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नतांज परमाणु केंद्र पर हमले के बाद अमेरिका-इजरायल की विनाशकारी कार्रवाई

 तेहरान मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर चरम पर है. ईरान के सबसे सुरक्षित और संवेदनशील माने जाने वाले नतांज परमाणु केंद्र (Natanz Nuclear Facility) पर एक भीषण हमला हुआ है. खबर है कि अमेरिका-इजरायल ने मिलकर इस साइट पर जबरदस्त बमबारी की है, जिससे पूरे इलाके में हड़कंप मच गया. हालांकि, इस भारी हमले के बीच राहत की एक बड़ी खबर भी सामने आई है।  ईरानी मीडिया के मुताबिक, इस ताजा हमले में नतांज संवर्धन केंद्र को निशाना बनाया गया है. हमले की तीव्रता इतनी अधिक थी कि इसकी गूंज दूर-दराज के इलाकों तक सुनी गई. लेकिन शुरुआती जांच के बाद ईरानी अधिकारियों ने राहत की सांस ली है, क्योंकि अब तक किसी भी तरह के रेडियोधर्मी पदार्थ (रेडिएशन) के रिसाव की पुष्टि नहीं हुई है. यानी, परमाणु कचरा फैलने जैसा जो सबसे बड़ा डर था, वह फिलहाल टल गया है।  ईरानी मीडिया का दावा है कि धमाके के बावजूद आसपास के रिहायशी इलाकों में रहने वाले लोग पूरी तरह सुरक्षित हैं. सरकार ने इस सैन्य कार्रवाई को अमेरिका-इजरायल के उस निरंतर अभियान का हिस्सा बताया है, जिसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना है।  बार-बार निशाने पर नतांज, पर हर बार बचा पर्यावरण दरअसल, नतांज परमाणु केंद्र दुश्मनों के लिए हमेशा से टारगेट रहा है. साल 2025 से अब तक इस साइट को कई बार निशाना बनाया जा चुका है. हर बार यहां के ढांचे और मशीनों को नुकसान पहुंचता है, लेकिन गनीमत यह रही है कि अब तक पर्यावरण को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा है।  आपको बता दें कि पिछले साल जून में इजरायल और ईरान के बीच जो 12 दिनों का भीषण युद्ध चला था, उसमें भी नतांज ही मुख्य टारगेट था. उस समय अमेरिका भी सीधे तौर पर इस संघर्ष का हिस्सा बन गया था. अब एक बार फिर इसी जगह पर बमबारी होना यह संकेत दे रहा है कि आने वाले दिनों में मिडिल ईस्ट के हालात और भी ज्यादा विस्फोटक हो सकते हैं। 

