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देश में नहीं थम रहा बाल विवाह, पश्चिम बंगाल टॉप पर; केरल और दिल्ली की सराहना

नई दिल्ली "पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब…" यह कहावत हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं, लेकिन आज भी हमारे देश की लाखों बेटियों के हाथों से किताबें छीनकर, उनके नाजुक कंधों पर घर-गृहस्थी का भारी बोझ लाद दिया जाता है। सपनों को पंख लगाने की उम्र में उन्हें शादी के मंडप में धकेल दिया जाता है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) की ताजा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2024 के विधिक और सांख्यिकीय आंकड़े बताते हैं कि तमाम कड़े कानूनों और जागरूकता अभियानों के बावजूद समाज से बाल विवाह (Child Marriage) का यह कूट डंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हर चौथी लड़की की शादी 21 से पहले देश में महिलाओं के विवाह की मौजूदा स्थिति को लेकर जारी हुए आंकड़े समाज की सोच पर कूट सवाल खड़े करते हैं। साल 2024 में भारत में जितनी भी महिलाओं की शादियां हुईं, उनका सांख्यिकीय गणित कुछ इस प्रकार है:     18 साल से कम (नाबालिग): 2.1% लड़कियां ऐसी थीं जिनकी विधिक उम्र पूरी होने से पहले ही शादी कर दी गई।     18 से 20 साल के बीच: 24.5% लड़कियों का विवाह इस उम्र में हुआ।     21 वर्ष या उससे अधिक: राहत की बात है कि 73.5% महिलाओं की शादी 21 साल के बाद हुई।     चौंकाने वाला सच: देश में आज भी हर चार में से एक महिला (करीब 26.6%) की शादी विधिक रूप से परिपक्व होने यानी 21 साल की उम्र पूरी करने से पहले ही कर दी जा रही है। हालांकि, अच्छी खबर यह है कि अब भारत में महिलाओं की शादी की औसत उम्र बढ़कर 23.1 वर्ष हो गई है। बाल विवाह में पश्चिम बंगाल टॉप पर अगर राज्यों के स्तर पर इस सामाजिक बुराई का कूट विश्लेषण करें, तो पूर्वी और मध्य भारत के हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं: बाल विवाह में पश्चिम बंगाल टॉप पर अगर राज्यों के स्तर पर इस सामाजिक बुराई का कूट विश्लेषण करें, तो पूर्वी और मध्य भारत के हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं: राज्य (States) बाल विवाह का प्रतिशत (18 साल से कम)** विधिक एवं कूट स्थिति (Current Status)** पश्चिम बंगाल 6.3% पूरे देश में शीर्ष (Top) स्थान पर, स्थिति सबसे गंभीर। झारखंड 4.9% देश में दूसरे स्थान पर, ग्रामीण इलाकों में दर अधिक। असम 2.8% पूर्वोत्तर राज्यों में सामाजिक सुधारों की गति धीमी। बिहार / ओडिशा 2.6% दोनों राज्यों में स्थिति समान रूप से चिंताजनक बनी हुई है। राजस्थान 2.4% ऐतिहासिक रूप से बदनाम यह राज्य अब राष्ट्रीय औसत के करीब आ रहा है। राष्ट्रीय औसत (2.1%) के बराबर और नीचे वाले राज्य गुजरात और मध्य प्रदेश: इन दोनों राज्यों में बाल विवाह का ग्राफ ठीक राष्ट्रीय औसत यानी 2.1% पर टिका है। दक्षिण और बड़े राज्य: तेलंगाना (1.8%), आंध्र प्रदेश (1.7%) और उत्तर प्रदेश (1.6%) की स्थिति राष्ट्रीय औसत से थोड़ी बेहतर है। पहाड़ी और औद्योगिक राज्य: उत्तराखंड में यह आंकड़ा 1.5%, जम्मू और कश्मीर में 1.2% और महाराष्ट्र में 1.0% दर्ज किया गया है।  दिल्ली और केरल ने पेश की मिसाल   इस स्याह तस्वीर के बीच देश के कुछ राज्यों ने कूट बदलाव की एक बेहद खूबसूरत और उम्मीद जगाने वाली मिसाल पेश की है: केरल: साक्षरता में अव्वल रहने वाले इस राज्य में बाल विवाह लगभग ना के बराबर यानी महज 0.04% रह गया है। दिल्ली : देश की राजधानी दिल्ली ने इस मोर्चे पर इतिहास रच दिया है। पूरे सर्वे के दौरान दिल्ली से बाल विवाह का एक भी मामला (0%) रिपोर्ट नहीं हुआ है। बेहतर प्रदर्शन: हिमाचल प्रदेश (0.4%), हरियाणा (0.7%), कर्नाटक व तमिलनाडु (0.8%) और पंजाब (0.9%) ने भी इस कुप्रथा को 1% से नीचे समेटने में विधिक सफलता पाई है।     ग्रामीण बनाम शहरी भारत   आमतौर पर माना जाता है कि शहरों में शिक्षा और जागरूकता के कारण बाल विवाह नहीं होते। राष्ट्रीय औसत भी यही कहता है कि ग्रामीण भारत में बाल विवाह 2.4% है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह महज 1.1% है। लेकिन पश्चिम बंगाल से आए आंकड़े समाजशास्त्रियों को चौंका रहे हैं। बंगाल के ग्रामीण इलाकों में बाल विवाह की दर 5.9% है, जबकि वहां के शहरी इलाकों में यह ग्राफ बढ़कर 7.6% तक पहुंच गया है, जो कि देश के शहरी औसत से सात गुना ज्यादा है। इसके विपरीत, झारखंड के ग्रामीण इलाकों में यह दर 5.8% है।  स्वास्थ्य और आर्थिक स्वतंत्रता पर असर स्वास्थ्य और विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि बाल विवाह केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि बेटियों के जीवन के साथ एक गंभीर खिलवाड़ है। शिक्षा पर ब्रेक: कम उम्र में शादी होने की वजह से लड़कियों को बीच में ही स्कूल-कॉलेज छोड़ना पड़ता है। स्वास्थ्य को खतरा: विधिक रूप से शारीरिक परिपक्वता आने से पहले ही वे गर्भवती हो जाती हैं, जिससे मातृ मृत्यु दर (MMR) और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य संबंधी कूट खतरे बढ़ जाते हैं। आर्थिक बेड़ियां: शिक्षा अधूरी रहने के कारण ये लड़कियां कभी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पातीं और जीवनभर घरेलू निर्भरता के चक्रव्यूह में फंसी रह जाती हैं।  

