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ईरान से इंटरनेट पर बड़ा खतरा, रिपोर्ट में खुलासा, भारत और अन्य देशों में हो सकता है अटैक

नई दिल्ली ईरान के निशाने पर अब दुनिया का इंटरनेट कनेक्शन हो सकता है। खबर है कि IRGC यानी इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड्स कोर से जुड़ी तस्नीम एजेंसी ने फारस की खाड़ी में समुद्र के अंदर मौजूद इंटरनेट केबल का नक्शा जारी कर ऐसे संकेत दिए हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। आशंका जताई जा रही है कि इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। इंटरनेट केबल्स और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर का एक नक्शा तस्नीम की तरफ से जारी किया गया है। अब इस कदम को चेतावनी के तौर पर भी देखा जा रहा है कि फारस की खाड़ी पर अब डिजिटल अटैक किया जा सकता है। बुधवार को प्रकाशित इस रिपोर्ट में खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में स्ट्रेट को न सिर्फ एनर्जी के लिहाज से अहम रास्ता बताया गया है। बल्कि, समुद्र के नीचे बिछी केबल्स के लिए भी एक बेहद महत्वपूर्ण गलियारा माना है। ये केबल्स फारस की खाड़ी के देशों को इंटरनेट और संचार सेवाओं से जोड़ती हैं। इनमें यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब शामिल हैं। रिपोर्ट में चेतावनी भरे सुर इसमें कहा गया है कि इस जलमार्ग से कई बड़े कबल सिस्टम गुजरते हैं। साथ ही कहा गया है कि ईरान के मुकाबले फारस की खाड़ी इन समुद्री मार्गों पर ज्यादा निर्भर है। खास बात है कि जारी युद्ध के समय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पहले ही निशाने पर आ चुका था। ऐसे में इस ताजा रिपोर्ट ने डिजिटल अटैक की आशंका को और तेज कर दिया है। भारत के लिए है चिंता की बात? ये समुद्री नेटवर्क ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान जैसे देशों के लैंडिंग स्टेशन से गुजरता है। खास बात है कि इनमें से कई देश युद्ध की आंच का सामना कर रहे हैं। अब कहा जा रहा है कि दुनिया के बड़े डेटा उपभोक्ता होने के चलते भारत की डिजिटल इकोनॉमी इन कनेक्शन पर काफी निर्भर है। क्या होगा असर आशंकाएं हैं कि अगर किसी तरह की परेशानी आती है, तो लाखों यूजर्स की इंटरनेट स्पीड धीमी हो सकती है। साथ ही क्लाउड सर्विसेज और डिजिटल पेमेंट सिस्टम खासे प्रभावित हो सकते हैं। खास बात है कि इससे पहले फ्रांस की सरकारी कंपनी अल्काटेल सबमरीन नेटवर्क्स ने फोर्स मेजर नोटिस जारी कर दिए हैं। खास बात है कि इस कंपनी ने ही केबल बिछाने की जिम्मेदारी है। फोर्स मेजर का मतलब ऐसी असाधारण घटना से है, जो किसी व्यक्ति या कंपनी के नियंत्रण से बाहर हो, और उस घटना के कारण वह अपना काम या अनुबंध पूरा ना कर पाए।

सरकार की योजना: ₹10,000 पेंशन की संभावना, ये लोग होंगे सबसे बड़े लाभार्थी

नई दिल्ली भारत सरकार इनफॉर्मल वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने की योजना बना रही है। बढ़ती महंगाई और रिटायर लोगों के बढ़ते खर्च को देखते हुए, सरकार अटल पेंशन योजना (APY) के तहत दी जाने वाली न्यूनतम पेंशन की अपर लिमिट को बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह करने पर विचार कर रही है। मिंट ने यह जानकारी तीन अधिकारियों ने नाम न छापने की शर्त पर दी है। बता दें भारत में नफॉर्मल वर्कर्स वे श्रमिक हैं, जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। यहां नौकरी की सुरक्षा, फिक्स्ड सैलरी, या सामाजिक सुरक्षा (PF, पेंशन, छुट्टी) का अभाव होता है। ये देश के कुल वर्कफोर्स का लगभग 90% हिस्सा हैं, जिनमें रेहड़ी-पटरी वाले, घरेलू कामगार, मजदूर और स्वरोजगार करने वाले शामिल हैं। क्यों जरूरी है यह बदलाव? अटल पेंशन योजना मई 2015 में शुरू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, किसानों, दुकानदारों और छोटे व्यवसायियों को बुढ़ापे में आर्थिक सहारा देना है। अभी इस योजना के तहत 60 साल की उम्र के बाद ₹1,000 से ₹5,000 प्रति माह तक की गारंटीड पेंशन दी जाती है। लेकिन बढ़ती कीमतों के कारण यह राशि कम पड़ रही है। मौजूदा हालात क्या हैं? अटल पेंशन योजना में अब तक 9 करोड़ से अधिक सदस्य जुड़ चुके हैं, लेकिन इनमें से लगभग आधे सदस्य नियमित योगदान देना बंद कर चुके हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक के सबसे ज्यादा 1.35 करोड़ नए सदस्य जुड़े हैं। सरकार का मानना है कि पेंशन की लिमिट बढ़ाने से नए सदस्य जुड़ेंगे और पुराने सदस्य योजना में बने रहेंगे। नया प्रस्ताव क्या है? वित्त मंत्रालय और पेंशन फंड नियामक (PFRDA) मिलकर इस प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं। संभावना है कि पेंशन की अपर लिमिट ₹8,000 से ₹10,000 प्रति माह कर दी जाए।एक अधिकारी ने बताया , “यह बदलाव योजना को और आकर्षक बनाएगा और बढ़ती जीवन-लागत के अनुसार ढालेगा।” सरकार का कितना योगदान जो सदस्य 31 मार्च 2016 से पहले जुड़े थे, उन्हें शुरुआती पांच साल में सरकार की तरफ से को-कंट्रीब्यूशन मिलता था। यह रकम सदस्य के योगदान का 50% (अधिकतम ₹1,000 प्रति वर्ष) थी। यह सुविधा केवल उन्हीं को मिलती थी, जो इनकम टैक्स का भुगतान नहीं करते थे और किसी अन्य सामाजिक सुरक्षा योजना से नहीं जुड़े थे। कैसे होगा योजना का विस्तार? सरकार 'पेंशन सखी' और बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट (BC) के जरिए गांव-गांव तक योजना पहुंचाने की योजना बना रही है। साथ ही, निरंतर योगदान की चुनौती पर भी काम हो रहा है।26 जनवरी 2026 को कैबिनेट ने इस योजना को वित्त वर्ष 2031 तक जारी रखने की मंजूरी दी। प्रचार, विकास और गैप-फंडिंग गतिविधियों के लिए भी मदद जारी रहेगी। क्या सरकार के खजाने पर पड़ेगा बोझ? विशेषज्ञों का कहना है कि इस बदलाव से सरकारी खजाने पर अधिक दबाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि अटल पेंशन योजना ज्यादातर सदस्यों के अपने योगदान पर चलती है। ग्रांट थॉर्नटन के विवेक अय्यर कहते हैं, “APY एक निर्धारित-योगदान वाली योजना है। सुरक्षा ही इसका मुख्य उद्देश्य है। इसलिए इस बदलाव से सरकार पर कोई बड़ा वित्तीय दबाव नहीं पड़ेगा।”

