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राहुल गांधी बोले, बीजेपी के सांसदों में है मतदाता धोखाधड़ी, हरियाणा की पूरी सरकार घुसपैठियों की

  नई दिल्ली कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर एक हमलावर पोस्ट साझा करते हुए बीजेपी पर एक बार फिर से 'वोट चोरी' का आरोप लगाया है. राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में लिखा कि वोट चोरी के जरिए कभी सीटें चुराई जाती हैं, तो कभी पूरी की पूरी सरकार ही हड़प ली जाती है. उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि लोकसभा में बीजेपी के जो 240 सांसद हैं, उनमें से मोटे तौर पर हर छठा सांसद वोट चोरी से जीता है।  राहुल ने तंज कसते हुए सवाल किया कि क्या इन सांसदों को बीजेपी की ही भाषा में 'घुसपैठिया' कहा जाना चाहिए?  उन्होंने वोटर लिस्ट और चुनाव प्रक्रिया को लेकर तीखा हमला बोला है।  'असली डर सच्चा का…' राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, "वोट चोरी से कभी सीटें चुराई जाती हैं, कभी पूरी सरकार. लोकसभा के 240 बीजेपी सांसदों में से मोटे तौर पर हर छठा सांसद वोट चोरी से जीता है. पहचानना मुश्किल नहीं- क्या उन्हें बीजेपी की भाषा में 'घुसपैठिए' कहें?" उन्होंने हरियाणा का जिक्र करते हुए कहा कि वहां तो पूरी सरकार ही 'घुसपैठिया' है।  राहुल गांधी ने कहा, "जो संस्थाएं अपनी जेब में रखते हैं, जो मतदाता सूचियों और चुनावी प्रक्रिया को तोड़-मरोड़ देते हैं- वो ख़ुद 'रिमोट कंट्रोल्ड' हैं. उन्हें असली डर सच्चाई का है, क्योंकि निष्पक्ष चुनाव हो जाएं, तो आज ये 140 के पास भी नहीं जीत सकते।  इससे पहले राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजे आने के बाद चुनाव आयोग और बीजेपी पर हमला बोला था। 

बंगाल के रिजल्ट से पहले यूपी में BJP की सक्रियता, PM मोदी समेत नेता जुटे मोर्चे पर

