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सऊदी के बाद तुर्की का ‘इस्लामिक नाटो’ में शामिल होना, पाकिस्तान की अमेरिका-इजरायल को नींद उड़ाने की तैयारी

इस्लामाबाद  मिडिल ईस्ट और दक्षिण एशिया की सुरक्षा राजनीति में बड़ा बदलाव होता दिख रहा है. सऊदी अरब और परमाणु ताकत वाले एकमात्र मुस्लिम देश पाकिस्तान के बीच बने रक्षा गठबंधन में तुर्की शामिल होने की कोशिश कर रहा है. इस संभावित त्रिपक्षीय सैन्य समझौते को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलने वाला कदम माना जा रहा है. इजरायल को मिडिल ईस्ट में काउंटर करने के लिए यह जरूरी है. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक तुर्की की इस गठबंधन में एंट्री को लेकर बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और समझौता होने की पूरी संभावना है. यह रक्षा समझौता सितंबर 2024 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ था, जिसमें कहा गया था कि किसी एक देश पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा. यह प्रावधान नाटो के आर्टिकल-5 से मिलता-जुलता है, जिसमें तुर्की पहले से सदस्य है. क्यों अहम है यह गठबंधन?     विशेषज्ञों के मुताबिक अगर यह गठबंधन हुआ तो तीनों देश एक-दूसरे की ताकत बढ़ाएगे. ऐसा इसलिए क्योंकि तीनों देशों की ताकत एक-दूसरे को पूरक बनाती है.     सऊदी अरब के पास अपार आर्थिक संसाधन हैं.     पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार, बैलिस्टिक मिसाइलें और बड़ी सैन्य ताकत है.     तुर्की के पास युद्ध का अनुभव, मजबूत सेना और उन्नत रक्षा उद्योग है. तुर्की क्यों इस गठबंधन में होगा शामिल? द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक तुर्की स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहात अली ओजकान के अनुसार, अमेरिका की नीतियों में अनिश्चितता और डोनाल्ड ट्रंप की नाटो को लेकर प्रतिबद्धता पर सवालों के बीच देश वैकल्पिक सुरक्षा ढांचे तलाश रहे हैं. यह कदम तुर्की और सऊदी अरब के रिश्तों में आए बड़े बदलाव को भी दर्शाता है. लंबे समय तक सुन्नी दुनिया की अगुवाई को लेकर दोनों में टकराव रहा है. लेकिन अब दोनों देश रक्षा और आर्थिक सहयोग बढ़ा रहे हैं. हाल ही में तुर्की में दोनों देशों के बीच पहली बार नौसैनिक वार्ता भी हुई. वहीं दूसरी तरफ तुर्की और पाकिस्तान के बीच पहले से गहरे सैन्य संबंध हैं. तुर्की पाकिस्तान के लिए युद्धपोत बना रहा है, उसके F-16 लड़ाकू विमानों को अपग्रेड कर चुका है और ड्रोन तकनीक भी साझा कर रहा है. अब तुर्की चाहता है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान उसके स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोजेक्ट ‘कान’ में भी शामिल हों. क्या भारत के कारण पाकिस्तान ने की डील? यह बातचीत ऐसे समय हो रही है जब पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के कई सैन्य ठिकानों को भारत ने जोरदार हमले से तबाह किया था. वहीं पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते भी बेहद तनावपूर्ण हैं. तुर्की और कतर ने दोनों के बीच मध्यस्थता की कोशिश की थी, लेकिन बातचीत बेनतीजा रही. तुर्की अब बातचीत कराने से पीछे हट गया है. अगर तुर्की इस रक्षा गठबंधन में औपचारिक रूप से शामिल होता है, तो यह सिर्फ मिडिल ईस्ट ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया और अफ्रीका में भी भू-राजनीतिक समीकरणों को नया आकार दे सकता है.

भारत में अफगानिस्तान का पहला राजनयिक – नूर अहमद नूर कौन हैं और यह कदम क्यों है अहम?