कतर एनर्जी के CEO ने ट्रंप को दिया जवाब, बार-बार कहा गैस ठिकानों को हाथ मत लगाना

दोहा  इजरायल ने अमेरिका की मदद से बुधवार रात दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड साउथ पार्स पर हमला कर ईरान को आगबबूला कर दिया. जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान ने कतर, सऊदी, यूएई और कुवैत के तेल और गैस ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया है. सबसे अधिक नुकसान कतर को हुआ है. सरकारी तेल और गैस कंपनी कतरएनर्जी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) साद अल-काबी का कहना है कि उन्होंने लगातार इसे लेकर अमेरिका को चेताया था।  साउथ पार्स पर हमले के कुछ ही घंटों के भीतर ईरान की मिसाइलों ने कतर के रास लाफान इलाके को निशाना बनाया, जहां लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) की रिफाइनरी के मुख्य ठिकाने मौजूद हैं. कतर की सरकारी गैस कंपनी के अनुसार, ईरान के हमले से समुद्री मार्ग से गैस आपूर्ति करने वाली दुनिया के सबसे बड़े गैस सिस्टम को भारी नुकसान हुआ है।  इसके प्रमुख अल-काबी, जो देश के ऊर्जा मंत्री भी हैं, ने कहा कि ईरान के हमले से इतना नुकसान हुआ है जिसे ठीक करने में तीन से पांच साल का समय लग सकता है. अल-काबी ने कहा कि उन्होंने पहले ही अधिकारियों और एग्जीक्यूटिव्स को चेताया था कि अगर ईरान के तेल-गैस ठिकानों पर हमला होता है तो हमें ऐसे खतरे झेलने पड़ सकते हैं।  समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में साद अल-काबी ने कहा, 'मैं हमेशा चेतावनी देता रहा, हमारे साथ साझेदारी करने वाली तेल और गैस कंपनियों के अधिकारियों से बात करता रहा, अमेरिकी ऊर्जा मंत्री से बात करता रहा, ताकि उन्हें इस नतीजे के बारे में आगाह कर सकूं और बता सकूं कि यह हमारे लिए नुकसानदेह हो सकता है।  कतरएनर्जी के साझेदारों में एक्सॉनमोबिल और कोनोकोफिलिप्स जैसी बड़ी अमेरिकी ऊर्जा कंपनियां शामिल हैं।  कतरएनर्जी के प्रमुख को खतरे का अंदाजा था साद अल-काबी ने कहा कि अमेरिका और उसकी कंपनियों को अंदाजा था कि अगर ईरान के गैस फील्ड पर हमला हुआ तो वो कड़ा पलटवार करेगा. उन्होंने कहा, 'उन्हें खतरे की जानकारी थी, और मैं उन्हें लगभग रोजाना याद दिलाता था, उनसे कहता था कि तेल और गैस ठिकानों पर हमलों से हमें एकदम बचने की जरूरत है।  इस संबंध में सवाल पूछे जाने पर व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने रॉयटर्स से कहा, 'राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी पूरी ऊर्जा टीम यह सच्चाई जानती थी कि ईरान में जारी ऑपरेशन के दौरान तेल और गैस की सप्लाई में कुछ समय के लिए रुकावटें आएंगी. हमें पहले से इन रुकावटों का अंदाजा था जिसे लेकर हमने प्लानिंग की थी।  कोनोकोफिलिप्स के एक प्रवक्ता ने कहा, 'हम अपनी लंबे समय से चली आ रही साझेदारी के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. कतरएनर्जी के साथ मिलकर चीजों को फिर से ठीक करने के लिए मिलकर काम करते रहेंगे।  ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल युद्ध के तीन हफ्तों के दौरान मिसाइल और ड्रोन हमलों ने टैंकरों, रिफाइनरियों और अन्य एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचाया है।  इसमें अब तक सबसे बड़ा असर कतरएनर्जी के रास लाफान पर पड़ा है, जो दुनिया का सबसे बड़ा लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) कॉम्प्लेक्स है. अल-काबी ने कहा कि 26 अरब डॉलर की लागत से बने इन संयंत्रों को हुए नुकसान से यूरोप और एशिया को एलएनजी सप्लाई पांच साल तक प्रभावित हो सकती है।  बिना किसी चेतावनी के ईरान के गैस फील्ड को इजरायल ने बनाया निशाना बुधवार को इजरायल ने ईरान के मुख्य साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया. इसके जवाब में तेहरान ने कुवैत, यूएई, सऊदी अरब और कतर के रास लाफान में एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े हमले किए।  काबी ने कहा कि उन्हें साउथ पार्स पर हमले की कोई पूर्व चेतावनी नहीं थी. उन्होंने कहा, 'मुझे किसी भी चीज की जानकारी नहीं थी, और मुझे नहीं लगता कि किसी को भी थी. राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि उन्हें नहीं पता था. तो क्या आपको लगता है कि हमें पता होता? साउथ पार्स दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड का हिस्सा है, जिसे ईरान कतर के साथ साझा करता है. कतर में इसे नॉर्थ फील्ड कहा जाता है।  काबी ने कहा कि कतरएनर्जी ने अभी तक यह आकलन नहीं किया है कि क्या बीमा युद्ध से हुए नुकसान को कवर करेगा।  रास लाफान को कितना नुकसान हुआ है? अल-काबी ने कहा कि रास लाफान पर हमले से न केवल कतर की एलएनजी निर्यात क्षमता का 17 प्रतिशत हिस्सा ठप हो गया, बल्कि नुकसान के कारण इसका असर पांच साल तक रहेगा।  काबी ने कहा, 'कोल्ड बॉक्स खत्म हो गए हैं.' कोल्ड बॉक्स कूलिंग सिस्टम होता है जो गैस को शुद्ध और लिक्विड रूप में ठंडा कर देता है ताकि उसका ट्रांसपोर्टेशन किया जा सके. कतरएनर्जी के 14 ट्रेनें कोल्ड बॉक्स में से 2 को भारी नुकसान हुआ है।  उन्होंने कहा, 'यह मुख्य यूनिट है, यही एलएनजी का कूलिंग बॉक्स है, यह पूरी तरह नष्ट हो चुका है।  रास लाफान का विस्तार भी होने वाला था लेकिन इस महीने की शुरुआत में ईरानी हमले के बाद कंपनी ने अपने संयंत्रों को खाली करा लिया है. इस देरी की वजह से 2027 से फ्रांस, जर्मनी और चीन जैसे देशों को भेजी जाने वाली गैस प्रभावित होगी।  उन्होंने कहा, 'समंदर के बीच स्थित रिफाइनरी से सभी लोगों को हटाना आसान नहीं था, आप जानते हैं, 24 घंटों में 10,000 लोगों को निकाला गया और सभी ऑपरेशंस बंद कर दिए गए. मुझे बहुत खुशी है कि कोई इस दौरान घायल नहीं हुआ, कोई मौत नहीं हुई. यह हमारे उस फैसले की वजह से हुआ।  इस विस्तार के जरिए कतर शीर्ष एलएनजी निर्यातक की अपनी स्थिति को और मजबूत करना चाहता था. इसके तहत 2027 तक कतर की तरलीकरण क्षमता 77 मिलियन टन से बढ़ाकर 126 मिलियन टन प्रति वर्ष की जानी थी।  कतरएनर्जी में अब एलएनजी का उत्पादन कब शुरू होगा? काबी ने कहा कि कतरएनर्जी का उत्पादन तभी दोबारा शुरू हो सकता है जब शत्रुता समाप्त हो जाए, और तब भी पूरी तरह लोडिंग शुरू करने में कम से कम तीन से चार महीने लगेंगे।  काबी, जो कतर एयरवेज के चेयरमैन भी हैं, ने कहा कि इस युद्ध का व्यापक असर खाड़ी की सभी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।  उन्होंने कहा, 'इसने पूरे क्षेत्र को 10-20 साल पीछे धकेल दिया है. पर्यटन … Read more

