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संघ प्रमुख मोहन भागवत बोले, भाजपा पर आरएसएस का नियंत्रण नहीं, कहीं कोई झगड़ा नहीं

नई दिल्ली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर समझाया है कि अपने घरों में अपनी भाषा, परंपरा, वेशभूषा और संस्कृति बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि तकनीक और आधुनिकता शिक्षा के विरोधी नहीं हैं। शिक्षा केवल जानकारी नहीं है; यह व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के बारे में है। नई शिक्षा नीति में पंचकोसीय शिक्षा के प्रावधान शामिल हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) सही दिशा में एक कदम है। बेहतर समाज का निर्माण संघ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आरएसएस द्वारा 100 वर्ष की संघ यात्रा – 'नए क्षितिज' के तहत अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। गुरुवार को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने परिवार को एकजुट करने के तरीके भी बताए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में शामिल होकर सामाजिक एकता मजबूत होती है, साथ ही प्रेम और करुणा बढ़ती है। कानूनी व्यवस्था पर भरोसा संघ प्रमुख ने कहा कि विवाद या भड़काऊ स्थिति में कानून हाथ में नहीं लेना चाहिए, बल्कि कानूनी व्यवस्था पर भरोसा करना चाहिए। हमारे देश की विविध संस्कृति में विभिन्न जाति, पंथ, और समुदाय के लोग रहते हैं. इन सबके बीच सौहार्द बनाए रखने और संबंध मजबूत करने के लिए एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में सम्मिलित होना बहुत जरूरी है। समाज में समरसता उन्‍होंने समझाया कि ऐसा करने से सामाजिक दूरियां घटती हैं और विश्वास बढ़ता है। इसके साथ ही समाज में प्रेम और करुणा की भावना पनपती है। दूसरों की खुशियों में शामिल होने से समाज में समरसता आती है और आपसी भेद-भाव कम होते हैं। कहीं कोई झगड़ा नहीं: आरएसएस प्रमुख संघ प्रमुख ने कहा, 'हमारा हर सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों, दोनों के साथ अच्छा समन्वय है। लेकिन कुछ व्यवस्थाएं ऐसी भी हैं, जिनमें कुछ आंतरिक विरोधाभास हैं। कुल मिलाकर व्यवस्था वही है, जिसका आविष्कार अंग्रेजों ने शासन करने के लिए किया था। इसलिए, हमें कुछ नवाचार करने होंगे। फिर, हम चाहते हैं कि कुछ हो। भले ही कुर्सी पर बैठा व्यक्ति हमारे लिए पूरी तरह से समर्पित हो, उसे यह करना ही होगा और वह जानता है कि इसमें क्या बाधाएं हैं। वह ऐसा कर भी सकता है और नहीं भी। हमें उसे वह स्वतंत्रता देनी होगी। कहीं कोई झगड़ा नहीं है।' उन्होंने कहा कि यह सच नहीं है कि आरएसएस भाजपा के लिए फैसले लेता है। जेपी नारायण से लेकर प्रणब मुखर्जी तक, लोगों ने हमारे बारे में अपना नजरिया बदला है। इसलिए हमें किसी के नजरिए में बदलाव की संभावना से कभी इनकार नहीं करना चाहिए। हम भाजपा के लिए फैसले नहीं लेते: संघ प्रमुख आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमारे यहां मत भेद हो सकता है, लेकिन मन भेद नहीं है। क्या आरएसएस सब कुछ तय करता है? यह पूरी तरह से गलत है। ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता। मैं कई सालों से संघ चला रहा हूं और वे सरकार चला रहे हैं। इसलिए हम केवल सलाह दे सकते हैं, निर्णय नहीं ले सकते। अगर हम निर्णय ले रहे होते, तो क्या इसमें इतना समय लगता? हम निर्णय नहीं लेते।