नई दिल्ली अफगानिस्तान ने नूर अहमद को अपने भारत स्थित दूतावास में राजनयिक नियुक्त किया है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत में किसी अफगान राजनयिक की यह पहली नियुक्ति है। नूर अहमद इससे पहले अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय में पहले राजनीतिक निदेशक के रूप में काम कर चुके हैं। अब वह अपनी नई जिम्मेदारी के लिए भारत पहुंच चुके हैं। नूर अहमद नूर की नियुक्ति भारत-अफगानिस्तान के बीच कूटनीति के नए दौर की शुरुआत का संकेत देती है। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब भारत और अफगानिस्तान के बीच संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश हो रही है। 20 दिसंबर को, अफगानिस्तान के सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री, मौलवी नूर जलाल जलाली ने कहा कि भारत अफगानिस्तान की दवा संबंधी जरूरतों के लिए प्रमुख वैकल्पिक साझेदार के रूप में उभर रहा है। बता दें कि पाकिस्तान के साथ अफगानिस्तान के संबंध काफी ज्यादा खराब हैं। जलाली ने कहा कि हमारा भारत के साथ मजबूत संबंध है, और हम सहयोग और साझेदारी का एक नया अध्याय खोलने के लिए यहां हैं। जब पाकिस्तान की बात आती है, तो संबंध बिगड़े हुए हैं। जलाली की यह टिप्पणियां उनके भारत दौरे के दौरान आईं। वह नई दिल्ली में आयोजित दूसरे विश्व स्वास्थ्य संगठन पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक शिखर सम्मेलन के लिए आए थे। इस दौरे के दौरान, भारत ने अफगानिस्तान के लिए लगातार मानवीय सहायता जारी रखने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इसमें दवाओं और स्वास्थ्य सहायता की लंबी अवधि की आपूर्ति को द्विपक्षीय संवाद का एक प्रमुख स्तंभ बताया गया। अक्तूबर 2025 में, अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खां मुतक्की ने तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद पहली बार भारत का दौरा किया। तब मुतक्की ने कहा कि यात्रा अब तक बहुत अच्छी रही है। न केवल दारुल उलूम के लोग, बल्कि इलाके के सभी लोग यहां आए हैं। मैं उनके द्वारा मुझे दिए गए गर्मजोशी भरे स्वागत के लिए आभारी हूं। इससे पहले नवंबर 2024 में अफगानिस्तान के वाणिज्य और उद्योग मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अजीजी ने घोषणा की थी कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से चली आ रही वीजा समस्याओं का समाधान कर लिया गया है। इससे अफगान नागरिक अब चिकित्सा उपचार और व्यापारिक उद्देश्यों के लिए भारतीय वीजा प्राप्त कर सकते हैं।

V2V टेक्नोलॉजी से सड़क पर आपस में बात करेंगी गाड़ियां, सरकार का हादसों को रोकने का प्लान

नई दिल्ली कल्पना कीजिए कि आप घने कोहरे में गाड़ी चला रहे हैं, सामने कुछ दिख नहीं रहा है, लेकिन आपकी कार आपको पहले ही बता दे कि आगे खड़ी गाड़ी कितनी दूर है. या पीछे से तेज रफ्तार वाहन आ रहा है और सिस्टम आपको अलर्ट कर दे. सरकार अब इसी तरह की एक ख़ास तकनीकी को वाहनों में देने की योजना पर काम कर रही है. भारत सरकार 2026 के अंत तक देश में व्हीकल-टू-व्हीकल यानी V2V कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी लागू करने की तैयारी में है. इसका सीधा मकसद है सड़कों पर हादसों की संख्या को कम करना और यात्रियों की जान बचाना है. क्या है V2V कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी V2V टेक्नोलॉजी के तहत गाड़ियां आपस में सीधे बातचीत करेंगी. इसके लिए किसी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट की जरूरत नहीं होगी. जब दो वाहन एक-दूसरे के ज्यादा करीब आएंगे तो सिस्टम तुरंत सिग्नल भेजेगा और ड्राइवर को अलर्ट कर देगा. इससे किसी भी संभावित टक्कर की आशंका काफी हद तक कम हो जाएगी और आप सेफ ड्राइविंग का आनंद ले सकेंगे. यह तकनीक खास तौर पर उन हादसों को रोकने में मदद करेगी, जो सड़कों पर खड़ी गाड़ियों और पीछे से तेज रफ्तार में आने वाले वाहनों के बीच होते हैं. सर्दियों में घने कोहरे के कारण होने वाले बड़े हादसों और कई गाड़ियों की टक्कर को भी यह सिस्टम रोक सकता है. जब विजिबिलिटी लगभग जीरो हो जाती है, तब यह टेक्नोलॉजी ड्राइवर के लिए तीसरी आंख का काम करेगी. नितिन गडकरी ने क्या कहा केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राज्य परिवहन मंत्रियों के साथ हुई सालाना बैठक के बाद इस योजना की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि बैठक में इस टेक्नोलॉजी पर विस्तार से चर्चा हुई है और इसे जल्द लागू किया जाएगा. उनके मुताबिक यह सिस्टम खास तौर पर पार्क की गई गाड़ियों और कोहरे में होने वाले हादसों को रोकने में बेहद कारगर साबित होगा. सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के सचिव वी उमाशंकर ने इसे रोड सेफ्टी की दिशा में बड़ा कदम बताया. उन्होंने कहा कि दुनिया के बहुत कम देशों में इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. भारत में इसे लागू करना एक बड़ी उपलब्धि होगी. इस पूरे प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 5000 करोड़ रुपये बताई जा रही है. कैसी होगी यह टेक्नोलॉजी यह सिस्टम एक खास डिवाइस के जरिए काम करेगा, जो सिम कार्ड जैसी होगी और गाड़ी में लगाई जाएगी. यह डिवाइस आसपास मौजूद अन्य वाहनों से सिग्नल लेकर जानकारी साझा करेगी. ताकि सड़क पर मौजूद सभी वाहनों में कम्युनिकेशन सिस्टम डेवलप हो सके. हालांकि इस सिस्टम के एक्टिव होने के बाद चालक को इससे मिलने वाले किसी भी तरह के अलर्ट पर तुरंत रिएक्ट करना जरूरी होगा. कैसे मददगार होगी यह तकनीक यह टेक्नोलॉजी सुरक्षित दूरी बनाए रखने में मदद करेगी. साथ ही सड़क किनारे खड़ी या रुकी हुई गाड़ियों के बारे में भी ड्राइवर को चेतावनी देगी. यह सिस्टम 360 डिग्री काम करेगा. यानी आगे, पीछे और दोनों तरफ से आने वाले वाहनों के सिग्नल ड्राइवर तक पहुंचेंगे. क्या देने होंगे पैसे इस परियोजना की कुल लागत लगभग 5000 करोड़ रुपये आंकी गई है. उपभोक्ताओं से भी इसके लिए शुल्क लिया जाएगा, लेकिन इसकी कीमत अभी तय नहीं की गई है. इसके बारे में अभी आधिकारिक तौर पर कोई घोषणा भी नहीं की गई है. कब से लागू होगी तकनीक परिवहन मंत्रालय 2026 के अंत तक इस टेक्नोलॉजी को नोटिफाई करने की तैयारी में है. इसके बाद इसे चरणबद्ध तरीके से इसे सभी वाहनों में लागू किया जाएगा. शुरुआत में यह सिस्टम सिर्फ नई गाड़ियों में लगाया जाएगा. V2V सिस्टम एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम यानी ADAS के साथ मिलकर काम करेगा. अभी कुछ महंगी एसयूवी में इस तरह की तकनीक मौजूद है, लेकिन वह सेंसर पर आधारित है. नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन गाड़ियों को भी नए सिस्टम के हिसाब से अपडेट किया जाएगा. सरकारी अधिकारियों का मानना है कि V2V टेक्नोलॉजी आने वाले समय में सड़क हादसों को कम करने और ट्रैफिक सेफ्टी को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाएगी. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो 2026 के बाद भारतीय सड़कों पर गाड़ियां सिर्फ चलेंगी नहीं, बल्कि एक-दूसरे से बात भी करेंगी.  