Puducherry Elections: BJP की पहली लिस्ट जारी, 9 उम्मीदवारों के नाम सामने

पुडुचेरी बीजेपी ने पुडुचेरी  विधानसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की पहली लिस्ट रिलीज कर दी है। BJP ने पुडुचेरी की 9 सीटों पर कैंडिडेट्स के नाम घोषित किए हैं, जिससे चुनावी सरगर्मी बढ़ गई है। BJP की Central Election Committee की मीटिंग बीते 18 मार्च 2026 को हुई, जिसकी अध्यक्षता पार्टी अध्यक्ष Nitin Nabin ने की। इस मीटिंग में PM Modi, केंद्रीय रक्षा मंत्री Rajnath Singh और केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah समेत कमेटी के अन्य सदस्य भी मौजूद रहे। मन्नादिपेट से प्रत्याशी होंगे पुडुचेरी के गृहमंत्री BJP की तरफ से रिलीज की गई सूची के मुताबिक, पुडुचेरी के गृहमंत्री A. Namassivayam को मन्नादिपेट विधानसभा सीट से सियासी मैदान में उतरेंगे। इसके अलावा, ऊसुदु (एससी) सीट से ई. थीप्पैनथन, राजभवन से वी.पी. रामालिंगम, कालापेट से पी.एम.एल. कल्याणसुंदरम, मुदलियारपेट से ए. जॉनकुमार, तिरुनल्लार से जी.एन.एस. राजशेखरन, मनावेली से एंबलम आर. सेल्वम, माहे सीट से ए. दिनेशन और नेरावी टी.आर. पट्टिनम से टीकेएसएम मीनाक्षीसुंदरम को टिकट दिया गया है। चुनावी तैयारियों को BJP ने दी धार पार्टी के उम्मीदवारों की इस लिस्ट से साफ है कि बीजेपी ने लोकल नेताओं पर विश्वास जताते हुए संतुलित उम्मीदवारों का चुनाव किया है। उम्मीदवारों के नामों के ऐलान से BJP ने अपनी स्ट्रैटेजी को स्पष्ट कर दिया है। अब सभी की नजरें दूसरे दलों की लिस्ट पर टिकी हुई हैं, क्योंकि पुडुचेरी में इस बार मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। बीजेपी ने यह लिस्ट जारी करने के साथ ही अपनी चुनावी तैयारियों को धार दे दी है। आने वाले दिनों में यहां चुनाव प्रचार और तेज होने वाला है। पुडुचेरी में 9 अप्रैल को विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे और 4 मई को वोटों की गिनती की जाएगी। विधानसभा सीट उम्मीदवार का नाम मन्नादिपेट ए. नमस्सिवयम ऊसुदु (एससी) ई. थीप्पैनथन राजभवन वी.पी. रामालिंगम कालापेट पी.एम.एल. कल्याणसुंदरम मुदलियारपेट ए. जॉनकुमार तिरुनल्लार जी.एन.एस. राजशेखरन मनावेली एंबलम आर. सेल्वम माहे ए. दिनेशन नेरावी टी.आर. पट्टिनम टीकेएसएम मीनाक्षीसुंदरम    

हल्द्वानी में बोले राजनाथ सिंह: पश्चिम एशिया संकट का हल सिर्फ संवाद और कूटनीति

 हल्द्वानी (नैनीताल) रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि पश्चिम एशिया का संकट भारत के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ । इस स्थिति में भारत ने अपना पक्ष मजबूती से रख रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा है कि यह गंभीर समस्या है। इसका समाधान युद्ध का माध्यम से नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति के जरिये ही निकलेगा। यही सबसे अच्छा जरिया ही है। इस बारे में जनसभा में इस बारे में लोगों से समर्थन भी मांगा। शनिवार को जन-जन की सरकार चार साल बेमिसाल कार्यक्रम के तहत एमबी इंटर कालेज मैदान में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा कि पीएम मोदी ने जिस करिश्माई तरीके से भारत का मस्तक ऊंचा किया है। उसकी सराहना जितनी की जाए, कम है। पहले भारत की बातों को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया जाता था लेकिन आज का भारत की बात को सारी दुनिया कान खोलकर सुनती है। यह गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि दुनिया में जिस तरह का संकट चल रहा है। ऐसे में हो सकता है कि यहां पर ऊर्जा व खाद संकट पैदा हो जाए। पूरी दुनिया के प्रभावित होने पर भारत भी प्रभावित हो सकता है। अभी तक पीएम ने अपनी सूझबूझ से उस संकट में भारत को नहीं फंसने दिया है लेकिन भविष्य में क्या होगा। कुछ नहीं कहा जा सकता है। रक्षा मंत्री ने कहा कि उत्तराखंड की धरती यह कहना चाहता हूं कि मोदी की ओर से वैश्विक संकट को दूर करने के लिए जो भी उनके द्वारा कोशिश की जा रही है। उत्तराखंडवासियों की ओर से भी उसका समर्थन किया जाना चाहिए।  

US के बैन हटाने के बाद, क्या भारत फिर से ईरानी तेल खरीदेगा? समंदर में है विशाल भंडार