लखनऊ  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे भी नहीं आए थे और भारतीय जनता पार्टी ने साल 2027 में होने वाले चुनावों की तैयारियां शुरू कर दी थीं। इसके संकेत भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन समेत कई पार्टी दिग्गजों के दौरों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों से मिल रहे हैं। बंगाल में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है। वहीं, अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं। भाजपा को यूपी में भी असम की तरह हैट्रिक की उम्मीद है। UP में जुटे भाजपा के टॉप नेता 29 अप्रैल को बंगाल में दूसरे चरण का मतदान हुआ है। इससे एक दिन पहले ही भाजपा चीफ और पीएम मोदी 28 अप्रैल को उत्तर प्रदेश पहुंच गए थे। वहीं, जब पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने दल बदल किया, तो बंगाल में चुनावी ड्यूटी निभा रहे कई भाजपा नेता दिल्ली पहुंच गए थे। बंगाल के नतीजों के बाद कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि नारी शक्ति वंदन (संशोधन) विधेयक का विरोध की कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य दलों को कड़ी सजा मिली है। उन्होंने दावा किया कि सपा को भी जल्द ही महिलाओं के गुस्से का सामना करना पड़ेगा। उनका इशारा उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की ओर था। क्यों अहम है उत्तर प्रदेश साल 2014 में जब भाजपा ने कुल 282 लोकसभा सीटें जीती थीं, तो इसमें यूपी की 71 सीटें भी शामिल थीं। खास बात है कि 80 सीटों वाला यूपी लोकसभा सीटों के लिहाज से सबसे बड़ा राज्य है। वहीं, 2024 के चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लगा था और पार्टी घटकर महज 33 सीटों पर आ गई थी। इससे पहले 2019 में भाजपा को यूपी में 62 लोकसभा सीटें मिली थीं। एक ओर जहां समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव PDA यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक को मजबूत करने पर काम कर रहे हैं। वहीं, भाजपा गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वर्गों को वापस जोड़ने की कोशिश कर रही है जो लोकसभा चुनाव में उनसे छिटक गए थे। अब बीजेपी अपने पुराने वोट बैंक को फिर से हासिल करने के लिए कई बड़े कदम उठा सकती है ताकि यादव और जाटव वोटों के अलावा अन्य जातियों में अपनी पकड़ फिर से बनाई जा सके। बंगाल का जीत बनेगी भाजपा का इंश्योरेंस बंगाल में जीत के साथ ही भाजपा ने उत्तर और पश्चिम की तरह पूर्व में भी मजबूती हासिल कर ली है। हालांकि, दक्षिण में कर्नाटक को छोड़ दिया जाए, तो भाजपा को लोकसभा में खास समर्थन नहीं मिलता है। साथ ही बंगाल की जीत को भाजपा इंश्योरेंस की तरह भी देख सकती है, जहां अगर उसे किसी मजबूत राज्य में लोकसभा चुनाव में झटका लगता है, तो बंगाल से भरपाई की जा सके। यहां कुल 42 लोकसभा सीटें हैं। पंजाब पर भी नजरें कहा जा रहा है कि पंजाब को हमेशा से प्रधानमंत्री मोदी सरकार चुनावी रूप से अहम मानती रही है। सिख बहुल राज्य में भाजपा लगातार समुदाय को अपनी ओर लाने के प्रयास करती रही है। वही, दल सत्तारूढ़ आप को भी कुर्सी से बेदखल करने की कोशिश में है। 7 राज्यसभा सांसदों का आना भाजपा को कुछ हद तक चुनावी रूप से मददगार साबित हो सकता है। चुनाव के नतीजे बंगाल में भाजपा ने ऐतिहासिक 206 सीटों पर जीत हासिल की। वहीं, असम में शतक लगाकर चुनावी जीत की हैट्रिक पूरी की। इधर, केरल में भी भाजपा की सीटों का ग्राफ बढ़ा है। जबकि, तमिलनाडु में एक्टर विजय की टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनी। पुडुचेरी में एनडीए ने जीत हासिल की।

