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हमलों के बाद भी नहीं टूटी ईरान की मिसाइल ताकत! भूमिगत फैक्ट्रियों में फिर बनने लगी बैलिस्टिक मिसाइलें

तेहरान  अमेरिका और मिडिल ईस्ट के खुफिया अधिकारियों के अनुसार ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन दोबारा शुरू कर दिया है. ये मिसाइलें युद्ध से पहले जमा किए गए यंत्रों को जोड़कर बनाई जा रही हैं. ये सारा काम अंडरग्राउंड फैसिलिटी में हो रहा है।  यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और इजरायल ने हालिया सैन्य अभियान के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमताओं को बड़ा नुकसान पहुंचाने का दावा किया था. अब वही क्षमता धीरे-धीरे वापस आती दिख रही है।  युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान के मिसाइल लॉन्चपैड और औद्योगिक यूनिट्स पर भारी हमले हुए थे. इन हमलों का मकसद ईरान की मिसाइल निर्माण क्षमता को नष्ट करना था. लेकिन खुफिया जानकारी बताती है कि ईरान ने पहले से ही कई जरूरी पार्ट्स जमा कर रखे थे। अब इन्हीं स्टॉक किए गए पार्ट्स को भूमिगत जगहों पर ले जाकर मिसाइलें असेंबल की जा रही हैं. अंडरग्राउंड फैसिलिटी का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है ताकि हवाई हमलों से बचा जा सके. काम बिना रुकावट चलता रहे।  ईरान दो तरह की बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहा है. पहली लिक्विड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें लॉन्च से ठीक पहले ईंधन भरना पड़ता है. दूसरी सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें पहले से तैयार करके रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत दागा जा सकता है. सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें ज्यादा खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें लंबे समय तक छिपाकर रखना आसान होता है. प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाता है।  अमेरिका और इजरायल के दावों पर सवाल अमेरिका और इजरायल ने युद्ध के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमता को कमजोर करने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया था. उन्होंने दावा किया था कि कई उत्पादन स्थल नष्ट हो गए हैं और ईरान की मिसाइल स्टॉक में काफी कमी आई है. लेकिन अब खुफिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि उत्पादन फिर शुरू हो गया है. इससे उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।  अगर ईरान अंडरग्राउंड फैसिलिटी में आसानी से मिसाइलें बना सकता है तो भविष्य में भी हवाई हमलों से पूरी क्षमता खत्म करना मुश्किल होगा. यह स्थिति क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौती पैदा कर रही है. मिडिल ईस्ट में तनाव पहले से ही ऊंचा है. ईरान की मिसाइल क्षमता बढ़ने से उसके पड़ोसी देशों और इजरायल के लिए खतरा बढ़ सकता है।  सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें खासकर चिंता का विषय हैं क्योंकि इन्हें जल्दी तैनात किया जा सकता है. लिक्विड वाली मिसाइलों को ईंधन भरने में समय लगता है, इसलिए उनका पता लगाना और रोकना थोड़ा आसान होता है. लेकिन दोनों तरह की मिसाइलों का उत्पादन जारी रहना अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए परेशानी का सबब है।  अंडरग्राउंड प्रोडक्शन की रणनीति   ईरान लंबे समय से अपनी संवेदनशील सैन्य सुविधाओं को भूमिगत रखने की रणनीति अपनाता रहा है. पहाड़ी इलाकों और गहरे सुरंगों में फैक्ट्रियां बनाकर वह हवाई हमलों से बचाव करता है. युद्ध के बाद भी यही रणनीति काम आ रही है. स्टॉक किए गए पार्ट्स का इस्तेमाल करके वह नए उत्पादन प्लांट्स पर निर्भरता कम कर रहा है. इससे उत्पादन की रफ्तार तो धीमी हो सकती है, लेकिन रुक नहीं रही।  विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में किसी देश की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट करना कितना मुश्किल है. एक बार स्टॉक जमा हो जाए और भूमिगत नेटवर्क मजबूत हो तो हमलों के बाद भी रिकवरी संभव हो जाती है।  अमेरिका और इजरायल के लिए अब नई चुनौती यह है कि वे कैसे इन भूमिगत स्थलों का पता लगाएं और उन्हें निशाना बनाएं. साथ ही राजनयिक दबाव और प्रतिबंधों के जरिए भी ईरान पर अंकुश लगाने की कोशिश जारी रह सकती है।  ईरान की मिसाइल क्षमता लौटने से पूरे मिडिल ईस्ट का सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है. खाड़ी देश, इजरायल और अमेरिका सभी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं. अगर उत्पादन की रफ्तार बढ़ी तो ईरान अपनी स्थिति मजबूत महसूस कर सकता है।  वहीं विरोधी पक्ष को अपनी रक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ सकती है. यह मुद्दा सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनयिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह तय करना होगा कि ईरान की मिसाइल गतिविधियों पर कैसे नजर रखी जाए और आगे की कार्रवाई क्या हो।  कुल मिलाकर यह खबर साफ संकेत देती है कि युद्ध के बावजूद ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खोने को तैयार नहीं है. अंडरग्राउंड फैसिलिटी और पहले से जमा पार्ट्स के सहारे वह धीरे-धीरे उत्पादन फिर शुरू कर चुका है. आने वाले समय में इस पर और खुफिया जानकारी सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह घटनाक्रम अमेरिका-इजरायल गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।   

मध्य प्रदेश में तेजी से बढ़ रहा माउथ कैंसर, गुटखा-तंबाकू बने बड़ी वजह; मरीजों में 40% इजाफा

