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तमिलनाडु की राजनीति में नया मोड़: अन्नामलाई ने बनाई अलग राह, नई पार्टी के गठन की घोषणा

नई दिल्ली  तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने शुक्रवार को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद राज्य में अपनी एक नई पार्टी बनाने के संकेत दिए। अन्नामलाई ने कहा कि, उनकी राजनीतिक पार्टी तमिलनाडु में अगला विधानसभा चुनाव लड़ेगी. भाजपा से इस्तीफा देने का बाद उन्होंने कहा कि, वे एक आंदोलन शुरू करने जा रहे हैं। भाजपा से इस्तीफा देने के बाद के अन्नामलाई ने कहा कि, उनके लिए पहले यह दुविधा वाली बात थी कि, वह बीजेपी के आदमी हैं या तमिलियन. पूर्व भाजपा नेता ने कहा कि, उन्होंने 4 दिसंबर 2025 को पार्टी को बताया कि वह इस्तीफा देने जा रहे हैं. पार्टी ने उन्हें चुनाव खत्म करने और फिर जाने को कहा।  बता दें कि, तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने शुक्रवार को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया जिसे भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने स्वीकार कर लिया. ऐसा बताया जा रहा है कि अन्नामलाई ने हाल में दिल्ली यात्रा के दौरान अपना इस्तीफा सौंपा था।  भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने शुक्रवार को एक बयान में कहा, "भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पार्टी की तमिलनाडु इकाई के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई द्वारा पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से दिया गया इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। अन्नामलाई इस्तीफे की संभावना और नयी राजनीतिक पार्टी बनाने की अटकलों के बीच पार्टी नेतृत्व से मुलाकात के लिए दिल्ली आए थे. उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से उनके आवास पर मंगलवार को मुलाकात कर इस विषय पर चर्चा की थी।  ऐसा बताया जा रहा है कि नैनार नागेंद्रन को उनकी जगह भाजपा की तमिलनाडु इकाई का अध्यक्ष पद नियुक्त किए जाने और राज्य में 2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के तहत अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) के साथ चुनावी गठबंधन फिर से बहाल किए जाने के बाद से अन्नामलाई नाराज थे।  अन्नामलाई ने गुरुवार को घोषणा की थी कि वह पांच जून को यानी आज सोशल मीडिया पर बातचीत के दौरान अपने विचार साझा करेंगे. वह राष्ट्रीय राजधानी की अपनी यात्रा के बारे में संभवतः स्पष्टीकरण देंगे तथा राष्ट्रीय राजधानी की अपनी यात्रा, इस्तीफे और नयी राजनीतिक पार्टी शुरू करने की संभावित योजना के बारे में भी स्थिति स्पष्ट करेंगे. आज उन्होंने नई पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया। 

पार्टी के तेजतर्रार प्रवक्ता से राज्यसभा उम्मीदवार तक: पवन खेड़ा को मिला कांग्रेस का बड़ा इनाम

