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ब्रह्मोस से चीन की बढ़ी टेंशन, समुद्र में दुश्मन के जहाजों पर कहर बरपा सकती है भारत की सुपरसोनिक मिसाइल

नई दिल्ली ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस की धमक लगातार बढ़ रही है। इसके लिए करीब तीन आसियान देशों ने भारत के साथ समझौते किए हैं। चौथा देश थाईलैंड भी इस मिसाइल पर विचार कर रहा है। भारत इसी मिसाइल की मदद से चीन को घेरने की तैयारी कर रहा है। भारत दक्षिण चीन सागर में अपनी ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की पहुंच बढ़ा रहा है। ताइवान टॉक्स को दिए एक इंटरव्यू में लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर (रिटायर्ड) ने इसकी पुष्टि की है। हालांकि, उन्होंने कहा कि ब्रह्मोस वाली इस रणनीति का मकसद सिर्फ चीन को निशाना बनाना नहीं बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत सुरक्षा घेरा बनाना है। आपको बता दें कि अपनी श्रेणी की सबसे तेज क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अपने शानदार प्रदर्शन के बाद दुनिया का ध्यान खींचा है। इस दौरान जब भारत ने पाकिस्तानी एयर बेस पर हमला किया तो इसकी सटीकता और लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता का पता चला। ब्रह्मोस के कारण ही पाकिस्तान को युद्धविराम के लिए मजबूर होना पड़ा। इन देशों ने किए भारत के साथ समझौते पिछले एक साल में वियतनाम और इंडोनेशिया ने भारत के साथ ब्रह्मोस के लिए समझौते किए हैं। मलेशिया और थाईलैंड भी इसमें शामिल हो सकते हैं। 2022 में फिलीपींस ने अपनी तटीय सुरक्षा के लिए 37.5 करोड़ डॉलर में ब्रह्मोस खरीदने वाला पहला देश बना। ये सभी देश विवादित दक्षिण चीन सागर के आसपास स्थित हैं। उन्हें चीन के आक्रामक और तेजी से बढ़ते दबदबे का सामना करना पड़ता है। अब चीन समझेगा कि मजबूत भारत से सामना हो रहा लेफ्टिनेंट जनरल पीआर शंकर इंटरव्यू के दौरान कहा कि ब्रह्मोस बेल्ट रणनीति से भारत-चीन संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि इससे चीन को निश्चित रूप से यह एहसास होगा कि उसका सामना एक मजबूत भारत से हो रहा है। पीआर शंकर ने कहा, "चीन ने देखा है कि ब्रह्मोस कैसे काम करती है। दक्षिण चीन सागर में चीन अपनी अधिकतम रेंज पर काम कर रहा है।" क्या है ब्रह्मोस बेल्ट? इसका मतलब किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन से नहीं है। विशेषज्ञ इस शब्द का इस्तेमाल भारत के उन देशों के साथ बढ़ते ब्रह्मोस पार्टनरशिप नेटवर्क के लिए कर रहे हैं, जिनका चीन के साथ समुद्री विवाद है। इस विवाद के केंद्र में दक्षिण चीन सागर है, जो एक प्रमुख शिपिंग रूट है। वैश्विक व्यापार का 21% हिस्सा इसी रूट से होता है। चीन अपनी दक्षिण चीन सागर के लगभग 90% हिस्से पर अपना दावा करता है, जिससे वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान के साथ विवाद पैदा हो गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने द्वीप बनाकर और नौसैनिक गश्त करके अपने दावे को मजबूत करने की कोशिश की है। इसके कारण फिलीपींस और वियतनाम के साथ टकराव की स्थिति पैदा हुई है। अब दक्षिण-पूर्व एशिया के और देश ब्रह्मोस एंटी शिप मिसाइलें हासिल कर रहे हैं। तो स्थिति बदलने लगी है। वियतनाम के साथ डील लगभग 5900 करोड़ रुपये की है, जबकि इंडोनेशिया ने 1900 करोड़ रुपये की कीमत वाली दो ब्रह्मोस खरीदने का फैसला किया है। अगर थाईलैंड जैसे और देश भी यह मिसाइल हासिल करते हैं तो नतीजा यह होगा कि एशिया के कुछ सबसे रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास ब्रह्मोस की एक चेन बन जाएगी। विशेषज्ञ इसे भारत की एक चालाक चाल के तौर पर देख रहे हैं। इससे दक्षिण चीन सागर में कोई सैनिक या जहाज भेजे बिना ही चीन की चिंताएं बढ़ गई हैं। ब्रह्मोस क्यों है इतना खास? 290 किमी तक की उड़ान रेंज वाली यह फायर-एंड-फॉरगेट मिसाइल जमीन, जहाज या लड़ाकू विमान से लॉन्च की जा सकती है। ब्रह्मोस बहुत तेज और सटीक है। इसे रोकना लगभग असंभव है। इसी मिसाइल ने नूर खान, सरगोधा और मुरीद जैसे पाकिस्तानी एयर बेस पर सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया था। ब्रह्मोस भारत के लिए गेम चेंजर साबित हुई। चीन का कोई भी एयर डिफेंस सिस्टम ब्रह्मोस को रोक नहीं सकता। ब्रह्मोस की रफ्तार और सटीक निशाना लगाने की क्षमता चीनी जहाजों के लिए बड़ा खतरा है। इससे चीन को विवादित इलाकों से दूर रहने पर मजबूर होना पड़ सकता है।

भारत का डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बना गेमचेंजर, डबल-स्टैक ट्रेन से तेज होगा सामान का सफर; आम लोगों को क्या फायदा?

