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अमेरिका में लापता भारतीय छात्र का हाल, पुलिस चेतावनी: जीवन भी हो सकता है खतरे में

न्यूयॉर्क अमेरिका में भारतीय छात्रों की मौत और लापता होने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। हाल ही में अमेरिका के बर्कले में 22 साल के भारतीय छात्र साकेत श्रीनिवासैया लापता हो गए हैं। अमेरिकी पुलिस डिपार्टमेंट का कहना है कि साकेत की तलाश की जा रही है। अमेरिकी पुलिस ने उनकी जान को खतरा भीबताया है। मंगलवार की शाम 5 बजे उन्हें आखिरी बार देखा गया था। पुलिस ने बताया है कि साकेत की लंबाई 6 फीट 1 इंच थीऔर उनका वजन 72 किलो के आसपास था। उनकी आंखें भूरी हैं और बाल छोटे हैं। पुलिस ने इसके अलावा ज्यादा जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। सैन फ्रांसिस्को में कॉन्सुलेट जनरल ऑफ इंडिया ने बयान जारी करते हुए घटना पर चिंता जताई है। बयान में कहा गया गया है कि भारतीय कॉन्सुलेट जनरल को साकेत श्रीनिवासैया के गायब होने की चंता है। वह कर्नाटक के रहने वाले हैं और यूसी बर्कली में पोस्टग्रैजुएट स्टूडेंट हैं। कॉन्सुलेट उनके परिवार और यहां स्थानीय प्रशासन के संपर्क में है। श्रीनिवासैया बर्कले की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया में केमिकल ऐंड बायोमॉलीकुलर इंजीनयिरिंग डिपार्टमेंट में पोस्ट ग्रैजुएशन कर रहे थे। उनकी लिंक्ड इन प्रोफाइल के मुताबिक एमएस पीडीपी 26 प्रोग्राम के तहत उन्होंने यहां ऐडमिशन लिया था। उन्होंने आईआईटी मद्रास से 2025 में अपना बीटेक पूरा किया था। इसके बाद विदेश में पढ़ने का मौका मिला और उन्हें यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफॉर्निया में ऐडमिशन मिल गया। बता दें कि विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्र के साथ यह कोई पहली घटना नहीं है। अकसर अमेरका और अन्य देशोंमें भारतीय छात्रों के साथ नस्लीय भेदभाव के मामले सामने आते रहते हैं। हाल ही में लोकसभा में एआईएमआईएम असुद्द्दीन ओवैसी ने विदेश में पढ़ने वाले छात्रों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया था। उनको जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा था कि सरकार विदेश में पढऩे वाले भारतीय छात्रों की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है। विदेश में मौजूद भारत के मिशन पूरा ध्यान रखते हैं कि भारतीयों के साथ बुरा व्यवहार ना होने पाए। बता दें कि श्रीनिवासैया के साथ रहने वाले बनेतस सिंह ने उनके गायब होने के बाद मदद के लिए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। इसमें लिखा गया था कि श्रीनिवासैया 9 फरवीर से लापता हैं। आखिरी बार बर्कले हिल्स के बाद उन्हें देखा गया था। अगर किसी को भी उनके बारे में पता चलता है तो जानकारी दे। उन्होंने कहा, यह मेरे लिए बहुत मुश्किल समय है अगर कोई भी मदद कर सकता है तो कृपया संपर्क करे।