राफेल डील पर भारत ने तय की लक्ष्मण रेखा, शर्त नहीं मानी तो सौदा रद्द, फ्रांस को ₹325000 करोड़ का भारी नुकसान

नईदिल्ली  भारत अपने डिफेंस सिस्‍टम को अपग्रेड करने और उसे मॉडर्न एज वॉरफेयर के लेवल तक लाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है. स्‍वदेशी तकनीक से नेक्‍स्‍ट जेनरेशन फाइटर जेट डेवलप करने के लिए AMCA प्रोग्राम लॉन्‍च किया गया है. इसके तहत 5th और 6th जेनरेशन का फाइटर जेट डेवलप किया जाना है. इसके साथ ही एयरस्‍पेस को अभेद्य किला बनाने के लिए मिशन सुदर्शन चक्र नाम से नेशनल एयर डिफेंस प्रोग्राम भी शुरू किया गया है. S-400 के साथ ही अन्‍य देसी डिफेंस सिस्‍टम इसका हिस्‍सा हैं. साल 2035 तक इसे पूरी तरह से अमल में लाने का लक्ष्‍य रखा गया है. इसके तहत कई एंटी मिसाइल, एंटी ड्रोन और एंटी एयरक्राफ्ट सिस्‍टम डेवलप किए गए हैं और किए जा रहे हैं. मिसाइल के क्षेत्र में भी भारत ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं. अग्नि सीरीज की मिसाइलों के साथ ही ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल इसका उदाहरण हैं. फाइटर जेट के मामले में भारत अभी भी इंपोर्ट पर निर्भर है. इसी क्रम में फ्रांस की डसॉल्‍ट एविएशन के साथ 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के प्रस्‍ताव को हरी झंडी दी गई है. यह सौदा तकरीबन 3.25 लाख करोड़ बताया जा रहा है. हालांकि, अब इस डील में नया पेच फंसता दिख रहा है. दरअसल, भारत ने राफेल डील के तहत इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट (ICD) तक पहुंच की शर्त रखी है. भारतीय पक्ष का कहना है कि यदि फ्रांस के साइड से इस शर्त का पालन नहीं किया गया तो भारत इस डील से पूरी तरह से बाहर निकल सकता है. ऐसे में अब फ्रांस पर निर्भर करता है कि 114 राफेल फाइटर जेट की महाडील आगे बढ़ती है या फिर बीच रास्‍ते ही दम तोड़ती है।  दरअसल, भारत के बहुप्रतीक्षित मीडियम रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) कार्यक्रम में 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है. करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये के इस मेगा सौदे में अब इंटरफेस कंट्रोल डॉक्यूमेंट (ICD) सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है, जो इस डील के भविष्य का फैसला कर सकता है. रक्षा मंत्रालय (MoD) के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, भारत को ICD तक पहुंच मिलने को लेकर भरोसा तो है, लेकिन यदि फ्रांस की ओर से इसमें किसी तरह की अनिच्छा दिखाई जाती है, तो नई दिल्ली इस सौदे से पूरी तरह पीछे हटने का कड़ा फैसला भी ले सकती है. यह रुख भारत की रक्षा खरीद नीति में एक बड़ा बदलाव दर्शाता है, जहां अब तकनीकी पहुंच और ऑपरेशनल ऑटोनॉमी को अनिवार्य शर्त के रूप में देखा जा रहा है, न कि एक अतिरिक्त सुविधा के रूप में. ‘इंडियन डिफेंस रिसर्च विंग’ की रिपोर्ट के अनुसार, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के नेतृत्व में ICD के महत्व को और अधिक बढ़ाया गया है. फरवरी 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) से मंजूरी मिलने के बाद MRFA कार्यक्रम अब सिर्फ विमानों की खरीद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक सामरिक आत्मनिर्भरता से जुड़ गया है. सरकार का स्पष्ट लक्ष्य है कि भविष्य में किसी भी अपग्रेड या वेपन इंटीग्रेशन के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भरता कम की जाए।  डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क तकनीकी रूप से ICD एक मानकीकृत डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क होता है, जो विमान के मिशन कंप्यूटर और बाहरी सिस्टम जैसे हथियारों के हार्डपॉइंट्स के बीच हैंडशेक का काम करता है. यदि भारत को ICD मिल जाता है, तो भारतीय इंजीनियर बिना मूल निर्माता के सोर्स कोड तक पहुंचे ही स्वदेशी हथियारों का फाइटर जेट में इंटीग्रेशन कर सकेंगे. इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि लागत भी काफी कम हो जाएगी. पहले 36 राफेल विमानों की खरीद में भारत को हर नए गैर-फ्रांसीसी हथियार को जोड़ने के लिए डसॉल्ट एविएशन पर निर्भर रहना पड़ा था. इस प्रक्रिया में अतिरिक्त लागत और लंबा समय लगता था, जिससे ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी प्रभावित होता था. हर नए हथियार के लिए अलग से बातचीत करनी पड़ती थी, जिससे पूरे सिस्टम की दक्षता पर असर पड़ता था. अब MRFA कॉन्‍ट्रैक्‍ट में ICD को शामिल करके भारत शुरुआत से ही इंटीग्रेशन फ्रीडम सुनिश्चित करना चाहता है. इसके तहत स्वदेशी हथियारों जैसे अस्त्र सीरीज (Mk1, Mk2, Mk3) की बीवीआर मिसाइलें, रुद्रम एंटी-रेडिएशन मिसाइल और स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (SAAW) जैसे प्रिसीजन गाइडेड म्यूनिशन को आसानी से जोड़ा जा सकेगा।  ICD क्‍यों है इतना अहम?     आईसीडी की अहम भूमिका: तकनीकी तौर पर ICD (Interface Control Document) एक मानकीकृत डिजिटल इंटरफेस फ्रेमवर्क है, जो विमान के मिशन कंप्यूटर और बाहरी सिस्टम के बीच हैंडशेक लेयर का काम करता है।      सिस्टम के बीच समन्वय: यह फ्रेमवर्क तय करता है कि विमान के मिशन कंप्यूटर और हथियार हार्डपॉइंट्स जैसे बाहरी सिस्टम आपस में कैसे संवाद करेंगे।      स्वदेशी क्षमता को बढ़ावा: ICD हासिल होने से भारतीय इंजीनियरों को स्वदेशी हथियारों को विमान में इंटीग्रेट करने की क्षमता मिलती है।      निर्माता पर निर्भरता कम: इसके जरिए मूल उपकरण निर्माता (OEM) के मालिकाना सोर्स कोड तक पहुंच की जरूरत नहीं रहती, जिससे विदेशी निर्भरता घटती है।      रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: यह कदम भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने और स्वदेशी तकनीक के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।  तकरीबन सवा तीन लाख करोड़ रुपये की राफेल डील के तहत भारत इंटरफेस कंट्रोल डॉक्‍यूमेंट यानी ICD का एक्‍सेस चाहता है, ताकि वेपन सिस्‍टम को फाइटर जेट में इंटीग्रेट करने में द‍िक्‍कतों का सामना न करना पड़े।  डिजिटल संप्रभुता रक्षा मंत्रालय ICD को डिजिटल संप्रभुता का एक महत्वपूर्ण साधन मान रहा है. इसका उद्देश्य भारत को अपने लड़ाकू प्लेटफॉर्म्स के विकास और उन्नयन पर पूर्ण नियंत्रण देना है, ताकि देश विदेशी कंपनियों के तकनीकी इकोसिस्टम में बंधा न रहे. यह कदम आत्मनिर्भर भारत और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने की व्यापक रणनीति के अनुरूप है. हालांकि, फ्रांस के लिए यह मुद्दा संवेदनशील बना हुआ है. ICD तक पहुंच देने से बौद्धिक संपदा अधिकारों और सिस्टम आर्किटेक्चर पर नियंत्रण से जुड़े सवाल उठ सकते हैं. ऐसे में सीमित या शर्तों के साथ पहुंच देने का विकल्प भी बातचीत में सामने आ सकता है, लेकिन यह भी विवाद का कारण बन सकता है. MRFA डील अब केवल रक्षा खरीद नहीं, … Read more

