samacharsecretary.com

यासीन मछली का अस्पताल में भर्ती होने का मामला: जेल अधीक्षक बोले- गंभीर बीमारी नहीं, कोर्ट को किया गुमराह

​भोपाल भोपाल की नसों में ड्रग्स का जहर घोलने वाला कुख्यात तस्कर यासीन मछली इन दिनों सलाखों के पीछे रहने के बजाय अस्पताल के बेड पर है। यूरिन इन्फेक्शन की शिकायत लेकर हमीदिया अस्पताल पहुंचे यासीन को लेकर अब जेल प्रबंधन ने बड़ा खुलासा किया है। जेल अधीक्षक का कहना है कि आरोपी को कोई गंभीर बीमारी नहीं है और उसकी हालत पूरी तरह स्थिर है। मेडिकल रिपोर्ट आते ही उसे वापस जेल की काल कोठरी में शिफ्ट करने की अर्जी अदालत में लगाई जाएगी। हालांकि, जेल प्रशासन ने साफ कर दिया है कि यासीन को कोई गंभीर बीमारी नहीं है। इस बात की लिखित जानकारी न्यायालय को दी जा चुकी है। मेडिकल बोर्ड से उसकी बीमारी की डिटेल रिपोर्ट मांगी गई थी, लेकिन यह रिपोर्ट भी अब तक जेल प्रशासन को सौंपी नहीं गई है। जेल सुप्रीटेंडेंट राकेश भांगरे के मुताबिक यासीन को जेल में रहते यूरिन में साधारण इंफेक्शन की शिकायत थी। जिसका जेल में ही उपचार करा दिया गया और उसे आराम भी मिला। हालांकि उसके परिजनों की ओर से न्यायालय में आवेदन देकर इलाज बाहर किसी अस्पताल में कराने की मांग गई। तब कोर्ट उसे उसकी बीमारी संबंधी जानकारी पत्राचार के माध्यम से मांगी गई। कोर्ट को उसकी बीमारी से जुड़ी पूरी जानकारी दी। जिसमें साफ किया गया कि यासीन को कोई गंभीर बीमारी नहीं है। 24 दिसंबर को एक बार फिर कोर्ट से लेटर प्राप्त हुआ, जिसमें आदेश दिया गया कि तत्काल यासीन को हमीदिया अस्पताल चेकअप के लिए भेजा जाए। उसे हमीदिया भेजते ही वहां भर्ती कर लिया गया। हमारी ओर से मेडिकल बोर्ड से पत्राचार के माध्यम से जानकारी मांगी चाही गई कि यासीन की गंभीर बीमारी से मेडिकल रिपोर्ट सहित अवगत कराया लेकिन आज तक मेडिकल बोर्ड से इसका जवाब नहीं मिला है। रेव पार्टियां और ब्लैकमेलिंग का मास्टरमाइंड यासीन का नेटवर्क शहर के रसूखदार मछली कारोबारी शारिक मछली से जुड़ा है। पुलिस जांच में खुलासा हुआ था कि यासीन केवल ड्रग्स नहीं बेचता था, बल्कि वह फार्महाउसों और क्लबों में हाई-प्रोफाइल पार्टियां आयोजित कर युवतियों को नशे का आदी बनाता था। उस पर नशा देकर दुष्कर्म करने और अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने के भी संगीन मामले दर्ज हैं। ​कोर्ट के आदेश पर मिला अस्पताल का सुख क्राइम ब्रांच द्वारा जुलाई में एमडी ड्रग्स के साथ गिरफ्तार किए गए यासीन ने अपनी बीमारी को ढाल बनाकर अदालत में गुहार लगाई थी। जेल अस्पताल से बाहर निकलकर बेहतर इलाज के नाम पर वह पिछले सात दिनों से हमीदिया अस्पताल में भर्ती है। हालांकि, जेल अधीक्षक राकेश भांगरे ने स्पष्ट किया कि मेडिकल बोर्ड की विस्तृत रिपोर्ट का इंतजार है, जिसके बाद कोर्ट को लिखित में स्थिति साफ कर