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PF का सारा पैसा निकालना है? जानें स्टेप-बाय-स्टेप आसान तरीका

नई दिल्ली अगर आपकी सैलरी से भी प्रोविडेंट फंड कटता रहा है, तो बता दें कि जरूरत पड़ने पर आप अपने PF अकाउंट से सारा पैसा रिटायमेंट से पहले भी निकाल सकते हैं। ध्यान रहे कि इस तरह के विड्रॉल को फुल एंड फाइनल विड्रॉल कहा जाता हैं क्योंकि इसमें आपका PF, पेंशन और ब्याज का पैसा शामिल होता है। इस तरह के विड्रॉल को नौकरी करते हुए नहीं निकाला जा सकता। नौकरी करते हुए निकाले जाने वाले पैसे को पार्शल विड्रॉल कहते हैं। अगर आपको नौकरी छोड़े हुए दो महीने हो चुके हैं या आपको अगली नौकरी जॉइन करने में दो महीने का समय है, तो आप नीचे बताए जा रहे प्रोसेस के जरिए अपने PF अकाउंट में मौजूद सारा पैसा निकाल सकते हैं। ऐसे निकालें PF से सारा पैसा     अपने PF अकाउंट से सारा पैसा निकालने के लिए आपको सबसे पहले आपको EPFO की ऑफीशियल साइट पर जाना होगा और अपने UAN नंबर और पासवर्ड की मदद से अपने अकाउंट में लॉग-इन करना होगा।     लॉग इन करने के बाद आपको डैश बोर्ड पर दिख रहे Online Services के ऑप्शन पर क्लिक करके Claims ऑप्शन पर क्लिक करना होगा।     इसके बाद आपके सामने एक फॉर्म खुल जाएगा। जहां कुछ फील्ड्स पहले से भरी हुई होंगी और कुछ फील्ड्स में आपको अपनी डिटेल्स भरनी होंगी।     इस फॉर्म पर आपको अपना बैंक अकाउंट नंबर डालना होगा और नियमों और शर्तों को स्वीकार करना होगा।     इसके बाद आपको अपनी आखिरी जॉब की डिटेल्स दिखाई देंगी और साथ ही डेट ऑफ एग्जिट का भी जिक्र उसमें होगा। डेट ऑफ एग्जिट का मतलब आपकी पिछली जॉब के लास्ट वर्किंग डे से होता है।     इसके बाद आपको Proceed For Online Claim पर क्लिक करके आगे बढ़ें।     इसके बाद आपको I want to apply for में Form 19 को चुनना होगा और इसी के साथ आपके सामने एक और फॉर्म खुल जाएगा।     इस ऑप्शन के नीचे आपको Form 15G जमा करने का ऑप्शन मिलेगा। इस फॉर्म को तब भरकर सबमिट किया जाता है जब विड्रॉल की जा रही अमाउंट 50 हजार से ज्यादा हो और आप न चाहते हों कि उस पर आपसे 10% टीडीएस या टैक्स लिया जाए।     इसके बाद आपको अपने आधार कार्ड पर दिया पता भरना होगा और फिर कैंसिल चेक की फोटो को अपलोड करना होगा।     इसके बाद शर्तों को स्वीकार करके Get Aadhaar OTP पर टैप करें और OTP वेरिफाई करके अपने फॉर्म को सबमिट कर दें। ऐसे निकालें पेंशन का पैसा अब पेंशन का पैसा निकालने के लिए आपको एक अलग फॉर्म इसी प्रॉसेस को फॉलो करते हुए भरना होगा।     सबसे पहले डैशबोर्ड पर Online Services पर जाएं और Claims पर क्लिक करें।     इसके बाद अपना बैंक अकाउंट नंबर भरकर Proceed For Online Claim पर क्लिक करके आगे बढ़ें।     अब आपको I want Apply for वाले ऑप्शन में Only Pension Withdrawal Form 10C को चुन लें।     इसके बाद पिछले स्टेप की तरह अपना पता, कैंसल चेक डालकर शर्तों को स्वीकार करना है और आधार OTP वेरिफाई करके फॉर्म सबमिट कर देना है। ऐसे चेक करें सबमिशन अगर आप देखना चाहते हैं आपने जो दो फॉर्म सबमिट किए हैं वो ठीक से सबमिट हुए हैं या नहीं, तो आप EPFO के डैशबोर्ड पर Online Services पर क्लिक करके Track Claim Status पर अपने सबमिट किए हुए फॉर्म और उनका करंट स्टेटस देख सकते हैं। अगले तीन दिन बाद आप यहीं वापिस आकर देख सकते हैं कि आपके क्लेम का स्टेटस क्या है। अगर आपको स्टेटस में Claim Settled लिखा दिखाई देता है, तो इसका मतलब है कि आपका क्लेम EPFO की ओर से अप्रूव कर दिया गया है। इसे कब अप्रूव किया गया है यह देखने के लिए आप अपनी EPFO की पासबुक चेक कर सकते हैं।