भारत ने खोजा एनर्जी का ‘ब्रह्मास्‍त्र’, अब LPG और तेल के संकट का होगा अंत, हर घर का चूल्‍हा जलता रहेगा

मुंबई  ईरान जंग की शुरुआत के साथ ही पूरी दुनिया नई समस्‍या से रूबरू होने लगी. ईरान ने एनर्जी कॉरिडोर होर्मुज स्‍ट्रेट को बार्गेनिंग चिप की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. इससे यूरोप से लेकर एशिया तक में एनर्जी क्राइसिस का दौर शुरू हो गया. प्रभावित देशों को अपने ऊर्जा स्रोतों के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया. भारत भी पश्चिम एशिया संकट से अछूता नहीं है. ऐसे में देश में किसी तरह का ऊर्जा संकट न आए, इसको लेकर कई तरह के कदम उठाए गए हैं. पूर्व में लिए गए फैसलों का असर अब दिखने लगा है. सौर ऊर्जा के बाद अब भारत ने पवन ऊर्जा यानी विंड एनर्जी के क्षेत्र में नया इतिहास रचा है. अक्षय ऊर्जा से जुड़ी परियोजनाओं पर यदि इसी तरह गंभीरता से काम किया जाता रहा तो LPG और तेल के बिना भी भारत विकास की पटरी पर सरपट भागता रहेगा।  ईरान जंग के चलते दुनियाभर में एनर्जी क्राइसिस गहरा गई है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. खाड़ी देश से आने वाले तेल और गैस पर निर्भरता को कम करने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं. भारत भी इसमें पीछे नहीं है. भारत पिछले कुछ सालों में रिन्‍यूवेबल यानी अक्षय ऊर्जा पर मिशन मोड में काम रहा है. उसका परिणाम सामने आने लगा है. पिछले दिनों सौर ऊर्जा के जरिये रिकॉर्ड एनर्जी प्रोडक्‍शन किया गया था. भारत ने सोलर एनर्जी के जरिये 45 गीगावाट बिजली पैदा किया था. अब भारत ने पवन ऊर्जा के सेक्‍टर में जबरदस्‍त सफलता हासिल की है. यह उपलब्‍ध‍ि ऐसे समय में सामने आई है, जब दुनिया के तमाम देश ईरान युद्ध और होर्मुज सट्रेट संकट से दो-चार हो रही है. तेल और गैस की सप्‍लाई बुरी तरह से प्रभावित हुई है. ऐसे में भारत की यह उपलब्धि दिल को सुकून देने वाला है।  भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए वर्ष 2025-26 के दौरान पवन ऊर्जा क्षमता में 6.1 गीगावाट (GW) की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की है. केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह अब तक की सबसे बड़ी सालाना बढ़ोतरी है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा और ग्रीन एनर्जी फ्यूचर की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. विंड इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (WIPPA) के स्थापना दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रह्लाद जोशी ने बताया कि भारत इस समय वैश्विक स्तर पर पवन ऊर्जा क्षमता के मामले में चौथे स्थान पर है. देश में वर्तमान में 56.1 गीगावाट से अधिक स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता है, जबकि करीब 28 गीगावाट की परियोजनाएं विभिन्न चरणों में कार्यान्वयन के अधीन हैं।  केंद्रीय मंत्री ने इस क्षेत्र में मौजूद अपार संभावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि 150 मीटर हब ऊंचाई पर भारत की पवन ऊर्जा क्षमता लगभग 1,164 गीगावाट आंकी गई है, जो देश को ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. उन्होंने विश्वास जताया कि मौजूदा प्रयासों की गति बरकरार रही तो भारत 2030 तक 100 गीगावाट और 2036 तक 156 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता हासिल कर सकता है. यह लक्ष्य वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने में भी अहम योगदान देगा।  पवन ऊर्जा भारत के एनर्जी सिस्‍टम को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. प्रह्लाद जोशी ने कहा कि पवन ऊर्जा का उत्पादन मुख्य रूप से शाम और रात के समय अधिक होता है, जो बिजली की अधिक मांग वाले समय के साथ मेल खाता है. आंकड़ों के अनुसार, लगभग 45 प्रतिशत पवन ऊर्जा उत्पादन पीक डिमांड के समय होता है, जिससे यह सौर ऊर्जा का एक मजबूत पूरक बन जाती है. नीतिगत सुधारों का उल्लेख करते हुए मंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने नवीकरणीय खरीद दायित्व (Renewable Purchase Obligations) के तहत पवन ऊर्जा के लिए एक विशेष घटक जोड़ा है, जिससे इस क्षेत्र में निरंतर मांग सुनिश्चित हो सके. इसके अलावा लेट पेमेंट सरचार्ज नियमों का सख्ती से पालन, पारदर्शी बोली प्रक्रिया और अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्युफैक्चरर्स (ALMM) जैसी व्यवस्थाओं ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है और घरेलू निर्माण को बढ़ावा दिया है।  भारत ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में मजबूत घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित किया है. देश की सालाना उत्‍पादन क्षमता 24 गीगावाट से अधिक है, जबकि स्वदेशीकरण का स्तर 70 से 80 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. ब्लेड, टावर, गियरबॉक्स और अन्य महत्वपूर्ण उपकरणों के निर्माण में भारत ने मजबूत सप्‍लाई चेन तैयार की है, जो इसे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाती है।  उद्योग से जुड़ी चुनौतियों पर बात करते हुए प्रह्लाद जोशी ने कहा कि सरकार अतिरिक्त पवन ऊर्जा टेंडर जारी करने पर विचार कर रही है. साथ ही हाइब्रिड और राउंड-द-क्लॉक (RTC) परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे ग्रिड की दक्षता और विश्वसनीयता में सुधार होगा. डिविएशन सेटलमेंट मैकेनिज्म (DSM) जुर्माने, पावर कर्टेलमेंट और ट्रांसमिशन में देरी जैसे मुद्दों पर भी सरकार गंभीरता से काम कर रही है और इनके व्यावहारिक समाधान तलाशे जा रहे हैं।  हाल ही में शुरू किए गए 500 मेगावाट के ‘कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस’ (CfD) मॉडल पायलट को बाजार में स्थिरता और राजस्व सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया गया. जोशी ने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के पास पवन ऊर्जा क्षेत्र में एक भरोसेमंद विनिर्माण और आपूर्ति साझेदार के रूप में उभरने का सुनहरा अवसर है, खासकर ऐसे समय में जब कई देश अपनी सप्लाई चेन में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं।  अंत में प्रह्लाद जोशी ने जोर दिया कि आने वाले दशक में 156 गीगावाट के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करना पूरी तरह संभव है, बशर्ते स्पष्ट नीतिगत दिशा, मजबूत संस्थागत सहयोग और उद्योग की सक्रिय भागीदारी बनी रहे. उन्होंने पवन, सौर और ऊर्जा भंडारण को मिलाकर एकीकृत हाइब्रिड प्रणालियों पर अधिक ध्यान देने की अपील की, ताकि देश को एक विश्वसनीय, टिकाऊ और हरित ऊर्जा भविष्य की ओर अग्रसर किया जा सके। 

इस्लामाबाद 10 दिनों से लॉकडाउन में, पाकिस्तान की जनता बोली – आवाम को मिल रही बददुआ

