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न्यूजीलैंड से FTA समझौते में आम भारतीय के लिए बड़ी राहत, 5000 वीजा और 0 ड्यूटी का फायदा

नईदिल्ली  कल तक जो सिर्फ फाइलों का हिस्सा था आज वो हकीकत बन चुका है. दिल्ली और वेलिंगटन के बीच समुद्र की दूरियां अब व्यापार के सेतु से सिमट गई हैं। जब दुनिया के बड़े-बड़े देश ट्रेड वॉर और मंदी के साये में दुबके हैं, तब भारत ने महज 270 दिनों के भीतर न्‍यूजीलैंड के साथ वो महाकरार कर लिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तहलका मचा दिया है। यह सिर्फ सरकारों के बीच का हाथ मिलाना नहीं है बल्कि भारत के उस मध्यमवर्गीय युवा के सपनों की उड़ान है जो विदेश में करियर बनाना चाहता है और उस छोटे उद्यमी की हिम्मत है जो अपना सामान दुनिया के कोने-कोने में बेचना चाहता है। 5000 वीजा का वो ब्रह्मास्त्र और जीरो ड्यूटी की वो चाबी अब आपके हाथ में है। आइए, इसे बहुत आसान भाषा में समझते हैं।  समझौते की 5 सबसे बड़ी ताकत · 5,000 वीजा का ‘एक्सप्रेस-वे’: अब हर साल कम से कम 5,000 ‘Temporary Employment Entry Visa’ की गारंटी मिलेगी. इसके तहत स्किल्ड प्रोफेशनल्स 3 साल तक न्यूजीलैंड में रहकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकेंगे।  · 100% ड्यूटी फ्री एक्सेस: अब न्यूजीलैंड के बाजार में ‘मेड इन इंडिया’ का डंका बजेगा. भारत से जाने वाले टेक्सटाइल, लेदर, प्लास्टिक और इंजीनियरिंग सामान पर अब जीरो ड्यूटी लगेगी, जिससे भारतीय व्यापारियों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा।  · $20 बिलियन का ‘इन्वेस्टमेंट बूस्टर’: अगले 15 वर्षों में न्यूजीलैंड भारत में 20 बिलियन डॉलर (लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम निवेश करेगा जिससे भारत के बुनियादी ढांचे और स्टार्टअप्स को नई उड़ान मिलेगी।  · किसानों के लिए ‘कीवी’ तकनीक: केवल व्यापार ही नहीं बल्कि अब न्यूजीलैंड के विशेषज्ञ भारतीय किसानों को कीवी, सेब और शहद के उत्पादन में वैश्विक स्तर की तकनीक सिखाएंगे. यह साझेदारी भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित होगी।  · शराब और वाइन पर रियायत: भारत से जाने वाली वाइन और स्पिरिट्स को वहां ड्यूटी-फ्री एंट्री मिलेगी, जबकि न्यूजीलैंड की वाइन पर भारत में मिलने वाली रियायतें 10 वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ाई जाएंगी।  कैसे संभव हुआ यह ‘एक्सप्रेस’ एग्रीमेंट? आमतौर पर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) होने में वर्षों का समय लगता है लेकिन न्यूज़ीलैंड के साथ यह महज 9 महीनों में पूरा हो गया. इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित रहे: · रणनीतिक तालमेल: न्यूज़ीलैंड की कृषि और डेयरी विशेषज्ञता और भारत की विशाल मार्केट और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता एक-दूसरे की पूरक (Complementary) हैं।  · चीन से हटकर विकल्प की तलाश: दोनों देश अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं. यह साझा सुरक्षा और आर्थिक हित इस समझौते की सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति बना।  · विश्वास की नींव: पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारतीय टीम ने पिछले साढ़े तीन साल में 7 समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं. यह ‘स्पीड’ भारत के नए वर्क कल्‍चर को दर्शाती है, जहां जटिल मुद्दों को सुलझाने के लिए डेडलाइन पर काम किया गया।  पाइपलाइन में और क्या है? न्यूज़ीलैंड तो बस शुरुआत है. भारत का असली लक्ष्य दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ सीधा व्यापारिक गलियारा बनाना है: · यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका: आने वाले कुछ महीनों में इन दो दिग्गजों के साथ समझौते होने की उम्मीद है. यह भारत के लिए अब तक की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी. ईयू के साथ जनवरी में मदर ऑफ ऑल डील हुई थी. इसके पूरी तरह से लागू होने की प्रक्रियाएं जारी हैं।  · 9 समझौतों का जादुई आंकड़ा: इन समझौतों के बाद भारत के कुल 9 FTA हो जाएंगे. ये कोई साधारण देश नहीं बल्कि 38 विकसित देश होंगे।  · ग्लोबल GDP पर प्रभाव: इसके पूरा होते ही भारत की पहुंच दुनिया के लगभग दो-तिहाई व्यापार और 65-70% वैश्विक जीडीपी तक सीधे तौर पर हो जाएगी।  विकसित भारत 2047 के लिए यह क्यों जरूरी है? 1. मार्केट एक्सेस: भारतीय किसानों, कारीगरों और MSMEs को अब ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बनाने के लिए ऊंचे टैक्स (Tariffs) का सामना नहीं करना पड़ेगा।  2. निवेश का प्रवाह: न्यूज़ीलैंड का $20 बिलियन का वादा केवल शुरुआत है. अमेरिका और EU के साथ समझौते से भारत में अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आएगा।  3. सर्विस सेक्टर की ताकत: भारत के आईटी और सर्विस सेक्टर के युवाओं के लिए इन विकसित देशों में काम करने और सेवा देने के रास्ते और आसान हो जाएंगे।  सवाल-जवाब न्यूज़ीलैंड के साथ FTA इतनी जल्दी (9 महीनों में) कैसे पूरा हो गया? यह दोनों देशों के बीच साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, विश्वास और चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीतिक जरूरत की वजह से संभव हुआ. पीयूष गोयल ने इसे “भरोसे और मजबूत रिश्तों” का परिणाम बताया है।  क्या भारत का अमेरिका के साथ भी कोई समझौता होने वाला है? जी हाँ, वाणिज्य मंत्री के अनुसार आगामी कुछ महीनों में अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ दो बड़े समझौते पाइपलाइन में हैं।  इन 9 FTA समझौतों का भारत की जीडीपी पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इन समझौतों के बाद भारत की पहुंच दुनिया की लगभग 65-70% ग्लोबल जीडीपी तक हो जाएगी, जिससे भारत के एक्सपोर्ट में भारी बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था में तेज उछाल आने की उम्मीद है।  इस समझौते से आम युवाओं को क्या फायदा होगा? यह FTA स्टार्टअप्स, डिजिटल इकोनॉमी और टेक्नोलॉजी सेक्टर में नए मौके पैदा करेगा. साथ ही, युवाओं के लिए ग्लोबल मार्केट में कौशल और प्रतिभा दिखाने के रास्ते खुलेंगे।   

