samacharsecretary.com

योगी की रैलियों में उमड़ी भीड़, बंगाल में जीत का बनता समीकरण

बंगाल भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक में से एक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की एक प्रसिद्ध कविता है, ‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा.’ उनकी कविता की ये पंक्तियां आज बंगाल में साकार होती दिख रही है. भाजपा के मूल संगठन जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्मभूमि में अब कमल खिलने जा रहा है. पश्चिम बंगाल में मतगणना जारी है. खबर लिखे जाने तक जो रुझान सामने आए हैं, उनके मुताबक बीजेपी करीब 190 सीटों पर आगे चल रही है. इन नतीजों के पीछे पूरे संगठन की मेहनत है. लेकिन इन सबसे इतर एक फैक्टर है जिसने इन चुनावों में खासा प्रभाव डाला है. विशेषकर जिन सीटों पर सीएम योगी ने प्रचार किया उनमें से अधिकतर सीटों पर भाजपा कब्जा करती दिख रही है. यानी योगी फैक्टर ने अपना जादू चला दिया है. बंगाल चुनाव में उत्तर प्रदेश के नेताओं की महती भूमिका रही है. देशभर में किसी भी राज्य में चुनाव हों उसमें एक जोड़ी हमेशा हिट रही है. वो है मोदी और योगी की जोड़ी. इसी तरह बंगाल के चुनाव में भी उत्तर प्रदेश के प्रमुख चेहरों ने मोर्चा संभाला. जिसमें सबसे पहले खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं. उन्होंने लगातार जनसभाएं और रैलियां की. इतना ही नहीं, उन्होंने सीधे जनता से जुड़ने का प्रयास किया. दुकान पर जाकर झालमुड़ी खाना, लोगों के बीच जाना इसका उदाहरण है. जिसने लोगों को प्रभावित किया. वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पार्टी के पक्ष में जमकर माहौल बनाया है. मुख्यमंत्री योगी की डिमांड हर राज्य में रही है. बिहार के चुनाव हों, महाराष्ट्र के चुनाव हों, ओडिशा के चुनाव हों, छत्तीसगढ़ के चुनाव हों, मध्यप्रदेश या राजस्थान के चुनाव हों, हर प्रदेश में सीएम योगी की अपनी फैन फॉलोविंग है. हिंदुत्व की छवि वाले योगी किसी भी क्षेत्र में जाकर वहां की जनता के बीच गहरी छाप छोड़ते हैं. बंगाल में भी इसका असर देखने को मिल रहा है. बंगाल में योगी की सभाओं में जबरदस्त भीड़ देखने को मिली. योगी को सुनने के लिए बड़ा जनसमूह उतरा. कई जगहों पर इतनी भीड़ दिखी कि वहां पैर रखने तक की जगह नहीं थी. कुल मिलाकर योगी ने इस भीड़ को वोट में तब्दील करने का पूरा प्रयास किया. जिसका नतीजा सकारात्मक दिख रहा है. जिन जिन क्षेत्र में योगी ने सभाएं की वहां अधिकतर सीटों पर कमल खिलता दिख रहा है. इन सीटों पर बीजेपी को बढ़त     कल्याणी विधानसभा में भाजपा को बढ़त मिल रही है. यहां अनुपम बिस्वास आगे चल रही हैं.     नंदकुमार सीट में खानरा निर्मल आगे चल रहे हैं.     बागदा विधानसभा में सोमा ठाकुर आगे चल रही हैं.     कटवा में कृष्णा घोष ने बढ़त बनाई हुई है.     माथाभांगा (कूच बिहार) में निशीथ प्रमाणिक जीत की ओर बढ़ रहे हैं.     धूपगुड़ी विधानसभा में नरेश चंद्र राय लीड लिए हुए हैं.     बांकुरा विधानसभा सीट पर नीलाद्री शेखर आगे चल रहे हैं.     कांथी दक्षिण सीट में भी अरुप कुमार दास बढ़त बनाए हुए हैं.     गोपालपुर विधानसभा सीट से तरुणज्योति तिवारी आगे चल रहे हैं.     दम दम विधानसभा सीट से अरिजीत बख्शी बढ़त बनाए हुए हैं.     जोरासांको सीट से विजय ओझा लीड बनाए हुए हैं.     चकदहा विधानसभा में बंकिम चंद्र घोष आगे चल रहे हैं.     उदयनारायणपुर सीट पर प्रभाकर पंडित बढ़त बनाए हुए हैं.     पिंगला विधानसभा में स्वागता मन्ना आगे चल रही हैं.     जॉयपुर सीट से बिस्वजीत महतो बढ़त बनाए हुए हैं.     गारबेटा विधानसभा में पारादीप लोधा जीत की ओर बढ़ रहे हैं.     बाराबनी सीट पर अरिजीत रॉय आगे चल रहे हैं.     रामपुरहाट विधानसभा में ध्रुब साहा बढ़त बनाए हुए हैं.     सोनामुखी विधानसभा में दिबाकर घरामी आगे चल रहे हैं. बता दें कि जिन विधानसभाओं में योगी ने धुंआधार प्रचार किया है उनके आसपास के क्षेत्रों में भी उनका प्रभाव पड़ा है. बिहार में चला था मोदी-योगी का जादू बता दें कि 5 महीने पहले हुए बिहार चुनाव में 202 सीटों के साथ NDA की प्रचंड जीत हुई थी. भाजपा ने अकेले 89 सीटें जीती थीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16 रैलियों से NDA को 97 सीटें दिलाई थीं. इसमें 44 नई सीटें थीं. पीएम का स्ट्राइक रेट 80% रहा था. इसी तरह सीएम योगी ने भी 80% स्टाइक रेट के साथ 98 सीटें जितवाई थीं. बिहार में सबसे ज्यादा डिमांड भी सीएम योगी की रैलियों, सभा और रोड शो की रही थी.