इस्लामाबाद जंग अमेरिका-ईरान-इजराइल का है, पाकिस्तान ने रास्ता इधर का बंद कर दिया है. सारी आवाम बददुआ देती है, ये देखो न सब बंद पड़ा है, सारा आवाम बेरोजगार पड़ा है, महंगाई और गुरबत है, मुजाकरात (बातचीत) करें या न करें पाकिस्तान आवाम पे रहम करें।  इस्लामाबाद के फिदाउल्ला ईरान वार्ता की बात सुनकर ही भड़क उठते हैं, और पाकिस्तानी हुक्मरानों पर खरी-खोटी सुनाने में तनिक भी परहेज नहीं करते हैं. ईरान वार्ता की आस में पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पिछले 10 दिनों से लॉकडाउन की स्थिति में है. इस्लामाबाद में सड़के बंद हैं, बाजार ठप पड़े हैं, और चारों ओर सुरक्षा बलों का पहरा है. संभावित शांति वार्ता और हाई-प्रोफाइल दौरों की अटकलों के चलते शहर की सड़कों पर पाबंदियां लगा दी गई हैं।  महंगाई से जूझ रही पाकिस्तान की गरीब जनता का कामकाज इस सिक्योरिटी लॉकडाउन की वजह से ठप हो गया है. और कमाई का सारा रास्ता बंद हो गया है। इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान बातचीत की अनिश्चितता के बीच सुरक्षा कड़ी कर दी गई है. अमेरिका-ईरान तनाव के बीच पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद अघोषित लॉकडाउन है।  हालात से परेशान स्थानीय निवासी मोहम्मद साबिर ने कहा, "आवाम तो परेशान है न महंगाई की वजह से कभी बोल रहे हैं ट्रंप आ रहा है, इधर पाकिस्तान कभी बोल रहे हैं कि ईरानी सदर आ रहा है, भाई आए मुजाकरात करें खत्म करे, जब-जब वो नही आएंगे, पाकिस्तान की आवाम किधर जाए बेचारे, वो तो भूखे मरते रहेंगे, न कोई कारोबार है न कोई काम है, मुज़ाकरात करें मसले-मसाइल खत्म करें, अब यही सुन रहे हैं की अब आज आ रहे हैं, कल आ रहे हैं, ना कोई काम है, हम परेशान हैं।  पूरे इस्लामाबाद में लॉकडाउन लगा हुआ है. पाकिस्तानी राजधानी की सड़कें कई दिनों से खाली पड़ी हैं, दुकानें बंद हैं और पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी रोक दिया गया है. अधिकारियों और दफ़्तरों में काम करने वालों से घर से ही काम करने को कहा गया है, जबकि मज़दूरों के पास कोई काम नहीं बचा है. सड़कों पर सिर्फ़ सेना और पुलिस की वर्दी पहने लोग ही नज़र आ रहे हैं।  कई लोगों को ऐसा लग रहा है जैसे वे फिर से महामारी के दौर में लौट आए हों. लोगों के लिए ये बेहद सख़्त और अनिश्चित काल तक चलने वाली पाबंदियाँ अब परेशानी और आर्थिक तंगी का सबब बन गई हैं।  इस्लामाबाद और उसके पड़ोसी शहर रावलपिंडी में काम करने वाले कई मज़दूर, जो फ़्लैट का किराया देने में असमर्थ थे, उन्हें शनिवार को एक सरकारी आदेश के बाद बिना किसी सूचना के उनके हॉस्टल से निकाल दिया गया। इसके चलते हज़ारों लोगों को आनन-फ़ानन में रहने के लिए कोई दूसरी जगह ढूंढनी पड़ी।  लग रहा है पिंजरे में कैद हैं सुरक्षा के दृष्टिकोण इस्लामाबाद के कई इलाके खाली कर दिए गए हैं. इस्लामाबाद के एक सरकारी अस्पताल, पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में हेल्थ ऑफिसर अरीज अख्तर कहती हैं कि उन हजारों लोगों में से एक थीं जिन्हें उनके कमरों से बाहर निकाल दिया गया था. उन्होंने कहा, "शनिवार को बहुत अफरा-तफरी मची थी मैं खुशकिस्मत हूं कि मेरा गांव यहां से सिर्फ़ तीन घंटे की ड्राइव की दूरी पर है. लेकिन बहुत से लोग जो दूर के शहरों और प्रांतों से आए थे, उन्हें अपने सहकर्मियों, दोस्तों और रिश्तेदारों से मिन्नतें करनी पड़ीं कि जब तक अमेरिका-ईरान बातचीत पूरी नहीं हो जाती, तब तक वे उन्हें अपने यहां रहने दें।  द गार्जियन से बातचती में अख्तर ने बताया कि जैसे-जैसे बातचीत में देरी होती गई उनकी निराशा भी बढ़ती गई. पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद होने का मतलब है कि वह शहर वापस नहीं जा पा रही हैं. उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है जैसे हम किसी पिंजरे में रह रहे हों." "हम काम पर वापस नहीं जा सकते. मेरे जैसे बहुत से लोग फ्लैट का किराया नहीं दे सकते, इसीलिए हम हॉस्टल में रहते हैं।  वार्ता को लेकर अनिश्चितता इस्लामाबाद में वार्ता को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी है. राष्ट्रपति ट्रंप ने बुधवार को ही कहा है कि अगले 72 घंटे में वार्ता को लेकर अच्छी खबर आ सकती है. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का प्लान बदल गया और ईरान भी फैसला टाल रहा है. पाकिस्तानी सरकार ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, लेकिन इससे स्थानीय लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. अगर वार्ताएं आगे बढ़ती हैं या रद्द होती हैं तो स्थिति में बदलाव आ सकता है, लेकिन फिलहाल शहर में तनाव और परेशानी जारी है।   

‘हिन्दू तो हिन्दू है, किसी भी मंदिर में जा सकता है’; जस्टिस नागरत्ना का अहम बयान