सावधान! नए LPG नियम लागू होते ही कैंसिल हो सकता है आपका सिलेंडर कनेक्शन

 नई दिल्‍ली एशिया संकट को देखते हुए कस्‍टमर्स को कोई दिक्‍कत नहीं आए, इसलिए कुछ खास बदलाव किए गए हैं. इसी में से एक बदलाव 1 जून से लागू होने जा रहा है, जिसके तहत आपका सिलेंडर कनेक्‍शन कैंसिल हो सकता है।  दरअसल, देश में PNG का कनेक्‍शन बढ़ रहा है और सरकार द्वारा निर्देश देने के बावजूद LPG सिलेंडर का उपयोग कम नहीं हो रहा है. पीएनजी कनेक्‍शन मार्च तक 6.5 लाख नए कनेक्शन लगे हैं, लेकिन वास्‍तवकि आपूर्ति 18 फीसदी कम थी।  इससे पता चलता है कि कई परिवारों ने वास्‍तव में स्विच किए बिना ही कनेक्‍शन ले लिया है, जबकि सरकार ने कहा है कि अगर पीएनजी और एलपीजी दोनों कनेक्‍शन हैं, तो एलपीजी को सरेंडर करना होगा. हालांकि, इसके बावजूद ही लोग पीएनजी का कनेक्‍शन ले रहे हैं, लेकिन एलपीजी को सरेंडर नहीं कर रहे हैं।  पिछले एक दशक में एलपीजी यूजर्स की संख्या लगभग दोगुनी होकर 33.5 करोड़ हो गई है, जबकि पीएनजी यूजर्स की संख्या केवल 1.64 करोड़ ही बनी हुई है. इस स्थिति में सरकार जल्‍द से जल्‍द बदलाव चाहती है और जून शुरू होने से पहले ही कड़े नियम लागू होने जा रहे हैं।  एक फैमिली, एक कनेक्‍शन नियम संशोधित नियम के तहत जिन परिवारों के पास पहले से ही PNG कनेक्‍शन हैं, उन्‍हें अपने एलपीजी कनेक्‍शन सरेंडर करने पड़ सकते हैं. तेल डिस्‍ट्रीब्‍यूशन कंपनियों (OMCs) ने घरेलू सिलेंडरों के दुरुप्रयोग, जमाखोरी और कलाबाजारी को रोकने के लिए पीएनजी और एलपीजी दोनों का एक साथ उपयोग करने वाले घरों की पहचान करना शुरू कर दिया है।  एक ही एड्रेस पर दोनों कनेक्‍शन रखना संशोधित एलपीजी नियमों के तहत प्रतिबंधित माना जा रहा है, जिन लोगों के इलाके में पीएनजी का इंफ्रा है, उन्‍हें तय समय के भीतर पीएनजी पर स्विच न करने पर एलपीजी आपूर्ति बंद या खुद रद्द होने का सामना करना पड़ सकता है।    LPG कनेक्‍शन ट्रांसफर पीएनजी कनेक्‍शन प्राप्‍त करने के 30 दिनों के भीतर अपना एलपीजी कनेक्‍शन बंद करने के लिए कहा है, जिस कारण सरकार ने इन कस्‍टमर्स को अपना एलपीजी कनेक्‍शन बहाल करने की अनुमति दी है. इससे यूजर्स को बाद में उन सेक्‍टर्स में जाने पर भी एलपीजी कनेक्‍शन फिर एक्टिव करने की सुविधा मिलती है, जहां पीएनजी कनेक्‍शन उपलब्‍ध नहीं है।  जून से ही नहीं भरा जाएगा एलपीजी सिलेंडर इस महीने से, पीएनजी पाइपलाइनों वाले क्षेत्रों में स्थित घरों को घरेलू एलपीजी सिलेंडर बुक करने या रिफिल करने से रोका जा रहा है. सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों और ओएमसी ने अब अपने डिजिटल डेटाबेस को पूरी तरह से यूनिफाइड कर दिया है. वहीं पीएनजी कनेक्‍शन विस्‍तार के लिए 30 जून तक समय बढ़ा दिया गया है।  गैस सिलेंडर बुकिंग के लिए डेडलाइन  आपूर्ति की कमी और दुरुपयोग को कंट्रोल करने के लिए शहरी यूजर्स के लिए एलपीजी रिफिल की लॉक-इन पीरियड 21 दिनों से बढ़ाकर 25 दिन और ग्रामीण यूजर्स के लिए 45 दिनों तक कर दी गई है।  कनेक्शन, सब्सिडी नियम परिवारों को हर साल केवल 12 रियायती घरेलू सिलेंडर ही मिलते रहेंगे. अतिरिक्त सिलेंडरों का शुल्क मार्केट वैल्‍यू के अनुसार लिया जाएगा. नया एलपीजी कनेक्शन लेने पर अब संशोधित जमा राशि और सेटअप शुल्क लागू होंगे, जिनमें रेगुलेटर, पाइप और इंस्टॉलेशन शुल्क शामिल हैं। 

खुल सकता है होर्मुज का रास्ता, तेल बाजार में खुशी की लहर; डेढ़ महीने के निचले स्तर पर पहुंचा क्रूड