ISRO का PSLV रॉकेट: 63 में से 60 सफल मिशन, अब नई उड़ान की ओर बढ़ेगा

 नई दिल्ली PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का वर्कहॉर्स (मुख्य काम करने वाला रॉकेट) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह बहुत विश्वसनीय और बार-बार इस्तेमाल होने वाला रॉकेट है. यह 1993 से लगातार काम कर रहा है. विभिन्न प्रकार के सैटेलाइट्स (छोटे से बड़े, भारतीय और विदेशी) को सटीक ऑर्बिट में पहुंचाने में माहिर है. अगली लॉन्चिंग कौन सी और कब? अगली PSLV लॉन्च PSLV-C62 है, जो 12 जनवरी 2026 को सुबह 10:17 बजे IST श्रीहरिकोटा के फर्स्ट लॉन्च पैड से होगी. यह इसरो की 2026 की पहली ऑर्बिटल लॉन्च होगी. मुख्य पेलोड EOS-N1 (Anvesha) नामक हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (DRDO द्वारा विकसित) है. साथ में 18 अन्य को-पैसेंजर सैटेलाइट्स (भारतीय और अंतरराष्ट्रीय) जाएंगे. यह PSLV की 64वीं उड़ान होगी. यह लॉन्च PSLV-C61 की 2025 वाली असफलता के बाद वापसी का प्रतीक है. विश्वसनीयताः 94% से ज्यादा सफलता दर (कई दशकों में सिर्फ 2-3 असफलताएं). लचीलापनः अलग-अलग वेरिएंट (XL, QL, DL, CA) से 100 ग्राम से 1700 किग्रा तक पेलोड ले जा सकता है. मल्टी-सैटेलाइट लॉन्चः एक ही उड़ान में 100+ सैटेलाइट्स लॉन्च कर चुका है (2017 में 104 सैटेलाइट्स का विश्व रिकॉर्ड). महत्वपूर्ण मिशनः चंद्रयान-1, मंगलयान (Mangalyaan), आदित्य-L1, Astrosat जैसे बड़े मिशन इसी ने किए. यह ISRO की कॉमर्शियल लॉन्च सर्विस (NSIL के जरिए) का सबसे बड़ा आधार है, जिससे विदेशी सैटेलाइट्स लॉन्च करके भारत को कमाई और विश्वसनीयता मिलती है. PSLV की लॉन्चिंग कब शुरू हुई? PSLV की पहली लॉन्च 20 सितंबर 1993 को हुई थी (PSLV-D1). यह विकास चरण था. असफल रहा था. पहली सफल लॉन्च 15 अक्टूबर 1994 में हुई. अब तक कितनी सफल और असफल? जनवरी 2026 तक PSLV की कुल उड़ानें 63 (PSLV-C61 तक) हो चुकी हैं.       सफलः  60 (लगभग 95% सफलता दर).     असफलः 3 (पूर्ण या आंशिक). असफलताओं के कारण     1993 (PSLV-D1) — पहली विकास उड़ान, सॉफ्टवेयर और इंजन कंट्रोल में समस्या से रॉकेट नियंत्रण खो बैठा.     2017 (PSLV-C39/IRNSS-1H) — हीट शील्ड (फेयरिंग) अलग नहीं हुआ, सैटेलाइट ऑर्बिट में नहीं पहुंचा.     2025 (PSLV-C61/EOS-09) — तीसरे स्टेज में चैंबर प्रेशर गिरने से थ्रस्ट कम हुआ, सैटेलाइट ऑर्बिट में नहीं पहुंचा. संभावित कारण: नोजल या सॉलिड मोटर में तकनीकी खराबी (पूर्ण रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई). PSLV का भविष्य क्या है? PSLV का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. यह अभी भी ISRO का सबसे भरोसेमंद रॉकेट है और आने वाले सालों में भी मुख्य रहेगा.       प्राइवेट सेक्टर का रोलः 2022 से PSLV का उत्पादन और ऑपरेशन प्राइवेट कंसोर्टियम (L&T, HAL आदि) को सौंपा जा रहा है. 2026 में पहली प्राइवेट PSLV लॉन्च संभावित है.     नई तकनीकः 3D प्रिंटेड पार्ट्स, बेहतर इंजन (जैसे PS4 में सुधार) से लागत कम और विश्वसनीयता बढ़ रही है.     भविष्य के मिशनः छोटे सैटेलाइट्स, कमर्शियल राइडशेयर, रिमोट सेंसिंग, नेविगेशन और अंतरिक्ष विज्ञान मिशन इसी पर निर्भर रहेंगे.     प्रतिस्पर्धाः SSLV और LVM3 जैसे नए रॉकेट्स आएंगे, लेकिन PSLV की सटीकता और कम लागत के कारण यह वर्कहॉर्स बना रहेगा. PSLV ने भारत को अंतरिक्ष में विश्वसनीयता दी है. आने वाले दशकों में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. PSLV-C62 की सफलता इसकी मजबूती को फिर साबित करेगी. 