324 जिलों के गांवों में बड़े बदलाव की तैयारी, आदिवासी कल्याण पर फोकस

नई दिल्ली  केंद्र सरकार एक जनजातीय आउटरीच कार्यक्रम शुरू कर रही है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य 1 लाख आदिवासी गांवों को सशक्त बनाना है। इसके तहत ग्रामीण अपनी पंचवर्षीय विकास योजनाएं स्वयं तैयार करेंगे। इसके लिए 20 लाख अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि सरकारी योजनाएं जमीनी स्तर तक पहुंचें। प्रत्येक गांव में 'आदि सेवा केंद्र' स्थापित होंगे, जो शिकायतों का समाधान और जानकारी प्रदान करेंगे। आदिवासी गांव तैयार करेंगे अपनी पंचवर्षीय विकास योजनाएं इस योजना के तहत 2 अक्टूबर तक करीब 1 लाख आदिवासी गांव अपनी पंचवर्षीय विकास योजनाएं तैयार करेंगे। इस पहल का लक्ष्य सरकारी योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाना है। यह 20 लाख अधिकारियों के प्रशिक्षण के साथ शुरू होगी, फिर ग्रामीणों को विकास योजनाएं बनाने, सभी सरकारी योजनाओं को शामिल करने और प्रत्येक गांव में शिकायत निवारण के लिए एकल-खिड़की केंद्र स्थापित करने में शामिल किया जाएगा। 324 जिलों के गांवों की पहचान जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने 'आदि कर्मयोगी अभियान' या व्यवहार परिवर्तन कार्यक्रम के लिए 324 जिलों के गांवों की पहचान की है। ET की रिपोर्ट के अनुसार, एक अधिकारी ने बताया कि इस कार्यक्रम के बड़े लक्ष्य हैं। मुख्य ध्यान अधिकारियों के प्रशिक्षण पर है, लेकिन इसके परिणामों में सरकारी योजनाओं का 100% समावेश और ग्राम विकास योजना शामिल है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि वे पोषण, स्वास्थ्य, आवास और शिक्षा जैसी योजनाओं को लक्षित लाभार्थियों तक पहुंचाएं। ब्लॉक और ग्राम स्तर तक प्रशिक्षण उन्होंने बताया कि प्रशिक्षण ब्लॉक और ग्राम स्तर तक होगा, जिसके बाद अधिकारी ग्रामीणों को ऐसी योजनाएं बनाने में मदद करेंगे जो ग्रामीणों द्वारा लागू की जाएं। अधिकारी ने कहा कि इससे प्रशासन को ग्रामीणों की आकांक्षाओं के अनुसार संसाधनों का उपयोग करने में सहायता मिलेगी। इसके अलावा, प्रत्येक गांव में आदि सेवा केंद्र स्थापित होंगे। यह एकल सुलभ केंद्र होगा, जिसमें हर सरकारी विभाग के प्रभारी अधिकारी, योजनाओं और लाभार्थियों की जानकारी, शिकायत निवारण रजिस्टर, अधिकारियों के दौरे का कैलेंडर और प्रत्येक विभाग के लिए गांव से नियुक्त व्यक्ति के संपर्क विवरण होंगे। हर सोमवार को गांव में जाएंगे अधिकारी इससे योजनाओं के कार्यान्वयन को सुव्यवस्थित करने और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। हर सोमवार को एक अधिकारी गांव में जाकर ग्रामीणों की शिकायतों का समाधान करेगा और सेवा केंद्र के शिकायत निवारण रजिस्टर में उठाए गए कदमों को दर्ज करेगा।

आवासीय स्कूल में सनसनी, 9वीं की छात्रा ने बच्चे को जन्म दिया

कर्नाटक   कर्नाटक के यादगिर जिले के शाहपुर में एक आवासीय विद्यालय की 9वीं कक्षा की छात्रा के शौचालय में एक शिशु को जन्म देने से हड़कंप मच गया है। बताया जा रहा कि छात्रा और शिशु, दोनों को शाहपुर के सरकारी अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया है। डॉक्टरों के अनुसार, फिलहाल दोनों सुरक्षित हैं। स्थानीय प्रशासन पर गंभीर आरोप वहीं, कर्नाटक बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य शशिधर कोसांबे ने बताया कि स्थानीय अधिकारियों ने शुरुआत में मामले को दबाने की भरसक कोशिश की थी, लेकिन मामला आयोग की नजर में आ गया, जिसके बाद आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए शिकायत दर्ज की और स्कूल का दौरा कर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। बाल-विवाह का हो सकता है मामला विद्यालय प्रशासन ने लड़की के गर्भवती होने पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि संभवत: यह बाल विवाह का मामला हो सकता है। साथ ही विद्यालय प्रशासन ने बताया कि उन्होंने लड़की के माता-पिता को भी इस संबंध में सूचित कर दिया है। विद्यालय प्रशासन पर लापरवाही का आरोप कोसांबे ने इसे विद्यालय प्रशासन की लापरवाही बताया और कहा कि यह न सिर्फ लड़की की निजता का हनन है, बल्कि इससे लड़की का स्वास्थ्य भी गंभीर रुप से प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि आयोग ने विद्यालय के प्रधानाध्यापक समेत वार्डन, कक्षा के शिक्षक और विद्यालय के नर्स पर कड़ी कार्रवाई की संस्तुति की है।  

RCB का अहम फैसला, भगदड़ पीड़ितों को मिलेगा सहारा!

