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इंडिगो विवाद: बीमारी से जूझ रहे कैप्टन पर गिरी गाज, कंपनी ने संकट का ठीकरा उन्हीं पर फोड़ा!

नई दिल्ली  देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो में जारी ऑपरेशनल संकट के बीच नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) के एक बड़े फैसले ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। विमानन विशेषज्ञों ने DGCA द्वारा चार वरिष्ठ फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर्स (FOIs) की सेवाएं समाप्त किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि इनमें से कुछ अधिकारियों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में विमानन विशेषज्ञ संजय लाजर ने कहा कि उन्हें एक चौंकाने वाली सच्चाई पता चली है। उन्होंने लिखा कि चार में से कुछ पायलट ऐसे हैं जिनका इंडिगो संकट से कोई लेना-देना नहीं था, फिर भी उन्हें जिम्मेदार ठहराया गया। लाजर ने विशेष रूप से कैप्टन अनिल कुमार पोखरियाल का जिक्र करते हुए कहा कि वह एडवांस स्टेज कैंसर से जूझ रहे हैं, अस्पताल में भर्ती हैं और काफी पहले ही इस्तीफा दे चुके थे। इसके बावजूद उन पर कार्रवाई की गई। DGCA ने 11 दिसंबर को चार FOI को बर्खास्त करने का आदेश जारी किया। बर्खास्त किए गए अधिकारियों के नाम हैं:     रिषि राज चटर्जी (कंसल्टेंट, डिप्टी चीफ FOI)     सीमा झामनानी (सीनियर FOI)     अनिल कुमार पोखरियाल (कंसल्टेंट, FOI)     प्रियम कौशिक (कंसल्टेंट, FOI) लाजर ने एक वाट्सऐप चैट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा- मुझे अभी एक चौंकाने वाली सच्चाई पता चली है कि इन 4 पायलटों में से कुछ को किसी और के अपराधों के लिए बलि का बकरा बनाया जा रहा है। कैप्टन पोखरियाल हॉस्पिटल में हैं और उन्हें एडवांस कैंसर है और उन्होंने बहुत पहले ही इस्तीफा दे दिया था। उनका FDTL से भी कोई लेना-देना नहीं था (बाकी 2 लोगों का भी यही हाल है) इन लोगों को फंसाया जा रहा है। कैप्टन, नोटिस के आधार पर आपको जज करने के लिए माफी चाहता हूं और जल्दी ठीक हो जाइए। लाजर के अलावा, डॉ. नीलिमा श्रीवास्तव नाम की एक यूजर ने एक्स पर लिखा- इंडिगो संकट में DGCA द्वारा सस्पेंड किए गए चार FOI में से एक, अनिल कुमार पोखरियाल पिछले एक महीने से एडवांस कैंसर से जूझते हुए अस्पताल में हैं। उन्होंने पहले ही इस्तीफा दे दिया था और FDTL मामलों में शामिल नहीं थे, फिर भी उनका नाम लिया गया है। एक ऐसे व्यक्ति को बलि का बकरा बनाया जा रहा है जिसने 35 साल तक सेना में सेवा की, जबकि सिस्टम की कमियों पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है। कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों पर दोष लगाना सबसे आसान होता है। असली जवाबदेही अभी भी अछूती है। हड़बड़ी में लिया गया फैसला या जिम्मेदारी से बचाव? इन गंभीर आरोपों के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या DGCA ने बिना पूरी जांच के यह कार्रवाई कर दी या फिर ऊपरी स्तर पर हुई चूकों से ध्यान हटाने के लिए कुछ अधिकारियों को निशाना बनाया गया। खासतौर पर तब, जब इंडिगो में सामने आई अव्यवस्थाओं की जड़ नई पायलट ड्यूटी और रेस्ट नियमों के क्रियान्वयन में बताई जा रही है। बीते दिनों इंडिगो के घरेलू नेटवर्क में भारी संख्या में उड़ानें रद्द हुईं, क्रू शेड्यूलिंग फेल रही और यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। इन समस्याओं को नई ड्यूटी और रेस्ट नॉर्म्स से जुड़ी प्लानिंग की चूक से जोड़ा जा रहा है। फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर्स का क्या काम होता है? फ्लाइट ऑपरेशन इंस्पेक्टर्स यानी FOI, नागर विमानन महानिदेशालय के वरिष्ठ अधिकारी होते हैं जो इसके नियामक एवं सुरक्षा निरीक्षण कार्यों को अंजाम देते हैं और अकसर विमानन कंपनी के परिचालन की निगरानी के लिए तैनात किए जाते हैं। इस बीच इंडिगो में परिचालन संकट की जांच कर रही उच्चस्तरीय समिति के समक्ष एयरलाइन के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) पीटर एल्बर्स शुक्रवार को लगातार दूसरे दिन पेश हुए। सूत्रों ने बताया कि नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) की तरफ से गठित चार-सदस्यीय समिति ने एयरलाइन के सीईओ के अलावा मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ) इसिद्रो पोर्केरास से भी कई घंटों तक पूछताछ की। सूत्रों ने पीटीआई-भाषा से कहा कि एयरलाइन के दोनों शीर्ष अधिकारियों को चार-सदस्यीय पैनल के सामने अलग-अलग बुलाया गया। एल्बर्स करीब सात घंटे और पोर्केरास लगभग पांच घंटे पैनल के समक्ष रहे। इस दौरान समिति ने इंडिगो के परिचालन में पैदा हुए व्यापक व्यवधान से जुड़े बिंदुओं पर कंपनी के शीर्ष अधिकारियों से सवाल पूछे।