प्राइवेट बनाम सरकारी स्कूल: खर्च में कई गुना फर्क, चौंका देने वाले आंकड़े

नई दिल्ली  देश में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, एक ताज़ा सरकारी सर्वे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। शिक्षा पर खर्च को लेकर किए गए कॉम्प्रिहेंसिव मॉड्यूल सर्वे: एजुकेशन 2025 से यह पता चला है कि प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना माता-पिता की जेब पर भारी पड़ रहा है। वहीं, सरकारी स्कूलों में नामांकन के बावजूद अधिकांश छात्रों से फीस नहीं ली जा रही है। प्राइवेट स्कूलों में खर्च 8 गुना ज़्यादा इस सर्वे में देशभर से 52,085 परिवारों और 57,742 छात्रों से इंटरव्यू लिए गए। इसके अनुसार, सरकारी स्कूलों में औसतन सालाना खर्च 2,863 रुपए है, जबकि प्राइवेट स्कूलों में यह खर्च 25,002 रुपए तक पहुंच चुका है। यानी प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई कराने का खर्च सरकारी स्कूलों की तुलना में लगभग 8.8 गुना अधिक है। शहरों और गांवों में बड़ा अंतर – शहरी और ग्रामीण इलाकों में भी शिक्षा पर खर्च में बड़ा अंतर देखा गया है। – शहरी छात्रों की औसत कोर्स फीस: ₹15,143 – ग्रामीण छात्रों की औसत कोर्स फीस: ₹3,979 – इसके अलावा, स्टेशनरी और किताबों का औसतन खर्च 2,002 रुपए सामने आया है। कोचिंग ने और बढ़ाया बोझ सिर्फ स्कूल की फीस ही नहीं, कोचिंग का खर्च भी अब माता-पिता की चिंताओं को बढ़ा रहा है। सर्वे में बताया गया कि 27% छात्र कोचिंग ले रहे हैं या ले चुके हैं। – शहरी छात्रों की कोचिंग फीस: ₹3,988 – ग्रामीण छात्रों की कोचिंग फीस: ₹1,739 – शहरों में 12वीं कक्षा के लिए कोचिंग फीस: ₹9,950 – ग्रामीण क्षेत्रों में 12वीं की कोचिंग फीस: ₹4,548 सरकारी स्कूलों में ज्यादा नामांकन, फिर भी कम खर्च सर्वे के मुताबिक, देश के 66% ग्रामीण और 30.1% शहरी छात्रों का नामांकन सरकारी स्कूलों में है। कुल मिलाकर, देशभर में 55.9% छात्रों का नामांकन सरकारी स्कूलों में है। इनमें से केवल 26.7% छात्र ही फीस देते हैं, जबकि प्राइवेट स्कूलों में 95.7% छात्रों से कोर्स फीस ली जाती है। हालांकि शिक्षा मंत्रालय ने यह साफ किया है कि यह आंकड़े अनुमानित हैं और इनमें थोड़ी बहुत त्रुटि की संभावना हो सकती है, लेकिन इससे शिक्षा क्षेत्र में बढ़ते खर्च और माता-पिता पर बढ़ते आर्थिक बोझ की तस्वीर जरूर साफ होती है।  

भारत का सबसे बड़ा स्पेसपोर्ट तैयार, ISRO दिसंबर 2026 से करेगा रॉकेट लॉन्चिंग की शुरुआत

कुलसेकरपट्टिनम  भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब नई ऊंचाई की ओर बढ़ रहा है. आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के बाद तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के कुलसेकरपट्टिनम में देश का दूसरा बड़ा लॉन्च कॉम्प्लेक्स तैयार किया जा रहा है. ISRO प्रमुख वी. नारायणन ने बुधवार को भूमि पूजन के बाद घोषणा की कि दिसंबर 2026 तक यह प्रोजेक्ट पूरा हो जाएगा. इस विशाल कॉम्प्लेक्स को 2,300 एकड़ जमीन पर विकसित किया जा रहा है. यहां से हर साल करीब 20 से 25 रॉकेट लॉन्च होंगे. खास बात यह है कि यहां से छोटे उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV) छोड़े जाएंगे, जो 500 किलो तक का पेलोड 400 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं. नारायणन ने कहा, ‘हमारा लक्ष्य दिसंबर 2026 तक सारा काम पूरा करने का है. अगले साल की चौथी तिमाही तक हम यहां से पहला लॉन्च करने की योजना बना रहे हैं. प्रधानमंत्री सही समय पर लॉन्च की तारीख की घोषणा करेंगे.’ इस लॉन्च कॉम्प्लेक्स का शिलान्यास फरवरी 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए किया था. क्यों जरूरी था नया स्पेसपोर्ट?     अब तक इसरो का मुख्य लॉन्च सेंटर श्रीहरिकोटा रहा है, जहां से 1971 से PSLV और GSLV जैसे बड़े रॉकेट छोड़े जाते हैं. लेकिन छोटे रॉकेट, खासकर SSLV, के लिए वहां से पोलर ऑर्बिट में लॉन्च करना मुश्किल है.     कारण है श्रीलंका. श्रीहरिकोटा से सीधे दक्षिण की ओर लॉन्च करने पर रॉकेट श्रीलंका के ऊपर से गुजरते. इस खतरे से बचने के लिए रॉकेटों को ‘डॉगलेग मैन्युवर’ करना पड़ता है. यानी पहले पूर्व की ओर मुड़ना और फिर दक्षिण की ओर झुकना.     यह घुमाव छोटे रॉकेटों के लिए बेहद महंगा पड़ता है क्योंकि इसमें ज्यादा ईंधन खर्च होता है और पेलोड की क्षमता भी कम हो जाती है. यही वजह है कि कुलसेकरपट्टिनम चुना गया. कुलसेकरपट्टिनम ही क्यों?     कुलसेकरपट्टिनम समुद्र किनारे स्थित है. यहां से सीधे दक्षिण की ओर रॉकेट छोड़े जा सकते हैं, जहां हजारों किलोमीटर तक सिर्फ महासागर है, कोई आबादी नहीं. इसका फायदा यह है कि रॉकेट सीधे पोलर ऑर्बिट की तरफ जाएगा, बिना अतिरिक्त ईंधन खर्च किए.     इसरो वैज्ञानिकों का कहना है कि इस कदम से छोटे उपग्रहों की लॉन्चिंग लागत काफी कम होगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धा और बढ़ेगी.     इस लॉन्च कॉम्प्लेक्स से छोटे उपग्रहों का व्यावसायिक प्रक्षेपण भी होगा. भारत की निजी स्पेस कंपनियों को भी यहां से लॉन्च करने की सुविधा मिलेगी. इससे देश का अंतरिक्ष कार्यक्रम और आत्मनिर्भर होगा. ISRO प्रमुख नारायणन के अनुसार, यह प्रोजेक्ट सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अहम है. भारत अब छोटे उपग्रहों की ग्लोबल डिमांड को पूरा करने के लिए बेहतर स्थिति में होगा. श्रीहरिकोटा से बड़े रॉकेट उड़ान भरेंगे और कुलसेकरपट्टिनम से छोटे उपग्रह, इसरो का यही भविष्य का खाका है. दिसंबर 2026 से जब यहां से रॉकेटों की गड़गड़ाहट गूंजेगी, तब भारत की अंतरिक्ष यात्रा का नया अध्याय लिखा जाएगा.