नई दिल्‍ली  खुशखबरी! ईंधन का संकट जल्‍द ही खत्‍म होने वाला है. ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते की संभावना तेजी से बढ़ रही है और माना जा रहा है कि जल्‍द ही दोनों किसी नतीजे पर पहुंचने वाले हैं. समझौते की यह खुशी कच्‍चे तेल की कीमतों पर भी दिख रही है, जो शनिवार सुबह फिसलकर 6 सप्‍ताह यानी डेढ़ महीने के निचले स्‍तर पर पहुंच गया है. माना जा रहा है कि अब होर्मुज का रास्‍ता दोबारा खोला जा सकता है और ईंधन से लदे भारतीय जहाज सरपट भागने लगेंगे. इससे देश में पैदा हुआ क्रूड व गैस का संकट भी जल्‍द ही खत्‍म हो जाएगा।  ग्‍लोबल मार्केट में कच्‍चे तेल की कीमतों में आज 2 फीसदी से भी ज्‍यादा की गिरावट दिख रही है. डब्‍ल्‍यूटीआई का भाव फिसलहर 87.36 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है तो ब्रेंट क्रूड की कीमतें भी 91.12 डॉलर प्रति बैरल के भाव चल रही हैं. यह 6 सप्‍ताह का सबसे निचला स्‍तर है. अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ शांति समझौते पर अंतिम बातचीत चल रही है. हालांकि, ईरान के विदेशी मंत्री का अब भी कहना है कि कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है और दोनों देशों के बीच बातचीत लगातार जारी है. हालांकि, अमेरिका के तेवर देखकर लगता है कि वह ईरान के साथ न्‍यूक्लियर मुद्दे पर दोबारा नए सिरे से बातचीत शुरू कर सकता है।  फिर सस्‍ता हो जाएगा क्रूड ग्‍लोबल एनर्जी एजेंसियों का कहना है कि होर्मुज के रास्‍ते में सैकड़ों जहाज खड़े-खड़े इंतजार कर रहे हैं. इस पर ईरान और अमेरिका दोनों ही अपना दावा ठोक रहे हैं और किसी भी जहाज को गुजरने नहीं दे रहे. अगर दोनों में समझौता होता है और होर्मुज से दोबारा कारोबार शुरू होता है तो जल्‍द ही कच्‍चे तेल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे जा सकती हैं. फिलहाल इस गतिरोध की वजह से ग्‍लोबल मार्केट में क्रूड का भंडार करीब 2 करोड़ बैरल नीचे आ चुका है. विश्‍व बैंक, आईएमएफ सहित तमाम ग्‍लोबल एजेंसियों ने भी चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज संकट लंबा खिंचा तो गर्मी के महीने में ईंधन का संकट गहरा सकता है।  भारत को सबसे बड़ी राहत होर्मुज जलडमरूमध्‍य का रास्‍ता खुलता है तो सबसे ज्‍यादा लाभ भारत को होगा. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्‍सा ईंधन इसी रास्‍ते से मंगाता है. जहाजरानी मंत्रालय में निदेशक ओपेश कुमार शर्मा का कहना है कि भारत के लिए होर्मुज कितना महत्‍वपूर्ण इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हम अपनी कुल जरूरत का करीब 30 फीसदी क्रूड ऑयल इसी रास्‍ते से मंगाते हैं. इतना ही नहीं, कुल एलपीजी आयात का 70 फीसदी भी इसी रास्‍ते से आता है. लिहाजा अगर शांति वार्ता कामयाब होती है और होर्मुज खुलता है तो भारतीय जहाजों के लिए यह सबसे बड़ी राहत होगी।  होर्मुज में अभी हमारे कितने जहाज ओपेश शर्मा का कहना है कि होर्मुज से अभी भारतीय झंडे वाले 13 जहाजों को ऑपरेट किया जा रहा है. इसमें एक एलपीजी टैंकर से लदा जहाज है, जबकि 5 जहाजों पर कच्‍चे तेल के टैंकर लदे हुए हैं. एक शिप रसायनों से भरा है, जिसका इस्‍तेमाल यूरिया व अन्‍य उर्वरक बनाने में किया जाता है, जबकि 3 कंटेनर लादने वाले शिप हैं और 2 जहाज बल्‍क कैरियर जबकि एक ड्रेगर के रूप में इस रास्‍ते पर खड़ा अपनी बारी का इंतजार कर रहा है. उन्‍होंने बताया कि 2.70 लाख मीट्रिक टन कच्‍चा तेल लादे एक टैंकर निसोस केरोस ने 25-26 मई को सफलतापूर्वक होर्मुज का रास्‍ता पार कर लिया है और इसके 3 जून तक विशाखापत्‍तन बंदरगाह पर पहुंचने की संभावना है। 

केंद्र सरकार के 12 साल पर भाजपा का बड़ा प्लान, देशभर में जनता तक पहुंचाएगी उपलब्धियां

नई दिल्ली  भारतीय जनता पार्टी केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने के मौके पर देशभर में व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाएगी. इस अभियान का थीम 'विश्वास, विकास और जनकल्याण के 12 वर्ष' है, जो 5 जून से 21 जून 2026 तक चलेगा।  पार्टी इसे अपने सबसे महत्वाकांक्षी आउटरीच कार्यक्रमों में से एक बता रही है. भाजपा के शीर्ष सूत्रों के मुताबिक, अभियान के दौरान जनसंपर्क अभियान, जनकल्याण शिविर, योग दिवस समारोह और पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रमों पर विशेष जोर दिया जाएगा. इन कार्यक्रमों के जरिए सरकार की प्रमुख योजनाओं और उपलब्धियों को आम जनता तक पहुंचाने का पार्टी लक्ष्य रख रही है।  इस अभियान के तहत कार्यकर्ता घर-घर जाकर योजनाओं की जानकारी देंगे. इसके तहत पार्टी जनकल्याण शिविर स्वास्थ्य, बीमा, पेंशन और अन्य कल्याणकारी सेवाओं के लिए शिविर लगाएगी. इसके अलावा इसी दौरान योग दिवस यानी 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर बड़े आयोजन भी किए जाएंगे।  इसके अलावा,पर्यावरण संरक्षण के लिए पौधरोपण और स्वच्छता अभियान भी चलाया जाएगा. पार्टी ने सभी राज्यों में कार्यक्रमों के लिए विस्तृत रोडमैप तैयार किया है. केंद्रीय मंत्री, सांसद और विधायक मैदान में उतरकर जनता से सीधा संवाद करेंगे।  भाजपा इस अभियान में मोदी सरकार की प्रमुख उपलब्धियों को हाइलाइट करेगी, जिनमें मुख्य रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार, जिसके तहत राष्ट्रीय राजमार्गों में 60 फीसदी वृद्धि, 1.46 लाख किमी तक पहुंच शामिल है. साथ ही पार्टी का दावा है कि पिछले 12 साल में मोदी सरकार में अर्थव्यवस्था दोगुनी हो गई है जिसके तहत , अर्थव्यवस्था 2 ट्रिलियन डॉलर से 4 ट्रिलियन डॉलर के पार हो गई है,इसके अलावा डिजिटल इंडिया ,UPI की वैश्विक नेतृत्व, आधार का व्यापक उपयोग जैसे बातों को भी जन जन तक पहुंचाने की बात है।  इसके अलावा पार्टी कल्याणकारी योजनाओं जिनमें उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, पीएम किसान, जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत आदि को भी जन जन तक पहुंचाएगी पार्टी का दावा है कि ये 12 साल देश के 'प्रगति' की ओर बढ़ने के रहे हैं. यह अभियान ऐसे समय में शुरू हो रहा है जब हाल ही में राज्य चुनावों में पार्टी ने मजबूत प्रदर्शन किया है।  अप्रैल में पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में भाजपा की बड़ी जीत ने पार्टी के नेताओं का भी काफी मनोबल बढ़ाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में सरकार विकास एजेंडे पर जोर दे रही है. 9 जून को तीसरे कार्यकाल की पूर्णता पर भी विशेष कार्यक्रमों की तैयारी है।  विपक्षी दल इस अभियान को चुनावी रणनीति बता रहे हैं, जबकि भाजपा इसे शासन की उपलब्धियों का सच्चा आकलन करार दे रही है. भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय नेतृत्व ने सभी प्रदेश इकाइयों को सक्रिय रहने के निर्देश दिए हैं।  पार्टी सूत्रों के मुताबिक, यह अभियान 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम भी बनेगा. देशभर के करोड़ों लाभार्थी इस अभियान के माध्यम से अपनी यात्रा की कहानियां भी साझा करेंगे। 

10 जून की मुख्यमंत्री परिषद बैठक से पहले बड़ा संकेत, मोदी सरकार में हो सकता है फेरबदल