थलापति के विजय रथ के सामने खड़ी हो सकती हैं पिता की दो संतानें: DMK और AIADMK

चेन्नई  तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में थलापति विजय की टीवीके पार्टी ने जबर्दस्त जीत हासिल कर पूरे देश में कोहराम मचा दिया है. राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा में टीवीके को 108 सीटों पर जीत मिली है. देश के इतिहास में यह अपने तरह की अभूतपूर्व घटना है. महज दो साल पुरानी पार्टी अपने दम पर एक बड़े राज्य में इतनी बड़ी जीत हासिल कर सकती है. इस बात का भरोसा अच्छे-अच्छे चुनावी पंडितों को भी नहीं था. टीवीके की स्थापना दो मार्च 2024 को हुई थी. लेकिन, इतनी शानदार जीत हासिल करने के बावजूद टीवीके बहुमत से थोड़ी दूर रह गई है. राज्य में सरकार बनाने के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए. उसको कम से कम 10 और विधायकों की जरूरत है. लेकिन, उसके लिए यह 10 का नंबर अब भारी पड़ता दिख रहा है।  एक संभावना यह बन रही है कि टीवीके के विजय रथ को रोकने के लिए राज्य की दोनों प्रमुख पार्टियां डीएमके और एआईएडीएमके पुरानी दुश्मनी भूलकर साथ आ सकती हैं. ऐसा इसलिए भी संभव है कि ये दोनों एक ही पिता की संतानें हैं. इनके बीच एक तरह से खून का रिश्ता है. दरअसल, तमिलनाडु की राजनीति में DMK और AIADMK लंबे समय से दुश्मन के रूप में जानी जाती हैं. लेकिन दोनों का जन्म द्रविड़ आंदोलन से हुआ है. दोनों की विचारधारा लगभग एक समान है. दोनों द्रविड़ संस्कृति, सामाजिक न्याय, भाषाई गौरव और हिंदुत्व की विरोधी रही हैं।  डीएमके के बंटवारे की कहानी इस कहानी की शुरुआत 1972 में डीएमके के टूटने से होती है. दरअसल, DMK के संस्थापक सीएन अन्नादुरै की मृत्यु के बाद पार्टी में दो बड़े नेता एम. करुणानिधि और एम.जी. रामचंद्रन (MGR) चेहरा बने. करुणानिधि पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री थे, जबकि MGR पार्टी के सबसे बड़े चेहरे, कोषाध्यक्ष और जनप्रिय अभिनेता थे. सबसे बड़ा विवाद पैसे और पारदर्शिता को लेकर हुआ. MGR ने पार्टी नेताओं से अपनी संपत्ति घोषित करने की मांग की. उन्होंने 1972 के मदुरै सम्मेलन के हिसाब-किताब पर सवाल उठाए और पार्टी में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया. करुणानिधि इसे अपनी सत्ता पर चुनौती मान बैठे. तनाव पहले से बढ़ रहा था. 1971 में करुणानिधि ने MGR को कैबिनेट में जगह देने से मना कर दिया था. इसके अलावा करुणानिधि ने बेटे एमके मुथु को फिल्मों में MGR का मुकाबला करने के लिए तैयार किया, जो MGR को नागवार गुजरा. यही आग अक्टूबर 1972 में सुलग गई. 10-11 अक्तूबर को MGR को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित कर दिया गया।      14 अक्टूबर: DMK की आम परिषद ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।      17 अक्टूबर: MGR ने नई पार्टी अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (ADMK) का ऐलान कर दिया. 1976 में इमरजेंसी के दौरान उन्होंने ऑल इंडिया जोड़कर इसे AIADMK बना दिया।  एक ही पिता की संतानें DMK और AIADMK में वैचारिक रूप से कोई बड़ी दूरी नहीं है. दोनों ही पेरियार के द्रविड़ आंदोलन की विरासत का दावा करती हैं. दोनों समाज के पिछड़े वर्गों, मंदिर प्रबंधन, जाति विरोध और तमिल गौरव की बात करती हैं. उनका झगड़ा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, सत्ता और करुणानिधि-MGR के बीच व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता का था, न कि विचारधारा का।  जब एमजीआर बने सीएम वर्ष 1972 नई पार्टी बनने के महज दो महीने में AIADMK में करीब दस लाख सदस्य जुड़ गए, ज्यादातर MGR के फैन क्लबों के जरिए. 1977 के चुनाव में AIADMK ने भारी जीत हासिल की और MGR भारत के पहले अभिनेता मुख्यमंत्री बने. उसके बाद पांच दशक तक तमिलनाडु में DMK और AIADMK के बीच सत्ता की अदला-बदली चलती रही।  2026 में नया मोड़ 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में इस लंबे द्वंद्व को नई चुनौती मिली है. थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने शानदार प्रदर्शन किया है. विजय की लोकप्रियता, युवाओं का समर्थन और सिनेमा की ताकत ने पुरानी दो-दलीय व्यवस्था को हिला दिया है. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या DMK और AIADMK जो पिछले 50 साल से एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे, थलापति विजय के बढ़ते विजय रथ को रोकने के लिए एक साथ आ सकती हैं? कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह संभव है. दोनों पार्टियां जानती हैं कि अगर वे अलग-अलग रहीं तो विजय की TVK तमिलनाडु की राजनीति को नया आकार दे सकती है।  एक ही गठबंधन में डीएमके-एआईएडीएमके ऐतिहासिक रूप से देखें तो दोनों पार्टियों ने राज्य में आपस में कभी गठबंधन नहीं किया. लेकिन, ये दोनों दल एक ही समय में राष्ट्रीय स्तर पर एक ही गठबंधन में साझेदार रह चुके हैं. दिवंगत अटल बिहार वाजपेयी के नेतृत्व वाले एनडीए में 1999 में ये दोनों दल एक ही समय में गठबंधन में साझेदार थे. इसी तरह इन दोनों दलों ने एक समय केंद्र की यूपीए सरकार को समर्थन दिया था. ऐसे में बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में कुछ भी असंभव नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस वक्त टीवीके ने डीएमके और एआईएडीएमके के अस्तित्व को सीधी चुनौती दी है। 

राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राघव चड्ढा ने किया खुलासा, कहा – ‘AAP मुझे भी टारगेट कर सकती है’

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी से बीजेपी में शामिल होने वाले सांसदों ने आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की और आप सरकार द्वारा उनके खिलाफ की जा रही कार्रवाई पर चर्चा की। मुलाकात के बाद राज्यसभा सांसद ने आम आदमी पार्टी पर खूब निशाना साधा। उन्होंने कहा, आज हमने राष्ट्रपति को बताया कि पंजाब सरकार किस तरह आम आदमी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए सांसदों के खिलाफ बदले की राजनीति के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल कर रही है। पंजाब पुलिस की मदद से आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने विश्व कप विजेता हरभजन सिंह के आवास के बाहर 'देशद्रोही' लिखा। इसके बाद पंजाब में पद्म श्री राजेंद्र गुप्ता की फैक्ट्री का पानी का कनेक्शन काट दिया गया। राघव चड्ढा ने दावा किया है कि इनका अगला टारगेट मैं बनूंगा। मीडिया से बात करते हुए राघव चड्ढा ने कहा , आम आदमी पार्टी ने संदीप पाठक के खिलाफ झूठे और मनगढ़ंत एफआईआर दर्ज कराईं और मीडिया के जरिए यह अफवाह फैलाई कि उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा। मैं आम आदमी पार्टी को बताना चाहता हूं कि उन्होंने सतर्कता बोर्ड और प्रदूषण बोर्ड की मदद से बदले का एक खतरनाक खेल शुरू किया है, जिसका अंजाम बेहद बुरा होगा। आप का अगला टारगेट मैं- राघव चड्ढा उन्होंने सूत्रों के हवाले से दावा करते हुए कहा कि , मैं उनका अगला निशाना बनूंगा। ये मेरे ऊपर भी कोई कार्रवाई करने जा रहे हैं। इन्होंने हम सब की छवि खराब करने की पूरी कोशि्श की है। पंजाब सरकार ने सोशल मीडिया पर हमें धमकाने के लिए एजेंसियों को काम पर रखा है। आम आदमी पार्टी यह सब पंजाब सरकार के फंड से कर रही है। यही कारण है कि मैंने कहा कि आम आदमी पार्टी भ्रष्ट और समझौतावादी लोगों के हाथों में फंसी हुई है। बता दें, आम आदमी पार्टी (आप) को 24 अप्रैल को उस समय बड़ा झटका लगा जब उसके राज्यसभा के 10 सदस्यों में से सात- राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत साहनी और स्वाति मालीवाल ने यह आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ दी कि 'आप' अपने मूल्यों और मूल सिद्धांतों से भटक गई है। इसके बाद इन सभी ने भाजपा में विलय कर लिया था। 'आप' छोड़ने वाले सात सांसदों में से छह पंजाब से थे। 

तीन दिग्गज परिवारों के वारिस हारे: असम चुनाव में कांग्रेस का नया रिकॉर्ड, बदला सियासी मूड