यूपी सियासत में गरमाहट: डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने सपा और ‘INDIA’ गठबंधन पर बोला हमला

नई दिल्ली पश्चिमी बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती के रुझानों के बीच ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में सोशल मीडिया के जरिए वार-पलटवार का दौर एक बार फिर तेज हो गया है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है। केशव मौर्य ने न केवल अखिलेश यादव के राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठाए, बल्कि 'इंडिया' गठबंधन के प्रमुख चेहरों—ममता बनर्जी, एमके स्टालिन और राहुल गांधी को भी निशाने पर लिया है। दरअसल पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन वोटों के रुझान में हारते नजर आ रहे हैं। विपक्षी गठबंधन पर 'हाशिए' वाला प्रहार डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल (X) पर ट्वीट करते हुए लिखा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव को अब उत्तर प्रदेश की जनता सुनने को तैयार नहीं है। उन्होंने क्षेत्रीय क्षत्रपों पर हमला बोलते हुए कहा कि जिन 'दीदी' (ममता बनर्जी) और 'भैया' (एम.के. स्टालिन) के भरोसे अखिलेश अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहे थे, देश की जनता ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया है। मौर्य ने तंज कसते हुए आगे लिखा, "अखिलेश यादव के 'भैया' राहुल गांधी का हाल तो पूरा देश पहले ही देख चुका है। हाल ही में बिहार में तेजस्वी यादव भी 'चारों खाने चित्त' हो चुके हैं। ऐसे में अखिलेश का इन नेताओं के साथ गठबंधन केवल डूबती कश्ती का सहारा है।" 2027 के 'सत्ता के सपनों' पर प्रहार केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव को नसीहत देते हुए कहा कि उन्हें अब 2027 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी के मुंगेरीलाल के सपने देखना छोड़ देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व और डबल इंजन सरकार के विकास कार्यों के सामने विपक्ष की नकारात्मक राजनीति पूरी तरह विफल हो चुकी है। डिप्टी सीएम ने तंज भरे लहजे में 'सपा बहादुर' शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा, "सच तो यह है कि मोदी जी के नेतृत्व में अब सपा के हिस्से में केवल 'अंतहीन इंतजार' ही लिखा है। जनता का विश्वास अब सिर्फ और सिर्फ भाजपा के साथ है।" सियासी गलियारों में चर्चा तेज केशव मौर्य का यह बयान ऐसे समय में आया है जब समाजवादी पार्टी लगातार 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के साथ खुद को 2027 के लिए तैयार बता रही है। मौर्य का यह हमला स्पष्ट करता है कि भाजपा यूपी चुनावों से पहले सपा के राष्ट्रीय स्तर के गठबंधनों की विफलता को जनता के बीच मुद्दा बनाएगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि केशव मौर्य ने इस ट्वीट के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि अखिलेश यादव के सहयोगी दल उन्हें चुनावी वैतरणी पार कराने में अब सक्षम नहीं हैं।

BJP की धांसू रणनीति: MP में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस से तीसरी सीट छीनने की तैयारी