नई दिल्ली मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के पहले विस्तार की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। नौ जून को इस कार्यकाल के दो साल पूरा होने और 10 जून को राजगशासित दलों के मुख्यमंत्री परिषद की बैठक के बाद पहला मंत्रिमंडल विस्तार होगा, उसके बाद भाजपा के केंद्रीय संगठन की नई टीम बनेगी। हाल ही में दिल्ली के अध्यक्ष बनाए गए हर्ष मल्होत्रा और चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पंकज चौधरी संगठन पर पूरा ध्यान केंद्रित करने के लिए मंत्री पद से इस्तीफा देंगे। सूत्रों ने बताया कि विस्तार के साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम पर साथ-साथ मंथन हो रहा है। संकेत हैं कि मुख्यमंत्री परिषद की बैठक के बाद 20 जून से पहले मंत्रिमंडल विस्तार को अमली जामा पहनाया जाएगा, इसके तत्काल बाद केंद्रीय संगठन की नई टीम घोषित कर दी जाएगी। संगठन को मजबूत करने के लिए मंत्रियों के इस्तीफे संभव राजनीतिक गलियारों से आ रही खबरों के मुताबिक, हाल ही में दिल्ली प्रदेश इकाई की कमान संभालने वाले हर्ष मल्होत्रा और आगामी विधानसभा चुनाव वाले राज्य उत्तर प्रदेश के संगठन प्रमुख पंकज चौधरी संगठनात्मक कार्यों पर अपना पूरा ध्यान लगाने के लिए जल्द ही केंद्रीय मंत्री पद से त्यागपत्र दे सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि मंत्रिमंडल में नए चेहरों को शामिल करने के साथ-साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई सांगठनिक टीम के गठन पर भी शीर्ष नेतृत्व में गहन विचार-विमर्श चल रहा है। संभावना जताई जा रही है कि मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद 20 जून से पहले इस कैबिनेट विस्तार को अंतिम रूप दे दिया जाएगा, जिसके तुरंत बाद राष्ट्रीय संगठन के नए पदाधिकारियों की सूची भी जारी कर दी जाएगी। आगामी विधानसभा और आम चुनावों को देखते हुए गहन मंथन इस बार सरकार और संगठन दोनों के स्तर पर बनने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई टीम में आगामी लोकसभा चुनाव तक किसी बड़े बदलाव की गुंजाइश नहीं होगी। इसके अलावा, भारतीय जनता पार्टी को अगले वर्ष के शुरुआती महीनों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावी दंगल में उतरना है, जबकि साल के अंत में गुजरात और मणिपुर जैसे राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसी स्थिति में सरकार और संगठन की नई टीमों के जरिए देश के सभी भौगोलिक क्षेत्रों और सामाजिक समीकरणों के बीच एक सटीक संतुलन साधना बेहद जरूरी है, यही वजह है कि दोनों सूचियों को अंतिम रूप देने से पहले शीर्ष स्तर पर काफी बारीकी से समीक्षा की जा रही है। ​हर्ष मल्होत्रा और पंकज चौधरी देंगे मंत्री पद से इस्तीफा ! इस बड़े फेरबदल और विस्तार के बीच सरकार के 2 कद्दावर मंत्रियों के इस्तीफे की खबर सबसे ज्यादा चर्चा में है। हाल ही में दिल्ली बीजेपी का अध्यक्ष बनाए गए हर्ष मल्होत्रा और उत्तर प्रदेश बीजेपी के नवनियुक्त अध्यक्ष पंकज चौधरी जल्द ही केंद्रीय मंत्री पद से अपना आधिकारिक इस्तीफा सौंपेंगे। पार्टी सूत्रों का कहना है कि 'एक व्यक्ति एक पद' के सिद्धांत के तहत इन दोनों नेताओं को पूरी तरह से चुनावी राज्यों और संगठन के काम पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया है। इन दोनों इस्तीफों के बाद खाली हो रहे पदों और नए मंत्रियों को शामिल करने को लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के साथ मंथन का दौर अंतिम चरण में पहुंच गया है। ​आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए साधा जाएगा सामाजिक संतुलन  बीजेपी के केंद्रीय संगठन और मंत्रिमंडल में होने जा रही इस बड़ी माथापच्ची के पीछे का मुख्य कारण आगामी राज्यों के चुनाव हैं। पार्टी को अगले साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गुजरात और मणिपुर जैसे रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनावों का सामना करना है। इसके अतिरिक्त हाल ही में संपन्न हुए 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद बंगाल, असम, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों ने दिल्ली में हाजिरी लगाई है। सरकार और संगठन की इस नई टीम के जरिए इन सभी राज्यों में क्षेत्रीय, सामाजिक और जातीय समीकरणों को पूरी तरह दुरुस्त करने का खाका खींचा गया है, ताकि आगामी आम चुनावों तक टीम में बार-बार बदलाव की जरूरत न पड़े। शीर्ष नेतृत्व और मुख्यमंत्रियों के बीच बैठकों का दौर जारी सत्ता और संगठन को नया रूप देने के लिए ही हालिया पांच राज्यों के चुनावी परिणाम घोषित होने के बाद से विभिन्न प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों की केंद्रीय आलाकमान के साथ ताबड़तोड़ बैठकें हो रही हैं। नतीजों के सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल, असम, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों ने देश की राजधानी पहुंचकर केंद्रीय नेताओं से संवाद किया है। इसके साथ ही, खुद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी लगातार राज्यों के दौरों पर हैं, जहां वे ओडिशा और कर्नाटक के संगठनात्मक दौरों को पूरा करने के बाद अब उत्तराखंड के प्रवास पर रणनीति बनाने में जुटे हैं। इसलिए ज्यादा माथापच्ची केंद्रीय संगठन की नई टीम और मंत्रिमंडल विस्तार से बनने वाली पीएम मोदी की नई टीम में आगामी आम चुनाव तक कोई बदलाव नहीं होना है। इसके अतिरिक्त पार्टी को अगले साल की शुरुआत में यूपी, उत्तराखंड, पंजाब और अंत में गुजरात और मणिपुर जैसे अहम राज्यों में विधानसभा चुनाव का सामना करना है। ऐसे में सरकार की नई टीम के जरिए सभी राज्यों से संतुलन बैठाना होगा। यही कारण है कि दोनों ही सूची के लिए गहन माथापच्ची हो रही है। मुख्यमंत्रियों के साथ ताबड़तोड़ बैठक दोनों स्तर पर नई टीम पर विचारविमर्श के लिए ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों की केंद्रीय नेतृत्व के साथ बैठक हुई है। नतीजे के बाद बंगाल, असम, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों ने दिल्ली में हाजिरी लगाई है। खुद पार्टी अध्यक्ष ओडिशा, कर्नाटक के बाद अब उत्तराखंड के दौरे पर हैं। 

मंदिरों में VIP दर्शन को लेकर हाई कोर्ट के तीखे सवाल, आम श्रद्धालुओं के अधिकार पर चर्चा