दी जाएगी कि उसे अस्पताल में रखने की जरूरत नहीं है। ऐसे कुख्यात यासीन तक पहुंची थी क्राइम ब्रांच दरअसल, 18 जुलाई को भोपाल पुलिस ने सैफुद्दीन और शाहरुख नाम के दो ड्रग पैडलर को पकड़ा था। वे शहर के विभिन्न क्लबों और पार्टियों में एमडी (मेथामफेटामिन) पाउडर की सप्लाई करते थे। उनसे हुई पूछताछ के बाद पता चला था कि आरोपी पार्टी, क्लब और जिम के माध्यम से युवाओं को फिटनेस और पार्टी कल्चर के नाम पर ड्रग्स का आदी बनाते थे। लड़कियों को पहले मुफ्त में नशा करवा कर उनका शोषण किया जाता था ताकि वे क्लब पार्टियों का आकर्षण केंद्र बन सकें। इनसे 15 ग्राम एमडी पुलिस ने जब्त किया था। 18 जुलाई को गिरफ्तार इन आरोपियों ने पुलिस के सामने जब चाचा-भतीजे के कारनामों का खुलासा किया तो पुलिस ने फिल्मी स्टाइल में प्लानिंग कर इन दोनों ड्रग पैडलर यासीन और शाहवर को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के दौरान यासीन ने भागने की कोशिश की और अपनी स्कॉर्पियो से दो कारों को टक्कर मारी। पुलिस ने इन्हें जेल में पेश कर 5 दिन के रिमांड पर लिया था। पुलिस को इनके पास जो गाड़ी मिली उस पर विधानसभा का पास और प्रेस भी लिखा हुआ था। जेल में यासीन बंदी नंबर 2318 भोपाल के हाई प्रोफाइल ड्रग तस्कर डीजे यासीन अहमद उर्फ मछली को जेल में विचाराधीन बंदी नंबर 2318 के रूप में जाना जाता है। वह अपने बैरक में कम ही बंदियों से बातचीत करता है और गुमसुम रहता है।

भोपाल मेट्रो में यात्रियों की कमी, शेड्यूल में बदलाव—अब ट्रेन चलेगी दोपहर से शाम तक

भोपाल  राजधानी भोपाल में जल्दबाजी में शुरू की गई मेट्रो सेवा अब सवालों के घेरे में है. एक ओर मेट्रो स्टेशनों और रूट को लेकर खामियां सामने आईं, तो दूसरी ओर आधे-अधूरे कॉरिडोर पर चलाई जा रही मेट्रो अब सवारी की कमी से जूझ रही है. हालत यह है कि संचालन के महज 15 दिन में ही भोपाल मेट्रो की रफ्तार थमने लगी है और संचालन समय व ट्रिप में कटौती करनी पड़ रही है. 21 दिसंबर से आम यात्रियों के लिए शुरु हुआ था संचालन भोपाल मेट्रो को 20 दिसंबर 2025 को केंद्रीय शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल खट्टर और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हरी झंडी दिखाकर किया था. जबकि इसके अगले दिन 21 दिसंबर से आम जनता के लिए मेट्रो के गेट खोल दिए गए. शुरुआती एक-दो दिन लोगों में उत्सुकता दिखी और करीब 5 से 6 हजार यात्रियों ने मेट्रो में सफर किया. लेकिन यह उत्साह ज्यादा दिन टिक नहीं सका. दिन गुजरने के साथ यात्रियों की संख्या लगातार घटती चली गई. अब सुबह 9 बजे से नहीं होगा संचालन वर्तमान में स्थिति यह हो गई कि अब रोजाना केवल 500 से 800 यात्री ही मेट्रो का इस्तेमाल कर रहे हैं. कई बार पूरी की पूरी ट्रेन बिना यात्रियों के ही स्टेशन से गुजरती नजर आ रही है. यात्रियों की इस