 नई दिल्ली सियासत में संघर्ष कभी बेकार नहीं जाता, बशर्ते आप सही वक्त पर सही पिच पर बैटिंग कर रहे हों. राजनीति में ये कदम आपके लिए बंद पड़े दरवाजों को खोल देता है. कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. कांग्रेस ने राज्यसभा चुनावों के लिए अपने 7 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है, जिसमें पवन खेड़ा का नाम शामिल हैं. इस तरह पार्टी उन्हें कर्नाटक से संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) भेज रही है।  बीजेपी और मोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस के तेज तर्रार प्रवक्ता पवन खेड़ा फ्रंटफुट पर लगातार मोर्चा खोला रखे थे. बीजेपी के 'एक्शन' पर आक्रामक तरीके से पवन खेडा के 'रिएक्शन' और कांग्रेस का 'पॉलिटिकल कैलकुलेशन' ने क्या राज्यसभा का टिकट कंफर्म करा दिया है?  राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने गुरुवार को अपने सात उम्मीदावरों के नाम का ऐलान किया है, जिसमें पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ पवन खेड़ा और मंसूर खान को कर्नाटक से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है. कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस विधायकों की संख्या के आधार पर पवन खेड़ा का राज्यसभा जाना तय है।   पवन खेड़ा की तपस्या पूरी हुई? यह वही पवन खेड़ा हैं, जिन्हें साल 2022 में राजस्थान से राज्यसभा टिकट न मिलने पर मायूसी हाथ लगी थी. तब पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर अपना दर्द बयां करते हुए लिखा था. 'शायद मेरी तपस्या में कुछ कमी रह गई.' लेकिन तब और अब के राजनीतिक हालात में जमीन-आसमान का अंतर है. पवन खेडा कल टीवी डिबेट्स का चेहरा थे, वो अब बीजेपी के खिलाफ 'लड़ाई के प्रतीक' बन चुके हैं. ऐसे में कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला लिया।  पिछले कुछ समय में जिस तरह से पवन खेड़ा ने खुद को पार्टी के संकटमोचक और सबसे मुखर चेहरे के रूप में स्थापित किया, उसने कांग्रेस आलाकमान को अपना मुरीद बना लिया. ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व पर यह नैतिक दबाव था कि जो नेता फ्रंटफुट पर रहकर गांधी परिवार और पार्टी के लिए तमाम मुकदमे झेल रहा है, उसे तरजीह दी जाए. इस तरह उनकी 'तपस्या' न सिर्फ पूरी हुई, बल्कि राहुल गांधी की कोर टीम ने उनके नाम पर सबसे पहले मुहर लगाई।  फ्रंटफुट पर 'लड़ाई लड़ने' का इनाम कांग्रेस आलाकमान ने अपने प्रवक्ताओं और कार्यकर्ताओं को एक साफ संदेश दिया है कि जो नेता पार्टी के लिए जमीन और कानूनी मोर्चों पर लाठियां या मुकदमे झेलेगा, संगठन उसके साथ खड़ा रहेगा. पवन खेड़ा लगातार बीजेपी और पीएम मोदी के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दिए गए एक बयान के बाद जिस तरह असम पुलिस ने दिल्ली एयरपोर्ट पर ड्रामाई अंदाज में पवन खेड़ा को फ्लाइट से उतारा था और गिरफ्तार किया, उसने रातों-रात उन्हें कांग्रेस का 'पोस्टर बॉय' बना दिया था।  हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी पर अघोषित विदेशी संपत्ति और फर्जी पासपोर्ट के आरोपों को लेकर उनके खिलाफ असम में कई एफआईआर दर्ज हुईं. असम पुलिस ने उनके घर पर दबिश तक दी और उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जाकर राहत मिली. इस कानूनी लड़ाई में डटे रहने के कारण पार्टी ने उन्हें यह बड़ा इनाम दिया है. इस 'बदले वाली कार्रवाई' ने पवन खेड़ा के लिए राज्यसभा का रास्ता साफ कर दिया है।  संसद में मुखर 'वक्ता' की जरूरत पवन खेड़ा कांग्रेस के मीडिया और पब्लिसिटी विभाग के चेयरमैन हैं. वे टीवी डिबेट्स और प्रेस कॉन्फ्रेंस में बेहद तार्किक और तीखे हमलों के लिए जाने जाते हैं. कांग्रेस को राज्यसभा में एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो मल्लिकार्जुन खड़गे और जयराम रमेश के साथ मिलकर सदन के भीतर मोदी सरकार को पुरजोर तरीके से घेर सके.  इसीलिए कांग्रेस ने पवन खेड़ा को राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाया है।  राहुल और खड़गे के 'गुड बुक्स' में  पवन खेड़ा को गांधी परिवार और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दोनों का बेहद करीबी और वफादार माना जाता है. पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के समय से राजनीति के केंद्र में रहे पवन खेड़ा ने मुश्किल वक्त में भी कभी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा.  दिल्ली में शीला दीक्षित के सीएम रहते हुए पवन खेड़ा उनके निजि सचिव के तौर पर काम कर रहे थे, उसके बाद से कांग्रेस के राष्ट्रीय टीम का हिस्सा हैं. राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे समेत पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जिस तरह इस मामले को हाथों-हाथ लिया, उससे साफ है कि खेड़ा अब गांधी परिवार के गुड बुक्स में टॉप पर हैं। कर्नाटक से उनके साथ खुद मल्लिकार्जुन खड़गे भी राज्यसभा जा रहे हैं, जो दर्शाता है कि उन्हें सबसे सुरक्षित सीट से संसद भेजने का फैसला शीर्ष नेतृत्व की मर्जी से हुआ है. साल 2022 के राज्यसभा चुनावों के दौरान जब कांग्रेस ने बाहरी या अन्य नेताओं (जैसे इमरान प्रतापगढ़ी, प्रमोद तिवारी) को तरजीह दी थी, तब पवन खेड़ा के साथ-साथ पार्टी के भीतर भी कई आवाजें उठी थीं. इस बार खेड़ा को टिकट देकर आलाकमान ने उस पुराने असंतोष और 'तपस्या' वाले नैरेटिव को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। 

क्या टूट की कगार पर है TMC? 23 सांसदों को लेकर सियासी हलचल तेज, ममता एक्टिव मोड में

 कोलकाता पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद ममता बनर्जी को 15 साल बाद सत्ता गंवानी पड़ी थी. हालिया चुनाव में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को 80 सीटों पर जीत मिली थी. टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने पार्टी से निकाले जा चुके संदीपन साहा और ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में बगावत कर दी. बागी गुट ने ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता घोषित कर दिया, जिन्हें स्पीकर ने भी मान्यता दे दी है।  विधायकों के बाद अब सांसदों के भी बगावत करने की चर्चा जोरों पर है. चर्चा है कि टीएमसी के 23 सांसद बागी गुट के संपर्क में हैं. चर्चा 20 सांसदों के केंद्र और सूबे की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में जाने की भी थी. टीएमसी में बगावत के बीच बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी के एक बयान ने सस्पेंस और बढ़ा दिया है. ऋतब्रत बनर्जी ने कहा है कि थोड़ा धैर्य रखिए, बहुत कुछ हो सकता है।  दरअसल, शुक्रवार को कोलकाता में ऋतब्रत बनर्जी से टीएमसी के 20 सांसदों के बीजेपी में शामिल होने की अटकलों को लेकर सवाल पूछा गया था. इस सवाल के जवाब में ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि पिछले सात दिन से मेरी किसी भी सांसद से कोई बात नहीं हुई है. उन्होंने किसी भी सांसद से कोई बात नहीं होने को आधार बनाते हुए कहा कि इसलिए यह नहीं कह सकता कि सांसद क्या कदम उठाएंगे।  पश्चिम बंगाल विधानसभा में बागी गुट की ओर से नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि वर्तमान में जीता हूं. कल क्या होगा, यह कोई नहीं कह सकता. हालांकि, सूत्रों की मानें तो टीएमसी में अगले हफ्ते टूट हो सकती है. 23 सांसद भी बागी गुट के साथ जा सकते हैं. टीएमसी सूत्रों की मानें, तो ये सांसद अभिषेक बनर्जी से नाराज बताए जा रहे हैं. यह सांसद भी विधायकों की तरह अलग गुट बना सकते हैं।  टीएमसी के लोकसभा में 28 सांसद हैं. ऐसे में दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई से बचने के लिए अलग गुट को 19 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी. कहा जा रहा है कि सांसदों की बगावत का नेतृत्व पार्टी के एक बहुत ही वरिष्ठ सांसद कर रहे हैं. राज्यसभा में टीएमसी के 13 सांसद हैं. राज्यसभा में अलग गुट की मान्यता के लिए नौ सांसदों का समर्थन जरूरी होगा।  दूसरी तरफ, टीएमसी में बगावत के बाद अब ममता बनर्जी भी एक्टिव मोड में आ गई हैं. ममता बनर्जी ने कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आवास पर बड़ी बैठक बुला ली है. यह बैठक 5 जून की शाम चार बजे से शुरू होनी है. ममता बनर्जी के घर इस बैठक में टीएमसी के करीब-करीब सभी बड़े नेताओं को बुलाया गया है।  टीएमसी में सांसदों के भी बगावत करने की सुगबुगाहट और बागी विधायकों के दावे को मान्यता देते हुए स्पीकर की ओर से ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के कमरे की चाबी सौंपे जाने के बाद ममता बनर्जी की यह पहली बड़ी बैठक है. टीएमसी के नाम-निशान को लेकर भी अब कयासों का दौर तेज हो गया है।  ममता बनर्जी के सामने 28 साल पहले बनाई गई अपनी ही पार्टी का नाम और निशान अपने पास बनाए रखने की चुनौती आ खड़ी हुई है. ममता की अगुवाई में होने जा रही इस बैठक में आगे की रणनीति तय पर चर्चा होनी है।   