इंडियन नेवी ने हल्दिया में शुरू किया अपना नया बेस, बांग्लादेश-चीन पर रहेगी निगाह

 हल्दिया भारतीय नौसेना पश्चिम बंगाल के हल्दिया में एक नया नौसैनिक बेस स्थापित करने का काम शुरू कर रही है. यह बेस उत्तरी बंगाल की खाड़ी (Northern Bay of Bengal) में भारत की समुद्री मौजूदगी को काफी मजबूत करेगा. खासकर चीन की नौसेना की बढ़ती गतिविधियों, बांग्लादेश से समुद्री घुसपैठ और पाकिस्तान के साथ बदलते क्षेत्रीय हालात के बीच यह कदम बहुत महत्वपूर्ण है. आइए जानते हैं यह बेस क्यों बन रहा है, इसमें क्या होगा, कौन से जहाज तैनात होंगे और इसका रणनीतिक महत्व क्या है. हल्दिया बेस का प्लान क्या है? स्थान और प्रकार: हल्दिया, कोलकाता से करीब 100 किमी दूर हुगली नदी पर स्थित है, जहां से बंगाल की खाड़ी में सीधा पहुंच है. यह बेस अभी तक नामित नहीं हुआ है. इसे नौसैनिक डिटैचमेंट (नौसैनिक चौकी) कहा जा रहा है. आकार: यह बड़ा कमांड नहीं होगा, बल्कि छोटा बेस होगा. इसमें करीब 100 अधिकारी और नाविक तैनात रहेंगे. निर्माण: मौजूदा हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स (1970 से चल रहा) का इस्तेमाल किया जाएगा. शुरुआत में एक विशेष जेट्टी (जहाज बांधने की जगह) और शोर सपोर्ट सुविधाएं बनाई जाएंगी. इससे बेस जल्दी तैयार हो जाएगा, ज्यादा नई इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं पड़ेगी. लाभ: हुगली नदी से कोलकाता तक लंबा सफर बच जाएगा. बेस बंगाल की खाड़ी में तेजी से पहुंच सकेगा. कौन से जहाज तैनात होंगे? बेस मुख्य रूप से छोटे और तेज जहाजों के लिए होगा…  फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स (FICs): ये छोटे, तेज (45 नॉट्स तक स्पीड) जहाज हैं, जो मशीन गन से लैस हैं. ये 100 टन के करीब होते हैं और 10-12 लोग चला सकते हैं. न्यू वॉटर जेट फास्ट अटैक क्राफ्ट्स (NWJFACs): ये 300 टन के जहाज हैं, जो 40-45 नॉट्स की स्पीड से चलते हैं. CRN-91 गन से लैस होंगे और नागास्त्र जैसे लूटरिंग मुनिशन (ड्रोन जैसी स्मार्ट मिसाइलें) से भी तैनात हो सकते हैं. ये निगरानी, हमला और सटीक स्ट्राइक के लिए हैं. खरीद: 2024 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने 120 FICs और 31 NWJFACs की खरीद को मंजूरी दी थी. ये जहाज तटीय सुरक्षा, घुसपैठ रोकने, बंदरगाह सुरक्षा और स्पेशल ऑपरेशंस के लिए हैं. क्यों बन रहा है यह बेस? मुख्य कारण भारतीय नौसेना ने पूर्वी तट पर पहले से ही विशाखापत्तनम (ईस्टर्न नेवल कमांड) और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में बड़े बेस हैं. लेकिन उत्तरी बंगाल की खाड़ी में मजबूत मौजूदगी की जरूरत इसलिए है… चीन की बढ़ती गतिविधियां: पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) हिंद महासागर में ज्यादा सक्रिय हो रही है. बंगाल की खाड़ी में चीनी जहाजों की निगरानी जरूरी है. बांग्लादेश से समुद्री घुसपैठ: भारत-बांग्लादेश सीमा पर पानी के रास्ते से अवैध घुसपैठ बढ़ रही है. उथले पानी और घने समुद्री यातायात में तेज जहाज बहुत उपयोगी हैं. पाकिस्तान-बांग्लादेश रिश्ते: हाल के समय में दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध मजबूत हो रहे हैं. चीन बांग्लादेश को सबमरीन और बेस दे रहा है. यह बेस भारत के पूर्वी इलाके की सुरक्षा के लिए जरूरी है. समुद्री मार्गों की सुरक्षा: हल्दिया से मलक्का स्ट्रेट तक निगरानी आसान होगी, जो वैश्विक व्यापार का महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है. रणनीतिक महत्व     यह बेस भारत को बंगाल की खाड़ी में तेज प्रतिक्रिया (क्विक रिस्पॉन्स) देने की क्षमता देगा.     घुसपैठ, तस्करी, समुद्री डकैती और आपदा राहत में मदद मिलेगी.     क्षेत्र में भारत की प्रमुख सुरक्षा प्रदाता भूमिका मजबूत होगी.     पुरानी जमीन पहले से आवंटित थी, जो अब उपलब्ध हो गई है. इससे काम तेजी से शुरू हो सकेगा. हल्दिया बेस भारतीय नौसेना की पूर्वी तट पर विस्तार की योजना का हिस्सा है. छोटे लेकिन तेज जहाजों से यह बेस घुसपैठ रोकने, निगरानी बढ़ाने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान से जुड़े चुनौतियों के बीच यह कदम भारत की समुद्री सुरक्षा को नई ताकत देगा. 