कैंपस में बवाल क्यों? UGC के इक्विटी कार्ड पर उभरी आग

नई दिल्ली यूजीसी के ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ ने उच्च शिक्षा जगत को 2 हिस्सों में बांट दिया है. इन दिनों दिल्ली, लखनऊ, पटना और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में जो चल रहा है, उससे पता चलता है कि यह विवाद अब जमीनी संघर्ष बन चुका है. एक तरफ नियमों को ‘ऐतिहासिक’ मानकर समर्थन में मार्च निकाले जा रहे हैं तो दूसरी तरफ इसे ‘पूर्वाग्रह से ग्रसित’ बताकर इसके खिलाफ अदालतों और सड़कों पर मोर्चा खोला गया है. प्रशासनिक स्तर पर यूजीसी का तर्क है कि कैंपस में बढ़ते मानसिक उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए अब तक के मौजूद तंत्र (जैसे एंटी-रैगिंग सेल) नाकाफी साबित हुए हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में विरोध कर रहे संगठनों का मानना है कि इन नियमों की आड़ में एक खास वर्ग को लक्षित किया जा रहा है. लखनऊ विश्वविद्यालय में समर्थन में उतरे छात्रों पर हुई पुलिसिया सख्ती ने इस पूरे मामले को और भी संवेदनशील बना दिया है. इस विवाद की हर परत को यहां विस्तार से समझिए. समर्थन का पक्ष: क्यों जरूरी हैं यूजीसी के नियम? नियमों का समर्थन कर रहे छात्र संगठनों (जैसे AISA, SFI, NSUI और अन्य दलित-पिछड़ा वर्ग संगठन) का तर्क है कि ‘संस्थागत हत्याओं’ (Institutional Murders) को रोकने के लिए सख्त कानूनों की जरूरत है.     बढ़ती शिकायतों का सच: यूजीसी के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और प्रताड़ना की शिकायतों में 118% की वृद्धि दर्ज की गई है.     स्वतंत्र जांच तंत्र: समर्थकों का कहना है कि वर्तमान में भेदभाव की जांच वही प्रशासन करता है जिस पर आरोप होता है. नए नियम बाहरी निगरानी की वकालत करते हैं, जो निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करेगा.     लखनऊ का ‘समता संवर्धन मार्च’: लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों ने मांग की कि ‘उच्च शिक्षा सामाजिक न्याय आयोग’ का गठन हो, जिससे फेलोशिप में देरी और पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन (Biased Evaluation) जैसे मुद्दों पर कानूनी जवाबदेही तय की जा सके. विरोध का पक्ष: क्या हैं आशंकाएं? सवर्ण समाज समन्वय समिति (Coordination Committee) और कई ‘सामान्य श्रेणी’ के छात्र संगठनों ने इसे ‘काला कानून’ करार दिया है. उनके विरोध के मुख्य बिंदु नीचे लिखे हैं:     सुरक्षात्मक प्रावधानों का अभाव: विरोधियों का आरोप है कि 2025 के शुरुआती ड्राफ्ट में ‘झूठी शिकायत’ करने वालों पर दंड का प्रावधान था, जिसे आखिरी नोटिफिकेशन से हटा दिया गया है. इससे निर्दोष छात्रों और शिक्षकों को फंसाए जाने का डर है.     प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: नए नियमों में ‘सबूत का भार’ (Burden of Proof) आरोपी पर डाल दिया गया है. यानी, अगर किसी पर भेदभाव का आरोप लगता है तो उसे खुद को निर्दोष साबित करना होगा, जो भारतीय दंड संहिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है.     भेदभाव की ‘अस्पष्ट’ परिभाषा: विरोधियों का तर्क है कि ‘अपमानजनक व्यवहार’ की परिभाषा इतनी व्यापक और अस्पष्ट रखी गई है कि सामान्य शैक्षणिक चर्चाओं को भी इसके दायरे में लाकर किसी का करियर बर्बाद किया जा सकता है. कैंपस की मौजूदा स्थिति: लखनऊ से दिल्ली यूनिवर्सिटी तक का हाल हालिया घटनाक्रमों ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. लखनऊ विश्वविद्यालय में समर्थन में उतरे छात्रों को जिस तरह पुलिस ने घसीटकर हिरासत में लिया, उसने समर्थकों का आक्रोश बढ़ा दिया है. वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय में सवर्ण संगठनों ने यूजीसी मुख्यालय का घेराव कर चेतावनी दी है कि अगर इन नियमों को वापस नहीं लिया गया तो देशव्यापी आंदोलन होगा. कई प्रोफेसर ने भी अपनी पहचान गुप्त रखते हुए कहा है कि ये नियम कैंपस में ‘मुक्त संवाद’ (Free Speech) का माहौल खत्म कर सकते हैं. यूजीसी विवाद: इन 5 धाराओं ने कैंपस को ‘अखाड़ा’ बना दिया यूजीसी इक्विटी कार्ड विवाद समझने के लिए आपको वो 5 धाराएं भी पता होनी चाहिए, जिनकी वजह से विभिन्न यूनिवर्सिटी में माहौल गर्माया हुआ है.     धारा 4.2: ‘भेदभाव’ की विस्तृत और अस्पष्ट परिभाषा- इस धारा के तहत ‘जातिगत भेदभाव’ की परिभाषा को इतना व्यापक बना दिया गया है कि इसमें किसी छात्र की शैक्षणिक आलोचना, उपहास या उसे किसी समूह से बाहर रखना भी शामिल है. विवाद की वजह: विशेषज्ञों का मानना है कि ‘उपहास’ या ‘भेदभावपूर्ण व्यवहार’ व्यक्तिपरक (Subjective) हो सकते हैं. विरोधियों को डर है कि सामान्य शैक्षणिक चर्चाओं या चुटकुलों को भी इस धारा के तहत ‘अपराध’ की श्रेणी में लाकर प्रोफेसरों और छात्रों को लक्षित किया जा सकता है.     धारा 6.1 (ख):आरोपी पर ‘सबूत का भार’- आमतौर पर किसी भी कानून में शिकायतकर्ता को आरोप साबित करना होता है, लेकिन इस क्लॉज ने इसे पलट दिया है. विवाद की वजह: अगर किसी छात्र ने भेदभाव का आरोप लगाया है तो आरोपी छात्र या शिक्षक को साबित करना होगा कि उसने ऐसा नहीं किया. इसे ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) के खिलाफ माना जा रहा है.. क्योंकि यह आरोपी को तब तक दोषी मानता है, जब तक वह अपनी बेगुनाही साबित न कर दे.     धारा 8.4: झूठी शिकायत पर दंड के प्रावधान का हटना- प्रारंभिक ड्राफ्ट (2025) में प्रावधान था कि अगर कोई दुर्भावनापूर्ण तरीके से झूठी शिकायत दर्ज कराता है तो उस पर कार्रवाई होगी. लेकिन 2026 की अंतिम अधिसूचना में यह सुरक्षा कवच हटा दिया गया है. विवाद की वजह: विरोध कर रहे छात्र संगठनों का तर्क है कि इस क्लॉज के हटने से व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए झूठी शिकायतों की बाढ़ आ सकती है और आरोपी के पास इससे बचने का कोई कानूनी रास्ता नहीं बचेगा.     धारा 10.2: स्वतंत्र ‘लोकपाल’ (Ombudsman) और बाहरी हस्तक्षेप- यह धारा हर विश्वविद्यालय क स्वतंत्र ‘समान अवसर सेल’ और एक बाहरी लोकपाल नियुक्त करने का निर्देश देती है, जो संस्थान के प्रशासन का हिस्सा नहीं होगा. विवाद की वजह: समर्थकों (जैसे लखनऊ के प्रदर्शनकारी छात्र) के लिए यह सबसे मजबूत बिंदु है क्योंकि यह निष्पक्षता सुनिश्चित करता है. लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन इसे अपनी ‘स्वायत्तता’ (Autonomy) पर हमला मान रहा है क्योंकि अब आंतरिक मामलों का फैसला बाहरी व्यक्ति करेगा.     धारा 12.1: फंड में कटौती और ‘डी-रिकग्निशन’ की शक्ति- यह धारा यूजीसी को अधिकार देती है कि अगर कोई संस्थान इन नियमों को सख्ती से लागू नहीं करता … Read more

बॉर्डर पर बढ़ी भारत की ताकत, पीएम मोदी ने किया इमरजेंसी लैंडिंग स्ट्रिप का उद्घाटन