भारत का रक्षा खर्च 8.66 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ा, ऑपरेशन सिंदूर का प्रभाव

  नई दिल्ली स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने 27 अप्रैल 2026 को अपनी नई रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च रिकॉर्ड 28.87 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह 2024 की तुलना में 2.9 प्रतिशत ज्यादा है. दुनिया भर में लगातार संघर्ष और युद्ध बढ़ रहे हैं, इसलिए हर देश अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. यह 11वां साल है जब दुनिया का सैन्य खर्च लगातार बढ़ा है।  भारत 2025 में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा खर्च करने वाला देश रहा. भारत ने अपना सैन्य खर्च 8.9 प्रतिशत बढ़ाकर 8.66 लाख करोड़ रुपये कर लिया. इस बढ़ोतरी के पीछे मुख्य वजह मई 2025 में पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ऑपरेशन सिंदूर था।  इस ऑपरेशन के बाद भारत ने ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और आधुनिक हथियारों की खरीद तेज कर दी। पाकिस्तान का रक्षा खर्च भी 11 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1.12 लाख करोड़ रुपये हो गया।  मध्य पूर्व में खर्च लगभग स्थिर मध्य पूर्व का सैन्य खर्च 2025 में 2.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024 से सिर्फ 0.1% ज्यादा है. इजरायल का खर्च 4.9% घटकर 4.54 लाख करोड़ रुपये रह गया क्योंकि जनवरी 2025 में हमास के साथ संघर्ष विराम हो गया था. लेकिन तुर्की का खर्च 7.2% बढ़कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. ईरान का खर्च दूसरी बार घटा और 5.6% कम होकर 69,560 करोड़ रुपये रह गया।  दुनिया के टॉप तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस दुनिया के सबसे ज्यादा रक्षा खर्च करने वाले तीन देश अमेरिका, चीन और रूस हैं. इन तीनों ने मिलकर 2025 में 13.91 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो पूरी दुनिया के सैन्य खर्च का 51 प्रतिशत है. अमेरिका ने 2025 में लगभग 8.97 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो 2024 से 7.5 प्रतिशत कम है।  मुख्य वजह यह थी कि साल भर में यूक्रेन को नई सैन्य मदद नहीं दी गई. लेकिन अमेरिका ने अपने परमाणु और सामान्य हथियारों में निवेश बढ़ाया ताकि चीन को इंडो-पैसिफिक में रोका जा सके।  यूरोप में 14% की भारी बढ़ोतरी 2025 में यूरोप का सैन्य खर्च सबसे तेजी से बढ़ा. यह 14% बढ़कर 8.12 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. रूस का खर्च 5.9% बढ़कर 1.79 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो उसके कुल जीडीपी का 7.5% है. यूक्रेन ने 20% बढ़ोतरी के साथ 7.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो उसके जीडीपी का 40% है।  NATO के 29 यूरोपीय देशों ने कुल 5.25 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जर्मनी का खर्च 24 प्रतिशत बढ़कर 1.07 लाख करोड़ रुपये हो गया. स्पेन का खर्च तो 50 प्रतिशत बढ़कर 3.78 लाख करोड़ रुपये हो गया।  मध्य पूर्व में खर्च लगभग स्थिर मध्य पूर्व का सैन्य खर्च 2025 में 2.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024 से सिर्फ 0.1% ज्यादा है. इजरायल का खर्च 4.9% घटकर 4.54 लाख करोड़ रुपये रह गया क्योंकि जनवरी 2025 में हमास के साथ संघर्ष विराम हो गया था. लेकिन तुर्की का खर्च 7.2% बढ़कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. ईरान का खर्च दूसरी बार घटा और 5.6% कम होकर 69,560 करोड़ रुपये रह गया।  एशिया और ओशिनिया में सबसे तेज बढ़ोतरी एशिया और ओशिनिया में सैन्य खर्च 8.1 प्रतिशत बढ़कर 6.40 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह 2009 के बाद सबसे तेज सालाना बढ़ोतरी है. चीन ने 7.4 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 3.16 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जापान का खर्च 9.7 प्रतिशत बढ़कर 5.85 लाख करोड़ रुपये हो गया. ताइवान ने 14 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 1.71 लाख करोड़ रुपये खर्च किए।  मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया. इसके बाद भारत सरकार ने रक्षा खरीद को बहुत तेज कर दिया. खासतौर पर ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, एयर डिफेंस और आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म्स पर जोर दिया गया. SIPRI रिपोर्ट साफ बताती है कि भारत अब अपनी सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए लगातार खर्च बढ़ा रहा है।  दुनिया क्यों बढ़ा रही है रक्षा खर्च? SIPRI की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में संघर्ष बढ़ रहे हैं – यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव, चीन-ताइवान की स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव. हर देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. 2026 में अमेरिका का खर्च और बढ़ने की उम्मीद है।  भारत का 8.66 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट दिखाता है कि देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों को प्राथमिकता दे रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह बढ़ोतरी भारत की मजबूत रक्षा नीति का प्रमाण है।  SIPRI की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में संघर्ष बढ़ रहे हैं – यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव, चीन-ताइवान की स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव. हर देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. 2026 में अमेरिका का खर्च और बढ़ने की उम्मीद है।  भारत का 8.66 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट दिखाता है कि देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों को प्राथमिकता दे रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह बढ़ोतरी भारत की मजबूत रक्षा नीति का प्रमाण है। 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव 28 अप्रैल को सूपखार में करेंगे भैंस पुनर्स्थापन का शुभारंभ

