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सिद्धारमैया ने सौंपा इस्तीफा, बोले- पार्टी ने जो कहा वही किया; अब DK शिवकुमार होंगे CM

बेंगलुरु कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर अपने पद से औपचारिक रूप से इस्तीफा दे दिया है. बेंगलुरु में मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि उन्होंने अपना इस्तीफा सौंप दिया है और उन्हें पूरा भरोसा है कि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत राज्यपाल इसे जल्द ही स्वीकार कर लेंगे. सत्ता परिवर्तन के इस बड़े कदम के बीच सिद्धारमैया ने यह भी साफ किया कि राज्य में कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत बरकरार है, इसलिए संविधान के अनुसार नई सरकार बनाने का अधिकार भी उनकी पार्टी को ही मिलना चाहिए. इस बड़े सियासी उलटफेर के दौरान उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का आभार जताया, जिन्होंने उन्हें राज्य का नेतृत्व करने का यह अवसर प्रदान किया था. अब पूरे राज्य की नजरें राजभवन और अगले मुख्यमंत्री के चेहरे पर टिक गई हैं। कर्नाटक कांग्रेस में लंबे समय से चल रहे सत्ता हस्तांतरण के विवाद पर आखिरकार कांग्रेस हाईकमान ने निर्णायक कदम उठा लिया है. सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली में चली कई दौर की मैराथन बैठकों के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री सिद्दारमैया पर पद छोड़ने का दबाव बनाया, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा देने पर सहमति जता दी. बताया जा रहा है कि सिद्दारमैया ने शुरुआत में दो सप्ताह का समय मांगा था, ताकि वह जातीय जनगणना रिपोर्ट को कैबिनेट में पेश कर सकें, लेकिन पार्टी नेतृत्व तत्काल नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में था. कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें याद दिलाया कि 2023 में कांग्रेस की प्रचंड जीत के बाद डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के साथ ढाई-ढाई साल के सत्ता साझेदारी फार्मूले पर सहमति बनी थी और सिद्दारमैया पहले ही तय अवधि से अधिक समय तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं. ‘डेक्‍कन हेराल्‍ड’ की रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी ने बंद कमरे में हुई बैठकों के दौरान सिद्दारमैया से कहा कि पार्टी की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पुराने वादे का सम्मान जरूरी है. इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी नेतृत्व परिवर्तन के पक्ष में बताए जा रहे हैं. राहुल गांधी ने दोनों नेताओं (सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार) से संयुक्त और अलग-अलग बैठकें कर पार्टी एकता बनाए रखने की अपील की। बताया जाता है कि बैठक के दौरान सिद्दारमैया ने यह तर्क दिया कि 2025 में पद छोड़ने को लेकर कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ था, लेकिन राहुल गांधी अपने रुख पर कायम रहे. पार्टी नेतृत्व ने यह भी कहा कि सिद्दारमैया पहले ही आठ वर्षों से अधिक समय तक मुख्यमंत्री और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं, इसलिए अब दूसरे नेताओं को अवसर देने का समय है. सूत्रों के मुताबिक, बाद में सिद्दारमैया ने वरिष्ठ नेताओं केसी वेणुगोपाल और रणदीप सुरजेवाला से चर्चा की, जिन्होंने भी हाईकमान के निर्देश को मानने की सलाह दी. शाम को सिद्दारमैया ने ऊर्जा मंत्री केजे जॉर्ज के आवास पर अपने करीबी सहयोगियों से मुलाकात की। कुछ मंत्रियों ने उन्हें जल्दबाजी में फैसला न लेने की सलाह दी, लेकिन सिद्धारमैया ने साफ कहा कि वह अब और इंतजार नहीं करेंगे. सूत्रों के अनुसार, सिद्दारमैया ने अपने सहयोगियों से कहा, ‘मैं शुरू से कहता आया हूं कि राहुल गांधी जब कहेंगे, मैं इस्तीफा दे दूंगा. अब जब उन्होंने कहा है, तो मैं तुरंत पद छोड़ दूंगा। कांग्रेस के लिए अहम कांग्रेस नेतृत्व इस फैसले को पार्टी अनुशासन और संगठनात्मक नियंत्रण के लिहाज से अहम मान रहा है. 2014 के बाद कांग्रेस कई राज्यों में क्षेत्रीय नेताओं पर नियंत्रण बनाए रखने में संघर्ष करती रही है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता साझा करने के वादों के बावजूद नेतृत्व परिवर्तन नहीं हो सका था. ऐसे में कर्नाटक में हाईकमान का यह कदम पार्टी के भीतर स्पष्ट संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व के फैसले सर्वोपरि होंगे।  इस्तीफा देने के प्रेस को संबोधित करते हुए भावुक हुए सिद्धारमैया सीएम सिद्दारमैया का इस्तीफा: कर्नाटक के राजनीति में एक बड़ा बदलाव हुआ है. कांग्रेस आलाकमान के निर्देशानुसार, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए सिद्धारमैया काफी भावुक नजर आए. उन्होंने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा, ‘हाई कमान के पहले ही इस्तीफा देने के लिए कहने के बाद, मैंने आज अपना इस्तीफा सौंप दिया है. मुझे पूरा भरोसा है कि जब राज्यपाल आएंगे, तो वे इसे स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि यह संविधान के अनुसार ही किया जाना है.’ सिद्धारमैया ने यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी के पास पूर्ण बहुमत है और संवैधानिक रूप से नई सरकार बनाने का अधिकार भी कांग्रेस को ही मिलना चाहिए. इस अवसर पर उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे का भी आभार व्यक्त किया, जिन्होंने उन्हें राज्य का नेतृत्व करने का मौका दिया।

