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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर सुर्खियों में, पाकिस्तान के संयुक्त गश्त प्रस्ताव पर चर्चा तेज

नई दिल्ली  अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता बेनतीजा रही। इस दौरान दोनों देशों के बीच किसी भी बात को लेकर आम सहमति नहीं बनी। यह वार्ता भले ही सिर्फ दो देशों के बीच हुई, लेकिन दुनिया की निगाहें इसपर टिकी हुई थीं। इसका सबसे बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज था, जिसपर युद्ध के बाद से ही पहरा है। हालांकि, शनिवार को इस समुद्री मार्ग से कम से कम 16 जहाज गुजरे। युद्धविराम के बाद का अब तक का सबसे व्यस्त दिन रहा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, अमेरिकी नौसेना के गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर USS फ्रैंक ई. पीटरसन और USS माइकल मर्फी इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। इन जहाजों को विशेष रूप से ईरानी समुद्री बारूदी सुरंगों को साफ करने के अभियान में लगाया गया है ताकि जहाजों के लिए रास्ता सुरक्षित किया जा सके। नौसेना की निगरानी करने वाली संस्था 'मैरीन ट्रैफिक' ने बताया कि USS माइकल मर्फी की सुरक्षा में चीन, हांगकांग और लाइबेरिया के झंडे वाले तीन विशाल कच्चे तेल के टैंकरों को सफलतापूर्वक मार्ग से गुजरने की अनुमति दी गई। वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने अपने संक्षिप्त संबोधन में होर्मुज (Strait of Hormuz) के फिर से खोलने जैसे संवेदनशील विषय पर किसी भी असहमति का जिक्र नहीं किया। आपको बता दें कि यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा गुजरता है। इस मार्ग का बंद होना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा खतरा माना जा रहा है। पाकिस्तान का संयुक्त गश्त प्रस्ताव इस्लामाबाद में संपन्न अमेरिका-ईरान सीधी बातचीत में पाकिस्तान ने इस विवादित जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही बहाल करने के लिए एक रूपरेखा पेश की है। अल जजीरा अरबी की रिपोर्ट के अनुसार, एक सूत्र ने पुष्टि की है कि पाकिस्तान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में संयुक्त गश्त का प्रस्ताव दिया। इसका मकदसद, अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए इस मार्ग को सुरक्षित और बाधा रहित बनाना है। पाकिस्तान ने सुझाव दिया है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए इस रणनीतिक जलमार्ग की निगरानी में संयुक्त तंत्र विकसित किया जाए। होर्मुज का खुलना क्यों जरूरी? दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। युद्ध के दौरान इस मार्ग के बाधित होने से वैश्विक तेल बाजार में भारी अस्थिरता पैदा हो गई थी। अब जबकि शनिवार को एक ही दिन में 16 जहाजों ने इसे पार किया है, यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए राहत के संकेत हैं।