 नई दिल्‍ली अमेरिका ने कच्‍चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को रोकने के लिए ईरानी तेल से प्रतिबंध हटा दिया है. अब ये तेल एशिया के देशों में आसानी से जा सकते हैं. समंदर के बीच ईरानी तेल का बड़ा भंडार है.  खबर है कि भारत की रिफाइनरियां इसे खरीदने के लिए योजना बना रही हैं. पहले ईरानी तेल सिर्फ चीन द्वारा खरीदे जाते थे, लेकिन बैन हटने के बाद अब भारत भी आ सकते हैं।  रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, व्‍याप‍ारियों ने शनिवार को बताया कि अमेरिका-इजरायल वॉर के कारण ईरान पर लगे एनर्जी संकट को कम करने के लिए अमेरिका द्वारा अस्‍थायी तौर से प्रतिबंध हटाए जाने के बाद भारतीय रिफाइनरियां ईरानी तेल की खरीद फिर से शुरू करने की योजना बना रही हैं, जबकि एशिया के अन्य हिस्सों में रिफाइनरियां भी इस तरह के कदम पर विचार कर रही हैं।  ईरानी तेल खरीदने के लिए निर्देश का इंतजार  रिपोर्ट में कहा गया है कि तीन भारतीय रिफाइनर्स सोर्स ने कहा कि वे ईरानी तेल खरीदेंगे और भुगतान की शर्तों पर सरकार के निर्देश का इंतजार कर रहे हैं. रॉयटर्स का कहना है कि भारत में कच्‍चे तेल का भंडार अन्‍य बड़े एशियाई देशों की तुलना में काफी कम है. अमेरिका ने हाल ही में रूसी तेल से भी बैन हटाया है, जिसके बाद भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की बुकिंग में तेजी दिखाई।  अमेरिका ने दी है 30 दिनों की छूट  अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने शुक्रवार को समुद्र में मौजूद ईरानी तेल की खरीद के लिए 30 दिनों की प्रतिबंध छूट जारी की है. यह छूट समुद्र में स्थित ईरानी तेल पर होगा, जो 19 अप्रैल तक उतारने तक लागू रहेगा. युद्ध शुरू होने के बाद से यह तीसरी बार है जब अमेरिका ने तेल पर लगे प्रतिबंधों में अस्थायी छूट दी है।  समंदर के बीच इतना बड़ा तेल भंडार  केप्लर के कच्चे तेल बाजार डेटा के अनुसार, लगभग 170 मिलियन या 17 करोड़ बैरल ईरानी कच्चा तेल समुद्र में है, जो मिडिल ईस्‍ट की खाड़ी से लेकर चीन के निकट के जलक्षेत्र तक फैले जहाजों पर मौजूद है. कंसल्टेंसी एनर्जी एस्पेक्ट्स ने 19 मार्च को अनुमान लगाया कि पानी पर 13 करोड़ से 14 करोड़ बैरल ईरानी तेल मौजूद है, जो मिडिल ईस्‍ट के 14 दिनों के उत्‍पादन के बराबर है।  एशिया अपनी कच्चे तेल की आपूर्ति का 60% हिस्सा मिडिल ईस्‍ट से मंगाता है और इस महीने स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने से पूरे क्षेत्र की रिफाइनरियों को कम दरों पर काम करने और ईंधन निर्यात में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। 

