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US-ईरान समझौते के बीच पाकिस्तान को इजरायल ने दिखाया आईना, राजदूत बोले- भरोसे लायक नहीं

यरुशलम अमेरिका और ईरान के बीच हुआ शांति समझौता पश्चिम एशिया की जियोपॉलिटिक्स को बदल रहा है. इजरायल इस समझौते से खुश नहीं है. इस समझौते में पाकिस्तान ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई है. इस पर भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने शांति की कोशिशों में पाकिस्तान की किसी भी भूमिका की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया है. उन्होंने साफ कहा कि इजरायल, पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करता।  न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए अजार ने कहा कि 'मैंने कई इंटरव्यू में यह बात कही है. हम पाकिस्तानियों पर भरोसा नहीं करते. मुझे लगता है कि उनका व्यवहार निंदनीय रहा है. जैसे- इजरायल के प्रति उनका रवैया, उनके रक्षा मंत्री की यहूदी-विरोधी टिप्पणियां वगैरह. इसलिए इसमें कुछ भी नया नहीं है।  उनकी यह टिप्पणी तब आई है, जब हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि इजरायल और पाकिस्तान के बीच राजनयिक संबंध न होने के बावजूद पाकिस्तान इस क्षेत्र में भूमिका निभा सकता है।  इजरायल और पाकिस्तान के बीच रिश्ते हमेशा से कड़वाहट भरे रहे हैं. दोनों के बीच अप्रैल में तनाव तब बढ़ गया था जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इजरायल को बुरा और मानवता के लिए अभिशाप बता दिया था. आसिफ ने इजरायल को 'कैंसर' तक कह दिया था और इजरायलियों के लिए 'नरक में जलने' की दुआ की थी. इसके जवाब में इजरायल ने ख्वाजा आसिफ के बयान को 'बेहद आपत्तिजनक' बताया था और निष्पक्ष मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे।  इंटरव्यू के दौरान रूवेन अजार ने अमेरिका-ईरान डील में लेबनान के शामिल होने की बात को भी खारिज कर दिया. उन्होंने दावा किया कि ये डील स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने के लिए हुई है. उन्होंने कहा कि हमारे पास जो जानकारी है, उससे लगता है कि सबसे जरूरी बात होर्मुज स्ट्रेट को खोलने की है. टोल वसूलने या अमेरिका से मुआवजा पाने जैसी उनकी सारी कल्पनाएं अब खत्म हो चुकी हैं।  उन्होंने दावा करते हुए कहा कि 'लेबनान इस समझौते का हिस्सा नहीं है. लेबनान के भविष्य का फैसला लेबनान की सरकार को करना है, जो इस समय इजरायल के साथ शांति समझौते पर बातचीत कर रही है.' उन्होंने कहा, 'हमारे रक्षा मंत्री ने साफ तौर पर कहा कि हम लेबनान समेत अपने सभी बफर जोन में बने रहेंगे और अपनी सुरक्षा के लिए जो भी जरूरी होगा, वह करेंगे।  उन्होंने कहा कि हम हिज्बुल्लाह के इंफ्रास्ट्रक्चर को खत्म करने के लिए कार्रवाई जारी रखेंगे. उन्होंने कहा कि इजरायली कैबिनेट को समझौते की शर्तों को देखना होगा और तय करना होगा कि वह क्या करना चाहती है. उन्होंने साफ किया कि इजरायल इस समझौते का हिस्सा नहीं है। 

सरकार का नया फैसला बना चर्चा का विषय, क्या बंद हो जाएंगी गैस एजेंसियां? जानिए पूरा मामला

 रामपुर  सरकार एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) के बजाय अब पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) को बढ़ावा दे रही है। जिले में भी तेजी से पीएनजी के उपभोक्ता बढ़ रहे हैं। अब शासन ने आदेश दिए हैं कि एलपीजी इस्तेमाल करने वाले शत-प्रतिशत उपभोक्ताओं के घरों तक पीएनजी पहुंचाई जाए। इसके बाद पीएनजी अपनाने वाले उपभोक्ताओं को एलपीजी कनेक्शन सरेंडर करना होगा। इससे भले ही उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी, लेकिन गैस एजेंसी पर बंदी का संकट आ जाएगा। साथ ही वहां काम करने वाले सैकड़ों स्टाफ और डिलीवरीमैन भी बेरोजगार हो जाएंगे। अमेरिका और इजरायल के बीच ईरान को लेकर चल रहे युद्ध का सबसे ज्यादा असर पेट्रोलियम पदार्थों पर पड़ा है। एलपीजी की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिसके कारण सरकार का पूरा जोर अब पीएनजी पर है। मुख्य सचिव उत्तर प्रदेश शासन एसपी गोयल ने सभी जिलों के डीएम को पत्र भेजा है, जिसमें एलपीजी उपभोक्ताओं को पीएनजी में स्विच कराने के आदेश दिए गए हैं। पत्र में युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरु मध्य क्षेत्र में हाल की घटनाओं के कारण एलपीजी पर निर्भरता कम करने और खाना पकाने के ईंधन के रूप में पीएनजी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी आवश्यक कार्रवाई किए जाने के निर्देश भी दिए हैं। इसके लिए जिला प्रशासन को अपने जिले में संचालित गैस एजेंसियों संचालकों एवं प्रतिनिधियों के साथ समन्वय स्थापित करते हुए उपलब्धता के आधार पर एलपीजी उपभोक्ताओं को शत-प्रतिशत पीएनजी पर स्विच कराने के लिए तत्काल कार्रवाई को कहा गया है। गैस एजेंसी संचालकों की पीड़ा गैस एजेंसी का काम अब फायदे वाला नहीं रह गया है। कई साल से एजेंसियों का कमीशन तक नहीं बढ़ा है। पीएनजी आने से एजेंसियों पर संकट मंडराने लगा है। हम इसका विरोध नहीं करते हैं, लेकिन एक एजेंसी से कई परिवार जुड़े हैं। सरकार को इस पर भी ध्यान देना चाहिए। – राजेंद्र प्रसाद, राजेंद्र गैस एजेंसी। धीरे-धीरे एलपीजी उपभोक्ता पीएनजी में तब्दील हो जाएंगे तो गैस एजेंसी संचालकों के पास आजीविका की समस्या खड़ी हो जाएगी। गैस एजेंसी से संचालक के अलावा 20 से 25 लोगों का परिवार पलता है। सरकार को इनके विषय में भी विचार करना चाहिए। – अमित दिवाकर, अध्यक्ष रामपुर एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स फेडरेशन। पीएनजी की व्यवस्था महानगरों में पहले से व्यवहार में थी, लेकिन केंद्र सरकार ने 14 मार्च 2026 को अधिसूचना जारी कर इसे पूरे देश में स्पष्ट कानूनी प्रविधान के रूप में लागू कर दिया है। अब एलपीजी वालों को एलपीजी कनेक्शन सरेंडर करना होगा। – अंकित जैन, टांडा गैस सर्विस। सरकार का जोर अब पीएनजी पर है। जिले में हिंदुस्तान पेट्रोलियम कंपनी द्वारा पीएनजी का कार्य किया जा रहा है। प्रदेश सरकार की मंशा के अनुरूप तेजी से काम किया जा रहा है। पीएनजी के करीब दो हजार कनेक्शन हो चुके हैं। – नीरज कुमार, एरिया मैनेजर एचपी।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा पर सख्ती, ब्रिटेन PM ने सोशल मीडिया प्रतिबंध का किया ऐलान