नई दिल्ली  इस साल आईपीएल के इतिहास में पहली बार ट्रॉफी पर कब्जा जमाने के बाद आरसीबी के जश्न में मची भगदड़ पर फ्रेंचाइजी ने पहली बार अपनी चुप्पी तोड़ी है। उसने आरसीबी केयर्स नाम की पहल का ऐलान किया है। हालांकि, उसके बारे में अभी डीटेल से नहीं बताया गया है लेकिन जल्द ही डीटेल शेयर करने की बात कही गई है। आईपीएल खिताब जीतने के अगले दिन 4 जून को आरसीबी ने बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में जश्न का कार्यक्रम रखा था। उस दौरान स्टेडियम के गेट के पास भगदड़ मचने से 11 लोगों की मौत हो गई थी और 56 अन्य घायल हो गए थे। भगदड़ के 84 दिन बाद आरसीबी ने उसे लेकर अपनी चुप्पी तोड़ी है। उसने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट डालते हुए कहा है कि उसकी चुप्पी गैरमौजूदगी नहीं थी। वह दर्द था। इसके साथ ही फ्रेंचाइजी ने 'आरसीबी केयर' पहल का जिक्र किया है। पोस्ट में उसके बारे में तो और ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है लेकिन संकेत मिल रहा है कि हो सकता है कि फ्रेंचाइजी भगदड़ के पीड़ित परिवारों के लिए कुछ राहतभरा कदम उठाए। ये राहत आश्रितों के जीवनयापन, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी उठाने या आर्थिक मदद जैसी पहल के रूप में हो सकती है। लेकिन आरसीबी केयर के तहत ऐसा कुछ किया जाएगा या नहीं, ये फिलहाल स्पष्ट नहीं है। जल्द ही डीटेल देने की बात कही गई है। भगदड़ के बाद से ही आरसीबी के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स पर एकदम से चुप्पी थी। 3 महीने तक न तो हादसे को लेकर कुछ लिखा गया और न ही क्रिकेट पर या किसी क्रिकेटर पर या किसी भी तरह का पोस्ट। आरसीबी ने गुरुवार को एक्स पर फैंस को संबोधित नोट पोस्ट किया। उसमें लिखा, 'डियर 12th मैन आर्मी, यह आपको हमारा दिल से लिखा खत है! करीब तीन महीने हो चुके हैं जब हमने यहां पिछली बार पोस्ट किया था। चुप्पी गैरमौजूदगी नहीं थी। यह दर्द था।' नोट में आगे लिखा गया है, 'यह स्पेस कभी ऊर्जा, यादों और मोमेंट्स से भरा हुआ होता था जिसे आप बहुत इंजॉय करते थे…लेकिन 4 जून ने सबकुछ बदल दिया। उस दिन ने हमारे दिलों को तोड़ दिया, और तब से हमारे इस स्पेस पर चुप्पी थी। उस चुप्पी में हम शोक मान रहे थे। सुन रहे थे। सीख रहे थे। और धीरे-धीरे हमने कुछ ऐसा बनाना शुरू किया जो सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं है। कुछ ऐसा है जिसमें हम पूरी तरह यकीन करते हैं। इस तरह आरसीबी केयर्स का जन्म हुआ।' पोस्ट में बताया गया है कि आरसीबी केयर्स अपने फैंस के साथ खड़े होने, उन्हें सम्मान देने और घाव भरने के लिए है। आरसीबी ध्यान रखता है और हम हमेशा ध्यान रखेंगे। जल्द ही विस्तार से जानकारी देंगे।  

गवर्नर बनाम राष्ट्रपति: सेना तैनात करने की पावर किसके पास?