चेन्नई मद्रास हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए बीते  पूछा कि भगवान के सामने तो सभी लोग समान होते हैं तो मंदिरों में VIP दर्शन जैसी व्यवस्था क्यों होनी चाहिए। इसकी वजह से आम श्रद्धालुओं को मंदिर के बाहर इंतजार करना पड़ता है। दरअसल, जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की बेंच मंदिरों में वीआईपी दर्शन और स्पेशल दर्शन व्यवस्था को खत्म करने की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई कर रही थी, तब उन्होंने यह टिप्पणी की। 'मंदिर में मंत्रियों की प्रतीक्षा नहीं कर रहे भगवान' सुनवाई के दौरान, मद्रास हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा, 'मंत्रियों और विधायकों को यह ना समझने दें कि वे किसी भी वक्त मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं और भगवान उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। VIP दर्शन की जरूरत ही क्या है? भगवान के सामने सभी समान हैं।' याचिका में की गई VIP दर्शन को खत्म करने की मांग लाइव लॉ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस याचिका में वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांगजन, मंदिर कला से जुड़े कलाकार, नवविवाहित जोड़े, राज्य के प्रमुख, संवैधानिक पदाधिकारी और गर्भवती महिलाओं को छोड़कर बाकी लोगों के लिए VIP दर्शन और विशेष दर्शन व्यवस्था को खत्म करने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान, मद्रास हाईकोर्ट ने पहले यह भी पूछा था कि क्या 15 मई को किसी मंत्री के दर्शन के लिए तिरुपरंकुंद्रम सुब्रमण्यस्वामी मंदिर के बंद होने का वक्त बढ़ाया गया था। 6 हफ्ते बाद होगी मामले की अगली सुनवाई इस पर एडिशनल एडवोकेट जनरल पी. वी. बालासुब्रमण्यम ने बेंच को बताया कि मंदिर के बंद होने के वक्त में कोई बदलाव नहीं किया गया था। इस संबंध में एक रिपोर्ट भी हाईकोर्ट के समक्ष पेश की गई है। फिर, पी. वी. बालासुब्रमण्यम ने बेंच से जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए वक्त मांगा। मद्रास हाईकोर्ट ने इस अपील को स्वीकार करते हुए केस की अगली सुनवाई 6 हफ्ते के लिए स्थगित कर दी। VHP के पदाधिकारी ने दाखिल की है याचिका जान लें कि यह याचिका, मद्रास हाईकोर्ट में विश्व हिंदू परिषद की उत्तर तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष पी. चोक्कलिंगम ने दाखिल की है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 6(15)(b) के अंतर्गत उनकी अर्जी विचार योग्य है। सनातन धर्म नहीं सिखाता भेदभाव पी. चोक्कलिंगम ने अपनी याचिका में कहा कि सनातन धर्म, जाति, आर्थिक संपन्नता या सामाजिक हैसियत के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है। उन्होंने तर्क दिया कि सनातन धर्म सभी मनुष्यों को एक बराबर मानने की शिक्षा देता है, इसलिए मंदिरों के अंदर वीआईपी और आम श्रद्धालु या अमीर और गरीब के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। क्या है पूरा मामला? दरअसल, यह पूरा विवाद हाल ही में विजय सरकार में मंत्री बने आर निर्मल कुमार के दौरे को लेकर है। उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने दर्शन के लिए तिरुपरनकुंड्रम स्थित सुब्रमण्य स्वामी मंदिर को बंद करवा दिया था। इसके बाद जब उन्होंने दर्शन कर लिए उसके बाद मंदिर खोला गया। विपक्ष के इन आरोपों को विजय सरकार ने खारिज किया है। मद्रास हाई कोर्ट में यह मामला विश्व हिंदू परिषद तमिलनाडु ईकाई के नेता पी, चोकलिंगम की याचिका पर शुरू हुआ। उन्होंने दावा किया कि निर्मल कुमार की तरह ही कई बार मंत्री और विधायक मंदिरों में वीआईपी दर्शन के लिए जाते हैं, जिसकी वजह से आम जनता को काफी परेशानी होती है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में धन, सामाजिक स्थिति या जाति के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता है और सभी भक्तों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। हालांकि, चोकलिंगम ने अपनी याचिका में वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों, गर्भवती महिलाओं, नवविवाहित जोड़ों, मंदिर में सेवा करने वाले कलाकारों, राष्ट्राध्यक्षों और संवैधानिक अधिकारियों सहित कुछ श्रेणियों के लिए छूट की मांग की।

31,554 करोड़ रुपये के टर्नओवर के साथ एनएमडीसी का अब तक का सर्वश्रेष्ठ वित्तीय प्रदर्शन