पाकिस्तान में शिया-सुन्नी विवाद के बीच मुनीर की सांसें फूलीं, उलेमाओं से मिले

इस्लामबाद  ईरान-इजरायल युद्ध के बीच पाकिस्तान में शिया-सुन्नी तनाव की आग भड़कने की आशंका बढ़ गई है। ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर शिया विरोध प्रदर्शन और हिंसा भड़क उठी थी, जिसने देश के अंदर सांप्रदायिक संतुलन को हिला दिया है। इस संवेदनशील स्थिति में पाकिस्तान के आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने शिया उलेमाओं से मुलाकात की, लेकिन यह बैठक विवादों में घिर गई। रमजान के दौरान इफ्तार के मौके पर रावलपिंडी में हुई इस बैठक में मुनीर ने कथित तौर पर शिया धर्मगुरुओं से कहा कि अगर उन्हें ईरान से इतनी मोहब्बत है, तो वे ईरान चले जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि 'कायदे आजम जिन्ना खुद शिया थे', लेकिन उनका मुख्य जोर इस बात पर था कि किसी दूसरे देश की घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा या अशांति बर्दाश्त नहीं की जाएगी। हालांकि, शिया समुदाय के कुछ नेताओं और सोशल मीडिया पर इस बयान को अपमानजनक बताया जा रहा है। कई रिपोर्टों में दावा किया गया कि मुनीर ने बैठक में एकतरफा मॉनोलॉग दिया, उलेमाओं को बोलने का मौका नहीं दिया और अचानक चले गए। इससे शिया समुदाय में रोष बढ़ा है और कुछ धार्मिक नेताओं ने इसे एंटी-शिया एजेंडा करार दिया है। बेहद मुश्किल कूटनीतिक राह पर पाकिस्तान पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका में जारी जंग के बीच पाकिस्तान एक बेहद मुश्किल कूटनीतिक राह पर चल रहा है। सऊदी अरब के साथ गहरे रणनीतिक व रक्षा संबंध, पुरानी भू-राजनीतिक वफादारी और आर्थिक निर्भरता के कारण पाकिस्तान पर यह बाहरी दबाव है कि अगर युद्ध और भीषण होता है तो वह अपने पारंपरिक खाड़ी सहयोगी का समर्थन करे। वहीं दूसरी ओर, देश की आंतरिक सांप्रदायिक संवेदनशीलता और घरेलू सुरक्षा चिंताओं के कारण किसी भी पक्ष का खुलकर समर्थन करना जोखिम भरा हो गया है। इसी वजह से पाकिस्तान सतर्क तटस्थता की नीति अपनाने को मजबूर है, जिसे बनाए रखना अब उसके लिए कठिन होता जा रहा है। इन तमाम दबावों और दुविधाओं की झलक पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की हालिया टिप्पणियों में स्पष्ट रूप से देखने को मिली है। शिया उलेमाओं के साथ सेना प्रमुख की बैठक जनरल असीम मुनीर ने हाल ही में अहल-ए-तशीह (शिया) समुदाय के धार्मिक विद्वानों और उलेमाओं से मुलाकात की। इस बातचीत का मुख्य फोकस राष्ट्रीय एकता, सांप्रदायिक सौहार्द और बढ़ती क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के बीच पाकिस्तान के कूटनीतिक रुख पर था। इस दौरान मुनीर का मुख्य संदेश बिल्कुल स्पष्ट था- सबसे पहले तो पाकिस्तान है। 'हम पहले मुसलमान और पाकिस्तानी हैं, फिर शिया-सुन्नी' ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष को लेकर शिया समुदाय की चिंताओं को संबोधित करते हुए, जनरल मुनीर ने इससे जुड़ी भावनात्मक और धार्मिक संवेदनाओं को स्वीकार किया। लेकिन, उन्होंने धार्मिक नेताओं से राष्ट्रीय स्थिरता को सर्वोपरि रखने का आग्रह किया। उन्होंने कहा- हम पहले मुसलमान और पाकिस्तानी हैं; उसके बाद शिया या सुन्नी। उनका संदेश था कि सांप्रदायिक पहचान को राष्ट्रीय हितों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। मुनीर ने पाकिस्तान की डेमोग्राफी का जिक्र करते हुए कहा कि भले ही देश में सुन्नी बहुसंख्यक हैं, लेकिन आबादी का लगभग 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा शिया है। उलेमाओं से बात करते हुए उन्होंने कहा- मैं शिया समुदाय की भावनाओं को समझता हूं, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि विदेशों में हो रहे घटनाक्रमों का गुस्सा पाकिस्तान में घरेलू अशांति में नहीं बदलना चाहिए। आम पाकिस्तानी को क्यों भुगतना चाहिए? सेना प्रमुख ने सख्त चेतावनी दी कि पाकिस्तान अपनी सीमाओं के बाहर के संघर्षों के कारण होने वाली आंतरिक अस्थिरता को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकता। उन्होंने कहा- पाकिस्तान अन्य देशों के मुद्दों, नीतियों और संघर्षों के कारण होने वाले दंगों का बोझ नहीं उठा सकता। एक आम पाकिस्तानी को इसका खामियाजा क्यों भुगतना चाहिए? उन्होंने कहा कि धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने सभी संप्रदायों के मौलवियों और उलेमाओं से एकता, सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकजुटता को बढ़ावा देने तथा आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में रचनात्मक और सकारात्मक भूमिका निभाने की अपील की। सऊदी अरब के साथ रणनीतिक संबंधों की पुष्टि एक तरफ जहां उन्होंने देश के भीतर शांति की अपील की, वहीं दूसरी तरफ सेना प्रमुख ने सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के गहरे रणनीतिक और रक्षा संबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने दोनों देशों को करीबी रक्षा साझेदार बताया, जो पुराने सुरक्षा सहयोग और आपसी प्रतिबद्धताओं से बंधे हुए हैं। मुनीर ने मक्का और मदीना में इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थलों (हरमैन शरीफैन) के 'रक्षक' के रूप में इस्लामाबाद की भूमिका का भी जिक्र किया। यह बयान पाकिस्तान की रणनीतिक सोच में सऊदी अरब के साथ रिश्ते के धार्मिक और प्रतीकात्मक महत्व को दर्शाता है। पाकिस्तान की दोहरी चुनौती सेना प्रमुख का यह दोहरा संदेश इस्लामाबाद की मौजूदा दुविधा को सटीक रूप से दर्शाता है। बाहरी दबाव: सैन्य साझेदारी, वित्तीय निर्भरता और खाड़ी देशों (विशेषकर सऊदी अरब) की उम्मीदें। आंतरिक कमजोरियां: सांप्रदायिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती, राजनीतिक अस्थिरता, और किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष में एक पक्ष लेने पर देश में सांप्रदायिक दंगे भड़कने का सीधा जोखिम। जनरल मुनीर की इन बातों से यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान अपने कूटनीतिक विकल्पों को खुला रखते हुए देश में किसी भी तरह की घरेलू अशांति को पहले ही रोकने की कोशिश कर रहा है। देश के भीतर एकता और संयम की अपील करके और विदेशी मंच पर रणनीतिक संबंधों की पुष्टि करके, पाकिस्तान खुद को बहुत ही सावधानी से स्थापित कर रहा है। 