बीजेपी ने बदले चार राज्यों के अध्यक्ष, जानिए दिल्ली की कमान किसे मिली

नई दिल्ली बीजेपी संगठन में बड़ा फेरबदल हुआ है. पार्टी ने गुरुवार (28 मई) को चार राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष बदलने का ऐलान किया है. दिल्ली में वीरेंद्र सचदेवा की जगह केंद्रीय मंत्री हर्ष मल्होत्रा को कमान सौंपी गई है. इसके अलावा, भाजपा ने पंजाब, हरियाणा और त्रिपुरा के नए प्रदेश अध्यक्ष के नामों का ऐलान किया है. इसको लेकर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव ने नोटिफिकेशन जारी किया है। बीजेपी राष्ट्रीय महासचिव ने कहा, 'भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा, भारतीय जनता पार्टी दिल्ली प्रदेश का अध्यक्ष नियुक्त किया है. उनकी नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू होगी। कौन हैं दिल्ली बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा? हर्ष मल्होत्रा बीजेपी के सीनियर नेता और दिल्ली से सांसद हैं. वह अभी तक केंद्र सरकार में मंत्री पद संभाल रहे हैं. लंबे समय से संगठनात्मक राजनीति में सक्रिय मल्होत्रा ने दिल्ली भाजपा में कई अहम जिम्मेदारियां निभाई हैं. वह जनसंपर्क, संगठन क्षमता और विकास से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका के लिए जाने जाते हैं। अर्चना गुप्ता बनीं हरियाणा की प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता को हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई है, जबकि सरदार केवल सिंह ढिल्लो को पंजाब और अभिषेक देबरॉय को त्रिपुरा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। कौन हैं पंजाब बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों बरनाला से दो बार विधायक रह चुके हैं. उन्होंने 2022 की संगरूर लोकसभा की उपचुनाव और 2024 में बरनाला विधानसभा की उपचुनाव बीजेपी के टिकट पर लड़ा था. ढिल्लों देश और पंजाब के एक बड़े उद्योगपति हैं. वह कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी रहे हैं, उन्हें बरनाला के लोग विकास पुरुष के तौर पर जानते हैं, उन्होंने अपनी राजनीति हमेशा विकास के मुद्दे पर लड़ी है, जबकि विरोधी खेमे के नेताओं के साथ कभी भी विवाद की राजनीति में वह नहीं पड़े। पंजाब बीजेपी की कमान केवल सिंह ढिल्लों को सरदार केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब बीजेपी का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। वह बरनाला से दो बार विधायक रह चुके हैं। उन्होंने 2022 में संगरूर लोकसभा उपचुनाव और 2024 में बरनाला विधानसभा उपचुनाव बीजेपी के टिकट पर लड़ा था। उद्योगपति से नेता तक का सफर केवल सिंह ढिल्लों पंजाब के बड़े उद्योगपतियों में गिने जाते हैं। वह पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी भी रहे हैं। बरनाला में लोग उन्हें विकास कार्यों के लिए जानते हैं। हरियाणा, दिल्ली और त्रिपुरा में भी नए चेहरे को मौका मिला है। बीजेपी ने अर्चना गुप्ता को हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली बीजेपी की जिम्मेदारी मिली है। वहीं, अभिषेक देवराय को त्रिपुरा बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया है।

TMC में टूट की आहट? BJP का दावा- 80 में से 50 विधायक बदल सकते हैं पाला

कलकत्ता णमूल कांग्रेस में जल्द ही बड़ी टूट हो सकती है। भारतीय जनता पार्टी सांसद का दावा है कि आधे से ज्यादा टीएमसी सांसद पार्टी बदलने के लिए तैयार हैं। वहीं, करीब 20 सांसद भी टीएमसी का साथ छोड़ सकते हैं। हालांकि, टीएमसी ने अब तक इसे लेकर प्रतिक्रिया नहीं दी है। 4 मई को घोषित नतीजों के बाद पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 80 विधायक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा सांसद सौमित्र खान ने बुधवार को दावा किया है कि करीब 50 विधायक टीएमसी से नाराज चल रहे हैं। उन्होंने कहा है कि ऐसी ही स्थिति 20 सांसदों की है। भाजपा सांसद का दावा है कि अगर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व सहमति देता है, तो ये नेता पार्टी बदलकर भाजपा में आने के लिए तैयार हैं। हालांकि, अब तक भाजपा आलाकमान की तरफ से इसे लेकर घोषणा नहीं की गई है। खत्म हो जाएगी टीएमसी भाजपा सांसद का कहना है कि अगर ऐसा होता है, तो टीएमसी खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा, 'अगर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व एक बार कह देता है, तो टीएमसी पार्टी ही नहीं बचेगी। सभी लोग आने के लिए तैयार हैं। करीब 50 विधायक पार्टी से नाखुश हैं और 20 सांसद शामिल होने के लिए तैयार हैं।' अटकलें हैं कि मॉनसून सत्र के आसपास टीएमसी सांसद भाजपा में शामिल हो सकते हैं। संकट में टीएमसी? खास बात है कि खान की तरफ से यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब 100 से ज्यादा पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है। वहीं, कहा जा रहा है कि काकोली घोष दस्तीदार और फिरहाद हाकिम जैसे पार्टी के बड़े चेहरे नेतृत्व से खफा हैं। हालांकि, विधायक हाकिम ने खुलकर कुछ नहीं कहा है, लेकिन दस्तीदार नाराजगी जाहिर कर चुकी हैं। उनके बेटे ने संभावनाएं जताई थीं कि वह सांसद पद से भी इस्तीफा दे सकती हैं। 20 सांसद बदल सकते हैं पाला संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा है कि 12 टीएमसी सांसदों ने भाजपा में शामिल होने या समर्थन देने की तैयारी कर ली है। इसके अलावा दल बदलने की तैयारी कर रहे सांसदों की लिस्ट में 5 से 6 नाम और हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि ये सांसद कौन होंगे और कब तक दल बदल की योजना बना रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 12 से ज्यादा सांसदों से चर्चा चल रही है और आंकड़ा 20 तक पहुंच सकता है। तृणमूल के दो विधायकों की शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात तृणमूल कांग्रेस के दो विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस से मुलाकात की और इस दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी वहां मौजूद थे। चुनावी हार के बाद विपक्षी दल के भीतर बदलते समीकरणों के बीच यह घटनाक्रम नई अटकलों को जन्म दे रहा है।  यह मुलाकात आधिकारिक तौर पर 'शिष्टाचार भेंट' बताई गई लेकिन यह दिल्ली स्थित पुराने बंग भवन में ऋतब्रत बनर्जी और शुभेंदु की हालिया मुलाकात के कुछ ही दिन बाद हुई है। इसके बाद पश्चिम बंगाल की चुनाव बाद की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में नए समीकरण उभरने की अटकलें तेज हो गई हैं।

TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह? काकोली घोष ने पार्टी के सभी पद छोड़े, ममता की बढ़ी टेंशन

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर का असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है. अब पार्टी को बड़ा झटका लगा है. बारासात से TMC पार्टी की लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने संगठन में अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. पिछले कुछ समय से उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद की खबरें आ रही थीं, जिस पर अब इस इस्तीफे ने मुहर लगा दी है। प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को भेजा पत्र सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अपना इस्तीफा तृणमूल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को भेज दिया है. अपने पत्र में उन्होंने साफ किया है कि वह पार्टी संगठन के सभी पदों को छोड़ रही हैं. बता दें कि इससे पहले उन्होंने बारासात के जिलाध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि वह कोई बड़ा कदम उठा सकती हैं। सांसद बनी रहेंगी काकोली घोष हालांकि, काकोली घोष ने अभी तक तृणमूल कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है. वह लोकसभा में बारासात सीट से टीएमसी की सांसद बनी रहेंगी. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनका यह कदम पार्टी नेतृत्व को एक कड़ा संदेश है, जिससे यह साफ है कि वह संगठन के कामकाज के तरीके से खुश नहीं हैं। पार्टी में बढ़ता असंतोष ममता के लिए चिंता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद से ही टीएमसी के अंदर कई सांसद और विधायक नाराज चल रहे हैं. काकोली घोष जैसी सीनियर नेता का इस तरह पदों से किनारा करना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ी चिंता का विषय बन सकता है. फिलहाल इस पूरे मामले पर टीएमसी आलाकमान की तरफ से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। ममता बनर्जी के इस कदम से काकोली घोष आहत और नाराज चल रही हैं. काकोली घोष ने सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. काकोली घोष को टीएमसी के चीफ व्हिप से हटाए जाने के कुछ ही घंटों में केंद्र सरकार ने उनको वाई सिक्योरिटी दे दी थी. ऐसा तब था, जब अभिषेक बनर्जी से लेकर टीएमसी के तमाम नेताओं की सिक्योरिटी में कटौती की गई थी। एक दिन पहले ही काकोली घोष टीएमसी के छह विधायकों के साथ मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक समीक्षा बैठक में भी शामिल हुई थीं. काकोली घोष टीएमसी की स्थापना के पहले से ममता बनर्जी की करीबी रही हैं। I PAC को मैनर्स नहीं, बदतमीजी से बात करते थे तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पार्टी संगठन, चुनावी हार, आई-पैक की भूमिका और राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि वह पिछले 40 वर्षों से पार्टी के साथ जुड़ी हुई हैं। उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब पार्टी सत्ता में नहीं थी और कार्यकर्ताओं को सड़कों पर प्रताड़ित किया जाता था, लेकिन कुछ लोग बाहर से आकर पार्टी को नुकसान पहुंचा गए। टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने कहा कि उन्होंने पार्टी के कठिन समय में संघर्ष किया और मेहनत के दम पर संगठन को मजबूत बनाने में योगदान दिया। मैं अच्छे समय में पार्टी में नहीं आई थी। जब लोग सड़कों पर पीटे जाते थे, तब भी मैं पार्टी के साथ थी। हमने लंबे संघर्ष के बाद पार्टी को मजबूत किया और करीब 20 साल बाद सत्ता हासिल की। व्यक्तिगत लाभ के लिए पार्टी में आए कुछ लोग काकोली घोष ने इशारों में उन नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भी निशाना साधा, जो पार्टी के सत्ता में आने के बाद जुड़े। उनके अनुसार, ऐसे कई लोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए राजनीति में आए। उन्होंने संगठन को मजबूत करने में कोई विशेष योगदान नहीं दिया। बंगालविधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार और चुनावी रणनीति तैयार करने वाली एजेंसी आई-पैक की भूमिका पर काकोली घोष दस्तीदार ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एजेंसी का काम करने का तरीका गलत था और उसके प्रतिनिधियों का व्यवहार पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति अपमानजनक था। ममता बनर्जी के नौकर नहीं टीएमसी कार्यकर्ता काकोली ने कहा कि हमारे कार्यकर्ता किसी के नौकर नहीं हैं। वे ममता बनर्जी और पार्टी के प्रति प्रेम और विश्वास के कारण काम करते हैं, लेकिन आई-पैक के लोगों ने उनके साथ बुरा व्यवहार किया, जिससे कार्यकर्ताओं में नाराजगी बढ़ी। उन्होंने यह भी कहा कि एजेंसी के कुछ सदस्य खुद को बहुत बड़ी सत्ता मानने लगे थे और स्थानीय नेताओं की राय को महत्व नहीं देते थे। उनके अनुसार, चुनाव प्रचार का संचालन करने वाली इस बाहरी एजेंसी के पास जमीनी राजनीति का पर्याप्त अनुभव नहीं था, जबकि पार्टी कार्यकर्ता लंबे समय से चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे हैं। I-PAC में काम करने का बिल्कुल भी सलीका नहीं था। वे बहुत ही बदतमीज़ी से बात करते थे। हमारे ये कार्यकर्ता कोई नौकर नहीं हैं। हम इन्हें कोई तनख्वाह नहीं देते। ये तो ममता दीदी और पार्टी के प्रति अपने प्यार की वजह से काम करते हैं। वे लोगों के साथ बुरा बर्ताव करते थे, और उनका घमंड इतना बढ़ गया था कि आखिरकार उन्होंने हमारे साथ भी बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया। उन्हें ऐसा लगता था मानो वे प्रधानमंत्री से भी ज़्यादा ऊंचे ओहदे पर बैठे हों। मुझे नहीं लगता कि I-PAC सीधे तौर पर उनके (ममता बनर्जी के) नियंत्रण में था, क्योंकि I-PAC एक अलग ही संस्था है।