महंगे और अनुपलब्ध गैस सिलेंडर ने बढ़ाई मुश्किलें, उधना स्टेशन पर उमड़ी भीड़

सूरत गुजरात के सूरत में इन दिनों घरेलू गैस सिलेंडर की किल्लत ने गंभीर सामाजिक संकट खड़ा कर दिया है. मिडिल ईस्ट में चल रहे संघर्ष के कारण सप्लाई प्रभावित होने और स्थानीय स्तर पर कालाबाज़ारी बढ़ने से आम लोगों, खासकर प्रवासी श्रमिकों के लिए हालात बेहद मुश्किल हो गए हैं. स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि बड़ी संख्या में मजदूर शहर छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं. स्टेशन पर भीड़, खुले मैदान में परिवार के साथ बैठे नजर आए लोग शनिवार रात और रविवार सुबह उधना रेलवे स्टेशन पर हजारों श्रमिकों की भीड़ देखने को मिली. रेलवे स्टेशन के वेटिंग एरिया से लेकर खुले मैदान तक लोग अपने परिवारों के साथ बैठे नजर आए. ट्रेनों में सफर करने के लिए लंबी कतारें लगी हुई थीं, जिससे साफ है कि पलायन का सिलसिला पिछले एक महीने से लगातार जारी है. मजदूरों ने बताया कि उन्हें सामान्य कीमत पर गैस सिलेंडर नहीं मिल रहा है. कई लोगों का कहना है कि सिलेंडर या तो उपलब्ध नहीं है या फिर ब्लैक में कई गुना ज्यादा कीमत पर बेचा जा रहा है. सीमित आय वाले इन श्रमिकों के लिए इतना महंगा सिलेंडर खरीद पाना संभव नहीं है. ऐसे में खाना बनाना और रोजमर्रा का जीवन चलाना कठिन हो गया है. श्रमिकों का पलायन उद्योगों के लिए भी बना चिंता का विषय एक श्रमिक ने बताया कि “काम तो मिल रहा है, लेकिन खाना बनाने के लिए गैस नहीं है. महंगे सिलेंडर खरीदना हमारे बस की बात नहीं है, इसलिए गांव लौटना ही बेहतर विकल्प है.” कई परिवारों ने भी यही कारण बताते हुए शहर छोड़ने का निर्णय लिया है. आपको बता दें कि सूरत देश का एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र है, जहां टेक्सटाइल और डायमंड इंडस्ट्री में लाखों प्रवासी मजदूर काम करते हैं. ऐसे में श्रमिकों का यह पलायन उद्योगों के लिए भी चिंता का विषय बनता जा रहा है. यदि यही स्थिति बनी रही, तो उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है. फिलहाल प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती गैस की आपूर्ति को सामान्य करना और कालाबाज़ारी पर सख्ती से रोक लगाना है. जब तक यह समस्या हल नहीं होती, तब तक सूरत से श्रमिकों का पलायन जारी रहने की आशंका बनी हुई है.