भारी कमी ने मेट्रो कॉर्पोरेशन की चिंता बढ़ा दी है. इसी के चलते भोपाल मेट्रो कॉर्पोरेशन ने संचालन शेड्यूल में बड़ा बदलाव करने का फैसला लिया है. अब सुबह 9 बजे की जगह दोपहर 12 बजे से मेट्रो का संचालन होगा. अब दोपहर से शाम तक 13 ट्रिप चलेगी टाइम टेबल में बदलाव के साथ भोपाल मेट्रो में ट्रिप की संख्या भी 17 से घटाकर 13 कर दी गई है. नया शेड्यूल 5 जनवरी यानि आज से प्रभावी रहेगा. नए शेड्यूल के अनुसार, मेट्रो दोपहर 12 बजे से शाम साढ़े 7 बजे तक ही चलेगी. पहली ट्रेन दोपहर 12 बजे एम्स स्टेशन से रवाना होकर 12 बजकर 25 मिनट पर सुभाष नगर स्टेशन पहुंचेगी. इसके बाद 12 बजकर 40 मिनट पर सुभाष नगर से रवाना होकर 1 बजकर 5 मिनट पर एम्स पहुंचेगी. इस तरह मेट्रो लगभग 75 मिनट के अंतराल में अपनी राउंड ट्रिप पूरी करेगी. इस तरह घटता गया यात्रियों का ग्राफ यात्रियों के आंकड़े भी मेट्रो की गिरती साख को बयां कर रहे हैं. 21 दिसंबर से 2 जनवरी तक कुल 29 हजार यात्रियों ने भोपाल मेट्रो में सफर किया. पहले दिन 6 हजार 568 यात्रियों ने मेट्रो का इस्तेमाल किया. 22 दिसंबर को 2 हजार 896 यात्रियों. 23 को 2 हजार 163 यात्रियों, 24 को 1 हजार 787 यात्रियों, 25 को 4 हजार 264 यात्रियों, 26 को 1 हजार 473 यात्रियों, 27 को 1200 यात्रियों, 28 को 2 हजार 349 यात्रियों, 29 को 1100 यात्रियों, 30 को 967 यात्रियों, 31 को 1 हजार 113 यात्रियों, एक जनवरी को 2 हजार 23 और दो जनवरी को सिर्फ 1 हजार 65 यात्रियों ने ही सफर किया. सवारियों को आकर्षित करना बड़ी चुनौती आर्किटेक्ट और टाउन प्लानर सुयश कुलश्रेष्ठ का कहना है कि, ''भोपाल में मेट्रो जिस मार्ग पर चल रही है, वहां मेट्रो के अलावा बस व अन्य साधन भी मौजूद हैं. इसके साथ ही भोपाल मेट्रो में एम्स से सुभाष नगर तक करीब 7 किलोमीटर पहुंचने में 35 से 40 मिनट लग रहे हैं. जबकि इसी मार्ग पर महज 10 से 15 मिनट में किसी अन्य परिवहन से पहुंचा जा सकता है.'' कुलश्रेष्ठ ने कहा कि, ''इतने कम समय में शेड्यूल बदलने और ट्रिप घटाने को लेकर सोशल मीडिया पर भी मेट्रो को लेकर तंज कसे जा रहे हैं. फिलहाल भोपाल मेट्रो के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोगों को आकर्षित करना और नियमित सवारी बढ़ाना है.'' शाम को 30 मिनट बढ़ाया गया मेट्रो का समय भोपाल मेट्रो के समय में बदलाव क्यों किया गया है, इसको लेकर कोई भी अधिकारी बयान देने से बच रहे हैं. मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कार्पेारेशन के एमडी कृष्णा चैतन्य का कहना है कि, ''सुबह ठंड के कारण लोग कम निकलना पसंद कर रहे हैं. जिससे सुबह के समय लोगों की संख्या कम रहती है. लेकिन दोपहर के बाद सवारियों की भीड़ बढ़ती है. इसलिए पहले मेट्रो का संचालन शाम 7.25 बजे तक किया जा रहा था, लेकिन अब इसे बढ़ाकर 7.55 बजे तक किया गया है.''