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि चीता पुनर्स्थापना की ऐतिहासिक सफलता के बाद अब जंगली भैंसों की वापसी से प्रदेश की जैव-विविधता में एक नया आयाम जुड़ेगा। प्रदेश में एक सदी से अधिक समय से विलुप्त हो चुकी जंगली भैंस (वाइल्ड बफेलो) प्रजाति की पुनर्स्थापना की रणनीति अब साकार हो रही है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव 28 अप्रैल को बालाघाट जिले के सूपखार एवं टोपला क्षेत्र में कार्यक्रम के अंतर्गत जंगली भैंसों के पुनर्स्थापन अभियान का शुभारंभ करेंगे। मुख्यमंत्री सूपखार में 4 जंगली भैंसों को उनके नए प्राकृतिक आवास में छोड़ेंगे। इनमें 3 मादा और एक नर जंगली भैंसा शामिल है। इस अवसर पर जिले के प्रभारी मंत्री  उदय प्रताप सिंह, अधिकारीगण, स्थानीय जनप्रतिनिधि और नागरिक उपस्थित रहेंगे। इस पहल से भैंस प्रजाति के संरक्षण के साथ ही राज्य का वन पारिस्थितिकी तंत्र भी सशक्त बनेगा। काजीरंगा से कान्हा तक: ऐतिहासिक ट्रांसलोकेशन इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत असम के काजीरंगा से जंगली भैंसों को कान्हा टाइगर रिजर्व लाया जा रहा है। पहले चरण में 4 भैंसों का दल अपनी यात्रा प्रारंभ कर चुका है। कुल 50 भैंसों के समूह को ‘फाउंडर पॉपुलेशन’ के रूप में लाने का लक्ष्य निर्धारित है। इस सीजन में 8 भैंसों को स्थानांतरित किया जाएगा। पूरी प्रक्रिया काजीरंगा और कान्हा के वरिष्ठ अधिकारियों एवं अनुभवी पशु-चिकित्सकों की निगरानी में वैज्ञानिक तरीके से संपन्न की जा रही है। एमपी–असम के बीच वन्यजीव सरंक्षण और जैव विविधता सहयोग का विस्तार इस परियोजना के साथ ही मध्यप्रदेश और असम के बीच वन्यजीव आदान-प्रदान का नया अध्याय भी जुड़ रहा है। असम से गैंडे (राइनो) के दो जोड़े मध्यप्रदेश लाए जाएंगे, जिन्हें भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में रखा जाएगा। इसके बदले में मध्यप्रदेश, असम की मांग के अनुसार 3 बाघ और 6 मगरमच्छों का स्थानांतरण करेगा। इस पर गुवाहाटी में मुख्यमंत्री डॉ. यादव और असम के मुख्यमंत्री  हिमंता विश्व सरमा के बीच हुई बैठक में सहमति बनी थी। ‘चीते के बाद अब भैंस’-जैव-विविधता को समृद्ध बनाने की एक और पहल मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा है कि चीता पुनर्स्थापना के बाद अब जंगली भैंसों की वापसी से प्रदेश की जैव-विविधता में एक नया आयाम जुड़ेगा। यह पहल एक प्रजाति के संरक्षण के प्रयास के साथ ही प्रदेश के वन पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। मध्यप्रदेश पहले ही ‘टाइगर स्टेट’ और ‘लेपर्ड स्टेट’ के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। जंगली भैंसों का पुनर्स्थापन इस गौरव को और सुदृढ़ करेगा। महत्वपूर्ण है यह पुनर्स्थापन मध्यप्रदेश में जंगली भैंसों की आबादी लगभग 100 वर्ष पहले समाप्त हो गई थी। कान्हा के सूपखार क्षेत्र में 1979 के आसपास जंगली भैसा देखा गया था। अत्यधिक शिकार, मानव हस्तक्षेप, आवास का क्षरण और घास के मैदानों का नष्ट होना इसके प्रमुख कारण रहे। वर्तमान में इनकी प्राकृतिक आबादी मुख्य रूप से असम में सीमित है, जबकि छत्तीसगढ़ में इनकी संख्या अत्यंत कम है। कान्हा सबसे उपयुक्त प्राकृतिक आवास भारतीय वन्यजीव संस्थान (देहरादून) द्वारा किए गए अध्ययन में कान्हा टाइगर रिजर्व को जंगली भैंसों के पुनर्स्थापन के लिए सबसे उपयुक्त पाया गया है। यहाँ के विस्तृत घासभूमि क्षेत्र, पर्याप्त जल स्रोत और न्यूनतम मानव हस्तक्षेप इस प्रजाति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं। प्रकृति संतुलन की दिशा में निर्णायक पहल सूपखार में जंगली भैंसों को छोड़े जाने के साथ यह ‘वाइल्ड-टू-वाइल्ड’ पुनर्स्थापना परियोजना एक नए चरण में प्रवेश करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे कान्हा की घासभूमि पारिस्थितिकी को मजबूती मिलेगी और जैव-विविधता संतुलन को नया जीवन मिलेगा। यह पहल मध्यप्रदेश वन विभाग द्वारा मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में संचालित एक और ऐतिहासिक संरक्षण अभियान है, जो आने वाले समय में देश के लिए एक मॉडल के रूप में स्थापित होगा।  