अन्नामलाई ने छोड़ी जिम्मेदारी, BJP ने स्वीकार किया इस्तीफा; दक्षिण की राजनीति में नई हलचल

बेंगलुरु तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को बड़ा झटका लग सकता है. बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई आज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बीजेपी छोड़ने का ऐलान कर सकते हैं. अन्नामलाई को मनाने की सभी कोशिशें नाकाम क्या रहीं, बीजेपी ने आंध्र प्रदेश को लेकर बड़ा फैसला ले लिया. बीजेपी ने आंध्र प्रदेश में खाली हो रही सभी चार सीटें सहयोगी दलों के लिए छोड़ दी हैं।  आंध्र प्रदेश में राज्यसभा सीटों के बंटवारे के जिस फॉर्मूले की चर्चा थी, उसके मुताबिक सूबे में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार की अगुवाई कर रही तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) को दो, पवन कल्याण की अगुवाई वाली जन सेना पार्टी को एक सीट मिलनी थी. चौथी सीट बीजेपी के खाते में आनी थी. लेकिन अब ऐसा होता नहीं दिख रहा।  आंध्र प्रदेश की चार राज्यसभा सीटों के चुनाव में बीजेपी खाली हाथ रहती नजर आ रही है. इसे तमिलनाडु में तेजी से बदल रहे सियासी घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है. तमिलनाडु बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष अन्नामलाई के पार्टी छोड़ने की चर्चा है और कहा जा रहा है कि इसी वजह से तमिलनाडु के पड़ोसी आंध्र प्रदेश की राज्यसभा सीटों के चुनाव में बीजेपी बैकफुट पर आ गई है।  बीजेपी ने जिस सीट पर दावा छोड़ दिया है, उसे लेकर कहा जा रहा है कि पार्टी इसी सीट से अन्नामलाई को राज्यसभा भेजने की तैयारी में थी. अब, जब अन्नामलाई के इस्तीफे की चर्चा जोरों पर है, कहा जा रहा है कि बीजेपी ने यह सीट सहयोगी दलों के लिए छोड़ने का फैसला कर लिया है. सूत्रों की मानें तो राज्यसभा चुनाव के लिए सीट शेयरिंग के इस नए फॉर्मूले पर अमरावती में एनडीए नेताओं की बैठक में मोहर भी लग गई।   बीजेपी ने मंजूर किया इस्तीफा भारतीय जनता पार्टी ने तमिलनाडु प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है. BJP के  राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने आधिकारिक तौर पर अन्नामलाई के इस्तीफे को मंजूरी दे दी है।  BJP की तरफ से जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, अन्नामलाई ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री नितिन नवीन ने उनके इस इस्तीफे को तत्काल प्रभाव से स्वीकार भी कर लिया है।  भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और मुख्यालय प्रभारी अरुण सिंह के हस्ताक्षर के साथ जारी इस प्रेस रिलीज में स्पष्ट किया गया है कि के. अन्नामलाई अब भारतीय जनता पार्टी के प्राथमिक सदस्य भी नहीं हैं. पत्र में लिखा गया है, "भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, माननीय श्री नितिन नवीन ने तमिलनाडु के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष श्री के. अन्नामलाई द्वारा पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से दिए गए इस्तीफे को स्वीकार कर लिया है।  दिल्ली में बीजेपी नेताओं से की थी मुलाकात अन्नामलाई ने दो जून को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष से मुलाकात की थी. इसके तुरंत बाद उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह के साथ एक अलग गोपनीय बैठक की. अमित शाह और नितिन नवीन समेत बीजेपी के तमाम शीर्ष नेताओं के साथ हुई इस बैठक में अन्नामलाई ने बेहद सौहार्दपूर्ण माहौल में पार्टी छोड़ने की इच्छा जता दी थी।  पूरी बैठक के बाद अन्नामलाई को वापस तमिलनाडु लौटना था. वे दिल्ली एयरपोर्ट के लिए रवाना हो चुके थे और फ्लाइट पकड़ने ही वाले थे कि तभी बीजेपी आलाकमान की तरफ से उन्हें अचानक वापस बुला लिया गया. बीजेपी के शीर्ष नेताओं ने अन्नामलाई को रोकने और पार्टी छोड़ने के फैसले को बदलने के लिए मनाने की आखिरी कोशिश की, लेकिन अन्नामलाई अपने फैसले पर अडिग रहे और आखिरकार बीजेपी मुख्यालय से उनका इस्तीफा स्वीकार होने की प्रेस रिलीज जारी हो गई।  आंध्र प्रदेश में एनडीए के घटक दलों के नेताओं की यह बैठक 4 जून को अमरावती में हुई थी. अब नए फॉर्मूले के मुताबिक सीएम एन चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली टीडीपी तीन सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. वहीं, एक सीट पर पवन कल्याण की पार्टी का उम्मीदवार होगा. आंध्र प्रदेश एनडीए में समन्वय बेहतर बनाने के लिए इस महीने के अंत तक तिरुपति, अमरावती और विशाखापत्तनम में तीन रैलियां करने का निर्णय भी इस बैठक में लिया गया।  सीट बंटवारे के फॉर्मूले में यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है, जब अन्नामलाई की सियासी राह को लेकर अटकलें तेज हैं. अन्नामलाई ने 2 जून को अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन, बीएल संतोष समेत बीजेपी के शीर्ष नेताओं के साथ कई दौर की बैठकें कीं. अन्नामलाई ने भविष्य में साथ काम करने की राह खुली रखते हुए बीजेपी नेतृत्व को धन्यवाद दिया और यह जानकारी भी दी कि वह अब नई राह पर चलना चाहते हैं। 