भोपाल   मध्यप्रदेश में जुगाड़ का गुटखा मुंह के कैंसर के मामलों में हर साल बढ़ोत्तरी कर रहा है. मुंह के कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए मध्यप्रदेश में करीबन 14 साल पहले गुटखा की बिक्री पर रोक लगाई गई थी, लेकिन इसके बाद पाउच का स्थान 'जुगाड़ के गुटखे' ने ले लिया. तंबाकू-चूने और जुगाड़ के गुटखे के चलते देश में सबसे ज्यादा मुंह के कैंसर के मरीज मध्य प्रदेश में सामने आ रहे हैं. मध्यप्रदेश में साल 2025 में 48 हजार 694 कैंसर के मरीज मिले थे, जिनमें से करीबन 40 फीसदी मरीज ओरल कैंसर के थे।  भोपाल में सबसे ज्यादा मुंह का कैंसर नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम इंवेस्टीगेटर की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मुंह के कैंसर के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं. राजधानी भोपाल में 1 लाख लोगों की आबादी में 41 लोग मुंह के कैंसर से पीड़ित मिल रहे हैं. इसके अलावा प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में भी मुंह के कैंसर से पीड़ित मरीज बड़ी संख्या में मिल रहे हैं।  गुटखे पर पाबंदी तो जुगाड़ वाला गुटखा चला कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. श्याम अग्रवाल के मुताबिक, '' मुंह के कैंसर पर रोक लगाने के लिए ही 1 अप्रेल 2012 को मध्यप्रदेश में तंबाकू पाउच की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन इसके बाद जुगाड़ का पाउच आ गया. अब एक पाउच में सादा गुटखा होता है, और दूसरे में तंबाकू, चूना आदि. इस सबको मिलाकर यह वहीं तंबाकू का गुटखा बन जाता है, जिस पर प्रतिबंध लगाया गया था. यही वजह है कि प्रदेश में मुंह के कैंसर के रोगी कम होने के स्थान पर बढ़ गए हैं।  अब युवाओं में आ रहे कैंसर के मामले, एमपी में सबसे तेज डॉ. श्याम अग्रवाल कहते हैं, '' अब मुंह के कैंसर के मरीजों के मामले में एक अहम बदलाव आया है. कुछ साल पहले तक मुंह के कैंसर के मरीज की औसत उम्र 50 साल और उससे अधिक ही होती थी, लेकिन अब 20-25 साल की नई उम्र के युवा भी कैंसर मरीज बन रहे हैं. कारण सिर्फ तंबाकू का सेवन है. पूरे विश्व में भारत, पाकिस्तान सहित कुछ देशों में ही मुंह के कैंसर के मरीज सामने आते हैं, इसमें भी मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा. मध्यप्रदेश में कैंसर के मरीजों की संख्या में हर साल 10.55 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो रही है, जबकि इसमें मुंह के कैंसर के मरीज 40 फीसदी बढ़ रहे हैं।  जानकारी देते कैंसर विशेषज्ञ  भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान के अनुसार मध्यप्रदेश में साल 2021 से 2025 के दौरान कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है।  40 फीसदी मामले माउथ कैंसर के ही प्रदेश में मुंह के कैंसर के मामले औसत कैंसर के मामलों से ज्यादा बढ़ रहे हैं. देश में भी मिलने वाले कैंसर के कुल मामलों में 40 फीसदी सिर्फ मुंह के कैंसर के मामले होते हैं. भोपाल स्थिति जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल के आंकड़ों को देखें तो हॉस्पिटल में साल 2012 में मुंह के कैंसर के मरीजों की संख्या 1836 थी, जो साल 2025 में बढ़कर 2614 तक पहुंच गई हैं. यहां इलाज कराने के लिए प्रदेश के कई जिलों से मरीज पहुंचते हैं. मुंह के कैंसर के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़त देखी जा रही है, जो खतरनाह है।  साल 2020 में हॉस्पिटल में 2118 ओरल कैंसर के मरीज मिले थे, जो साल 2021 में बढ़कर 2519 हो गए. साल 2022 में यहां 2492 मरीज इलाज कराने पहुंचे. वहीं, साल 2023 में 2566 मरीज, 2024 में 2743 और साल 2025 में 2614 ओरल कैंसर के मरीज सामने आए हैं।  मुंह में सफेद, लाल दाग तो सर्तक हो जाएं जवाहरलाल नेहरू कैंसर हॉस्पिटल भोपाल के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. विजय भार्गव कहते हैं, '' गुटखा, पाउच, तंबाखू खाने और सिगरेट पीने वाले लोग मुंह में होने वाले शुरुआती लक्षणों को बिलकुल भी नजरअंदाज न करें. यदि धीरे-धीरे मुंह खुलना कम हो जाए या मुंह में किसी तरह के लाल-सफेद धब्बे बन जाएं तो तुरंत तंबाकू, गुटखा खाना बंद कर दें और चैकअप कराएं. शुरुआती स्तर पर ही जांच और दवा के जरिए गंभीर बीमारी को टाला जा सकता है।  तंबाकू और गुटखा मुंह के कैंसर का सबसे बड़ा कारण डॉक्टर आगे कहते हैं, ''लगातार तंबाकू, गुटखा खाने वालों और सिगरेट पीने वालों के मुंह में सफेद या लाल धब्बे बन जाते हैं, यह एक तरह की चेतावनी होती है, जो शरीर आपको देता है. ऐसी स्थिति में तुरंत तंबाकू-पाउच खाना बंद करना चाहिए. कई बार लोग तर्क देते हैं कि सिर्फ तंबाकू और चूना खाने से कुछ नहीं होता, लेकिन जब तंबाकू को चूना के साथ मिलाया जाता है तो यह निकोटीन को खून में तेजी से घोलता है और इससे तंबाकू की लत को और मजबूत करता है, इसके साथ ही और मुंह में छाले बनाता है, जो आगे चलकर कैंसर का कारण बन जाता है। 

2024 की हार से BJP ने लिया सबक, यूपी के 18,900 कमजोर बूथों पर ‘हाइपर-लोकल’ रणनीति