छत्तीसगढ़ ने मनरेगा श्रमिकों की ई-केवाईसी में किया नया कीर्तिमान, देश में अव्वल

मनरेगा श्रमिकों की ई- के वाय सी में छत्तीसगढ़ देश में अव्वल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के मार्गदर्शन में प्रदेश ने रचा नया कीर्तिमान  रायपुर  महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत श्रमिकों के ई-के वाय सी कार्य में छत्तीसगढ़ ने पूरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त कर उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। भारत सरकार द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 97.11 प्रतिशत सक्रिय श्रमिकों का ई-के वाय सी पूर्ण कर लिया गया है, जो राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक है। खास बात यह है कि छत्तीसगढ़ ने केरलम, त्रिपुरा, मिजोरम जैसे छोटे राज्यों तथा कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों को भी पछाड़कर यह उपलब्धि हासिल की है।                महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ;मनरेगा के तहत श्रमिकों की ई.केवाईसी (e-KYC) प्रक्रिया को पूरा करने में छत्तीसगढ़ ने देश भर में अग्रणी स्थान हासिल किया है। प्रदेश में लगभग 56.87 लाख से ज्यादा मजदूरों की डिजिटल वेरिफिकेशन (e-KYC) पूरी की गई है जो भुगतान में पारदर्शिता सुनिश्चित करती है। यह डिजिटल प्रक्रिया फर्जी जॉब कार्डों को हटाने और सीधे वास्तविक लाभार्थियों के बैंक खातों में मजदूरी पहुंचाने में मदद कर रही है।              यह उपलब्धि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कुशल मार्गदर्शन एवं उप मुख्यमंत्री तथा पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री विजय शर्मा के सतत नेतृत्व, मॉनिटरिंग और प्रभावी रणनीति का परिणाम है। राज्य में योजनाबद्ध ढंग से अभियान चलाकर ई-के वाय सी की प्रक्रिया को तेज किया गया, जिससे बड़ी संख्या में श्रमिकों को समयबद्ध रूप से इससे जोड़ा जा सका।          रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ में कुल 58 लाख से अधिक सक्रिय श्रमिकों में से 56 लाख से अधिक का ई-के वाय सी सफलतापूर्वक पूर्ण किया जा चुका है। यह उपलब्धि न केवल प्रशासनिक दक्षता को दर्शाती है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सशक्तिकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।        मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि राज्य सरकार गरीब और श्रमिक वर्ग के हितों के संरक्षण एवं उन्हें योजनाओं का पारदर्शी लाभ दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। ई-के वाय सी के माध्यम से श्रमिकों को समय पर भुगतान एवं योजनाओं का सीधा लाभ सुनिश्चित हो रहा है।        उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा कि यह उपलब्धि प्रदेश के अधिकारियों, कर्मचारियों और ग्राम स्तर पर कार्यरत टीमों के समन्वित प्रयास का परिणाम है। उन्होंने बताया कि ई-के वाय सी से न केवल फर्जीवाड़े पर रोक लगी है, बल्कि वास्तविक हितग्राहियों तक लाभ पहुंचाने में भी पारदर्शिता आई है। शर्मा ने सभी संबंधित अधिकारियों को बधाई देते हुए निर्देशित किया कि शेष लंबित प्रकरणों को भी शीघ्र पूर्ण कर प्रदेश को 100 प्रतिशत e-KYC (ई – के वाय सी) लक्ष्य की ओर अग्रसर किया जाए।            प्रदेश में चलाए गए विशेष अभियान, ग्राम पंचायत स्तर पर जनजागरूकता और तकनीकी संसाधनों के प्रभावी उपयोग से यह सफलता हासिल हुई है। यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ को डिजिटल गवर्नेंस और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में एक अग्रणी राज्य के रूप में स्थापित करती है।

चंडीगढ़ के कर्मचारियों को मिलेगा महंगाई भत्ते में इज़ाफा, जल्द मिलेगा फायदा

चंडीगढ़ चंडीगढ़ प्रशासन के वित्त विभाग ने कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ते की दरों में बढ़ोतरी का आदेश जारी किया है। नए आदेश के अनुसार महंगाई भत्ता 58 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दिया गया है, जो 1 जनवरी 2026 से लागू होगा। यह निर्णय भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के 22 अप्रैल को जारी आदेश के अनुरूप लिया गया है। चंडीगढ़ प्रशासन ने इस निर्णय को अपनाते हुए इसे अपने अधीन कार्यरत सभी कर्मचारियों पर लागू कर दिया है। यह बढ़ा हुआ महंगाई भत्ता भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय वन सेवा तथा अन्य संबंधित सेवाओं के अधिकारियों और चंडीगढ़ प्रशासन के सभी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होगा। वित्त विभाग ने सभी संबंधित विभागों, प्रशासनिक सचिवों और कार्यालय प्रमुखों को आवश्यक कार्यवाही करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही इस आदेश को प्रशासन की आधिकारिक जानकारी प्रणाली पर दर्ज करने के निर्देश भी जारी किए गए हैं। इस फैसले से कर्मचारियों को बढ़ती महंगाई से राहत मिलने की उम्मीद है और उनकी आय में वृद्धि होगी। 1 जनवरी से लागू हुआ 60% महंगाई भत्ता लाखों रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत की खबर है। केंद्र सरकार ने केंद्रीय पेंशनभोगियों और पारिवारिक पेंशनभोगियों के लिए महंगाई राहत (Dearness Relief) में बढ़ोतरी का ऐलान किया है। इस फैसले से पेंशनर्स को बढ़ती महंगाई का सामना करने में बड़ी आर्थिक मदद मिलेगी। महंगाई राहत में कितनी बढ़ोतरी हुई है और यह कब से लागू होगा? पेंशन और पेंशनभोगी कल्याण विभाग के जारी एक कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के अनुसार, महंगाई राहत (DR) में 2% का इजाफा किया गया है। इस बढ़ोतरी के साथ ही बेसिक पेंशन पर मिलने वाला DR मौजूदा 58% से बढ़कर 60% हो गया है। पेंशनर्स के लिए अच्छी खबर यह है कि यह नई दर 1 जनवरी 2026 से पूर्वव्यापी (retroactive) प्रभाव से लागू मानी जाएगी, जिसका मतलब है कि उन्हें पिछले महीनों का एरियर भी मिलेगा। इस बढ़ोतरी का सीधा फायदा किन पेंशनर्स को मिलेगा? आधिकारिक आदेश में स्पष्ट किया गया है कि इस बढ़ी हुई महंगाई राहत का लाभ व्यापक स्तर पर लाभार्थियों को मिलेगा, जिनमें मुख्य रूप से सभी केंद्र सरकार के पेंशनभोगी और पारिवारिक पेंशनभोगी, सशस्त्र बल के पेंशनभोगी और रक्षा सेवा अनुमानों से भुगतान पाने वाले नागरिक (Civilian) पेंशनभोगी, रेलवे के पेंशनभोगी और पारिवारिक पेंशनभोगी, अखिल भारतीय सेवा के रिटायर्ड अधिकारी और पेंशनभोगी और वर्तमान में प्रोविजनल पेंशन प्राप्त करने वाले पेंशनभोगी शामिल हैं। क्या बढ़ा हुआ पैसा खाते में आने में कोई देरी होगी? बिल्कुल नहीं। सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं कि पेंशनर्स को उनके बढ़े हुए लाभ बिना किसी रुकावट या देरी के मिलें। अकाउंटेंट जनरल के कार्यालयों और अधिकृत पेंशन वितरण बैंकों (Pension Disbursing Banks) को तत्काल संशोधित DR के भुगतान की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया है। ज्ञापन में साफ तौर पर कहा गया है कि बैंकों को "किसी अन्य निर्देश की प्रतीक्षा किए बिना" कैलकुलेशन और भुगतान की प्रक्रिया तुरंत आगे बढ़ानी चाहिए।    