योगी सरकार का बड़ा फैसला: पुलिस भर्ती में आयु सीमा में तीन साल की राहत, 32,679 पदों पर होगी भर्ती

योगी सरकार का बड़ा फैसला, पुलिस भर्ती में आयु सीमा पर तीन साल की राहत 32,679 पदों पर सीधी भर्ती में सभी वर्गों को आयुसीमा में छूट उत्तर प्रदेश में युवाओं के हित में फिर आगे आई योगी सरकार लखनऊ उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं को योगी आदित्यनाथ सरकार ने बड़ी राहत दी है। अभ्यर्थियों के हितों को प्राथमिकता देते हुए मुख्यमंत्री के निर्देश पर पुलिस में आरक्षी नागरिक पुलिस एवं समकक्ष पदों पर प्रस्तावित सीधी भर्ती-2025 के लिए अधिकतम आयु सीमा में एकमुश्त तीन वर्ष का शिथिलीकरण प्रदान करने का निर्णय लिया गया है। इस संबंध में शासनादेश जारी कर दिया गया है। लाखों युवाओं को होगा लाभ सीधी भर्ती-2025 के अंतर्गत कुल 32,679 पदों को भरे जाने के लिए यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। शासनादेश के अनुसार आरक्षी नागरिक पुलिस (पुरुष/महिला), आरक्षी पीएसी/सशस्त्र पुलिस (पुरुष), आरक्षी विशेष सुरक्षा बल (पुरुष), महिला बटालियन हेतु महिला आरक्षी, आरक्षी घुड़सवार पुलिस (पुरुष) तथा जेल वार्डर (पुरुष एवं महिला) पदों पर भर्ती प्रक्रिया में सम्मिलित होने वाले सभी वर्गों के अभ्यर्थियों को यह आयु शिथिलीकरण एक बार के लिए प्रदान किया जाएगा। सरकार द्वारा यह निर्णय उत्तर प्रदेश लोक सेवा (भर्ती के लिए आयु सीमा का शिथिलीकरण) नियमावली-1992 के नियम-3 के आलोक में लिया गया है। यह फैसला 31 दिसंबर 2025 को जारी भर्ती विज्ञप्ति के अनुक्रम में 5 जनवरी 2026 को जारी शासनादेश के माध्यम से लागू किया गया है, जिससे बड़ी संख्या में ऐसे अभ्यर्थियों को अवसर मिलेगा जो आयु सीमा के कारण अब तक भर्ती प्रक्रिया से बाहर हो रहे थे। युवाओं के हित में योगी आदित्यनाथ सरकार योगी सरकार का यह कदम साफ संदेश देता है कि प्रदेश की सरकार युवाओं की वास्तविक समस्याओं को समझती है और समाधान के लिए ठोस फैसले लेने से पीछे नहीं हटती। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को न्यायसंगत अवसर देना, रोजगार के अधिक से अधिक विकल्प उपलब्ध कराना और प्रशासनिक निर्णयों में संवेदनशीलता बनाए रखना योगी सरकार की कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है। पुलिस भर्ती में आयु सीमा शिथिलीकरण का यह निर्णय न केवल लाखों युवाओं की उम्मीदों को नया बल देगा, बल्कि यह भी दर्शाता है कि योगी आदित्यनाथ सरकार में युवाओं का भविष्य नीति निर्धारण के केंद्र में है।

ईडी का बड़ा एक्शन: छत्तीसगढ़ शराब घोटाले में IAS निरंजन दास और 31 आबकारी अधिकारियों की संपत्ति कुर्क