सुरों की दुनिया में शोक की लहर: आशा भोसले ने दुनिया को कहा अलविदा

नई दिल्ली बॉलीवुड की लेजेंडरी सिंगर्स में से एक आशा भोसले ने दुनिया को अलविदा कह दिया है. वो 92 साल की थीं. आशा भोसले को 11 अप्रैल को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. अस्पताल के डॉक्टर प्रति समदानी ने कन्फर्म किया था कि सिंगर उनकी केयर भी हैं. सिंगर की पोती ने बताया था कि चेस्ट इंफेक्शन और थकान के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी है. मगर अब खबर आई है कि आशा भोसले का निधन हो गया है. आशा भोसले ने 40 के दशक में अपने करियर की शुरुआत की थी. उन्होंने लेजेंडरी डायरेक्टर बिमल रॉय, राज कपूर के साथ-साथ लेजेंडरी म्यूजिक कम्पोजर ओ पी नय्यर, सरदार मलिक, सज्जाद हुसैन, एस मोहिंदर, ए आर रहमान संग काम किया था. उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर 40 और 50 के दशक की सबसे बड़ी गायिकाओं में से एक थीं. मंगेशकर परिवार से आईं आशा भी अपनी बहन की ही तरह सुरीली आवाज वाली थीं. आशा ने अपनी आवाज का जादू बॉलीवुड में 1950 के दशक में चलाया. हालांकि उन्होंने बड़ी फिल्मों में अपनी आवाज देने से पहले कई लो बजट फिल्मों में गाना गाकर पहचान पाई. 1952 में आई फिल्म 'संगदिल' में उन्होंने गाने गाए थे. म्यूजिक कम्पोजर सज्जाद हुसैन की इस एल्बम ने आशा को फेम दिलाया. उस जमाने के जाने माने डायरेक्टर बिमल रॉय ने 1953 में आई फिल्म 'परिणीता' में आशा भोसले को साइन किया था. इसके बाद राज कपूर ने उनकी अपनी 1954 की फिल्म 'बूट पोलिश' में काम दिया. लेजेंडरी म्यूजिक कम्पोजर ओ पी नय्यर के साथ आशा ने 1952 से लेकर 1956 तक कई गानों पर काम किया था. मगर 1957 में आई बी आर चोपड़ा की फिल्म 'नया दौर' के साथ आशा भोसले ने सफलता का असली स्वाद चखा. इस फिल्म के गाने भी नय्यर ने ही कम्पोज किए थे. बॉलीवुड में आशा ने बनाई अलग पहचान मोहम्मद रफी के साथ आशा भोसले की जोड़ी उस जमाने में सुपरहिट थी. दोनों ने मिलकर 'मांग के साथ तुम्हारा', 'साथी हाथ बढ़ाना' और 'उड़ें जब जब जुल्फें तेरी' को गाया था. साहिर लुधियानवी के बोल और रफी संग आशा की आवाज का जादू सभी के सिर चढ़कर बोलता था. उन्होंने 60 के दशक की फिल्म 'गुमराह', 'हमराज', 'आदमी और इंसान' संग कई और में अपनी आवाज दी. 1966 में उन्होंने आर डी बर्मन के साथ फिल्म 'तीसरी मंजिल' के लिए गाने गाए थे, जिन्हें खूब सराहा गया. इसके बाद वो दौर आया जब आशा भोसले ने बॉलीवुड के हिट डांस नंबर गाने शुरू किए. कहा जाता है कि जब उन्होंने पहली बार 'आजा आजा' गाने को सुना था तो उन्हें लगा था कि वो वेस्टर्न म्यूजिक ट्यून पर नहीं गा पाएंगी. बर्मन ने इसे बदलने का ऑफर दिया, मगर आशा ने मना कर दिया. बाद में उन्होंने इसे एक चैलेंज की तरह लिया और 10 दिन रिहर्सल करने के बाद इसे रिकॉर्ड किया था. आज भी ये गाना लोगों की जुबान पर है. 'आजा आजा' के बाद आशा ने 'ओ हसीना जुल्फों वाली', 'ओ मेरे सनम रे', 'पिया तू अब तो आजा' और 'ये मेरा दिल' जैसे बढ़िया गाने गाए, जो हर पार्टी की जान बन गए थे. गजल गायिकी ने दिलाया नेशनल अवॉर्ड 1981 में आशा भोसले ने गजल गायिकी में अपना हाथ आजमाया. उन्होंने फिल्म 'उमराव जान' में 'दिल चीज क्या है', 'इन आंखों की मस्ती के', 'ये क्या जगह है दोस्तों' और 'जुस्तजू जिसकी थी' जैसी गजलों को गाकर सभी का दिल खुश कर दिया था. इस फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर खय्याम थे, जिन्होंने आशा की आवाज को लो पिच पर ला दिया था. इन्हीं गजलों ने उन्हें उनका पहला नेशनल अवॉर्ड दिलवाया. इसके बाद उन्हें फिल्म 'इजाजत' के अपने गाने 'मेरा कुछ सामान' के लिए अपना दूसरा नेशनल अवॉर्ड मिला. 1995 में आशा भोसले ने 62 साल की उम्र में एक्ट्रेस उर्मिला मतोंडकर को अपनी आवाज दी. उर्मिला की फिल्म 'रंगीला' के गाने 'तन्हा तन्हा' और 'रंगीला रे' उन्होंने गाए. 2000 में दशक में आई 'लगान' के गाने 'राधा कैसे न जले', फिल्म 'प्यार तूने क्या किया' के गाने 'कमबख्त इश्क', फिल्म 'लकी' के गाने 'लकी लिप्स' को आशा भोसले ने ही गाया था. ये सभी गाने आगे चलकर सुपरहिट हुए. आशा के नाम है ये रिकॉर्ड साल 2013 में आशा भोसले ने अपना एक्टिंग डेब्यू किया था. 79 साल की आशा को फिल्म 'माई' में एक 65 साल की महिला के रोल में देखा गया था, जो अल्जाइमर की मरीज है. महिला को उसके बच्चे छोड़ जाते हैं. अपने काम के लिए क्रिटिक्स से आशा भोसले को तारीफ मिली थी. मई 2020 में आशा ने आशा भोसले ऑफिशियल के नाम से अपना यूट्यूब चैनल लॉन्च किया था. हिंदी, बंगाली, मराठी समेत आशा भोसले ने अपने करियर में 20 भाषाओं में गाने गाए. इसके चलते उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया था. जनवरी 2025 में आशा भोसले को दुबई में एक कॉन्सर्ट करते देखा गया था. 91 साल की आशा, जिन्हें प्यार से आशा ताई बुलाया जाता था, दमदार अंदाज में परफॉर्म करती दिखीं. उन्होंने इस कॉन्सर्ट में पंजाबी सिंगर करण औजला के हिट गाने 'तौबा तौबा' को गाया था. ये गाना विक्की कौशल की फिल्म 'बैड न्यूज' का था. ऐसे में विक्की के अतरंगी स्टेप्स को आशा भोसले ने भी कॉपी किया और स्टेज पर धूम मचाई थी.