नई दिल्ली राज्यपालों और राष्ट्रपति की ओर से किसी विधानसभा से पारित बिल पर लंबे समय तक निर्णय न लेने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में एक आदेश दिया था। बेंच ने विधेयकों पर फैसले के लिए 90 दिन की लिमिट तय कर दी थी, जिस पर राष्ट्रपति ने अदालत में रेफरेंस दाखिल किया है। उन्होंने पूछा है कि क्या सुप्रीम कोर्ट की ओर से राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए टाइमलाइन तय की जा सकती है। इसी पर 5 दिन सुनवाई चल चुकी है और आज फिर से दिलचस्प बहस देखने को मिली। केंद्र सरकार के वकील तुषार मेहता ने कहा कि इस तरह यदि बिलों को रोकने की बात अदालत में आई है तो क्या किसी विधेयक को मंजूरी पर भी ऐसा हो सकता है। यही नहीं उन्होंने राज्यपाल और राष्ट्रपति के विवेकाधिकार एवं परिस्थितिजन्य निर्णय लेने की क्षमता पर अदालत में विचार होने पर भी सवाल उठाया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मान लीजिए कि किसी राज्य में कानून व्यवस्था की समस्या हो गई है। स्थानीय पुलिस स्थिति को संभाल नहीं पा रही है। ऐसे में क्या अर्धसैनिक बलों की तैनाती से पहले केंद्र सरकार को अदालत में अर्जी दाखिल करनी चाहिए। मेरा तो जवाब है कि ऐसा नहीं हो सकता। यही नहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आर्टिकल 32 के तहत तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों की ओर से अर्जी दाखिल करने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 32 में मूलभूत अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है। एक बार कर्नाटक सरकार ने भी इसके तहत अर्जी डाली थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। बेंच का कहना था कि मूल अधिकारों के रक्षा के नाम पर सरकार अर्जी नहीं डाल सकती। कोई एनजीओ, पीड़ित पक्ष या अन्य उत्पीड़न के शिकार लोग या संस्था ऐसा कर सकते हैं, लेकिन सरकार नहीं। इस दौरान तमिलनाडु सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अभिषेक मनु सिंघवी ने भी दिलचस्प दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि राज्यपाल और सरकार एक म्यान में दो तलवार की तरह नहीं रह सकते। दोनों को सहयोगी की भूमिका में ही रहना होगा। राज्यपाल केंद्र सरकार के कर्मचारी नहीं हैं, किसने रखी दलील उन्होंने कहा कि राज्यपाल का काम एक मार्गदर्शक का है। वह टकराव की भूमिका में नहीं आ सकते और ना ही राज्य विधानसभा की ओर से पारित विधेयकों को पलट सकते हैं। यही नहीं उन्हें केंद्र सरकार का प्रतिनिधि बताने पर भी बहस हुई। तुषार मेहता ने कहा कि राज्यपाल कोई केंद्र सरकार के कर्मचारी नहीं हैं। वह एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति हैं। इस पर चीफ जस्टिस गवई ने कहा कि राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर वह राज्यों में होते हैं। संविधान के मुताबिक केंद्र सरकार की शक्तियां राष्ट्रपति में समाहित होती हैं। इसलिए ऐसा कहना गलत है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि नहीं हैं।  

ट्रंप के सलाहकार का चीन पर वार – कहा, अक्साई चिन पर हमला किया तो दोस्त कैसे?