ट्रंप का चेतावनी भरा बयान: ईरानी विदेश मंत्री की रूस यात्रा से भड़के, 3 दिन का वक्त दिया

वाशिंगटन ईरान के विदेश मंत्री की रूस की यात्रा से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भड़क गए हैं। उन्होंने धमकी देते हुए कहा है कि अगर तीन दिन के अंदर ईरान समझौता नहीं करता है तो फिर उसकी तेल की पाइपलाइनों में भयंकर विस्फोट होगा। फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि ईरान तेल निर्यात करने के लायक ही नहीं बचेगा। ट्रंप ने कहा कि नाकेबंदी की वजह से ईरान जहाजों के जरिए निर्यात नहीं कर पा रहा है। वहीं पाइपलाइन ध्वस्त होने के बाद उसका निर्यात एकदम से बंद हो जाएगा। बता दें कि ईरान के विदेश मंत्री पाकिस्तान से एक बार फिर रूस पहुंचे हैं और वह अब पुतिन से वार्ता करने वाले हैं। रूसी मीडिया ने इसकी पुष्टि की है। ईरानी विदेश मंत्री के रूस दौरे से नाराज ट्रंप? दरअसल ईरान के विदेश मंत्री अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष वार्ता के लिए पाकिस्तान गए थे। हालांकि डोनाल्ड ट्रंप ने अपने प्रतिनिधिमंडल को भेजने से इनकार कर दिया। इसके बाद ईरानी विदेश मंत्री अराघची भी रूस और ओमान की यात्रा पर निकल गए। रूस के दौरे से वह एक बार फिर पाकिस्तान लौटे। उधर ट्रंप ने कहा कि अब उनकी टीम पाकिस्तान नहीं जाएगी बल्कि जो भी बात होगी, फोन पर ही होगी। ईरान ने भेजा अपना प्रस्ताव ईरान ने एक लिखित प्रस्ताव डोनाल्ड ट्रंप को भेजा था जिसे उन्होंने तुरंत खारिज कर दिया। ट्रंप ने दावा किया कि पहले प्रस्ताव खारिज होने के बाद ईरान ने दूसरा प्रस्ताव भेजा जो कि उससे बेहतर है। उन्होंने कहा कि वार्ता के लिए आने-जाने में सफर बहुत करना पड़ता है और अब सारी बातें फोन पर होंगी। ईरान जब चाहें उन्हें फोन कर सकता है। जानकारी के मुताबिक ईरानी विदेश मंत्री एक बार फिर रूस चले गए हैं और ईरान का कहना है कि मॉस्को में अब आगे की बातें होंगी। राष्ट्रपति ट्रंप ने धमकी देते हुए कहा है कि उसकी तेल की पाइपलाइन को इस तरह तबाह किया जाएगा कि दोबारा वह वैसी पाइपलाइन नहीं बना पाएगा। जियो टीवी' ने ईरानी समाचार एजेंसी 'आईएसएनए' के हवाले से बताया कि अराघची ''युद्ध को पूरी तरह से समाप्त करने के लिए किसी भी समझौते के ढांचे पर ईरान के रुख और विचारों'' से अवगत कराएंगे। ग्यारह और बारह अप्रैल को आयोजित शांति वार्ता का पहला दौर संघर्ष में शामिल पक्षों के लिए वांछित परिणाम लाने में विफल रहा। शनिवार को अराघची के ओमान रवाना होने के बाद, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिकी वार्ताकार स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर अब ईरान के साथ वार्ता के लिए इस्लामाबाद नहीं जाएंगे। रविवार को ट्रंप ने दोहराया कि अमेरिकी और ईरानी अधिकारी संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के लिए फोन पर बातचीत कर सकते हैं।

राघव चड्ढा का अटका बिल: अगर पास होता तो AAP की टूटन और BJP में जाने की बात न होती

