कवर देने की मंजूरी दी गई है. ये कंपनियां प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी (P&I) कवर प्रदान करेंगी, जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए बेहद जरूरी होता है।  भारत ने खत्म किया सबसे बड़ा रोड़ा दरअसल, रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते यूरोप की बड़ी बीमा कंपनियों ने रूसी तेल ढोने वाले जहाजों को कवर देना कम कर दिया था. ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि वह अपने लिए वैकल्पिक इंश्योरेंस व्यवस्था तैयार करे. अब रूसी कंपनियों को मंजूरी देकर भारत ने इस समस्या का बड़ा समाधान निकाल लिया है।  गज़प्रोम इंश्योरेंस और रोसगोस्त्राख जैसी प्रमुख कंपनियों को फरवरी 2027 तक बीमा सेवाएं देने की अनुमति दी गई है, जबकि VSK, सोगाज़ और अल्फास्ट्राखोवानी जैसी कुछ कंपनियों को 2030 तक की लंबी मंजूरी मिल गई है. यह संकेत है कि भारत ने सिर्फ तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक समाधान पर भी काम किया है।  इसके अलावा सोग्लासिए, स्बरबैंक इंश्योरेंस, उगोरिया इंश्योरेंस ग्रुप और ASTK इंश्योरेंस जैसी कंपनियों का रजिस्ट्रेशन भी बढ़ाया गया है. वहीं दुबई स्थित इस्लामिक प्रोटेक्शन एंड इंडेम्निटी क्लब को भी फरवरी 2027 तक सेवाएं देने की अनुमति देकर भारत ने गैर-पश्चिमी विकल्पों का दायरा और बढ़ा दिया है।  होर्मुज की टेंशन पर लगाम यह फैसला ऐसे समय आया है, जब होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी ने दुनियाभर में तेल सप्लाई की चिंता बढ़ा दी है. दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी रास्ते से गुजरता है, और किसी भी बाधा का सीधा असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर पड़ता है।  भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है. हाल के वर्षों भारत ने सस्ते रूसी तेल का आयात काफी बढ़ा दिया है. ऐसे में बीमा कवर की उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद जरूरी था, क्योंकि बिना बीमा के कोई भी जहाज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑपरेट नहीं कर सकता।  विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम वैश्विक अस्थिरता के बीच एक ‘सेफ्टी कवच’ की तरह काम करेगा. इससे न सिर्फ रूसी तेल की सप्लाई बनी रहेगी, बल्कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को भी बिना रुकावट पूरा कर सकेगा. कुल मिलाकर, होर्मुज संकट और पश्चिमी दबाव के बीच भारत ने एक ऐसा रास्ता निकाल लिया है, जिससे 2030 तक तेल सप्लाई से जुड़ी बड़ी ‘किचकिच’ खत्म होती नजर आ रही है। 

केदारनाथ धाम के कपाट आज सुबह 8 बजे होंगे खुलेंगे, भक्तों की भीड़ लगनी शुरू

गौरीकुंड  ग्यारहवें ज्योतिर्लिंग भगवान केदारनाथ की यात्रा अपने सबसे पावन पड़ाव पर पहुंच चुकी है. बम-बम भोले के जयकारों और आर्मी बैंड की सुरीली धुन के बीच बाबा केदारनाथ की पंचमुखी चल विग्रह उत्सव डोली अब केदारपुरी के बिल्कुल करीब है. केदारनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले पूरी केदारपुरी को कई क्विंटल फूलों से किसी दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है।   फाटा से गौरीकुण्ड तक भक्ति का सैलाब बाबा केदारनाथ की डोली सोमवार को फाटा से अपने सफर पर निकली और बड़ासू, शेरसी, रामपुर, सीतापुर होते हुए शाम करीब 4 बजे गौरीकुण्ड पहुंची. सोनप्रयाग से लेकर गौरीकुण्ड तक श्रद्धालुओं ने फूल-मालाओं और अक्षत के साथ बाबा की पालकी का जोरदार स्वागत किया।  सोमवार की रात बाबा की डोली ने गौरी माई मंदिर, गौरीकुण्ड में विश्राम किया.  इससे पहले डोली शीतकालीन गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर से रवाना होकर गुप्तकाशी पहुंची थी, जहां आर्मी बैंड की धुन ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया।  