वाशिंगटन  दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत और अमेरिका के बीच संबंध इस समय अपने सबसे निचले स्तर पर चल रहे हैं। दोनों देशों की तरफ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी की जा रही है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापारिक सलाहकार नवारो ने भारत और चीन के बीच रिश्तों में फिर से आती गर्म जोशी को लेकर जहर उगला है। नवारो ने भारत के ऊपर तंज कसते हुए कहा कि वह चीन के साथ दोस्ती बढ़ा रहे हैं, जिन्होंने उनके लद्दाख वाले हिस्से पर हमला किया था। ब्लूमबर्ग टीवी टैनल को दिए एक इंटरव्यू में पीटर नवारो ने कहा, "भारत एक लोकतांत्रिक देश है लेकिन वह तानाशाही वाले देशों… जैसे की चीन और रूस के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है। चीन के साथ आपका (भारत का) पिछले कई दशकों से संघर्ष चल रहा है। उन्होंने कई हिस्सों पर हमला किया और अक्साई चिन समेत कई हिस्सों को हड़प लिया। वह आपके दोस्त नहीं है… जहां तक रूस की बात है तो, अब मैं क्या ही कहूं।" भारत को कल मिल जाए 25 फीसदी की छूट लेकिन… :नवारो नवारो नहीं रुके उनसे जब पूछा गया कि क्या भारत को टैरिफ में छूट मिलेगी। इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, "यह बहुत ही आसान है। अगर भारत रूसी तेल को खरीदना बंद कर देता है और युद्ध को बढ़ावा देना बंद कर देता है तो उसे कल ही 25 फीसदी की छूट मिल सकती है। मैं हैरान हूं, मोदी एक महान नेता हैं, भारत एक परिपक्व देश है, जिसे परिपक्व देश चला रहे हैं। इसके बाद भी यह सब हो रहा है।" भारत के बारे में एक बात हमें परेशान कर रही है कि वह अहंकारी होकर लगातार यह बात कह रहे हैं कि यह हमारी संप्रभुता है कि हम जिससे चाहें उससे तेल खरीद सकते हैं। यह सही नहीं है। भारत को टैरिफ का महाराज बता चुके है नवारो गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब नवारो ने भारत के खिलाफ अपने जहर को उगला हो। इससे पहले भी वह भारत को टैरिफ का महाराज कहते रहे हैं। हां… इतना जरूर है कि भारत पर आरोप लगाने से पहले नवारो अमेरिका के इतिहास और वर्तमान को देखने की कोशिश नहीं करते हैं। भारत रूसी तेल खरीद रहा है क्योंकि रूस भारत का मित्र देश है। अमेरिका ने ईरान के बाजार को पहले से ही प्रतिबंधित किया हुआ है। ऐसे में अगर भारत भी रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है तो वैश्विक तेल बाजार में भयंकर तेजी आ जाएगी और दाम बढ़ जाएंगे। वहीं दूसरी और भारत को युद्ध पोषित करने वाला अमेरिका दशकों से पाकिस्तान को पालता आ रहा है। रूस के साथ भारत के व्यापार करने वाला अमेरिका खुद भी अपने रूसी व्यापार को बढ़ा रहा है। यहां तक की उसका साझेदार यूरोप भी अपनी ऊर्जा जरूरतों को लिए रूस पर निर्भर है। लोकतांत्रिक देश होने के बाद भी अमेरिका का ज्यादातर व्यापार और सामान तानाशाह देश चीन में बनता है। दशकों की दुश्मनी होने के बाद भी कुछ दिन पहले ही रूस के राष्ट्र्पति व्लादिमीर पुतिन से मिले थे और दोनों देशों के संबंधों को मजबूत करने की कसमें खाई थी।  

ब्रिटिश सांसद का खुलासा: 85 जगहों पर पाकिस्तानी बलात्कारियों के ग्रुप सक्रिय

लंदन  यूनाइटेड किंगडम (UK) के एक सांसद की जांच रिपोर्ट से ब्रिटेन में सनसनी फैल गई है। सांसद ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देशभर में ऐसे 85 इलाके हैं, जहां पाकिस्तानी बलात्कारियों का गैंग सक्रिय है और भोली-भाली बच्चियों को शिकार बनाता रहा है। निर्दलीय सांसद रूपर्ट लोव द्वारा की गई इस जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि इन 'बलात्कार गिरोह' में मुख्यतः पाकिस्तानी मूल के पुरुष शामिल हैं और ये घिनौनी हरकतों को अंजाम देने में दशकों से सक्रिय हैं। रूपर्ट लोव के 'गिरोह-आधारित बाल यौन शोषण' निजी रिपोर्ट में कहा गया है कि गिरोह के वीभत्स कारनामों के बारे में जितना सोचा गया था, वह उससे कहीं अधिक व्यापक हैं। रिपोर्ट में ब्रिटिश अधिकारियों पर निशाना साधकर होने वाले दुर्व्यवहार के मामलों में कार्रवाई करने में विफल रहने का भी आरोप लगाया गया है। सोशल मीडिया एक्स पर साझा की गई इस जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तानी पुरुषों के पैटर्न और सार्वजनिक निकायों की घोर लापरवाही पहचाने जाने योग्य हैं। ब्रिटिश सांसद ने ये भी कहा है कि यह बलात्कार गिरोह कांड का अब तक का सबसे बड़ा खुलासा है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर द्वारा जून में सरकार के समर्थन से इसी तरह की जाँच शुरू करने का आदेश दिया गया था लेकिन सांसद रूपर्ट लोव ने उससे पहले ही बलात्कार गिरोह की जाँच करनी शुरू करवा दी थी। उनकी रिपोर्ट ने यह तथ्य उजागर किया है कि ब्रिटेन में इस गिरोह की जड़ें बहुत गहरी हैं। इनमें तो कुछ 1960 के दशक से सक्रिय हैं। रिपोर्ट में ऐसे पाकिस्तानियों को जबरन डिपोर्ट करने का सुझाव दिया गया है। पीड़ितों ने क्या-क्या बताया? गिरोह का खुलासा करने वाले जांच दल ने कहा कि उसके निष्कर्ष सैकड़ों पीड़ितों, रिश्तेदारों और मुखबिरों की गवाही के साथ-साथ सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त हज़ारों अनुरोधों पर आधारित हैं। कई पीड़ितों ने जाँच समिति को बताया कि उन्हें बचपन में ही बहलाया-फुसलाया गया, नशीले पदार्थ दिए गए और बलात्कार किया गया। कुछ ने बताया कि उनकी तस्करी की गई और चुप रहने की धमकी दी गई। कई पीड़ितों, खासकर श्वेत लड़कियों के आरोपों को अधिकारियों ने खारिज कर दिया, क्योंकि वे उनके आरोपों की जांच करने और पीड़ित के रूप में उनकी पहचान करने विफल रहे। लेबर सरकार पर भी आरोप लोव ने कहा, "हमारी जाँच से पता चला है कि यह घिनौना कांड जितना सोचा गया था, उससे कहीं ज़्यादा व्यापक है – मुख्यतः पाकिस्तानी बलात्कार गिरोहों के हाथों लाखों लोगों की ज़िंदगी बर्बाद हो गई है।" लोव ने लेबर सरकार पर तत्काल कार्रवाई का वादा करने के बावजूद इस मुद्दे पर टालमटोल करने का भी आरोप लगाया है।  