SIR अभियान का असर: 12 राज्यों में 10% से ज्यादा मतदाता सूची से बाहर

नई दिल्ली भारतीय चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की वोटर लिस्ट से करीब 5.2 करोड़ अयोग्य मतदाताओं के नाम हटा दिए हैं जो कि इन राज्यों के कुल मतदाताओं का लगभग 10.2 प्रतिशत है. आयोग का कहना है कि ये अभियान वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा और सटीक बनाने के उद्देश्य से चलाया गया, जिसमें अनुपस्थित, ट्रांसफर, मृत, डबल पंजीकृत और अन्य अयोग्य मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, ताकि फर्जी मतदान की गुंजाइश खत्म हो सके. आयोग ने बताया कि SIR का पहला चरण बिहार में शुरू किया गया था. इसके बाद उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात और तमिलनाडु जैसे 11 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में एसआईआर अभियान शुरू किया गया था. अभियान के दौरान कुल 51 करोड़ मतदाताओं की जांच की गई, जिसमें से 10.2% नाम अनुपस्थित, मृत या फर्जी पाए जाने पर हटाए गए. आयोग ने ये कदम मतदाता सूची को शुद्ध और सटीक बनाने के उद्देश्य से उठाया है. इस प्रक्रिया में अंदमान-निकोबार से लेकर केरल तक के चुनावी डेटा को खंगाला गया और लाखों नए नाम भी जोड़े गए. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में कटे सबसे ज्याद नाम आंकड़ों के अनुसार, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सबसे अधिक 16.6% नाम हटाए गए. इसके बाद उत्तर प्रदेश में 13.2% और गुजरात में 13.1% नामों की छंटनी की गई है. छत्तीसगढ़ में भी 11.3% मतदाताओं के नाम सूची से बाहर किए गए. बंगाल में ये दर 10.9% रही, जहां न्यायिक प्रक्रिया के जरिए 27 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए. इन राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे जो या तो स्थायी रूप से ट्रांसफर हो चुके थे या उनकी मृत्यु हो चुकी थी. '6.5 करोड़ ने नहीं किया कभी मतदान' SIR अभियान के दौरान पाया गया कि 13 करोड़ लोग अपने पंजीकृत पतों पर अनुपस्थित थे, जबकि 3.1 करोड़ लोग दूसरे राज्यों में चले गए थे. इसके अलावा मतदाता सूची ने करीब 6.5 करोड़ ऐसे मतदाता थे, जिन्होंने कभी मतदान ही नहीं किया. इससे फर्जी वोटिंग की आशंका बनी रहती थी. लिहाजा उन्हें हटाने से एक शुद्ध और सटीक मतदाता सूची तैयार हुई है. अब इन 12 प्रदेशों में शुद्धिकरण के बाद कुल 45.8 करोड़ मतदाता पंजीकृत हैं. पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्रमशः 20.9% और 10% की शुद्ध गिरावट दर्ज की गई है, जबकि पुडुचेरी में मतदाताओं की संख्या में 1% की शुद्ध गिरावट देखी गई है. मध्य प्रदेश में 5.7, राजस्थान में 5.4, केरल में 2.5 और लक्षद्वीप में 0.3% मतदाताओं की संख्या में कमी आई है. UP में जोड़े गए सबसे ज्यादा नाम आयोग ने बताया कि नाम हटाने के साथ-साथ निर्वाचन आयोग ने 2 करोड़ नए नाम मतदाता सूची में जोड़े भी हैं. जिसमें उत्तर प्रदेश 92.4 लाख नए मतदाताओं के साथ पहले स्थान पर है. यूपी के बाद तमिलनाडु में 35 लाख, केरल में 20.4 लाख और राजस्थान में 15.4 लाख नए नाम शामिल किए गए. मध्य प्रदेश में 12.9 लाख और गुजरात में 12 लाख से अधिक मतदाताओं ने फॉर्म 6 और फॉर्म 8 के जरिए अपना पंजीकरण कराया, जिससे सूची में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है.