भोपाल  मध्य प्रदेश की राज्यसभा चुनाव के लिए बिसातें बिछनी शुरु हो गई हैं। प्रदेश में तीन राज्यसभा सीटें अगले महीने यानी की जून में रिक्त हो रही हैं, इस सीटों के खाली होने के पहले ही बीजेपी और कांग्रेस में प्योर रणनीति पर काम शुरु हो चुका है। प्रदेश की जिन सीटों पर जून 2026 में चुनाव होगों उनमें कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, दूसरी पर भाजपा के सुमेर सिंह सोलंकी और तीसरी सीट पर राज्य मंत्री जार्ज कुरियन राज्यसभा सदस्य हैं। इन्ही तीन सीटों पर चुनाव होगें। संख्या बल के हिसाब से देखें तो 2 सीटें भाजपा और एक कांग्रेस के खाते में जानी तय मानी जा रही है लेकिन कांग्रेस सीट पर दिग्विजय सिंह के मना करने और कांग्रेस के बढ़ते दावेदारों के साथ ही, कांग्रेस में चल रही गुटबाजी और कलह का फायदा उठाकर भाजपा तीसरी सीट को भी अपने पाले में ले जाने की योजना पर विचार कर रही है, भाजपा अपना उम्मीदवार उतारने का प्लान बना रही है। भाजपा कर रही इस ऱणनीति पर काम दरअसल पहले इस सीट के लिए पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का नाम चर्चाओं में था, लेकिन दतिया में राजेंद्र भारती की सदस्यता पर लटकी तलवार से संभावित विधानसभा उपचुनाव के चलते अब स्थिति बदल रही है।   किसी आदिवासी चेहरे को मैदान में उतारने पर विचार किया जा रहा है। इस प्लान के लिए दो वजहें है जिस पर भाजपा विचार कर रही है। पहली है कांग्रेस के आदिवासी विधायकों का समर्थन हासिल करने का मकसद, वहीं दूसरे कारण है  विपक्ष की शक्ति को कम करना। जानकारी के मुताबिक  भाजपा दावा कर रही है कि कांग्रेस के कुछ आदिवासी विधायक उनके संपर्क में हैं। कांग्रेस के लिए आसान मानी जाने वाली राज्यसभा की तीसरी सीट पर गणित कुछ और ही बन रहा है  क्योंकि  दतिया विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद कांग्रेस विधायकों की संख्या घटकर 64 हो गई है। विजयपुर विधायक मुकेश मल्होत्रा के मतदान पर कोर्ट ने रोक लगाई है तो बीना विधायक निर्मला सप्रे का मामला भी कोर्ट में हैं। इस स्थिति में कांग्रेस के घटकर 62 पर पहुंच चुके हैं,यहां से बीजेपी कुछ खेल कर सकती है। वैसै बात करें तो कांग्रेस के पास अपनी राज्यसभा सीट पाने का संख्या बल है लेकिन  पार्टी में संभावित क्रास वोटिंग को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही है।

निशिकांत दुबे का बड़ा दावा: बंगाल में 1962 में पड़ी थी हिंदू विरोध की नींव

नई दिल्ली भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने पश्चिम बंगाल में हिंदुओं की दयनीय स्थिति को लेकर कांग्रेस पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि आज के पश्चिम बंगाल में 'हिंदू प्रताड़ित करो' और मुस्लिम तुष्टिकरण की नींव 3 मई 1962 को ही रखी गई। सांसद निशिकांत दुबे ने दावा किया है कि 3 मई 1962 से 30 मई 1962 के बीच पश्चिम बंगाल के कई जिलों (मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया और कूचबिहार) में हिंदू–मुस्लिम दंगे हुए, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और कई लोग शरणार्थी बनने को मजबूर हुए। बीजेपी सांसद के निशाने पर कांग्रेस बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने रविवार सुबह एक्स पर एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने लिखा, 'कांग्रेस का काला अध्याय'। बीजेपी नेता ने पोस्ट में आगे लिखा- '3 मई 1962 से लेकर 30 मई 1962 तक पूरा पश्चिम बंगाल हिंदू मुस्लिम दंगे में झुलसता रहा। हजारों हिंदू मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, कूचबिहार में मरते रहे, यही हाल पूर्वी पाकिस्तान/बांग्लादेश के हिंदुओं का हो रहा था। या तो हिंदू मारे गए या भागकर शरणार्थी बने जो ज्यादातर मतुआ यानि अनुसूचित जाति समुदाय के हैं जिन्हें हमारे मोदी सरकार ने नागरिकता दी।' पूर्व पीएम पंडित नेहरू को लेकर बड़ा आरोप निशिकांत दुबे ने आगे लिखा, 'नेहरू जी संसद में संसद के बाहर मुसलमानों का पक्ष लेते रहे। राजागोपालाचारी जी को लिखे पत्रों से कांग्रेस के वोट बैंक की राजनीति का पता चलता है। आज के पश्चिम बंगाल में हिंदू प्रताड़ित करो और मुस्लिम तुष्टिकरण की नींव 3 मई 1962 को ही रखी गई। #CongressDarkHistory'। बीजेपी सांसद ने अपनी पोस्ट के साथ कुछ डॉक्यूमेंट्स भी शेयर किए हैं। पंडित नेहरू के सी. राजगोपालाचारी को लिखे पत्र किए शेयर निशिकांत दुबे ने आरोप लगाया कि उस समय के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद के भीतर और बाहर मुसलमानों के पक्ष में रुख अपनाया था। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति सी. राजगोपालाचारी को लिखे गए पत्रों का भी हवाला दिया। जवाहर लाल नेहरू की ओर से सी. राजगोपालाचारी को लिखे गए पत्रों को बीजेपी सांसद ने एक्स पर शेयर किया है।