डरावनी मौसम भविष्यवाणी: भारत में पड़ने वाली है हाड़ कंपाने वाली सर्दी

नई दिल्ली भारत में इस बार मानूसन पूरी तरह से मेहरबान रहा है. बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में लगातार नए सिस्‍टम डेवलप होने की वजह से मानसून लगातार मजबूत बना रहा. इसके वजह से उत्‍तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक जोरदार बारिश हुई. इसके लिए एक कारण सबसे ज्‍यादा जिम्‍मेदार है – पैसिफिक रीजन (प्रशांत महासागर क्षेत्र) में अल-नीनो के बजाय ला-नीना का एक्टिव होना. ला-नीना का भारत में पड़ने वाली सर्दी पर भी व्‍यापक प्रभाव पड़ने की संभावना प्रबल है. अमेरका के नेशनल ओश‍िएनिक एंड एटमॉसफेरिक एडमिस्‍ट्रेशन (National Oceanic and Atmospheric Administration – NOAA) ला-नीना के प्रभावी रहने का पूर्वानुमान जारी किया है. इससे इंडोनेशिया से लेकर लैटिन अमेरिका तक के क्षेत्र पर प्रभाव तो पड़ेगा ही, इंडियन सब-कॉन्टिनेंट पर भी इसका व्‍यापक प्रभाव पड़ने की संभावना है. इस तरह भारत में इस बार कड़ाके की ठंड पड़ने की संभावना है. NOAA ने बताया है कि सितंबर से नवंबर के बीच ला नीना विकसित होने की संभावना करीब 53% है, जबकि साल के अंत तक यह संभावना 58% तक पहुंच सकती है. एक बार शुरू होने पर यह क्‍लाइमेट पैटर्न सर्दियों के अधिकांश समय तक सक्रिय रह सकता है और शुरुआती वसंत तक असर डाल सकता है. ला नीना एक प्राकृतिक जलवायु प्रणाली है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर (Equatorial Pacific) का पानी सामान्य से ठंडा हो जाता है. इसका असर ऊपरी वायुमंडलीय पैटर्न पर भी पड़ता है, जो वैश्विक मौसम को प्रभावित करता है. इसके विपरीत एल नीनो के दौरान महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. दोनों ही स्थितियां उत्तरी गोलार्ध की सर्दियों में सबसे ज्यादा असर डालती हैं. इस बार आने वाली ला नीना अपेक्षाकृत कमज़ोर मानी जा रही है, जिसका मतलब है कि इसके प्रभाव हमेशा साफ़ तौर पर दिखाई नहीं देंगे. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह मौसम का एक ब्लूप्रिंट जरूर प्रदान करता है. ला-नीना मतलब तापमान में गिरावट ला-नीना एक जलवायु पैटर्न है जिसमें मध्य प्रशांत महासागर का सतही जल सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है, जिससे दुनिया भर के मौसम पर असर पड़ता है. यह आमतौर पर भारत में तेज़ मानसून और भारी वर्षा लाता है, जबकि अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सूखे का कारण बनता है. यह वैश्विक तापमान को थोड़ा ठंडा भी करता है. इसके विपरीत अल नीनो के प्रभावी होने से तापमान बढ़ता है. इस तरह ला-नीना के एक्टिव होने से भारत समेत एशिया के अधिकांश देशों में कड़ाके की ठंड पड़ने की संभावना रहती है. अमेरिका के मौसम विज्ञानियों की मानें तो इस बार उसी तरह का माहौल बन सकता है. ला-नीना और अल-नीनो ला-नीना और उसका विपरीत चक्र एल-नीनो वैश्विक स्तर पर मौसम के पैटर्न को गहराई से प्रभावित करते हैं. जहां ला-नीना के दौरान प्रशांत महासागर का इंडोनेशिया से दक्षिण अमेरिका तक का हिस्सा सामान्य से ठंडा हो जाता है, वहीं एल-नीनो में यही समुद्री क्षेत्र ज्यादा गर्म हो जाता है. ला-नीना के असर से भारत में सामान्य या सामान्य से अधिक मानसूनी बारिश होती है, लेकिन अफ्रीका के कई हिस्सों में सूखा और अटलांटिक क्षेत्र में तूफानों की तीव्रता बढ़ जाती है. दूसरी ओर, एल-नीनो भारत में भीषण गर्मी और सूखे की वजह बनता है, जबकि दक्षिणी अमेरिका में यह अतिरिक्त वर्षा लाता है. पिछले दशक की शुरुआत में 2020 से 2022 तक लगातार तीन साल ला-नीना सक्रिय रहा था, जिसे ट्रिपल डिप ला-नीना कहा जाता है. इसके बाद 2023 में एल-नीनो ने दस्तक दी. वैज्ञानिक मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के चलते अब ला-नीना और एल-नीनो जैसी घटनाएं और ज्यादा बार और ज्यादा तीव्रता के साथ हो सकती हैं.