असम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दिवसीय असम दौरे पर पहुंचे हैं। उन्होंने डिब्रूगढ़ में मोरन बाइपास पर आपातकाली लैंडिंग सुविधा का उद्घाटन किया। उनका विमान इसी हाइवे पर उतारा गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असम के दौरे पर पहुंचे हैं। उनका विमान चीन की सीमा के पास असम के डिब्रूगढ़ में बने पहले इमर्जेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) पर उतरा। इसके बाद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनेवाल ने उनका स्वागत किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस एक दिवसीय दौरे के दौरान मोरन बाइपास के पास आपातकालीन लैंडिंग सुविधा (ईएलएफ) सहित कई परियोजनाओं का उद्घाटन कर रहे हैं। चीन के लिए कड़ा संदेश यह पिछले तीन महीने में मोदी का तीसरा असम दौरा है। राज्य में कुछ ही महीनों में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थित में मोरन बाईपास पर फाइटर और ट्रांसपोर्ट विमानों के साथ ही हेलिकॉप्टर ने हवाई प्रदर्शन किए। पूर्वोत्तर के किसी भी राज्य में यह इमरजेंसी लैंडिंग की पहली सुविधा है। इसपर सेना और नागरिक विमान दोनों को टेकऑफ और लैंडिंग की सुविधा मिलेगी। ऐसे में इसे चीन के लिए कड़ा संदेश माना जा रहा है। इस लैंडिंग सुविधा को इंडियन एयरफोर्स के साथ मिलकर तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य इमरजेंसी रिस्पॉन्स के लिए मजबूत तैयारी करना है। प्राकृतिक आपदाओं या फिर पड़ोसी से तनाव की स्थिति में उसका उपयोग रणनीतिक तौर पर किया जा सकेगा। यह फैसिलिटी 40 टन तक के लड़ाकू विमानों और 74 टन तक के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की लैंडिंग और टेकऑफ के लिए बनाया गया है। अन्य पांच जगहों पर भी है ऐसी सुविधा डिब्रूगढ़ में इमर्जेंसी लैंडिग फैसिलिटी पूर्वोत्तर के राज्यों में अपनी तरह की पहली सुविधा है। हालांकि उत्तर प्रदेश के आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे और पूर्वाांचल एक्सप्रेस-वे पर भी ऐसी सुविधा उपलब्ध है। इसके अलावा ओडिशा के बालासोर और आध्र प्रदेश के नेल्लोर मे फैसिलिटी है। हालांकि डिब्रूगढञ में बनाया गया ईएलएफ ज्यादा मायने रखता है क्योंकि यह चीन की सीमा के पास है। प्रधानमंत्री गुवाहाटी में 3,000 करोड़ रुपये की लागत से बने कुमार भास्कर वर्मा सेतु का उद्घाटन करेंगे जो गुवाहाटी को उत्तर गुवाहाटी से जोड़ेगा। छह लेन वाला यह पुल गुवाहाटी और उत्तर गुवाहाटी के बीच निर्बाध संपर्क उपलब्ध कराएगा, क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देगा, भूकंपीय सुरक्षा को बेहतर बनाएगा और राज्य राजधानी क्षेत्र में विकास को गति देगा। मोदी निकटवर्ती लचित घाट से भारतीय प्रबंधन संस्थान-गुवाहाटी (आईआईएम-गुवाहाटी) के अस्थायी परिसर और कृत्रिम मेधा (एआई) सक्षम 'हाइपरस्केल डेटा' केंद्र का भी डिजिटल माध्यम से उद्घाटन करेंगे। मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा ने कहा था कि आईआईएम-गुवाहाटी के उद्घाटन से असम शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाएगा और उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जिनमें अगली पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करने के लिए आईआईटी, आईआईएम, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और अन्य सभी अग्रणी संस्थान होंगे। प्रधानमंत्री इसी स्थल से गुवाहाटी के लिए 100 विद्युत वाहन (ईवी) को भी रवाना करेंगे।  

मेट्रो पिलर का रनिंग ऑटो पर पतन, मुंबई में 4 गंभीर रूप से घायल

मुंबई  देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से डराने वाली खबर सामने आई है. अंडर कंस्‍ट्रक्‍शन मेट्रो के पिलर का एक चलते ऑटोरिक्‍शा पर ग‍िर गया. इस हादसे में 4 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. जानकारी के अनुसार, मुंबई के मुलुंड (पश्चिम) इलाके में शनिवार दोपहर बड़ा हादसा हो गया, जब निर्माणाधीन मेट्रो का एक हिस्सा अचानक ढह गया. यह घटना दोपहर करीब 12:20 बजे एलबीएस रोड पर जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी के पास हुई. BMC के अनुसार, निर्माण कार्य के दौरान सीमेंट से बना मेट्रो पिलर का हिस्सा टूटकर नीचे सड़क पर चल रही एक ऑटो रिक्शा पर गिर पड़ा. हादसे में ऑटो में सवार 3 से 4 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. एक निजी कार भी इस दुर्घटना की चपेट में आ गई. घटना के तुरंत बाद मुंबई फायर ब्रिगेड, पुलिस, मेट्रो स्टाफ, वार्ड कर्मचारी और 108 एंबुलेंस सेवा मौके पर पहुंची और घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया. बता दें कि मुंबई में मेट्रो नेटवर्क लगातार विस्‍तार कर रहा है. मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MMRDA) अब मेट्रो लाइन 2B के मंडाले और चेंबूर के बीच एक अतिरिक्त स्टेशन जोड़ने की योजना बना रही है. प्रस्तावित ‘चेंबूर नाका’ स्टेशन इस रूट पर कनेक्टिविटी और राइडरशिप बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है. यह इलाका शहर के व्यस्त जगहों में से एक है. मुंबई मेट्रो की 23.64 किलोमीटर लंबी लाइन 2B शहर की पूर्व-पश्चिम कनेक्टिविटी को मजबूत करने के उद्देश्य से तैयार की जा रही है. यह लाइन ट्रैफिक जाम की समस्या को कम करने में भी मददगार मानी जा रही है. फिलहाल मंडाले (मानखुर्द) से डायमंड गार्डन (चेंबूर) तक के हिस्से को आंशिक रूप से चालू करने की अनुमति मिल चुकी है। इस सेक्शन में अभी पांच स्टेशन शामिल हैं. नया मेट्रो कॉरिडोर मुंबई मेट्रो की लाइन 2B रूट पर छठा स्टेशन जोड़ा जाएगा. हालांकि, अधिकारियों का मानना है कि केवल पांच स्टेशनों के साथ इस कॉरिडोर को अलग से ऑपरेट करने पर यात्रियों की संख्या कम रह सकती है. वर्तमान में इस सेक्शन में मानखुर्द रेलवे स्टेशन पर ही एकमात्र इंटरचेंज उपलब्ध है, जिससे कनेक्टिविटी सीमित हो जाती है. ऐसे में डायमंड गार्डन के बाद ‘चेंबूर नाका’ स्टेशन को जोड़ने से यात्रियों की सुविधा और उपयोगिता दोनों में सुधार होने की उम्मीद है. पिछले साल कमिश्नर ऑफ मेट्रो रेल सेफ्टी (CMRS) ने मंडाले से डायमंड गार्डन सेक्शन का निरीक्षण कर इसे प्रमाणित किया था. अब MMRDA इस खंड को और प्रभावी बनाने के लिए छठा स्टेशन जोड़ने की दिशा में काम कर रही है. 37 स्‍टेशन का प्रस्‍ताव मेट्रो लाइन 2B बड़े मेट्रो 2 कॉरिडोर का हिस्सा है, जिसमें कुल 37 स्टेशन प्रस्तावित हैं. निर्माण कार्य में देरी के चलते इस प्रोजेक्ट को चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जा रहा है. जानकारी के अनुसार, लाइन 2B का पहला चरण लगभग पूरा हो चुका है और पूरी लाइन 2026-27 तक चालू होने की उम्मीद है. पूरी तरह ऑपरेट होने के बाद यह लाइन डीएन नगर को मेट्रो लाइन 1 से, बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स को मेट्रो लाइन 3 से और डीएन नगर को मेट्रो लाइन 2 से जोड़ेगी. ऐसे में यह परियोजना मुंबई के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्‍टम तंत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है.