लंदन  ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने एक बड़ा ऐलान कर दिया है, उन्होंने बताया है कि वह अब 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन करने जा रहे हैं. ब्रिटेन अपने इस फैसले की मदद से बच्चों पर सोशल मीडिया की वजह से पड़ने वाले नकारात्मक असर को खत्म करना चाहता है।  बीते साल ऑस्ट्रेलिया ने टीनएजर्स और बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को बैन किया था. फिर उसके बाद यूरोप समेत कई देशों ने इस फैसले की तारीफ की थी. हाल ही में कनाडा ने भी ऐलान किया था कि वह सोशल मीडिया के लिए नियम बदलने जा रहा है और बच्चों के इस्तेमाल करने को लेकर नियम बदलेगा।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने कहा- आसान नहीं था फैसला  कीर स्टारमर ने आगे बताया है कि यह फैसला उनके लिए आसान नहीं है. कई बड़ी कंपनियां सरकार को अपना फैसला वापस लेने के लिए दबाव डाल रही हैं, लेकिन ये फैसला होकर रहेगा।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने X प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करके इस फैसले के बारे में जानकारी दी है और बताया है कि अधिकतर माता-पिता ने उनको बताया है कि उनके बच्चे स्मार्टफोन चलाने का आदि हो चुके हैं।  ब्रिटेन प्रधानमंत्री का पोस्ट  ब्रिटेन प्रधानमंत्री ने अपने पोस्ट में लिखा है कि हम 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया एक्सेस को बैन करने जा रहे हैं।   आज के दौर में बच्चों को ऐसी दुनिया में खुद को ढालना पड़ रहा है, जहां तकनीक उनकी जिंदगी के हर पहलू में दखल दे रही है. मैं अब इसे और जारी नहीं रहने दे सकता. इसलिए हम बच्चों को उनका बचपन वापस देने जा रहे हैं।  टेक कंपनियों को कई नियम लागू करने को कहा  ब्रिटेन ने हाल ही के दिनों में टेक कंपनियों के ऊपर दबाव बनाया है. सरकार ने इन कंपनियों से उम्र सत्यापन लागू करने और अपने एल्गोरिद्म में बदलाव करने के लिए के लिए कहा है. साथ ही बच्चों को अश्लील तस्वीर आदि से दूर रखने के लिए नए कदम उठाने को कहा है।  ब्रिटेन की सरकार चाहती है की ऑनलाइन गेमिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर होने वाले लाइव स्ट्रीमिंग को भी बच्चों के लिए प्रतिबंधित किया जाए। 

अब और तेज होगा सफर! भारतीय रेलवे ला रहा 220 किमी/घंटा रफ्तार वाली ट्रेनें, सुरक्षा के लिए ब्लैक बॉक्स भी