बंगाल चुनाव में किंगमेकर कौन बनेगा? त्रिशंकु विधानसभा का गणित

कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में किसी एक पार्टी की लहर नहीं, बल्कि एक कड़ा 'चुनावी गतिरोध' देखने को मिल रहा है। ज्यादातर एग्जिट पोल यह नहीं बता रहे हैं कि कौन जीत रहा है, बल्कि यह दिखा रहे हैं कि 148 के जादुई आंकड़े के इर्द-गिर्द मुकाबला कितना कांटे का है। हालात ये हैं कि महज 5-10 सीटों का हेरफेर ही यह तय कर देगा कि राज्य में एक स्थिर सरकार बनेगी या फिर सूबे में त्रिशंकु विधानसभा की नौबत आएगी। टीएमसी और बीजेपी में कांटे की टक्कर ज्यादातर एग्जिट पोल के रुझानों से साफ है कि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और राज्य में अपना विस्तार कर रही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच सीधी और कांटे की टक्कर है। क्या कहते हैं एग्जिट पोल के आंकड़े? मैट्रिज (Matrize-ABP): इसके मुताबिक बीजेपी को 146-161 और टीएमसी को 125-140 सीटें मिल सकती हैं। अगर बीजेपी 146 पर रुकती है, तो वह बहुमत से दूर रह जाएगी और यह सीधे तौर पर त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति होगी। पीमार्क (PMARQ): इन आंकड़ों में बीजेपी का पलड़ा थोड़ा भारी है। बीजेपी को 150-175 और टीएमसी को 118-138 सीटें दी गई हैं। हालांकि, यहां भी बीजेपी का निचला आंकड़ा (150) बहुमत (148) से जरा सा ही ऊपर है, जो एक कमजोर जनादेश का इशारा है। एक्सिस माई इंडिया (Axis My India): इस मशहूर पोलस्टर ने बंगाल के लिए अपने आंकड़े ही जारी नहीं किए। उनका कहना है कि बहुत बड़ी संख्या में वोटरों ने अपनी पसंद का खुलासा करने से इनकार कर दिया, जिससे कड़े मुकाबले की पुष्टि होती है। पीपुल्स पल्स (Peoples Pulse): इस पोल ने दोनों पार्टियों के आंकड़ों को एक-दूसरे के काफी करीब दिखाया है, जिसका मतलब है कि तकनीकी रूप से कोई भी जीत सकता है। त्रिशंकु विधानसभा के पूरे आसार आंकड़ों को देखें तो बंगाल में त्रिशंकु विधानसभा की संभावना काफी मजबूत है। ज्यादातर अनुमान बीजेपी को 140-160 और टीएमसी को 120-140 सीटों के आसपास दिखा रहे हैं। दोनों बहुमत के करीब तो हैं, लेकिन लगातार इससे ऊपर नहीं दिख रहे। हालांकि, ध्यान रखना जरूरी है कि एग्जिट पोल सिर्फ एक अनुमान होते हैं और अतीत में इनके गलत साबित होने का भी इतिहास रहा है। क्या होती है त्रिशंकु विधानसभा और क्या है नियम? बंगाल में त्रिशंकु विधानसभा का मतलब है कि किसी भी दल को 148 सीटें नहीं मिलेंगी और कोई भी अपने दम पर सरकार नहीं बना पाएगा। ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका अहम हो जाती है। नियम के मुताबिक, राज्यपाल सबसे बड़ी पार्टी को सबसे पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं। बहुमत नहीं मिला तो सरकार कैसे बनेगी? बीजेपी की रणनीति: अगर बीजेपी बहुमत से चूकती है, तो वह छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों से समर्थन मांग सकती है। टीएमसी की रणनीति: ममता बनर्जी की पार्टी समर्थन के लिए कांग्रेस और लेफ्ट का रुख कर सकती है। जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जरूरत पड़ने पर टीएमसी को समर्थन देने के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट जवाब देने के बजाय कहा कि पार्टी तस्वीर साफ होने का इंतजार करेगी। फ्लोर टेस्ट और राष्ट्रपति शासन का विकल्प जो भी सरकार बनेगी, उसे विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के जरिए अपना बहुमत साबित करना ही होगा। अगर कोई भी गठबंधन काम नहीं करता है, तो राज्य में कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन लगने और दोबारा चुनाव होने की भी संभावना बन सकती है, हालांकि ऐसा दुर्लभ ही होता है। 92% बंपर वोटिंग और 'किंगमेकर' की भूमिका पहले के चुनावों के उलट, 2026 का चुनाव पूरी तरह से टीएमसी और बीजेपी के बीच का चुनाव बन गया है। सत्ता विरोधी वोट कई दलों में बंटे हुए हैं और 92 प्रतिशत से ज्यादा की बंपर वोटिंग मजबूत लामबंदी का संकेत देती है। बीजेपी के लिए इसके मायने: अगर त्रिशंकु विधानसभा बनती है और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है, तब भी उसे सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी। ममता बनर्जी से सत्ता छीनने की कोशिश कर रही बीजेपी के लिए यह स्थिति राज्य में उसके नियंत्रण को सीमित कर देगी। टीएमसी के लिए इसके मायने: यह विपक्षी एकजुटता की एक बड़ी परीक्षा होगी। अगर कांग्रेस और लेफ्ट साथ देते हैं, तो बीजेपी से पिछड़ने के बावजूद टीएमसी सत्ता बरकरार रख सकती है। कांग्रेस-लेफ्ट के लिए इसके मायने: ऐसी स्थिति में कम या शून्य सीटें होने के बावजूद कांग्रेस और लेफ्ट के पास 'किंगमेकर' बनने और अपनी प्रासंगिकता हासिल करने का एक बड़ा मौका होगा।