नई दिल्ली  सौ बात की एक बात ये कि खबरों की भीड़ में जो रेल की लेटेस्ट खबर आई है उसपर ध्यान पब्लिक का शायद उतना नहीं जा रहा क्योंकि बात मालगाड़ी की है, लेकिन उसको समझने की जरूरत है कि बात सिर्फ मालगाड़ी की नहीं है. ये सब के मतलब की खबर है. वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, इसके आखिरी तीन हिस्सों का भी उद्घाटन कर दिया गया. डेडिकेटेड मतलब सिर्फ फ्रेट के लिये, माल के लिए. मतलब सिर्फ मालगाड़ियों के लिए अलग रेल की पटरी. जिसपर सिर्फ मालगाड़ियां चलेंगी. इसके आखिरी तीन हिस्से यानी कुल 326 km के हिस्से का भी अब उद्घाटन हो गया. यानी पूरा 2,843 किलोमीटर का डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर नेटवर्क अब पूरी तरह चालू हो गया है. तो ये सिर्फ मालगाड़ियों की बात इसलिए नहीं है क्योंकि इसका फायदा तो सबको मिलेगा. मालगाड़ी के चक्कर में किसकी ट्रेन लेट नहीं हुई जीवन में? ये वाली प्रॉब्लम तो सब झेल चुके हैं. पहले एक ही पटरी पर यात्री ट्रेनें और मालगाड़ियां दोनों चलती थीं. मालगाड़ियां भारी और धीमी होती हैं, इसलिए यात्री ट्रेनों को बार-बार रुकना पड़ता था या लेट होना पड़ता था. पटरियां जैम रहती थीं. अब मालगाड़ियों का बड़ा हिस्सा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर चला गया है. पुरानी लाइनों पर जगह खाली हुई है. रेलवे अब उन लाइनों पर ज्यादा यात्री ट्रेनें चला सकता है और वो टाइम पर चलेंगी ये भी उम्मीद बढ़ जाती है। 20 साल पहले बना प्लैन क्योंकि ये डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सिर्फ मालगाड़ियों के लिए बनी हुई एकदम अलग रेल लाइन है. इसलिए मालगाड़ियां बिना रुके तेज दौड़ सकती हैं. और ये काम चल रहा था 2005 से. 20 साल पहले से. 2005 में प्लैन बना. 2006 में इसके लिए DFCCIL नाम से अलग कंपनी बनाई गई इसे बनाने और चलाने का काम संभालने के लिए. जापान की मदद से वेस्टर्न कॉरिडोर और विश्व बैंक की मदद से ईस्टर्न कॉरिडोर का काम शुरू हुआ. जमीन लेने में दिक्कतें आईं, ठेके देने में कई अड़चनें आईं, निर्माण में कई बाधाएं आईं. तो काम जरूर लंबा खिंचा. ईस्टर्न कॉरिडोर 2023-24 में पूरा हुआ और वेस्टर्न का आखिरी हिस्सा अब जाकर 2026 में पूरा हुआ है। ये कॉरिडोर दो बड़े हिस्सों में बंटा है. एक है ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जो पंजाब के लुधियाना से बिहार के सोननगर तक 1,337 किलोमीटर लंबा है. ये मुख्य रूप से कोयला, स्टील, अनाज जैसे भारी माल के लिए है. दूसरा है वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जो उत्तर प्रदेश के दादरी से मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक 1,506 किलोमीटर लंबा है. ये कंटेनर माल और इंपोर्ट-एक्सपोर्ट के लिए है खासतौर पर. दादरी पर दोनों कॉरिडॉर मिलते हैं और पूरे उत्तर, पश्चिम और पूर्व को जोड़ देते हैं. लेकिन खबर में जो खासतौर पर समझने की बात है वो ये कि ये दुनिया में अनोखा है. क्यों? क्या दुनिया में मालगाड़ियां नहीं चलतीं? बिल्कुल चलती हैं. लेकिन इसमें डबल स्टैक मालगाड़ी चल सकती है। डबल स्टैक का मतलब डबल स्टैक मतलब एक डिब्बे के ऊपर दूसरा डिब्बा, एक कंटेनर के ऊपर दूसरा कंटेनर. वैसे तो अमेरिका जैसे देशों में डबल स्टैक कंटेनर ट्रेनें चलती हैं यानी एक डिब्बे पर दो कंटेनर एक के ऊपर एक रखे जाते हैं, लेकिन वहां ऐसी मालगाड़ी चलती है डीजल इंजन से. अब आप कहोगे तो ये कौनसा बड़ा फर्क हो गया? तो वो समझने वाली बात है कि भारत ने जो बनायी है पटरी उसपर ये इलेक्ट्रिक गाड़ी चलेगी. और इलेट्रिक इंजन की पटरी पर एक के ऊपर एक कंटेनर रख कर चलाओ तो बिजली की तारें भी तो फंस जाएंगी. इसलिए ये भारत में पटरी बनी है वो दुनिया में अनोखी बनाई गई है. इसकी तारें उतनी ऊचीं लगाई गई हैं कि गाड़ी डबल कंटेनर ले कर चल सके. पैसेंजर गाड़ियों वाली पटरी पर डबल कंटेनर लेकर नहीं जा सकते क्योंकि बिजली की तारें आ जती हैं बीच में. भारत ने पूरे कॉरिडोर पर बिजली की तारें ऊंची लगाई हैं, लगभग 7.5 मीटर ऊंची. इससे बिजली के इंजन से डबल स्टैक ट्रेनें चल सकती हैं. ऐसा पूरा फ्रेट कॉरिडोर, ऐसी पूरी रेल लाइन ही ऊंची तारों की हो, ये दुनिया के किसी और देश में नहीं है. और क्योंकि पूरी लाइन है ही मालगाड़ियों के लिए, तो ट्रेन की लंबाई भी डबल रख सकते हैं। डबल लंबाई और डबल ऊंचाई लॉन्ग हॉल यानी लंबी दूरी तक माल ढोने के लिए ट्रेन में डिब्बे भी ज्यादा लगाते हैं. तो डबल लंबाई और डबल ऊंचाई, तो एक ट्रेन अब चार सामान्य ट्रेनों जितना माल ले जा सकती है. स्पीड भी 100 km/h तक हो सकती है क्योंकि पूरी लाइन ही मालगाड़ी की है. पैसेंजर ट्रेनों के लिए रुकना ही नहीं है. पुरानी लाइनों पर मालगाड़ियां औसतन 25 km/h ही चल पाती थीं. ट्रक से जिस माल को पहुंचने में 30 घंटे लगते हैं, वही माल अब इससे 10-12 घंटे में पहुंच जाता है. तो फायदा हर लेवल पर है. आप ये देखो कि पहले लॉजिस्टिक्स यानी माल ढोने का खर्च देश की जीडीपी का लगभग 14% था, जो बाकी देशों से बहुत ज्यादा था। यानी हमारे यहां ज्यादातर सामान की कीमत का बड़ा हिस्सा तो उसकी ढुलाई के खर्चे का होता था. अब ये घटकर 8-9 % के आसपास आ रहा है. माल सस्ता भी पहुंचता है और जल्दी भी पहुंचता है. किसानों का अनाज हो, फैक्टरियों का माल हो, कच्चा माल हो, तैयार सामान हो, सब में फायदा है. और लोगों को रेल का सीधा फायदा तो ये कि पुरानी रेल लाइनों से मालगाड़ियां हटने से बाक़ी यात्री ट्रेनें ज्यादा चलाई जा सकती हैं और टाइम पर चल सकती हैं. क्योंकि ये भी प्रॉब्लम खड़ी हो गई थी कि दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा जैसे व्यस्त रूट पर यात्री बढ़े जा रहे हैं और वो वंदे भारत जैसी ट्रेनों के लिए पैसा देने को भी तैयार दिख रहे हैं लेकिन पटरियां ही इतनी नहीं थीं कि और ट्रेनें चला सकें. तो पटरियां तो और बिछाने की जरूरत थी है. यानी जितनी ट्रेनें चल सकती थीं उससे कहीं ज्यादा ट्रेनें दौड़ रही थीं पहले ही पटरियों पर इन रूट पर. इस वजह से नई यात्री ट्रेनें शुरू करना मुश्किल हो जाता था. … Read more