तिरुवनंतपुरम केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ में आज (गुरुवार, 23 अप्रैल को) आठवें दिन भी सुनवाई जारी है। सुनवाई के दौरान आज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि, “एक हिंदू आखिरकार तो हिंदू ही है और वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।” दरअसल, मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली ये संविधान पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि क्या धार्मिक संप्रदाय अपने विशिष्ट रीति-रिवाजों के आधार पर दूसरों को मंदिर में प्रवेश से रोक सकते हैं। इस पीठ में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। संविधान पीठ न्यायिक समीक्षा के दायरे, अनुच्छेद 25 , 26 और अनुच्छेद 14 के बीच संतुलन ,'संवैधानिक नैतिकता' की भूमिका और धार्मिक मामलों में जनहित याचिकाओं की स्वीकार्यता से संबंधित प्रमुख सवालों की जांच कर रही है। हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हिंदू समाज को एकजुट होना चाहिए और मंदिरों को संप्रदाय की रेखाओं पर एकदूसरों को बाहर नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसा अलगाव अंततः संप्रदाय को ही कमजोर करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि दक्षिण भारत में भले ही पूजा के विभिन्न रूप (जैसे शैव या वैष्णव) प्रचलित हों और वे संरक्षित हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि एक हिंदू दूसरे संप्रदाय के मंदिर में नहीं जा सकता। एक हिंदू, आखिरकार हिंदू ही होता है जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा, “कोई भी हिंदू किसी भी मंदिर में जा सकता है। एक तरीका है 'संप्रदाय'… मंदिर शैव, वैष्णव या श्री वैष्णव पूजा पद्धति का पालन करता है। कम से कम दक्षिण भारत में तो ऐसा ही होता है। ये ही वहाँ की प्रचलित प्रथाएँ हैं। इसलिए, इसे एक 'संप्रदाय' कहा जाता है। अब, अगर पूजा की पद्धति शैव प्रकार की है, तो वैष्णव संप्रदाय के लोग यह नहीं कह सकते कि इसे वैष्णव पद्धति के अनुसार ही होना चाहिए; क्योंकि उन दोनों पूजा पद्धतियों में अंतर होता है… इसलिए, पूजा के उस विशिष्ट स्वरूप को संरक्षण प्राप्त है। इसका किसी 'संगठन' के होने या न होने से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसा होना जरूरी नहीं है। एक हिंदू, आखिरकार हिंदू ही होता है। वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।” 'व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी' और व्यक्तिगत विचार सुनवाई के दौरान एक रोचक मोड़ तब आया जब वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सावधानी बरतने की सलाह देते हुए कहा कि ज्ञान और ज्ञान के स्रोतों का स्वागत है, लेकिन "व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी" से नहीं। मुख्य न्यायाधीश ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि अदालत सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों का सम्मान करती है, लेकिन "व्यक्तिगत राय केवल व्यक्तिगत राय होती है।" सामाजिक सुधार में राज्य की भूमिका न्यायालय ने सामाजिक सुधारों के संदर्भ में राज्य की शक्ति पर भी चर्चा की। पीठ ने टिप्पणी की कि राज्य कोई अजनबी या विदेशी संस्था नहीं है, बल्कि वह लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। अगर जनता किसी सामाजिक बुराई को सुधारना चाहती है, तो राज्य के पास उस शक्ति का प्रयोग करने का अधिकार है। जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत सामाजिक सुधार के लिए बनाया गया कानून धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों पर प्रभावी हो सकता है। संविधान पीठ के सामने प्रमुख कानूनी प्रश्न क्या हैं? इस नौ सदस्यीय संविधान पीठ के सामने सात मुख्य प्रश्न हैं, जिनमें शामिल हैं: -संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा क्या है? -अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदायों के अधिकार) के बीच क्या संबंध है? -क्या 'नैतिकता' शब्द में 'संवैधानिक नैतिकता' भी शामिल है? -क्या कोई व्यक्ति जो उस संप्रदाय का हिस्सा नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उसकी प्रथाओं को चुनौती दे सकता है? -संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत किसी धार्मिक प्रथा की न्यायिक समीक्षा का दायरा और विस्तार क्या है? -संविधान के अनुच्छेद 25 (2) (b) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति "हिंदुओं के वर्ग" का क्या अर्थ है? दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं कर सकते वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णन वेणुगोपाल ने इस मामले के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस फैसले का असर देश के लगभग 1.5 अरब लोगों पर पड़ेगा और दुनिया भर के संवैधानिक विद्वान इसकी समीक्षा करेंगे। उन्होंने धर्म के मामलों में राज्य के बढ़ते हस्तक्षेप पर भी चिंता व्यक्त की। फिलहाल सुनवाई जारी है और इसका परिणाम भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन को नई दिशा देगा। बुधवार को शीर्ष अदालत ने कहा था कि धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं से उत्पन्न होने वाले मुद्दों पर निर्णय देते समय सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता है लेकिन न्यायालय ने यह संकेत भी दिया कि वह ऐसी प्रथाओं से संबंधित जनहित याचिकाओं के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं कर सकता।