मेस्सी के नाम पर मचा बवाल: ममता बनर्जी ने जताया खेद, कोलकाता स्टेडियम घटना की जांच के निर्देश

कोलकाता  लियोनेल मेस्सी के भारत पहुंचने से पहले ही फुटबॉल प्रेमियों पर उनका खुमार चढ़ गया। वहीं शनिवार को उनकी एक झलक पाने के लिए कोलकाता के युवा भारती क्रीड़ांगन में बड़ी संख्या में फैन इकट्ठा हुए। मेस्सी के आते ही थोड़ी देर में वहां बवाल शुरू हो गया। लोग बोतल फेंकने लगे और कुर्सियों पर खड़े हो गए। इसके बाद आपस में ही मारपीट और तोड़फोड़ शुरू हो गई। दुनिया के सबसे लोकप्रिय फुटबॉल खिलाड़ी की झलक नहीं देखने पर नाराज प्रशंसकों ने सुरक्षा नियमों का उल्लंघन किया और मैदान में घुस गए। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस कुप्रबंधन पर हैरानी जताई है और इस बवाल की जांच के आदेश दे दिए हैं। ममता बनर्जी ने लियोनेल मेस्सी और उनके फैन्स से इस उपद्रव के लिए माफी मांगी है।   बनर्जी ने कहा, साल्ट लेक स्टेडियम में हुए उपद्रव से मैं बहुत दुखी और हैरान हूं। मैं लियोनेल मेस्सी और उनके फैन्स से माफी मांगती हूं। बता दें कि ममता बनर्जी इस कार्यक्रम में शामिल होने जा रही रही थीं। वह रास्ते में ही थीं तब तक स्डेडियम में बवाल शुरू हो गया। ‘सिटी ऑफ जॉय’ में फुटबॉल प्रशंसकों के लिए जो दिन यादगार होना चाहिए था, वह एक बुरे सपने में बदल गया। स्टेडियम के अंदर अव्यवस्था के चलते मेस्सी की मौजूदगी से अधिक अफरा-तफरी मची रही। मेस्सी के मैदान में आते ही स्थिति बेकाबू हो गई। अराजकता के कारण कार्यक्रम को बीच में ही रोक दिया गया। जिससे स्टेडियम में इस कार्यक्रम के लिए मौजूद बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख खान, भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की इस दिग्गज फुटबॉल खिलाड़ी से मुलाकात नहीं हो सकी। सॉल्ट लेक स्टेडियम राजनीतिक दांव-पेच का अड्डा बन गया और सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के समर्थक सुरक्षा घेरा तोड़कर मैदान में घुस आए थे। हालात इतने बिगड़ गए कि ‘जीओएटी टूर’ के आयोजक शतद्रु दत्ता और सुरक्षाकर्मियों को मेस्सी को स्टेडियम से सुरक्षित बाहर निकालना पड़ा। अर्जेंटीना के इस स्टार खिलाड़ी को देखने के लिए 4,500 से 10,000 रुपये तक के टिकट खरीदने वाले प्रशंसकों ने निराशा में बोतलें फेंकी और सीटों को तोड़ दिया। इसके स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ी। अजय शाह नाम के एक नाराज प्रशंसक ने कहा, ‘‘ यहां एक गिलास कोल्ड ड्रिंक की कीमत 150-200 रुपये है, फिर भी हमें मेस्सी की एक झलक भी नहीं मिली। लोग उन्हें देखने के लिए अपनी एक महीने की तनख्वाह खर्च कर चुके हैं। मैंने टिकट के लिए 5000 रुपये दिए और अपने बेटे के साथ मेस्सी को देखने आया था, नेताओं को नहीं। पुलिस और सैन्यकर्मी सेल्फी ले रहे थे और इसके लिए प्रबंधन जिम्मेदार है। पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं था।’  