अगर भारत ने माना PM मोदी का संदेश, तो हिल जाएंगी 30 अमेरिकी कंपनियां

नई दिल्ली अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर एकतरफा 50 फीसदी टैरिफ थोप दिया है. भारत ने इसे अनुचित करार दिया है. अमेरिका के इस कदम का अब भारत में विरोध हो रहा है. क्योंकि अमेरिका का सबसे बड़ा कारोबारी दुश्मन चीन है, जिसपर अमेरिका ने अधिकतम 34% टैरिफ लगाया है, जबकि भारत पर जबरन 50% टैरिफ लगा दिया गया है, जो कि सरासर गलत है.  इस बीच अब स्वदेशी अपनाने पर जोर दिया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशवासियों से अपील की है कि विदेशी ब्रांड के मुकाबले देसी प्रोडक्ट्स खरीदें, जिससे भारत पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनेगा. अगर देश की 140 करोड़ जनता ने चाह लिया तो कुछ भी संभव है, केवल एक आदमी के स्वदेशी अपनाने से अमेरिका जैसी ताकत को कोई असर नहीं होगा. लेकिन अगर हर किसी ने आज से अमेरिकी प्रोडक्ट्स का बहिष्कार शुरू कर दिया, तो कुछ ही दिन में डोनाल्ड ट्रंप भी रास्ते पर आ जाएंगे. क्योंकि इससे भारत में मौजूद अमेरिका कंपनियों पर आर्थिक चोट पहुंचेगी और इसका नुकसान अमेरिका को उठाना पड़ेगा. लेकिन ये सब तब संभव होगा, जब हर भारतीय स्वदेशी अपनाएगा.   हर भारतीय को करना होगा फैसला लेकिन अब सवाल उठता है कि भारतीय उपभोक्ता और उद्योग जगत कैसे अमेरिका का विरोध करें? क्योंकि केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय रणनीतिक कदम उठाना जरूरी है. दरअसल, आज की तारीख में सैकड़ों अमेरिकी कंपनियां भारत में मौजूद हैं. हर घर में अमेरिका प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल हो रहा है, रसोई से लेकर बर्गर-पिज्जा, चिप्स, मैगी, कपड़े, जूते, घड़ी और शराब की बड़ी से बड़ी कंपनियां भारतीय बाजार में मौजूद हैं. आप जब इन कंपनियों को इग्नोर करेंगे, तो आर्थिक चोट अमेरिका को पहुंचेगी.  इसके लिए सबसे पहले हर भारतीय अमेरिकी ब्रांड्स के बजाय भारतीय प्रोडक्ट्स खरीदे. देश के डिस्ट्रिब्यूटर्स और रिटेलर्स अमेरिकी प्रोडक्ट्स की बिक्री कम करके दूसरी कंपनियों को प्राथमिकता दें. साथ ही अमेरिकी आयात पर निर्भरता को घटाना होगा, इसके लिए स्वदेशी और दूसरे देशों के सस्ते प्रोडक्ट्स को अपनाएं. भारत काउंटर टैरिफ के तौर पर अमेरिकी प्रोडक्ट्स पर ज्यादा टैरिफ लगाने जैसे कदम उठा सकता है. अगर भारत ने लिया बदला… मौजूदा समय में देखें तो हर सेक्टर में अमेरिकी कंपनियों की मौजूदगी है, अगर भारत ने बदला लेना शुरू किया तो अमेरिका को तगड़ा झटका लगेगा. आज हम आपको 30 अमेरिकी कंपनियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका भारत में बड़ा कारोबार है. अगर भारत ने इन कंपनियों को आर्थिक चोट पहुंचाई तो सीधा दर्द अमेरिकी इकोनॉमी को होगा.  अमेरिका की 30 प्रमुख कंपनियों की लिस्ट (अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स इंडिया की रिपोर्ट)-  1. Amazon India: ये अमेरिकी कंपनी ई-कॉमर्स सेंगमेट में सबसे बड़ी प्लेयर है, यह कंपनी भारत में 97% पिनकोड तक पहुंचती है. यानी करीब-करीब हर घर तक अमेजन की पहुंच है, लेकिन इस कंपनी को जो मुनाफा होता है, वो अमेरिका तक पहुंचता है. अगर आपने इस कंपनी का विरोध किया तो सीधा असर अमेरिका को होगा.  