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी – ईश्वर दुश्मनी का साधन नहीं, याचिकाओं के पीछे है अहंकार

चेन्नई  श्वर के नाम पर होने वाली राजनीति पर मद्रास हाई कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि ईश्वर प्रतिद्वंद्विता के साधन नहीं, बल्कि एकता, शांति और आध्यात्मिक उत्थान के प्रतीक हैं। अदालत ने विनायक चतुर्थी के दौरान भगवान गणेश की मूर्ति स्थापना के लिए कई याचिकाएँ दायर करने पर ये टिप्पणी की और कहा कि दायर कई याचिकाएं आस्था से नहीं, बल्कि अहंकार से प्रेरित हैं। जस्टिस बी. पुगलेंधी की पीठ ने कहा, "यह अदालत कुछ मामलों में अंतर्निहित प्रेरणाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकती। वर्तमान में दायर अधिकांश याचिकाएं वास्तविक धार्मिक मंशा की बजाय अहंकार के टकराव और आर्थिक प्रभाव जमाने की इच्छा से प्रेरित प्रतीत होते हैं। यह न्यायालय व्यक्तिगत बदला लेने या सामाजिक प्रभुत्व प्रदर्शित करने के लिए ईश्वर को शामिल करने की प्रथा की कड़ी निंदा करता है। ईश्वर प्रतिद्वंद्विता के साधन नहीं हैं; वह एकता, शांति और आध्यात्मिक उत्थान के प्रतीक है।" गली-मोहल्लों में मंदिर तो उपेक्षित, फिर ये होड़ क्यों? बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने इस तथ्य पर भी संज्ञान लिया कि जहाँ गली-मोहल्लों में स्थित मंदिर साल भर उपेक्षित रहते हैं, वहीं त्योहारों के दौरान विशाल मूर्तियाँ स्थापित करने के व्यापक प्रयास किए जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा, “यह विरोधाभास भक्तों को आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित करता है। सच्ची भक्ति भव्यता में नहीं, बल्कि पूजा स्थलों के प्रति निरंतर श्रद्धा और रखरखाव में निहित है।” हाई कोर्ट ने कहा कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उत्सवों के दौरान स्थापित की गई मूर्तियों से सार्वजनिक अशांति या पर्यावरण विनाश न हो। कोर्ट ने कहा, "ईश्वर की भक्ति से मनुष्य को अशांति या प्रकृति का विनाश नहीं होने दिया जा सकता। सच्ची पूजा सद्भाव में निहित है – शांति और व्यवस्था के माध्यम से समुदायों के बीच सद्भाव, और पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से सृष्टि के साथ सद्भाव।" अंतिम समय में आवेदन देने पर अचरज कोर्ट ने इस बात पर भी अचरज जताया कि कई याचिकाकर्ताओं ने मूर्तियाँ स्थापित करने के लिए अंतिम समय में आवेदन दिए थे, जिससे अधिकारियों के पास यह सुनिश्चित करने के लिए बहुत कम समय बचा कि अगर अनुमति दी जाती है तो पर्यावरण और सार्वजनिक व्यवस्था की आवश्यकताओं का पालन किया जा सकेगा या नहीं। न्यायालय ने कहा, “अंतिम समय में प्राप्त आवेदनों पर विचार नहीं किया जा सकता, खासकर जब उनमें सार्वजनिक स्थापनाएँ शामिल हों जिनके लिए कई विभागों के बीच समन्वय की आवश्यकता हो।” हालांकि, कोर्ट ने ऐसे आवेदनों पर निर्धारित तरीके से कार्रवाई न करने या चुनिंदा अनुमतियाँ देने के लिए अधिकारियों की आलोचना भी की। मूर्ति स्थापना की होड़ के पीछे क्या वजह? दरअसल, तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए गणेश प्रतिमाओं की स्थापना कर धार्मिक गोलबंदी करने का इसे एक साधन बनाया जा रहा था और इसी कड़ी में कई आयोजकों ने चेन्नई में पंडाल निर्माण और मूर्ति स्थापना के लिए चेन्नई पुलिस से इजाजत मांगी थी लेकिन कई आवेदनों को पुलिस ने खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ कई संगठन हाई कोर्ट पहंचे थे। कोर्ट ने सभी याचिकाओं पर एक-एक कर फैसला लेने का आदेश दिया है और अंतिम क्षण में दिए आवेदनों को खारिज कर दिया है।  