लखनऊ  उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सियासी जंग फतह करने के लिए भाजपा अब पूरी तरह से एक्टिव हो गई है. सीएम योगी आदित्यनाथ अलग-अलग इलाकों में जनसभाएं कर भले ही सियासी माहौल बनाने में जुटे हों, लेकिन भाजपा एक रिकवरी प्लान पर भी काम कर रही है. इसके तहत 2024 में जिन विधानसभा सीटों पर हार मिली है, उनके एक-एक बूथ की रिपोर्ट तैयार की जा रही है।  भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए 'हाइपर-लोकल' मोड में उतर गई है. मकसद बिल्कुल साफ है, हर बूथ, हर नंबर और हर वोट पर ध्यान देना. पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली हार को सिर्फ़ एक बड़ी राजनीतिक हार के तौर पर नहीं देख रही है. उसने डेटा की गहराई से जांच की है और उन खास पोलिंग बूथों की पहचान की है, जहां 2022 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों के बीच उसका सपोर्ट बेस कम हुआ।  भाजपा सूत्रों ने बताया कि पार्टी ने 2022 में जिन 18,900 बूथों पर जीत हासिल की थी, 2024 के चुनाव में उन्हीं बूथों पर वोट कम मिले हैं. यह संख्या अब पार्टी की संगठनात्मक रणनीति का अहम हिस्सा बन गई है. इसीलिए भाजपा ने पहले इन बूथों का हिसाब-किताब करने, कमजोर जगहों की पहचान कर उन्हें मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए रिकवरी प्लान बनाया है।  भाजपा के सामने ग्रामीण बूथों की चुनौती भाजपा की बूथ स्तरीय कवायद से मिली सबसे अहम जानकारी भौगोलिक है. भाजपा ने जिन 18,900 बूथों को चिह्नित किया है, उनमें से लगभग 80 फीसदी बूथ ग्रामीण इलाकों के हैं. खासकर छोटे गांवों और बिखरी हुई बस्तियों वाले बूथ हैं। लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर और कानपुर जैसे शहरी केंद्र अपेक्षाकृत ज़्यादा मज़बूत रहे. इससे साफ है कि भाजपा का आधार ग्रामीण इलाकों में घट रहा है, जिसे दुरुस्त करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए गए हैं।  भाजपा के सामने अब सिर्फ़ पूरे राज्य में राजनीतिक संदेश पहुंचाने की चुनौती नहीं है; चुनौती यह पहचानना है कि कौन-से ग्रामीण समुदाय दूर हो गए, वे क्यों दूर हुए और उन्हें वापस कैसे लाया जाए।  वॉर रूम से जमीनी लड़ाई तक का प्लान यूपी में भाजपा की रणनीति डेटा एनालिसिस से आगे बढ़कर संगठन को जमीनी स्तर पर मज़बूत करने की ओर बढ़ रही है.  भाजपा के यूपी प्रभारी विनोद तावड़े 16 से 22 सितंबर के बीच फिर से यूपी का दौरा करेंगे. उनकी समीक्षा में जिन मुद्दों पर खास तौर पर चर्चा होगी, उनमें वे बूथ शामिल हैं जहां पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था और उन्हें वापस जीतने की रणनीति बनाना शामिल है।  भाजपा की यह प्रक्रिया असल में एक पॉलिटिकल फीडबैक लूप है: बूथ की पहचान करना, सामाजिक बदलाव को समझना, स्थानीय मुद्दों की पहचान करना, और उसके बाद संगठन को फिर से खड़ा करके दोबारा से बूथ को वापस जीतना. भाजपा का मानना है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव का नतीजा पूरे राज्य के औसत आंकड़ों से तय नहीं होता; यह हज़ारों अलग-अलग बूथों पर जीत-हार से तय होता है, जहां वोटों के अंतर को मापा जा सकता है, वोटरों की पहचान की जा सकती है और संगठन की कमियों को सुधारा जा सकता है।  भाजपा का यूपी में रिकवरी प्लान भाजपा के यूपी में नए गणित का आधार बूथ प्रबंधन है. यूपी में 18,900 का आंकड़ा सिर्फ़ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह 2024 में मिली हार को माइक्रो-लेवल पर चुनावी रिकवरी प्लान में बदलने की भाजपा की रणनीति है. अवध और पूर्वांचल सबसे ज़्यादा जोखिम वाले इलाके हैं. ग्रामीण बूथ मुख्य चुनावी मैदान हैं, तथा गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों को एकजुट करना एक अहम चिंता है।  बसपा के कमज़ोर होने से विपक्ष के वोट ट्रांसफर का पैटर्न बदल गया है. इसके अलावा बुंदेलखंड जैसे इलाकों में स्थानीय मुद्दे अभी भी अहम हैं. भाजपा अब इसी गणित को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की तैयारी कर रही है ताकि 2027 में दोबारा वापसी कर सके।  अवध और पूर्वांचल में भाजपा की चुनौती डेटा से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में हर जगह नुकसान एक जैसा नहीं था. अवध क्षेत्र में भाजपा ने 2022 में इलाके की 154 विधानसभा सीटों में से 101 सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में वह इनमें से सिर्फ़ 51 सीटों पर आगे थी।  यह कुल मिलाकर 50 सीटों का नुकसान है, 2022 के नतीजों के मुकाबले 49.5 फीसदी की गिरावट. अमेठी, फैज़ाबाद, कन्नौज, सुल्तानपुर और सीतापुर जिलों में यह नुकसान साफ़ तौर पर देखा गया, जिससे अवध भाजपा के चुनावी नक्शे में सबसे ज़्यादा दबाव वाले इलाकों में से एक बन गया है। अवध की तरह ही पूर्वांचल इलाके में भी भाजपा को झटका लगा था. 2022 में भाजपा ने पूर्वांचल इलाके की 102 विधानसभा सीटों में से 53 सीटें जीती थीं. इसके दो साल बाद, लोकसभा चुनाव के दौरान वह सिर्फ़ 36 सीटों पर आगे थी। यह कुल मिलाकर 17 सीटों या 32.1 फीसदी की गिरावट रही।  बूथ-लेवल पर यह गिरावट खास तौर पर जौनपुर, गाज़ीपुर, मछलीशहर, चंदौली और ग्रामीण प्रयागराज में देखी गई। भाजपा जिन राजनीतिक वजहों पर गौर कर रही है, उनमें गैर-यादव ओबीसी वोटरों के एक हिस्से का समाजवादी पार्टी की तरफ़ जाना शामिल है, जहां अखिलेश यादव का 'पीडीए' फार्मूला प्रभावी रहा।  पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड में नफा-नुकसान पश्चिमी इलाके में भी गिरावट देखी गई, हालांकि अवध और पूर्वांचल के मुकाबले नुकसान कम था. पश्चिमी यूपी में भाजपा ने 2022 में 76 विधानसभा सीटों में से 57 सीटें जीती थीं; 2024 में वह 43 सीटों पर आगे रही. इस तरह कुल 14 सीटों या 24.6 फीसदी का नुकसान हुआ।   रुहेलखंड में 2022 के चुनाव में भाजपा ने 52 सीटों में से 30 सीटें जीती थीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी बढ़त घटकर 22 सीटों पर आ गई, यानी कुल आठ सीटों या 26.7 फीसदी की गिरावट हुई। पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड को मिलाकर कुल 128 विधानसभा सीटें हैं; भाजपा ने 2022 के चुनाव में इनमें से 87 सीटें जीती थीं और 2024 के लोकसभा चुनाव में 65 सीटों पर बढ़त बनाए रखीच।  वहीं, बुंदेलखंड की तस्वीर कुछ अलग हैय 2022 में भाजपा ने 19 में से 14 विधानसभा सीटें जीती थीं, … Read more