गैस सिलेंडर के दाम ₹400 तक आने की चर्चा, क्या बढ़ेगी LPG सब्सिडी? जानें पूरा मामला

नई दिल्ली ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद यानी CEW की एक रिपोर्ट आई है। इसमें कहा गया है कि LPG की कीमत एक ऐसा बड़ा मुद्दा है, जो सभी वर्गों के लिए चुनौती बना हुआ है। मौजूदा दरें आम आदमी की पहुंच से काफी ऊपर हैं। इसी वजह से लोग जलाऊ लकड़ी या महंगे अनौपचारिक सिलेंडरों का सहारा ले रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अगर 14.2 किलोग्राम वाले एलपीजी सिलेंडर की कीमत 400 रुपये हो जाए तो 80 प्रतिशत से अधिक लोग पूरी तरह से गैस पर आ जाएंगे। अभी सिलेंडर रिफिल करवाने की औसत भुगतान क्षमता 500 रुपये प्रति सिलेंडर है, जबकि उज्ज्वला योजना के तहत सब्सिडी वाला सिलेंडर 642 रुपये का है। प्रवासी मजदूरों को भारी दिक्कतें स्टडी के अनुसार, प्रवासी मजदूरों में से 79 प्रतिशत के पास औपचारिक गैस कनेक्शन नहीं है और 4 प्रतिशत से भी कम लोग प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का लाभ पा रहे हैं। यह स्थिति इसलिए और हैरान करने वाली है, क्योंकि 2021 की नीति में प्रवासी मजदूरों के लिए सेल्फ-डिक्लेरेशन के माध्यम से कनेक्शन लेने की सुविधा पहले ही दे दी गई थी। इसके बावजूद जागरूकता की कमी और कागजी प्रक्रियाओं में उलझन के कारण प्रवासी मजदूर इस योजना से दूर हैं। सीईडब्ल्यू की फेलो प्रार्थना बराह का कहना है कि सरकार का यह सोचना कि केवल एलपीजी कनेक्शन दे देने भर से काम हो जाएगा, सही नहीं है। असली चुनौती यह है कि लोग नियमित रूप से गैस रिफिल करवा पाएं, प्रवासी मजदूरों को उज्ज्वला योजना की पूरी जानकारी हो और ग्रामीण घरों तक सिलेंडर भरोसेमंद ढंग से पहुंचते रहें। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत की स्वच्छ हवा की नीति को केवल 'कनेक्शन देने' से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि साफ ईंधन सस्ता, भरोसेमंद और लंबे समय तक टिकाऊ हो। शहरी झुग्गियों और प्रवासियों की स्थिति शहरी अनौपचारिक बस्तियों में 70 प्रतिशत लोग पूरी तरह से गैस का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन बिना औपचारिक कनेक्शन वाले 31 प्रतिशत लोगों को एड्रेस प्रूफ न होने के कारण कनेक्शन देने से मना कर दिया जाता है। इस वजह से 11 प्रतिशत लोग वास्तविक रिटेल प्राइस के बजाय 1,040 रुपये तक अनौपचारिक रूप से सिलेंडर खरीदने को मजबूर हैं। वहीं, प्रवासी मजदूरों में से 70 प्रतिशत, जो खुले स्थानों में रहते हैं, पूरी तरह से ठोस ईंधनों जैसे लकड़ी और कोयले पर निर्भर हैं। जो प्रवासी अनौपचारिक रूप से गैस खरीदते हैं, उन्हें 71 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान करना पड़ता है, जो आधिकारिक दर से 20 प्रतिशत से अधिक महंगा है। 200 रुपये और बढ़े सब्सिडी सीईडब्ल्यू की पहली सिफारिश यह है कि पेट्रोलियम मंत्रालय को उज्ज्वला सब्सिडी को प्रति सिलेंडर लगभग 200 रुपये बढ़ाना चाहिए। दूसरा सुझाव प्रवासी मजदूरों के लिए विशेष पंजीकरण अभियान चलाने का है, ताकि वे आसानी से उज्ज्वला योजना से जुड़ सकें। तीसरा, स्मार्ट मीटर कियोस्क की पायलट परियोजनाएं शुरू करने की सिफारिश की गई है, ताकि लोग छोटी-छोटी किस्तों में गैस के पैसे जमा कर सकें। ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर डिलीवरी बढ़ाने के लिए विक्रेताओं को अलग-अलग कमीशन देने का सुझाव दिया गया है, ताकि दूर-दराज के इलाकों में भी सिलेंडर पहुंच सकें।