धनबाद  देश में बुलेट ट्रेन की तैयारियों के बीच रेलवे ने अब 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से सेमी हाई स्पीड ट्रेन दौड़ाने के लिए भी कसरत शुरू कर दी है।आईसीएफ यानी इंटीग्रल रेल फैक्ट्री में 100 वंदे भारत और 50 वंदे भारत स्लीपर के नए रैक का निर्माण होगा। अमृत भारत 3.0 वर्जन पटरी पर उतारने की तैयारी शुरू होगी।साथ ही 220 किमी की स्पीड से फर्राटा भरने वाली सेमी हाई स्पीड ट्रेन के रैक भी विकसित किए जाएंगे। इतना ही नहीं हवाई जहाज की तरह यात्री ट्रेनों में ब्लैक बाक्स भी होंगे। देश के अन्य जोन के साथ पूर्व मध्य रेल में ट्रेनों के मेंटेनेंस को डिजिटाइज किया जाएगा। प्रधान मुख्य यांत्रिक अभियंताओं की इसी सप्ताह होनेवाली पीसीएमई कॉन्फ्रेंस में इन सभी एजेंडा को शामिल किया गया है। रेलवे बोर्ड के संयुक्त निदेशक यांत्रिक-इंजीनियर कोचिंग प्रांजल मिश्रा की ओर से सभी जाेन को पत्र जारी किए जाने के बाद संबंधित जोनल रेलवे ने प्रेजेंटेशन समर्पित कर दिया है। आग लगने से पहले और बाद की हर गतिविधि को कैद करेगा ब्लैक बाक्स हवाई जहाज में ब्लैक बाक्स अत्यंत मजबूत इलेक्ट्रानिक डिवाइस है, जिसका उपयोग विमान दुर्घटना के कारणों एवं अंतिम समय की गतिविधियों का पता लगाने के लिए किया जाता है। इसे विमान हादसे की जांच का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक हिस्सा माना जाता है। ठीक इसी तरह ट्रेनों में लगे आग के लिए फायर डिटेक्शन सिस्टम और फायर डिटेक्शन सप्रेशन सिस्टम के लिए ब्लैक बाक्स लगाए जाएंगे। इससे मजबूत और छेड़छाड़ रहित डाटा लागर तैयार होगा। इसका उद्देश्य घटना की जांच के लिए आग लगने से पहले और बाद की गतिविधियों, सिस्टम को चालू ट्रिगर्स और सिस्टम के कामकाज के जुड़े पैरामीटर को रिकार्ड किया जा सकेगा। वंदे भारत और अमृत भारत में आन बोर्ड कंडीशन मॉनीटरिंग सिस्टम वंदे भारत और अमृत भारत जैसी ट्रेनों में ओबीसीएमएस यानी आन बोर्ड कंडीशन मानीटरिंग सिस्टम अपनाए जाएंगे। यह एक अहम डायग्नोस्टिक तकनीक है जिसकी मदद से ट्रेनों के पहिए व बेयरिंग की सुरक्षा, कार्यक्षमता और रियम टाम हेल्थ मॉनीटरिंग हो सकेगी। इससे दुर्घटनाओं की रोकथाम में काफी हद तक मदद मिलेगी। नए कोचिंग डिपो व पुराने के अपग्रेडेशन के साथ कम समय में मेंटेनेंस नए कोचिंग डिपो, कोचिंग टर्मिनल के निर्माण के साथ पुराने कोचिंग डिपो के अपग्रेडेशन की स्थिति संबंधित जोन के पीसीएमई स्पष्ट करेंगे। रैक मेंटेनेंस को कम समय में करने, स्मार्ट मेंटेनेंस और कर्मचारियों से जुड़ी बेंचमार्किंग पर भी नीतिगत चर्चा होगी। कैरेज एंड वैगन विभाग के कर्मचारियों के लिए दुर्घटना व बेपटरी होने जैसी घटनाओं के लिए ट्रेनिंग माड्यूल तय होगा। गरीब रथ ट्रेनों के रैक के उपयोग पर भी निर्णय होंगे।  

क्या आप ज्यादा पैसे देकर पी रहे हैं ट्रेन की चाय? रेलवे के तय रेट जानकर रह जाएंगे हैरान

नई दिल्ली भले ही ट्रेन की चाय कैसी भी हो, लेकिन जब लोग ट्रेन में सफर करते हैं तो चाय पी ही लेते हैं. आपने देखा होगा कि ट्रेन में कई तरह की चाय मिलती है, एक चाय तो वो होती है, जो बिना टी बैग के होती है, लेकिन एक वो होती है जिसमें टी बैग भी होता है. इन चाय के रेट भी अलग-अलग वसूले जाते हैं. लेकिन, क्या आप  जानते हैं कि ट्रेन में बिकने वाली चाय की असली रेट कितनी होती है यानी सरकार की ओर से इनकी कितनी रेट तय की गई है? बता दें कि इससे ज्यादा रेट में ट्रेन में चाय नहीं बेची जा सकती है।  आमतौर पर ट्रेन में वेंडर या कैटरिंग स्टाफ एक कप चाय 10 रुपये में बेचते हैं, लेकिन असली रेट काफी अलग है. रेलवे की आधिकारिक कैटरिंग दरों के अनुसार, सामान्य ट्रेनों में मिलने वाली 150 मिलीलीटर स्टैंडर्ड चाय की कीमत सिर्फ 5 रुपये तय है. अगर आपको इसी कैटेगरी की चाय 10 रुपये में बेची जा रही है तो उसकी कीमत तय दर से दोगुनी है।  लेकिन, टीबैग वाली चाय के रेट अलग है. रेलवे के नियमों के अनुसार, टी बैग वाली चाय 10 रुपये की मिलती है. इसके अलावा इंस्टेंट कॉफी के रेट भी 10 रुपये हैं. हालांकि कुछ विशेष ट्रेनों में व्यवस्था अलग होती है. उदाहरण के लिए हमसफर ट्रेनों में एवीएम मशीन के  जरिए चाय दी जा रही है तो उस चाय की कीमत 10 रुपये तय है. यहां 100 मिलीलीटर चाय 120 मिलीलीटर के कप में दी जाती है।  ऐसे में जब भी आप चाय खरीदें तो इस बात का ध्यान रखें कि आखिर आप कौनसी चाय पी रहे हैं, वो स्टैंडर्ड चाय है या फिर वेंडिंग मशीन वाली चाय. रेलवे में सभी ट्रेनों के लिए एक जैसी कैटरिंग व्यवस्था नहीं होती. सामान्य मेल-एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनों में स्टैंडर्ड चाय का रेट 5 रुपये रखा गया है, जबकि कुछ प्रीमियम सेवाओं और वेंडिंग मशीन आधारित व्यवस्था में कीमत अधिक हो सकती है।  क्या हैं पानी की बोतल से जुड़े नियम? भारतीय रेलवे के नियमों के अनुसार, ट्रेन में सिर्फ रेल नीर ही बेचा जा सकता है और उसकी एक लीटर वाली बोतल की रेट 14 रुपये है. ये स्टेशन और ट्रेन दोनों में बराबर है. लेकिन, अगर कुछ परिस्थिति में वेंडर रेल नीर के अलावा दूसरी पानी की बोतल बेचता है तो वो भी कुछ निश्चित कंपनियों का पानी ही ट्रेन में बेचा जा सकता है. इसमें भी खास बात ये है कि दूसरी कंपनी की पानी की बोतल भी 14 रुपये में ही बेचनी होगी. यानी ट्रेन में कोई भी 14 रुपये से ज्यादा दाम में पानी की बोतल नहीं बेच सकता है।  