न्यू ईयर से पहले बड़ा फैसला: दिल्ली की क्रिसमस पार्टियों में नहीं होंगे पटाखे

नई दिल्ली  साल 2025 खत्म होने को है। राजधानी दिल्ली नए साल का जश्न मनाने को तैयार है। क्रिसमस की रौनक और न्यू ईयर की धूम के लिए दिल्ली के क्लब, रेस्टोरेंट और बार पूरी तरह तैयार हैं। लेकिन इस बार पार्टी में एक बड़ा बदलाव आने वाला है। अब इन जगहों पर पटाखे फोड़ने की सख्त मनाही है। गोवा के नाइट क्लब में हुए खौफनाक हादसे के बाद ये फैसला लिया गया। हाल ही में गोवा के एक नाइटक्लब में लगी भीषण आग ने सबको हिला कर रख दिया। इस हादसे में कम से कम 25 लोगों की जान चली गई। इसी को ध्यान में रखते हुए दिल्ली के आबकारी विभाग ने फैसला लिया है कि पार्टी की मस्ती में सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। क्लब और रेस्टोरेंट वालों को सख्त हिदायत 10 दिसंबर को जारी आदेश में विभाग ने सभी होटल, क्लब और रेस्टोरेंट (HCR) लाइसेंस धारकों को चेतावनी दी है। फायर NOC हमेशा वैलिड रखें। फायर सेफ्टी सिस्टम पूरी तरह चालू हालत में हों। इसके अलावा परिसर में किसी भी तरह के पटाखे चाहे पारंपरिक हों या इलेक्ट्रिक पूरी तरह बैन हैं। अगर कोई गलती हुई तो दिल्ली एक्साइज एक्ट 2009 और नियम 2010 के तहत सख्त कार्रवाई होगी। लाइसेंस सस्पेंड या कैंसल तक हो सकता है। दिल्ली में कितने जगहों पर लागू होगा ये नियम? शहर में करीब 950 रेस्टोरेंट, बार और क्लब आबकारी विभाग के साथ रजिस्टर्ड हैं। खास बात ये कि 90 वर्ग मीटर या उससे ज्यादा एरिया वाले सभी प्रतिष्ठानों को अपना फायर NOC समय पर रिन्यू कराना अनिवार्य है। कोई बहाना नहीं चलेगा।  

जस्टिस जे. निशा बानो का केरल HC ट्रांसफर: राष्ट्रपति के आदेश के साथ जॉइनिंग की डेडलाइन तय

केरल मद्रास हाईकोर्ट की जज जे. निशा बानो को केरल हाईकोर्ट में ट्रांसफर किए जाने के लगभग दो महीने बाद भी उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया है, जिसके बाद राष्ट्रपति ने उन्हें 20 दिसंबर, 2025 तक केरल हाईकोर्ट में पदभार ग्रहण करने का निर्देश दिया है। कानून मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि, राष्ट्रपति, भारत के चीफ जस्टिस से परामर्श करने के बाद मद्रास हाईकोर्ट की जज न्यायमूर्ति जे. निशा बानो को 20 दिसंबर 2025 को या उससे पहले केरल हाईकोर्ट में अपना पदभार ग्रहण करने का निर्देश देते हुए प्रसन्न हैं। केंद्र सरकार ने जज बानो के मद्रास हाईकोर्ट से केरल हाईकोर्ट में ट्रांसफर की अधिसूचना 14 अक्टूबर, 2025 को जारी की थी। हालांकि, लगभग दो महीने बीत जाने के बाद भी उन्होंने केरल हाईकोर्ट में कार्यभार नहीं संभाला था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इस देरी ने केरल हाईकोर्ट बार के सदस्यों के बीच बेचैनी पैदा कर दी थी। बार की प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया देते हुए, न्यायमूर्ति बानो ने पिछले महीने एक समाचार पत्र को बताया था कि उन्होंने अपने बेटे के विवाह के मद्देनजर मद्रास हाईकोर्ट में अर्जित अवकाश के लिए आवेदन किया था। साथ ही, उन्होंने कहा था कि वह अपने ट्रांसफर पर पुनर्विचार के लिए किए गए अनुरोध के परिणाम का भी इंतजार कर रही थीं। इस बीच कांग्रेस सांसद केएम सुधा आर ने शुक्रवार को लोकसभा में प्रश्न उठाते हुए केंद्रीय कानून मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा। उन्होंने पूछा कि क्या न्यायमूर्ति बानो अभी भी मद्रास हाईकोर्ट के कॉलेजियम का हिस्सा हैं और क्या उन्होंने जजों के रूप में नियुक्ति के लिए अनुशंसित उम्मीदवारों की किसी सूची पर हस्ताक्षर किए हैं। सांसद ने यह भी पूछा कि क्या जज ने अपने ट्रांसफर पर पुनर्विचार की मांग की थी। इसके जवाब में कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सीधे तौर पर इन सवालों का जवाब नहीं दिया। इसके बजाय, उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों और ट्रांसफरों को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक और प्रक्रियात्मक ढांचे को रेखांकित किया। मंत्री ने संविधान के अनुच्छेद 217 का उल्लेख करते हुए कहा कि एक जज को दूसरे हाईकोर्ट में ट्रांसफर किए जाने पर अपना वर्तमान पद खाली करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति बानो के ट्रांसफर की अधिसूचना 14 अक्टूबर, 2025 को जारी की गई थी और उन्होंने अनुच्छेद 217 (1) (ग) का हवाला दिया, जिसमें प्रावधान है कि राष्ट्रपति द्वारा किसी अन्य हाईकोर्ट में ट्रांसफर किए जाने पर जज का पद रिक्त हो जाएगा।  