‘मां के पैर छूकर माफी मांगिए’, संपत्ति विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को दिया भावुक संदेश

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में मां-बेटे के संपत्ति विवाद में एक अलग ही नजारा देखने को मिला. कोर्ट ने बेटे से कहा कि मां के पैर छूकर माफी मांगो और अपने पापों के लिए माफी मांगो. दरअसल, कोर्ट ने इस विवाद की सुनवाई के दौरान बेटे को मां के पास जाकर माफी मांगने और आशीर्वाद लेने की सलाह थी. कोर्ट ने कहा कि मां का स्थान हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है.जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी.  सुनवाई के दौरान जस्टिस शर्मा ने बेटे से मौखिक रूप से कहा कि आपको अपनी मां के पैर छूकर माफी मांगनी चाहिए, अपने सभी पापों के लिए माफी मांगिए।  क्या बेटे का ऐसा करना गलत नहीं है- सुप्रीम कोर्ट जस्टिस शर्मा ने अदालत में मौजूद वकील को संबोधित करते हुए भी कहा कि क्या बेटे का ऐसा करना गलत नहीं है? हम बेटे से कह रहे हैं कि वापस मां के पास जाए, उनके पैर छूए, उन्हें महसूस करे, माफी मांगे और उनका आशीर्वाद ले. मामला उस संपत्ति से जुड़ा है, जिसकी मां और उनके पति एकमात्र मालिक हैं.  माता-पिता ने प्रेम और स्नेह के चलते बेटे और उसकी पत्नी को संपत्ति की पहली मंजिल पर बिना किराए के लाइसेंसी के तौर पर रहने की अनुमति दी थी।  बेटे और उसकी पत्नी पर परेशान करने के आरोप माता-पिता का आरोप था कि बाद में बेटे और उसकी पत्नी ने उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया और संपत्ति उनके नाम ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाया. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बेटे ने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा किया. इसके बाद माता-पिता ने अखबार में सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित कर बेटे से संबंध समाप्त करने की घोषणा की. उन्होंने बेटे के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई और संपत्ति खाली करने को कहा. माता-पिता ने संपत्ति का कब्जा वापस लेने, स्थायी निषेधाज्ञा और हर्जाने की मांग को लेकर मुकदमा दायर किया।  माता-पिता ही संपत्ति के एकमात्र मालिक थे- ट्रायल कोर्ट ने माना ट्रायल कोर्ट ने माना कि माता-पिता संपत्ति के एकमात्र मालिक हैं और बेटे तथा उसकी पत्नी केवल लाइसेंसी हैं. लाइसेंस वैध रूप से समाप्त किए जाने के बाद दोनों को पहली मंजिल का कब्जा खाली करना होगा. दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 अप्रैल को ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. इसके बाद बेटे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की तो सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने बेटे को मां के पास जाकर माफी मांगने और उनका आशीर्वाद लेने की मौखिक सलाह भी दी। 

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर! 8th Pay Commission में बदल सकता है 40 साल पुराना नियम