शाम धाम पहुंचें बाबा, आज होगा महा-अभिषेक कल सुबह विशेष पूजा-अर्चना के बाद डोली गौरीकुण्ड से केदारनाथ धाम के लिए रवाना .  हजारों की संख्या में पैदल यात्री इस डोली के पीछे-पीछे चल रहे हैं.  उम्मीद है कि शाम तक डोली मंदिर परिसर में पहुंची .  वहीं, भक्तों की नजरें आज सुबह 8:00 बजे के उस ऐतिहासिक पल पर टिकी हैं, जब मंत्रोच्चार के बीच केदारनाथ मंदिर के कपाट आम जनता के लिए खोल दिए जाएंगे।  पैदल मार्ग पर भारी जाम और अव्यवस्था आस्था के इस महाकुंभ में जहां जोश हाई है, वहीं व्यवस्थाएं पस्त नजर आ रही हैं.  गौरीकुण्ड से केदारनाथ तक के संकरे पैदल मार्ग पर इस वक्त पैर रखने की जगह नहीं है.  हजारों यात्रियों का हुजूम एक साथ आगे बढ़ रहा है, जिससे रास्ते में जगह-जगह भयंकर जाम की स्थिति बनी हुई है।  यात्रा मार्ग पर सबसे बड़ी मुसीबत घोड़े-खच्चर बन गए हैं. इनकी बेतरतीब आवाजाही और संकरे रास्तों पर इनके कारण पैदल चल रहे यात्रियों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. यात्रियों का कहना है कि पशुओं के दबाव के कारण जाम खुल नहीं रहा है, जिससे बुजुर्गों और बच्चों की सांसें फूल रही हैं।  केदारघाटी हुई शिवमय बेशक रास्ते कठिन हैं और जाम की चुनौती बड़ी है, लेकिन भक्तों का हौसला कम नहीं हुआ है. गुप्तकाशी से लेकर गौरीकुण्ड तक पूरा इलाका शिव के रंग में रंगा नजर आ रहा है।  तीन दिन पहले बाबा केदार ने छोड़ा शीतकालीन गद्दीस्थल बाबा केदारनाथ की पंचमुखी डोली रविवार, 19 अप्रैल को अपने शीतकालीन गद्दीस्थल उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर से रवाना हुई थी। 20 किलोमीटर का सफर तय कर डोली फाटा पहुंची, जहां आर्मी बैंड की धुन और स्कूली बच्चों के जयकारों के साथ डोली का स्वागत किया गया। इसके बाद डोली सोमवार सुबह फाटा से निकली और शाम को गौरीकुंड पहुंची। यहां से मंगलवार सुबह बाबा की पंचमुखी डोली केदारनाथ धाम के लिए रवाना हो चुकी है। बाबा केदार की डोली 178 दिन ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ में विराजमान रही। इससे पहले, 23 अक्टूबर 2025 (भैया दूज) को सुबह 8:30 बजे केदारनाथ धाम के कपाट बंद किए गए थे। कपाट बंद होने के बाद बाबा की डोली रामपुर और गुप्तकाशी होते हुए तीन दिनों की पैदल यात्रा पूरी कर 25 अक्टूबर 2025 को ऊखीमठ पहुंची थी, जहां छह महीने तक उनकी शीतकालीन पूजा-अर्चना हुई। 149 दिन बाद बद्रीनाथ धाम पहुंचेंगे भगवान बद्री विशाल बद्रीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल को श्रद्धालुओं के लिए खुलने जा रहे हैं। इसे देखते हुए चमोली पुलिस ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। धाम में आतंकवादी निरोध दस्ता (एटीएस) की तैनाती भी की गई है। भगवान बद्री विशाल की डोली मंगलवार, 21 अप्रैल को जोशीमठ से धाम के लिए रवाना होगी। करीब 42 किलोमीटर का सफर तय करके डोली बुधवार शाम बद्रीनाथ धाम पहुंचेगी। 23 अप्रैल को सुबह 6:15 बजे मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। भगवान बद्रीनाथ की गद्दी करीब 6 महीने तक जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में विराजमान रही। बद्रीनाथ धाम के कपाट 25 नवंबर 2025 को दोपहर करीब 2:56 बजे बंद हुए थे। कपाट बंद होने के बाद भगवान की गद्दी पांडुकेश्वर होते हुए अपने शीतकालीन प्रवास जोशीमठ पहुंची थी, जहां पूरी सर्दियों में उनकी विशेष पूजा-अर्चना हुई। दो दिन पहले खुले थे कपाट रविवार से चारधाम यात्रा शुरू हुई थी। दोपहर 12 बजकर 15 मिनट पर गंगोत्री और 12 बजकर 35 मिनट पर यमुनोत्री के कपाट खोल दिए गए थे। इससे पहले गंगोत्री धाम के कपाट 22 अक्टूबर 2025 (अन्नकूट, गोवर्धन पूजा) को सुबह 11:36 बजे शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए थे। वहीं, यमुनोत्री धाम के कपाट भाई दूज पर 23 अक्टूबर 2025 को दोपहर 12:30 बजे शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए थे।