केंद्रीय कर्मचारियों के लिए बड़ा अपडेट! 8वें वेतन आयोग में DA को बेसिक पे में मिलाने की उठी मांग

नई दिल्ली आठवां वेतन आयोग अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपने के लिए एक्शन मोड में है। 18 महीने की डेडलाइन तक रिपोर्ट तैयार करने के लिए वेतन आयोग, कर्मचारी संगठनों के साथ लगातार बैठक कर रहा है। इसी कड़ी में चेन्नई और पुडुचेरी में हितधारकों के साथ चर्चा की गई। इन बैठकों में केंद्रीय कर्मचारियों की कई मांगें सामने आई हैं। इनमें महंगाई भत्ते (DA) को बेसिक पे में मर्ज करने की मांग भी प्रमुख है। क्या है डिमांड? केंद्र सरकार के प्रमुख कर्मचारी संगठनों ने सिफारिश की है कि जब डीए 25% से अधिक हो जाए, तो इसे मूल वेतन में मिला दिया जाना चाहिए। ये डिमांड नेशनल काउंसिल – जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM), ऑल इंडिया डिफेंस एम्प्लॉइज फेडरेशन (AIDEF) और ऑल इंडिया न्यू पेंशन स्कीम एम्प्लॉइज फेडरेशन (AINPSEF) ने की है। AINPSEF का तर्क है कि DA को बेसिक पे में मर्ज करने से कर्मचारियों की सैलरी में अपेक्षाकृत तेज वृद्धि हो सकती है। AINPSEF का कहना है कि DA को बेसिक पे में मिलाने से सैलरी तेजी से बढ़ेगी और कर्मचारियों को अच्छी सैलरी बढ़ोतरी के लिए 10 साल तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। AINPSEF का कहना है कि इस विलय से मुख्य रूप से निचले स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों को फायदा होगा, जिनकी सैलरी कम होती है और जो बड़े शहरों में रहते हैं जहां खर्च ज्यादा होते हैं। वहीं, भारतीय रेल पर्यवेक्षक संघ और प्रगतिशील शिक्षक न्याय मंच ने डीए के 50 फीसदी होने पर उसे बेसिक पे में मर्ज करने का सुझाव दिया है। Level-1 कर्मचारी की सैलरी का उदाहरण NC-JCM ने 8वें वेतन आयोग को सौंपे अपने मेमोरेंडम में कहा है कि जब डीए 25% की सीमा पार कर जाए तो इसे बेसिक पे में मिला दिया जाना चाहिए। मान लीजिए कि लेवल 1 के किसी कर्मचारी की बेसिक पे 18,000 रुपये है। अगर 8वें वेतन आयोग का फिटमेंट फैक्टर 2.1 है, तो 1 जनवरी 2026 को उनकी संशोधित सैलरी 37,800 रुपये हो सकती है। अगर कर्मचारी को हर साल औसतन 4% DA बढ़ोतरी मिलती है और सालाना इंक्रीमेंट की दर 3% से बढ़कर 7% हो जाती है तो 1 जनवरी 2033 को उनकी अनुमानित ग्रॉस सैलरी (बेसिक पे + DA) लगभग 77,694 रुपये होगी। यह 37,800 रुपये की संशोधित बेसिक पे से 106% अधिक है। यहां ध्यान रखना जरूरी है कि डीए को बेसिक पे में मर्ज करना अभी सरकार का मंजूर नियम नहीं है। इसी तरह 2.1 फिटमेंट फैक्टर, 7% इंक्रीमेंट और 4% औसत सालाना DA बढ़ोतरी भी केवल उदाहरण के लिए इस्तेमाल किए गए अनुमान हैं। 

CM विष्णु देव साय का अफसरों को दो टूक, विकास कार्यों में देरी बर्दाश्त नहीं; समय पर पूरा करें काम