बंटवारे के बाद नया अध्याय: पाकिस्तान में शुरू हुआ संस्कृत कोर्स, पाठ्यक्रम में गीता-महाभारत

इस्लामाबाद  भारत और पाकिस्तान भले ही कभी एक ही रहे हों लेकिन आज दोनों देश के बीच राजनीतिक दूरियां इतनी बढ़ गई हैं कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर दोनों देश एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। वहीं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दोनों देशों की संस्कृति एक ही बीजे से उपजे हुए दो पौधों की तरह है जिसमें समानता को कभी खत्म नहीं किया जा सकता है। बंटवारे के बाद पहली बार है जब पाकिस्तान के किसी विश्वविद्यालय में संस्कृति का कोर्स शुरू किया गया है। इतना ही नहीं तैयारी यह भी है कि आने वाले समय में पाकिस्तान में भी भगवद्गीता और महाभारत की शिक्षा दी जाएगी।   लाहौर यनिवर्सिटी ऑफि मैनेजमेंट साइंसेज (LUMS) ने पारंपरिक भाषाओं के चार क्रेडिट कोर्स शुरू किए हैं। इसमें से एक संस्कृत भी है। फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज में समाजशास्त्र के असोसिएट प्रोफेसर डॉ. शाहिद रशीद के प्रयासों से यह सं हो बपाया है। वह खुद भी संस्कृत के विद्वान हैं। द ट्रि्ब्यून से बातचीत में उन्होंने बताया कि पारंपरिक भाषाओं में ज्ञान का सागर छइा है। मैंने पहले अरबी और फारसी पढ़ी और इसके बाद संस्कृत पढ़नी शुरू की। उन्होंने कहा, मुझे संस्कृत का व्याकरण समझने में एक साल लग गया और अब भी मैं कोशिश कर रहा हूं। उन्होंने बताया कि तीन महीने की वीकेंड वर्कशॉप में संस्कृत का कोर्स चलाया गया था। इसके बाद छात्रों में संस्कृति के प्रति रुचि दिखाई दी। एलयूएमएस में गुरमानी सेंटर के डायरेक्टर डॉ. अली उस्मान कासिम ने कहा कि पाकिस्तान के इलाके में भी संस्कृत पर बहुत काम हुआ है। अब भी पंजाब यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में संस्कृति की दुर्लभ पुस्तकें और ग्रंथ उपलब्ध हैं। यहां तक कि संस्कृत में लिखे पत्ते भी लाइब्रेरी में मौजूद हैं जिन्हें बाद में जेसीआर वूलनर ने एकत्रित किया था। इनका इस्तेमाल विदेशी शोधकर्ता ही करते हैं। वहीं पाकिस्तान में संस्कृत की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया। ये हमारी भी भाषा है डॉ. रशीद ने कहा कि बहुत सारे लोगों को लगता है कि यह भाषा हिंदू धार्मक ग्रंथों के लिए ही है। मैं उनको बताना चाहता हूं कि यह पूरे क्षेत्र की भाषा है। संस्कृत के व्याकरण के रचयिता पाणिनि का गांव भी यहीं हुआ करता था। सिंधु सभ्यता के दौरान यहां बहुत ज्यादा लेखन हुआ। संस्कृत एक पर्वत की तरह है जिसमें बहुत सारे खजाने हैं। हमें इनको स्वीकार करना है। यह किसी एक विशेष धर्म से बंधी हुई नहीं है। उन्होंने कहा कि सीमा के दोनों तरफ जब संस्कृत पर काम होगा तो आप कल्पना करिए कि भारत के हिंदू और सिख अरबी पारसी सीखेंगे और पाकिस्तान के मुसलमान संस्कृति सीखेंगे। इससे दक्षिण एशिया में एक भाषा सेतु का निर्माण होगा। उन्होंने कहा कि भाषा की कोई सीमा नहीं होती है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज हरियाणा के करनाल में रहते थे। वहीं उनकी मां उत्तर प्रदेश के शेखपुरा की रहने वाली हैं। उन्होंने कहा कि देवनागरी लिपि बहुत ही आकर्षक है। गीता और महाभारत पर भी लॉन्च होंगे कोर्स डॉ. कासमी ने कहा कि यूनिवर्सिटी का प्लान महाभारत और भगवद्गीता के कोर्स शुरू करने का भी है। हो सकता है कि 10 से 15 सालों में पाकिस्तान से गीता और महाभारत के भी विद्वान निकलें।  