होर्मुज स्ट्रेट से गुजरेंगे भारतीय झंडे वाले 2 गैस टैंकर, LPG पर मिली गुड न्यूज

 नई दिल्ली दुनिया में जितना भी तेल और गैस समुद्र के रास्ते जाता है, उसका करीब 20 फीसदी सिर्फ एक रास्ते से गुजरता है होर्मुज की खाड़ी. यह एक बहुत ही पतली सी जलधारा है जो ईरान और ओमान के बीच में है. एक तरफ खाड़ी के देश हैं – UAE, कुवैत, सऊदी अरब, इराक. और इन सबका तेल बाहर जाने का एकमात्र समुद्री रास्ता यही है।  अब सोचिए – अगर यह रास्ता बंद हो जाए तो क्या होगा? दुनिया के पांचवें हिस्से का तेल और गैस रुक जाएगा. कीमतें आसमान छू लेंगी. और भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से मंगाते हैं, उन्हें सबसे ज्यादा तकलीफ होगी।  हुआ क्या है अभी? ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जंग छिड़ी हुई है. ईरान ने धमकी दे दी कि जो भी जहाज होर्मुज से निकलने की कोशिश करेगा, उस पर हमला होगा।  बस इतना सुनते ही सैकड़ों जहाज वहीं लंगर डालकर रुक गए. कोई आगे जाने को तैयार नहीं. पिछले 24 घंटों में एक भी तेल का बड़ा जहाज होर्मुज से नहीं गुजरा. यह बहुत बड़ी बात है. मतलब रास्ता व्यावहारिक रूप से बंद पड़ा है।  भारत का क्या हाल है? भारत के 22 जहाज इस वक्त खाड़ी के अंदर फंसे हुए हैं. न आगे जा पा रहे हैं, न वापस आ पा रहे हैं. इनमें दो जहाज खास तौर पर चर्चा में हैं. पाइन गैस जिसे आईओसी यानी इंडियन ऑयल ने किराए पर लिया है. जग वसंत – जिसे बीपीसीएल ने किराए पर लिया है।  ये दोनों LPG टैंकर हैं. मतलब इनमें रसोई गैस जैसा ईंधन भरा है जो भारत के घरों तक पहुंचना है. ये दोनों जहाज UAE के शारजाह के पास लंगर डाले खड़े हैं. शनिवार को निकलने की तैयारी में बताए जा रहे हैं।  मोदी सरकार क्या कर रही है? भारत सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है. विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि भारत चाहता है कि उसके जहाज सुरक्षित और बिना रोक-टोक के निकल सकें।  और सबसे अहम बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद दूसरे देशों के नेताओं से बात कर रहे हैं ताकि इन जहाजों का सुरक्षित रास्ता निकाला जा सके. यह कूटनीति का खेल है. प्रधानमंत्री की कोशिश है कि ईरान तक यह बात पहुंचे कि भारत के जहाजों को जाने दिया जाए।  खबर के मुताबिक पिछले हफ्ते ईरान ने दो भारतीय LPG जहाजों को होरमुज से गुजरने दिया था. यानी ईरान ने भारत को थोड़ी रियायत दी. यह इसलिए भी समझ में आता है क्योंकि भारत और ईरान के रिश्ते पहले से ही ठीक-ठाक रहे हैं, और भारत ने हमेशा इस जंग में किसी एक तरफ खड़े होने से परहेज किया है।  पाकिस्तान वाला दिलचस्प किस्सा इस पूरी खबर में एक बहुत दिलचस्प बात और है. डेटा से पता चला है कि पाकिस्तान जाने वाला एक तेल का जहाज हाल ही में होर्मुज से गुजर गया. इसका मतलब यह है कि ईरान ने पूरी तरह रास्ता बंद नहीं किया है. वो चुन-चुनकर कुछ देशों को जाने दे रहा है. जिनसे उसके संबंध ठीक हैं, या जो उसके लिए काम के हैं – उन्हें रास्ता मिल रहा है।  यह एक तरह का दबाव का हथियार है. ईरान कह रहा है, "देखो, मैं सबको रोक सकता हूं, लेकिन जिसे चाहूं उसे जाने भी दे सकता हूं।  असली मुद्दा क्या है? यह सिर्फ कुछ जहाजों की कहानी नहीं है. यह उस रास्ते की कहानी है जिससे भारत का रसोई गैस, पेट्रोल और डीजल आता है. अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहा तो भारत में गैस और तेल की कमी हो सकती है. कीमतें बढ़ सकती हैं और आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। 

लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन व्यापार शुरू होगा 6 साल बाद, गलवान झड़प के बाद था स्थगित