चीन का पावर शो: 41 विमान और 7 पोत ने तोड़ी ताइवान की हदें, अलर्ट पर सेना

ताइपे ताइवान को लेकर चीनी राष्ट्रपति का क्या योजना है? इस मुद्दे पर अक्सर चर्चा होती रहती है। चर्चा की वजह भी स्पष्ट है। बार-बार चीनी विमान और जहाज ताइवान की सीमा में घुसपैठ करते हैं। एक बार फिर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के विमान और जहाज दिखाई दिए हैं। ताइवान के रक्षा मंत्रालय (MND) ने गुरुवार सुबह 6 बजे तक अपने क्षेत्रीय जलक्षेत्र के आसपास 41 चीनी सैन्य विमानों, सात नौसैनिक जहाजों और एक आधिकारिक जहाज की मौजूदगी का पता लगाया। मंत्रालय के अनुसार, 41 विमानों में से 21 ने मध्य रेखा को पार किया और ताइवान के उत्तरी, मध्य और दक्षिण-पश्चिमी ADIZ (एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन) में प्रवेश किया। ADIZ वह क्षेत्र है जहां प्रवेश करने वाले विमानों की पहचान की जाती है ताकि देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। सुबह 6 बजे दिखे विमान और जहाज रक्षा मंत्रालय ने X पर एक पोस्ट में कहा कि आज सुबह 6 बजे तक ताइवान के आसपास 41 PLA (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) विमान, 7 PLA नौसेना जहाज और 1 आधिकारिक जहाज देखे गए। इनमें से 24 विमानों ने मध्य रेखा को पार किया और ताइवान के उत्तरी, मध्य और दक्षिण-पश्चिमी ADIZ में प्रवेश किया। हमने स्थिति पर नजर रखी और उचित जवाब दिया। गौरतलब है कि बुधवार को भी ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने PLA के 23 विमानों, 7 PLA नौसेना जहाजों और एक आधिकारिक जहाज को अपने क्षेत्र के आसपास देखे थे। मंत्रालय ने कहा कि 23 विमानों में से 16 ने मध्य रेखा को पार किया और ताइवान के उत्तरी और दक्षिण-पश्चिमी ADIZ में प्रवेश किया। चीन 'क्षेत्रीय उपद्रवी' ताइवान के विदेश मंत्री लिन चिया-लंग ने चीन को 'क्षेत्रीय उपद्रवी' करार दिया था। उन्होंने यह बयान तब दिया जब सोलोमन द्वीप ने ताइवान और अमेरिका सहित अन्य वार्ता भागीदारों को आगामी प्रशांत द्वीप समूह फोरम (PIF) नेताओं की बैठक से रोक दिया था। ताइपे टाइम्स के अनुसार, लिन ने 'प्रशांत तरीके' की बात करते हुए कहा कि सभी को शामिल करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि वार्ता भागीदारों को बाहर करने से फोरम की आम चुनौतियों का सामना करने की क्षमता कमजोर होगी। झूठ को सौ बार दोहराने से वह सच नहीं हो जाता वहीं, ताइवान पर चीन के दावों को खारिज करते हुए लिन ने कहा कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने एक दिन भी ताइवान पर शासन नहीं किया है। उन्होंने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रस्ताव 2758 में ताइवान का कोई जिक्र नहीं है। लिन ने चीन के दावे को 'सम्राट के नए कपड़े' बताते हुए कहा कि एक झूठ को सौ बार दोहराने से वह सच नहीं हो जाता। लिन ने आगे कहा कि ताइवान गहरे अंतरराष्ट्रीय सहयोग, व्यावहारिक योगदान और निरंतर राजनयिक पहुंच के माध्यम से चीन के दबाव का मुकाबला कर रहा है। ताइवान दुनिया के अन्य देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है ताकि चीन के प्रभाव को कम किया जा सके।  