सनातन पर कथित टिप्पणी से बढ़ा विवाद, ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ीं

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। सिलीगुड़ी में ममता बनर्जी के खिलाफ एक वकील की शिकायत पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि पूर्व मुख्यमंत्री ने पिछले साल कोलकाता में ईद के एक कार्यक्रम के दौरान हिंदू धर्म को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की थी, जिससे करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुंची है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर ममता बनर्जी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की कई गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया है। ममता के खिलाफ धारा 351 (1)- आपराधिक धमकी, धारा 352- शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर किया गया अपमान और धारा 353- विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी, नफरत या द्वेष की भावना को बढ़ावा देना के तहत मामला दर्ज किया गया है। यह शिकायत वकील रिंकी चटर्जी द्वारा दर्ज कराई गई है। उन्होंने अपनी शिकायत में साल 2025 में कोलकाता के ऐतिहासिक रेड रोड पर आयोजित ईद-उल-फितर के कार्यक्रम में दिए गए ममता बनर्जी के भाषण का हवाला दिया है। क्या कहा था ममता ने? पिछले साल ईद के मंच से भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर हमला बोलते हुए ममता बनर्जी ने कथित तौर पर कहा था, "मैं उस गंदे धर्म को नहीं मानती जिसे इस 'जुमला पार्टी' ने जानबूझकर गढ़ा है।" आरोप है कि उन्होंने भाजपा द्वारा प्रचारित हिंदू धर्म के स्वरूप को गंदा धर्म कहकर संबोधित किया था। भाजपा आईटी सेल के प्रमुख ने 31 मार्च 2025 को एक वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने लिखा था, 'क्या पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री (तत्कालीन) ममता बनर्जी के लिए सनातन धर्म एक गंदा धर्म है? उनके शासनकाल में कई हिंदू-विरोधी दंगे होने के बावजूद, उनमें हिंदुओं का मजाक उड़ाने और उनकी आस्था का अपमान करने की हिम्मत है। एक बार फिर उन्होंने मुसलमानों को हिंदुओं को निशाना बनाने की खुली छूट दे दी है। इस बार एक ऐसे धार्मिक मंच से, जो ईद मनाने के लिए था। उन पर शर्म आती है।' वहीं, शिकायतकर्ता रिंकी चटर्जी का कहना है कि एक मुस्लिम धार्मिक सभा के मंच से सनातन धर्म को गंदा कहना पूरी तरह से अस्वीकार्य है और इससे भारत सहित दुनिया भर के हिंदुओं का अपमान हुआ है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि कानून इस मामले में उचित और सख्त कार्रवाई करेगा। रिंकी चटर्जी ने अपनी शिकायत में कहा कि तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं और पूर्ववर्ती सरकार के मंत्रियों ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार हिंदू धर्म को निशाना बनाया है, जिसमें ममता बनर्जी का यह बयान सबसे गंभीर था। शिकायत में यह भी कहा गया है कि ममता बनर्जी ने साल 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भी हिंदू समुदाय को परोक्ष रूप से धमकी दी थी। TMC के भीतर से उठे विरोध के सुर इस कानूनी कार्रवाई के बाद तृणमूल कांग्रेस बैकफुट पर नजर आ रही है। जब इस एफआईआर को लेकर टीएमसी की दार्जिलिंग इकाई के महासचिव और पेशे से वकील अत्री शर्मा से प्रतिक्रिया मांगी गई तो उन्होंने पार्टी प्रवक्ता के रूप में तो कुछ नहीं कहा लेकिन व्यक्तिगत तौर पर एक बेहद चौंकाने वाला बयान दिया। अत्री शर्मा ने स्वीकार किया कि जब तृणमूल सत्ता में थी तब भी पार्टी के भीतर कई लोग इस बयान के खिलाफ थे। उन्होंने कहा, "उस समय सत्ता की कमान संभालते हुए ममता बनर्जी के लिए इस तरह की टिप्पणी करना वास्तव में अनुचित था। यहां तक कि हममें से जो लोग उस समय से पार्टी के प्रति वफादार रहे हैं, उन्होंने भी उन विशेष टिप्पणियों का कभी समर्थन नहीं किया। देश के हर नागरिक को शिकायत दर्ज कराने का नैतिक अधिकार है।"