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी को राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा झटका दे चुके हैं. आम आदमी पार्टी में बगावत करने वाले राघव चड्ढा अब भाजपाई हो चुके हैं. उनके साथ छह अन्य सांसद भी आम आदमी पार्टी से नाता तोड़ चुके हैं. अब वे सभी भाजपा में हैं. राघव चड्ढा आज भले ही दल बदलकर भाजपा में जा चुके हैं. मगर राघव चड्ढा का ही लाया बिल पास हो गया होता तो वह आज आम आदमी पार्टी छोड़कर अलग नहीं हो पाते. न ही वह बगावत कर पाते. राघव चड्ढा की यह खबर सिर्फ एक नेता के पार्टी बदलने की नहीं है. इसमें एक बड़ी विडंबना छिपी है. चार साल पहले राघव चड्ढा ने खुद एक बिल लाया था, जो दल-बदल को बहुत सख्ती से रोकता. अगर वह बिल कानून बन गया होता तो आज राघव चड्ढा की कहानी कुछ और होती।  जी हां, चार साल पहले राघव चड्ढा राज्यसभा के सबसे युवा सदस्य थे. उन्होंने राज्यसभा के सबसे युवा सदस्य के तौर पर अगस्त 2022 में एक प्राइवेट मेंबर बिल लाया था. उस बिल का मकसद दल-बदल कानून को और सख्त बनाना था. वह कानून बन गया होता तो राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी छोड़कर नहीं जा पाते. न ही वह सदन के अपने छह अन्य पार्टी सदस्यों के साथ मिलकर भाजपा में शामिल हो पाते. दो दिन पहले ही उन्होंने यह घोषणा की थी. जिसमें उन्होंने आम आदमी पार्टी की सदन में मौजूद 10 सदस्यों की कुल संख्या में से दो-तिहाई बहुमत होने का हवाला दिया था।  राघव चड्ढा ने चार साल पहले लाया था बिल  खबर के मुताबिक, अगर राघव चड्ढा का प्रस्तावित बिल कानून बन गया होता तो पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने के लिए राघव चड्ढा को अपनी पार्टी के छह नहीं, बल्कि सात सदस्यों के समर्थन की जरूरत पड़ती. इतना ही नहीं पार्टी तोड़ने के आरोप में इस मौजूदा टीम पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लग जाती।  उस बिल में क्या था? ऐसा इसलिए, क्योंकि संविधान संशोधन बिल में दलबदल विरोधी कानून को और अधिक सख़्त बनाने की मांग की गई थी. यह बिल उन्होंने राज्यसभा में शामिल होने के तीन महीने बाद पेश किया था. इस बिल के तहत पार्टी में वैध रूप से टूट या विभाजन करने के लिए दो-तिहाई नहीं, बल्कि तीन-चौथाई बहुमत की जरूरत होती. इस बिल को राघव चड्ढा ने 5 अगस्त 2022 को एक ‘निजी सदस्य बिल’ के तौर पर सदन में पेश किया था. तब राघव आप चीफ अरविंद केजरीवाल के भरोसेमंद सहयोगी थे।  बिल में क्या मांग की गई थी? ‘विधायकों द्वारा पूरी तरह से लोकतांत्रिक जनादेश की अनदेखी करते हुए गलत इरादे से पार्टी बदलने’ का हवाला देते हुए राघव चड्ढा के प्रस्तावित बिल में संविधान की दसवीं अनुसूची के लिए और भी अधिक सख़्त प्रावधानों के जरिए दलबदल विरोधी नियमों को मजबूत करने की मांग की गई थी. गौरतलब है कि दसवीं अनुसूची में दलबदल के आधार पर चुने हुए प्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने से जुड़े नियम शामिल हैं।  दसवीं अनुसूची में क्या है वर्तमान कानून (दसवीं अनुसूची) कहता है कि अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य मिलकर दूसरी पार्टी में चले जाएं तो उन्हें अयोग्य नहीं माना जाता. राघव चड्ढा के बिल ने इसे बढ़ाकर तीन-चौथाई (3/4) कर दिया था. मतलब 10 सदस्यों वाली पार्टी में कम से कम 8 सदस्यों का सहमत होना जरूरी होता. सिर्फ 7 से काम नहीं चलता।  जानिए बिल में क्या-क्या?     इस प्रस्तावित कानून का मकसद संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 में संशोधन करके और दसवीं अनुसूची में बदलाव करके पार्टी के भीतर विलय के लिए ज़रूरी सदस्यों की संख्या को 2/3 से बढ़ाकर 3/4 करके  लोकतंत्र को मज़बूत करना और जन प्रतिनिधियों को राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं के बजाय जानकार कानून निर्माता बनने में मदद करना था।      बिल में यह भी लिखा था कि अगर कोई सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलता है तो उसे छह साल तक कोई चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं होगी. साथ ही ‘रिसॉर्ट पॉलिटिक्स’ रोकने के लिए अगर कोई सरकार से समर्थन वापस लेता है तो उसे सात दिन के अंदर स्पीकर या चेयरमैन के सामने हाजिर होना पड़ता. अगर वह नहीं करता तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता था।      बिल में साफ लिखा था कि दल-बदल कानून का मकसद विधायकों-सांसदों के खरीद-फरोख्त को रोकना था, लेकिन आज भी यह समस्या बदस्तूर जारी है. दसवीं अनुसूची का दुरुपयोग हो रहा है. यह हमारे लोकतंत्र पर कलंक है. बिल ने अनुच्छेद 102 और 191 में भी बदलाव का प्रस्ताव रखा था ताकि सांसद या विधायक अयोग्य होने पर सदन की सदस्यता चली जाए।  और यह विडंबना तब राघव चड्ढा ने बिल पेश करते समय कहा था कि जनता ने जिस उम्मीद से विधायकों को चुना है, उसके खिलाफ फ्लोर क्रॉसिंग (दल-बदल) करना गलत है. लेकिन आज वही राघव चड्ढा आम आदमी पार्टी की दो-तिहाई बहुमत का हवाला देकर भाजपा में चले गए हैं. अगर उनका 2022 वाला बिल कानून बन जाता तो आज उन्हें सात सदस्यों (न कि छह) का समर्थन चाहिए होता और पूरी टीम को छह साल तक चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता। 

‘4 मई के बाद भाजपा के शपथ ग्रहण समारोह में वापसी करूंगा’, बंगाल में जीत को लेकर पीएम मोदी का भरोसा