महिला चेहरे पर कांग्रेस का बड़ा दांव: मीनाक्षी नटराजन को मिला राज्यसभा टिकट, MP की राजनीति में बढ़ी चर्चा

भोपाल  मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने चौंकाने वाला फैसला लेते हुए मीनाक्षी नटराजन को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह की खाली हो रही सीट पर पार्टी ने लंबे समय बाद किसी महिला चेहरे पर दांव खेला है। राहुल गांधी की बेहद करीबी और तेलंगाना की एआईसीसी प्रभारी मीनाक्षी नटराजन आखिर कौन हैं और क्रॉस वोटिंग के डर के बीच कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें ही क्यों चुना? आगामी राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर भाजपा द्वारा मध्य प्रदेश से दो प्रत्याशी घोषित करने के चंद घंटे बाद कांग्रेस पार्टी ने भी देश के 5 राज्यों में खाली हो रही 7 सीटों के लिए प्रत्याशी घोषित कर दिए। इसमें एकमात्र महिला प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नाम शामिल है। उन्हें मध्य प्रदेश से खाली हो रही कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की सीट से प्रत्याशी बनाया गया है। इसके बाद उन तमाम अटकलों पर विराम लग गया जिसमें अलग—अलग नेताओं के दावेदारी को लेकर दावे किए जा रहे थे।     उज्जैन के नागदा में जन्म, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा।     जैव रसायन में स्नातकोत्तर और कानून में स्नातक की डिग्री।     एनएसयूआई की राष्ट्रीय अध्यक्ष और युवा कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष रह चुकी हैं।     2009 में मंदसौर लोकसभा सीट से सांसद चुनी गई थीं।     वर्तमान में तेलंगाना की एआईसीसी प्रभारी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता हैं। दिग्गजों को पछाड़कर महिला चेहरे पर दांव मध्य प्रदेश से राज्यसभा टिकट के लिए कांग्रेस के भीतर दिग्गजों की लंबी फेहरिस्त थी। दावेदारों में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, अरुण यादव, सज्जन सिंह वर्मा और शोभा ओझा सहित करीब दर्जनभर बड़े नाम शुमार थे। लेकिन पार्टी आलाकमान ने गुटीय राजनीति से दूर रहते हुए एक कद्दावर और साफ-सुथरी छवि वाली महिला नेत्री पर भरोसा जताया है। राहुल गांधी की करीबी और NSUI की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मीनाक्षी नटराजन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की एक बेहद सीनियर और जमीनी नेता मानी जाती हैं। उन्हें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की 'कोर टीम' का हिस्सा और उनका बेहद करीबी माना जाता है। उनकी राजनीतिक यात्रा बेहद शानदार रही है। मीनाक्षी नटराजन का राजनीतिक सफर उन्होंने छात्र राजनीति से शुरुआत एनएसयूआई से की। वे 1999 से 2002 तक NSUI की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहीं। इसके बाद 2002 से 2005 तक उन्होंने मध्य प्रदेश युवा कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। वे साल 2009 के लोकसभा चुनाव में मंदसौर निर्वाचन क्षेत्र से 15वीं लोकसभा की सांसद चुनी गई थीं। हालांकि, 2014 और 2019 के चुनावों में उन्हें भाजपा के सुधीर गुप्ता से हार का सामना करना पड़ा। वर्तमान में वह तेलंगाना की एआईसीसी प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं और 'राजीव गांधी पंचायती राज संगठन' की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। क्रॉस वोटिंग का डर, दिल्ली में नेताओं की 'घेराबंदी' मीनाक्षी नटराजन के नाम के एलान के साथ ही कांग्रेस के सामने अपनी सीट सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी चुनौती है। बिहार, हरियाणा और ओडिशा जैसे राज्यों में क्रॉस वोटिंग का दंश झेल चुकी कांग्रेस इस बार मध्य प्रदेश में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। राज्यसभा उम्मीदवार, जानिए सागर से दिल्ली तक का सफर सूत्रों के मुताबिक, विधायकों में सेंधमारी रोकने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव को बीते दिनों दिल्ली तलब किया गया था, जबकि इससे पहले कमलनाथ और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी दिल्ली जाकर शीर्ष नेतृत्व को रिपोर्ट सौंप चुके हैं। हालांकि भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है, कि वह खाली हुई तीसरी सीट पर प्रत्याशी नहीं उतारेगी।

राज्यसभा चुनाव के लिए भाजपा ने उतारे 11 उम्मीदवार, MP से तरुण चुग तो कर्नाटक से कांग्रेस ने पवन खेड़ा पर लगाया दांव