जापान से लोग हो रहे गायब! एक ही साल में दर्ज हुई जनसंख्या की सबसे बड़ी कमी

टोक्यो अमेरिका भले भी सी-5 ग्रुप में जापान को शामिल करने की तरफ देख रहा हो, लेकिन कभी अपने तकनीक के दम पर दुनिया पर राज करने का सपना देखने वाला यह देश आज घरेलू स्तर पर जूझ रहा है। जापान के लिए उसकी गिरती हुई जनसंख्या एक बड़ा सिरदर्द बन गई है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक साल में जापान की जनसंख्या में से करीब 9 लाख लोग कम हो गए हैं। मतलब पैदा होने वाले और मरने वालों के बीच का फासला करीब 9 लाख के आसपास है। ऐतिहासिक रूप से यह जापान की आबादी की सबसे बड़ी गिरावट है।   करीब 12.5 करोड़ की आबादी वाले जापान के लिए एक साल में 9 लाख लोगों को खोना एक बड़ा झटका है। यह जापान की आबादी का करीब 0.7 फीसदी है, जो कि उसने केवल एक साल में खो दिया है। अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत के लिए यह आंकड़ा बेहद कम लगे लेकिन जापान के लिए यह एक बहुत बड़ी और चिंताजनक बात है। जापान पिछले कई वर्षों से लगातार जनसंख्या की गिरावट का सामना कर रहा है। घटती जन्म दर और आबादी की बढ़ती उम्र जापान की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक विकास को भी धीमा कर रही है। जापान की आबादी में युवाओं की आबादी लगातार घट रही है, जबकि बुजुर्गों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। अर्थव्यवस्था पर असर जनसंख्या में लगातार युवाओं आबादी का कम होना जापान के विकास के लिए लगातार परेशानी बढ़ा रहा है। कामकाजी युवाओं की कमी की वजह से आर्थिक विकास मंद पड़ गया है, वहीं दूसरी ओर सरकार के ऊपर लगातार बुजुर्गों को पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं किया जाने वाला खर्च बढ़ाना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक मोर्चे पर दोहरा दबाव पड़ रहा है। सरकार के प्रयास नाकाफी जापानी सरकार इस जनसंख्या संकट के उबरने के लिए लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन उसके प्रयास अभी तक नाकाफी ही साबित हुए हैं। हाल के वर्षों में सरकार की तरफ से बच्चों के जन्म पर आर्थिक सहायता, वर्क लाइफ बैलेंस सुधार और महिलाओं को भागीदारी को बढ़ाने की कोशिश की गई है, लेकिन अभी तक इनका असर जनसंख्या पर देखने को नहीं मिला है। वह लगातार कमी के रिकॉर्ड बनाती जा रही है। जनसंख्या मामले के विशेषज्ञों के मुताबिक अगर जापान अपनी आबादी को बढ़ाने और स्थाई करने का कोई रास्ता जल्दी ही नहीं ढूंढ़ता है, तो आने वाले दशकों में यह एक बड़ा संकट होगा। उस समय पर जनसंख्या का कम होना जापान के लिए केवल आंकड़ों का संकट नहीं रह जाएगा, बल्कि यह भविष्य में देश की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन जाएगा।

अमेरिकी संसद में बगावत: ट्रंप के भारत पर 50% टैरिफ के खिलाफ डेमोक्रेट सांसदों ने उठाया विरोध