संजय शिरसाट का बड़ा संकेत: 2029 में BJP और शिवसेना अकेले लड़ सकते हैं चुनाव, सियासत में हलचल तेज

मुंबई महाराष्ट्र की सियासत में आगामी चुनावों को लेकर गठबंधन के भविष्य पर बयानबाजी तेज हो गई है। शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के मंत्री संजय शिरसाट ने शनिवार को संकेत दिया कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और शिवसेना 2029 का विधानसभा चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ सकते हैं। शिरसाट का यह बयान शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र 'सामना' के उस दावे के बाद आया है, जिसमें कहा गया था कि बीजेपी अब अकेले चलने की तैयारी कर रही है। संजय शिरसाट ने ‘सामना’ के संपादकीय पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हर राजनीतिक दल को अपना संगठन मजबूत करने और चुनाव की तैयारी करने का पूरा अधिकार है। उन्होंने साफ किया कि गठबंधन में होने का यह मतलब नहीं है कि पार्टियां भविष्य में अलग नहीं हो सकतीं। शिरसाट ने कहा कि अगर BJP 2029 का चुनाव अकेले लड़ने का फैसला करती है, तो वही विकल्प शिवसेना के पास भी रहेगा। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अतीत में सीट बंटवारे को लेकर दोनों दल अलग हो चुके हैं और एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुके हैं। 'सामना' ने किया था दावा उद्धव के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के रुख को दर्शाने वाले 'सामना' ने दावा किया था कि भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर भविष्य के चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, यह तर्क देते हुए कि पार्टी का विस्तार उस बिंदु तक हो गया है जहां सहयोगियों को साथ लेकर चलना मुश्किल हो गया है। इसने सुझाव दिया कि बीजेपी की राजनीतिक रणनीति तेजी से स्वतंत्र रूप से शक्ति को मजबूत करने पर केंद्रित हो रही है। गठबंधन की वर्तमान स्थिति का कड़ा मूल्यांकन करते हुए, संपादकीय में आरोप लगाया गया कि बीजेपी सही समय आने पर उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार की एनसीपी और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना दोनों को किनारे करने की फिराक में है।   आपको बता दें कि सत्तारूढ़ गठबंधन पर कटाक्ष करते हुए, संपादकीय ने स्थिति को "गिरती राजनीतिक संस्कृति" का सूचक बताया, जिसमें आरोप लगाया गया कि नेता शासन के बजाय राजनीतिक पुनर्गठन को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि किसानों, विकलांग व्यक्तियों और विधवाओं से संबंधित प्रमुख मुद्दे अनसुलझे बने हुए हैं।

दिग्विजय सिंह का विवादित बयान: गुरु गुड़ रह गया और चेला…, जीतू पटवारी पर क्या था उनका इशारा?

भोपाल मध्य प्रदेश में कांग्रेस के अंदर चल रही खींचतान शुक्रवार को सार्वजनिक रूप से सामने आ गई. भोपाल में कांग्रेस के अनुसूचित विभाग की प्रदेश कार्यकारिणी और जिला अध्यक्षों की बैठक को संबोधित करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी पर तंज कसते नजर आए. जीतू पटवारी ने भी प्रतिक्रिया में खुद को दिग्विजय सिंह का चेला बता दिया. इस पर दिग्विजय ने कहा, 'गुरु गुड़ रह गया और चेला शक्कर हो गया' . भोपाल स्थित पार्टी मुख्यालय में हुई बैठक के दौरान दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी की संगठनात्मक नियुक्तियों पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि वाल्मीकि समाज और बसोड़ समाज को प्रदेश कांग्रेस में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. उन्होंने मंच पर बैठे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी से हल्के-फुल्के अंदाज में कहा, 'ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी में आपकी जो पकड़ है, वो हम लोगों की थोड़ी न है. आप जो कहोगे, केसी वेणुगोपाल से लिखवाकर ले आओगे. जितने प्रिय आप वेणुगोपाल के हो, कोई दूसरा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष उतना नहीं है।  दिग्विजय​ सिंह की इस बात पर बैठक में मौजूद सभी नेता और कार्यकर्ता हंसने लगे. तभी जीतू पटवारी ने कहा, 'सर मैं भी एक बात कहूं… चेला तो आपका ही हूं.' इस पर दिग्विजय ने कहा, 'आप मेरे चेले हो, लेकिन गुरु गुड़ रह गया और चेला शक्कर बन गया.' दोनों नेताओं की इस टीका-टिप्पणी को लेकर बीजेपी ने मध्य प्रदेश कांग्रेस में अंदरुनी कलह का दावा किया है. मध्य प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता दुर्गेश केसवानी ने कहा कि दिग्विजय सिंह कांग्रेस के 'संगठन सृजन' कार्यक्रम का 'विसर्जन' करते नजर आ रहे हैं।  केसवानी ने आरोप लगाया कि दिग्विजय सिंह का स्वभाव पहले से ही ऐसा रहा है और कमलनाथ सरकार के समय भी वह सरकार के कामकाज में दखल देते थे. उन्होंने यह भी कहा कि दिग्विजय को इस बात की नाराजगी है कि जीतू पटवारी ने उनके पुत्र जयवर्धन सिंह को जिला अध्यक्ष बनाकर उनका कद कम कर दिया है, जिसके चलते वह लगातार पटवारी पर निशाना साध रहे हैं. बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर गंभीर खींचतान चल रही है और यह स्थिति गृह युद्ध जैसी है।  वहीं मध्य प्रदेश कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी के बीच हुई इस टीका-टिप्पणी को सामान्य करार दिया. कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि मंच पर हुआ यह संवाद दोनों नेताओं के बीच बेहतर तालमेल और मजबूत नेतृत्व को दर्शाता है. उन्होंने बीजेपी को अपने संगठन पर ध्यान देने की सलाह दी. वहीं कार्यक्रम के बाद जब मीडिया ने जीतू पटवारी से दिग्विजय सिंह की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया चाही, तो उन्होंने कुछ भी बोलने से से इनकार कर दिया। 