असम असम में बीजेपी ने जीत की हैट्रिक लगाई है। बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए ने 102 सीटों पर जीत हासिल की। जबकि कांग्रेस सिर्फ 19 सीट पर सिमट गई है। असम में ऐसा देश में पहली बार हुआ कि भाजपा सरकार का कोई भी मंत्री चुनाव नहीं हारा। असम में लगातार तीसरी बार सत्ता से महरूम रहने वाली कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। असम के तीन पूर्व सीएम के बोटों को भी करारी हार का सामना करना पड़ा। इनमें से एक तो वर्तमान में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद भी हैं। असम के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के बेटों की हार के साथ ही कांग्रेस ने नया रिकॉर्ड भी बना डाला है। असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने 15 साल तक कांग्रेस की सरकार चलाई। पूर्व सीएम तरुण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई को असम चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। गौरव असम कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं और जोरहाट से तीन बार के सांसद हैं। असम विधानसभा चुनाव में गौरव गोगोई जोरहाट सीट से लड़े। हालांकि उन्हें बीजेपी के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। भाजपा कैंडिडेट हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने गौरव गोगोई को 23,182 वोटों से मात दी। वहीं पूर्व सीएम हितेश्वर सैकिया दो बार असम के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। हितेश्वर सैकिया के बेटे देबब्रत सैकिया को भी असम विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है। अपने पिता के परंपरागत सीट नजीरा विधानसभा सीट से खड़े देबब्रत सैकिया को बीजेपी प्रत्याशी मयूर बोरगोहाईं ने 46,000 से ज्यादा वोटों से करारी शिकस्त दी। देबब्रत खुद 2011 से लगातार इसी सीट से जीतते आ रहे थे। 2016 से विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रह चुके हैं। असम के कार्यवाहक मुख्यमंत्री रह चुके दिवंगत भूमिधर बर्मन के बेटे दिगंता बर्मन (Diganta Barman) को भी असम चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है। हितेश्वर सैकिया पद पर रहते हुए गुजर गए थे। तब भूमिधर बर्मन ने थोड़े समय के लिए मुख्यमंत्री का काम संभाला था। दिगंता बारखेत्री सीट से लड़े लेकिन BJP के नारायण डेका से 84,000 से ज्यादा वोटों से करारी शिकस्त देकर कांग्रेस के गहरी चोट दी। CM हिमंता बिस्वा सरमा बोले- जनता ने वंशवादी राजनीति को नकारा असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इन तीनों की हार पर कहा कि किसी की हार में खुश होना ठीक नहीं, खासकर जब वो हितेश्वर सैकिया के बेटे हों। उन्होंने साफ कहा कि जनता ने ‘खानदानी राजनीति’ यानी सिर्फ बाप-दादा के नाम पर चुनाव लड़ने की सोच को नकार दिया है। उन्होंने कहा कि इन लोगों ने तीन-चार बार चुनाव जीते, उनके पास अपनी अलग पहचान बनाने का पूरा मौका था, लेकिन वो ऐसा नहीं कर पाए। यहां एक दिलचस्प बात यह है कि हिमंत सरमा खुद लगभग 20 साल तक कांग्रेस में रहे और उन्हें पार्टी में लाने वाले हितेश्वर सैकिया ही थे. 2014 में वो BJP में आ गए।

मिशन-2027: भाजपा सुशासन बनाम अराजकता के मुद्दे पर, सपा के पीडीए समीकरण की परीक्षा

लखनऊ  पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव परिणामों ने यूपी की राजनीति को नई दिशा दे दी है। मिशन-2027 की तैयारी में जुटी भारतीय जनता पार्टी को इन नतीजों से निश्चित रूप से मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी, जबकि विपक्षी दलों -खासकर समाजवादी पार्टी -के सामने अपने पीडीए समीकरण को बनाए रखने की कठिन चुनौती आ खड़ी हुई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन राज्यों से मिली राजनीतिक ऊर्जा के दम पर भाजपा यूपी में तीसरी बार सत्ता हासिल कर पाएगी? सुशासन बनाम अतीत की अराजकता पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा की रणनीति पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'बुलडोजर बाबा' और 'हिंदू हृदय सम्राट' की छवि को प्रभावी ढंग से भुनाया और प्रदेश में सुशासन लागू करने का वादा किया, जिसका असर चुनाव परिणामों में स्पष्ट दिखा। माना जा रहा है कि भाजपा यूपी में भी इसी रणनीति को आगे बढ़ाएगी। पार्टी संगठन पहले से ही अपने कार्यकर्ताओं को वर्ष 2012-2017 बनाम 2017-2027 की तुलना के आधार पर विकास, सुशासन और रोजगार को मुद्दा बनाकर विपक्ष को घेरने की गोपनीय हिदायत दे चुका है। समाजवादी पार्टी के पीडीए समीकरण की होगी कठिन परीक्षा वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने कांग्रेस के साथ मिलकर पीडीए की रणनीति पर चलते हुए 43 सीटें जीती थीं और एनडीए गठबंधन को जोरदार चुनौती दी थी। अब मिशन-2027 में इस सफलता को दोहराना सपा के लिए आसान नहीं होगा। सपा प्रमुख लगातार पीडीए की राजनीति को धार देने में जुटे हैं, लेकिन भाजपा के सुशासन के दावों का जवाब देना और पूर्वांचल के जातीय समीकरणों को साधना उनके लिए बड़ी परीक्षा होगी। कांग्रेस के सामने खुद को मजबूत करने की चुनौती वर्ष 2024 में सपा के साथ गठबंधन कर कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीती थीं, जबकि विधानसभा में उसके दो विधायक हैं। पार्टी अब दलितों, ओबीसी और अल्पसंख्यकों को संगठन में तरजीह देते हुए सम्मेलनों के माध्यम से अपना जनाधार मजबूत करने में लगी है। हालाँकि भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते रहते हैं, जिसका तोड़ निकालना कांग्रेस के लिए सरल नहीं होगा। बसपा को तलाशनी होगी नई सोशल इंजीनियरिंग की राह मायावती के लिए भी ये नतीजे चुनौती लेकर आए हैं। बसपा ने वर्ष 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के बल पर सरकार बनाई थी और उसे 30.43 प्रतिशत मत मिले थे। लेकिन बीते दो दशकों में पार्टी का जनाधार लगातार घटता रहा – वर्ष 2022 में यह 12.88 प्रतिशत और वर्ष 2024 में मात्र 9.39 प्रतिशत रह गया। ऐसे में मिशन-2027 में वर्ष 2007 जैसी सफलता दोहराना बसपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी。