FASTag फ्रॉड में सावधानी बरतें, NHAI की चेतावनी: छोटी गलती भी पड़ सकती है महंगी

नई दिल्ली FASTag ऐनुअल पास को लेकर बड़ा फ्रॉड हो रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए नैशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने पब्लिक एडवाइजरी जारी की है। फास्टैग ऐनुअल पास से जुड़ा यह स्कैम फर्जी वेबसाइट्स के जरिए किया जा रहा है। इसमें जालसाज यूजर्स को ऑफिशियल प्लेटफार्म्स जैसे दिखने वाले फर्जी पोर्टल्स पर पेमेंट करने के लिए कहते हैं। चिंता की बात यह है कि ये फर्जी वेबसाइट्स पेड एडवर्टाइजमेंट और सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन की ट्रिक्स से गूगल जैसे सर्च इंजन के रिजल्ट्स में टॉप पर आती हैं। अथॉरिटी ने यूजर्स से फाइनेंशियल लॉस से बचने के लिए FASTag से जुड़ी सर्विसेज के लिए केवल वेरिफाइड चैनल्स पर ही भरोसा करने की सलाह दी है। यूजर्स को नहीं मिलता कोई कन्फर्मेशन इन वेबसाइट्स पर पहुंचने पर यूजर्स से मोबाइल नंबर, वीइकल रेजिस्ट्रेशन इन्फर्मेशन और पेमेंट क्रीडेंशियल्स जैसी सेंसिटिव इन्फर्मेशन को एंटर करने के लिए कहा जाता है। हालांकि, इंटरफेस देखने में असली लगता है, लेकिन पेमेंट स्कैमर्स के अकाउंट में चला जाता है। कई मामलों में यूजर्स को या तो कोई कन्फर्मेशन नहीं मिलता या उन्हें नकली रसीद पकड़ा दी जाती हैं और उनके पास कोई वैलिड FASTag नहीं रह जाता। असली और नकली वेबसाइट्स को पहचान पाना मुश्किल इससे पहले यह चेतावनी गृह मंत्रालय के Indian Cyber Crime Coordination Centre ने जारी की थी। अधिकारियों ने बताया कि कैसे जालसाज नैशनल हाइवे यूजर्स को निशाना बनाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का तेजी से गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। सलाह में इस बात पर जोर दिया गया है कि ये स्कैम अधिक सोफिस्टिकेटेड होते जा रहे हैं, जिससे यूजर्स के लिए पहली नजर में असली और नकली वेबसाइट्स के बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो गया है। FASTag धोखाधड़ी से खुद के ऐसे रखें सेफ NHAI ने यूजर्स को ऐसी धोखाधड़ी से सेफ रहने के लिए कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखने की सलाह दी है, जिसमें सबसे पहला FASTag ऐनुअल पास सर्विस का यूज हमेशा Rajmargyatra ऐप जैसे ऑफिशियल सोर्स से करना है। इसके अलावा आप नीचे बताई गई बातों को भी ध्यान में रखें: – ऑनलाइन स्रच करते समय स्पॉन्सर्ड लिंक या अनजान एडवर्टाइजमेंट पर क्लिक करने से बचें। – कोई भी पर्सनल या पेमेंट डीटेल एंटर करने से पहले वेबसाइट URL की दोबारा जांच करें। – OTP, कार्ड डीटेल या लॉगिन क्रिडेंशियल जैसे सेंसिटिव इन्फर्मेशन कभी भी शेयर न करें। – अगर कोई वेबसाइट संदिग्ध लगे या गैर-जरूरी परमिशन मांगे, तो तुरंत उस वेबसाइट को बंद कर दें।

भारत करेगा ₹75,272 करोड़ की बड़ी डिफेंस डील, जर्मनी से आएगी दुनिया की सबसे साइलेंट सबमरीन टेक्नोलॉजी