US-ईरान शांति वार्ता क्यों टूटी? परमाणु हथियार बना सबसे बड़ा रोड़ा

नई दिल्ली पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही उच्च स्तरीय शांति वार्ता 21 घंटे तक चली सघन चर्चा के बाद भी बेनतीजा रही। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन सी बात हुई, जिसके कारण शांति वार्ता छोड़कर अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस वहां से निकल गए। दरअसल, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस समझौते के विफल होने की वजह ईरान ने परमाणु हथियारों से जुड़ी अनिवार्य शर्तों को न मानना बता रहे हैं, तो वहीं ईरान ने अमेरिका पर अतार्किक और बेतुकी मांगें थोपने का आरोप लगाया है। क्यों विफल हुई शांतिवार्ता? पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में 21 घंटे तक चली बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस ने विस्तार से चर्चा करने और सार्वजनिक रूप से बातचीत करने से इनकार कर दिया, लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा कि मुख्य विवाद परमाणु हथियारों पर था। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस ने कहा कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है और उनकी टीम अंतिम और सर्वोत्तम प्रस्ताव पेश करने के बाद वार्ता खत्म कर दी है। कैसे बिगड़ी बात? शांति वार्ता के दौरान अमेरिकी उपराष्ट्रपति वेंस ने कहा, "हमें एक सकारात्मक प्रतिबद्धता देखने की जरूरत है कि वे परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेंगे और न ही ऐसे उपकरण हासिल करने की कोशिश करेंगे जो उन्हें जल्दी से परमाणु हथियार प्राप्त करने में सक्षम बना सकें। वेंस ने तया कि यही लक्ष्य अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का भी है और यही वे बातचीत के माध्यम से हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। वेंस ने एक अलंकारिक प्रश्न पूछा कि क्या ईरानियों में दीर्घकाल में परमाणु हथियार विकसित न करने की इच्छाशक्ति है? जिसका ईरानियों ने सीधा सा जवाब 'नहीं' में दिया। शनिवार को इस्लामाबाद में चली शांति वार्ता के दौरान ईरान की जब्त संपत्तियों पर चर्चा हुई, इस बारे में एक पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए वैंस ने कहा कि इस पर और कई अन्य मुद्दों पर चर्चा हुई, लेकिन हम ऐसी स्थिति तक नहीं पहुंच सके जहां ईरानी हमारी शर्तों को स्वीकार करने के लिए तैयार हों। ईरान ने अमेरिका की बेतूकी मांगो की आलोचना की ईरान ने मध्य पूर्व में युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से इस्लामाबाद में चल रही वार्ता में गतिरोध के लिए अमेरिका की बेतूकी मांगो को जिम्मेदार ठहराया है। ईरानी सरकारी प्रसारक आईआरआईबी ने बताया, "ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने ईरानी जनता के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए 21 घंटे तक लगातार और गहन बातचीत की। ईरानी प्रतिनिधिमंडल की विभिन्न पहलों के बावजूद, अमेरिकी पक्ष की अनुचित मांगों ने बातचीत की प्रगति को रोक दिया। इस प्रकार बातचीत समाप्त हो गई।"  

21 घंटे चली बातचीत फेल: US-ईरान में नहीं बनी सहमति, पाकिस्तान ने निभाई मध्यस्थ की भूमिका

नई दिल्ली अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग को रोकने के लिए पाकिस्तान ने मध्यस्थता का रोल निभाया. इस्लामाबाद में शांति वार्ता का आयोजन किया गया. हालांकि, ये बातचीत बेनतीजा साबित हुई. इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी पीठ थपथपाने से पीछे नहीं हट रहा है. विदेश मंत्री इशाक डार ने बातचीत में शामिल होने के लिए अमेरिका और ईरान का आभार जताया है. शांति वार्ता के बाद इशाक डार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस दौरान अपने बयान में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इन शांति वार्ताओं की मेजबानी करके सम्मानित महसूस कर रहा है. डार ने कहा, 'हम इस्लामाबाद में शांति वार्ता आयोजित करने के लिए ईरान और अमेरिका का शुक्रिया अदा करते हैं. ये न सिर्फ मिडिल-ईस्ट बल्कि पूरी दुनिया की स्थिरता के लिए एक अच्छा संकेत है.' पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने इस दौरान उम्मीद जताई कि दोनों पक्ष भविष्य में भी सीजफायर पर समझौतों को जारी रखेंगे. उन्होंने शांति के लिए पाकिस्तान की कोशिशें जारी रहने का भरोसा भी दिलाया. उन्होंने आगे बताया कि इस पूरी शांति वार्ता के पीछे पाकिस्तान के थल सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की अहम भूमिका रही. उन्होंने कहा, 'आसिम मुनीर ने सीजफायर करने के लिए कई दौर की वार्ताओं में मदद की.' बता दें कि इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटों तक बातचीत का दौर चला. इस दौरान दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर सहमति भी बनी. लेकिन परमाणु हथियार और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच बात नहीं बन पाई. क्यों फेल हुई शांति वार्ता? अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बताया कि वो बातचीत की नीयत से वार्ता में शामिल हुए थे. लेकिन ईरान अमेरिका का शर्तें मानने पर राजी नहीं है. ऐसे में वेंस अब अपनी टीम के साथ इस्लामाबाद से अमेरिका के लिए रवाना हो गए हैं. वहीं, ईरानी मीडिया का दावा है कि अमेरिका अपनी शर्तो में बहुत कुछ मांग रहा था.