ईंधन से लेकर फर्टिलाइज़र तक राहत की उम्मीद, US-Iran तनाव कम होने का भारत को डबल फायदा

नई दिल्ली क्या आप जानते हैं कि खाड़ी देशों में होने वाले तनाव का सीधा असर आपकी रसोई और जेब पर कैसे पड़ता है? जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध चल रहा था तो भारत में सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि दूध, सब्जी से लेकर हवाई टिकट तक सब कुछ महंगा हो गया. लेकिन अब चूंकि यह युद्ध खत्म होने जा रहा है, तो अब क्या-क्या सस्ता होगा? यहां हम उन चीजों की लिस्ट दे रहे हैं।   1. रसोई गैस और कमर्शियल सिलेंडर (LPG): भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी खाड़ी देशों से आयात करता है. युद्ध के समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रोपेन और ब्यूटेन (एलपीजी के मुख्य घटक) की कीमतें 800 डॉलर प्रति मीट्रिक टन पार कर गई थीं. तनाव खत्म होने से यह कीमत गिरकर 550-600 डॉलर के दायरे में आ सकती हैं, जिससे घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों में 70 से 100 रुपये तक की कटौती देखने को मिल सकती है. हालांकि सरकार पहले से ही सिलेंडर पर सब्सिडी देती है, तो ऐसे में देखना होगा कि क्या सरकार इसे आम लोगों तक पास करेगी, या नहीं।  2. विदेशी फल और ड्राई फ्रूट्स (खजूर और अंजीर): भारत सालाना करीब 90 हजार से 1 लाख मीट्रिक टन खजूर ईरान और खाड़ी देशों से मंगाता है. समुद्री नाकेबंदी के कारण भारतीय थोक बाजारों में कीमिया और मजलूम खजूर के दाम 35 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गए थे. रूट खुलते ही सप्लाई सामान्य होने से इनके थोक और रिटेल दामों में 25 से 30 फीसदी की सीधी गिरावट आने की संभावना है।  3. सीएनजी और पीएनजी (CNG & PNG): भारत अपनी कुल नेचुरल गैस की जरूरत का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा (LNG के रूप में) कतर और यूएई जैसे देशों से इम्पोर्ट करता है. युद्ध के डर से स्पॉट एलएनजी की कीमतें 15-18 डॉलर प्रति mmBtu (Million British Thermal Units) तक पहुंच गई थीं. अब वैश्विक बाजार में गैस की कीमत घटकर 9-10 डॉलर प्रति mmBtu के स्तर पर आने की संभावना है, जिससे घरेलू स्तर पर सीएनजी और पीएनजी के दाम 4 से 6 प्रति किलो/Scm तक सस्ते हो सकते हैं।   4. रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizers): भारत सालाना लगभग 70 से 80 लाख टन यूरिया और फॉस्फेटिक खादों का आयात करता है, जिसमें ओमान और सऊदी अरब की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. सप्लाई चेन टूटने से प्रति टन आयात लागत में 50 से 70 डॉलर का उछाल आया था. होर्मुज रूट खुलने से फर्टिलाइजर कंपनियों की इनपुट कॉस्ट 12 से 15 प्रतिशत तक कम होगी, जिससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ घटेगा और खुले बाजार में खाद की किल्लत खत्म होगी।  5. प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्रियां (Polymers): भारतीय प्लास्टिक उद्योग अपनी जरूरत का लगभग 40% पॉलीमर और प्लास्टिक दाना खाड़ी देशों की पेट्रोकेमिकल रिफाइनरियों से मंगाता है. कच्चे तेल के 125 डॉलर होने से पॉलिमर के दाम 20% तक महंगे हो गए थे. कच्चे तेल की कीमतें 75-80 डॉलर के सामान्य स्तर पर आने से प्लास्टिक इनपुट कॉस्ट में 15% तक की कमी आएगी, जिससे पैकेजिंग मैटेरियल सीधे सस्ते होंगे।  6. हवाई सफर (Air Tickets): किसी भी एयरलाइंस कंपनी के कुल ऑपरेटिंग खर्च का 40% हिस्सा अकेले एटीएफ (Aviation Turbine Fuel) पर खर्च होता है. क्रूड के 125 डॉलर पार जाने से एटीएफ की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर थीं. कच्चे तेल में गिरावट के बाद एटीएफ की कीमतों में 10% से 12% की कटौती तय है, जिससे एयरलाइंस कंपनियां हवाई किराए (Airfares) में 8% से 10% तक की कमी कर सकती हैं।  7. स्क्रैप मेटल और रीसाइक्लिंग उत्पाद: भारत यूएई और खाड़ी देशों से हर साल लाखों टन एल्युमिनियम और कॉपर स्क्रैप इम्पोर्ट करता है. युद्ध के दौरान समुद्री जहाजों का भाड़ा (Freight Rate) और वॉर रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम 300% तक बढ़ गया था. शिपिंग रूट सामान्य होने से माल ढुलाई का भाड़ा 30% तक कम होने की संभावना है, जिससे घरेलू रिसाइक्लिंग यूनिट्स को कच्चा माल 8 से 10 प्रतिशत सस्ता मिलेगा।  8. इंडस्ट्रियल सल्फर (Industrial Sulfur): रबर और केमिकल इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी सल्फर का भारत एक बड़ा आयातक है. खाड़ी देशों से सप्लाई रुकने से भारत में सल्फर की घरेलू कीमतें 18% से 22% तक उछल गई थीं. रिफाइनरियों में उत्पादन सामान्य होने और शिपमेंट शुरू होने से इंडस्ट्रियल सल्फर के दाम 15% तक नीचे आ सकते हैं।   9. पेंट्स और कोटिंग्स (Paints & Solvents): पेंट्स बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (जैसे रेजिन और सॉल्वैंट्स) का करीब 50% हिस्सा पेट्रोकेमिकल डेरिवेटिव्स होता है. कच्चे तेल और गैस के दाम टूटने से पेंट कंपनियों की कुल मैन्युफैक्चरिंग लागत में 6 से 8 प्रतिशत की कमी आएगी, जिसका सीधा फायदा वे उपभोक्ताओं को कीमतों में कटौती या डिस्काउंट के रूप में देंगी।  10. ऑनलाइन डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स सेवाएं: भारत का लॉजिस्टिक्स इंडेक्स सीधे तौर पर ईंधन और परिचालन लागत से जुड़ा है. वैश्विक ऊर्जा संकट थमने से माल ढुलाई इंडेक्स (Freight Index) में 7 से 10 फीसदी की गिरावट आने का अनुमान है. इसका सीधा असर ई-कॉमर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों पर पड़ेगा, जिससे डिलीवरी चार्जेस और कूरियर फीस में 5 से 8 प्रतिशथ तक की राहत मिल सकती है। 