भोपाल/जयपुर/अहमदाबाद/दिल्ली भाजपा और कांग्रेस ने राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है। मध्यप्रदेश की दो सीटों के लिए राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और उद्योगपति रजनीश अग्रवाल को उम्मीदवार बनाया है। राजस्थान से पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनिया और डॉ. अलका गुर्जर को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस ने भी सात उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की है। पार्टी ने कर्नाटक से मल्लिकार्जुन खड़गे, पवन खेड़ा और मंसूर अली खान को उम्मीदवार बनाया है। वहीं मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन, राजस्थान से नीरज डांगी, तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती और झारखंड से प्रणव झा को राज्यसभा चुनाव के लिए टिकट दिया गया है। ओडिशा में 25 मई को देवाशीष सामंतराय ने बीजू जनता दल (BJD) और राज्यसभा से इस्तीफा देकर भाजपा जॉइन कर ली थी। इस तरह ओडिशा की इस सीट पर उपचुनाव होगा। इसके लिए भाजपा ने देवाशीष को ही उम्मीदवार बनाया है। 13 राज्यों की 27 राज्यसभा सीटों पर 18 जून को चुनाव होगा। नामांकन भरने की लास्ट डेट 8 जून है। तमिलनाडु, मेघालय और मिजोरम में भी प्रत्याशी घोषित     तमिलनाडु: CM विजय की पार्टी TVK ने राज्य की एक राज्यसभा सीट कांग्रेस को दी है। पार्टी ने यहां से प्रवीण चक्रवर्ती को उम्मीदवार बनाया है।     मेघालय: मेघालय डेमोक्रेटिक अलायंस-II (MDA-II) ने नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) के जेम्स पीके संगमा को सर्वसम्मति से उम्मीदवार बनाया है।     मिजोरम: राज्य की एक सीट के लिए सत्ताधारी दल जोराम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) ने पार्टी प्रवक्ता के. लालतलुआंगकिमा को प्रत्याशी घोषित किया है। NDA के पास 18 सीट राज्यसभा की जिन 27 सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें से NDA के पास अभी 18 (आंध्र प्रदेश से 1, गुजरात से 4, कर्नाटक से 3, राजस्थान-मध्य प्रदेश से 2-2, झारखंड, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से एक-एक सीटे हैं)। वहीं कांग्रेस गठबंधन के पास 5 सीटे हैं। वहीं तीन अन्य सीटें YSRCP के खाते में हैं। एक बीजेडी के पास थी। इन चुनावों में NDA को 17 सीटें मिलने की संभावना है, जबकि कांग्रेस को पांच, JMM को दो और TVK को एक सीट मिलने की उम्मीद है। एक सीट मिजोरम में जोरम पीपल्स मूवमेंट जीत सकती है। YSRCP अपनी तीनों सीटें गंवा सकती है। 244 सदस्यों वाले उच्च सदन में NDA के पास अभी 149 सांसद हैं, जबकि विपक्ष के पास 78 और गैर-गठबंधन वाले क्षेत्रीय दलों के पास 17 सांसद हैं। केंद्रीय मंत्री रवनीत बिट्टू और जॉर्ज कूरियन का कटा टिकट, मोदी कैबिनेट से विदाई तय भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए 11 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है. इस सूची के सामने आते ही सियासी गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा दो केंद्रीय राज्य मंत्रियों रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कूरियन के नामों के कटने को लेकर शुरू हो गई है. उम्मीदवारों की सूची में जगह न मिलने के कारण अब दोनों ही मंत्रियों की मोदी मंत्रिपरिषद से छुट्टी तय मानी जा रही है।  BJP की इस 11 संसदीय उम्मीदवारों की सूची में सबसे चौंकाने वाला  नाम रवनीत सिंह बिट्टू का है. वह राजस्थान कोटे से राज्यसभा सांसद हैं. केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को दोबारा मौका नहीं दिया गया है. पंजाब में सिखों के बड़े चेहरे के तौर पर स्थापित बिट्टू का 21 जून को कार्यकाल समाप्त हो रहा है. संसद का सदस्य न रहने की स्थिति में उनका मंत्री पद जाना अब लगभग तय है।  वहीं, मध्य प्रदेश कोटे से राज्यसभा सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कूरियन का नाम भी इस सूची से नदारद है. कूरियन का कार्यकाल भी आगामी 21 जून को समाप्त हो रहा है. उन्हें दोबारा राज्यसभा न भेजने के फैसले के बाद अब मोदी कैबिनेट में फेरबदल की सुगबुगाहट तेज हो गई है।  सांगठनिक धुरंधरों को मिला ईनाम पार्टी ने इस बार मंत्रियों को ड्रॉप करके संगठन में रात-दिन काम करने वाले जमीनी रणनीतिकारों पर बड़ा दांव खेला है।  भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और कई राज्यों के चुनावी प्रभारी तरुण चुघ को मध्य प्रदेश कोटे से उम्मीदवार बनाया गया है.चुघ को टिकट देकर पार्टी ने उनके संगठनात्मक कौशल को पुरस्कृत किया है. उनके साथ एमपी से प्रदेश मंत्री और लंबे समय से प्रदेश बीजेपी का प्रमुख चेहरा रहे रजनीश अग्रवाल को भी संसद भेजा जा रहा है।  इसके अलावा, राजस्थान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान में हरियाणा बीजेपी के प्रभारी डॉ. सतीश पूनिया को राजस्थान से टिकट मिला है. पूनिया की जमीनी और जाट समुदाय पर मजबूत पकड़ को देखते हुए इसे बड़ा फैसला माना जा रहा है।  वहीं, बीजेपी की केंद्रीय सचिव डॉ. अलका गुर्जर को भी राजस्थान कोटे से राज्यसभा का टिकट दिया गया है, जो महिला और क्षेत्रीय संतुलन को मजबूत करेगा।  गुजरात के 4 'सरप्राइज' नाम  बीजेपी ने अपने अभेद्य किले गुजरात से चार ऐसे चेहरों को मैदान में उतारा है जिन्होंने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है.इन नामों के पीछे RSS की पसंद और ओबीसी-आदिवासी सोशल इंजीनियरिंग साफ दिखाई देती है।  राजूभाई शुक्ला: मेहसाणा के रहने वाले राजूभाई शुक्ला लंबे समय से पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता और मजबूत ब्राह्मण चेहरा हैं. वर्तमान में वे सुरेंद्रनगर के जिला प्रभारी हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से गहरा जुड़ाव रखते हैं. वे मेहसाणा जिला महामंत्री और कड़ी नगरपालिका के प्रमुख भी रह चुके हैं।  मानसिंह परमार: युवा चेहरा मानसिंह परमार सोमनाथ जिले से आते हैं. वे ओबीसी मोर्चा के प्रमुख व पूर्व विधायक गोविंद परमार के भतीजे हैं और खुद भी पूर्व जिला अध्यक्ष के रूप में संगठन संभाल चुके हैं।  जितेंद्र कंजारिया: देवभूमि द्वारका के खंभालिया से पूर्व विधायक मेघजी कंजारिया के बेटे जितेंद्र खुद भी ओबीसी समुदाय से आते हैं और क्षेत्र के बड़े जमीनी नेता हैं।  मुकेशभाई राठवा: छोटा उदेपुर जिला महामंत्री मुकेश राठवा भारतीय जनता युवा मोर्चा से अपनी राजनीति शुरू कर चुके हैं. RSS के कैडर रहे मुकेश राठवा की गुजरात के आदिवासी समुदाय पर बेहद मजबूत पकड़ मानी जाती है।  नॉर्थ-ईस्ट पर विशेष फोकस  मणिपुर में जारी संवेदनशील और सामाजिक हालात के बीच भाजपा ने मणिपुर बीजेपी की प्रदेश अध्यक्ष  ए. शारदा देवी को राज्यसभा का टिकट दिया है. एक महिला और सांगठनिक अध्यक्ष को उच्च सदन में भेजना राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा … Read more