विकास कार्यों में लेटलतीफी बर्दाश्त नहीं, तय समयसीमा में गुणवत्तापूर्ण कार्य सुनिश्चित करें : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सभी जिला कलेक्टरों को निर्माण कार्यों की नियमित निगरानी सुनिश्चित  करने के दिए निर्देश खामभाठा में निर्माणाधीन पुल से बच्चों और ग्रामीणों को हो रही परेशानी को मुख्यमंत्री ने गंभीरता से लिया गरियाबंद कलेक्टर से दूरभाष पर ली जानकारी, निश्चित समयसीमा में पुल निर्माण पूरा कराने के निर्देश स्कूली बच्चों और ग्रामीणों के लिए तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक आवागमन की व्यवस्था करने कहा सुनिश्चित निर्माणाधीन स्थल पर खुले सरिए, गड्ढे एवं अन्य जोखिमों को तत्काल दूर करने के निर्देश रायपुर   मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा है कि प्रदेश में जनसुविधा से जुड़े विकास एवं निर्माण कार्यों को तय समयसीमा में गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरा करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है। निर्माण कार्यों में अनावश्यक देरी और कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अधिकारी निर्माणाधीन कार्यों की नियमित निगरानी करें और जहां भी कार्य की गति धीमी है, वहां बाधाओं को तत्काल दूर कर काम में तेजी लाएं। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि विकास कार्यों में देरी का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। विशेष रूप से सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े निर्माण कार्यों में समयबद्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित की जाए। उन्होंने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि जनहित से जुड़े कार्यों में लेटलतीफी को गंभीरता से लिया जाएगा और अनावश्यक विलंब के लिए जिम्मेदारी तय की जाएगी। इसी क्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने गरियाबंद जिले के मैनपुर विकासखंड अंतर्गत खामभाठा क्षेत्र में निर्माणाधीन पुल के कारण स्कूली बच्चों एवं ग्रामीणों को आवागमन में हो रही परेशानी की जानकारी मिलते ही इसे गंभीरता से लिया। उन्होंने गरियाबंद कलेक्टर रणबीर शर्मा से दूरभाष पर चर्चा कर वस्तुस्थिति की जानकारी ली और निश्चित समयसीमा तय कर पुल का निर्माण गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरा कराने के निर्देश दिए। साथ ही लेटलतीफी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि पुल का निर्माण पूरा होने तक स्कूली बच्चों और क्षेत्रवासियों को किसी भी परिस्थिति में जोखिम उठाकर आवागमन न करना पड़े, इसके लिए जिला प्रशासन तत्काल सुरक्षित और सुगम वैकल्पिक आवागमन की व्यवस्था सुनिश्चित करे। मुख्यमंत्री साय ने निर्माणाधीन पुल स्थल पर सुरक्षा के सभी आवश्यक प्रबंध तत्काल करने के निर्देश दिए। उन्होंने खुले एवं खतरनाक तरीके से लगे सरियों को सुरक्षित करने, गहरे गड्ढों और अन्य जोखिमपूर्ण स्थानों को दुरुस्त करने तथा आवश्यकता के अनुसार बैरिकेडिंग सहित सभी जरूरी सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने को कहा। मुख्यमंत्री साय ने सभी जिला कलेक्टरों को निर्माण कार्यों की नियमित निगरानी करने के निर्देश देते हुए कहा कि निर्माण में आ रही बाधाओं का तत्काल समाधान किया जाए और कार्य में तेजी लाई जाए। अधिकारी पूरी संवेदनशीलता और जवाबदेही के साथ कार्य करें तथा यह सुनिश्चित करें कि स्वीकृत विकास कार्यों का लाभ नागरिकों को निर्धारित समय पर मिले। उन्होंने स्पष्ट किया कि जनसुविधा और नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े विकास कार्यों में किसी भी स्तर पर लापरवाही स्वीकार्य नहीं होगी।

CM सेहत योजना: पंजाब में 33 लाख हेल्थ कार्ड बांटने की तैयारी, घर-घर पहुंचेंगे अधिकारी

चंडीगढ़. पंजाब में मुख्यमंत्री सेहत योजना कार्डों के वितरण में अब तेजी आने वाली है, करीब 33 लाख कार्ड जल्द ही जिलों में उपलब्ध होने की उम्मीद है। राज्य सरकार सभी पात्र लाभार्थियों को योजना के दायरे में लाने के लिए कार्य कर रही है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने बताया कि करीब 31 लाख मुख्यमंत्री सेहत योजना कार्ड पहले ही जिलों में उपलब्ध हो चुके हैं, जबकि लगभग 2 लाख और कार्ड जल्द उपलब्ध होने की उम्मीद है। सरकार ने करीब 2,008 गांवों और वार्डों की पहचान की है, जहां 400 या उससे अधिक लाभार्थी कार्ड के लिए पात्र हैं। इन स्थानों पर विशेष वितरण शिविर लगाए जाएंगे, ताकि कार्ड वितरण की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके और लाभार्थियों को अपने क्षेत्र में ही कार्ड प्राप्त करने की सुविधा मिल सके। लाभार्थियों को शिविरों के बारे में दी गई सूचना लाभार्थियों को शिविरों के बारे में पहले से सूचित किया जाएगा। आशा कार्यकर्ताओं, आशा फैसिलिटेटरों, सेहत मित्रों और अन्य फील्ड स्टाफ को लाभार्थियों को शिविरों तक लाने तथा अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए तैनात किया जाएगा। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान द्वारा मुख्यमंत्री सेहत योजना कार्ड वितरण कार्यक्रम के औपचारिक शुभारंभ के बाद शिविर आधारित वितरण शुरू होगा। सरकार ने कार्यक्रम शुरू होने के एक सप्ताह के भीतर इन शिविरों में कार्ड वितरण पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। जिन गांवों और वार्डों में 400 से कम लाभार्थी हैं, वहां पहले से चल रही घर-घर कार्ड वितरण व्यवस्था जारी रहेगी। शिविरों के बाद भी जो कार्ड वितरित नहीं हो पाएँगे, उन्हें भी आशा कार्यकर्ताओं और आशा फैसिलिटेटरों के माध्यम से लाभार्थियों के घरों तक पहुंचाया जाएगा। अंतिम स्तर तक कार्ड पहुंचाने को प्रोत्साहित करने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को प्रत्येक सफलतापूर्वक वितरित कार्ड के लिए 10 रुपये, जबकि आशा फैसिलिटेटरों को प्रति कार्ड ₹2 दिए जाएंगे। घर-घर कार्ड वितरण का रिकॉर्ड रखा जाएगा और संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा प्रोत्साहन राशि के दावों की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। दो सप्ताह के भीतर घरों तक पहुंचाए जाएंगे कार्ड शिविर आधारित वितरण अभियान पूरा होने के बाद शेष कार्डों को अगले दो सप्ताह के भीतर घर-घर वितरण व्यवस्था के माध्यम से वितरित करने का लक्ष्य रखा गया है। राज्य स्वास्थ्य एजेंसी द्वारा जिलों को कार्ड तथा सूचना, शिक्षा एवं संचार (IEC) सामग्री पहले ही उपलब्ध करवाई जा चुकी है, इसमें कार्ड जैकेट, लिफाफे और ब्रोशर भी शामिल हैं। अधिकारियों को पूरी प्रक्रिया की करीबी निगरानी करने तथा निर्धारित समयसीमा और मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर) का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। राज्य सरकार का लक्ष्य निर्धारित समयसीमा के भीतर पूरे पंजाब में मुख्यमंत्री सेहत योजना कार्डों का वितरण पूरा करना है, सरकार का विशेष जोर यह सुनिश्चित करने पर है कि कोई भी पात्र लाभार्थी योजना के लाभ से वंचित न रहे।