रिपोर्ट का दावा: US से भारत को 12 अरब डॉलर तक टैरिफ रिफंड, व्यापार को मिलेगी रफ्तार

नई दिल्ली अमेरिका में भारत से जुड़े टैरिफ रिफंड की राशि 10 से 12 अरब डॉलर के बीच होने की उम्मीद है। यह रिफंड अमेरिकी अधिकारियों द्वारा डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए टैरिफ के लिए 166 अरब डॉलर की क्लेम विंडो खोलने के बाद दिया जा रहा है, जिसे अमेरिकी अदालतों ने रद्द कर दिया था। यह जानकारी ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव की ओर से जारी रिपोर्ट में दी गई। रिफंड की प्रक्रिया 20 अप्रैल को शुरू हुई और क्लेम केवल अमेरिका स्थित आयातकों द्वारा ही दायर किए जा सकते हैं, जिसका अर्थ है कि भारतीय निर्यातकों के पास रिफंड प्राप्त करने का कोई सीधा कानूनी रास्ता नहीं है। भारतीय कंपनियों को रिफंड का कोई हिस्सा पाने के लिए अब अमेरिकी खरीदारों के साथ बातचीत पर निर्भर रहना होगा। निर्यातकों को छूट साझा करने के लिए डील, कीमतों में बदलाव या भविष्य के अनुबंधों में बेहतर शर्तों की मांग करनी पड़ सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बड़ा रिफंड एक बड़े अवसर की ओर इशारा करता है, लेकिन चेतावनी दी गई है कि भारतीय निर्यातकों के लिए कोई भी वास्तविक लाभ उनकी बातचीत की ताकत और अमेरिकी भागीदारों के साथ वाणिज्यिक शर्तों को फिर से शुरू करने की उनकी क्षमता पर निर्भर करेगा। भारत से जुड़े रिफंड में सबसे अधिक हिस्सेदारी कपड़ा और परिधान, इंजीनियरिंग सामान और रसायन क्षेत्रों की होने की संभावना है, क्योंकि टैरिफ में अचानक बढ़ोतरी होने पर ये क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुए थे। टैरिफ के पहले चरण में उन व्यवसायों को शामिल किया गया है जिनकी प्रविष्टियों को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया गया है, या आयात संबंधी आवेदन अभी भी सीमा शुल्क समीक्षा के अधीन हैं, और वे प्रविष्टियां, जिन्हें पिछले 80 दिनों के भीतर अंतिम रूप दिया गया है। इससे पहले अंतिम रूप दी गई प्रविष्टियों वाले व्यवसायों को क्लेम दाखिल करने से पहले बाद के चरणों का इंतजार करना होगा।

एयर विजिट में बड़ा संदेश: भारत-अमेरिका रिश्ते मजबूत, इंडो-पैसिफिक सुरक्षा पर जोर

वाशिंगटन सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने होनोलूलू में यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी पैसिफिक के कमांडिंग जनरल, जनरल रोनाल्ड पी. क्लार्क और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बैठक की। इस बैठक में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग मजबूत करने और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए एक साझा दृष्टिकोण आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई। जब जनरल द्विवेदी हवाई स्थित यूएस मिलिट्री बेस पर पहुंचे, तो फोर्ट शैफ्टर में उन्हें 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिया गया और उन्होंने ओहू द्वीप का हवाई दौरा भी किया। भारतीय सेना के अतिरिक्त जन सूचना महानिदेशालय (एडीजीपीआई) ने एक्स पोस्ट में इसकी जानकारी दी। बताया, "जनरल उपेंद्र द्विवेदी, सीओएएस, को यूएस आर्मी पैसिफिक की अपनी मौजूदा यात्रा के दौरान, हवाई के फोर्ट शैफ्टर में 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिया गया। उन्होंने अमेरिकी आर्मी पैसिफिक के कमांडिंग जनरल, जनरल रोनाल्ड पी. क्लार्क और अन्य वरिष्ठों के साथ बातचीत की। इस दौरान भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग मजबूत करने और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए एक साझा दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने पर जोर रहा। सीओएएस ने ओहू द्वीप का हवाई दौरा भी किया, जिससे उन्हें ट्रेनिंग इकोसिस्टम और बहु-क्षेत्रीय परिचालन तत्परता की जानकारी मिली।" इस महीने की शुरुआत में, भारत और अमेरिका ने अपनी वायु सेनाओं के प्रमुखों के बीच हुई उच्च-स्तरीय बातचीत के दौरान अपनी रणनीतिक रक्षा साझेदारी की फिर से पुष्टि की; इस बातचीत का मुख्य एजेंडा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में आपसी तालमेल, प्रशिक्षण और क्षेत्रीय प्रतिरोधक क्षमता पर जोर देना था। यूएस वायु सेना के चीफ ऑफ स्टाफ, जनरल केनेथ विल्सबैक ने 8 अप्रैल को भारतीय वायु सेना के प्रमुख, एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह की आधिकारिक यात्रा की मेजबानी की थी। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, सिंह का जॉइंट बेस एनाकोस्टिया-बोलिंग में पूरे सम्मान के साथ स्वागत किया गया और बाद में उन्होंने पेंटागन में वायु सेना के सचिव, ट्रॉय मिंक और विल्सबैक के साथ बैठक भी की। बातचीत के दौरान, यूएस वायु सेना के वरिष्ठ अफसरों ने बताया कि भारत के साथ अपनी रक्षा साझेदारी को वाशिंगटन बहुत महत्व देता है; उन्होंने इसे "एक स्वतंत्र, खुला, शांतिपूर्ण और समृद्ध इंडो-पैसिफिक क्षेत्र" सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण बताया। विल्सबैक ने समान विचारधारा वाले साझेदारों के साथ बहुपक्षीय अभ्यासों में भारत के नेतृत्व और भागीदारी की सराहना की, और इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के सहयोग का विस्तार करना क्षेत्रीय प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने की कुंजी होगी। विल्सबैक ने कहा, "एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह की इस महत्वपूर्ण समकक्ष यात्रा की मेजबानी करना हमारे लिए सम्मान की बात थी। पेंटागन में हमने आधुनिकीकरण के प्रयासों, भविष्य के प्रशिक्षण अवसरों और एक स्वतंत्र, खुले और समृद्ध इंडो-पैसिफिक की साझा प्रतिबद्धता पर मंथन किया।" वार्ताओं में भारत द्वारा एमक्यू-9बी स्काई गार्डियन विमान की खरीद पर भी चर्चा हुई, जिसमें अमेरिकी वायुसेना ने यह सुनिश्चित करने की अपनी प्रतिबद्धता जताई कि भारतीय सशस्त्र बल इस प्लेटफॉर्म का डिलीवरी के बाद "सुगमता और प्रभावी ढंग से उपयोग" कर सकें। विल्सबैक ने भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण प्रयासों का समर्थन करने के लिए अमेरिकी वायुसेना की तत्परता को रेखांकित किया और रक्षा औद्योगिक सहयोग के पारस्परिक लाभों की ओर इशारा किया था। पेंटागन की बैठकों के बाद स्टाफ-स्तरीय वार्ताएं हुईं, जिनमें कई परिचालन क्षेत्रों पर चर्चा की गई, जैसे नेशनल गार्ड ब्यूरो का स्टेट पार्टनरशिप प्रोग्राम, एयर नेशनल गार्ड का एडवांस्ड एयरलिफ्ट टैक्टिक्स ट्रेनिंग सेंटर और एमक्यू-9 के पूर्ण-स्पेक्ट्रम संचालन। एयरचीफ मार्शल सिंह ने कहा कि इस तरह की सहभागिताएं दोनों वायुसेनाओं के बीच संयुक्त क्षमताओं को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा, "ऐसे अवसर हमारी संयुक्त इंटरऑपरेबिलिटी को बढ़ाने और हमारी वायुसेनाओं के बीच रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।" एयरचीफ मार्शल सिंह ने कोलोराडो के पीटरसन स्पेस फोर्स बेस का दौरा किया, जहां उन्हें नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड के मिशन के बारे में जानकारी दी गई, जिसमें उत्तरी अमेरिका के लिए एयरोस्पेस और समुद्री चेतावनी शामिल है।