सुधांशु त्रिवेदी का खुलासा, जवाहरलाल नेहरू ने सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण पर दिखाया था असहमति

नई दिल्ली   भाजपा के राज्यसभा सांसद और प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और सोमनाथ मंदिर को लेकर एक सोशल मीडिया पोस्ट किया है, जिसके बाद से सियासत गर्मा गई है। सुधांशु त्रिवेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर सिलसिलेवार पोस्ट कर आरोप लगाया कि आजाद भारत में सोमनाथ मंदिर के प्रति सबसे अधिक नकारात्मक रवैया खुद पंडित नेहरू का था। उन्होंने कहा कि जहां इतिहास में सोमनाथ को विदेशी आक्रमणकारियों ने लूटा, वहीं स्वतंत्र भारत में नेहरू ने इसके पुनर्निर्माण और प्रतीकात्मक महत्व को कमजोर करने की कोशिश की। अपने पहले पोस्ट में सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया कि पंडित नेहरू ने 21 अप्रैल 1951 को पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने सोमनाथ मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक कथाओं को “पूरी तरह झूठा” बताया। त्रिवेदी के अनुसार, नेहरू ने इस पत्र में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से इनकार करते हुए पाकिस्तान को आश्वस्त करने की कोशिश की और भारत की सभ्यतागत स्मृतियों के बचाव के बजाय “बाहरी तुष्टीकरण” को प्राथमिकता दी। दूसरे पोस्ट में भाजपा सांसद ने कहा कि पंडित नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने कैबिनेट मंत्रियों के साथ-साथ तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भी पत्र लिखकर न सिर्फ पुनर्निर्माण पर सवाल उठाए, बल्कि उद्घाटन समारोह में शामिल न होने की सलाह दी। त्रिवेदी के मुताबिक, नेहरू ने सभी मुख्यमंत्रियों को भी पत्र लिखकर कहा था कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण से विदेशों में भारत की छवि खराब हो रही है। साथ ही उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्री को प्राण-प्रतिष्ठा समारोह की मीडिया कवरेज कम करने का निर्देश दिया था। तीसरे पोस्ट में सुधांशु त्रिवेदी ने दावा किया कि नेहरू ने भारतीय दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी तरह की सहायता देने से मना कर दिया था, यहां तक कि पवित्र नदियों से जल मंगाने की मांग भी ठुकरा दी गई। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने राष्ट्रपति के सोमनाथ दौरे के “प्रभाव को कम करने” की कोशिश की और विदेश मंत्रालय के माध्यम से मंदिर से जुड़े प्रतीकात्मक आयोजनों को जानबूझकर सीमित किया। इन सोशल मीडिया पोस्ट के बाद राजनीतिक हलकों में एक बार फिर नेहरू की धर्मनिरपेक्षता, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और उस दौर की नीतियों को लेकर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