2. Apple Inc: आज की तारीख में भारत iphone के लिए बड़ा बाजार है. लेकिन आईफोन को बनाने वाली कंपनी अमेरिकी है. यह कंपनी भारत में बड़े पैमाने पर आईफोन का प्रोडक्शन और बिक्री करती है. अगर इस कंपनी को भारत में दिक्कत हुई तो उसका असर अमेरिका तक दिखेगा. ये कंपनियां भारत में बड़ा कारोबार करके अमेरिकी इकोनॉमी में भी योगदान दे रही हैं.  3. Google (Alphabet Inc.): ये अमेरिकी कंपनी सर्च इंजन, विज्ञापन, एंड्रॉइड और क्लाउड सेवाएं देती हैं, हर कोई गूगल के बारे में जानता है और इसका उपयोग करता है. भारत में गूगल का बड़ा डेटा सेंटर है. कंपनी का भारत बड़ा कारोबार है, लेकिन ट्रंप को लगता है कि अमेरिकी कंपनियों को भारत में कारोबार करने से रोकी जाती हैं.  4. Microsoft: सॉफ्टवेयर, क्लाउड (Azure) और आईटी सर्विस में इस कंपनी का भारत में कारोबार फैला हुआ है. हर कंप्यूटर और लैपटॉप में Microsoft का साफ्टवेयर होता है. ये जो कंपनियां भारत में कमाई करती हैं, उसका कुछ हिस्सा अमेरिका भी ट्रांसफर होता है. यानी अगर भारत में इन कंपनियों के लिए मुश्किलें हुईं तो अमेरिका को भी आर्थिक तौर पर नुकसान होगा.  5. X and Meta: आप दिनभर जिस सोशल मीडिया फेसबुक और ट्विटर यानी X पर समय बिताते हैं, वो भी अमेरिकी कंपनियों के द्वारा ही संचालित की जाती हैं.   Fast-Moving Consumer Goods (FMCG) सेगमेंट में अमेरिका की कई प्रमुख कंपनियां भारत में सक्रिय हैं, जो उपभोक्ता उत्पादों जैसे खाद्य, पेय, व्यक्तिगत देखभाल, और घरेलू उत्पादों में कारोबार करती हैं. बाजार पर प्रभाव की बात करें, तो देश में जंक फूड बाजार $30 बिलियन का है, जिसमें अमेरिकी कंपनियां जैसे PepsiCo, Coca-Cola, और McDonald’s प्रमुख खिलाड़ी हैं.  6. Coca-Cola India: कोका कोला भारत में पेय पदार्थों की अग्रणी कंपनी है, जो कार्बोनेटेड ड्रिंक्स (कोक, थम्स अप, स्प्राइट), जूस (माज़ा), और बोतलबंद पानी (किनले) जैसे प्रोडक्ट्स बेचती हैं. कंपनी 1960 के दशक से भारत में मौजूद है.  7. PepsiCo India: पेप्सी, 7अप, मिरिंडा, कुरकुरे, और लेज जैसे लोकप्रिय ब्रांड्स PepsiCo भी अमेरिकी कंपनी है. भारत में पेय और स्नैक्स के क्षेत्र में अग्रणी है, जो . कंपनी 1989 से भारत में सक्रिय है और ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण जैसे सामाजिक पहलों में निवेश करती है.  8. Procter & Gamble Hygiene and Health Care Ltd (P&G India): व्हिस्पर (सैनिटरी पैड), टाइड (डिटर्जेंट) और विक्स जो आप इस्तेमाल करते हैं, वो अमेरिकी कंपनी P&G बनाती है, यह कंपनी 1964 से भारत में सक्रिय है.  9. Colgate-Palmolive (India) Ltd: कोलगेट घर-घर में मशहूर है, लेकिन कंपनी अमेरिकी है, कोलगेट के टूथपेस्ट और टूथब्रश खूब बिकती हैं और हर घर में आम है.  10. Johnson & Johnson Pvt. Ltd: Johnson & Johnson के प्रोडक्टस् भारत में साबून, पाउडर और सैंपू मौजूद हैं. जॉनसन बेबी प्रोडक्ट्स की खूब डिमांड है, इस कंपनी की साल 1886 से ही भारत में मौजूदगी है.  11. Nestlé India Limited: मैगी, नेस्कैफे, किटकैट, मिल्कमेड बनाने और बेचने वाली कंपनी Nestlé अमेरिकी है. मैगी नूडल्स और किटकैट चॉकलेट्स बेहद लोकप्रिय हैं. 1959 से भारत में सक्रिय, कंपनी ने हाल ही में बिना रिफाइंड शुगर वाले सेरेलैक जैसे नए उत्पाद भी लॉन्च किए हैं. 12. Kimberly-Clark Lever Pvt Ltd: आप जो बच्चों के लिए … Read more