मंत्रिमंडल गठन के साथ ही संकट! विभाग आवंटन से नाराज रेड्डी ने छोड़ा पद

 बेंगलुरु कर्नाटक में नई सरकार के गठन और विभागों के बंटवारे के तुरंत बाद कांग्रेस के भीतर का आंतरिक असंतोष एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया है. वरिष्ठ कांग्रेस नेता और नवनियुक्त कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।  रेड्डी ने खुलेआम अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि उनसे किया गया वादा पूरा नहीं किया गया, जिसके चलते वे यह बड़ा कदम उठा रहे हैं. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे कैबिनेट छोड़ रहे हैं, लेकिन विधायक (MLA) और कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहेंगे।  प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रामलिंगा रेड्डी ने उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार पर सीधा निशाना साधा. रेड्डी ने दावा किया, "डीके शिवकुमार खुद मेरे घर आए थे और कहा था कि जब मैं सीएम बनूंगा, तो मैं इस मंत्रालय (बेंगलुरु विकास) को छोड़ दूंगा और आप इसे संभाल लेना." रेड्डी के मुताबिक, शपथ ग्रहण समारोह से ठीक एक दिन पहले भी जब वे शिवकुमार से मिले, तो उन्हें दोबारा आश्वस्त किया गया था कि बेंगलुरु से जुड़ा पोर्टफोलियो उन्हीं को मिलेगा।  रेड्डी ने भावुक होते हुए कहा, "मैंने कभी इस विभाग की मांग खुद से नहीं की थी, लेकिन मुझे बार-बार इसका भरोसा दिया गया था. दो बार वादा करने के बाद अब मुझे जल संसाधन विभाग दे दिया गया. मैं इस फैसले से बेहद निराश हूं और इसीलिए इस्तीफा दे रहा हूं।  समर्थक के हाथ भेजा इस्तीफा, पत्र में लिखी बड़ी बात रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा सीधे मुख्यमंत्री को सौंपने के बजाय अपने एक समर्थक के जरिए मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को भिजवाया है. अपने त्यागपत्र में उन्होंने लिखा, "मैं कैबिनेट में मंत्री पद देने के लिए आपका और कांग्रेस पार्टी का आभार व्यक्त करता हूं. हालांकि, चूंकि मैं अपनी अंतरात्मा के खिलाफ काम करने में असमर्थ हूं, इसलिए मैं मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप रहा हूं. कृपया इसे स्वीकार करें।  राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर भी चर्चा तेज है कि रामलिंगा रेड्डी ने अपने त्यागपत्र में 'माननीय मुख्यमंत्री' के रूप में डी. के. शिवकुमार को संबोधित किया है, जो राज्य के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान की ओर इशारा करता है. हालांकि, रेड्डी ने मीडिया से कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से न तो शिवकुमार से नाराज हैं और ना ही सिद्धारमैया से।  दरअसल, रामलिंगा रेड्डी 'बेंगलुरु शहरी विकास'  विभाग की मांग कर रहे थे. वे इस महत्वपूर्ण विभाग पर अपनी कमान चाहते थे, लेकिन मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने यह जिम्मेदारी ब्याटरायनपुरा के विधायक कृष्णा बायरे गौड़ा को सौंप दी। 

13 दिनों में बदल गई बंगाल की राजनीति, एक मुलाकात के बाद TMC में बढ़ा सत्ता संघर्ष