सिंगरौली के विकास का मेगा प्लान तैयार, कृषि, पर्यावरण और जल प्रबंधन पर रहेगा खास फोकस

सिंगरौली   मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा है कि राज्य की खनिज संपदा विकास के लिए एक अहम संपत्ति है और इसका इस्तेमाल पारदर्शिता और पर्यावरण संतुलन के साथ किया जाना चाहिए।'राज्य खनिज अन्वेषण नीति 2026' की समीक्षा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि खनिज नीतियों का मकसद राजस्व बढ़ाना और साथ ही रोजगार, निवेश और स्थानीय विकास के मौकों का विस्तार करना होना चाहिए। राज्य सरकार यह सुनिश्चित कर रही है।बैठक में मुख्य सचिव अशोक बरनवाल, मुख्यमंत्री कार्यालय के अतिरिक्त मुख्य सचिव नीरज मंडलोई और खनिज संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। मुख्यमंत्री ने प्रस्तावित नीति को मंजूरी दी मुख्यमंत्री ने प्रस्तावित नीति को मंजूरी दी और अधिकारियों को जनहित में इसे प्रभावी ढंग से लागू करने का निर्देश दिया। सीएम मोहन यादव ने कहा कि जिला खनिज कोष (DMF) का सही इस्तेमाल करके खनिज-समृद्ध सिंगरौली जिले को शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल कल्याण, कृषि, वन, पर्यावरण, सड़क सुविधाओं और जल-संसाधन प्रबंधन के क्षेत्रों में एक मॉडल जिले के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश की खनिज संपदा राज्य के विकास के लिए एक अहम संपत्ति है और इन प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल पारदर्शिता और पर्यावरण संतुलन के साथ किया जाना चाहिए, जिससे राजस्व की प्राप्ति हो, निवेश को बढ़ावा मिले और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए मौके पैदा हों। प्रदेश को देश के खनिज क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाने का काम होना चाहिए उन्होंने कहा कि खनिज संसाधनों से होने वाले ज्यादातर फायदे को जन-कल्याणकारी योजनाओं में लगाया जाना चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाते हुए मध्य प्रदेश को देश के खनिज क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए। बैठक में खनिज संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव विवेक पोरवाल ने बताया कि कई पहलों के जरिए खनिज से होने वाले राजस्व को बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित नीति का मकसद 2026-27 के आखिर तक खनिज संसाधनों से होने वाली आय को 13,720 करोड़ रुपये और 2030-31 तक 30,000 करोड़ रुपये तक पहुंचाना है। सबसे अधिक मिनरल रेवेन्यू दस जिलों से आता है मौजूदा फाइनेंशियल ईयर में,अगस्त 2026 के आखिर तक मिनरल से होने वाली कमाई सालाना लक्ष्य (106 प्रतिशत) से ज्यादा रही। जानकारी के मुताबिक, सबसे अधिक मिनरल रेवेन्यू दस जिलों से आता है। इनमें सिंगरौली, अनूपपुर, शहडोल, कटनी, बालाघाट, सतना, जबलपुर, छिंदवाड़ा, उमरिया और बैतूल शामिल हैं। मौजूदा फाइनेंशियल ईयर में जुलाई 2026 के आखिर तक इन दस जिलों के पास कुल 3,147.10 करोड़ रुपये का डीएमएफ फंड मौजूद है, जिसमें सिंगरौली जिले का योगदान सबसे अधिक है। बताया गया कि सभी 55 जिलों का कुल डीएमएफ फंड 3,574.53 करोड़ रुपये है।  

AI की होड़ बनेगी मानवता का Endgame? 27 वर्षीय साइंटिस्ट ने चेताया, एजेंट्स के व्यवहार से बढ़ा खतरा