भूकंप से दहशत: डोडा के बाद महाराष्ट्र के हिंगोली तक महसूस हुए झटके

 डोडा जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले में रविवार तड़के भूकंप के झटके महसूस किए गए.  रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 4.6 मापी गई.  नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी के अनुसार, भूकंप सुबह 04:32 बजे आया. राहत की बात यह है कि अभी तक कहीं से भी जान-माल के नुकसान की कोई सूचना नहीं मिली है. भूकंप के बाद स्थानीय प्रशासन अलर्ट हो गया है. पुलिस और राहत टीमें हालात पर नजर बनाए हुए हैं.  प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे घबराएं नहीं, लेकिन सतर्क जरूर रहें और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सूचना दें. 1 मार्च को भी आया था भूकंप डोडा में भूकंप के झटके महसूस करना कोई नई बात नहीं है. इससे पहले 1 मार्च 2026 को भी यहां 4.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया था. हालांकि उस समय भी कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ था, लेकिन लोगों में दहशत फैल गई थी. महाराष्ट्र में भी महसूस हुए थे भूकंप के झटके महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र स्थित हिंगोली जिले के कुछ हिस्सों में शनिवार को भूकंप के झटके महसूस किए गए.  रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता 4.7 मापी गई. इसके साथ ही पड़ोसी जिलों नांदेड़ और परभणी के भी कुछ हिस्सों में भूकंप के झटके महसूस किए गए. हिंगोली के जिलाधिकारी राहुल गुप्ता ने बताया कि पांगरा शिंदे गांव के कुछ हिस्सों में भूकंप का असर देखने को मिला है.  यहां कुछ घरों और सामुदायिक केंद्रो की दीवारों में दरार देखने को मिली हैं.  हालांकि किसी प्रकार की जान-माल का नुकसान नहीं हुआ. वहीं, नादेड़ जिला अधिकारी ने बताया कि भूकंप की तीव्रता 4.7 मापी गई थी.  नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी की एक रीडिंग का हवाला देते हुए कहा कि भूकंप शनिवार सुबह 8.45 बजे दर्ज किया गया. भूकंप का केंद्र हिंगोली जिले की वसमत तहसील के शिरली गांव में भूमि से करीब 10 किलोमीटर की गहराई में था.  

SIR वोटर लिस्ट में बड़ा अपडेट: 12 राज्यों में 6.08 करोड़ नाम हटे, यूपी और बंगाल में बदलाव सबसे ज्यादा

नई दिल्ली देशभर में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के दूसरे फेज के तहत चुनाव आयोग ने 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों की अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी है। इस प्रक्रिया के बाद वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जिसमें कुल 6.08 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। इस अपडेट के बाद इन राज्यों में कुल मतदाताओं की संख्या घटकर लगभग 44.92 करोड़ रह गई है। चुनाव आयोग के अनुसार, SIR प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना है, ताकि डुप्लीकेट, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए जा सकें। इस प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल, गुजरात, मध्य प्रदेश, गोवा सहित पुडुचेरी, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप शामिल रहे। उत्तर प्रदेश और बंगाल में सबसे बड़ा बदलाव सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है, जहां मतदाता सूची से लगभग 2.04 करोड़ नाम हटाए गए हैं। इसके चलते राज्य में मतदाताओं की कुल संख्या में करीब 13 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है और अब यह लगभग 13.39 करोड़ रह गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव मुख्य रूप से मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टियों को हटाने के कारण हुआ है। दूसरे बड़े राज्य पश्चिम बंगाल में भी मतदाता सूची में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। यहां करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जिससे राज्य की वोटर लिस्ट पहले की तुलना में काफी छोटी हो गई है। यह राज्य पहले से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, ऐसे में इस बदलाव को लेकर राजनीतिक हलचल भी तेज हो गई है। 60 करोड़ मतदाता SIR प्रक्रिया के तहत कवर हुए  चुनाव आयोग का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया देश की मतदाता सूची को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए की जा रही है। आयोग के अनुसार, पूरे देश में करीब 99 करोड़ मतदाताओं में से अब तक लगभग 60 करोड़ मतदाता SIR प्रक्रिया के तहत कवर किए जा चुके हैं, जबकि शेष राज्यों में यह अभियान अगले चरण में पूरा किया जाएगा। हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर कुछ राज्यों में राजनीतिक विवाद भी देखने को मिला है। विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में कुछ दलों ने मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने पर सवाल उठाते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। आने वाले समय में 17 राज्यों और 5 केंद्र शासित प्रदेशों में SIR प्रक्रिया शुरू की जाएगी। चुनाव आयोग का लक्ष्य है कि आगामी चुनावों से पहले देशभर की मतदाता सूची को पूरी तरह अपडेट कर लिा जाए, ताकि चुनावी प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी हो सके।  