नई दिल्ली/बर्लिन भारत और जर्मनी के बीच रक्षा क्षेत्र में एक बहुत बड़ी डील होने जा रही है. यह डील 8 अरब डॉलर (करीब 75,272 करोड़ रुपये) की है और अगले 90 दिनों के अंदर इस पर फाइनल मुहर लग सकती है. जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने बुधवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ बातचीत के बाद इसकी जानकारी दी है. इस प्रोजेक्ट के तहत भारत में छह एडवांस सबमरीन बनाई जाएंगी. भारत सरकार वर्तमान में इस एग्रीमेंट को अंतिम रूप देने के लिए जरूरी कदम उठा रही है. राजनाथ सिंह इस समय जर्मनी की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं।  भारत और जर्मनी की सबसे बड़ी डिफेंस डील क्या है? भारत और जर्मनी के बीच होने वाला यह समझौता डिफेंस सेक्टर में एक नया इतिहास रचने जा रहा है. 8 अरब डॉलर यानी करीब 75 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की यह डील सबमरीन के निर्माण से जुड़ी है. जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने कील शहर में राजनाथ सिंह से मुलाकात के बाद भरोसा जताया कि अगले तीन महीनों में इस पर हस्ताक्षर हो जाएंगे. यह पहली बार होगा जब जर्मनी अपनी सबमरीन प्रोडक्शन टेक्नोलॉजी किसी गैर-यूरोपीय देश को ट्रांसफर करेगा. इस डील के लिए जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच पहले ही चर्चा हो चुकी है।  भारतीय नौसेना की ताकत कैसे बढ़ेगी? इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत कुल छह सबमरीन का निर्माण भारत में ही किया जाएगा. इसके लिए जर्मनी की दिग्गज कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारत की सरकारी कंपनी मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड साथ मिलकर काम करेंगी. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने खुद कील में स्थित TKMS की शिपयार्ड फैसिलिटी का दौरा किया. वहां उन्होंने टाइप 212 क्लास की सबमरीन की वर्किंग और उसकी क्षमताओं का जायजा लिया. यह सबमरीन अपनी साइलेंट ऑपरेटिंग क्षमता और मारक क्षमता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है. इनके आने से भारतीय नौसेना की समुद्री ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।  डिफेंस रोडमैप से दोनों देशों को क्या मिलेगा? सिर्फ सबमरीन ही नहीं, बल्कि दोनों देशों ने डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन रोडमैप पर भी साइन किए हैं. इस रोडमैप का मुख्य उद्देश्य डिफेंस इक्विपमेंट का साथ मिलकर विकास और प्रोडक्शन करना है. भारत और जर्मनी अब हाई-टेक टेक्नोलॉजी पर मिलकर काम करेंगे. इसमें संयुक्त ट्रेनिंग और कैपेसिटी बिल्डिंग जैसे अहम हिस्से भी शामिल हैं. इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन की ट्रेनिंग के लिए भी एक समझौता हुआ है. राजनाथ सिंह ने बर्लिन में पिस्टोरियस के साथ क्षेत्रीय और ग्लोबल सुरक्षा चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा की है।  क्या यह डील चीन और पाकिस्तान के लिए चुनौती है? हिंद महासागर में बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए भारत के लिए अपनी अंडरवाटर ताकत बढ़ाना बहुत जरूरी है. वर्तमान में भारत की सबमरीन फ्लीट को अपडेट करने की जरूरत है. जर्मनी के साथ यह डील इसी कमी को पूरा करेगी. यह समझौता न केवल भारत की सुरक्षा को पुख्ता करेगा, बल्कि डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग में ‘मेक इन इंडिया’ को भी बढ़ावा देगा. दोनों देशों ने सैन्य संबंधों को अपनी रणनीतिक साझेदारी का मुख्य आधार बताया है. इससे भविष्य में भारत की निर्भरता अन्य देशों से कम होगी और अपनी टेक्नोलॉजी विकसित करने में मदद मिलेगी। 

अमेरिका का ईरानी टैंकर पर धावा, हिंद महासागर में 3 जहाजों की घेराबंदी के बाद तनाव बढ़ा

तेहरान  अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव अब समुद्र के बीच खुली ताकत की लड़ाई में बदलता जा रहा है. ईरान के जहाज चकमा देकर होर्मुज को पार कर रहे हैं. लेकिन अब ताजा घटनाक्रम में अमेरिकी सेना ने एशियाई समुद्री इलाकों में ईरान के कम से कम तीन तेल टैंकरों को रोक लिया है और उन्हें उनके रास्ते से हटा दिया है. रिपोर्ट के मुताबिक, ये जहाज भारत, मलेशिया और श्रीलंका के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में मौजूद थे. अमेरिकी सेना ने इन्हें इंटरसेप्ट कर उनकी दिशा बदल दी, जिससे साफ संकेत मिला कि अमेरिका अब ईरान के तेल व्यापार को पूरी तरह रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है।  इन टैंकरों में ‘डीप सी’, ‘सेविन’ और ‘डोरेना’ शामिल हैं. ‘डीप सी’ एक बड़ा सुपरटैंकर है, जो आंशिक रूप से कच्चे तेल से भरा हुआ था और आखिरी बार मलेशिया के तट के पास देखा गया था. वहीं ‘सेविन’ नाम का छोटा टैंकर अपनी क्षमता का करीब 65 प्रतिशत तेल लेकर चल रहा था  भारत के करीब ईरानी जहाज पर अमेरिका का एक्शन रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे अहम जहाज ‘डोरेना’ बताया जा रहा है, जो करीब 20 लाख बैरल कच्चे तेल से पूरी तरह भरा हुआ था. यह जहाज चार दिन पहले भारत के दक्षिणी तट के पास देखा गया था, जिसके बाद अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत ने उसे हिंद महासागर में एस्कॉर्ट करते हुए अपनी निगरानी में ले लिया. इसके अलावा ‘डेर्या’ नाम के एक और ईरानी टैंकर को भी रोके जाने की खबर है. यह जहाज भारत में अपना तेल उतार नहीं सका था, क्योंकि ईरानी तेल खरीदने की अमेरिकी छूट खत्म हो चुकी थी।  होर्मुज में अमेरिका ने बनाई दीवार! अमेरिका ने हाल के दिनों में ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी को और कड़ा कर दिया है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, अब तक 29 जहाजों को वापस लौटने या दिशा बदलने के लिए मजबूर किया जा चुका है. यह पूरी कार्रवाई ऐसे समय हो रही है जब होर्मुज जलडमरूमध्य पहले ही तनाव का केंद्र बना हुआ है. ईरान ने भारत आ रहे एक जहाज को कब्जे में ले लिया. वहीं ईरान के तेल टैंकर अमेरिका को चकमा देकर होर्मुज से निकल रहे हैं। 

हुमायूं कबीर पर हमला, सुवेंदु सरकार को दौड़ाकर पीटा, बंगाल में जगह-जगह हिंसा की वारदातें