आसमान में भारत ने रचा चक्रव्यूह, F-35 रह गया सिर्फ परिंदा

नई दिल्ली भारत ने देसी एयर डिफेंस सिस्‍टम को डेवलप करने की दिशा में पहला बड़ा कदम उठा लिया है. देसी वायु रक्षा प्रणाली फाइटर जेट, मिसाइल और ड्रोन को तबाह करने में सक्षम है. आने वाले समय में इस ‘सुदर्शन चक्र’ के इस तरह कि डेवलप किया जाएगा कि F-35 जैसे जेट भी महज परिंदा बनकर रह जाएंगे. इस पूरे सिस्‍टम को तीन लेयर में तैयार किया गया है, ताकि यदि किसी एक चक्र से दुश्‍मनों का वार बच भी जाए तो दूसरे और तीसरे लेयर में वह फंस कर रह जाए. दरअसल, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 23 अगस्त को ओडिशा तट से Integrated Air Defence Weapon System (IADWS) का सफलतापूर्वक पहला परीक्षण किया था. यह भारत का पहला पूरी तरह से स्वदेशी मल्टी-लेयर एयर डिफेंस शील्ड है. यह शील्‍ड मिसाइलों, फाइटर जेट्स और ड्रोन जैसे हवाई खतरों को एक साथ निष्क्रिय करने में सक्षम है. टेस्ट डेमो में IADWS ने एक ही समय में तीन टारगेट (दो हाई-स्पीड UAVs और एक मल्टीकॉप्टर ड्रोन) को अलग-अलग ऊंचाइयों और रेंज पर मार गिराया. यह भारत की मल्‍टीलेयर वायु-रक्षा क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण है. तीन लेयर का सुरक्षा चक्र यह प्रणाली तीन प्रमुख स्वदेशी तकनीकों को इंटीग्रेट करती है. QRSAM (Quick Reaction Surface-to-Air Missile): 25-30 किमी रेंज और 10 किमी ऊंचाई तक टारगेट हिट करने में सक्षम. 8×8 मोबाइल व्हीकल्स पर माउंटेड, यह फायर-ऑन-द-मूव क्षमता देता है. VSHORADS (Very Short Range Air Defence System): लो-एल्टीट्यूड खतरों को टैकल करने वाला पोर्टेबल और फील्ड-डिप्लॉयबल सिस्टम. Directed Energy Weapon (DEW): 30 किलोवॉट लेजर जो 3.5 किमी तक ड्रोन, हेलिकॉप्टर और मिसाइल को ध्वस्त कर सकता है. ये सभी एक सेंट्रलाइज्ड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से नियंत्रित होते हैं, जिसे DRDL ने विकसित किया है. ऑपरेशन सिंदूर से मिली सीख यह सफलता मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि में अहम मानी जा रही है, जब भारतीय रक्षा प्रणाली ने पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइल हमलों को निष्क्रिय किया था. उसी ऑपरेशन ने स्वदेशी एयर शील्ड की तात्कालिक जरूरत को उजागर किया. स्टार वॉर टेक्नोलॉजी रूस, चीन और ईरान जैसे देशों के पास पहले से ही इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम हैं, जो अमेरिकी एयर पावर को एक निश्चित दूरी पर रोकते हैं. IADWS उसी रणनीति का भारतीय संस्करण है, जो विशेष रूप से क्षेत्रीय खतरों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है. DRDO प्रमुख समीर वी. कामत ने कहा, ‘यह सिर्फ शुरुआत है. हम हाई-एनर्जी माइक्रोवेव्स और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स जैसी तकनीकों पर भी काम कर रहे हैं, जो हमें स्टार वॉर्स जैसी क्षमता देंगे.’ इंजन की कमी यह उपलब्धि भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (Indigenisation) की दिशा में बड़ी छलांग है. हालांकि, देश फाइटर जेट इंजन टेक्‍नोलॉजी में भारत अब भी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर है. कावेरी इंजन पर 2,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च के बावजूद सफलता नहीं मिली. तेजस और AMCA जैसे प्रोजेक्ट्स आज भी अमेरिकी, फ्रांसीसी और रूसी इंजनों पर टिके हैं. बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त को लालकिले से आह्वान किया था कि देश को स्वदेशी जेट इंजन विकसित करना होगा. मिसाइल और रडार में प्रगति के बावजूद यह कमी भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी बनी हुई है.

आबादी असंतुलन पर मोहन भागवत का बयान- हर परिवार में हों 3 संतान

 नई दिल्ली  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को कहा कि सभी परिवारों को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए। उन्होंने कहा कि भविष्य में परिवार व्यवस्था बनी रहे और देश की सुरक्षा भी सुनिश्चित रहे, इसके लिए जरूरी है कि तीन बच्चे सभी परिवारों में रहें। मोहन भागवत ने कहा कि हमने विभाजन का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि हम अखंड भारत के समर्थक हैं और हमारा इस पर यकीन है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हम सभी की एक पहचान है। सभी लोग हिंदू हैं और उनकी एक ही पहचान है। आरएसएस चीफ ने कहा कि एकता की बात वहां की जाए, जहां कोई अंतर हो। आरएसएस के 100 साल पूरा होने के मौके पर संघ की ओर से देश भर में कार्यक्रमों का आयोजन होना है। इसकी शुरुआत दिल्ली में तीन दिवसीय सम्मेलन हो रहा है, जिसमें समाज के विविध वर्गों से आने वाले लोगों से संघ प्रमुख मोहन भागवत बात कर रहे हैं। उन्होंने गुरुवार को आयोजन के तीसरे दिन कई मुद्दों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि यह जरूरी है कि परिवार में तीन बच्चे होने चाहिए। इसके अलावा हमें अपनी भूमिका अवैध घुसपैठ को रोकने में भी निभानी होगी। उन्होंने कहा कि सरकार अवैध घुसपैठ रोकने की कोशिश कर रही है, लेकिन समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। 'किसी वर्ग के खिलाफ अन्याय हुआ है तो उसे दूर करना चाहिए' उन्होंने कहा कि धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ के कारण ही देश में जनसंख्या का असंतुलन हुआ है। उन्होंने कहा कि धर्म व्यक्तिगत पसंद का विषय है, इसमें किसी प्रकार का प्रलोभन या बल प्रयोग नहीं होना चाहिए। मोहन भागवत ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि हिंदू समाज में एकता की जरूरत है। इसके लिए हमें मंदिर, श्मशान और कुंओं को एक रखना होगा। इस दौरान मोहन भागवत से एक सवाल आरक्षण को लेकर भी हुआ। इस पर उन्होंने कहा कि एक वर्ग के खिलाफ अन्याय हुआ है और उन्हें प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो उन्हें सहारा मिलना चाहिए। आरक्षण कब तक रहना चाहिए? मोहन भागवत ने खुलकर दिया जवाब मोहन भागवत ने यह भी कहा कि समाज में एकता के लिए यह जरूरी है कि कोई गड्ढे में गिरा है तो उसे हाथ देकर ऊपर खिंचा जाए। इसी से समाज में एकता होगी। उन्होंने कहा कि हमें सद्भाव के साथ इस पर काम करना होगा। मोहन भागवत ने कहा कि जब तक आरक्षण के लाभार्थियों को लगता नहीं है कि अब हम अपने बलबूते खड़े रहेंगे, तब तक हम इसके समर्थन में हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत जितना आरक्षण दिया जा रहा है। हम उसके साथ हैं। आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया कि हम समाज में जातिगत भेदभाव मिटाना चाहते हैं और इसके लिए हर तरह की खाई समाप्त करनी होगी।  