हैदराबाद      सरकार के स्वामित्व वाली लौह अयस्क की प्रमुख कंपनी एनएमडीसी ने अब तक के सबसे मजबूत परिचालन और वित्तीय प्रदर्शन के साथ वित्त वर्ष 26 को समाप्त किया। उत्पादन में मजबूत वृद्धि और अनुशासित निष्पादन ने कंपनी को प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करने में मदद की। वित्त वर्ष 26 में लौह अयस्क उत्पादन 21% बढ़कर 53.16 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया और बिक्री 13% बढ़कर 50.24 मिलियन टन हो गई, जिससे एनएमडीसी ने  अपने इतिहास में अब तक की सबसे अधिक वार्षिक मात्रा दर्ज की। ये दोनों मील के पत्थर घरेलू इस्पात की सुदृढ़ मांग और भारत के सबसे बड़े लौह अयस्क उत्पादक की बढ़ती क्षमताओं दोनों का संकेत देते हैं।  उत्पादन और प्रेषण में वृद्धि ने सीधे एनएमडीसी के वित्तीय प्रदर्शन को बढ़ावा दिया, जिससे वित्त वर्ष 26 में टर्न ओवर 33% बढ़कर अब तक के उच्चतम स्तर 31,554 करोड़ रुपए पर पहुंच गया। । ईबीआईटीडीए 9% बढ़कर रु. 10,737 करोड़ हो गया जबकि कर पूर्व लाभ 9% बढ़कर रु. 10,155 करोड़ और निवल लाभ 11% बढ़कर रु. 7,421 करोड़.हो गया।  एनएमडीसी ने वित्त वर्ष 26 में 3,690 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय किया साथ ही शेयरधारक रिटर्न को सुदृढ़ बनाए रखा। बोर्ड ने शेयरधारक अनुमोदन के अधीन, 1 रुपये प्रति शेयर के अंतिम लाभांश की सिफारिश की। साथ ही वित्त वर्ष26 के लिए प्रति इक्विटी शेयर रु. 2.5 के अंतरिम लाभांश घोषित किया। इस प्रकार वर्ष के लिए कुल लाभांश की राशि रु. 3,077 करोड़ होती है।. एनएमडीसी ने उत्पादन, बिक्री और वित्तीय मेट्रिक्स में व्यापक आधार पर वृद्धि के साथ चौथी तिमाही के उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ वित्त वर्ष 26 को एक मजबूत स्थिति में समाप्त किया। लौह अयस्क का उत्पादन वर्ष -दर-वर्ष 22% बढ़कर 16.27 मिलियन टन हो गया, जबकि बिक्री 21% बढ़कर 15.30 मिलियन टन हो गई। मात्रा में मजबूत वृद्धि ने वित्तीय प्रदर्शन में तेजी से वृद्धि की, जिसमें टर्न ओवर 61% बढ़कर रु. 11,173 करोड़ हो गया। कर पूर्व लाभ 22% बढ़कर रु. हो गया। 2,875 करोड़, जबकि कर पश्चात लाभ 35% बढ़कर रु. 2,020 करोड़ रुपये हो गया। इसे बेहतर प्राप्ति और स्थिर परिचालन दक्षता द्वारा समर्थन मिला। ईबीआईटीडीए 21% बढ़कर रु. 3,072 करोड़ हो गया।  तिमाही के प्रदर्शन ने इस सेक्टर क्षेत्र में एनएमडीसी के प्रभुत्व को और मजबूत किया।   एनएमडीसी के सीएमडी  अमिताभ मुखर्जी ने कहा, “रिकॉर्ड उत्पादन, टॉप लाइन में वृद्धि, रणनीतिक पूंजी नियोजन और सभी क्षेत्रों में मजबूत वित्तीय मेट्रिक्स के साथ, एनएमडीसी ने वित्त वर्ष 26 को एक ऐसी गति के साथ बंद किया जो हमें भारत के बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में एक विशिष्ट उच्च स्थान में रखता है। हम इस मात्रात्मक वृद्धि को बनाए रखने, परिसंपत्ति उत्पादकता बढ़ाने और भविष्य के लिए तैयार खनन क्षमता का निर्माण करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।“    यह प्रदर्शन कंपनी के भीतर चल रहे परिवर्तन को दर्शाता है, जो मुख्य रूप से उच्च-नकदी-प्रवाह खनन पीएसयू से एक बड़े पैमाने वाले, पूंजी-गहन संसाधन उद्यम के रूप में उभर रहा है, जिसमें परिचालन और वित्तीय पैमाना बढ़ रहा है। वृद्धि , नकदी प्रवाह और क्षमता एनएमडीसी के वित्त वर्ष 26 रिकॉर्ड प्रदर्शन को परिभाषित करते हैं – टॉपलाइन में 33% की वृद्धि, आउटपुट में 21% की वृद्धि वि.व. 26    वि.व.25    वृद्धि     4थी तिमाही वि.व.26    4थी तिमाही वि.व.25    वृद्धि उत्पादन    53.16    44.07    21%    16.27    13.31    22% बिक्री    50.24    44.40    13%    15.30    12.67    21% टर्नओवर    31,554    23,668    33%    11,173    6,953    61% पीबीटी    10,155    9,296    9%    2,875    2,351    22% पी ए टी    7,421    6,693    11%    2,020    1,496    35% ईबीआईटीडीए    10,737    9,847    9%    3,072    2,538    21% उत्पादन और बिक्री मिलियन टन में, और वित्तीय आंकड़े करोड़ रुपये में

आर्मी चीफ का बड़ा बयान, बोले- ऑपरेशन सिंदूर ने दिखा दिया भारत क्या कर सकता है

नई दिल्ली आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने शनिवार को कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह तय कर दिया है कि उकसावे पर भारत किस तरह जवाब देता है। उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के पासिंग आउट कैडेटों से अपील की कि वे अपने सैन्य करियर की शुरुआत करते हुए इस उच्च मानक को हमेशा बनाए रखें। पुणे के खडकवासला स्थित त्रि-सेवा अकादमी परिसर में एनडीए के 150वें कोर्स की पासिंग आउट परेड को संबोधित करते हुए जनरल द्विवेदी ने आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप और एकीकृत सैन्य प्रतिक्रिया के महत्व पर प्रकाश डाला। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने कहा, "आज के समय में खतरे हमेशा वर्दी में या किसी घोषित मोर्चे पर नहीं आते। ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित किया और एक बेंचमार्क स्थापित किया कि जब राष्ट्रीय इच्छाशक्ति को सटीकता और संकल्प के साथ व्यक्त किया जाता है तो भारत उकसावे का कैसा जवाब देता है। अब इस मानक को बनाए रखने की जिम्मेदारी आपकी है।" तीनों सेनाओं के तालमेल पर दिया जोर सेना प्रमुख ने तीनों सेनाओं थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बीच आपसी तालमेल और एकजुटता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता उसी एकीकृत दृष्टिकोण का परिणाम थी, जिसकी नींव एनडीए में रखी जाती है। उन्होंने कैडेट्स से कहा, "ऑपरेशन सिंदूर में आपने जो एकीकृत प्रतिक्रिया देखी, वह ठीक उसी नींव पर बनी थी जो एनडीए तैयार करता है। यहां संयुक्तता केवल पढ़ने का विषय नहीं है, बल्कि पहले दिन से ही तीनों सेनाओं के सैनिकों के साथ मिलकर जीने की एक प्रवृत्ति है।" 42 साल बाद अकादमी लौटे सेना प्रमुख जनरल द्विवेदी ने खेत्रपाल परेड ग्राउंड में परेड की समीक्षा की, जहां 355 कैडेटों को भारतीय सशस्त्र बलों में शामिल किया गया। इस पासिंग आउट बैच में 12 मित्र विदेशी देशों के 24 कैडेट भी शामिल थे। अपने पुराने दिनों को याद करते हुए सेना प्रमुख भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि यह अवसर उनके लिए बेहद खास है क्योंकि चार दशक से भी पहले वह खुद इसी अकादमी से पास आउट हुए थे। आपको बता दें कि जनरल उपेंद्र द्विवेदी एनडीए के 65वें कोर्स के छात्र और चार्ली स्क्वाड्रन के कैडेट रह चुके हैं। उन्होंने कहा, "42 साल से अधिक समय पहले मैं इसी क्वार्टर डेक से पास आउट हुआ था। आज समीक्षा अधिकारी के रूप में अपनी मातृ संस्था में लौटना मेरे लिए गर्व की बात है। इसी संस्थान ने मेरे मूल्यों, नेतृत्व और राष्ट्र सेवा के प्रति प्रतिबद्धता को आकार दिया है।"