पिथौरागढ़  उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत और चीन के बीच बॉर्डर ट्रेड छह साल बाद फिर से शुरू होने जा रहा है। यह ट्रेड सेशन आमतौर पर जून से सितंबर तक चलता है। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट आशीष भटगाई ने बताया कि केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। विदेश मंत्रालय की ओर से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) जारी होने के बाद यह प्रक्रिया आगे बढ़ी है। लिपुलेख दर्रे के जरिए तिब्बत के साथ बॉर्डर ट्रेड लंबे अंतराल के बाद 1992 में फिर शुरू हुआ था। हालांकि 2019 में COVID-19 महामारी और गलवान झड़प के कारण इसे बंद कर दिया गया था। पिछले साल 18-19 अगस्त को चीनी विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान भारत-चीन ने रुपए और युआन में ट्रेड करने का फैसला किया था। अब तक यह ‘वस्तु विनिमय’ आधारित यानी सामान के बदले सामान का लेन-देने होता था। लिपुलेख दर्रा औपचारिक व्यापारिक मार्ग ब्रिटिश काल में भी लिपुलेख दर्रा व्यापार और तीर्थयात्रा का प्रमुख केंद्र था। तिब्बत से व्यापारी नमक, बोराक्स, पशु उत्पाद, जड़ी-बूटियां और स्थानीय सामान बेचने आते हैं, जबकि भारतीय व्यापारी बकरी, भेड़, अनाज, मसाले, गुड़, मिश्री, गेहूं वहां ले जाते हैं। भारत-चीन के बीच साल 2005 में 12 करोड़ रुपए का आयात और 39 लाख रुपए का निर्यात हुआ था। साल 2018 में 5.59 करोड़ रुपए का आयात और 96.5 लाख रुपए का निर्यात हुआ था। नेपाल ने समझौते पर आपत्ति जताई थी लिपुलेख के साथ शिपकी ला और नाथु ला दर्रों से भी कारोबार बहाल करने का फैसला लिया गया था। हिमालय के तीन दर्रों से शुरू होने जा रहा भारत-चीन व्यापार पहली बार पूरी तरह सड़क के जरिए होगा। यहां मनी एक्सचेंज भी खुलेगा। हालांकि नेपाल ने इस समझौते पर आपत्ति जताई थी। उसका कहना है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी उसके क्षेत्र का हिस्सा हैं। उसने भारत और चीन से इस इलाके में कोई एक्टिविटी न करने की अपील की है। केंद्र ने राज्य सरकार से व्यवस्था करने को कहा विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद बर्धन को लेटर लिखकर हिमालयी दर्रे के जरिए व्यापार बहाल करने का अनुरोध किया है। लेटर में बताया गया है कि गृह मंत्रालय और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय से भी मंजूरी मिल चुकी है। प्रशासन ने ट्रेड पास जारी करने, करेंसी एक्सचेंज के लिए बैंकों की व्यवस्था, कस्टम विभाग की तैनाती और धारचूला प्रशासन को विस्तृत एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसमें व्यापारियों के लिए ट्रांजिट कैंप, संचार, बैंकिंग, सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाएं शामिल होंगी। व्यापारियों ने फैसले का स्वागत किया उत्तराखंड के पिथौरागढ़ सीमांत व्यापार संगठन के अध्यक्ष जीवन सिंह रोंकाली ने इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इससे व्यापारियों को 2019 से तकलाकोट (तिब्बत) के वेयरहाउस में रखे सामान को वापस लाने का अवसर मिलेगा।

DGCA के फैसले के खिलाफ इंडिगो और एअर इंडिया का विरोध, महंगे टिकटों की चेतावनी

 नई दिल्ली आपने कभी फ्लाइट बुक की होगी तो देखा होगा कि टिकट का दाम अलग होता है और सीट चुनने का चार्ज अलग. विंडो सीट चाहिए? पैसे दो. आगे की सीट चाहिए? और पैसे दो. परिवार के साथ बैठना है? उसके लिए भी पैसे. यह एक तरह से एयरलाइंस की अलग कमाई है। अब सरकार ने कहा, "नहीं. हर फ्लाइट की 60 फीसदी सीटें यात्रियों को फ्री में दो. सीट चुनने के पैसे मत लो." और इस पर एयरलाइंस भड़क गई हैं।  किसने क्या कहा? सरकार का यह फैसला MoCA यानी नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने लिया. और 18 मार्च 2026 को इसका ऐलान कर दिया. इसके खिलाफ FIA यानी भारतीय एयरलाइंस महासंघ ने MoCA के सचिव समीर सिन्हा को चिट्ठी लिखी है. FIA में कौन-कौन है? इंडिगो, एअर इंडिया और स्पाइसजेट. यानी देश की तीन सबसे बड़ी एयरलाइंस।  एयरलाइंस का तर्क क्या है? एयरलाइंस का कहना है कि यह फैसला उल्टा पड़ेगा. उनका कहना है कि पैसा तो यात्री ही देगा. एयरलाइंस ने साफ कहा, "अगर हम सीट का चार्ज नहीं लेंगे, तो वो पैसा कहीं से तो आएगा. और वो आएगा टिकट के दाम बढ़ाकर।  इसपर सोचने वाली बात है कि अभी आप 4,000 में टिकट लेते हैं और 300 में मनपसंद सीट. कुल 4,300. कल को हो सकता है टिकट ही 4,500 का हो जाए और सीट भले फ्री हो. आपका फायदा क्या हुआ? FIA का कहना है कि जो लोग सस्ती फ्लाइट लेते हैं. बजट ट्रैवलर, परिवार, बार-बार उड़ने वाले लोग उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान होगा. क्योंकि टिकट महंगे होंगे और उनकी जेब पर सीधा असर पड़ेगा।  एयरलाइंस की अपनी पहचान खत्म होगी अभी हर एयरलाइन अपने तरीके से सेवा देती है. कोई सस्ती सीट देता है, कोई ज्यादा लेगरूम देता है, कोई बेहतर खाना देता है. इससे यात्री अपनी पसंद की एयरलाइन चुन सकते हैं. अगर सब एक जैसे नियमों में बंध जाएंगे तो यह अलगप्पन खत्म हो जाएगा।  एयरलाइंस ने एक और बड़ा सवाल उठाया FIA ने यह भी कहा कि DGCA यानी जो सरकारी संस्था हवाई यातायात देखती है उसे कानूनी तौर पर यह अधिकार ही नहीं है कि वो सीट चार्ज जैसी अलग सेवाओं के दाम तय करे।  पहले की अदालती फैसलों का हवाला देते हुए कहा, "यह आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता." यानी एयरलाइंस सिर्फ विरोध नहीं कर रहीं वो यह भी कह रही हैं कि यह आदेश कानूनी रूप से सही नहीं है।  सबसे बड़ी शिकायत – बिना पूछे फैसला एयरलाइंस की सबसे बड़ी नाराजगी यह है कि यह आदेश बिना किसी से पूछे आ गया. FIA ने चिट्ठी में लिखा, "18 मार्च को प्रेस रिलीज से पहले हमें कुछ नहीं बताया गया. न कोई बैठक हुई, न कोई सलाह ली गई." यानी एक दिन अखबार में खबर आई और एयरलाइंस को पता चला कि सरकार ने नया नियम बना दिया।  एयरलाइंस की मांग क्या है? FIA ने सरकार से साफ कहा है कि यह आदेश वापस लीजिए. और यह भी चेताया कि अगर यह चलता रहा तो भविष्य में सरकार किसी भी सेवा के दाम में दखल दे सकती है. इससे एयरलाइंस को अपना कारोबार चलाना मुश्किल हो जाएगा। 