टैरिफ के फैसले पर ट्रंप के खिलाफ बढ़ी आवाज़, भारत सहित आलोचना हुई जोरदार

वाशिंगटन  भारत पर मोटा टैरिफ लगाकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत-अमेरिकी संबंधों को भी ताक पर रख दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल की खरीद कर यूक्रेन युद्ध में रूस की आर्थिक मदद का आरोप लगाते हुए भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया है। वहीं अमेरिकी दल ने भारत के साथ ट्रेड डील को लेकर चल रही बातचीत के अगले दौर को भी स्थगित कर दिया है। इन नीतियों की वजह से अब ट्रंप को घर में ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी राजनेताओं और विशेषज्ञों ने ट्रंप की टैरिफ नीतियों और भारत पर लगाए गए शुल्कों की कड़ी आलोचना की है। बुधवार से भारत कर अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लागू होने के बाद कई अमेरिकी सांसदों, राजनयिकों और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह कदम अमेरिका की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में से एक को नुकसान पहुंचा सकता है। हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के डेमोक्रेट्स ने कहा है कि अमेरिका के इस कदम से चीन को फायदा मिल सकता है। बुधवार को एक पोस्ट में समिति ने आरोप लगाया कि सिर्फ भारत को निशाना बनाया जाना बिल्कुल सही नहीं है। पोस्ट में उन्होंने लिखा, “टैरिफ के साथ सिर्फ भारत पर ध्यान केंद्रित करने का ट्रंप का फैसला अमेरिकियों को नुकसान पहुंचा रहा है और इस प्रक्रिया में अमेरिका-भारत संबंधों खराब हो रहे हैं।" पोस्ट में आगे कहा गया, “अगर ट्रंप प्रशासन रूसी तेल खरीदने वाले हर देश पर अतिरिक्त प्रतिबंधों की धमकी का विकल्प चुनता, तो बात अलग होती। लेकिन सिर्फ भारत पर ध्यान केंद्रित करने के फैसले का नतीजा शायद सबसे भ्रामक नीतिगत फैसला है। रूसी तेल का सबसे बड़ा आयातक, चीन अभी भी रियायती दामों पर तेल खरीद रहा है और अब तक उसे ऐसी सजा नहीं दी गई है।” पूर्व उपराष्ट्रपति ने भी सुनाया वहीं अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने भी ट्रंप की नीति की आलोचना की है। पेंस ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, "अमेरिकी कंपनियां और अमेरिकी उपभोक्ता अमेरिकी टैरिफ की कीमत चुका रहे हैं।" पेंस ने एक लेख भी शेयर किया जिसमें बताया गया था कि कैसे फोर्ड ने अपनी ज्यादातर गाड़ियां अमेरिका में बनाईं। इसके बावजूद सिर्फ तीन महीनों में 80 करोड़ डॉलर का टैरिफ चुकाया। मोदी को घुटने नहीं टेकने चाहिए- पूर्व उप विदेश मंत्री अमेरिका के पूर्व उप विदेश मंत्री कर्ट कैंपबेल ने अमेरिका और भारत की साझेदारी को 21वीं सदी में अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण रिश्ता बताया है। उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी को राष्ट्रपति ट्रंप के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए।" भारत में अमेरिका के पूर्व राजदूत केनेथ जस्टर ने भी इन चिंताओं को दोहराया और कहा कि अचानक टैरिफ की घोषणा एक कूटनीतिक झटका है जिससे अमेरिका का ही नुकसान होगा। रिपब्लिकन पार्टी से भी मिल रही आलोचना वहीं ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं ने भी ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। पूर्व संयुक्त राष्ट्र राजदूत और विदेश मंत्री पद की उम्मीदवार निक्की हेली ने हाल ही में कहा है कि व्यापार को लेकर भारत के साथ संबंधों को कमजोर करना एक रणनीतिक आपदा होगी, जिससे चीन का मुकाबला करने की अमेरिका की क्षमता कमजोर होगी। ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे जॉन बोल्टन ने टैरिफ को एक गलती करार दिया है और चेतावनी दी है कि इससे भारत चीन और रूस के करीब जा सकता है।  