सीमा सुरक्षा पर बड़ा सवाल! 600 किमी का डार्क जोन बना घुसपैठ का नया कॉरिडोर

 नई दिल्ली भारत और बांग्लादेश के बीच की सीमा दुनिया की सबसे लंबी और जटिल सीमाओं में से एक है. कुल 4,096 किलोमीटर लंबी इस सीमा पर लगभग 600 किलोमीटर का इलाका अभी भी डार्क जोन बना हुआ है. इन इलाकों में पर्याप्त बाड़बंदी नहीं है. रोशनी कम है. मोबाइल नेटवर्क कमजोर है. इलाका नदियों, दलदल और घने इलाकों से भरा है. यही जगह घुसपैठियों, तस्करों और अन्य संदिग्ध तत्वों के लिए आसान प्रवेश द्वार बन गई है।  1947 के विभाजन के समय रेडक्लिफ लाइन से बनी यह सीमा 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद तय हुई.  सीमा का ज्यादातर हिस्सा घनी आबादी वाले इलाकों, खेतों, नदियों और गांवों से गुजरता है. दोनों तरफ परिवार बंटे हुए हैं. रोजमर्रा की जिंदगी में लोग सीमा पार करते हैं. इससे सीमा पूरी तरह बंद करना मुश्किल हो जाता है. पहले चिटमहल (एन्क्लेव) की समस्या थी, जिसे 2015 के लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट से ज्यादातर सुलझा लिया गया. लेकिन अब भी सुरक्षा की चुनौतियां बनी हुई हैं।  600 किलोमीटर डार्क जोन कहां है? यह डार्क जोन मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में है. राज्य की कुल 2,217 किलोमीटर सीमा में से करीब 1,600 किलोमीटर पर बाड़ लग चुकी है, लेकिन लगभग 600 किलोमीटर अभी बिना बाड़ का है।  क्या है यह 600 किलोमीटर का 'डार्क जोन' और यह कहां स्थित है? भारत-बांग्लादेश सीमा पांच भारतीय राज्यों से होकर गुजरती है…     पश्चिम बंगाल: 2,217 किलोमीटर (सबसे लंबी सीमा)     त्रिपुरा: 856 किलोमीटर     मेघालय: 443 किलोमीटर     असम: 262 किलोमीटर     मिजोरम: 318 किलोमीटर यह 600 किलोमीटर का डार्क जोन मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में फैला हुआ है. पश्चिम बंगाल की 2217 किमी लंबी सीमा में से लगभग 1600 किमी पर किसी न किसी रूप में बाड़ लगाई जा चुकी है, लेकिन लगभग 550 से 600 किलोमीटर का हिस्सा अभी भी पूरी तरह से खुला या असुरक्षित है।  यह डार्क जोन विशेष रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों और जिलों में मौजूद है…      मुर्शिदाबाद और मालदा: इन जिलों में गंगा और पद्मा जैसी नदियां बहती हैं. नदी के बहाव के कारण यहां जमीन स्थिर नहीं रहती, जिससे पक्की बाड़ लगाना असंभव हो जाता है।      उत्तर और दक्षिण 24 परगना: सुंदरबन का दलदली इलाका और इछामती जैसी इकरूखी नदियां इस क्षेत्र को बेहद संवेदनशील बनाती हैं।      कूचबिहार और जलपाईगुड़ी: उत्तरी बंगाल के इन जिलों में कई ऐसे गांव हैं जो ठीक जीरो लाइन (अंतर्राष्ट्रीय सीमा) पर बसे हैं, जहां बाड़ लगाने के लिए जमीन का अधिग्रहण करना एक बड़ी चुनौती रहा है।  इसे 'डार्क जोन' क्यों कहा जाता है? इसे डार्क जोन कहने के पीछे केवल रात का अंधेरा ही एकमात्र कारण नहीं है. इसके कई तकनीकी और भौगोलिक कारण हैं…      नदी तटीय क्षेत्र (Riverine Terrain): जब नदियां अपना रास्ता बदलती हैं, तो पहले से लगाई गई बाड़ बह जाती है. पानी के बीच में खंभे गाड़ना व्यावहारिक नहीं होता।      खराब मोबाइल और संचार नेटवर्क: इन सुदूर इलाकों में भारतीय टेलीकॉम कंपनियों के सिग्नल बेहद कमजोर या न के बराबर हैं, जिससे सुरक्षा बलों को समय पर खुफिया जानकारी साझा करने में दिक्कत आती है।      फ्लडलाइट्स की कमी: कई दुर्गम और दलदली पैच ऐसे हैं जहां बिजली के खंभे और हाई-मास्ट फ्लडलाइट्स लगाना तकनीकी रूप से संभव नहीं हो पाया है।      सघन आबादी (Zero Line Villages): कई जगहों पर अंतरराष्ट्रीय सीमा लोगों के घरों के पीछे के आंगन या खेतों से होकर गुजरती है. ऐसे में यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि कौन स्थानीय नागरिक है. कौन घुसपैठिया।  नदियों और दलदलों वाले करीब 175 किलोमीटर इलाके में पारंपरिक बाड़ लगाना लगभग नामुमकिन है. यही जगह घुसपैठ और तस्करी के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है।  वहां किस तरह की घुसपैठ होती है? डार्क जोन से कई तरह की अनधिकृत गतिविधियां होती हैं…     अवैध प्रवासन (Illegal Migration): आर्थिक मजबूरियों या अन्य कारणों से लोग रात के अंधेरे में घुसते हैं. वे पश्चिम बंगाल, असम आदि में बस जाते हैं. जाली दस्तावेज बनवा लेते हैं।      तस्करी (Smuggling): सबसे बड़ा कारोबार. भारत से बांग्लादेश में गाय तस्करी, फेक इंडियन करेंसी (FICN), ड्रग्स (याबा, फेंसिडिल), सोना और हथियार. नदी वाले इलाकों में नावों से रात में तस्करी आसान होती है।      मानव तस्करी: महिलाओं और बच्चों को मजदूरी, जबरन शादी या शोषण के लिए ले जाया जाता है।      सुरक्षा खतरे: कभी-कभी चरमपंथी तत्व, जासूस या अपराधी भी घुसते हैं. डेमोग्राफिक चेंज और कट्टरपंथ की आशंका बढ़ रही है।      छोटी-मोटी घटनाएं: चोरी, अवैध व्यापार आदि. BSF हर साल हजारों प्रयासों को नाकाम करता है, लेकिन कुछ सफल हो जाते हैं. हाल के वर्षों में प्रयास बढ़े हैं।  भारत की तरफ: सीमा सुरक्षा बल (BSF) भारत की ओर से इस सीमा की रक्षा की जिम्मेदारी बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) के कंधों पर है. BSF के जवान इस डार्क जोन में निम्नलिखित रणनीतियों के तहत काम करते हैं…  चौबीसों घंटे पेट्रोलिंग: पैदल गश्त के साथ-साथ नदी वाले इलाकों में BSF 'वाटर विंग' की स्पीड बोट और फ्लोटिंग बॉर्डर आउटपोस्ट्स (Floating BOPs) के जरिए गश्त करती है।  तकनीकी समाधान (Smart Fencing): जहां पारंपरिक कंटीली बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहां BSF अब Comprehensive Integrated Border Management System (CIBMS) का उपयोग कर रही है. इसमें लेजर दीवारें (Laser Walls), थर्मल इमेजर, अंडरवाटर सेंसर और इंफ्रा-रेड कैमरे शामिल हैं, जो अंधेरे या कोहरे में भी हलचल को पकड़ लेते हैं।  ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम: आसमान से निगरानी रखने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ाया गया है. साथ ही, सीमा पार से आने वाले संदिग्ध ड्रोनों को मार गिराने के लिए एंटी-ड्रोन तकनीक भी तैनात की जा रही है।  स्थानीय प्रशासन से समन्वय: सीमा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाओं को तेज किया है, ताकि BSF को नई चौकियां (BOPs) बनाने और बचे हुए हिस्सों में बाड़ लगाने के लिए जमीन मिल सके।  बांग्लादेश: बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) बांग्लादेश की ओर से सीमा की निगरानी बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) (जिसे पहले बांग्लादेश राइफल्स या BDR कहा जाता था) करती है। बांग्लादेश: बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश … Read more