कोलकाता दिल्ली में 'संयोगवश' हुई एक मुलाकात, हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप, तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर बढ़ता असंतोष और उत्तराधिकार की लड़ाई जैसी महज 13 दिन के भीतर तेजी से घटी इन सिलसिलेवार घटनाओं ने 28 वर्ष पुरानी पार्टी को उसके पहले विभाजन की दहलीज पर ला खड़ा किया। बंग भवन में 22 मई को तृणमूल के बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बीच कथित तौर पर हुई 'संयोगवश' मुलाकात से शुरू हुआ घटनाक्रम बुधवार को उस समय निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया, जब 58 विधायकों ने पार्टी के विधायक दल पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष से भी इसकी मान्यता हासिल कर ली। इस बगावत ने औपचारिक रूप से उस पार्टी में विभाजन की रेखा खींच दी, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर की थी। हालांकि, विद्रोह के बीज काफी पहले ही पड़ चुके थे। हार के बाद उभरने लगी थी कलह विधानसभा चुनाव में चार मई को भाजपा के हाथों मिली हार के बाद पार्टी के भीतर कलह उभरने लगी थी। पार्टी के कुछ विधायकों को लगने लगा था कि संगठन और निर्णय प्रक्रिया में पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के भतीजे एवं सांसद अभिषेक बनर्जी का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे असंतोष धीरे-धीरे गहराता चला गया। नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक में छह मई को ममता बनर्जी ने कथित तौर पर विधायकों से चुनाव अभियान में अभिषेक बनर्जी की भूमिका के लिए खड़े होकर उनका अभिनंदन करने को कहा। हालांकि इसका उद्देश्य उनके योगदान को स्वीकारना था, लेकिन पार्टी के एक वर्ग में इस कदम को लेकर फुसफुसाहट शुरू हो गई। कुछ विधायकों को लगने लगा कि पार्टी का केंद्र धीरे-धीरे एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है। जहांगीर को अभिषेक ने क्यों नहीं किया निष्कासित? पार्टी में असंतोष पहली बार खुले तौर पर 19 मई को सामने आया। एक अन्य बैठक में ऋतब्रत बनर्जी और इंटाल्ली के विधायक संदीपन साहा ने सवाल उठाया कि फालटा विधायक जहांगीर खान द्वारा पुन: चुनाव से हटने की सार्वजनिक घोषणा किए जाने के बावजूद पार्टी ने उन्हें निष्कासित क्यों नहीं किया। चूंकि जहांगीर को अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता था, इसलिए इस आलोचना को व्यापक तौर पर तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव को सीधी चुनौती के रूप में देखा गया। 22 मई को ऋतब्रत ने की शुभेंदु से मुलाकात वरिष्ठ विधायक कुणाल घोष ने भी इसी तरह की चिंताएं जताईं, हालांकि बाद में उन्होंने खुद को बागी खेमे से अलग कर लिया। घटनाक्रम ने तीन दिन बाद निर्णायक मोड़ लिया। ऋतब्रत बनर्जी राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए 22 मई को दिल्ली गए हुए थे तभी वह दोपहर के भोजन के लिए बंग भवन पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हो गई। इसके बाद ऋतब्रत ने सार्वजनिक रूप से विपक्षी विधायकों और सांसदों को प्रशासनिक समीक्षा बैठकों में आमंत्रित करने के शुभेंदु अधिकारी के फैसले का स्वागत किया और इसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा बताया। उनके इस बयान ने तत्काल राजनीतिक हलकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी हालांकि, कुछ ही दिन में तृणमूल एक अलग विवाद में घिर गई। 25 मई को आरोप सामने आए कि विधानसभा में विधायक दल के नेतृत्व ढांचे से जुड़े दस्तावेजों पर कई विधायकों के जाली हस्ताक्षर कर विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए थे। इस आरोप ने पहले से सुलग रहे असंतोष को और हवा दे दी तथा पार्टी के भीतर जारी खींचतान को खुले टकराव में बदल दिया। इस विवाद ने 27 मई को कानूनी मोड़ ले लिया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से औपचारिक शिकायत कर हस्ताक्षरों की जालसाजी का आरोप लगाया। इसके बाद विधानसभा सचिवालय ने मामले को पुलिस के संज्ञान में दिया, जिसके साथ ही अपराध अन्वेषण विभाग (सीआईडी) की ओर से जांच शुरू हो गई। अभिषेक बनर्जी पर हुआ हमला अगले दो दिन के दौरान जब जांचकर्ताओं ने विधायकों से पूछताछ शुरू की, तो मामला महज एक प्रक्रियागत विवाद तक सीमित नहीं रहा बल्कि तेजी से राजनीतिक संघर्ष में बदल गया। यह राजनीतिक सकंट 30 मई को उस समय और गहरा गया, जब अभिषेक बनर्जी पर सोनारपुर दौरे के दौरान भीड़ ने हमला कर दिया। यद्यपि सभी राजनीतिक दलों ने इस घटना की निंदा की, लेकिन तृणमूल के कई नेताओं ने निजी तौर पर संगठन और विधायक दल के कुछ वर्गों की अपेक्षाकृत फीकी प्रतिक्रिया पर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यह नेतृत्व और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के एक हिस्से के बीच बढ़ती दूरी का संकेत था। ममता की बैठक में पहुंचे कम विधायक इसके बाद 31 मई तक नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ती साफ दिखाई देने लगी। ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास पर नवनिर्वाचित विधायकों की बैठक बुलाई, लेकिन उसमें अपेक्षा से कम उपस्थिति रही। निर्णायक रूप से विभाजन एक जून को मुख्यमंत्री शुभेंदु द्वारा सार्वजनिक रूप से यह खुलासा किए जाने के कुछ ही घंटे बाद सामने आया कि सीआईडी जांच रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर शुरू हुई है। तृणमूल कांग्रेस ने दोनों नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया। लेकिन संकट को थामने के बजाय इस कदम ने बगावत को और तेज कर दिया। 'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस' देखते ही देखते बागी खेमे के भीतर इस मुहिम को एक नाम भी मिल गया-'ऑपरेशन क्राउन प्रिंस'। यह राजनीतिक नाटक बुधवार को चरम पर पहुंच गया जब 58 विधायकों के एक समूह ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुने जाने और नई टीम के गठन की जानकारी दी। विधानसभा अध्यक्ष ने इस दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही बागी गुट को तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विधायक दल के रूप में मान्यता मिल गई। कुछ ही मिनट बाद इन्हीं में से कई विधायक राज्य सचिवालय 'नबान्न' में शुभेंदु अधिकारी द्वारा बुलाई गई सरकारी समीक्षा बैठक में भी शामिल हुए। अब तक के इतिहास की सबसे बड़ी दरार दिल्ली में शुरू हुई यह बगावत, जिसने हस्ताक्षर जालसाजी के आरोपों, संगठन के भीतर बढ़ते असंतोष … Read more