बिना ड्राइवर दौड़ेंगी कारें! क्या भारत में जल्द आएगी सेल्फ-ड्राइविंग टेक्नोलॉजी, जानिए पूरा प्लान

नई दिल्ली कई बार कुछ फैसले इतने टेक्निकल और जटिल होते हैं कि उनकी अहमियत तुरंत समझ में नहीं आती. लेकिन कुछ साल बाद वही फैसले आपकी डेली-लाइफ, रूटीन और पूरी इंडस्ट्री की दिशा बदल देते हैं. ऑटोमोटिव रडार और कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म करने का सरकार फैसला भी ऐसा ही एक कदम माना जा रहा है. पहली नजर में यह सिर्फ नियमों में बदलाव जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में यह भारत को सेफ, स्मार्ट और फ्यूचर की सेल्फ-ड्राइविंग मोबिलिटी की ओर ले जाने वाला बड़ा दरवाजा खोल सकता है।  रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने 77GHz से 81GHz फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करने वाले ऑटोमोटिव रडार सिस्टम के लाइसेंस की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है. इसके अलावा 5.9GHz बैंड पर चलने वाले सिस्टम के लिए भी लाइसेंस की जरूरत खत्म कर दी गई है. यही फ्रीक्वेंसी वाहन और सड़क किनारे लगे इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल होती है. यह फैसला भारत को अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित ऑटोमोबाइल बाजारों के बराबर खड़ा करता है, जहां ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल के लिए पहले से कहीं ज्यादा आसान नियम बनाए गए हैं।  भारत में जब भी नई ऑटोमोबाइल तकनीक आती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कीमत नहीं होती, बल्कि नियमों और मंजूरियों की जटिल प्रक्रिया भी होती है. किसी नई तकनीक को बाजार में लाने के लिए कंपनियों को ज्यादा समय और पैसे खर्च करने पड़ते हैं. इसका सीधा असर ग्राहकों की जेब पर पड़ता है।  अब जब रडार बेस्ड सिस्टम के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं रहेगी, तो वाहन निर्माता कंपनियां दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर और तकनीक को भारत में भी आसानी से ला सकेंगी. उन्हें भारत के लिए अलग एडिशन तैयार करने की जरूरत कम पड़ेगी. इससे लागत घट सकती है और नई तकनीकियों का इस्तेमाल आसान और तेज हो जाएगा।  ADAS अब लग्जरी फीचर नहीं रहेगा कुछ साल पहले तक ADAS यानी एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम केवल महंगी लग्जरी कारों में देखने को मिलता था. लेकिन अब धीरे-धीरे यह तकनीक मुख्यधारा की कारों तक पहुंच रही है. अब कम दाम या यूं कहें कि मिड-साइज एसयूवी और अन्य कारों में भी यह फीचर दिया जाने लगा है. कम्पटीशन के इस दौर में तकरीबन हर वाहन निर्माता की कोशिश है कि, वो अपनी काम में अपने प्रतिद्वंदी के मुकाबले ज्यादा फीचर दे सके. इसके लिए ग्राहक ज्यादा पैसे खर्च करने को भी तैयार हैं।  ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, अडैप्टिव क्रूज कंट्रोल और ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग जैसे फीचर्स रडार सेंसर की मदद से काम करते हैं. ये सिस्टम सिर्फ सुविधा नहीं देते, बल्कि कई बार गंभीर दुर्घटनाओं को रोकने में भी मदद करते हैं. भारत में अब तक ADAS तकनीक का इस्तेमाल सिमित रहा है. इसकी एक वजह लागत और दूसरी वजह नियम और प्रोसेस हैं. ऐसे में लाइसेंस की बाध्यता हटना इस तकनीक को ज्यादा तेजी से फैलाने में मदद कर सकता है।  सेल्फ-ड्राइविंग कारों की बुनियाद आज दुनिया के कई देश सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों पर तेजी से काम कर रहे हैं. भारत अभी उस लेवल से काफी दूर है, लेकिन किसी भी तकनीक की शुरुआत इंफ्रा से ही होती है. रडार सेंसर और व्हीकल कम्युनिकेशन सिस्टम भविष्य में आने वाली ऑटोनॉमस यानी सेल्फ-ड्राइविंग कारों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक हैं. इसलिए यह फैसला सिर्फ आज की कारों के लिए नहीं, बल्कि अगले दशक की मोबिलिटी को ध्यान में रखकर लिया गया कदम भी माना जा रहा है।  इस फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू 5.9GHz बैंड से जुड़ा है. यह V2X यानी व्हीकल-टू-एवरीथिंग सिस्टम को सपोर्ट करता है. सरल भाषा में समझें तो भविष्य में गाड़ियां सिर्फ सड़क पर नहीं चलेंगी, बल्कि एक-दूसरे से बातचीत भी करेंगी. कोई वाहन अचानक ब्रेक लगाए, किसी ब्लाइंड मोड़ के पीछे खतरा हो या कोई एम्बुलेंस तेजी से आ रही हो, तो ऐसी जानकारी पहले ही दूसरी गाड़ियों तक पहुंच सकती है। ऐसी तकनीकियां इंसानी आंखों की तरह काम करेंगी. जो सड़क पर अचानक से रिएक्ट करने की समय को कम करने में मदद करेंगी. यही कारण है कि दुनिया भर में इन्हें रोड सेफ्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।  इन कंपनियों को फायदा अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि नई तकनीक का फायदा केवल विदेशी कंपनियों को मिलता है. लेकिन इस मामले में तस्वीर कुछ अलग है. जहां मर्सिडीज बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी कंपनियां ग्लोबल टेक्नोलॉजी को आसानी से भारत ला सकेंगी. वहीं मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी भारतीय कंपनियों के लिए भी यह मौका होगा कि वे तेजी से ADAS बेस्ड फीचर्स को अपनी गाड़ियों में शामिल करें।  हालांकि ये भारतीय कंपनियां पहले से ही अपने कुछ प्रीमियम मॉडलों में ये फीचर दे रही हैं. लेकिन आने वाले समय में जब ये तकनीकी और किफायती होगी तो इसका इस्तेमाल सस्ती कारों में भी देखने को मिल सकता है. इसके अलावा Bosch, Continental और Qualcomm जैसी तकनीकी कंपनियों को भी नए अवसर मिल सकते हैं, क्योंकि आधुनिक वाहनों में इनकी टेक्नोलॉजी की मांग बढ़ेगी।  इस फैसले की सबसे मजबूत वजह रोड सेफ्टी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में भारत में लगभग पांच लाख सड़क दुर्घटनाएं हुईं और 1.77 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई. ये आंकड़े बताते हैं कि सड़क सुरक्षा केवल ट्रैफिक नियमों या बेहतर सड़कों का मुद्दा नहीं है. आधुनिक तकनीक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. ADAS और V2X जैसे सिस्टम उन परिस्थितियों में एक्स्ट्रा सेफ्टी दे सकते हैं जहां ड्राइवर की नजर या रिएक्ट करने की क्षमता कम हो जाती है।  अभी शुरुआत है, मंजिल नहीं यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सरकार ने इस टेक्नोलॉजी को अनिवार्य नहीं बनाया है. केवल लाइसेंस की बाध्यता हटाई गई है. यानी यह फैसला रास्ता साफ करता है, लेकिन यह पक्का नहीं करता कि हर नई कार में तुरंत ये तकनीकी दिखाई देने लगेंगी. फिर भी यह एक ऐसा कदम है जो इंडस्ट्री को सही दिशा देने में मददगार साबित होगा. जब नियम आसान होते हैं, लागत कम होती है और तकनीक तेजी से पहुंचती है, तो अंततः फायदा ग्राहक को ही मिलता है।   

ट्रंप-ईरान डील से नाराज इजरायल, समझौते को ठुकराया; क्या मध्य पूर्व में फिर भड़केगी जंग?