ममता की 3 घंटे की मौजूदगी और कार्यकर्ताओं का पहरा, टीएमसी के आरोप पर EC का जवाब

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग ख़त्म होने के एक दिन बाद ईवीएम और पोस्टल बैलट बॉक्स को रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर विवाद हो गया।  30 अप्रैल की दोपहर से शुरू हुआ ये विवाद शाम तक काफ़ी बढ़ गया और कई जगह तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) नेताओं, उनके समर्थकों और प्रशासन-पुलिस के लोगों के बीच बहस देखने को मिली।  तृणमूल कांग्रेस के लोग स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर पुलिस-प्रशासन पर 'धांधली' करने के आरोप लगाते दिखे. वहीं बीजेपी ने कहा कि ममता बनर्जी की पार्टी हार रही है, इसलिए 'धांधली' के आरोप लगाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण में विधानसभा की 142 सीटों पर वोटिंग हुई थी. नतीजे 4 मई को आएंगे।   टीएमसी ने स्ट्रॉन्गरूम में पोस्टल बैलट से छेड़छाड़ का आरोप लगाया और इसके बाद पार्टी के नेताओं के संबंधित जगह पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद भी पहुंच गईं और धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया. विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे राजनीतिक ड्रामा बताया. मामले ने तूल पकड़ा तो चुनाव आयोग को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्थिति साफ करनी पड़ी. इस दौरान क्या-क्या हुआ? शाम तीन बजे के बाद तक सब सामान्य था, फिर एक ई-मेल आया. ई-मेल में इस बात की सूचना थी कि शाम 4 बजे स्ट्रॉन्गरूम खुलेगा. टीएमसी नेता कुणाल घोष और शशि पांजा मौके पर पहुंचे, लेकिन उनको अंदर जाने की इजाजत नहीं दी गई. टीएमसी ने इस पर शक जताते हुए पार्टी प्रतिनिधियों के बिना पोस्टल बैलट और पिंक पेपर संभालने को लोकतंत्र के खिलाफ बताया. टीएमसी ने इसका वीडियो भी शेयर किया और इसके बाद सियासी पारा चढ़ता ही चला गया. कुणाल घोष और शशि पांजा स्ट्रॉन्गरूम के बाहर धरने पर बैठ गए. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी मौके पर पहुंच गईं।  सीएम की अपील पर बड़ी तादाद में टीएमसी समर्थक पहले से ही मौके पर थे. सीएम ने समर्थकों से 24 घंटे स्ट्रॉन्गरूम की निगरानी करने की अपील की थी. ममता सखावत मेमोरियल स्कूल में बने स्ट्रॉन्गरूम में पहुंचीं और करीब तीन घंटे तक रहीं. इस स्कूल में भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र की ईवीएम रखी हुई है, जहां से खुद ममता बनर्जी उम्मीदवार हैं. ममता बनर्जी करीब तीन घंटे तक स्ट्रॉन्गरूम में रहीं. स्ट्रॉन्गरूम से निकलने के बाद उन्होंने आरोप लगाया कि सुरक्षाकर्मियों ने उनको अंदर जाने से रोक दिया. जब कहा कि मुझे जाने का अधिकार है, चुनाव नियमों के मुताबिक उम्मीदवार को सील कक्ष के बाहर तक जाने की अनुमति है, तब मुझे जाने दिया गया।  उन्होंने कई जगह गड़बड़ी मिलने का दावा करते हुए कहा कि अगर कोई गड़बड़ी हुई, तो हम लड़ेंगे. ईवीएम मशीन लूटने की कोई कोशिश करेगा, तो हम जिंदगी-मौत एक कर देंगे. टीएमसी के आक्रामक रुख, धरना-प्रदर्शन और आरोप के बीच कई घंटे तक माहौल गर्म बना रहा. इस दौरान टीएमसी और बीजेपी समर्थकों के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई. बीजेपी नेता अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि ममता बनर्जी का यह नाटकीय रवैया पश्चिम बंगाल के लिए सबसे साफ एग्जिट पोल है।  टीएमसी के आरोप टीएमसी ने चुनाव आयोग पर बीजेपी के साथ मिलकर लोकतंत्र से खिलवाड़ का आरोप लगाया और कहा कि स्ट्रॉन्गरूम के आसपास उनकी जानकारी के बगैर हलचल हो रही है, जो गलत है. कुणाल घोष ने कहा कि तय यह हुआ था कि बिना बताए स्ट्रॉन्गरूम की सील नहीं तोड़ी जाएगी. फिर ऐसा क्यों हुआ? उन्होंने विपक्ष पर भी हमला बोला और कहा कि हम जब गलत का विरोध कर रहे हैं, तब बीजेपी को इतनी मिर्ची क्यों लग रही है।  चुनाव आयोग का जवाब टीएमसी के आरोप पर चुनाव आयोग को रात के समय प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जवाब देना पड़ा. चुनाव आयोग ने टीएमसी के आरोप सिरे से खारिज कर दिए और कहा कि स्ट्रॉन्गरूम में रखे बैलट की छंटनी की जा रही थी. यह प्रक्रिया का हिस्सा है. चुनाव आयोग ने दावा किया कि सभी पार्टियों को इसकी जानकारी पहले ही दे दी गई थी. बैलट बॉक्स के साथ किसी तरह की कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है. खुदीराम अनुशीलन केंद्र के सभी सात स्ट्रॉन्गरूम पूरी तरह से सुरक्षित हैं. पोस्टल बैलट की छंटनी का काम दूसरे कमरे में चल रहा था। 