नई दिल्ली आठवें वेतन आयोग की सिफारिशो का इंतजार बेसब्री से हो रहा है। वेतन आयोग से कर्मचारी संगठनों की डिमांड भी तरह-तरह की है। ऐसी ही एक डिमांड पेंशनभोगियों की भी है। यह डिमांड अगर लागू हो जाता है रिटायर केंद्रीय कर्मचारियों के लिए 40 साल पुराने नियम में बदलाव हो जाएगा। क्या है डिमांड? केंद्र सरकार के पेंशनभोगियों और कर्मचारी संगठनों की मांग है कि कम्युटेड पेंशन (समय से पहले ली गई पेंशन) को बहाल करने की 15 साल की अवधि को कम किया जाए। कई संगठनों ने 8वें वेतन आयोग से सिफारिश की है कि इसे 10 से 12 साल बाद बहाल किया जाए। उनका तर्क है कि मौजूदा नियम उन वित्तीय और एक्चुअरियल मान्यताओं पर आधारित है जो कई दशक पुरानी हैं। बता दें कि साल 1986 में कम्युटेड पेंशन के 15 साल वाले नियम को लागू किया गया था। कहने का मतलब है कि यह 40 साल पुराना नियम है। पेंशन कम्युटेशन क्या है? केंद्र सरकार के कर्मचारी रिटायरमेंट के समय अपनी बेसिक पेंशन का 40% तक कम्युट (समय से पहले एकमुश्त लेना) करवा सकते हैं और उस रकम को एकमुश्त पा सकते हैं। इसके बदले, कम्युट किए गए हिस्से को उनकी मासिक पेंशन से काट लिया जाता है। मौजूदा नियमों के तहत, काटी गई पेंशन 15 साल बाद बहाल कर दी जाती है। क्यों उठ रहे सवाल? कर्मचारी और पेंशनभोगी संगठनों का तर्क है कि जब यह सिस्टम लागू किया गया था तब की वित्तीय और जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) स्थितियां अब काफी बदल चुकी हैं। बता दें कि नेशनल काउंसिल ऑफ द जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM), ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन (AIDEF) और फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गेनाइजेशन्स (FNPO) ने बहाली की अवधि 11 साल करने की मांग की है। इसके अलावा, इंडियन रेलवेज टेक्निकल सुपरवाइजर्स एसोसिएशन ने 12 साल का प्रस्ताव दिया है, जबकि ऑल इंडिया न्यू पेंशन स्कीम एम्प्लॉइज फेडरेशन ने 10 साल की मांग की है। भारत पेंशनर्स समाज और ऑल पेंशनर्स एसोसिएशन ने भी 11 साल की सिफारिश की है। ₹100 की कम्युटेड पेंशन का उदाहरण नेशनल काउंसिल ऑफ द जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी ने 100 रुपये की कम्युटेड पेंशन का उदाहरण दिया है। 61 साल की उम्र के पेंशनर के लिए 8.194 के कम्युटेशन फैक्टर पर हर ₹100 मासिक पेंशन कम्युट करने पर करीब ₹9,833 की एकमुश्त राशि मिलती है। इसके बाद पेंशनर की मासिक पेंशन से ₹100 की कटौती होती है। 10 साल में कुल कटौती ₹12,000 और 15 साल में ₹18,000 हो जाती है। संगठन का तर्क है कि करीब 10 साल में कम्युट की गई राशि की भरपाई हो जाती है और उसके बाद की कटौती की समीक्षा की जानी चाहिए।

2100 तक धरती का 40% हिस्सा बन सकता है रेगिस्तान! सूखे की मार से इंसानों और पेड़-पौधों पर बड़ा खतरा

नई दिल्ली हमारी धरती लगातार गर्म हो रही है और इसका नतीजा बेहद भयानक होने वाला है. बढ़ते तापमान के कारण दुनिया के कई इलाके तेजी से सूख रहे हैं. जब ऐसा होता है तो सूखे इलाकों की सीमाएं आगे बढ़ने लगती हैं. इससे पूरी दुनिया का लैंडस्केप बदल जाता है और पेड़-पौधे खत्म होने लगते हैं. अब साइंटिस्ट्स ने इसे लेकर एक खतरनाक अलर्ट जारी किया है. एक नई रिसर्च के मुताबिक 21वीं सदी के अंत तक धरती का 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा ड्राईलैंड्स बन सकता है।  ‘एनवायर्नमेंटल रिसर्च लेटर्स’ में पब्लिश एक रिपोर्ट में यह डरावना दावा किया गया है. हालांकि इस रिसर्च में एक हैरान करने वाली बात भी सामने आई है. क्लाइमेट चेंज के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) इस खतरे को थोड़ा धीमा कर रही है. आइए इस डरावनी रिसर्च को डिटेल में समझते हैं।  धरती पर ड्राईलैंड्स बढ़ने का कारण क्या है? ड्राईलैंड्स उन इलाकों को कहते हैं जहां पानी की भारी कमी होती है. यहां बारिश बहुत कम होती है और वाष्पीकरण के जरिए पानी ज्यादा उड़ जाता है. साइंटिस्ट्स का मानना है कि दुनिया भर में ड्राईलैंड्स लगातार बढ़ रहे हैं।  चाइनीज एकेडमी ऑफ फॉरेस्ट्री के साइंटिस्ट्स ने इसे लेकर गहराई से एनालिसिस किया है. उन्होंने दुनिया भर के क्लाइमेट डेटा और भविष्य के अनुमानों का इस्तेमाल किया. इसके लिए 1960 से 2023 तक का मौसम डेटा देखा गया. टीम ने एक नई तकनीक का इस्तेमाल करके यह पूरा डेटा तैयार किया है।      रिसर्च टीम के एक साइंटिस्ट ने कहा, ‘सूखे इलाकों का बढ़ना ग्लोबल सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए बड़ा खतरा है।  अगर सूखे इलाके उन जगहों पर फैलेंगे जहां अभी अच्छी नमी है, तो पानी की कमी और गंभीर हो जाएगी. इससे पूरे इकोसिस्टम को भारी नुकसान पहुंचेगा और रेगिस्तान तेजी से बढ़ने लगेंगे. इंसान और जानवरों के लिए पानी जुटाना भी काफी मुश्किल हो जाएगा।  1994–2023 के दौरान दुनिया भर के शुष्क क्षेत्रों और उनसे जुड़े जलवायु क्षेत्रों का भौगोलिक वितरण (a); हर जलवायु क्षेत्र का प्रतिशत (b). (Visuals Credit : Cai et al., Environmental Research Letters, 2026) कार्बन डाइऑक्साइड गैस इस खतरे को धीमा कैसे कर रही है?     इस रिसर्च में सबसे हैरान करने वाली बात कार्बन डाइऑक्साइड गैस को लेकर है. हम सभी जानते हैं कि यह गैस ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे बड़ा कारण है. लेकिन यही गैस धरती को पूरी तरह सूखने से थोड़ा बचा भी रही है।      दरअसल वातावरण में जब CO2 का लेवल बढ़ता है तो इसका असर पौधों पर पड़ता है. पौधों की पत्तियों में छोटे छेद होते हैं जिन्हें स्टोमेटा कहा जाता है. ज्यादा CO2 होने पर यह स्टोमेटा पूरी तरह नहीं खुलते हैं. इससे पौधों के अंदर का पानी भाप बनकर कम उड़ता है. इस वजह से पेड़-पौधे लंबे समय तक अपने अंदर पानी बचाकर रख पाते हैं।      स्टोमेटा के आंशिक रूप से बंद होने के कारण पानी का नुकसान काफी कम हो जाता है. साइंटिस्ट्स का कहना है कि पुरानी रिसर्च में इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया था. पुराने क्लाइमेट मॉडल में इस खास फैक्टर को इग्नोर कर दिया गया था. इसीलिए पहले की कुछ रिपोर्ट्स में 2100 तक 56 प्रतिशत धरती के सूखने का दावा किया गया था. लेकिन नई कैलकुलेशन के बाद इसे करीब 40 प्रतिशत माना गया है।  फिलहाल धरती के कितने हिस्से पर मौजूद है सूखा और बंजर इलाका? रिसर्च टीम ने 1994 से 2023 के बेसलाइन डेटा के आधार पर नई जानकारी दी है. अंटार्कटिका को छोड़कर फिलहाल धरती का करीब 38.58 प्रतिशत हिस्सा ड्राईलैंड्स है. इन सूखे इलाकों को चार अलग-अलग कैटिगरी में बांटा गया है। 