बंगाल की राजनीति में हलचल, TMC के 18 दिग्गज नाराज बताए जा रहे

कलकत्ता ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही बरकरार हैं। कहा जा रहा है कि एक दर्जन से ज्यादा विधायक खुलकर पार्टी की नीतियों की आलोचना कर चुके हैं। वहीं, अटकलें ये भी हैं कि करीब 15 सांसद जल्द ही टीएमसी छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। इसके अलावा पार्टी नंदीग्राम में होने वाले उप चुनाव को लेकर उम्मीदवार खोजने में भी परेशानी का सामना करती नजर आ रही है। विधायक हो रहे हैं नाराज टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 18 बड़े नेता ऐसे हैं, जो खुलकर नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। इनमें सुखेंदु शेख रॉय, सांसद काकोली घोष दस्तीदार, देव अधिकारी, कल्याण बनर्जी, रचना बनर्जी, विधायक कुणाल घोष, रिताब्रता बनर्जी, अरुणव सेन, संदीपन साहा, नियामत शेख, पूर्व मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी, मनोज तिवारी, रविंद्रनाथ घोष, पूर्व विधायक अतीन घोष, खगेश्वर रॉय, सौरव चक्रवर्ती, रत्ना चटर्जी, तपन चटर्जी का नाम शामिल है। 20 सांसद बदल सकते हैं पाला संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने कहा है कि 12 टीएमसी सांसदों ने भाजपा में शामिल होने या समर्थन देने की तैयारी कर ली है। इसके अलावा दल बदलने की तैयारी कर रहे सांसदों की लिस्ट में 5 से 6 नाम और हैं। हालांकि, रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि ये सांसद कौन होंगे और कब तक दल बदल की योजना बना रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 12 से ज्यादा सांसदों से चर्चा चल रही है और आंकड़ा 20 तक पहुंच सकता है। 100 से ज्यादा पार्षद दे चुके इस्तीफा खबर है कि बीते कुछ दिनों में 100 से ज्यादा पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं। खास बात है कि ये घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहे हैं, जब निकाय चुनाव में कुछ ही समय बाकी है। इतना ही नहीं पार्षद अब खुलकर टीएमसी नेतृत्व और सांसद अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर मॉडल पर सवाल उठा रहे हैं। ममता बनर्जी ने पार्षदों से एकजुट रहने की अपील की है। नंदीग्राम में उम्मीदवार नहीं मिल रहा ममता बनर्जी के सामने एक और बड़ी चुनौती नंदीग्राम से खड़ी होती दिख रही है। कहा जा रहा है कि टीएमसी को इस सीट पर होने वाले उपचुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। कई बड़े नेता यहां से चुनाव लड़ने से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। इस सीट पर उन्हें साल 2021 में शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। 2026 में भी अधिकारी ने यहां से जीत दर्ज की, लेकिन भवानीपुर सीट से विधायक रहते हुए नंदीग्राम को छोड़ने का फैसला किया था।

कांग्रेस से दूरी बनाकर चलेंगे CM विजय? तमिलनाडु राजनीति में नए समीकरणों के संकेत

चेन्नई मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने तमिलनाडु में गठबंधन की सरकार बनाई जरूर है, लेकिन उनका इरादा कुछ और ही लगता है. विजय जल्दी से जल्दी अपने बूते सरकार चलाना चाहते हैं. और यह गठबंधन साथियों, खास तौर पर कांग्रेस, के लिए काफी चिंता वाली बात हो सकती है।  एक तरफ विजय लोक कल्याणकारी कदम उठा रहे हैं, और ऐन उसी वक्त विरोधी खेमे में बगैर बुलडोजर के ही तोड़-फोड़ की कार्रवाई चल रही होती है. विजय के सलाहकारों की टीम देश भर के नेताओं से सीखने और उस पर अमल करने की रणनीति पर काम कर रही है।  मुख्यमंत्री ने सहकारी बैंकों से लिए गए किसानों के 50,000 रुपये तक के फसल लोन माफ कर दिए हैं. सरकारी ऐलान के अनुसार, जिन बड़े किसानों ने सहकारी बैंकों से फसल लोन लिया है, उन्हें भी 5 हजार रुपये की राहत दिए जाने की बात है।  राज्यसभा में डेब्यू, और उपचुनावों की तैयारी तमिलनाडु में 18 जून को राज्यसभा की एक सीट के लिए उपचुनाव होना है. तमिलनाडु की मेलम विधानसभा सीट से चुन लिए जाने के बाद सीवी शनमुगम ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. मुख्यमंत्री विजय उसी सीट के जरिए टीवीके की राज्यसभा में एंट्री करना चाहते हैं।  चर्चा है कि टीवीके में रिटायर्ड आईएएस अफसर यू सगायम को राज्यसभा भेजने पर विचार किया जा रहा है. तमिलनाडु में यू सगायम ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने कड़े रुख के लिए मशहूर रहे हैं. उनकी ईमानदारी के कई किस्से सुनाए जाते हैं।  खास बात यह है कि यू सगायम ऐसे अफसर हैं जिनका 28 साल की सेवा में 25 बार ट्रांसफर हुआ. यू सगायम को राज्यसभा भेज कर मुख्यमंत्री थलपति विजय तमिलनाडु की जनता को संदेश देना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ वो क्या करना चाहते हैं, और ऐसा करने से उनके पहले की डीएमके और एआईएडीएमके सरकारें अपने आप निशाने पर आ जाती हैं।  