ईरानी महिलाओं का अनोखा प्रदर्शन: खामेनेई की फोटो जलाकर सिगरेट से लगाई आग

तेहरान  ईरान में हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शन के दौरान नया रूप देखने को मिला है, जहां महिलाएं सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की तस्वीरों को जलाकर उसकी आग से सिगरेट सुलगा रही हैं। यह ट्रेंड सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है, जो देश में जारी आर्थिक संकट, महंगाई, कमजोर मुद्रा और सरकारी दमन के खिलाफ जनता के गुस्से को दर्शाता है। दिसंबर 2025 के अंत से शुरू हुए ये प्रदर्शन अब खामेनेई के शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर उतरकर नारे लगाए, सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया और इंटरनेट-टेलीफोन ब्लैकआउट के बावजूद अपना विरोध जारी रखा। महिलाओं की ओर से सिगरेट जलाने वाला कदम प्रतीकात्मक है, क्योंकि ईरान में सुप्रीम लीडर की तस्वीर जलाना गंभीर अपराध माना जाता है। महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करना भी सामाजिक-धार्मिक नियमों के तहत प्रतिबंधित है। यह कदम 2022 में महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद शुरू हुए 'महिला, जीवन, आजादी' आंदोलन की निरंतरता भी दर्शाता है। तब महिलाओं ने हिजाब जलाकर और बाल काटकर विरोध जताया था, लेकिन अब यह और ज्यादा सत्ता को चुनौती दे रहा है। खामेनेई की तस्वीर पर सिगरेट जलाती महिलाएं  इंटरनेट पर वायरल वीडियो में कई महिलाओं को खामेनेई की तस्वीरों को जलाकर सिगरेट जलाते हुए देखा जा सकता है. इसे ईरान की राजनीतिक और धार्मिक सत्ता के लिए एक खुली चुनौती बताया जा रहा है. इंस्टाग्राम, X, टेलीग्राम और रेडिट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इसके वीडियो क्लिप और फोटो कई बार शेयर और रीपोस्ट किए जा रहे हैं. ईरान की ओर से असहमति पर कंट्रोल सख्त करने के बावजूद अधिकारियों के लिए इसे रोकना मुश्किल होता जा रहा है.  विरोध का प्रतीक  ईरानी कानून के तहत सुप्रीम लीडर की तस्वीर जलाना एक गंभीर अपराध है. इसके बावजूद महिलाएं जानबूझकर इसे सीगरेट के साथ जला रही हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि ईरान में महिलाओं के लिए सामाजिक नियम सख्त कर दिए गए हैं, जिसमें हिजाब का पालन और महिलाओं की व्यक्तिगत आजादी पर प्रतिबंध शामिल हैं. ऐसे में महिलाएं इस हरकत के जरिए ईरान में लागू इन नियमों को अस्वीकार कर रही हैं. यह विरोध का प्रतीक माना जा रहा है.  ईरान में बढ़ता विरोध  यह वायरल ट्रेंड ऐसे वक्त पर सामने आया है जब ईरान बढ़ते आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है. यहां की जनता करेंसी का तेजी से कमजोर होना और फूड प्रोडक्ट्स की महंगी कीमतों को लेकर गुस्से में है. इसके चलते देशभर के शहरों में तेजी से विरोध प्रदर्शन बढ़ गया है. प्रदर्शनकारियों ने सीनियर लीडर्स की तस्वीरें जलाने और सत्ताधारी दल से जुड़ी मूर्तियों को नुकसान पहुंचाना भी शुरु कर दिया है. बता दें कि तेहरान में विरोध का यह रूप साल 2022 में पुलिस हिरासत में महसा अमिनी की मौत के बाद हुए आंदोलन पर आधारित है. एक ओर जहां प्रशासन की ओर से सड़क प्रदर्शन को बलपूर्क दबा दिया गया है तो वहीं अब यह विरोध ऑनलाइन फैल गया है.    प्रदर्शनकारियों को विदेशी ताकतों का एजेंट बताया अयातुल्लाह अली खामेनेई ने प्रदर्शनकारियों को विदेशी ताकतों का एजेंट करार दिया है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों पर हिंसा के खिलाफ सख्त चेतावनी दी है। सुरक्षा बलों की गोलीबारी से अब तक सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों गिरफ्तारियां हुई हैं। ये प्रतीकात्मक कृत्य महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, हिजाब नियमों और पूरे धार्मिक शासन के खिलाफ खुली बगावत का प्रतीक बन गए हैं, जो सोशल मीडिया के जरिए वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। ईरान में यह नया विरोध रूप आर्थिक संकट और सामाजिक प्रतिबंधों के बीच जनता की बढ़ती बेचैनी को उजागर करता है। आर्थिक संकट के बीच भड़का जनाक्रोश बता दें कि ईरान इस वक्त गंभीर आर्थिक दबाव से गुजर रहा है। बढ़ती महंगाई, तेजी से कमजोर होती मुद्रा और खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों में भारी नाराजगी पैदा कर दी है। देश के कई शहरों में फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। नेताओं की तस्वीरें और मूर्तियां निशाने पर रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने सीनियर नेताओं की तस्वीरें जलाने और सरकार से जुड़ी मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं को भी अंजाम दिया है। यह साफ संकेत है कि जनता का गुस्सा अब सिर्फ नारों तक सीमित नहीं रह गया है। महसा अमिनी आंदोलन से जुड़ी विरोध की जड़ें यह विरोध ट्रेंड 2022 में पुलिस हिरासत में महसा अमिनी की मौत के बाद शुरू हुए आंदोलन से जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया ने विरोध को नया रूप दे दिया है। छोटे-छोटे वीडियो अब मिनटों में ग्लोबल लेवल पर पहुंच रहे हैं। सरकारी चेतावनियों के बावजूद जारी विरोध ईरानी अधिकारियों की चेतावनियों और कड़े नियंत्रण के बावजूद इन वीडियो का लगातार बढ़ता सर्कुलेशन दिखाता है कि यह ट्रेंड अब एक ग्लोबल डिजिटल आंदोलन बन चुका है। इसके चलते ईरानी महिलाओं का विरोध अंतरराष्ट्रीय मीडिया और वैश्विक मंचों पर लगातार चर्चा में बना हुआ है।