‘साढ़े चार बम’ की रणनीति: इजरायल ने 40 दिनों में ईरान और लेबनान को दी कितनी ज़बरदस्त चोट

तेल अवीव इजरायल ने ईरान के साथ चल रही जंग में अब तक 18,000 से ज्यादा बम गिराए हैं. इजरायली सेना (IDF) की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उन्होंने ईरान में 4,000 से ज्यादा अलग-अलग ठिकानों को निशाना बनाया. यह आंकड़ा लगभग 40 दिनों (28 फरवरी 2026 से शुरू होकर अप्रैल 2026 तक) की लड़ाई का है।इजरायल की एयर फोर्स ने 1000 से ज्यादा हमले की सीरीज चलाई. कुल 10,800 से अधिक अलग-अलग हमले किए. हर टारगेट पर औसतन साढ़े चार बम या उससे ज्यादा गोला-बारूद गिराने की रणनीति अपनाई गई ताकि कोई भी लक्ष्य बच न सके. यह इजरायल की अब तक की सबसे भारी हवाई कार्रवाई में से एक मानी जा रही है।  28 फरवरी 2026 को शुरू हुए संघर्ष में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए. इजरायली सेना ने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चर, हथियार बनाने वाली फैक्टरियां, न्यूक्लियर से जुड़े ठिकाने, आईआरजीसी के मुख्यालय और कई सैन्य कमांडरों को निशाना बनाया। ईरान की मिसाइल और हथियार उत्पादन क्षमता को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा है. कई पेट्रोकेमिकल प्लांट, स्टील फैक्टरियां और मिसाइल बनाने के प्लांट तबाह हो गए. इजरायल का दावा है कि ईरान की डिफेंस इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया है. ईरान ने भी इजरायल पर मिसाइलें दागीं, लेकिन इजरायली डिफेंस सिस्टम ने ज्यादातर को रोक लिया। ईरान में इन हमलों से हजारों लोग मारे गए और घायल हुए. सैन्य ठिकानों के अलावा कुछ नागरिक इलाकों में भी नुकसान हुआ. ईरान की अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत दोनों को भारी झटका लगा है. इजरायल का कहना है कि इन हमलों से ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता, एयर डिफेंस और परमाणु कार्यक्रम को काफी नुकसान पहुंचा है। इजरायल ने ईरान के साथ-साथ लेबनान में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर भी लगातार हमले जारी रखे. 8 अप्रैल 2026 को एक ही दिन में इजरायल ने लेबनान पर 10 मिनट के अंदर 100 से ज्यादा हमले किए. इसमें बेरूत के घनी आबादी वाले इलाकों, दक्षिणी लेबनान और बेकां घाटी को निशाना बनाया गया। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय और सिविल डिफेंस के अनुसार उस एक दिन में 250 से 350 से ज्यादा लोग मारे गए और 1100 से अधिक घायल हुए. यह लेबनान में हाल के सालों का सबसे खूनी दिन था. पूरे अभियान में लेबनान में 1000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और हजारों लोग घायल हुए हैं।इजरायल ने हिजबुल्लाह के कमांड सेंटर, हथियार डिपो, ब्रिज और रसद मार्गों को नष्ट किया. कई पुल टूट गए जिससे दक्षिणी लेबनान में मदद पहुंचना मुश्किल हो गया है. इजरायल का दावा है कि इन हमलों में सैकड़ों हिजबुल्लाह लड़ाके मारे गए. लेबनान में लाखों लोग बेघर हो गए और देश में बड़ी तबाही मची है। इजरायल हर एक महत्वपूर्ण टारगेट को पूरी तरह खत्म करने के लिए बहुत ज्यादा बम गिरा रहा है. औसतन हर टारगेट पर 4.5 बम या उससे ज्यादा गोला-बारूद का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसका मकसद है कि कोई भी सैन्य सुविधा, मिसाइल या कमांड सेंटर बच न सके।        इजरायल ने 800 से ज्यादा हमले की लहरों में यह रणनीति अपनाई. इससे ईरान और हिजबुल्लाह की सैन्य क्षमता को जड़ से कमजोर करने का प्रयास किया गया. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी भारी बमबारी दुर्लभ है और इससे इलाके में लंबे समय तक असर रहेगा। यह 40 दिनों का संघर्ष फरवरी के अंत में शुरू हुआ जब इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमले शुरू किए. इसका मुख्य लक्ष्य ईरान की मिसाइल क्षमता, न्यूक्लियर कार्यक्रम और हिज्बुल्लाह जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स को कमजोर करना था. ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत की भी खबरें आईं जिससे स्थिति और गर्म हो गई।  अप्रैल 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर हुआ, लेकिन इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ हमले जारी रखे. इजरायल कहता है कि ये हमले आत्मरक्षा के लिए जरूरी हैं क्योंकि हिजबुल्लाह अभी भी खतरा बना हुआ है। दूसरी तरफ ईरान और लेबनान इन हमलों को आक्रामकता बता रहे हैं. दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं. लेबनान सरकार ने राष्ट्रीय शोक घोषित किया है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद मांगी है। यह युद्ध दिखाता है कि मध्य पूर्व में तनाव कितना गहरा है. इजरायल ने अपनी एयर पावर का पूरा जोर लगाया, लेकिन इससे आम लोगों की मौत और बड़ी तबाही भी हुई है. आने वाले दिनों में सीजफायर की कोशिशें जारी रहेंगी, लेकिन शांति अभी दूर नजर आ रही है। 