बैरकपुर  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण के मतदान से पहले बैरकपुर में एक विजय संकल्प रैली को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने राज्य के साथ अपने लंबे जुड़ाव पर प्रकाश डाला और 4 मई को नतीजों के बाद भाजपा की जीत का भरोसा जताया।  उन्होंने कहा, "इस चुनाव में यह मेरी आखिरी रैली है और पश्चिम बंगाल में मैं जहां भी गया हूं, मैंने लोगों का मूड देखा है. मैं इस भरोसे के साथ लौट रहा हूं कि 4 मई को नतीजों के बाद मुझे भाजपा के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए वापस आना होगा।  पीएम ने कहा, बैरकपुर ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को शक्ति प्रदान की थी; आज यही भूमि बंगाल में बदलाव का मार्ग प्रशस्त कर रही है। पीएम ने कहा कि ओडिशा और बिहार के बाद इस बार पश्चिम बंगाल में कमल खिलेगा. उन्होंने कहा कि पूर्वी भारत का विकास राष्ट्र की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है; तृणमूल के पास बंगाल के विकास के लिए कोई दूरदृष्टि नहीं है. साथ ही उन्होंने कहा कि स्वयं को बंगाल की सेवा करने, सुरक्षा सुनिश्चित करने और राज्य की रक्षा करने के लिए समर्पित मानता हूं. उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान निरस्त करके, भाजपा ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संकल्पों में से एक को पूरा किया. बंगाल में नई भाजपा सरकार श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राज्य की समृद्धि के सपने को पूरा करेगी और शरणार्थी मुद्दे का समाधान करेगी।  बैरकपुर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा- एक ओर मिलें बंद हो रही हैं, दूसरी ओर कच्चे बम बनाने की फैक्ट्रियां खुल रही हैं, गुंडों को नौकरियां मिल रही हैं, टीएमसी का गिरोह फल-फूल रहा है. उन्होंने कहा- टीएमसी का फॉर्मूला है गाली दो, धमकी दो, झूठ बोलो, इन्होंने सेना, संवैधानिक संस्थाएं सब को गालियां दी. वहीं रोजगार की कमी के कारण बंगाल ने दशकों तक पलायन का दर्द सहा है, बीजेपी सरकार की प्राथमिकता युवाओं को रोजगार प्रदान करना होगी. दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होगा और वोटों की गिनती 4 मई को होगी। 

जबलपुर: कॉन्स्टेबल द्वारा वकील को पीटे जाने के 14 दिन बाद FIR, अफसरों पर समझौते का दबाव, हाईकोर्ट में याचिका

जबलपुर जबलपुर के सिविल लाइन थाना क्षेत्र में अधिवक्ता के साथ मारपीट का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। पुलिस आरक्षक पर घर में घुसकर हमला करने के आरोप के बाद पहले पुलिस की निष्क्रियता और फिर देरी से दर्ज एफआईआर ने पूरे घटनाक्रम को विवादों में ला दिया है। अब मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट पहुंच गया है, जहां 29 अप्रैल को सुनवाई प्रस्तावित है। मामूली विवाद से शुरू हुआ हिंसक घटनाक्रम-समीक्षा टाउन निवासी अधिवक्ता पंकज शर्मा के अनुसार 11 अप्रैल की शाम बच्चों के शोर को लेकर हुए विवाद के बाद मदनमहल थाने में पदस्थ आरक्षक साकेत तिवारी उनके घर पहुंचे और गाली-गलौच करते हुए मारपीट करने लगे। बीच-बचाव करने आई महिलाओं और पड़ोसियों के साथ भी अभद्र व्यवहार किया गया। सबूत होने के बावजूद नहीं हुई तत्काल कार्रवाई-घटना के बाद पीड़ित अधिवक्ता सिविल लाइन थाने पहुंचे और सीसीटीवी फुटेज के माध्यम से पूरी घटना की जानकारी दी। आरोप है कि पुलिस ने स्पष्ट सबूत होने के बावजूद एफआईआर दर्ज करने में रुचि नहीं दिखाई और समझौते के लिए दबाव बनाया। कोर्ट की शरण के बाद हरकत में आई पुलिस-कार्रवाई न होने पर अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। इसके बाद 25 अप्रैल को, घटना के लगभग 14 दिन बाद, सिविल लाइन थाने में आरक्षक साकेत तिवारी के खिलाफ विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई। एफआईआर की प्रक्रिया पर भी उठे सवाल-पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता धर्मेंद्र सोनी ने दर्ज एफआईआर की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि एफआईआर जल्दबाजी में और त्रुटिपूर्ण तरीके से दर्ज की गई, जिसमें न तो आवेदक को सूचित किया गया और न ही उनके हस्ताक्षर लिए गए। आरोपी ने खाली किया मकान, दबाव के आरोप-एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी आरक्षक ने अपना किराए का मकान खाली कर दिया। वहीं, पीड़ित पक्ष का आरोप है कि शिकायत वापस लेने के लिए पुलिस द्वारा दबाव बनाया जा रहा था और मना करने पर काउंटर केस की धमकी दी गई। 29 अप्रैल को हाईकोर्ट में सुनवाई-अब इस पूरे मामले पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस बी.पी. शर्मा की एकलपीठ 29 अप्रैल को सुनवाई करेगी, जिसमें मारपीट और कथित तौर पर त्रुटिपूर्ण एफआईआर से जुड़े सभी पहलुओं पर विचार किया जाएगा। बच्चों के शोर से आगबबूला हुआ आरक्षक सिविल लाइन समीक्षा टाउन में रहने वाले अधिवक्ता पंकज शर्मा 11 अप्रैल की शाम करीब 6:30 बजे घर पर आराम कर रहे थे। बाहर बच्चों का शोर हो रहा था, जिस पर उनकी पत्नी ने उन्हें शांत होकर खेलने के लिए कहा। यह बात पास में ही किराए से रहने वाले पुलिस आरक्षक साकेत तिवारी को पता चली। वह शहर के मदन महल थाने में पदस्थ है। आरक्षक अधिवक्ता के घर पहुंचा और गाली-गलौच करने लगा। पास खड़े पड़ोसियों ने विवाद को शांत कराने की कोशिश की। इसी बीच अचानक आरक्षक साकेत तिवारी ने वकील पर हमला कर दिया। पड़ोसी वकील को बचाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन आरक्षक लगातार हमला करता रहा, जिससे उनके चेहरे पर चोट आई। घटना के बाद अधिवक्ता पंकज शर्मा सिविल लाइन थाने पहुंचे और टीआई को वीडियो फुटेज के जरिए सिपाही साकेत तिवारी की करतूत बताई, लेकिन पुलिस ने इस पर ध्यान नहीं दिया। पीड़ित का कहना था कि कार्रवाई करने के बजाय उल्टा उस पर समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा था। वकील बोले- 3 घंटे तक थाने में बैठे रहे अधिवक्ता पंकज शर्मा का कहना था कि बहुत ही मामूली बात पर वर्दी का रौब दिखाते हुए पुलिस आरक्षक साकेत तिवारी ने उनके साथ मारपीट की। साकेत पड़ोस में प्रकाश सराठे के घर किराए से रहते हैं। वकील पंकज शर्मा का आरोप है कि वे रात में तीन घंटे तक थाने में बैठे रहे, लेकिन वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने FIR दर्ज नहीं की, बल्कि उस पुलिसकर्मी को भी वहां से अलग कर दिया, जो रिपोर्ट दर्ज करता है, ताकि वह शिकायत न लिख सके। पंकज शर्मा ने घटना स्थल के सीसीटीवी फुटेज पुलिस को सौंपे, जिसमें विवाद होता दिख रहा है। मारपीट की जानकारी मिलते ही साथी अधिवक्ता सिविल लाइन थाने पहुंच गए। सीएसपी और टीआई ने कार्रवाई का आश्वासन देते हुए जांच की बात कही। लगातार शिकायतें कीं, कार्रवाई नहीं हुई अधिवक्ता पंकज शर्मा का कहना है कि पुलिस आरक्षक साकेत तिवारी के खिलाफ लगातार शिकायत की गई, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में 23 अप्रैल को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर 29 अप्रैल को सुनवाई होनी है। पीड़ित को नहीं दी जानकारी याचिकाकर्ता पंकज शर्मा के वकील धर्मेंद्र सोनी का कहना है कि साकेत तिवारी के खिलाफ जल्दबाजी में जो एफआईआर दर्ज की गई है, उसमें कई खामियां हैं, जिन्हें सुनवाई के दौरान कोर्ट को अवगत कराया जाएगा। उनका कहना है कि जब एफआईआर दर्ज की जा रही थी, तब आवेदक को न तो इसकी जानकारी दी गई और न ही उनके हस्ताक्षर लिए गए। जहां पंकज शर्मा के हस्ताक्षर होना थे, वहां किसी और के हस्ताक्षर कर दिए गए। धर्मेंद्र सोनी ने बताया कि एफआईआर की कंडिका 7 में आरोपी साकेत तिवारी का नाम होना था, वहां उसके अलावा एक और नाम शैलेंद्र सिंह मार्को का भी लिखा है। वह सिविल लाइन थाने में एएसआई के पद पर पदस्थ हैं और उनका इस केस से कोई ताल्लुक नहीं है। अधिवक्ता ने बताया कि जानबूझकर एफआईआर इस तरह लिखी गई है, ताकि बाद में उस पर सवाल खड़े हो सकें।