राज्यसभा के साथ ही टीवीके नेतृत्व की नजर तमिलनाडु की चार विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव हैं. एक सीट तो मुख्यमंत्री विजय ने ही खाली की है, जबकि तीन सीटें टीवीके में शामिल होने वाले विधायकों के AIADMK छोड़ने से खाली हुई हैं।  AIADMK विधायक के. मरगथम कुमारवेल, एस. जयकुमार और पी. सत्यभामा ने तमिलनाडु विधानसभा स्पीकर JCD प्रभाकर से मुलाकात कर अपना इस्तीफा सौंप दिया. मरगथम कुमारवेल मदुरंतकम सीट से, पी सत्यभामा धारापुरम सीट से और एस जयकुमार पेरुनदुरई सीट से AIADMK के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. धारापुरम और पेरुनदुरई को AIADMK का पारंपरिक गढ़ माना जाता है, जबकि मदुरंतकम चेन्नई के पास महत्वपूर्ण सीट मानी जाती है।  यह घटनाक्रम ऐसे वक्त सामने आया है, जब सीवी शनमुगम के नेतृत्व में टीवीके सरकार को समर्थन देने वाले 25 विधायकों में से कुछ के कैबिनेट में शामिल होने पर बातचीत चल रही थी. लेकिन, वाम दलों, वीसीके और टीवीके के ही कुछ नेताओं के दबाव में अचानक यह प्लान ड्रॉप कर दिया गया।  इस्तीफा देने वाले विधायक अब टीवीके के चुनाव निशान सीटी पर फिर से मैदान में उतरेंगे. उपचुनाव जीतने के बाद वे टीवीके के विधायक बन जाएंगे, और उसके बाद किसी भी गठबंधन साथी को कोई आपत्ति नहीं होगी – खास बात यह है कि सिलसिला यहीं थमने वाला नहीं है।  कांग्रेस और टीवीके का साथ कब तक तीन विधायकों का इस्तीफा तो ट्रेलर लगता है. जननायगन के समानांतर विजय की सियासी पिक्चर अभी बाकी है. टीवीके के उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि कम से कम 7 से 8 विधायक अभी आने वाले दिनों में ऐसे ही इस्तीफा दे सकते हैं।  टीवीके के पास फिलहाल 107 विधायक हैं. टीवीके ने 108 सीटें जीती थीं, जिनमें मुख्यमंत्री विजय की जीती हुई दो सीटें शामिल थीं. विजय ने अपनी एक सीट खाली कर दी थी. अब अगर उपचुनावों में सभी सीटों पर जीत हासिल होती है, तो टीवीके के पास 111 सीटें हो जाएंगी. तमिलनाडु में बहुमत का आंकड़ा 118 है. टीवीके सरकार को कांग्रेस की पांच विधायकों का समर्थन हासिल है।  अगर उपचुनाव घोषित होने से पहले और विधायक इस्तीफा देकर टीवीके में शामिल हो जाते हैं, तो टीवीके को सहयोगियों पर निर्भरता कम हो जाएगी. सबसे ज्यादा 5 सीटों वाली कांग्रेस से छुटकारा पाना आसान हो जाएगा. रिपोर्ट के मुताबिक, टीवीके के सीनियर नेताओं का मानना है कि विजय जैसे करिश्माई नेता के इर्द-गिर्द बनी पहली पीढ़ी की राजनीतिक पार्टी चुनाव के बाद बने सहयोगी दलों पर लंबे समय तक निर्भर नहीं रह सकती।  एक सीनियर टीवीके नेता का कहना है, अगर ये सीटें साथ में जाती हैं, तो बात बहुत मायने रखती है. जब लोगों को लगता है कि सरकार खुद को स्थिर कर रही है, तो जनता के बीच माहौल बदलने लगता है।  तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय की रणनीति जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला से काफी हद तक मिलती जुलती लगती है. हालांकि, दोनों राज्यों के राजनीतिक समीकरण में थोड़ा फर्क भी है. उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था. विजय ने कांग्रेस के साथ चुनाव बाद गठबंधन किया है।  कांग्रेस ने चुनाव से पहले तो उमर अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के साथ गठबंधन कर लिया था, लेकिन सरकार में शामिल नहीं हुई. उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस को लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. धीरे धीरे गठबंधन रस्मअदायगी भर रह गया. केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में कांग्रेस के 6 विधायक हैं. कहने को तो कांग्रेस सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है, लेकिन पार्टी की वही स्थिति है जैसी तमिलनाडु की पिछली डीएमके सरकार में थी।  ऐसा ही एक उदाहरण दिल्ली में मिलता है. 2013 में अरविंद केजरीवाल भी बहुमत के आंकड़े से पिछड़ गए थे. पहली बार सरकार बनाने के लिए केजरीवाल ने कांग्रेस का सपोर्ट लिया था, लेकिन अपने बूते सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी को अगले विधानसभा चुनाव तक इंतजार करना पड़ा, विजय तमिलनाडु में ये सब पहले ही कर लेना चाहते हैं।  क्या टीवीके नेता थलपति विजय का ताजा एक्शन बीजेपी के 'ऑपरेशन लोटस' जैसा है? देखा जाए तो तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए टीवीके के राजनीतिक सपोर्ट लेने की शुरुआत गठबंधन की कोशिश के रूप में हुई थी. जिसमें AIADMK … Read more