यरुशलम/वाशिंगटन मिडिल-ईस्ट में शांति स्थापित करने के अमेरिकी प्रयासों को एक बड़ा झटका लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ परमाणु सामग्री और क्षेत्रीय तनाव को कम करने के लिए किए गए समझौतों के दावों के बावजूद, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है. इस अनिश्चितता की सबसे बड़ी वजह यह है कि इजरायल इस अमेरिकी डील से पूरी तरह असहमत नजर आ रहा है।  इजरायल ने ईरान और उसके समर्थित गुटों (जैसे हिज्बुल्लाह और अन्य मिलिशिया) के खिलाफ अपने सैन्य अभियानों और हवाई हमलों को थामने के बजाय और तेज कर दिया है. बेंजामिन नेतन्याहू सरकार का रुख यह साफ करता है कि वह वॉशिंगटन की कूटनीतिक कोशिशों के भरोसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को छोड़ने के मूड में बिल्कुल नहीं है, जिससे इस क्षेत्र में एक बार फिर बड़े पैमाने पर युद्ध भड़कने की आशंका पैदा हो गई है।  ट्रंप की डील कितनी टिकाऊ?  डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में ईरान को भारी वित्तीय प्रतिबंधों से राहत देने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खुलवाने के बदले उसके समृद्ध यूरेनियम को जब्त या नष्ट करने का एक कथित खाका तैयार किया है. लेकिन इस कूटनीतिक जीत के दावों के बीच सबसे बड़ा रोड़ा इजरायल ही बनकर उभरा है।  इजरायल का मानना है कि ईरान के साथ किया जाने वाला कोई भी समझौता तब तक टिकाऊ या भरोसेमंद नहीं हो सकता, जब तक कि तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से नेस्तनाबूद न कर दिया जाए और क्षेत्र में उसके प्रॉक्सी नेटवर्क को पूरी तरह खत्म न किया जाए।  इजरायल को डर है कि इस डील की आड़ में ईरान को दोबारा आर्थिक रूप से मजबूत होने और अपने गुप्त ठिकानों पर परमाणु हथियार विकसित करने का मौका मिल जाएगा. यही कारण है कि अमेरिकी आपत्तियों के बावजूद इजरायल लगातार ईरान के रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना रहा है।  थमे नहीं हैं इजरायली हमले  अमेरिकी राष्ट्रपति की घोषणाओं को दरकिनार करते हुए इजरायली वायुसेना और खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान के भीतर और उसके पड़ोसी देशों (जैसे सीरिया और लेबनान) में स्थित ईरानी ठिकानों पर हमले जारी रखे हैं. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि जब बात इजरायल के अस्तित्व और सुरक्षा की होगी, तो वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे नहीं झुकेंगे।  इजरायल की रणनीति यह है कि इससे पहले कि ट्रंप की डील पूरी तरह से जमीन पर लागू हो और ईरान को कोई सुरक्षा कवच मिले, उसके सैन्य बुनियादी ढांचे को इतना कमजोर कर दिया जाए कि वह पलटवार करने की स्थिति में ही न रहे. इजरायल के ये निरंतर हमले सीधे तौर पर अमेरिकी मध्यस्थता वाली शांति प्रक्रिया की संप्रभुता को चुनौती दे रहे हैं।  मध्य पूर्व में बढ़ सकता है बारूदी संकट कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका इजरायल की चिंताओं को शामिल किए बिना ईरान के साथ एकतरफा समझौता आगे बढ़ाता है, तो इसके परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं. इजरायल के हमलों के जवाब में यदि ईरान ने पलटवार किया या अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया, तो यह समझौता लागू होने से पहले ही टूट जाएगा।  इसके अतिरिक्त, यदि ईरान को लगा कि अमेरिकी डील के बावजूद इजरायली हमले नहीं रुक रहे हैं, तो वह खुद भी इस समझौते से पीछे हट सकता है. अपनी बंद पड़ी परमाणु गतिविधियों को और तेज कर सकता है. ऐसे में ट्रंप की यह 'ऐतिहासिक शांति डील' सिर्फ कागजों तक सीमित रह सकती है. पूरे क्षेत्र को एक ऐसे युद्ध में धकेल सकती है जिसे संभालना अमेरिका के लिए भी मुमकिन नहीं होगा। 

मॉनसून की रफ्तार पर ब्रेक! भारत के बड़े हिस्से में सूखे जैसे हालात, सैटेलाइट इमेज ने बढ़ाई टेंशन