बंगाल की राजनीति में तीखा वार, स्वपन दासगुप्ता ने TMC को लेकर BJP को किया आगाह

कलकत्ता तृणमूल कांग्रेस आंतरिक कलह के कारण बिखर रही है. ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी फिसलती हुई दिख रही है. इस बीच सीएम शुभेंदु सरकार में मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने अपनी ही पार्टी को चेतावनी दी है. स्वपन दास गुप्ता ने टीएमसी के वैसे नेताओं की ओर इशारा किया है जो बीजेपी के करीब आने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा है कि उन्हें यही उम्मीद है कि तोड़-फोड़ करने वालों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को दूषित न करे. उन्होंने कहा है कि वे TMC के विनाश पर कोई भी आंसू नहीं बहा रहे हैं।  TMC के 58 विधायकों के ऐसे गुट के नेता को प्रतिपक्ष की मान्यता मिल गई है, जिसे ममता बनर्जी का समर्थन प्राप्त नहीं है. इस गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी हैं. स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी है।  कोलकाता के रासबिहारी से विधायक स्वपन दासगुप्ता ने एक्स पर लिखा, "TMC के आत्म-विनाश पर मैं कोई आंसू नहीं बहा रहा हूं. मेरी एकमात्र आशा यही है कि इन तोड़-फोड़ करने वालों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल BJP को दूषित न करे।  बंगाल बीजेपी को आगाह करते हुए स्वपन दासगुप्ता ने लिखा, "हमें झूठे दोस्तों से हमेशा सावधान रहना होगा जो आज हमारे करीब आ रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने पिछले पाप धोने की जरूरत है।  मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने लिखा, "बंगाल की शुद्धिकरण प्रक्रिया अधूरी नहीं छोड़ी जा सकती। पत्रकार के रूप में सक्रिय रहने वाले स्वपन दासगुप्ता को सीएम शुभेंदु अधिकारी ने अपनी सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया है।  TMC में इतिहास की सबसे बड़ी टूट 3 जून 2026 को पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा भूकंप आया. तृणमूल कांग्रेस के इतिहास में पहली बड़ी टूट हुई. विधानसभा स्पीकर रथींद्रनाथ बोस ने ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दे दी।   ऋतब्रत को ममता ने हाल ही में पार्टी से निष्कासित किया था. उन्होंने अपने पास 58 TMC विधायकों का हस्ताक्षर दिखाया और उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया. स्पीकर ने अभिषेक बनर्जी द्वारा नामित शोभनदेब चट्टोपाध्याय के दावे को खारिज कर दिया।  ऋतब्रत ने खुद को 'असली TMC' का प्रतिनिधि बताया और ममता बनर्जी को मुख्य सलाहकार बनाने का प्रस्ताव रखा और कहा कि वे रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे. उनके गुट में संदीपन साहा, जावेद खान, शिउली साहा समेत कई प्रमुख विधायक शामिल हैं।  इस घटनाक्रम से TMC में गहरा संकट पैदा हो गया है. ममता-अभिषेक गुट ने सभी पार्टी कमेटियों को भंग कर दिया है।   

Congress Crisis: ‘पार्टी BJP से नहीं, अंदरूनी कलह से हारती है’, वरिष्ठ नेता का बड़ा बयान

भोपाल  मध्य प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने हरदा में कार्यकर्ताओं के बीच संगठन को लेकर बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि 2028 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए आखिरी मौका साबित हो सकता है, इसलिए पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर संगठन के लिए त्याग और समर्पण दिखाना होगा।कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अजय सिंह ने कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी भी खुलकर गिनाई। उन्होंने कहा कि चुनाव आते ही पार्टी में हर कोई दावेदार बन जाता है या फिर किसी गुट का समर्थक बनकर खड़ा हो जाता है। यही वजह है कि कांग्रेस कई बार भाजपा से नहीं, बल्कि अपनी ही अंदरूनी खींचतान से चुनाव हार जाती है। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि कांग्रेस 2028 में सत्ता में वापसी नहीं कर पाई, तो पार्टी के भविष्य पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। इसलिए अभी से संगठन को मजबूत करने और जनता के मुद्दों पर संघर्ष करने की जरूरत है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी पर की गई टिप्पणी को लेकर भी अजय सिंह ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री को अपने पद की गरिमा के अनुरूप भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए और राजनीतिक विरोध के बावजूद मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है। इस दौरान अजय सिंह ने केंद्र सरकार पर भी हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार की नीतियां बड़े उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने वाली हैं, जबकि कांग्रेस की राजनीति हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति के हितों को केंद्र में रखकर चलती रही है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से राहुल गांधी के संघर्ष और जनसरोकारों से प्रेरणा लेने की अपील की। कार्यक्रम में कांग्रेस नेताओं के बीच हल्की-फुल्की राजनीतिक नोकझोंक भी देखने को मिली। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए पूर्व नपाध्यक्ष सुरेंद्र जैन ने कहा कि भाजपा में रहते हुए वे कांग्रेस की एकजुटता तोड़कर चुनावी लाभ दिलाते थे। इस पर कांग्रेस नेता हेमंत टाले ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि अब वही रणनीति भाजपा के खिलाफ अपनाने का समय आ गया है। कुल मिलाकर हरदा का यह संवाद कार्यक्रम कांग्रेस के भीतर एकजुटता, संगठनात्मक मजबूती और 2028 की चुनावी तैयारी को लेकर गंभीर संदेश देने वाला साबित हुआ, जहां अजय सिंह ने साफ कर दिया कि सत्ता में वापसी का रास्ता पहले पार्टी के अंदर से होकर गुजरता है।