US कंपनियों की ट्रंप को चेतावनी, वेनेजुएला में निवेश पर सवाल, ‘कैसे निकालेगा तेल?’

वाशिंगटन  अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने कंपनियों के सामने वेनेजुएला के तेल उद्योग को पुनर्जीवित करने का प्रस्‍ताव रखा है, जिसे लेकर शुक्रवार को व्‍हाइट हाउस में एक मीटिंग हुई. इस बैठक के दौरान एक्सॉनमोबिल के सीईओ डैरेन वुड्स समेत कई कंपनियों ने यहां निवेश को लेकर समस्‍याओं के बारे में बताया. डैरेन वुड्स ने साफ तौर पर कहा कि वर्तमान में यह लैटिन अमेरिकी देश निवेश के लिहाज से लायक नहीं है.  एक्सॉनमोबिल के सीईओ ने कहा कि वेनेजुएला की अस्थिर कानूनी व्यवस्था, निवेश सुरक्षा की कमी और पुराने हाइड्रोकार्बन कानूनों के कारण पर्याप्त सुधारों के बिना अमेरिकी तेल कंपनियों के लिए यह क्षेत्र सही नहीं होगा. वुड्स ने कहा कि अगर आप वेनेजुएला में आज मौजूद व्यावसायिक संरचनाओं और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को देखें, तो वहां निवेश करना संभव नहीं है.  उन्‍होंने आगे कहा कि इन इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर और कानून व्‍यवस्‍था में महत्वपूर्ण बदलाव करने होंगे. निवेश के लिए स्‍थायी सुरक्षा उपाय और हाइड्रोजन कानूनों में बदलाव की आवश्‍यकता है. उन्होंने कहा कि एक्सॉनमोबिल ने पहली बार 1940 में वेनेजुएला में प्रवेश किया था और उसकी संपत्ति दो बार जब्त किया जा चुका है, जिस कारण कंपनी सोच समझकर कदम रखना चाहती है.   वेनेजुएला में बड़े बदलाव की जरूरत कंपनी के सीईओ ने कहा कि आप कल्पना कर सकते हैं कि तीसरी बार फिर से प्रवेश करने के लिए यहां पर कई तरह के बदलाव की आवश्‍यकता होगी. खासकर ऐतिहासिक स्‍वरूप और वर्तमान स्थिति को देखते हुए कई बदलाव जरूरी हैं. हालांकि इसके बाद भी वुड्स ने कहा कि उन्‍हें विश्‍वास है कि अमेरिका आवश्‍यक बदलाव लाने में मदद कर सकता है.   जांच के लिए जाएगी एक टीम  वुड्स ने कहा कि उन्‍हें उम्‍मीद है कि एक्‍सॉन जल्‍द ही वेनेजुएला में तेल अवसंरचना की स्थिति का आकलन करने के लिए एक तकनीकी टीम भेजेगी. डैरेन वुड्स ने कहा कि कंपनियों को किसी भी निवेश से पहले संभावित लाभ के बारे में जानकारी हासिल करनी होगी.  एक्सॉनमोबिल के सीईओ ने कहा कि आखिरी सवाल यह होगा कि वित्तीय नजरिए से सुरक्षा उपाय कितने टिकाऊ हैं? इसका लाभ कैसा दिखता है? वाणिज्यिक व्यवस्थाएं और कानूनी ढांचे क्या हैं? वेनेजुएला में निवेश पर निर्णय लेने से पहले इन सभी चीजों को व्यवस्थित करना होगा.  मधुमक्‍खी के छत्ते की तरह खड़ी हैं कंपनियां: ट्रंप  ट्रंप का दावा है कि तेल कंपनियों के अधिकारी इस अवसर का लाभ उठाने के लिए मधुमक्खी के छत्ते की तरह कतार में खड़े हैं. अगर आप अंदर तक नहीं जाना चाहते हैं तो बस मुझे बता दीजिए. बैठक के दौरान उन्‍होंने कंपनियों से कहा कि यहां पर 25 लोग अभी नहीं हैं, जो आपकी जगह लेने के लिए लाइन में खड़े हैं. उन्होंने उन रिपोर्टों को भी खारिज कर दिया जिनमें सुझाव दिया गया था कि प्रशासन एक जोखिम भरे निवेश का समर्थन करने के लिए वित्तीय गारंटी दे रहा है.    ट्रंप ने कहा कि मुझे उम्‍मीद है कि मुझे कोई बचाव पेश नहीं करना पड़ेगा. दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां यहां पर हैं और वे रिस्‍क को समझती हैं. बैठक के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वेनेजुएला में निवेश करने वाली कंपनियों को अमेरिकी सरकार द्वारा टैक्‍सपेयर्स के पैसे खर्च किए बिना या जमीन पर सेना तैनात किए बिना 'पूर्ण सुरक्षा' का आश्वासन दिया जाएगा. ट्रंप ने संकेत दिया कि वेनेजुएला अमेरिकी कंपनियों को सुरक्षा प्रदान करेगा और कंपनियां भी अपनी सुरक्षा व्यवस्था स्वयं करेंगी.