 नई दिल्ली जून का महीना आधा बीत चुका है, लेकिन भारत की जीवनरेखा कहे जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मॉनसून को लेकर एक बेहद हैरान और डराने वाली तस्वीर सामने आई है. सैटेलाइट इमेज और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के हालिया आंकड़ों से पता चला है कि देश के बड़े हिस्से में मॉनसून अचानक बेहद कमजोर हो गया है. अंतरिक्ष से ली गई तस्वीरों में मॉनसून का बादलों वाला पारंपरिक रूप पूरी तरह गायब नजर आ रहा है।  हालात इतने गंभीर हैं कि जून के शुरुआती दो हफ्तों में ही देश भर में बारिश का आंकड़ा सामान्य से काफी नीचे गिर गया है, जिससे खरीफ फसलों की बुआई और पानी की उपलब्धता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र में नमी की कोई कमी नहीं है, लेकिन हवा के एक अजीब बर्ताव ने मॉनसून की रफ्तार को पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है।  सैटेलाइट तस्वीरों में गायब दिखे बादल  मौसम विभाग (IMD) द्वारा 4 जून से 15 जून के बीच जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में देश भर में केवल 19.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है, जबकि सामान्य तौर पर इस दौरान 53.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी. इसका सीधा मतलब यह है कि देश इस समय 64% के भारी घाटे का सामना कर रहा है।  आईएमडी के रेनफॉल डिपार्चर मैप में मध्य, दक्षिणी और पूर्वी भारत के विशाल हिस्से पीले और लाल रंगों में रंगे हुए हैं, जो सूखे जैसे गंभीर हालात को दर्शाते हैं. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात 15 जून को भारत के INSAT-3DS सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें हैं. आमतौर पर इस मौसम में भारत का जो नक्शा बादलों की घनी सफेद चादर से ढका रहता था, वह इस बार प्रायद्वीपीय और मध्य भारत में बिल्कुल साफ और सूखा दिखाई दे रहा है।  आखिर साल 2026 में क्यों हांफ रहा है भारतीय मॉनसून? मौसम वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मॉनसून ने कुछ ही दिन पहले कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सही समय पर दस्तक दे दी थी, तो अचानक यह गायब कैसे हो गया? विशेषज्ञों का कहना है कि यह समस्या समुद्र के तापमान या पानी की कमी के कारण नहीं है, बल्कि यह धरती से कई किलोमीटर ऊपर वायुमंडल में चल रही हवाओं की आपसी जंग का नतीजा है।  इस समय आसमान की ऊपरी सतह पर बहने वाली 'वेस्टरली जेट स्ट्रीम' (पश्चिमी हवाओं का प्रवाह) अपनी सामान्य जगह से बहुत ज्यादा दक्षिण की ओर खिसक आई है. यह असामान्य बदलाव मॉनसून के सबसे मुख्य इंजन यानी 'ईस्टरली जेट' (पूर्वी हवाओं) के रास्ते में रुकावट बन गया है।  हवाओं की ऊपरी जंग ने रोका बादलों का बनना सामान्य परिस्थितियों में, ऊपरी वायुमंडल में बहने वाली ईस्टरली जेट स्ट्रीम भारत के ऊपर हवा को ऊपर की ओर खींचती है, जिससे घने बादल बनते हैं और पूरे उपमहाद्वीप में झमाझम बारिश होती है. लेकिन इस बार शक्तिशाली पश्चिमी हवाएं इस पूरी प्रक्रिया को दबा रही हैं. नतीजा यह हो रहा है कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में भरपूर नमी और पानी वाले बादल मौजूद होने के बावजूद, वे भारत की मुख्य भूमि पर बरस नहीं पा रहे हैं।  