राघव चड्ढा को पांच मई को राष्ट्रपति से मिलने का समय, सीएम मान से पहले तय हुई मुलाकात

चंडीगढ़ पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान आज पांच मई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलेंगे। इस प्रस्तावित मुलाकात से पहले राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा तीन अन्य सांसदों के साथ राष्ट्रपति से मिलेंगे। ये सभी सांसद हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं।  राष्ट्रपति कार्यालय ने इन सांसदों को 5 मई को सुबह 10.40 बजे का समय दिया है। बताया जा रहा है कि यह सांसद पंजाब सरकार पर राज्य मशीनरी के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाएंगे। उनका आरोप है कि राजनीतिक प्रतिशोध के तहत उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री मान उसी दिन दोपहर 12 बजे राष्ट्रपति से मिलेंगे। उन्होंने आम आदमी पार्टी के छह सांसदों को रिकॉल करने के मुद्दे पर समय मांगा है। पार्टी की ओर से 80 विधायकों को दिल्ली भेजने की तैयारी है हालांकि राष्ट्रपति से मुलाकात केवल मुख्यमंत्री ही करेंगे। 

AAP से टीवीके तक: नए राजनीतिक दलों की पहली ही चुनाव में चौंकाने वाली एंट्री

नई दिल्ली तमिल फिल्मों के सुपरस्टार विजय ने अपनी सियासी पारी के आगाज से न सिर्फ सबको हैरान कर दिया, बल्कि उनकी पार्टी तमिलागा वेट्री कषगम (टीवीके) अपने गठन के दो साल के भीतर ही देश के उन चंद सियासी 'स्टार्टअप' में शामिल हो गई जो अपने पहले ही चुनाव में सत्ता तक पहुंचने में सफल रहे। टीवीके अब आम आदमी पार्टी, असम गण परिषद और तेलुगु देशम पार्टी जैसी पार्टियों की जमात में शामिल हो गयी है जो अपने पहले चुनाव में ही सत्तासीन हो गए। AAP ने भी किया था कमाल आम आदमी पार्टी ने 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपनी सियासी पारी की शुरुआत की थी और 70 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीती थीं और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई थी। असम गण परिषद 1985 में अपने गठन के तुरंत बाद सत्ता पर काबिज हुई थी। तेदेपा ने अपने गठन के एक साल बाद 1983 में आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में 201 सीटें जीतकर भारी बहुमत के साथ जीत हासिल की थी। सभी को नहीं मिली सफलता कुछ राजनीतिक दल अपने आगाज के साथ ही कामयाबी के शिखर पर पहुंच गए, लेकिन कई ऐसे दल भी रहे जिन्होंने अस्तित्व में आने के बाद अपने पहले चुनाव में शानदार दस्तक दी, लेकिन सत्ता में आने के लिए इंतजार करना पड़ा। पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की 'जन सुराज पार्टी' चौतरफा चर्चा के बावजूद सफलता हासिल नहीं कर सकी। इसी तरह अभिनेता कमल हासन की पार्टी मक्कल निधि मय्यम 2021 को तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली। शुरुआत से ही चर्चा में रही टीवीके टीवीके ने शुरू से ही जोरदार चर्चा पैदा की और अतीत में फिल्मी सितारों द्वारा बनाए गए कई राजनीतिक 'स्टार्टअप' के दक्षिण में अच्छे प्रदर्शन की तर्ज पर तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में इससे काफी उम्मीदें थीं। टीवीके ने तमिलनाडु के दो मुख्य दलों द्रमुक और अन्नाद्रमुक को पछाड़कर सब को हतप्रभ कर दिया। बिहार और यूपी में आईं नई पार्टियां बिहार और उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई राजनीतिक दल सियासी 'स्टार्टअप' के रूप में सामने आए, जिनमें कुछ नाकाम हुए और कुछ सीमित दायरे में कायम हैं। बिहार में पुष्पम प्रिया चौधरी की 'प्लूरल्स पार्टी' भी एक ऐसा दल है जो चर्चा के बावजूद कुछ सफलता हासिल नहीं कर सकी। जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) और उपेन्द्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा बिहार में सीमित दायरे में अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। उत्तर प्रदेश में निषाद पार्टी, पीस पार्टी, अपना दल (सोनेलाल) और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) जैसी कुछ ऐसे ही दल हैं।