देश ने मनाया ब्लैक डे, पीएम मोदी ने पुलवामा शहीदों को किया याद और श्रद्धांजलि अर्पित

पुलवामा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को 2019 के पुलवामा हमले में शहीद सीआरपीएफ जवानों को श्रद्धांजलि दी और देश के प्रति उनकी बहादुरी, समर्पण और सेवा को याद किया. उन्होंने कहा कि उनका साहस हर भारतीय को प्रेरित करता है. पीएम मोदी ने कहा, '2019 में आज के दिन पुलवामा में अपनी जान देने वाले बहादुर हीरो को याद करते हुए. देश के लिए उनकी भक्ति, इरादा और सेवा हमेशा हमारी सोच में बसी रहेगी. हर भारतीय को उनकी हिम्मत से ताकत मिलती है.' एक्स पर एक पोस्ट में पीएम मोदी ने लिखा, '2019 में आज के दिन पुलवामा में अपनी जान देने वाले बहादुर हीरो को याद कर रहा हूँ. देश के लिए उनकी भक्ति, इरादा और सेवा हमेशा हमारी सोच में बसी रहेगी. हर भारतीय को उनके लगातार साहस से ताकत मिलती है.' रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीर जवानों को दी श्रद्धांजलि रक्षा मंत्री ने एक्स पर लिखा, '14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले में अपनी जान गंवाने वाले बहादुर सीआरपीएफ के जवानों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देते है. पूरा देश उनकी याद में और उनके परिवारों के साथ एकजुटता में खड़ा है. उनका बलिदान हमारे देश के लिए आतंकवाद से पैदा हुए गंभीर खतरों की याद दिलाता है. भारत हर तरह के आतंकवाद से लड़ने और उसे खत्म करने के अपने इरादे पर अडिग है. हमारी सरकार भारत को सुरक्षित बनाने के हमारे सामूहिक इरादे को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है.' अमित शाह ने किया नमन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वीर जवानों के शौर्य का स्मरण किया. उन्होंने एक्स पर लिखा, 'पुलवामा आतंकी हमले में शहीद होने वाले हमारे वीर जवानों के शौर्य का स्मरण कर उन्हें नमन करता हूँ. आतंकवाद मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन है और भारत इसके समूल नाश के लिए दृढ़ संकल्पित है. आतंकवाद का सामना करने वाले हमारे सुरक्षा बलों व सुरक्षा एजेंसियों के साहस, समर्पण और बलिदान का देश सदैव ऋणी रहेगा.' इससे पहले दिन में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने भी बहादुर सीआरपीएफ जवानों को विनम्र श्रद्धांजलि दी. उपराष्ट्रपति ने उनके बलिदान को याद करते हुए कहा कि यह बलिदान भारतीय इतिहास में हमेशा के लिए अंकित है और सदियों तक देश को प्रेरणा देता रहेगा. उन्होंने लिखा, 'मैं पुलवामा आतंकी हमले में अपनी जान देने वाले बहादुर जवानों को श्रद्धांजलि देता हूं. उनका सर्वोच्च बलिदान हमेशा देश की याद में रहेगा और हमें एक मजबूत और सुरक्षित भारत बनाने के लिए प्रेरित करता रहेगा.' जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में 14 फरवरी, 2019 को श्रीनगर-जम्मू नेशनल हाईवे पर सीआरपीएफ के काफिले को निशाना बनाकर किए गए सबसे खतरनाक आतंकी हमलों में से एक हुआ था, जिसमें 40 सीआरपीएफ के जवान मारे गए थे. काफिले में 78 बसें थी जिनमें करीब 2500 लोग जम्मू से श्रीनगर जा रहे थे. एक लोकल न्यूज एजेंसी के मुताबिक पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि यह एक सुसाइड बॉम्बर ने किया था. हालांकि, भारत ने पाकिस्तान में आतंकी कैंपों पर एयरस्ट्राइक समेत कई काउंटर-टेरर ऑपरेशन शुरू किए, जिससे तनाव काफी बढ़ गया. पुलवामा आतंकी हमले से न सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा, बल्कि जम्मू-कश्मीर में बॉर्डर पार आतंकवाद और सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में चर्चा भी हुई. हमले में अपनी जान देने वाले 40 बहादुर सीआरपीएफ जवानों को याद करने के लिए इसे 'ब्लैक डे' के तौर पर मनाया जाता है.