सुनील वर्मा को मिला ‘लोक संपर्क सम्मान’, भोपाल में जनसंपर्क विभाग में उत्साह

भोपाल पब्लिक रिलेशंस सोसाइटी ऑफ इंडिया की भोपाल इकाई द्वारा ‘राष्ट्रीय जनसंपर्क दिवस-2026’ के अवसर पर 26 अप्रैल को जेके अस्पताल के सीएमई हॉल में कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में पत्रकारिता-जनसंपर्क क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तित्वों को सम्मानित किया गया। इस श्रृंखला में जनसंपर्क विभाग के उप संचालक सुनील वर्मा को उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए ‘लोक संपर्क सम्मान’ प्रदान किया गया। गौरतलब है कि, जनसंपर्क विभाग के उप-संचालक सुनील वर्मा ने अपने कार्यों के जरिए जनसंपर्क के क्षेत्र में एक अलग पहचान बनाई है। उनका व्यक्तित्व सरल, सौम्य और विनम्र है। यह व्यवहार उन्हें सभी वर्गों में लोकप्रिय बनाता है। वे अपने व्यवहार और कार्यशैली से यह सिद्ध करते हैं कि जनसंपर्क केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि लोगों के साथ संवेदनशील और भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करने की प्रक्रिया भी है। वे एक ऐसे अधिकारी के रूप में पहचाने जाते हैं, जो अपने सहयोगियों और आमजन दोनों के प्रति समान रूप से संवेदनशील रहते हैं और सभी का ध्यान रखते हैं। समर्पण और नवाचार के लिए सम्मान जनसंपर्क के प्रति वर्मा की निष्ठा और समर्पण उनके कार्यों में स्पष्ट झलकता है। संवाद को सशक्त बनाने, सूचनाओं को प्रभावी ढंग से प्रसारित करने और शासन तथा जनता के बीच मजबूत कड़ी बनने में उनकी भूमिका सराहनीय रही है। यही वजह है कि वे विभाग में एक विश्वसनीय और प्रेरणास्रोत नाम बन चुके हैं। उन्हें यह सम्मान जनहित के प्रति प्रतिबद्धता, उत्कृष्ट कार्यशैली और जनसंपर्क के क्षेत्र में किए गए नवाचारों के लिए दिया गया। नारी शक्ति का भी वंदन गौरतलब है कि, कार्यक्रम में जनसंपर्क विभाग की सहायक संचालक निहारिका मीणा और हिमांशी बजाज को भी सम्मानित किया गया। मंच पर सभी हस्तियों को वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर, प्रख्यात साहित्यकार उर्मिला शिरीष और एलएनसीटी यूनिवर्सिटी के कुलगुरू डॉ. नरेंद्र कुमार थापक ने सम्मानित किया। बदलते जनसंपर्क पर हुई चर्चा बता दें, कार्यक्रम के दौरान जनसंपर्क और पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती भूमिका और समाज के साथ प्रभावी संवाद की जरूरत जैसे अहम विषयों पर विचार-विमर्श किया गया। यह आयोजन केवल सम्मान समारोह तक सीमित था, बल्कि अनुभवों के आदान-प्रदान और नए विचारों को साझा करने का मंच भी था।