PAK ने खुद के शख्स को अपनाने से किया मना, हाईकोर्ट में अटकी सुनवाई

कोलकाता कलकत्ता हाईकोर्ट के सामने हाल ही में तब बड़ी दुविधा खड़ी हो गई है कि जब पाकिस्तान ने भारतीय जेल में बंद अपने ही नागरिक की रिहाई के बाद उसे स्वीकारने से ही मना कर दिया है। इससे पहले शख्स को विदेशी नागरिक ठहराया गया था और वह बीते एक दशक से अधिक समय से जेल में बंद था। अब रिहाई के बाद भी पाकिस्तान उसे वापस लेने से मना कर रहा है, जिसके बाद कोर्ट ने शख्स के भविष्य को लेकर केंद्र से राय मांगी है। वहीं फिलहाल दमदम केंद्रीय कारावास में बंद पी. यूसुफ नाम के इस शख्स ने हाईकोर्ट से उसे पाकिस्तान वापस भेजने का निर्देश देने का अनुरोध किया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस अमृता सिन्हा ने भारत सरकार की ओर से पेश वकील को निर्देश दिया कि वह यूसुफ के संबंध में आगे की कार्रवाई के लिए उचित निर्देश प्राप्त करें। अदालत ने बुधवार को निर्देश दिया, ‘‘याचिकाकर्ता को रिहा करना है या उसे हिरासत में रखना है, इस बारे में अधिकारियों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिए जाए।” अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर के लिए निर्धारित की है। 2012 में हुआ था गिरफ्तार जानकारी के मुताबिक यूसुफ को 2012 में बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में सीमा पार कर अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने के बाद गिरफ्तार किया गया था। चार अप्रैल 2013 को दोषी ठहराए जाने के बाद उसे 650 दिनों के कारावास की सजा सुनाई गई थी।उसके वकील ने बताया कि यूसुफ को सजा बहुत पहले पूरी कर लेने के बावजूद वापस नहीं भेजा गया और वह अब भी दमदम केंद्रीय कारागार में बंद है। पाकिस्तान ने किया इनकार वहीं पश्चिम बंगाल सरकार के वकील ने अदालत में सुधार सेवा निदेशालय के प्रभारी अधिकारी की एक रिपोर्ट पेश की। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान यूसुफ को अपना नागरिक नहीं मान रहा है। रिपोर्ट में कहा गया कि यूसुफ को दो बार ‘कांसुलर एक्सेस’ दिया गया और दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग ले जाया गया। राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि यूसुफ के साथ कैद दो अन्य लोगों को पाकिस्तान ने अपना नागरिक स्वीकार कर लिया, जबकि यूसुफ को नागरिक स्वीकार नहीं किया। सरकार ने दिए तर्क कोर्ट को यह भी बताया गया कि पाकिस्तान से इनकार मिलने के बाद शख्स ने हाईकोर्ट की दूसरी पीठ के सामने दावा किया कि वह एक भारतीय नागरिक है और उसने केरल में कुछ जमीन की खरीद के कुछ कागज भी पेश किए। हालांकि पश्चिम बंगाल सरकार के वकील ने अदालत में दलील दी कि केरल सरकार की एक रिपोर्ट में बताया गया कि यूसुफ ने कन्नूर के एक स्कूल में सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी लेकिन उसके बाद अपने पिता मीर मोहम्मद के साथ पाकिस्तान चला गया था। केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि यूसुफ एक विदेशी नागरिक है।  

IMD अलर्ट: अगले 3 दिनों में इन राज्यों में आंधी, बिजली गिरने और भारी बारिश का खतरा

नई दिल्ली  देशभर में मानसून ने इस बार अपना जलवा दिखाया है। हालांकि मानसून की रफ्तार में लगातार बदलाव देखे गए हैं। कभी तेज बारिश के साथ मानसून सक्रिय होता है तो कभी धीमी गति से हल्की बारिश होती है। मौसम विभाग के अनुसार, अगले 72 घंटों में मानसून करवट लेगा और कई राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। राजस्थान में मानसून का असर जारी राजस्थान के कई जिलों में मानसून ने अच्छी बारिश दी है। राज्य में बारिश का सिलसिला जारी है, लेकिन रफ्तार में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला है। अगले तीन दिनों में प्रदेश के कई हिस्सों में तेज बारिश, आंधी और बिजली गिरने की संभावना है। कुछ जिलों में हल्की-फुल्की रिमझिम बारिश भी हो सकती है। दिल्ली में मानसून की धीमी चाल देश की राजधानी दिल्ली में इस बार मानसून अपेक्षाकृत कम सक्रिय रहा है। हालांकि, पिछले कुछ दिनों में दिल्ली के कई हिस्सों में अच्छी बारिश हुई है। अगले 72 घंटे में यहां रिमझिम बारिश और तेज हवाओं के चलने की संभावना है। उत्तरपश्चिम और पूर्वोत्तर भारत में भारी बारिश का अनुमान उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में अगले तीन दिनों में भारी बारिश की संभावना है। वहीं, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और नागालैंड में मूसलाधार बारिश होने की चेतावनी जारी की गई है। पश्चिमी, दक्षिणी एवं पूर्वी भारत में भी बारिश का दौर गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात-सौराष्ट्र और कोंकण में अगले 72 घंटे में कहीं भारी तो कहीं हल्की-मीठी बारिश होगी। दक्षिण भारत के केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, लक्षद्वीप और यनम में भी तेज बारिश का अलर्ट है।  बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, मध्य प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और विदर्भ में भी तेज बारिश और रिमझिम बरसात का अनुमान है। मौसम विभाग ने सभी राज्यों से सतर्क रहने और आवश्यक तैयारियां करने की सलाह दी है।