वॉशिंगटन  अमेरिका में भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर लगाए गए भारी टैरिफ को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाने के लिए राष्ट्रीय आपातकाल का हवाला दिया था. अब हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की तीन डेमोक्रेट सांसदों—डेबोरा रॉस (नॉर्थ कैरोलिना), मार्क वीजी (टेक्सास) और भारतीय मूल के राजा कृष्णमूर्ति (इलिनॉय)—ने इस फैसले को चुनौती देते हुए एक प्रस्ताव पेश किया है. सांसदों ने कहा कि यह टैरिफ न केवल अवैध हैं, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों के हितों के खिलाफ हैं. तीनों सांसदों ने साझा बयान में कहा, “ये टैरिफ आम लोगों की जेब पर भार डाल रहे हैं और अमेरिकी व्यवसायों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. इसे हटाना अमेरिका-भारत संबंधों के लिए भी महत्वपूर्ण है.” ट्रंप प्रशासन ने 1 अगस्त 2025 को भारत से आने वाले उत्पादों पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था. इसके बाद 27 अगस्त 2025 को भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत सेकेंडरी टैरिफ की घोषणा की गई. इससे कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया. प्रशासन का तर्क था कि भारत अब भी रूस से तेल खरीद रहा है, जिससे मॉस्को को यूक्रेन युद्ध के लिए वित्तीय सहायता मिल रही है. सांसदों की प्रतिक्रिया डेबोरा रॉस ने कहा कि नॉर्थ कैरोलिना की अर्थव्यवस्था भारत से जुड़े निवेश पर निर्भर है. उन्होंने बताया कि भारतीय कंपनियों ने वहां अरबों डॉलर का निवेश किया है और हजारों नौकरियां पैदा की हैं. ऐसे में टैरिफ इस आर्थिक संबंध को नुकसान पहुँचा रहे हैं. मार्क वीजी ने कहा, “ये टैरिफ आम अमेरिकी परिवारों के लिए महंगाई बढ़ाने जैसा है. भारत हमारा महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक सहयोगी है, और ऐसे कदम द्विपक्षीय रिश्तों को कमजोर करते हैं.” राजा कृष्णमूर्ति ने कहा कि टैरिफ अमेरिकी सप्लाई चेन में रुकावट डाल रहे हैं और अमेरिकी मजदूरों को नुकसान पहुँचा रहे हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि टैरिफ हटाने से अमेरिका-भारत के आर्थिक और सुरक्षा संबंध मजबूत होंगे. कांग्रेस बनाम राष्ट्रपति यह प्रस्ताव अमेरिकी कांग्रेस में उस बड़े प्रयास का हिस्सा है, जिसमें डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकन राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों के दुरुपयोग पर अंकुश लगाना चाहते हैं. सांसदों का कहना है कि व्यापार नीति बनाने का अधिकार संविधान के तहत केवल कांग्रेस के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं. वर्तमान में यह प्रस्ताव हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पेश किया गया है. यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो इसे सीनेट में भी पेश किया जाएगा. विशेष बहुमत मिलने पर राष्ट्रपति के वीटो को भी ओवरराइड किया जा सकता है. प्रस्ताव पारित होने पर भारत पर लगे 50 प्रतिशत टैरिफ हट सकते हैं और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों में सुधार की संभावना बढ़ सकती है.

बीजेपी ने केरल निकाय चुनाव में कांग्रेस को पछाड़ा, लेफ्ट को भी लगा बड़ा झटका

तिरुवनंतपुरम केरल में सत्ता का सेमिफाइनल माने जा रहे अहम स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे अब काफी हद तक साफ हो गए हैं. राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया है. वहीं सत्ताधारी सीपीएम नीत एलडीएफ को इन चुनावों में झटका लगा है. वहीं इन निकाय चुनावों में बीजेपी ने चौंकाने वाला प्रदर्शन किया है. भगवा दल ने तिरुवनंतपुरम सहित कई जिला पंचायतों में जीत दर्ज की है. केरल के 6 नगर निगम, 14 जिला पंचायत, 87 नगर पालिका, 152 ब्लॉक पंचायत और 941 ग्राम पंचायत के लिए चुनाव हुए थे. राज्य के 244 केंद्रों और 14 जिला कलेक्ट्रेट में वोटों की गिनती चल रही है. यहां सभी की नजरें इन नतीजों पर हैं, क्योंकि इससे 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जनता का रुझान पता चलेगा. स्थानीय निकाय चुनाव इस बार केवल सीटों की गणित तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने राज्य की राजनीति में कुछ ऐसे मुद्दों को भी केंद्र में ला दिया, जो आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा तय कर सकते हैं. लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) का परंपरागत दबदबा बरकरार है, कांग्रेस भी कई इलाकों में मजबूती से लड़ती दिखी, लेकिन बीजेपी के लिए यह चुनाव खास तौर पर अहम माना जा रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह है एर्नाकुलम जिले का मुनंबम इलाका, जहां NDA की जीत को बीजेपी एक "राजनीतिक और सामाजिक टर्निंग पॉइंट" के रूप में पेश कर रही है. बीजेपी के केरल महासचिव अनूप एंटनी जोसेफ ने मुनंबम वार्ड में NDA की जीत को "ऐतिहासिक" बताया है. बीजेपी नेता का दावा है कि मुनंबम में करीब 500 ईसाई परिवार वक्फ बोर्ड के कथित अवैध दावों की वजह से अपने घरों से बेदखली के खतरे का सामना कर रहे थे. अनूप एंटनी के मुताबिक, मोदी सरकार और बीजेपी ने इस मुद्दे पर खुलकर इन परिवारों का साथ दिया, उसी का नतीजा है कि लोगों ने स्थानीय चुनाव में बीजेपी को अपना समर्थन दिया. सात दशक पुराना है वक्फ विवाद की जड़ मुनंबम वक्फ विवाद की जड़ें आज से करीब सात दशक पुरानी हैं. 1950 में सिद्दीकी सैत नामक व्यक्ति ने यह जमीन फरीद कॉलेज को दान की थी. इसके बाद कॉलेज प्रशासन ने इस भूमि के कुछ हिस्से स्थानीय निवासियों को बेच दिए, जबकि इन इलाकों में लोग पहले से रह रहे थे. साल 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने इस पूरी जमीन को वक्फ संपत्ति के तौर पर रजिस्टर कर दिया, जिससे पहले हुए सभी सौदे अमान्य माने जाने लगे. इसके बाद सैकड़ों परिवारों के सामने बेदखली का संकट खड़ा हो गया. 410 परिवारों के बेदखली का डर इस फैसले के खिलाफ मुनंबम और चेराई इलाकों में 410 दिनों से भी ज्यादा समय तक आंदोलन चला. प्रभावित परिवारों ने कोझिकोड वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी, वहीं राज्य सरकार ने जमीन के स्वामित्व की जांच के लिए सीएन रामचंद्रन नायर आयोग का गठन किया. 2025 में केरल हाई कोर्ट के एकल पीठ ने इस आयोग को रद्द कर दिया था, लेकिन बाद में डिवीजन बेंच ने आयोग को बहाल करते हुए 2019 के वक्फ रजिस्ट्रेशन को "कानून के अनुरूप नहीं" बताया. सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक  रिपोर्ट के मुताबिक, 12 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के "नॉट वक्फ" वाले फैसले पर रोक लगा दी और जनवरी 2026 तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. इससे फिलहाल किसी भी परिवार की बेदखली पर रोक है. मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी पहले ही भरोसा दिला चुके हैं कि किसी को जबरन नहीं हटाया जाएगा. मुनंबम की जीत को ईसाई समर्थन का संकेत मान रही बीजेपी बीजेपी अब इस पूरे विवाद को "न्याय बनाम अन्याय" की लड़ाई के रूप में पेश कर रही है. मुनंबम में मिली जीत को पार्टी केरल में ईसाई समुदाय के बीच बढ़ते भरोसे का संकेत मान रही है. मसलन, भले ही यह जीत प्रतीकात्मक हो, लेकिन वक्फ जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बीजेपी की आक्रामक राजनीति आने वाले समय में राज्य की चुनावी बहस को और तेज कर सकती है.  