PM मोदी के 25 साल के सफर का जश्न, वडनगर से वाराणसी तक BJP निकालेगी खास यात्रा; जानें पूरा कार्यक्रम

बनारस   पीएम मोदी के 25 साल के शासन को भव्य तरीके से मनाए जाने की तैयारी है. इस मौके पर बनारस से वडनगर तक कलश यात्रा का ऐलान क‍िया गया है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने कहा क‍ि 7 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन सेवा और समर्पण के 25 साल पूरे होने वाले हैं. ऐसे में अगले महीने 'सेवा संकल्प अभियान' आयोजित क‍िया जाएगा. 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक एक महीने तक चलने वाला 'सेवा संकल्प अभियान' आयोजित होगा. 17 सितंबर को हम हर वर्ष सेवा दिवस के रूप में मनाते हैं और पूरा कार्यक्रम सेवा पखवाड़ा के रूप में मनाते हैं।   भाजपा अध्‍यक्ष ने कहा, पीएम मोदी ने पिछले 25 वर्षों में जन सेवा से राष्ट्रसेवा के मंत्र को पकड़ते हुए पूरी तरह से सेवा यात्रा को जारी रखा है. 25 करोड़ गरीब परिवारों को गरीबी रेखा से बाहर लाना, 80 करोड़ लोगों को राशन उपलब्ध कराना, 100 करोड़ लोगों से अधिक को सामाजिक सुरक्षा योजना से जोड़ना, 12 करोड़ शौचालय, कोविड की फ्री वैक्सीन और 4 करोड़ से अधिक गरीबों के लिए आवास बनाना सामान्य घटना नहीं है. उनका सफर एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में प्रारंभ हुआ और आज देश के प्रधान सेवक के रूप में उन्होंने काम को आगे बढ़ाया, यह केवल उनके स्पष्ट विजन, दृढ़संकल्प और सामाजिक जीवन में लगातार गुणात्मक परिवर्तन कैसे आए, कैसे लोगों के जीवन में बदलाव आए इसका प्रयास उन्होंने किया।  'आज भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में सामने आ रहा है'  नितिन नवीन ने आगे कहा, ''पीएम मोदी ने जब देश का नेतृत्व संभाला तो पूरे देश में एक निराशा, एक अंधकार का माहौल था, पॉलिसी पैरालिसिस कह सकते हैं हमारे इकोनॉमी को फ्रेजाइल फाइव के रूप में देखा जाता था, लेकिन आज भारत दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में सामने आ रहा है।  7 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच सभी स्कूलों में होंगे कार्यक्रम उन्‍होंने कहा, "प्रधानमंत्री के जन्मदिन 17 सितंबर को हर वर्ष हम सेवा दिवस के रूप में मनाते हैं. 17 सितंबर को रक्तदान शिविर का आयोजन किया जाएगा. 17 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच सभी स्कूलों में चित्रकारी, ड्राइंग और भाषण प्रतियोगिता कराई जाएगी. इसमें उत्कृष्ट चित्रों को और भाषण प्रतियोगिताओं के विजेताओं को मुख्यमंत्री के स्तर पर और अन्य केंद्रीय मंत्री के स्तर पर प्रमाण पत्र देने की योजना है।  सभी जिलों में सेवा ज्योतिकलश यात्रा के माध्यम से होंगे कार्यक्रम उन्‍होंने कहा क‍ि 7 अक्टूबर, जिस दिन 'हेडऑफ द गवर्नमेंट' के रूप में प्रधानमंत्री के जनसेवा और समर्पण के 25 साल पूरे होंगे, उस दिन देशभर के सभी जिलों में सेवा ज्योतिकलश यात्रा के माध्यम से कार्यक्रम करेंगे. इस कार्यक्रम में उनके 25 वर्षों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाएगी, इस कार्यक्रम में विकसित भारत 2047 का भी संकल्प लिया जाएगा। 

मोदी कैबिनेट का बड़ा फैसला! 7 रेलवे प्रोजेक्ट्स को मिली 4 लेन की मंजूरी, ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने की उम्मीद