भारत-चीन रिश्तों में नया मोड़, शी जिनपिंग की गुप्त चिट्ठी ने बदल दिया ट्रंप का खेल

नई दिल्ली जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के साथ अपना व्यापार युद्ध बढ़ा रहे थे ठीक उसी समय चीन ने भारत के साथ शांतिपूर्वक संबंध सुधारने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। इसकी पहल चीन के द्वारा ही शूरू की गई। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत एक चिट्ठी भेजी, इसके बाद भारत ने भी अपने प्रयासों को तेज कर दिया। ब्लूमबर्ग ने इस मामले से परिचित एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक पत्र लिखकर संबंधों को बेहतर बनाने की इच्छा जताई। इस पत्र में चीन ने किसी भी ऐसे किसी भी अमेरिकी समझौते पर चिंता व्यक्त की थी जो चीन के हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। शी का यह संदेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचाया गया था। जून में शुरू हुए प्रयास अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मोदी सरकार ने जून में चीन के साथ संबंधों को सुधारने के लिए गंभीर प्रयास करना शुरू किया। उस समय अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताएं तनावपूर्ण हो रही थीं और मई में भारत-पाकिस्तान के बीच चार दिनों की लड़ाई के बाद ट्रंप के युद्धविराम कराने के दावों से भारत नाराज था। 7 साल बाद चीन जाएंगे मोदी अगस्त तक भारत और चीन के बीच संबंध सुधारने की प्रक्रिया तेज हो गई। ट्रंप के टैरिफ से प्रभावित होकर दोनों देशों ने पिछले सप्ताह 2020 के घातक सीमा संघर्ष को पीछे छोड़ने के लिए एक बड़ा कदम उठाया। दोनों देश अपने औपनिवेशिक काल से चले आ रहे सीमा विवादों को हल करने के प्रयासों को दोगुना करने पर सहमत हुए। इन तमाम कोशिशों के बाद इस सप्ताह के अंत में पीएम मोदी सात साल में पहली बार चीन की यात्रा करेंगे। भारत-चीन के बीच सुलह के अमेरिका के लिए गहरे निहितार्थ हैं। अमेरिका ने पिछले कुछ दशकों में लगातार शक्तिशाली हो रहे चीन को संतुलित करने के इरादे से भारत को अपने पाले में लाने की कोशिश की थी। ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने के कारण भारतीय निर्यात पर 50% टैरिफ लगाकर इस समीकरण को बदल दिया। ट्रंप का फैसला एक ऐसा बदलाव था जिसने मोदी सरकार को चौंका दिया। पूर्व दूत का ट्रंप पर तंज कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के वरिष्ठ फेलो और भारत में पूर्व अमेरिकी राजनयिक एशले टेलिस ने व्यंगात्मक लहजे में कहा, "ट्रंप वास्तव में एक महान शांतिदूत हैं। भारत और चीन के बीच इस उभरती हुई सुलह को बढ़ावा देने का सारा श्रेय उन्हें ही जाता है।" उन्होंने आगे कहा, "उन्होंने अकेले ही भारत को एक दुश्मन की तरह व्यवहार करके यह सब हासिल किया है।" इस मामले पर भारत या चीन की तरफ से फिलहाल आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा जा रहा है।