ममता बनर्जी के लिए बढ़ी मुश्किलें, TMC के कई सांसद BJP में जाने की तैयारी में?

कलकत्ता बंगाल में बदलाव हो गया. अब बदलाव के दायरे का विस्तार हो रहा है. बंगाल में 206 सीटों के साथ भाजपा ने सरकार बना ली. ममता बनर्जी की टीएमसी 80 पर ही अटक गई. ममता अब भी मानने को तैयार नहीं कि उनकी हार स्वाभाविक है. यह 15 साल से जनता के भीतर पनप रहे असंतोष और आक्रोश की स्वाभाविक परिणति है. पर, ममता टीएमसी की हार को भाजपा और चुनाव आयोग की साजिश मानती हैं. वे अपनी हार पर रोज ही विलाप के अंदाज में दोनों को खरी-खोटी सुनाती हैं. अब तो हालत यह हो गई है कि टीएमसी के उनके साथी भी भरोसेमंद नहीं रहे. नगर निकायों के पार्षद थोक में इस्तीफा दे रहे हैं. टीएमसी के ज्यादातर सांसद और विधायक भाजपा के संपर्क में हैं. पार्टी की बैठकों-कार्यक्रमों में उनकी गैरहाजिरी इसका संकेत है. ममता को भी अब लगने लगा है कि उनके लोग जान-बूझ कर दूरी बना रहे हैं. तभी तो उन्हें कहना पड़ रहा है कि जिन्हें जाना है, वे चले जाएं. बचे-खुचे लोगों से वे टीएमसी को पुनर्जीवित कर लेंगी।  पार्षदों के थोक में इस्तीफे विधानसभा चुनावों में हार के बाद नगरपालिकाओं में टीएमसी पार्षदों के सामूहिक इस्तीफे का सिलसिला शुरू हो गया है. आधा दर्जन से अधिक नगरपालिकाओं में थोक के भाव टीएमसी पार्षदों के इस्तीफे हुए हैं. यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. फालता सीट पर आए नतीजे के बाद डायमंड हार्बर में भी पार्षदों के इस्तीफे का दौर शुरू हो गया है. पार्षदों के इस्तीफे की शुरुआत उत्तर 24 परगना जिले के भाटपाड़ा से हुई थी. कुल 35 में 30 पार्षदों ने एक साथ इस्तीफे सौंप दिए. इसी तरह हालीशहर के 23 पार्षदों में 16 ने एक साथ इस्तीफा दे दिया. उत्तर बैरकपुर, गारुलिया और डायमंड हार्बर में इस्तीफों का सिलसिला जारी है. कई और नगरपालिकाओं और निगमों में भी टीएमसी पार्षदों ने इस्तीफे दिए हैं. कोलकाता नगर निगम में भी टीएमसी के पार्षद पाला बदलने को बेताब दिखते हैं. ममता बनर्जी के खिलाफ बगावती तेवर देखने को मिले।  कब होगा दल बदल! रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल सांसदों की संख्या को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है। दरअसल, चर्चाएं इस बात को लेकर हैं कि दल बदल कानून से बचने के लिए कितने सांसदों की जरूतर होगी। कयास लगाए जा रहे हैं कि इसे लेकर मॉनसून सत्र तक स्थिति साफ हो सकती है। कहा यह भी जा रहा है कि दल बदल के कथित प्रयासों में लगे कई सांसद पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के करीबी हैं। विधायक बना रहे हैं दूरी चुनाव में हार के बाद 20 मई को पहली बार टीएमसी ने प्रदर्शन किया था, जिसमें बड़ी संख्या में टीएमसी विधायक शामिल नहीं हुए थे। यह घटनाक्रम पार्टी के आंतरिक विचार-विमर्श के एक दिन बाद सामने आया था, जिसमें कथित तौर पर जनता से जुड़ने के लिए सड़क पर उतरने की राजनीति की ओर लौटने की आवश्यकता पर चर्चा हुई थी। हालांकि, 80 विधायकों में से केवल 35 ही कार्यक्रम में पहुंचे, जिससे राजनीतिक गलियारों में संगठन के भीतर संभावित मतभेदों को लेकर अटकलें तेज हो गईं। यह ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी चुनावी हार के बाद खुद को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रही है। विपक्ष के नेता पद के लिए पार्टी की पसंद माने जा रहे शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने आंतरिक कलह की अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि कई विधायक संगठनात्मक जिम्मेदारियों और अन्य व्यावहारिक कारणों से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। एजेंसी वार्ता के अनुसार, फलता में भाजपा की जीत के बाद डायमंड हार्बर नगर पालिका में टीएमसी के आठ पार्षदों ने अपने इस्तीफे सौंप दिए। डायमंड हार्बर नगर पालिका में टीएमसी के 16 पार्षद थे। इस शहरी स्थानीय निकाय में दूसरी किसी पार्टी का एक भी पार्षद नहीं था। आठ पार्षदों ने सोमवार को अलग-अलग कारणों का हवाला देते हुए अपने इस्तीफे सौंपे हैं। बैठकों व कार्यक्रमों से दूरी ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से अब तक जितनी बैठकें की हैं, उनमें पार्टी के सभी विधायक नहीं शामिल हुए. शामिल न होने की कोई वजह बताना भी विधायकों ने मुनासिब नहीं समझा. चूंकि बैठकें टीएमसी चीफ ममता ने बुलाई थीं, इसलिए सबकी उपस्थिति जरूरी थी. खासकर तब, जब पार्टी के सामने अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है. टीएमसी के सांसद भी ममता से दूरी बनाने लगे हैं. चुनाव परिणाम आने के बाद ममता की बुलाई पहली ही बैठक से 10-12 नवनिर्वाचित विधायक नदारद रहे. विरोध प्रदर्शनों में सभी विधायकों की भागीदारी ममता बनर्जी सुनिश्चित नहीं कर पाईं।  अभिषेक के नेतृत्व पर प्रश्न इतना ही नहीं, अब तो ममता बनर्जी और उनके भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर भी सांसद-विधायक खुल कर सवाल उठाने लगे हैं. टीएमसी के सामने 2021 के बाद यह दूसरा बड़ा संकट है. कालीघाट में हुई समीक्षा बैठकों में कुणाल घोष, रितुव्रत बनर्जी जैसे वरिष्ठ विधायकों ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के फैसलों पर सीधे सवाल उठाए. विधायकों का मानना है कि बंद कमरों में रणनीति बनाने से पार्टी फिर से मजबूत नहीं होगी. इसके लिए कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरना होगा. बागी नेताओं का आरोप है कि बंद कमरे में आलाकमान द्वारा लिए गए फैसले जबरदस्ती नेताओं पर थोपे गए, जिससे जमीनी स्तर के नेताओं और पार्षदों ने पार्टी से दूरी बनाना शुरू कर दिया है।  MP काकोली के तल्ख तेवर टीएमसी के संकट को इससे भी समझा जा सकता है. ममता ने 4 बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार से लोकसभा में मुख्य सचेतक का पद छीन कर कल्याण बनर्जी को दे दिया. इससे काकोली की नाराज हुईं. ममता का यह फैसला उन्हें पार्टी के भीतर अपना अपमान लगा. भाजपा ने उनकी नाराजगी को भुना लिया. केंद्र सरकार ने काकोली को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की ‘Y’ श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा मुहैया कराई है. इंटेलिजेंस ब्यूरो की थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर उन्हें यह सुरक्षा दी गई है. सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अब टीएमसी के लिए राजनीतिक रणनीति बनाने वाली आई-पैक (I-PAC) के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी दे दिया है. काकोली की नाराजगी सामान्य बात … Read more

नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ने से कतरा रहे TMC नेता, ममता के सामने नई चुनौती