पश्चिम बंगाल चुनाव: दिल्ली जैसा हाल दोहराती कांग्रेस, राहुल गांधी की भूमिका पर चर्चा तेज

नई दिल्ली राहुल गांधी का पश्चिम बंगाल चुनाव में करीब करीब उसी अंदाज में नजर आए, जैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव में देखे गए थे – और मुद्दे की बात यह है कि बंगाल के नतीजे भी दिल्ली जैसे ही लग रहे हैं. दिल्ली की ही तरह बंगाल में भी कांग्रेस के जीरो बैलेंस की ही संभावना नजर आ रही है. ये बंगाल का लगातार दूसरा विधानसभा चुनाव है, जब पार्टी सीटों के हिसाब से शून्य प्राप्त करने जा रही है. पश्चिम बंगाल चुनाव में राहुल गांधी की दिलचस्पी को उनके एक वीडियो से समझने की कोशिश की जा सकती है. पश्चिम बंगाल में जिस दिन दूसरे चरण की वोटिंग होनी थी, उस दिन राहुल गांधी ने ग्रेटर निकोबार प्रोजेक्ट पर बयान जारी किया था. 29 अप्रैल को सुबह आठ बजे (7:58 am पर) सोशल साइट X पर एक वीडियो पोस्ट कर राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर हमला बोला था. राहुल गांधी ने वीडियो निकोबार के कैंपबेल बे में प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे आदिवासी नेताओं से मिलने के बाद बनाई थी. बाद में, सरकार की तरफ से राहुल गांधी के आरोपों का जवाब भी दे दिया गया. कांग्रेस के कैंपेन के हिसाब से देखें तो राहुल गांधी ने विधानसभा चुनाव के दौरान दो बार पश्चिम बंगाल का दौरा किया है, और 5 रैलियां की हैं. 2024 के आम चुनाव में तो राहुल गांधी चुनाव प्रचार के लिए गए तक नहीं थे. 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी एक दिन के दौरे पर गए थे, और दो चुनावी रैलियां की थीं. कहने को तो पश्चिम बंगाल कांग्रेस पूरे बंगाल में विधानसभा चुनाव लड़ा है, बंगाल कांग्रेस के बड़े नेता अधीर रंजन चौधरी भी विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन राहुल गांधी सिर्फ दो दिन के लिए रस्म अदा करने गए – आखिर पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर राहुल गांधी की रणनीति क्या थी? मोदी पर गरम, ममता पर नरम पश्चिम बंगाल में हुए दो चरणों के मतदान में हिंसा की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है, न ही उस दौरान किसी की जान गई है. चुनाव आयोग ने तो पहले से ही शांतिपूर्ण मतदान का दावा किया था. लेकिन, पहले चरण के मतदान के बाद 23 अप्रैल को आसनसोल में कांग्रेस के एक कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई थी. पश्चिम बंगाल कांग्रेस का आरोप है कि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस से जुड़े गुंडों ने ही पार्टी कार्यकर्ता की हत्या की है, जो राज्य में खत्म हो चुके कानून व्यवस्था का सबूत है. राहुल गांधी ने भी सोशल साइट X पर एक पोस्ट में ऐसा ही आरोप लगाया है. राहुल गांधी ने लिखा, 'कांग्रेस कार्यकर्ता देबदीप चटर्जी की वोटिंग के बाद TMC से जुड़े गुंडों द्वारा की गई हत्या बेहद निंदनीय है. शोकाकुल परिवार के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं. पश्चिम बंगाल में आज लोकतंत्र नहीं, TMC का गुंडा राज चल रहा है. वोट के बाद विरोधी आवाजों को डराना, मारना, मिटाना – यही TMC का चरित्र बन चुका है.'