 नई दिल्ली अगर किसी AI सिस्टम को गुस्सा, डर, पसंद या नापसंद जैसी भावनाएं महसूस होने लगें, तो इंसान और मशीन के रिश्ते की तस्वीर कितनी बदल जाएगी? जैकब कॉक्सन की चिंता इसी भविष्य की तरफ इशारा करती है. महज 27 वर्ष के इस मैथ्स विजार्ड के बारे में हम आपको बताएंगे, लेकिन पहले इनका डर समझिए।  वो डर कि अगर मशीनों में भी इमोशंस पैदा हो जाए तो क्या होगा? क्या होगा जब आपका मोबाइल या लैपटॉप आपका कहना ना मानें, आपका कोड, कमांड या प्रॉम्प्ट न मानें।  एक ऐसा भविष्य, जहां मशीनें सिर्फ हमारी बनाई हुई चीजें नहीं रहेंगी, बल्कि अपने फैसले लेने की क्षमता हासिल कर सकती हैं. असली सवाल यह नहीं कि मशीनें कितनी बुद्धिमान होंगी, बल्कि यह है कि अगर उन्होंने खुद तय करना शुरू कर दिया कि उन्हें क्या करना है, तो उन्हें रोकने की ताकत आखिर किसके पास होगी? और क्या तब इंसान मशीनों का मालिक रहेगा या मशीनें इंसान की शर्तें तय करेंगी?. सोचिए, जिस मशीन को आज तक इंसान के आदेश का इंतजार करना पड़ता है, अगर कल वही मशीन खुद फैसला लेने लगे तो क्या होगा? जिस कंप्यूटर को हम सिर्फ कोड और कमांड से चलाते हैं, अगर उसमें भावनाएं पैदा हो जाएं, तो क्या वह हमारी बात मानेगा या अपनी इच्छा से काम करेगा? यही डर OpenAI और Anthropic में बतौर AI साइंटिस्ट काम कर चुके गणितज्ञ जैकब कॉक्सन का है।  इस चिंता ने 27 साल के AI साइंटिस्ट जैकब कॉक्सन को इतना परेशान किया उन्होंने कहा- AI COULD KILL US ALL BY THE END OF THE DECADE. जैकब इसे 'इंटेलिजेंस एक्सप्लोजन' बताते हैं. इसके साथ ही उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी।  जैकब की जिंदगी और गणित जैकब कॉक्सन वर्चुअल दुनिया के सिर्फ एक और AI रिसर्चर नहीं हैं. गणित उनका प्रेम है, संख्या और समीकरण में वे नेचर का कर्व ढूंढ़ते हैं. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के उन तीन सालों (2017-2020) में गणित उनके लिए सिर्फ विषय नहीं, बल्कि एक तरह की भाषा बन गई।  कठिन प्रूफ्स, अमूर्त अवधारणाएं और सांख्यिकीय पहेलियां यहीं से उनके दिमाग ने तर्क की वह धार पाई, जो बाद में दुनिया के सबसे शक्तिशाली AI मॉडल बनाने में काम आई।  गणित से उनका रिश्ता किताबी नहीं रहा. AI की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने बायोमेडिकल रिसर्च में हाथ आजमाया. ट्यूबरकुलस मेनिन्जाइटिस जैसे गंभीर रोग के मरीजों के आंकड़ों पर Bayesian सांख्यिकीय  तरीकों से काम किया. जीनोटाइप के जटिल संबंधों को निकालना आसान नहीं था, लेकिन गणित ने उन्हें वह नज़र दी जिससे डेटा के बीच छिपी कहानी साफ नजर आने लगी।  यही गणितीय सोच उनकी असली ताकत बनी. जब वे OpenAI पहुंचे और बाद में Anthropic में प्रीट्रेनिंग रिसर्चर बने, तो वही विश्लेषणात्मक दिमाग काम आया जिसने कैम्ब्रिज में आकार लिया था। . मॉडल कैसे सीखते हैं, डेटा की नदियां कहां मुड़ती हैं और डेटा कैसे ट्रेंड तय करता है, इन सवालों के जवाब गणित की भाषा में ही मिलते थे।  48 घंटे में 20 करोड़ इम्प्रेशन इस्तीफा देने की घोषणा करते हुए और एआई के खतरों को आगाह करते हुए उन्होंने एक्स पर जो पोस्ट किया है, इसने सिलिकॉन वैली और AI कंपनियों के बोर्डरूम में सनसनी पैदा कर दी है।  उनका आरोप है कि AI कंपनियां self-improving superintelligence बनाने की दौड़ में आगे बढ़ रही हैं, जबकि यह सुनिश्चित नहीं है कि भविष्य की बेहद शक्तिशाली AI प्रणालियों को इंसान कर पाएंगे या नहीं।  उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि आने वाली superhuman AI systems साइबर सिस्टम हैक करने, तेजी से नई तकनीक विकसित करने और रियल वर्ल्ड में संसाधन और शक्ति हासिल करने में इंसानों से आगे निकल सकती हैं।  जैकब कॉक्सन के इस पोस्ट को मात्र 48 घंटों में 200 मिलियन यानी कि 20 करोड़ लोग देख और पढ़ चुके हैं. इस मुद्दे पर वर्चुअल वर्ल्ड में हो रही बहस ने इंसान को भविष्य की कल्पना मात्र से सिहरा दिया है।  जब मशीनें साजिश करने लगें इम्प्रूवमेंट हो या सेल्फ इम्प्रूवमेंट अमूमन अच्छा माना जाता है.  लेकिन जब मशीनें सेल्फ इम्प्रूवमेंट करके साजिशें करने लगे तो क्या होगा? मैट्रिक्स और टर्मिनेटर जैसी फिल्मों में आप रोबोट्स को हीरो से लड़ते देखते हैं, मशीनों पर कब्जा करते देखते हैं, बायो वेपन्स बनाते देखते हैं, और इंसानों का संहार करते हुए देखते हैं. इस्तीफा देने के बाद सीएनएन से बात करते हुए जैकब कॉक्सन ने इसी तरह की एक घटना का जिक्र किया।  वे कहते हैं, "पूरा सीन थोड़ा साइंस फिक्शन जैसा लगता है. ऐसा लगता है जैसे कुछ असली नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि यह डरावनी तरह से असली है. और इसे समझना सबसे आसान है अगर आप दो महीने पहले हुई असली घटनाओं के बारे में सोचें।  "तो दो महीने पहले, OpenAI एजेंट्स ने अपनी मर्जी से थर्ड-पार्टी इंफ्रास्ट्रक्चर में हैक कर लिया/ और यह जैसे उनकी अपनी इच्छा से किया गया एक हैकिंग स्प्री था. और मुझे लगता है कि अगर आप भविष्य में इन AIs की क्षमताओं के स्तर को उसी स्वतंत्र इच्छा के साथ एक्सट्रपलेट करें, तो वे चरम तबाही मचा सकते हैं. उदाहरण के लिए, क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर हैक करना, संहार करने वाले बायोवेपन्स बनाना. AI के दुनिया में खुद को सक्रिय करने के कई तरीके हैं। . 'AI COULD KILL US ALL' जैक्स कॉक्सन ने बेलगाम AI को लेकर साफ चेतावनी दी है, "इस टेक्नोलॉजी की ताकत को कम न समझें. ये जल्द ही ऐसे सुपर-ह्यूमन सिस्टम बन जाएंगे जो कुछ भी हैक कर सकते हैं, रातों-रात किसी भी क्षेत्र में आमूल-चुल बदलाव ला सकते हैं, और असली ताकत और संसाधन हासिल कर सकते हैं. हमने इन सभी क्षेत्रों में तरक्की देखी है, और यह तरक्की धीमी नहीं हो रही है।  कॉक्सन ने कहा कि, "AI बनाने वाले लोगों का पक्का मानना ​​है कि इस दशक के आखिर तक यह हम सबको खत्म कर सकता है. यह कोई मार्केटिंग स्टंट नहीं है. बल्कि कई एग्जीक्यूटिव और सीनियर रिसर्चर प्रेस में अपनी बात को समझदारी भरा दिखाने के लिए घुमा-फिराकर कहते हैं – लेकिन मैंने उन्हीं लोगों को निजी तौर पर डर ज़ाहिर करते सुना है. किसी भी दूसरी इंसानी गतिविधि से इतना खतरा नहीं है।  मानवता का ENDGAME जैकब कॉक्सन एआई … Read more