महिला सहकर्मी के शरीर को घूरना: हाई कोर्ट का अहम फैसला, यह ताक-झांक नहीं

मुंबई  बॉम्बे हाई कोर्ट ने महिला को कथित तौर पर घूरने को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी महिला सहकर्मी के शरीर को घूरना अनैतिक व्यवहार है, लेकिन इसे ताक-झांक (Voyeurism) का अपराध नहीं माना जाएगा। जस्टिस अमित बोरकर ने कहा कि ऐसे काम नैतिक रूप से गलत हैं, लेकिन वे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354C के तहत कानूनी मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं। बता दें कि यह धारा ताक-झांक के अपराध को परिभाषित करती है और उसके लिए सजा तय करती है। इस धारा के तहत किसी महिला को कोई निजी काम करते हुए देखना, उसकी तस्वीरें लेना या उन तस्वीरों को फैलाना शामिल है। यह उस हालात में लागू होता है जहां शरीर के निजी अंग खुले हों, कोई महिला शौचालय का इस्तेमाल कर रही हो, या कोई ऐसा यौन कृत्य कर रही हो जो आमतौर पर सार्वजनिक रूप से नहीं किया जाता। हालांकि, इसके तहत ऑफिस के माहौल में किसी को घूरना इस श्रेणी में नहीं आता। एक मामले में एक इंश्योरेंस कंपनी के एग्जीक्यूटिव के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। उनकी एक महिला सहकर्मी ने उन पर आरोप लगाया था कि मीटिंग के दौरान वे उनसे नजरें मिलाने के बजाय उनके शरीर को घूरते थे, और साथ ही गलत टिप्पणियां भी करते थे। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि कानून को उसकी लिखी हुई बातों से ज्यादा नहीं खींचा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे हालात में आपराधिक मामला जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल होगा। कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कंपनी की इंटरनल कंप्लेंट्स कमिटी (ICC) ने पहले ही आरोपी को बरी कर दिया था। इन दावों को देखते हुए कोर्ट ने इस मामले में व्यक्ति के ऊपर दर्ज एफआईआर को रद्द करने का फैसला किया। जस्टिस अमित बोरकर की सिंगल जज बेंच ने कहा, "आरोप सिर्फ इतना है कि उन्होंने ऑफिस मीटिंग के दौरान महिला के सीने को घूरा था। किसी को घूरना, भले ही यह सच भी मान लिया जाए, आईपीसी की धारा 354-C के तहत आने वाले 'ताक-झांक' के अपराध जैसा नहीं है।''