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होती नहीं दिख रहीं हैं। अब खबर है कि पार्टी को नंदीग्राम में होने वाले उप चुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं मिल रहा है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। फिलहाल, सीट पर उप चुनाव का भी ऐलान नहीं हुआ है। अटकलें हैं कि टीएमसी नेता यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर के साथ नंदीग्राम से भी चुनाव लड़ा था और जीत दर्ज की थी, लेकिन अंत में उन्होंने यह सीट छोड़ने का फैसला किया। खास बात है कि अधिकारी 2021 में भी तत्कालीन सीएम ममता बनर्जी को नंदीग्राम से हरा चुके हैं। 2 नेता कर चुके मना पूर्वी मिदनापुर जिले की नंदीग्राम विधानसभा सीट पर उप चुनाव की तारीख का ऐलान कभी भी हो सकता है। अब अटकलों का दौर शुरू हो गया है कि यहां टीएमसी ने उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि यहां से टीएमसी को उम्मीदवार खोजने में मुश्किल हो रही है। साथ ही दो नेताओं ने तो यहां से चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है। 2026 विधानसभा चुनाव में भी अधिकारी ने भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी को हराया है। नंदीग्राम से लड़ने नेता मना क्यों कर रहे अधिकारी के कभी करीबी रहे पवित्र कर भी नंदीग्राम से नहीं लड़ना चाहते। खास बात है कि शुभेंदु ने उन्हें ही इस सीट से हराया है। हिन्दुस्तान टाइम्स के अनुसार, वह कहते हैं, 'कुछ लोग मुझसे बात करने आए थे, लेकिन मैं दोबारा नंदीग्राम से नहीं लड़ सकता। इसका सवाल ही पैदा नहीं होता है।' चुनाव से कुछ समय पहले ही कर भारतीय जनता पार्टी छोड़ टीएमसी में गए थे। 2021 में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी के इलेक्शन एजेंट रहे शेख सूफियान भी यहां से चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। उन्होंने कहा, 'मैंने 2006 में नंदीग्राम का चुनाव लड़ा था। उसके बाद टीएमसी में से किसी ने भी मुझसे चुनाव लड़ने के लिए नहीं कहा। मुझे अब चुनावों में दिलचस्पी नहीं है। मैं मेरे परिवार की सलाह मानकर राजनीति से रिटायर हो रहा हूं।' टीएमसी का क्या है प्लान रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'उम्मीदवार का चुनाव ममता बनर्जी करेंगी और इस पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी। चुनावों का ऐलान होने दीजिए।' फलता जैसा लक्ष्य रखा मुख्यमंत्री बनने के बाद नंदीग्राम के अपने पहले दौरे पर अधिकारी ने अपने समर्थकों को आश्वस्त किया कि सीट खाली करने के बावजूद उनका अपने राजनीतिक गढ़ से जुड़ाव पूरी तरह मजबूत बना हुआ है। उन्होंने अभिनंदन रैली को संबोधित करते हुए अपने समर्थकों से पूछा कि क्या वे नंदीग्राम में भी फाल्टा जैसी जीत का अंतर दोहरा सकते हैं, जहां भाजपा ने एक लाख से अधिक मतों से जीत हासिल की है।

बिहार राजनीति में बड़ा उलटफेर, RJD छोड़ BJP में शामिल हुईं रितु जायसवाल

पटना  आरजेडी की पूर्व महिला नेता रितु जायसवाल अब भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गई हैं. बीजेपी प्रदेश संजय सरावगी ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई. इस मौके पर मंत्री दिलीप जायसवाल भी मौजूद रहे. बता दें कि जायसवाल ने BJP का दामन थामने की औपचारिक घोषणा 24 मई को की थी. आरजेडी छोड़कर रितु जयसवाल के साथ कई अन्य नेता भी बीजेपी में शामिल हुए। इनमें प्रोफेसर राजमणि, सीमा जायसवाल, माया गुप्ता, शकुंतला प्रजापति, संगीता यादव, सुलेखा खातून, पानो देवी, अनिल महतो और शिवशंकर शामिल हैं।  बीजेपी में शामिल होने के बाद ऋतु जयसवाल ने कहा कि आज वह पूरी मजबूती और आत्मविश्वास के साथ पार्टी में शामिल हो रही हैं. उन्होंने कहा कि उनके पुराने वीडियो सामने लाकर उन्हें ट्रोल किया जा सकता है, लेकिन वह डरने वाली नहीं हैं.उन्होंने कहा कि जब उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया था, तब उन्हें बागी कहा गया था। इसके बावजूद उन्होंने करीब 65 हजार वोट हासिल किए थे।  रितु जायसवाल ने कहा कि बीजेपी राष्ट्रहित की राजनीति करती है और देश से बढ़कर कुछ भी नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि वे राष्ट्रहित और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की बात करते हैं।  RJD से क्यों बढ़ी दूरियां? मुखिया दीदी’ के नाम से पहचान बनाने वाली रितु जायसवाल पहले आरजेडी की महिला प्रकोष्ठ की प्रदेश अध्यक्ष रह चुकी हैं. उन्होंने 2020 विधानसभा चुनाव में परिहार सीट से चुनाव लड़ा था और बहुत कम अंतर से हार गई थीं. लेकिन बाद में आरजेडी ने उनका टिकट काट दिया था. पार्टी ने उनकी जगह दूसरे उम्मीदवार को मैदान में उतारा, जिससे नाराज होकर रितु जायसवाल ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया. निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया था. उन्हें 60 हजार से ज्यादा वोट मिले थे और आरजेडी उम्मीदवार तीसरे स्थान पर पहुंच गया था. इसके बाद आरजेडी ने उन्हें 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था।  मुखिया के तौर पर बनाई पहचान रितु जायसवाल का राजनीतिक सफर काफी खास माना जाता है. मुंबई से सीतामढ़ी आकर उन्होंने सिंहवाहिनी पंचायत की मुखिया के रूप में काम किया और अपने काम की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. पढ़ी-लिखी और सक्रिय महिला नेता के रूप में उनकी अच्छी छवि रही है।  वैश्य समाज पर पकड़ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी उन्हें अपने साथ जोड़कर वैश्य समाज और महिला वोटरों के बीच पकड़ मजबूत करना चाहती है. सीतामढ़ी, शिवहर और आसपास के इलाकों में युवाओं और महिलाओं के बीच उनकी अच्छी लोकप्रियता मानी जाती है. बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी भी मिल सकती है।