पुतिन की मिसाइल से यूक्रेन में हड़कंप, 4000 डिग्री सेल्सियस के हमले में 4 की मौत, 24 लोग घायल

कीव  रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने एक बार फिर विनाशकारी मोड़ ले लिया है। रूसी रक्षा मंत्रालय ने शुक्रवार को पुष्टि की है कि उसने अपनी सबसे आधुनिक और घातक 'ओरेश्निक' (Oreshnik) मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल (IRBM) से यूक्रेन पर हमला किया है। रूस का दावा है कि यह हमला दिसंबर में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के आवास पर हुए यूक्रेनी ड्रोन हमले का बदला है। इस ताजा मिसाइल हमले ने यूक्रेन के बुनियादी ढांचे और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के अनुसार, इस हमले में 4 नागरिकों की मौत हो गई और 24 से अधिक लोग घायल हुए हैं। हमले के कारण कई इलाकों में पानी और हीटिंग की सप्लाई ठप हो गई है। कितनी घातक है ओरेश्निक मिसाइल? ओरेश्निक कोई साधारण मिसाइल नहीं है, बल्कि यह पारंपरिक हथियारों के साथ भी परमाणु जैसी तबाही मचाने में सक्षम है। इसकी रेंज करीब 1,000 से 5,500 किलोमीटर के बीच है और यह महज 15 मिनट में अपने लक्ष्य को भेद सकती है। इतनी तेज स्पीड के कारण दुनिया का कोई भी वर्तमान एयर डिफेंस सिस्टम इसे रोक नहीं सकता। पुतिन के अनुसार, हमले के वक्त इसका तापमान 4,000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जो सूरज की सतह के करीब है। यह अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को राख बना देती है। यूक्रेन ने इसे रूस की "बर्बरता और आतंक" करार देते हुए कहा है कि पुतिन बमबारी के जरिए उन्हें अपनी शर्तें मानने पर मजबूर नहीं कर सकते। हालांकि, ओरेश्निक का दोबारा इस्तेमाल यह संकेत देता है कि रूस अब युद्ध को और अधिक आक्रामक स्तर पर ले जाने के लिए तैयार है।  

17 जनवरी को PM मोदी करेंगे पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन का उद्घाटन, साथ ही 6 नई अमृत भारत एक्सप्रेस की शुरुआत

 नई दिल्ली  देश को पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन मिलने जा रही है। केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 जनवरी को पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन का उद्घाटन करेंगे। ये ट्रेन कोलकाता और गुवाहाटी के बीच चलेगी। वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के शुभारंभ के साथ छह नई अमृत भारत एक्सप्रेस की शुरुआत भी की जा रही है। यात्रियों के लिए इन ट्रेनों की सेवाएं 17 और 18 जनवरी से मिलने लगेंगी। पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन प्रधानमंत्री मोदी 17 जनवरी को पश्चिम बंगाल के मालदा टाउन से देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को हरी झंडी दिखाएंगे। ये ट्रेन सप्ताह में 6 दिन कामाख्या और हावड़ा जंक्शन के बीच चलेगी। यात्रियों के लिए 6 नई अमृत भारत एक्सप्रेस की शुरुआत भी की जा रही है।     16107/16108 ताम्बरम से संतरागाछी     16597/16598- सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया टर्मिनल बेंगलुरु से अलीपुरद्वार जंक्शन     16523/16524- सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया टर्मिनल बेंगलुरु से बालुरघाट     16223/16224- सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया टर्मिनल बेंगलुरु से राधिकापुर     20603/20604- न्यू जलपाईगुड़ी से नागरकोइल     20609/20610- न्यू जलपाईगुड़ी से तिरुचिरापल्ली 52 हफ्तों में 52 सुधार दिल्ली में आयोजित हुए अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार समारोह में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि साल 2026 में भारतीय रेलवे में कई बड़े सुधार होने वाले हैं। यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर नए तरीकों और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा। रेल मंत्री ने आगे कहा कि इस साल 52 हफ्तों में 52 सुधार पेश किए जाएंगे, जिससे आने वाले दिनों में भारतीय रेलवे का एक नया रूप देखने को मिले। ट्रेनों में टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के लिए एक नया स्ट्रक्चरल तरीका लाया जाएगा। इसके लिए AI का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर किया जाएगा।