सिद्धीक सैत द्वारा दान की गई भूमि पर 600 परिवारों को बेदखली का खतरा, SC में वक्फ बोर्ड ने की अपील

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने  केरल के एर्नाकुलम जिले की मुनंबम भूमि को वक्फ संपत्ति न मानने संबंधी केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने इस मामले में अगली सुनवाई तक भूमि की यथास्थिति बनाए रखने का भी आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी, 2026 को होगी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केरल सरकार द्वारा गठित जस्टिस सी.एन. रामचंद्रन नायर जांच आयोग के कामकाज पर कोई रोक नहीं लगाई गई है और आयोग अपनी जांच जारी रख सकता है। पीठ ने अपने आदेश में कहा- नोटिस जारी किया जाए, छह हफ्ते में जवाब दाखिल हो। मामले को 27 जनवरी 2026 को सूचीबद्ध किया जाए। तब तक हाईकोर्ट के उस आदेश की घोषणा कि विवादित संपत्ति वक्फ नहीं है, स्थगित रहेगी और यथास्थिति बनाए रखी जाए। यह स्पष्ट किया जाता है कि हमने जांच आयोग के काम पर कोई रोक नहीं लगाई है। अदालत ने यह अंतरिम आदेश केरल वक्फ संरक्षण वेदी की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर पारित किया। याचिका में केरल हाईकोर्ट की उस डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने राज्य सरकार द्वारा गठित जांच आयोग को वैध ठहराया था और साथ ही यह टिप्पणी की थी कि मुनंबम की जमीन वक्फ संपत्ति नहीं है। क्या है पूरा विवाद? यह मामला मुनंबम की करीब 135 एकड़ भूमि से जुड़ा है, जिसे वर्ष 1950 में सिद्दीक सैत नामक व्यक्ति ने फारूक कॉलेज को दान में दिया था। उस समय इस भूमि पर स्थानीय परिवार पहले से ही रह रहे थे। बाद में कॉलेज ने भूमि के कुछ हिस्से इन्हीं निवासियों को बेच दिए। विवाद तब गहराया जब 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने इस जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कर दिया, जिससे पहले की गई बिक्री को अवैध माना गया। इसके चलते 600 से अधिक परिवारों को बेदखली का डर सताने लगा और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। वक्फ बोर्ड के इस फैसले को कोझिकोड वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी गई, जहां मामला अभी लंबित है। हाईकोर्ट में क्या हुआ? भूमि विवाद और बढ़ते तनाव के बीच, नवंबर 2024 में केरल सरकार ने इस मुद्दे का समाधान तलाशने के लिए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सी.एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग गठित किया। इसके खिलाफ केरल वक्फ संरक्षण वेदी ने हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि वक्फ अधिनियम के तहत आने वाले मामलों में राज्य सरकार को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने इस दलील से सहमति जताते हुए आयोग को रद्द कर दिया। हालांकि, अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एकल न्यायाधीश के फैसले को पलट दिया। डिवीजन बेंच ने न केवल राज्य सरकार के आयोग को वैध ठहराया, बल्कि यह भी कहा कि 2019 में वक्फ बोर्ड द्वारा जमीन का पंजीकरण कानून के विपरीत था। अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि जमीन को वक्फ घोषित करना एक तरह की जमीन पर कब्जा करने की रणनीति जैसा प्रतीत होता है और 1950 का दस्तावेज वक्फनामा नहीं, बल्कि एक गिफ्ट डीड था। सुप्रीम कोर्ट में याचिका डिवीजन बेंच के इन निष्कर्षों को चुनौती देते हुए वक्फ संरक्षण वेदी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने यह तय करके कि जमीन वक्फ है या नहीं, अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसला दिया, जबकि यह मुद्दा पहले से ही वक्फ ट्रिब्यूनल में विचाराधीन है। साथ ही, यह भी तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट का फैसला कार्यपालिका को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति देता है, जहां कानूनन एक अलग वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है। संक्षिप्त सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए भूमि की स्थिति को यथावत रखने का आदेश दिया, लेकिन जांच आयोग को अपना काम जारी रखने की अनुमति दे दी। अब सभी की निगाहें 27 जनवरी, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस संवेदनशील भूमि विवाद की आगे की दिशा तय होगी।  