गर्मी से राहत लेने निकले लोग, मनाली से चारधाम तक सड़कों पर रेंगती दिखीं गाड़ियां

 मनाली/नैनीताल/चमोली उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में पड़ रही भीषण गर्मी ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है. कई शहरों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है. ऐसे में गर्मी से राहत पाने के लिए लाखों लोग पहाड़ों की ओर रुख कर रहे हैं. हिमाचल प्रदेश के मनाली और रोहतांग से लेकर उत्तराखंड के नैनीताल, बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब, औली और जोशीमठ तक इस समय पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की रिकॉर्ड भीड़ देखने को मिल रही है।  पहाड़ों में मौसम सुहावना है, कहीं हल्की बारिश हो रही है तो कहीं बर्फबारी के नजारे देखने को मिल रहे हैं. यही वजह है कि लोग लंबा सफर और घंटों का ट्रैफिक जाम झेलने के बावजूद पहाड़ों का रुख कर रहे हैं. हालांकि बढ़ती भीड़ अब प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है. कई पर्यटन स्थलों पर होटल हाउसफुल हैं, पार्किंग की जगह कम पड़ रही है और सड़कों पर कई किलोमीटर लंबे जाम लग रहे हैं।  मनाली-रोहतांग मार्ग पर थमी रफ्तार हिमाचल प्रदेश के मनाली और रोहतांग दर्रे में इन दिनों पर्यटकों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। मई का महीना खत्म होने के बावजूद रोहतांग में बर्फ मौजूद है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। भीड़ का असर सड़कों पर साफ दिखाई दे रहा है। कई किलोमीटर लंबा जाम लगने से लोगों को घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है। सामान्य दिनों में करीब 50 किलोमीटर का सफर आसानी से पूरा हो जाता है, लेकिन इन दिनों यही दूरी तय करने में 7 से 8 घंटे लग रहे हैं। कोलकाता से आए पर्यटक एस. मित्रा ने बताया कि रास्ते में कई घंटे जाम में फंसे रहना पड़ा। उन्होंने कहा कि प्रशासन को ट्रैफिक व्यवस्था और मजबूत करनी चाहिए, क्योंकि कुछ वाहन चालक नियमों का पालन नहीं करते, जिससे जाम और बढ़ जाता है। स्थानीय पर्यटन कारोबारी हीरालाल का कहना है कि पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण लोग सड़क किनारे वाहन खड़े कर देते हैं। इससे ट्रैफिक प्रभावित होता है और जाम की स्थिति गंभीर हो जाती है। नैनीताल में पर्यटकों की रिकॉर्ड भीड़ उत्तराखंड के नैनीताल में भी इस समय पर्यटकों की भारी भीड़ है। वीकेंड के दौरान शहर के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। माल रोड, स्नो व्यू, केव गार्डन और चिड़ियाघर जैसे स्थानों पर दिनभर चहल-पहल बनी हुई है। नैनी झील में बोटिंग के लिए लोगों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ रहा है। सुबह से शाम तक झील के आसपास पर्यटकों की भीड़ बनी रहती है। ठंडी हवाएं और सुहावना मौसम लोगों को आकर्षित कर रहा है। इसका फायदा स्थानीय कारोबार को भी मिल रहा है। होटल, होमस्टे, गेस्ट हाउस और रेस्टोरेंट लगभग पूरी क्षमता के साथ संचालित हो रहे हैं। होटल व्यवसायियों का कहना है कि लंबे समय बाद पर्यटन कारोबार में ऐसी रौनक देखने को मिल रही है। हालांकि बढ़ती भीड़ के कारण शहर की सड़कों पर लगातार जाम की स्थिति बनी हुई है। कई लोगों को शहर में प्रवेश करने और बाहर निकलने में काफी समय लग रहा है। कैंचीधाम में भी बढ़ रही श्रद्धालुओं की संख्या बाबा नीम करौली महाराज के प्रसिद्ध कैंचीधाम में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। देश के अलग-अलग राज्यों के अलावा विदेशों से भी लोग यहां दर्शन के लिए आ रहे हैं। मंदिर परिसर और आसपास के इलाकों में लगातार भीड़ बढ़ रही है। आने वाले दिनों में स्थापना दिवस कार्यक्रम को देखते हुए श्रद्धालुओं की संख्या और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। इसे देखते हुए प्रशासन सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन पर विशेष ध्यान दे रहा है। चारधाम यात्रा मार्गों पर बढ़ा दबाव चारधाम यात्रा के चलते उत्तराखंड के चमोली जिले में भी वाहनों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। बद्रीनाथ धाम, हेमकुंड साहिब, औली और माणा-नीति घाटी जाने वाले मार्गों पर लंबी वाहन कतारें देखी जा रही हैं। जोशीमठ क्षेत्र में स्थिति सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। कई स्थानों पर 15 से 20 किलोमीटर तक लंबा जाम लग रहा है। लोगों को घंटों तक सड़कों पर इंतजार करना पड़ रहा है। प्रशासन ने ट्रैफिक नियंत्रित करने के लिए वन-वे सिस्टम लागू किया है, लेकिन यात्रियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि व्यवस्था पर लगातार दबाव बना हुआ है। बारिश और बर्फबारी भी नहीं रोक पा रही भीड़ ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम लगातार बदल रहा है। कई जगह हल्की बारिश हो रही है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अभी भी बर्फबारी देखने को मिल रही है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं और पर्यटकों का उत्साह कम नहीं हुआ है। बद्रीनाथ धाम में लाखों श्रद्धालु दर्शन कर चुके हैं। वहीं हेमकुंड साहिब जाने वाले रास्तों पर भी लोगों की अच्छी खासी भीड़ दिखाई दे रही है। कई बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे भी यात्रा का हिस्सा बन रहे हैं। यात्रियों का कहना है कि मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से बचने के लिए पहाड़ सबसे बेहतर विकल्प हैं। यही वजह है कि लोग लंबी यात्रा और जाम की परेशानी के बावजूद पहाड़ों का रुख कर रहे हैं।