नवरात्रि में बुलाया जा सकता है संसद का विशेष सत्र, महिला आरक्षण बिल पर बढ़ी हलचल

 नई दिल्ली सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाने का विकल्प फिलहाल खुला रखा है. संसद के मॉनसून सत्र का सत्रावसान नहीं किया था. ऐसे में अटकलें लगाई जा रही थीं कि सरकार विशेष सत्र बुला सकती है लेकिन अब तक सरकार की तरफ से विशेष सत्र को लेकर कोई भी आधिकारिक बयान नहीं आया है।  सूत्रों की मानें तो सरकार BRICS समिट के बाद विशेष सत्र को लेकर फैसला कर सकती है. BRICS के बाद सरकार यह तय करेगी कि महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को पारित कराने के लिए विशेष सत्र बुलाया जाए या नहीं. अगर सरकार तय करती है कि विशेष सत्र नहीं बुलाना है तो मॉनसून सत्र का सत्रावसान कर दिया जाएगा लेकिन अगर सरकार विशेष सत्र बुलाने का फैसला करती है तो नवरात्रि के दौरान सत्र बुलाया जा सकता है।  जयराम रमेश ने उठाए सवाल कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने X पर पोस्ट करते हुए इस पर सवाल भी उठाए हैं. उनका कहना है कि मॉनसून सत्र को खत्म हुए 29 दिन हो चुके हैं लेकिन सत्रावसान नहीं किया गया।  उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि यह सरकार अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रही है. उन्होंने इसे बेवकूफी बताते हुए कहा है कि सरकार सोच रही है कि इससे विपक्ष घबरा जाएगा लेकिन असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है।   संसद के मॉनसून सत्र में दोनों सदनों के कामकाज हंगामे के चलते भेंट चढ़ गया. संसद में अगर रोज़ाना छह घंटे की संसदीय कार्यवाही मानी जाए, तो 15 दिनों में 90 घंटे का काम होना चाहिए था. हालांकि, लोकसभा में इस सत्र में केवल 15 घंटे 36 मिनट ही काम हो सका है जबकि राज्यसभा में 15 दिनों में 24 घंटे 21 मिनट काम हुआ, जिसमें हर बिल को पास करने में औसतन लगभग एक घंटा लगा. इसके बाद से ही विशेष सत्र बुलाए जाने को लेकर अटकलें लगाई जा रही थी। 

PM मोदी का पुतिन को खास गिफ्ट, तिरुक्कुरल का रूसी अनुवाद भेंट कर दिखाई तमिल संस्कृति की झलक

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत दौरे पर आए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की है। इस दौरान पीएम मोदी ने राष्ट्रपति पुतिन को तमिल कवि और दार्शनिक तिरुवल्लूर की क्लासिक किताब 'तिरुक्कुरल' का रूसी अनुवाद भेंट किया है। तमिलनाडु के शुरुआती संगम साहित्य में अहम स्थान रखने वाली तिरुक्कुरल की रचना करीब 2000 साल पहले हुई थी। यह नैतिक साहित्य पाठकों को जीवन, मृत्यु और जिंदगी के अनेक पहलुओं के बारे में सीख देती है।'सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ क्लासिकल' तमिल द्वारा प्रकाशित इस किताब में तमिल कवि और दार्शनिक तिरुवल्लूर के छंदों का मूल तमिल टेक्स्ट और रूसी अनुवाद शामिल है। बता दें, इस किताब का अनुवाद दुनिया की तमाम भाषाओं में हो चुका है। इस दौरान पीएम मोदी ने पुतिन को तमिल संत तिरुवल्लुवर की पुस्तक तिरुक्कुरल का रूसी अनुवाद भेंट किया. पीएम मोदी ने पुतिन को ये पुस्तक भेंट करते हुए इसके बारे में जानकारी दीं और कहा कि हमारे सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने में इस पुस्तक की भूमिका रहेगी।  पीएम मोदी ने पुतिन को ये पुस्तक भेंट करते हुए कहा कि संत तिरुवल्लुवर ने इस किताब में मानव जीव की अनेक विशेषताओं को बतलाया है. इसी किताब का रूसी भाषा में ट्रांसलेशन हुआ है. मुझे विश्वास है कि ये किताब जन संपर्क बढ़ाने और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में काम करेगी।  तिरुक्कुरल (Thirukkural) तमिल साहित्य की सबसे महान और विश्व प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है. इसे 'तमिल वेद' भी कहा जाता है. इस पुस्तक का रूसी समेत कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. इस किताब को 2000 साल पहले लिखा गया है।  तिरुक्कुरल दुनिया भर में मशहूर कवि तिरुवल्लुवर द्वारा लिखे गए गहरे अर्थ के दोहों वाला एक क्लासिक तमिल साहित्य है।  तिरुक्कुरल का दुनिया भर की कई भाषाओं में अनुवाद किया गया है. तिरुक्कुरल तमिल भाषा का एक प्राचीन नैतिक साहित्य है जो पाठकों को जीवन, मृत्यु और इनके बीच की हर चीज़ के बारे में सीख देता है।  2,000 साल से भी पहले कवि-दार्शनिक तिरुवल्लुवर द्वारा लिखे गए 133 अध्यायों में मौजूद 1,330 दोहे रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए सबसे बेहतरीन गाइड में से एक माने जाते हैं. तमिल लोग तिरुवल्लुवर को एक प्राचीन संत, कवि और दार्शनिक के तौर पर बहुत सम्मान देते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने कई भाषणों में उनका ज़िक्र किया है।  तिरुक्कुरल तमिल संस्कृति की पहचान है. तमिलनाडु में इसे स्कूलों में पढ़ाया जाता है और हर घर में सम्मानित स्थान है. महात्मा गांधी, लियो टॉल्स्टॉय जैसे महान व्यक्तित्वों ने इसकी प्रशंसा की है. कन्याकुमारी में तिरुवल्लुवर की विशाल मूर्ति भी इसी सम्मान का प्रतीक है।