निखिल गुप्ता मामले में सजा की संभावना और अमेरिका की डिमांड पर अपडेट

न्यूयॉर्क खालिस्तानी आतंकवादी और अमेरिकी नागरिक गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश वाले मामले में एक बड़ा नाटकीय मोड़ आया है। इस मामले के मुख्य आरोपी 54 साल के भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने शुक्रवार को अमेरिकी अदालत के समक्ष अपना गुनाह कबूल कर लिया है। यह कदम उनके पिछले रुख से बिल्कुल उलट है। जून 2024 में चेक गणराज्य से प्रत्यर्पण के बाद से वे लगातार खुद को निर्दोष बता रहे थे। निखिल गुप्ता ने अमेरिकी मजिस्ट्रेट जज सारा नेटबर्न के समक्ष तीन गंभीर आरोपों में अपना दोष स्वीकार किया है। उनके खिलाफ सुपारी देकर हत्या कराने, हत्या की साजिश रचने और मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश रचने का आरोप है। उन्होंने इन तीनों में दोष कबूल कर लिया है। कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि अभियोजकों द्वारा जुटाए गए पुख्ता सबूतों के कारण निखिल गुप्ता के पास अपना गुनाह कबूल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। इस मामले की सुनवाई 30 मार्च से शुरू होने वाली थी, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक संचार और वायरटैप की गई बातचीत पेश की जानी थी। इन रिकॉर्डिंग्स में कथित तौर पर निखिल गुप्ता को एक हिटमैन के साथ 1,00,000 डॉलर की सुपारी पर बातचीत करते हुए सुना गया था। अपना गुनाह कबूल करने के बाद अब निखिल गुप्ता एक हाई-प्रोफाइल ट्रायल से बच जाएंगे, जिसमें उन्हें अधिकतम 40 साल की सजा हो सकती थी। हालांकि सजा का अंतिम निर्णय न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर करेगा, लेकिन अमेरिकी सरकार ने गुप्ता के लिए 21 से 24 साल की कैद की सिफारिश की है। सीनियर जिला जज विक्टर मरेरो आने वाले महीनों में सजा सुनाने के लिए औपचारिक सुनवाई की तारीख तय करेंगे। इस पूरी साजिश के केंद्र में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) के पूर्व अधिकारी विकास यादव का नाम भी उछला है। अमेरिकी अधिकारियों का आरोप है कि यादव ने ही पन्नू की हत्या के समन्वय के लिए गुप्ता को भर्ती किया था। साल 2024 के अंत में यादव के खिलाफ संघीय गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था, लेकिन वे फिलहाल भारत में हैं। भारत सरकार ने पुष्टि की है कि विकास यादव अब सरकारी सेवा में नहीं हैं, लेकिन उनके प्रत्यर्पण को लेकर फिलहाल कोई सहमति नहीं जताई गई है। भारत की आंतरिक जांच समिति ने स्वीकार किया है कि उक्त अधिकारी के आपराधिक लिंक थे, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। कौन है गुरपतवंत सिंह पन्नू? गुरपतवंत सिंह पन्नू 'सिख फॉर जस्टिस' (SFJ) नामक संगठन का जनरल काउंसल है, जो अमेरिका में सक्रिय है। हाल के महीनों में पन्नू ने भारत विरोधी गतिविधियों को तेज किया है, जिसमें अमेरिकी शहरों में खालिस्तान जनमत संग्रह आयोजित करना, एयर इंडिया के बहिष्कार के वीडियो जारी करना और भारत विरोधी हरकतों के लिए इनामों की घोषणा करना शामिल है। इन गतिविधियों के कारण भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने पन्नू के खिलाफ आतंकवाद से संबंधित नए मामले दर्ज किए हैं।

पीएम मोदी की डिब्रूगढ़ यात्रा खास: राष्ट्रीय राजमार्ग पर उतरा विमान, इमरजेंसी लैंडिंग सुविधा चर्चा में

डिब्रूगढ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असम दौरे के तहत डिब्रूगढ़ पहुंच गए हैं. उनके दौरे की शुरुआत बेहद रणनीतिक रही, जब उनका विमान डिब्रूगढ़ के मोरान बाईपास पर नवनिर्मित इमरजेंसी लैंडिंग सुविधा (ELF) पर उतरा. यह पहली बार है कि पीएम का विमान नेशनल हाइवे पर उतरा. पूर्वोत्तर भारत में अपनी तरह की यह पहली सुविधा है, जो युद्ध और प्राकृतिक आपदा जैसी स्थितियों में भारतीय वायुसेना के लिए गेम-चेंजर साबित होगी. प्रधानमंत्री ब्रह्मपुत्र नदी पर बने कुमार भास्कर वर्मा सेतु का उद्घाटन करेंगे. ₹3,030 करोड़ की लागत से बना यह 6-लेन पुल पूर्वोत्तर का पहला 'एक्स्ट्राडोज्ड' पुल है. इस आधुनिक पुल की मदद से गुवाहाटी और उत्तर गुवाहाटी के बीच का सफर जो घंटों में तय होता था, अब मात्र 7 मिनट में सिमट जाएगा. इसमें भूकंपरोधी तकनीक और रियल-टाइम हेल्थ मॉनिटरिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है. प्रधानमंत्री आईआईएम गुवाहाटी (IIM Guwahati) का उद्घाटन करेंगे, जो क्षेत्र में उच्च शिक्षा के मानक बदलेगा. साथ ही, कामरूप जिले में राष्ट्रीय डेटा केंद्र (National Data Center) का शुभारंभ होगा. 8.5 मेगावाट क्षमता वाला यह केंद्र पूर्वोत्तर की सरकारी सेवाओं को डिजिटल रूप से सुरक्षित और सशक्त बनाएगा. शहरी परिवहन को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए प्रधानमंत्री 225 इलेक्ट्रिक बसों को हरी झंडी दिखाएंगे. इनमें से 100 बसें अकेले गुवाहाटी के लिए होंगी, जबकि बाकी नागपुर, भावनगर और चंडीगढ़ के लिए रवाना की जाएंगी. क्या है इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (14 फरवरी) असम के डिब्रूगढ़ में देश की पहली हाईवे इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी (ELF) पर भारतीय वायुसेना के C-130J Super Hercules से लैंड किया. यह सुविधा ऊपरी असम में एक हाईवे स्ट्रिप पर बनाई गई है, जो युद्ध या आपातकाल में लड़ाकू विमानों, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टरों के लिए वैकल्पिक लैंडिंग की जगह देगी. यह पूर्वोत्तर भारत की रक्षा और रणनीतिक तैयारी में एक महत्वपूर्ण कदम है.  ELF क्या है और डिब्रूगढ़ में क्यों खास? इमरजेंसी लैंडिंग फैसिलिटी एक ऐसा हाईवे स्ट्रिप होता है जहां सामान्य समय में गाड़ियां चलती हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर इसे रनवे में बदलकर विमान उतारे और उड़ाए जा सकते हैं. डिब्रूगढ़ ELF असम के ऊपरी हिस्से में है, जो भारत-चीन सीमा के बहुत करीब है.     भारतीय वायुसेना (IAF) को अगर मुख्य एयरबेस पर हमला हो या क्षतिग्रस्त हो जाएं, तो वैकल्पिक जगह देगी.     विमानों को तैनात करने की सुविधा देगी, जिससे दुश्मन का निशाना लगाना मुश्किल हो जाएगा.     पूर्वी सेक्टर में हवाई ऑपरेशंस की गहराई और जीवित रहने की क्षमता बढ़ाएगी. पहले ही सफल रिहर्सल हो चुकी है इस ELF की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. हाल ही में पूर्ण पैमाने 'रिहर्सल' की गई…     राफेल और सुखोई-30 MKI जैसे लड़ाकू विमान.     C-130J सुपर हरक्यूलिस ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट.     डोर्नियर सर्विलांस विमान.     एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर (ALH). ये सभी विमान हाईवे स्ट्रिप पर सफलतापूर्वक उतरे और उड़े. 'टच एंड गो' मैन्यूवर्स और कॉम्बैट फॉर्मेशन लैंडिंग भी की गई. हेलीकॉप्टरों से घायलों को निकालने (कैजुअल्टी इवैक्यूएशन) का अभ्यास भी हुआ. यह सुविधा युद्ध के साथ-साथ मानवीय सहायता मिशनों में भी काम आएगी. प्रधानमंत्री मोदी खुद IAF के C-130J विमान से इस स्ट्रिप पर उतरे. यह 2021 में उत्तर प्रदेश में बने इसी तरह के स्ट्रिप की तरह होगा, जहां भी उन्होंने विमान से लैंडिंग की थी. यह सेना की क्षमता का प्रदर्शन भी है. देशभर में ELF का नेटवर्क डिब्रूगढ़ ELF अकेला नहीं है. सड़क परिवहन मंत्रालय और IAF मिलकर देशभर में ऐसे 28 स्थानों की पहचान कर चुके हैं. असम में ही 5 ELF बन रहे हैं. कई पहले से ऑपरेशनल हैं. सभी IAF एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड्स को आधुनिक बनाया जा चुका है. पूर्वोत्तर में अन्य रणनीतिक प्रोजेक्ट्स यह सुविधा पूर्वोत्तर की रक्षा को मजबूत करने की बड़ी योजना का हिस्सा है… ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे प्रस्तावित अंडरवाटर रोड-रेल सुरंग – नदी के उत्तर और दक्षिण तट के बीच तेज आवाजाही. कई स्ट्रैटेजिक टनल और ऑल-वेदर रोड – बरसात या आपदा में भी कनेक्टिविटी बनी रहे. ये प्रोजेक्ट्स सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) पर निर्भरता कम करेंगे. सेना की तेज तैनाती सुनिश्चित करेंगे. क्यों जरूरी है यह सब? पूर्वोत्तर भारत की संवेदनशील सीमाओं (चीन, म्यांमार, बांग्लादेश) के पास है. यहां का इलाका मुश्किल है – नदियां, पहाड़, बाढ़. ये प्रोजेक्ट्स… प्राकृतिक आपदाओं और दुश्मन हमले दोनों से बचाव देंगे. सेना को तेज रिस्पॉन्स और बेहतर लॉजिस्टिक्स देंगे. रक्षा के साथ-साथ आम लोगों के लिए भी कनेक्टिविटी और विकास लाएंगे. डिब्रूगढ़ ELF पूर्वोत्तर की रक्षा रीढ़ को मजबूत करने वाला मील का पत्थर है. यह भारत की रणनीतिक सोच को दर्शाता है – भूगोल की चुनौतियों को ताकत में बदलना. आने वाले समय में ऐसे प्रोजेक्ट्स पूर्वोत्तर को और सुरक्षित और विकसित बनाएंगे.