Ashwagandha पर नया नियम: पत्तियों के इस्तेमाल पर बैन, क्या जड़ है सुरक्षित? पूरी जानकारी

नई दिल्ली फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने खाने-पीने की चीजों में अपनी निगरानी बढ़ा दी है। पिछले कुछ दिनों से कई मिलावटी चीजों को पकड़ने के बाद अब FSSAI ने अश्वगंधा की पत्तियों के इस्तेमाल पर सीधी रोक लगाई है। उन्होंने सख्त निर्देश दिए है कि अश्वगंधा का इस्तेमाल सिर्फ उसकी जड़ और एक्सट्रैक्ट तक ही सीमित रखा जाए, पत्तियों के इस्तेमाल पर कंपनियों पर कार्रवाई होगी। उन्होंने साफ कर दिया है कि अश्वगंधा का इस्तेमाल फिर चाहे कच्चा हो या उसका एक्सट्रैक्ट उसकी अनुमति नहीं है। FSSAI के साथ आयुष मंत्रालय ने भी दवा और प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियों को यही निर्देश जारी किए हैं। एडवाइजरी जारी करते हुए सरकार ने सभी हेल्थ सप्लीमेंट बनाने वाली कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे अपने खाद्य उत्पादों पर साफ-साफ लेबल के साथ लिखेंगे कि उनमें अश्वगंधा का कितने प्रतिशत इस्तेमाल किया गया है। क्या है अश्वगंधा अश्वगंधा (Ashwagandha) आयुर्वेद की सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध जड़ी-बूटियों में से एक है। इसे पुराने समय से लोग दवाइयों के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। 'अश्वगंधा' शब्द दो संस्कृत शब्दों से बना है, अश्व (घोड़ा) और गंध (महक)। ऐसा कहा जाता है कि इससे घोड़े के पसीने जैसी महक आती है और इसे खाने से उसके जैसी ताकत। इसका पौधा छोटा और झाड़ीदार होता है, जिसमें पीले फूल और लाल फल निकलते हैं। आयुर्वेद में सालों से इसकी जड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे फायदेमंद माना जाता है। पत्तियों पर क्यों लगाई रोक? अश्वगंधा की पत्तियों में रिएक्टिव विथानोलाइड्स की मात्रा ज्यादा होती है, जो शरीर के लिए टॉक्सिक माने जाता है। इसका सेवन करने से लिवर, पेट और नसों से जुड़ी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। सेहत को मद्देनजर यूरोपीय कंट्री पोलैंड और हंगरी ने पहले से ही इन पत्तियों के इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है। दवा बनाने वाली कंपनियां सस्ते होने की वजह से इसकी पत्तियों का इस्तेमाल कर रही थी क्योंकि जड़ काफी महंगी मिलती है। अश्वगंधा की जड़ खाने के फायदे अश्वगंधा की जड़ खाने से सेहत को कई तरह के फायदे मिलते हैं लेकिन इसके सेवन का तरीका भी सही होना चाहिए। ज्यादा खाने से ये खतरनाक भी हो सकता है। चलिए आपको इसके फायदे और नुकसान बताते हैं। फायदे-     तनाव कम करना- रिसर्च के मुताबिक, अश्वगंधा शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) के स्तर को कम करता है, जो कि एक स्ट्रेस हार्मोन है। इससे दिमाग शांत रहता है और स्ट्रेस लेवल कंट्रोल में रहता है।     मांसपेशियां होंगी मजबूत- एथलीट और जिम जाने वाले लोग ताकत बढ़ाने के लिए इसे खाते हैं। इसे खाने से मसल्स मजबूत हो जाती है।     नींद की कमी- अश्वगंधा की जड़ का सेवन करने से अनिद्रा की समस्या नहीं रहती। अगर आपको कम नींद आती है, तो ये ठीक कर देगा।     स्पर्म क्वालिटी- अश्वंगधा पुरुषों के लिए काफी फायदेमंद होती है। यह टेस्टोस्टेरोन लेवल को बढ़ाकर प्रजनन क्षमता को बेहतर करती है। साथ ही स्पर्म क्वालिटी को सुधारती है। नुकसान-     हड्डियों में दर्द- ज्यादा अश्वगंधा खाने से हड्डियों में दर्द या थायरॉइड की समस्या हो सकती है।     ब्लड प्रेशर के मरीज- अश्वगंधा बीपी वाले मरीजों को बिल्कुल नहीं लेना चाहिए। इसे खाने से ब्लड प्रेशर घट या बढ़ सकता है, जो जानलेवा हो सकता है।     लिवर पर असर- ज्यादा अश्वगंधा का सेवन आपके लिवर पर असर डाल सकता है। साथ ही पेट संबंधी समस्याएं भी हो सकती हैं।