अमेरिकी अधिकारी ने किया बड़ा ऐलान, ‘3-4 दिन में बंदरगाहों तक पहुंचेगा तेल-गैस

नई दिल्‍ली अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग ने पूरी दुनिया के लिए संकट पैदा कर दिया है. इस बीच, अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने शुक्रवार को कहा कि समुद्र में फंसे ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध हटाने से तीन-चार दिनों के भीतर एशिया तक आपूर्ति पहुंच जाएगी।  यह बयान ऐसे समय में आया है, जब अमेरिका ने समुंद्र में फंसे ईरानी तेल से प्रतिबंध हटा दिया है और 30 दिनों के लिए इन प्रतिबंधों से ढील दी है. इससे पहले वित्त सचिव स्कॉट बेसेंट ने गुरुवार को कहा था कि अमेरिका जल्द ही समुद्र में टैंकरों में फंसे ईरानी तेल पर लगे प्रतिबंध हटा सकता है. इस कदम का उद्देश्य ईरान द्वारा स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने के कारण बढ़ती कीमतों को कम करना है।  फॉक्स बिजनेस नेटवर्क के साथ एक इंटरव्‍यू में क्रिस राइट ने कहा कि कुछ ही दिनों में, तीन या चार दिनों के भीतर, वह तेल बंदरगाहों पर पहुंचना शुरू हो जाएगा, जिसके बाद तेल की बढ़ती कीमतों को कम किया जा सकेगा. उन्‍होंने कहा कि मौजूदा प्रतिबंधों के कारण ईरान की कच्चे तेल के निर्यात की क्षमता सीमित हो गई है, जिससे तेल का भंडार बाजारों तक पहुंच नहीं पा रहा है।  ईरान से प्रतिबंध हटाया  अमेरिका ने समुद्र में फंसे ईरानी तेल टैंकरों को छूट दी है. अब ये तेल टैंकर एशिया के बंदरगाहों पर आसानी से पहुंच सकते हैं. अमेरिका ने 1 महीने यानी 19 अप्रैल तक इसमें छूट दी है।  गौरलब है कि वैश्विक तेल व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण जलमार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास ईरान की कार्रवाइयों के बाद कीमतों में भारी उछाल आया है. प्रतिबंध हटाने से आपूर्ति की समस्‍या खत्‍म हो सकती है।  गंभीर संकट का समाना कर सकती है दुनिया ऊर्जा अधिकारियों ने बाजार के दबाव को कम करने और इन आपूर्तियों पर निर्भर अन्य क्षेत्रों के लिए ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए तेल की सप्‍लाई बनाए रखने पर जोर दिया है. इस बीच, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के प्रमुख फातिह बिरोल ने कहा है कि खाड़ी देशों से तेल और गैस की आपूर्ति बहाल करने में 6 महीने तक का समय लग सकता है. फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्‍यू में बिरोल ने चेतावनी दी कि दुनिया इतिहास के सबसे गंभीर ऊर्जा संकट का सामना कर सकती है।  इसके अलावा, सऊदी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान से संबंधित आपूर्ति में रुकावटें अप्रैल के अंत तक जारी रहती हैं, तो तेल की कीमत 180 डॉलर प्रति बैरल या उससे भी अधिक हो सकती है. अनुमानों के अनुसार, 180 डॉलर प्रति बैरल की दर पर अमेरिकियों को 7 डॉलर प्रति गैलन से अधिक भुगतान करना होगा।