वैश्विक मंच पर भारत का दम, जमीन और समुद्र दोनों मोर्चों पर बड़ी कामयाबी

नई दिल्ली भारत के रक्षा मंत्रालय ने करीब 3.60 लाख करोड़ रुपये के रक्षा प्रस्तावों को मंजूरी दी. इससे पहले बीते कुछ महीनों में कई अन्य प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है. भारत ऐसा अपनी रक्षा तैयारियों को आधुनिक बनाने के लिए कर रहा है. लेकिन, भारत ने अपनी इन रक्षा तैयारियों में अपनी पारंपरिक नीति से अलग एक बड़ा रणनीतिक बदलाव किया है. वह अब किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं है. उसने अपनी विदेश नीति की तरह ही रक्षा खरीद नीति में मल्टीपोलर बना दिया है. बीते कुछ महीनों के डेवलपमेंट को देखा जाए तो ऐसा लगता है कि भारत ने इस नीति में रूस के साथ-साथ अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी जैसे सुपरपावर्स को साधने का काम किया है. तकनीकी रूप से जर्मनी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है लेकिन वह एक बहुत बड़ी आर्थिक शक्ति और सैन्य शक्ति है. भारत की इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक वैश्विक पावर पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए पूर्व और पश्चिम दोनों से सर्वश्रेष्ठ तकनीक हासिल करने की है. हाल के महीनों में रूस, अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी के साथ बड़े सौदों ने न केवल इन देशों को साधने का काम किया है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता को भी मजबूत किया है. रूस के साथ मजबूत रणनीतिक रिश्ते रूस भारत का सबसे पुराना और भरोसेमंद रक्षा साझेदार बना हुआ है. वैश्विक भू-राजनीतिक बदलावों के बावजूद रूस मौजूदा वक्त में सैन्य हार्डवेयर का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का संयुक्त उद्यम इसका प्रमुख उदाहरण है. S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की दो स्क्वाड्रन इसी साल डिलीवर होने वाले थहैं. इतना ही नहीं गुरुवार को ही रक्षा मंत्रालय ने रूस से 10 हजार करोड़ में एस-400 सिस्टम की मिसाइलें खरीद फैसला किया. इसी तरह रूस के साथ मिलकर ही यूपी के अमेठी में 6 लाख से अधिक AK-203 असॉल्ट राइफलों का स्वदेशी उत्पादन चल रहा है. सरकारी कंपनी एचएएल में Su-30MKI इंजनों का निर्माण भी रूस के सहयोग से चल रहा है. ये सौदे रूस को भारत में स्थायी बाजार देते हैं, जबकि भारत को सस्ती और विश्वसनीय तकनीक मिलती है. अमेरिका से मिलेगा हाईटेक तकनीक अमेरिका के साथ संबंध खरीदार-विक्रेता से व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी तक पहुंच चुके हैं. GE-F414 जेट इंजन सौदा सबसे बड़ा ब्रेकथ्रू है, जिसमें HAL के साथ 80 फीसदी तकनीक ट्रांसफर की बात चल रही है. यह सुविधा पहले केवल NATO सहयोगियों को मिलती थी. यह सौदा मार्च 2026 तक फाइनल होने की उम्मीद है, जो तेजस MkII और AMCA जैसे स्वदेशी फाइटर को पावर देगा. इसके अलावा, 31 MQ-9B सी गार्जियन ड्रोन और 6 अतिरिक्त P-8I पोसीडॉन विमानों की खरीद हिंद महासागर में अभूतपूर्व निगरानी प्रदान करेगी. अमेरिका को भारत एक पसंदीदा सुरक्षा भागीदार मिलता है, जबकि भारत को ‘सबमरीन हंटर’ जैसी उन्नत क्षमता मिलती है. रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस से 114 राफेल खरीदने को मंजूरी दे दी है. फ्रांस बना एक सबसे भरोसेमंद साझेदार फ्रांस भारत का सबसे भरोसेमंद पश्चिमी साथी साबित हुआ है, जहां तकनीक साझा करने में कोई शर्त नहीं लगाई जाती. 36 राफेल फाइटर की सफल खरीद के बाद रक्षा मंत्रालय की रक्षा खरीद परिषद ने गुरुवार को 114 राफेल जेट्स की मंजूरी दी है. यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा सौदा है. इनमें से ज्यादातर भारत में निर्मित होंगे, जिसमें 50 फीसदी स्वदेशी सामग्री होगी. नौसेना के लिए 26 राफेल-एम (मरीन) पहले ही क्लियर हैं. स्कॉर्पीन (कलवरी-क्लास) सबमरीन पर सहयोग जारी है, जहां मझगांव डॉक अतिरिक्त यूनिट बना रहा है. फ्रांस को भारत में बड़ा बाजार और सह-उत्पादन मिलता है, जबकि भारत को हाई-परफॉर्मेंस फाइटर और जर्मनी के साथ सबमरीन डील जर्मनी भारत की अंडरवाटर डोमिनेंस में प्रमुख भूमिका निभा रहा है. प्रोजेक्ट-75(I) के तहत थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) के साथ 6 एडवांस्ड कन्वेंशनल सबमरीन का सौदा करीब $8-10 बिलियन (70,000-90,000 करोड़) का है. जनवरी 2026 में जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की यात्रा के दौरान सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए और मार्च तक यह सौदा फाइनल होने की उम्मीद है. ये सबमरीन मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड में बनेंगी, जिसमें फुल टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा. ये सबमरीन लंबे समय तक पानी के नीचे रह सकेंगी.

सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी! 8वें वेतन आयोग का असर और प्राइवेट नौकरी वालों पर संभावित प्रभाव

नई दिल्ली  दिल्ली की सर्दी में चाय की चुस्कियों के साथ ऑफिस जाने वाले लाखों कर्मचारी आजकल एक ही बात पर चर्चा कर रहे हैं- 8वां केंद्रीय वेतन आयोग क्या लाने वाला है? आयोग की ऑफिशियल वेबसाइट लाइव हो चुकी है, जहां कर्मचारी, यूनियन और अन्य स्टेकहोल्डर्स 16 मार्च 2026 तक अपने सुझाव और फीडबैक जमा कर सकते हैं. यह आयोग नवंबर 2025 में गठित हुआ था और इसे 18 महीनों के अंदर अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपनी हैं, जिनमें वेतन, भत्ते, पेंशन और अन्य सुविधाओं की समीक्षा शामिल है. समझा जा रहा है कि जल्द ही सरकारी कर्मचारियों की सैलरी में बड़ा उछाल आने वाला है. लेकिन एक बड़ा सवाल कई लोगों के मन में है कि क्या ये बदलाव प्राइवेट सेक्टर की सैलरी पर भी असर डालेंगे? तो सच्चाई ये है कि 8वां वेतन आयोग प्राइवेट सेक्टर को सीधे तौर पर कवर नहीं करता. ये आयोग सिर्फ केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों (लगभग 48-50 लाख), डिफेंस पर्सनल और पेंशनर्स (करीब 68-70 लाख) के लिए बना है. प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों पर इसका कोई कानूनी या डायरेक्ट प्रभाव नहीं पड़ता. न ही प्राइवेट कंपनियों को बाध्य किया जा सकता कि वे इसके हिसाब से सैलरी बढ़ाएं. तो प्राइवेट सेक्टर को कोई लाभ नहीं? नहीं, ऐसा भी नहीं है. हालांकि इसमें प्राइवेट सेक्टर सीधे तौर पर शामिल नहीं होता है. केंद्रीय वेतन आयोग केवल केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों (Central Government Employees), रक्षा कर्मियों (Defence Personnel) और पेंशनभोगियों के वेतन, भत्ते और पेंशन की समीक्षा के लिए बनाया जाता है. इसकी Terms of Reference (ToR) में स्पष्ट रूप से यही लिखा होता है. प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों की सैलरी पर आयोग कोई सीधी सिफारिश नहीं करता. ऐसे में प्राइवेट सेक्टर पर कोई डायरेक्ट असर नहीं पड़ता. हां, इनडायरेक्ट असर की बात करें तो पिछले वेतन आयोगों में अच्छा-खासा असर देखा गया है. इनडायरेक्ट असर कैसे पड़ता है?     टैलेंट कॉम्पिटिशन (Talent Retention & Attraction): सरकारी सैलरी बढ़ने के बाद अच्छे इंजीनियर्स, MBA, CA, IT प्रोफेशनल्स आदि सरकारी नौकरी की ओर आकर्षित होते हैं. प्राइवेट कंपनियों को इन्हें रोकने या नए हायर करने के लिए सैलरी बढ़ानी पड़ती है. खासकर IT, Banking, Consulting, PSU-Competitive सेक्टर्स में यह असर बहुत ज्यादा दिखता है.     बेंचमार्किंग (Benchmarking): कई बड़ी प्राइवेट कंपनियां जैसे TCS, Infosys, HDFC, L&T आदि अपने वेतन स्ट्रक्चर को सरकारी वेतन आयोग या PSUs के सैलरी लेवल के साथ कम्पेयर करती हैं. 8वें वेतन आयोग में तो ToR में ही प्राइवेट सेक्टर की मौजूदा सैलरी को ध्यान में रखने को कहा गया है.     PSUs पर डायरेक्ट प्रभाव: केंद्रीय PSUs (जैसे ONGC, IOC, SAIL, BHEL) अक्सर केंद्रीय वेतन आयोग के बाद अपना वेतन रिवाइज करती हैं. इससे प्राइवेट सेक्टर में और दबाव बढ़ता है.     इकोनॉमिक मल्टीप्लायर: करीब 50 लाख कर्मचारी और 70 लाख पेंशनर्स की सैलरी बढ़ने से मार्केट में डिमांड बढ़ती है. डिमांड बढ़ने से कंपनियों को प्रोडक्शन बढ़ाना पड़ता है, जिससे वेतन में वृद्धि होती है. पिछले आयोगों का रियल अनुभव 7वें वेतन आयोग (2016) के बाद कई प्राइवेट कंपनियों ने 2016-18 में अच्छी सैलरी हाइक्स दीं, खासकर मिड-लेवल पर. अभी 8वें वेतन आयोग (2026 से लागू होने की संभावना) में अगर फिटमेंट फैक्टर 2.0+ हुआ तो सरकारी सैलरी में 30-35%+ की बढ़ोतरी हो सकती है. इससे प्राइवेट सेक्टर में खासकर एंट्री लेवल और मिड लेवल पर दबाव बढ़ेगा.