 कोलकाता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया है. एक तरफ मतदाता भारी संख्या में पोलिंग बूथों पर पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य के विभिन्न हिस्सों से आगजनी, मारपीट और तोड़फोड़ के गंभीर मामले सामने आ रहे हैं। मुर्शिदाबाद, कूचबिहार, सिलिगुड़ी और मालदा में जमकर बवाल हो रहा है. मुर्शिदाबाद में उपद्रवियों ने हुमायूं कबीर की कार पर लाठी और ईंटों से हमला किया।  मुर्शिदाबाद के नौदा में उस समय हड़कंप मच गया जब AJUP प्रमुख और रेजीनगर से उम्मीदवार हुमायूं कबीर के काफिले पर उपद्रवियों ने ईंटों और लाठियों से हमला कर दिया. इस दौरान टीएमसी और एजेयूपी कार्यकर्ताओं के बीच खूनी झड़प हुई. कबीर की पुलिस अधिकारियों के साथ तीखी नोकझोंक भी हुई. उन्होंने इस हमले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।  कूचबिहार में केंद्रीय बलों का एक्शन कूचबिहार के तूफानगंज इलाके में मतदान के दौरान भारी भीड़ जमा हो गई, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई. स्थिति को नियंत्रण से बाहर होता देख वहां तैनात केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जवानों ने मोर्चा संभाला. सुरक्षा बलों ने लाठीचार्ज कर और भीड़ को खदेड़कर स्थिति को तितर-बितर किया. आरोप है कि कुछ असामाजिक तत्व मतदाताओं को डराने का प्रयास कर रहे थे, जिसके बाद जवानों को बल प्रयोग करना पड़ा।  मुर्शिदाबाद-कूचबिहार में बवाल दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज (Kumarganj) विधानसभा क्षेत्र से एक बेहद विचलित करने वाली घटना सामने आई है. यहाँ के भाजपा उम्मीदवार सुवेंदु सरकार पर कथित तौर पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के समर्थकों ने हमला कर दिया. बताया जा रहा है कि सुवेंदु सरकार को सूचना मिली थी कि एक विशेष बूथ पर 'बूथ जैमिंग' की जा रही है. जब वे अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे, तो उन पर लाठियों और घूंसों से हमला किया गया. सुवेंदु सरकार ने आरोप लगाया कि पुलिस की मौजूदगी में टीएमसी के गुंडों ने उन्हें पीटा।  मालदा में हंगामा मालदा के मोथाबाड़ी विधानसभा क्षेत्र में बालुआचारा हाई स्कूल स्थित मतदान केंद्र के बाहर EVM में खराबी आने के बाद स्थानीय लोगों का गुस्सा फूट पड़ा. चुनाव आयोग के अधिकारी के पहुंचने में देरी होने पर वोटर भड़क गए और उन्होंने अधिकारी को घेर लिया और बंधक सा बना लिया. कई मतदाता अफसर की बांह पकड़कर उन्हें खींचते हुए और उनके साथ हाथापाई करते हुए दिखाई दिए।  तृणमूल कैंप ऑफिस में तोड़फोड़ मालदा जिले के हरिश्चंद्रपुर विधानसभा क्षेत्र में उस वक्त अफरा-तफरी मच गई, जब तृणमूल कांग्रेस के ही दो गुट आपस में भिड़ गए. यह विवाद इतना बढ़ गया कि राज्य के निवर्तमान मंत्री ताज़मुल हुसैन के पैतृक गांव बांगरुआ (बूथ संख्या 200 और 201) में टीएमसी के एक चुनावी कैंप ऑफिस में जमकर तोड़फोड़ की गई।  हरिश्चंद्रपुर-I ब्लॉक पंचायत समिति में टीएमसी के नेता स्वपन अली ने सनसनीखेज आरोप लगाते हुए दावा किया है कि मंत्री ताजमुल हुसैन और उनके समर्थक खुलेआम कांग्रेस पार्टी के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं. स्वपन अली का आरोप है कि मंत्री के ही निर्देश पर उनके समर्थकों ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर टीएमसी के कैंप ऑफिस पर हमला किया, पार्टी के झंडे फाड़े और बैनरों को क्षतिग्रस्त कर दिया।  सिलीगुड़ी में भिड़े TMC और बीजेपी कार्यकर्ता भिड़े सिलीगुड़ी के जगदीश चंद्र विद्यापीठ स्थित बूथ संख्या 26/237 पर वोटिंग के बीच मतदान केंद्र के बाहर तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यकर्ताओं के बीच अचानक बहस शुरू हो गई. देखते ही देखते यह विवाद गरमा गया और दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की होने लगी।  घटना के वक्त इलाके से बीजेपी उम्मीदवार शंकर घोष भी मौके पर मौजूद थे. केंद्र पर तैनात केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जवानों ने तत्काल कार्रवाई करते हुए भीड़ को तितर-बितर किया और स्थिति को नियंत्रण में लिया. सुरक्षा बलों की मुस्तैदी की वजह से प्रिय घटना टल गई और मतदान की प्रक्रिया को फिर से सुचारू रूप से शुरू कराया जा सका।  '5 स्पेशल ट्रेनों से वोटर लाए गए' आसनसोल उत्तर सीट से टीएमसी प्रत्याशी मलय घटक ने दावा किया कि वोटिंग से एक दिन पहले रात में पांच विशेष ट्रेनें राज्य में पहुंची हैं, जिनमें से चार गुजरात और एक मध्य प्रदेश से आई हैं. बिहार से भी बसों के जरिए बाहरी लोगों को लाया गया है. उनकी टीम ने इन बसों और संदिग्ध गतिविधियों के फोटो और अन्य सबूत जुटाए हैं. मामले की शिकायत चुनाव आयुक्त से की गई है।  गाड़ी में EVM मिलने का दावा जामुड़िया विधानसभा क्षेत्र में ईवीएम को लेकर विवाद हो गया. श्रीपुर इलाके में एक सड़क किनारे ढाबे के पास खड़ी एक गाड़ी में ईवीएम मिलने का आरोप सामने आया है, जिससे चुनावी माहौल गरमा गया. स्थानीय लोगों और विपक्षी नेताओं का कहना था कि 'ऑन इलेक्शन ड्यूटी- जमुरिया AC 279' लिखी गाड़ी में कई रिजर्व EVM रखी हुई थीं, लेकिन मौके पर कोई सुरक्षा कर्मी नहीं था।