नई दिल्ली केंद्रीय कैबिनेट की बुधवार को हुई बैठक में रेलवे के 7 सबसे व्यस्त (हाई डेंसिटी) रूट्स को फोर लेन ट्रैक करने की मंजूरी दे दी गई. अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट के फैसलों की सूचना देते हुए इसका ऐलान किया. हालांकि, इससे करीब 2 हफ्ते पहले 26 अगस्त को वह इन रूट्स को फोर लेने किए जाने की जानकारी दे चुके थे.इन परियोजनाओं के तहत करीब 656 किमी नई रेल लाइनें जोड़ी या अपग्रेड की जाएंगी. इसके लिए कुल 10,783 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. इससे रेलवे के मौजूदा नेटवर्क की क्षमता बढ़ेगी और ट्रेनों के संचालन में सुधार होगा।  इन परियोजनाओं का फायदा पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 14 जिलों को मिलेगा. करीब 4,790 गांव इन परियोजनाओं से बेहतर रेल कनेक्टिविटी से जुड़ेंगे. इन गांवों में लगभग 56 लाख लोगों की आबादी रहती है. नई लाइनें बनने से यात्री ट्रेनों के साथ मालगाड़ियों की आवाजाही भी आसान होगी।  11,000 किलोमीटर लंबा ट्रैक होगा 4-लेन केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि अगर हम सबसे अहम रेलवे कॉरिडोर पर नजर डालें तो यह 11,000 किलोमीटर लंबे, 7 हाई-डेंसिटी कॉरिडोर हैं. इन हाई-डेंसिटी कॉरिडोर को 4-लेन का बनाया जा रहा है और कई दूसरे कॉरिडोर पर भी काम चल रहा है. ये आने वाले समय में बहुत ज्‍यादा ट्रैफिक संभालेंगे।  ये रूट संभालते हैं 40% भीड़ का हिस्‍सा दिल्ली से मुंबई, मुंबई से चेन्नई, चेन्नई से कोलकाता और कोलकाता से मुंबई – यह 'गोल्डन क्वाड्रिलैटरल' है. ये 7 कॉरिडोर रेलवे के कुल ट्रैफिक का लगभग 40% हिस्सा संभालते हैं. इन कॉरिडोर में से लगभग 2,000 किलोमीटर पहले ही 4-लेन का हो चुका है. लगभग 5,000 किलोमीटर पर काम चल रहा है या उसे मंजूरी मिल चुकी है और बाकी 4,000 किलोमीटर के लिए अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है।  3-मल्‍टी ट्रैकिंग प्रोजेक्‍ट को भी मंजूरी  4 लेन प्रोजेकट के अलावा, कैबिनेट ने 5 राज्यों के 14 ज़िलों में फैले 3 मल्टी-ट्रैकिंग प्रोजेक्ट्स को भी मंजूरी दी है. इस प्रोजेकट से भारतीय रेलवे में लगभग 656 km नेटवर्क फैलेगा. इन प्रोजेक्ट्स की अनुमानित लागत ₹10,783 करोड़ है और इन्हें 2029–30 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।  5 नए प्रोजेक्‍ट की भी मंजूरी केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा‍ कि केंद्रीय कैबिनेट ने तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना राज्यों के 17 जिलों में 5 मल्टी-ट्रैकिंग प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दी है. इन प्रोजेक्ट्स से भारतीय रेलवे का मौजूदा नेटवर्क लगभग 540 किलोमीटर बढ़ जाएगा. इन प्रोजेक्ट्स की कुल अनुमानित लागत 10,021 करोड़ रुपये है और इन्हें 2029-30 तक पूरा करने की योजना है।  कौन-कौन सी रेल लाइनें होंगी अपग्रेड सरकार ने खड़गपुर-झारसुगुड़ा सेक्शन में बागडेही तक 4th लाइन, कटनी-पेंड्रा रोड 4th लाइन और बिलासपुर यानी उसलापुर-पेंड्रा रोड 3rd लाइन को मंजूरी दी है. इन लाइनों के मल्टीट्रैकिंग से मौजूदा रेल रूट पर ट्रेनों के लिए अतिरिक्त क्षमता तैयार होगी।  रेलवे का ट्रैफिक जाम होगा कम नई रेल लाइनों के जुड़ने से मौजूदा रूट पर ट्रेनों का कंजेशन कम करने में मदद मिलेगी. ट्रेनों का संचालन ज्यादा सुचारू होगा और यात्री तथा मालगाड़ियों को अलग-अलग समय और रूट पर चलाने की सुविधा बढ़ेगी. इससे माल ढुलाई की क्षमता भी मजबूत होगी।  पर्यटन और धार्मिक स्थलों को फायदा इन परियोजनाओं से कई प्रमुख पर्यटन और धार्मिक स्थलों की रेल कनेक्टिविटी बेहतर होगी. इनमें पुरी का जगन्नाथ मंदिर, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व, अमरकंटक, अचानकमार टाइगर रिजर्व, तारातारिणी मंदिर और रतनपुर महामाया मंदिर जैसे प्रमुख स्थल शामिल हैं. बेहतर रेल कनेक्टिविटी से इन क्षेत्रों में पर्यटन और स्थानीय कारोबार को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। 

सरकारी बैंक के निजीकरण पर बड़ा अपडेट, IDBI Bank की 60.72% हिस्सेदारी बेचने की डील अंतिम चरण में