पुतिन से मिलते वक्त शहबाज शरीफ को 40 मिनट इंतजार, रूस-तुर्की मीटिंग में पाकिस्तान की फजीहत

अश्गाबात तुर्कमेनिस्तान में एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान पाकिस्तान की डिप्लोमेसी का मजाक बना है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने का कार्यक्रम था. लेकिन पुतिन उनसे मिलने नहीं आए, बल्कि 40 मिनट तक इंतजार कराया. दरअसल पुतिन तब तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन से मुलाकात कर रहे थे. पुतिन का इंतजार करते-करते आखिर शहबाज से रहा नहीं गया और आखिरकार तय प्रोटोकॉल तोड़ते हुए वह पुतिन-एर्दोगन की मीटिंग में घुस गए. इस दौरान पुतिन और एर्दोगन बातचीत कर ही रहे थे. किस जगह हुई पाकिस्तान की डिप्लोमैटिक बेइज्जती? यह पूरा घटनाक्रम तुर्कमेनिस्तान की तटस्थता की 30वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुआ. सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में देखा गया कि शहबाज शरीफ अपने विदेश मंत्री इशाक डार के साथ एक अलग कमरे में बैठे हुए हैं और साफ तौर पर बेचैन नजर आ रहे हैं. तय समय बीत जाने और किसी बुलावे के न आने के बाद शहबाज शरीफ अचानक उस हॉल में पहुंच गए, जहां रूस और तुर्की के राष्ट्रपति आमने-सामने चर्चा  जिसमें देखा जा सकता है कि पुतिन के लिए बैठक में काफी देर तक शरीफ इंतजार करते रहे, लेकिन वह नहीं आए। वह अपने विदेश मंत्री इशाक डार के साथ कमरे में थे। इसके बाद शरीफ अचानक से उठे और बगल में हो रही पुतिन व तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन की बंद कमरे की बैठक में घुस गए। हालांकि, वहां भी उनकी बात नहीं हो सकी और सिर्फ दस मिनट बाद वहां से भी रवाना होना पड़ा। सोशल मीडिया पर इसी वीडियो को लेकर शरीफ का मजाक उड़ाया जा रहा है। एक यूजर ने लिखा कि पुतिन भिखारियों पर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते हैं। वहीं, एक और यूजर ने कहा कि यह तो इंटरनेशनल बेइज्जती हो गई। एक और यूजर ने कहा कि 40 मिनट पुतिन का दरवाजा खटखटाते थक गए, लेकिन एंट्री नहीं मिली, जैसे शादी में बिना इन्विटेशन घुसने वाला रिश्तेदार। हालांकि बाद में वीडियो हटा दिया। बता दें कि इंटरनेशनल फोरम फॉर पीस एंड ट्रस्ट प्रोग्राम तुर्कमेनिस्तान के अशगाबात में आयोजित किया जा रहा है। इस मीटिंग में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ सहित कई देशों के नेताओं ने हिस्सा लिया है।