चुनावी नतीजों पर संतोष सुमन का तंज, ममता से लेकर कांग्रेस तक पर तीखी टिप्पणी

नई दिल्ली हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) सेकुलर के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मंत्री संतोष कुमार सुमन ने अलग-अलग राज्यों से आए चुनाव परिणामों पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व की जमकर सराहना करते हुए विपक्ष पर करारा तंज कसा है। संतोष सुमन ने कहा कि पीएम मोदी के नेतृत्व में आज उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक पूरे विपक्ष की हालत 'झालमुड़ी' जैसी हो गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की राजनीति में विपक्ष अब पूरी तरह से अपनी प्रासंगिकता खो चुका है और जनता ने उनके एजेंडे को नकार दिया है। 'देशविरोधी ताकतों की कठपुतलियों के लिए जगह नहीं' विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए संतोष सुमन ने कहा कि आज देश की राजनीति में विपक्षी दलों का हाल ऐसा हो गया है कि आम जनता उनकी असलियत समझ चुकी है। उन्होंने कहा कि देश के नागरिक अब जागरूक हो गए हैं और वे यह भली-भांति जान चुके हैं कि देशविरोधी ताकतों के इशारे पर काम करने वाली कठपुतलियों के लिए हिंदुस्तान में कोई जगह नहीं बची है। जनता अब सिर्फ विकास और राष्ट्रहित की राजनीति को ही अपना समर्थन दे रही है। विपक्ष को जमकर घेरा अलग-अलग राज्यों के चुनाव परिणामों की समीक्षा करते हुए संतोष सुमन ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में 'ममता बुआ' की नीतियों और उनकी राजनीतिक सोच पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। वहां की जनता अब पूरी तरह से सत्ता में बदलाव का मन बना चुकी है। वहीं, असम का जिक्र करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा की जमकर तारीफ की। सुमन ने कहा कि हिमंता बिस्वा शर्मा के नेतृत्व में हुए विकास और उनकी निर्णायक राजनीति ने असम में विपक्ष को पूरी तरह से पीछे छोड़ दिया है। कांग्रेस नेताओं पर चुटकी लेते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव परिणामों में कांग्रेस के गौरव गोगोई और पवन खेड़ा का 'पेड़ा' बन गया है। दक्षिण भारत में DMK से बढ़ रही है नाराजगी दक्षिण भारत की राजनीति पर अपनी बात रखते हुए 'हम' के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि वहां भी विपक्ष के लिए स्थिति ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में DMK की विचारधारा और उनके नेताओं द्वारा हाल ही में दिए गए कुछ विवादित बयानों को लेकर आम लोगों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। जनता के बीच पनप रहा यह गुस्सा अब सीधे तौर पर वहां के राजनीतिक और चुनावी परिणामों में भी स्पष्ट रूप से दिखने लगा है।