    नई दिल्ली करीब 5 साल से इस सरकारी बैंक को प्राइवेट के हाथों में सौंपने के लिए कोशिशें चल रही थीं. लेकिन हर बार मामला अटक जाता था. लेकिन अब खबर है कि आईडीबीआई (IDBI) बैंक के निजीकरण और रणनीतिक विनिवेश की प्रक्रिया अपने अंतिम दौर में पहुंच गई है।  दरअसल, केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) मिलकर बैंक में अपनी 60.72% हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में हैं. खरीदारों की रेस में कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स सबसे आगे चल रही है, जिसने लगभग 53,000 करोड़ रुपये के वैल्यूएशन का संशोधित प्रस्ताव पेश किया है।  साल 2021 से जारी इस प्रक्रिया में नियामक देरी और बोलियों के उतार-चढ़ाव के बाद, अब सरकार सही समय पर डील के आधिकारिक ऐलान पर विचार कर रही है. IDBI बैंक में केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) की 60.72% रणनीतिक हिस्सेदारी की बिक्री अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। सही समय पर ऐलान की तैयारी  सूत्रों के मुताबिक सरकार अब इस सौदे की औपचारिक घोषणा के सही समय पर विचार कर रही है. IDBI खरीदने के लिए कनाडा की प्रेम वात्सा के स्वामित्व वाली फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स (Fairfax Financial Holdings) ने सबसे बड़ी बोली लगाई है।  शुरुआत में इस सौदे में कुछ अड़चनें आई थीं, क्योंकि शुरुआती बोलियां सरकार के रिजर्व प्राइस से कम थीं. इसके बाद बोलीदाताओं को अपने ऑफर संशोधित करने का मौका दिया गया. रिपोर्ट के मुताबिक फेयरफैक्स ने अपने प्रस्ताव में सुधार किया है, जो अब करीब 81 रुपये प्रति शेयर के आसपास समझा जा रहा है. इस दर पर 60.72% हिस्सेदारी का कुल वैल्यूएशन लगभग 53,000 करोड़ रुपये बैठता है।   IDBI बैंक में सरकार और LIC की कितनी हिस्सेदारी इस रणनीतिक विनिवेश प्रक्रिया के तहत सरकार अपनी 30.48% हिस्सेदारी बेच रही है. जबकि LIC अपनी 30.24% हिस्सेदारी बेच रही है।  बता दें, IDBI बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया 2021 में शुरू की गई थी. नियामक मंजूरी और प्रक्रियात्मक कारणों के चलते इसमें कई बार देरी हुई. हालांकि, फेयरफैक्स की ओर से मिली नई बोली और निरंतर रुचि से साफ है कि यह विनिवेश प्रक्रिया सही दिशा में आगे बढ़ रही है।  फिलहाल सरकार यह मूल्यांकन कर रही है कि फेयरफैक्स का नया संशोधित प्रस्ताव बैंक के सही मूल्यांकन के अनुकूल है या नहीं. सभी पहलुओं की जांच पूरी होते ही आधिकारिक घोषणा की तारीख तय कर दी जाएगी. इस खबर की वजह से IDBI बैंक के शेयर में भी हलचल देखने को मिल रही है. बुधवार को शेयर मामूली गिरावट के साथ 81 रुपये पर बंद हुआ. इससे पहले मंगलवार को शेयर में 10 फीसदी से ज्यादा की गिरावट देखी गई थी।   

गणेश चतुर्थी पर बड़ा तोहफा, आंध्र प्रदेश में गणेश पंडालों को मुफ्त बिजली देगी सरकार

अमरावती गणेश चतुर्थी से पहले आंध्र प्रदेश सरकार ने बड़ा ऐलान किया है. राज्य में गणेश उत्सव के लिए लगाए जाने वाले सभी पंडालों को मुफ्त बिजली दी जाएगी. आंध्र प्रदेश के शिक्षा मंत्री नारा लोकेश ने इसकी जानकारी दी. सरकार के इस फैसले से गणेश उत्सव मनाने वाले आयोजकों को बिजली के खर्च से राहत मिलेगी।  नारा लोकेश ने ट्वीट कर बताया कि इस गणेश चतुर्थी पर आंध्र प्रदेश के सभी गणेश पंडालों को मुफ्त बिजली दी जाएगी. उन्होंने कहा कि यह सुविधा पूरे राज्य में लागू होगी. इससे पंडाल लगाने वालों को बिजली के बिल का खर्च नहीं उठाना पड़ेगा।  नारा लोकेश ने इस बड़ी राहत का ऐलान करते हुए कहा कि उत्सव की भव्यता को बढ़ाने के लिए यह फैसला लिया गया है. हर साल गली-मोहल्लों में पंडाल सजाने वाली समितियों का एक बड़ा बजट बिजली कनेक्शन, मीटर और बिल भरने में खर्च हो जाता था. सरकारी ऐलान के बाद अब पंडालों को रोशनी के लिए जेब खाली नहीं करनी पड़ेगी।  त्योहारी सीजन में लोगों को राहत देने का यह अकेला फैसला नहीं है. इससे ठीक एक दिन पहले महाराष्ट्र से भी गणेश भक्तों के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई थी. PWD मिनिस्टर शिवेंद्रसिंहराजे भोंसले ने जानकारी दी थी कि मुंबई से कोंकण जाने वाले लोगों को नेशनल हाईवे पर कोई टोल टैक्स नहीं देना होगा।  महाराष्ट्र में मुंबई से कोंकण जाने वाले गोवा हाईवे और पुणे-बेंगलुरु हाईवे पर 11 सितंबर से 27 सितंबर तक टोल वसूली पूरी तरह बंद रहेगी. इससे सिंधुदुर्ग या कोल्हापुर की तरफ अपने पैतृक गांव जा रहे परिवारों के 650 से 700 रुपये तक बचेंगे. साथ ही टोल प्लाजा पर लगने वाले लंबे जाम से भी छुटकारा मिलेगा. दक्षिण से लेकर पश्चिम तक, सरकारों के इन फैसलों से गणेशोत्सव की खुशियां दोगुनी हो गई हैं।