कांग्रेस की टेढ़ी नजर उद्धव ठाकरे की खाली सीट पर, कैंडिडेट उतारने को लेकर विपक्ष में विवाद

मुंबई  उद्धव ठाकरे ने इस बार विधान परिषद सदस्य न बनने का फैसला लिया है। उनके स्थान पर उद्धव सेना चाहती है कि अंबादास दानवे को सदन में भेजा जाए। उद्धव ठाकरे ऐसे पहले सदस्य थे, जो ठाकरे फैमिली से सदन में पहुंचे थे। इसको लेकर यह भी कहा गया था कि यह गलत परंपरा है और बालासाहेब ठाकरे से अलग है, जो खुद कभी किसी सदन के लिए निर्वाचित नहीं हुए थे। ऐसे में उनके फैसले को खुद को सही करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। इस बीच जानकारी मिली है कि भले ही उद्धव ठाकरे विधान परिषद के मेंबर नहीं बनना चाहते, लेकिन INDIA अलायंस अब उनके स्थान पर किसी उद्धव सेना के किसी और नेता के नाम पर सहमत नहीं दिख रहा है। कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि यदि उद्धव ठाकरे खुद सदन नहीं जाएंगे तो फिर वह अपना कैंडिडेट उतार सकती है। महाराष्ट्र में विधान परिषद की कुल 9 सीटें खाली हो रही हैं और इनमें से एक सीट ही विपक्षी गठबंधन जीतने की स्थिति में है। ऐसे में हालात एक अनार सौ बीमार वाले बन रहे हैं। उद्धव ठाकरे बड़े नेता हैं तो उनके आगे कोई दावेदारी नहीं जता रहा था, लेकिन जब वह पैर पीछे हटा रहे हैं तो फिर कांग्रेस की उम्मीदें भी परवान चढ़ने लगी हैं। 2020 में जब उद्धव ठाकरे सीएम बने थे तो एनसीपी और कांग्रेस ने उन्हें विधान परिषद जाने को कहा था। इस तरह सत्ता के लिए तीनों दल एकजुट थे, लेकिन अब विपक्ष में रहने के दौरान एक-एक सीट के लिए संघर्ष की स्थिति बन रही है। पिछले दिनों कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सकपाल ने उद्धव ठाकरे से मुलाकात की थी। उनका कहना था कि वह खुद चुनाव में उतरें। इसके अलावा उन्होंने यह भी संकेत दिया था कि यदि सेना चीफ खुद नहीं विधान परिषद जाएंगे तो फिर कांग्रेस अपना कैंडिडेट उतारना चाहती है। बुधवार को हर्षवर्धन सकपाल दिल्ली में थे और पार्टी के सीनियर नेताओं से मुलाकात की थी। माना जा रहा है कि उन्होंने हाईकमान से यह मांग की है कि अब उद्धव की खाली हो रही सीट पर कांग्रेस को अपना कैंडिडेट उतारना चाहिए। हालांकि उद्धव सेना ऐलान कर चुकी है कि हम अंबादास दानवे को उद्धव के स्थान पर भेजेंगे। कांग्रेस बोली- हम उद्धव सेना के खिलाफ उतार सकते हैं कैंडिडेट ऐसे में यदि कांग्रेस की ओर से अपने कैंडिडेट के लिए दबाव बनाया गया तो तय है कि आपस में खींचतान शुरू हो जाएगी। कांग्रेस की एक दलील यह भी है कि आखिर उद्धव सेना सहयोगी दलों को भरोसे में लिए बिना एकतरफा फैसला कैसे कर सकती है। यही नहीं एक अन्य कांग्रेस नेता भाई जगताप ने तो दानवे के खिलाफ कैंडिडेट ही खड़े करने की बात कर दी। उन्होंने कहा कि इस मामले में सही राय तो सकपाल रखेंगे, लेकिन मुझे इतनी जानकारी है कि अंबादास दानवे के खिलाफ कांग्रेस अपना कैंडिडेट उतार सकती है। अब यह मामला रोचक होता दिख रहा है क्योंकि विपक्ष में बंटवारा होते देख भाजपा और शिवसेना की ओर से एक अतिरिक्त कैंडिडेट भी उतारा जा सकता है।