भविष्य की नौकरियों पर AI का कहर, 2027 तक ज्यादातर जॉब्स खत्म; केवल पांच क्षेत्र में रहेंगी अवसर

नई दिल्ली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में एक प्रमुख विशेषज्ञ ने ऐसी चेतावनी दी है जिसने दुनिया भर में हड़कंप मचा दिया है. लैटवियन मूल के कंप्यूटर साइंटिस्ट और लुइसविल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. रोमन याम्पोलस्की ने ‘द डायरी ऑफ ए सीईओ’ पॉडकास्ट में स्टीवन बार्टलेट से बातचीत में कहा कि 2027 तक आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस (AGI) आ सकता है, जो इंसानों से बेहतर हर संज्ञानात्मक काम कर सकेगा. इसके साथ ही अगले पांच सालों में 99 प्रतिशत नौकरियां गायब हो जाएंगी. डॉ. याम्पोलस्की, जिन्होंने AI सेफ्टी और रिस्क पर 100 से ज्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित किए हैं, ने कहा, “कोई भी जॉब ऐसी नहीं जो ऑटोमेटेड ना हो सके. पहले की सभी तकनीकें इंसानों की मदद करती थीं, लेकिन AI सब कुछ खुद कर लेगा.” इसका नतीजा होगा कि लोगों को नौकरियों से हाथ धोना पड़ जाएगा. इन जॉब्स पर सबसे अधिक खतरा एक्सपर्ट ने बताया कि सबसे पहले कंप्यूटर पर होने वाले काम ऑटोमेट हो जाएंगे, फिर ह्यूमनॉइड रोबोट्स के आने से फिजिकल लेबर भी 5 साल पीछे रह जाएगा. 2030 तक रोबोट्स इतने प्रभावी हो जाएंगे कि सभी फिजिकल काम भी AI संभाल लेगा. उन्होंने चेतावनी दी कि इससे पहले कभी नहीं देखी गई स्तर की बेरोजगारी आएगी. “10 प्र.तिशत बेरोजगारी भी डरावनी है, लेकिन एआई की वजह से 99 प्रतिशत तक बेरोजगारी हो जाएगी.” उन्होंने कहा कि आज के मॉडल्स से ही 60 प्रतिशत जॉब्स रिप्लेस हो सकती हैं और कई जॉब्स तो ‘बुलशिट जॉब्स’ हैं जो बिना ऑटोमेशन के ही खत्म हो जाएंगे. रिट्रेनिंग का कोई फायदा नहीं, क्योंकि “प्लान बी नहीं है.” आएगा आइआइ का बाप डॉ. याम्पोलस्की ने AGI के आने को 2027 तक संभावित बताया, जो प्रेडिक्शन मार्केट्स और लीडिंग AI लैब्स के सीईओज की भविष्यवाणियों पर आधारित है. इसके बाद सुपरइंटेलिजेंस आ सकती है, जो इंसानों से कहीं ज्यादा स्मार्ट होगी. लेकिन उनका मुख्य फोकस जॉब्स पर है. उन्होंने कहा कि क्रिएटिव काम, मीडिया, पॉडकास्टिंग सब AI से बेहतर हो सकता है क्योंकि AI तेज, सटीक और डेटा-ड्रिवन है. फिर भी, कुछ जॉब्स बचे रह सकते हैं, लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है. उन्होंने सिर्फ 5 तरह के काम बताए जहां लोग इंसान को प्राथमिकता देंगे: पर्सनल सर्विसेज फॉर द रिच – जैसे अमीर लोग अपने अकाउंटेंट, पर्सनल असिस्टेंट या अन्य सर्विसेज में इंसान चाहेंगे, जैसे वॉरेन बफेट AI की बजाय ह्यूमन अकाउंटेंट चुनते हैं. इमोशनल या पर्सनल टच वाली जॉब्स – जहां इंसानी भावनाएं, एम्पैथी या ट्रस्ट जरूरी हो, जैसे कुछ थेरेपी या पर्सनल रिलेशनशिप रोल्स, लेकिन ये भी सीमित होंगे. AI ओवरसाइट एंड रेगुलेशन – AI सिस्टम्स को कंट्रोल, मॉनिटर और रेगुलेट करने वाले एक्सपर्ट्स, क्योंकि सेफ्टी इश्यूज रहेंगे. इंटरमीडियरीज या AI एक्सप्लेनर्स – जो AI को समझकर कंपनियों या लोगों के लिए इसे डिप्लॉय और एक्सप्लेन करेंगे. प्रॉम्प्ट इंजीनियर्स या स्पेशलाइज्ड AI हैंडलर्स – शुरुआत में प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग जैसी जॉब्स, लेकिन लंबे समय में ये भी कम हो सकती हैं. ये जॉब्स सिर्फ छोटे सेक्शन के लिए होंगी, ज्यादातर लोगों के लिए नहीं होगी. उन्होंने कहा कि समाज को यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) जैसी व्यवस्था अपनानी पड़ेगी, क्योंकि AI से इतनी अबंडेंस आएगी कि काम की जरूरत नहीं रहेगी. लेकिन खतरा ये है कि सिस्टम तैयार नहीं हैं. यह चेतावनी भारत जैसे देशों के लिए और भी गंभीर है, जहां युवा बेरोजगारी पहले से समस्या है. अगर AI इतनी तेजी से जॉब्स छीन लेगा, तो लाखों-करोड़ों लोग प्रभावित होंगे. एक्सपर्ट्स का कहना है कि सरकारों को अभी से पॉलिसी बनानी चाहिए, स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करना चाहिए, लेकिन डॉ. याम्पोलस्की मानते हैं कि रिट्रेनिंग काफी नहीं होगी.