हवा का यह ऊपरी दबाव बादलों को बनने और टिकने ही नहीं दे रहा है. यही वजह है कि मॉनसून कागजों और नक्शों पर तो आगे बढ़ गया है, लेकिन जमीन पर बूंद-बूंद बारिश के लिए लोग तरस रहे हैं. मौसम वैज्ञानिक इसे मॉनसून का पूरी तरह खत्म होना नहीं, बल्कि ऊपरी वायुमंडलीय गतिकी के कारण आया एक बड़ा 'मॉनसून पॉज' (मॉनसून का ठहरना) मान रहे हैं।  क्या आने वाले दिनों में सुधरेंगे हालात? इस भीषण गर्मी और सूखे के बीच राहत की एकमात्र बात यह है कि मौसम के पूर्वानुमान मॉडल संकेत दे रहे हैं कि यह संकट स्थाई नहीं है. मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सप्ताह के अंत तक पश्चिमी जेट स्ट्रीम का यह अजीबोगरीब पैटर्न धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगेगा. जैसे ही यह पश्चिमी बाधा हटेगी, मॉनसून फिर एक्टिव होगा।  उम्मीद जताई जा रही है कि जून के आखिरी हफ्तों में हवाओं का रुख बदलेगा और मध्य तथा दक्षिण भारत के उन हिस्सों में व्यापक बारिश का दौर फिर से शुरू होगा, जो आमतौर पर इस सीजन की पहचान होते हैं. तब तक पूरे देश को मॉनसून की इस दूसरी पारी का इंतजार करना होगा। 

दुनिया में आर्थिक चुनौतियां, लेकिन भारत की घरेलू मांग बनी मजबूती की बड़ी वजह: सीतारमण

नयी दिल्ली वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि इस समय वैश्विक स्तर पर व्यापार और आपूर्ति को लेकर कई प्रकार की अनिश्चतताएं भारतीय अर्थव्यस्था के लिए चुनौती पेश कर रही हैं, हालांकि घरेलू मांग से अर्थव्यवस्था को समर्थन मिल रहा है। श्रीमती सीतारमण ने यहां "माइंडमाइन सम्मेलन 2026" के एक संवाद सत्र के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियों के बारे में पूछे जाने पर कहा कि वर्तमान में वैश्विक व्यापार में काफी अनिश्चितताएं हैं। हमारा निर्यात मजबूत है लेकिन अचानक आयात शुल्क बढ़ा दिया जाता है। हम जिन तीन वस्तुओं का सबसे अधिक आयात करते हैं उनकी कीमत और आपूर्ति दोनों में काफी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। इसके लिए विदेशी मुद्रा का भंडार मजबूत होना चाहिये।   उन्होंने कहा कि इन सबके बीच भारत के लिए राहत की बात हमारा घरेलू बाजार है, जो काफी बड़ा है। घरेलू मांग मजबूत बनी हुई है। हालांकि विनिर्माताओं के समक्ष आयातित कच्चे माल की ऊंची कीमत की चुनौती भी है। घरेलू स्तर पर मानसून की चुनौती को लेकर उन्होंने कहा कि इस बार अल-नीनो प्रभाव के कारण कम बारिश होने का अनुमान है। देश के पास अनाज का काफी बफर भंडार है, इसलिए खाद्यान्न की कमी जैसी स्थिति तो नहीं होगी, लेकिन किसानों की आमदनी पर कम मानसून का असर जरूर होगा।   उर्वरकों की कमी के बारे में उन्होंने कहा कि आगामी खरीफ सत्र के लिए उर्वरकों की कोई कमी नहीं है। रबी सत्र को लेकर चिंता थी लेकिन अब चीन से उर्वरक आने से वह चिंता भी दूर हो गयी है। विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और उससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव के बारे में वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने रिजर्व बैंक के साथ मिलकर विदेशी मुद्रा जुटाने के उपाय किये हैं। बॉन्ड बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों को आकर्षित करने के लिए कदम उठाये गये हैं। साथ ही बैंकों और सार्वजनिक कंपनियों को विदेशों से पूंजी जुटाने की अनुमति दी गयी है और इसके लिए जोखिम को कम करने की रणनीति की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक उठायेगा। इससे बैंक विदेशों से पूंजी जुटाने के लिए प्रोत्साहित होंगे।