‘ममता बनर्जी आराम करें’, सुवेंदु ने कहा- बंगाल में BJP को मिलेगी 180 से ज्यादा सीटें

कलकत्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में दूसरे और आखिरी चरण की वोटिंग खत्म हो चुकी है. खबर लिखे जाने तक इस फेज की 142 सीटों पर करीब 90 फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ है. दूसरे फेज के चुनाव में सबकी नजर भाजपा प्रत्याशी शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर पर टिकी हुई है. वोटिंग के बाद शुभेंदु अधिकारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कई दावे किए।  180 से अधिक सीटें जीतने का दावा सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य में इस बार सत्ता परिवर्तन तय है और भाजपा 180 से अधिक सीटें जीतकर सरकार बनाएगी. उन्होंने कहा कि 4 मई को भाजपा की सरकार बनेगी और वे भवानीपुर सीट से 30 हजार से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज करेंगे. उन्होंने ममता बनर्जी को अब आराम करने की सलाह दी. उन्होंने कहा, 'ममता बनर्जी अब आराम करेंगे, हम 180 से अधिक सीटें जीतेंगे।  सुवेंदु अधिकारी ने दावा किया कि उनके निर्वाचन क्षेत्र भवानीपुर में 90 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ और बड़ी संख्या में हिंदू मतदाताओं ने परिवर्तन के पक्ष में वोट दिया. उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं के परिश्रम के लिए आभार व्यक्त किया।  उन्होंने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी ने स्थानीय पुलिस, केंद्रीय बलों और अन्य लोगों को डराने की कोशिश की. सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता बनर्जी कथित तौर पर गुंडों के साथ घूमती रहीं, लेकिन सुवेंदु ने लोगों में भरोसा जगाया।  जमात-ए-इस्लामी समर्थकों पर हमले का आरोप भाजपा नेता ने यह भी आरोप लगाया कि आज शाम 5 बजे के बाद जब वे इकबालपुर पहुंचे, तो जमात-ए-इस्लामी समर्थकों ने उन पर हमला करने की कोशिश की, हालांकि पुलिस ने स्थिति संभाल ली. उन्होंने दावा किया कि कुछ लोगों ने 'जय बंगला' के नारे लगाकर उन्हें घेरने की कोशिश की।  सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि यह नया बंगाल है, जो भगवा रंग में रंगा हुआ है. अंत में उन्होंने ममता बनर्जी को संदेश देते हुए कहा, 'अब आप आराम कीजिए।  जहांगीर खान का दावा- हम 200 प्रतिशत चुनाव जीत रहे हैं इस बीच तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार जहांगीर खान ने भाजपा और चुनावी पर्यवेक्षकों पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि फाल्टा के मतदाता हर उस कार्रवाई का जवाब देंगे, जिसे वे बाहरी दबाव या हस्तक्षेप मानते हैं. उन्होंने कहा, हम 200 प्रतिशत चुनाव जीत रहे हैं।  एक विशेष बातचीत में जहांगीर खान ने कहा कि 'गुजरात और उत्तर प्रदेश की राजनीति या संस्कृति बंगाल में नहीं चलेगी.' उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य के चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन बंगाल की जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी।  ईवीएम पर टेप लगाए जाने पर क्या बोले? ईवीएम से छेड़छाड़ के आरोपों पर उन्होंने कहा कि भाजपा उम्मीदवार ने खुद ईवीएम को टेप किया और फिर झूठे आरोप लगाकर माहौल बनाने की कोशिश की. उनके अनुसार यह एक सोची-समझी रणनीति थी, ताकि चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा सकें।  फाल्टा में हाल में हुई 'सिंघम कार्रवाई' और चुनावी तनाव पर भी उन्होंने प्रतिक्रिया दी. उनका कहना था कि मतदाता इस पूरे घटनाक्रम का जवाब अपने वोट से देंगे. अभिषेक बनर्जी द्वारा कानूनी कार्रवाई की बात पर जहांगीर खान ने समर्थन जताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वालों के खिलाफ कानून के तहत कदम उठना चाहिए।  उन्होंने विश्वास जताया कि उनकी पार्टी फाल्टा सीट पर भारी बहुमत से जीत दर्ज करेगी. जहांगीर खान ने कहा, 'हम 200 प्रतिशत जीत को लेकर आश्वस्त हैं।