रायपुर  छत्तीसगढ़ में चर्चित शराब घोटाले में ईडी ने आईएएस निरंजन दास समेत 30 आबकारी अधिकारियों की 38.21 करोड़ की संपत्ति कुर्क की है। ईडी, रायपुर आंचलिक कार्यालय ने छत्तीसगढ़ शराब घोटाले की चल रही जांच के तहत 2002 के पीएमएलए के तहत आईएएस निरंजन दास (तत्कालीन आबकारी आयुक्त) और 30 अन्य आबकारी अधिकारियों की 38.21 करोड़ रुपये की संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क कर लिया है।  इस घोटाले में राज्य के खजाने को 2,800 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ (आगे के खुलासों के आधार पर संशोधित गणना)। इसमें 78 अचल संपत्तियां शामिल हैं जिनमें आलीशान बंगले, प्रीमियम कॉम्प्लेक्स में फ्लैट, व्यावसायिक दुकानें और विशाल कृषि भूमि शामिल हैं। इसके अलावा, 197 चल संपत्तियां भी शामिल हैं जिनमें उच्च मूल्य की सावधि जमा (एफडी), कई बैंक खातों में शेष राशि, जीवन बीमा पॉलिसियां ​​और इक्विटी शेयर और म्यूचुअल फंड का एक विविध पोर्टफोलियो शामिल है।  ईडी का दावा है कि इस घोटाले से राज्य के राजस्व को 2,800 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है, जिसकी राशि आगे की जांच में और बढ़ सकती है। 275 संपत्तियां ईडी के रडार पर ईडी द्वारा कुर्क की गई कुल 275 संपत्तियों में 78 अचल और 197 चल संपत्तियां शामिल हैं। अचल संपत्तियों की अनुमानित कीमत 21.64 करोड़ रुपये है, जिनमें आलीशान बंगले, प्रीमियम रिहायशी कॉलोनियों में फ्लैट, व्यावसायिक दुकानें और बड़े पैमाने पर कृषि भूमि शामिल है। 16.56 करोड़ रुपये मूल्य की चल संपत्तियों में एफडी, बैंक खातों में जमा राशि, जीवन बीमा पॉलिसियां, इक्विटी शेयर और म्यूचुअल फंड में निवेश शामिल हैं। समानांतर आबकारी व्यवस्था का खुलासा ईडी की जांच में सामने आया है कि वरिष्ठ अधिकारियों और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों से जुड़ा एक आपराधिक सिंडिकेट छत्तीसगढ़ के आबकारी विभाग को नियंत्रित कर रहा था। तत्कालीन आबकारी आयुक्त निरंजन दास और तत्कालीन सीईओ अरुण पति त्रिपाठी ने मिलकर एक समानांतर आबकारी व्यवस्था खड़ी की, जिसके जरिए सरकारी नियमों को दरकिनार कर अवैध कमाई की गई। 38.21 करोड़ रुपये मूल्य की अटैच की गई संपतियों की जानकारी ''अचल संपतियां (21,64,65,015 रुपये): 78 संपत्तियां जिनमें आलीशान बंगले, प्रीमियम कॉम्प्लेक्स में फ्लैट, व्यावसायिक दुकानें और विस्तृत कृषि भूमि शामिल हैं। चल संपत्तियां (16,56,54,717 रुपये): 197 वस्तुएं जिनमें उच्च मूल्य की सावधि जमा (एफडी), कई बैंक खातों में शेष राशि, जीवन बीमा पॉलिसियां और इक्विटी शेयरों और म्यूचुअल फंडों का विविध पोर्टफोलियो शामिल है। ईडी द्वारा की गई जांच से पता चला है कि वरिष्ठ नौकरशाहों और राजनीतिक हस्तियों से जुड़े एक आपराधिक सिंडिकेट ने छतीसगढ़ आबकारी विभाग को पूरी तरह से अपने कब्जे में ले लिया था। निरंजन दास (तत्कालीन आबकारी आयुक्त) और अरुण पति त्रिपाठी (तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सीएसएमसीएल) ने एक समानांतर आबकारी प्रणाली चलाई, जिसने राज्य के नियंत्रणों को दरकिनार करते हुए भारी मात्रा में अवैध कमाई की। इस सिंडिकेट ने सरकारी दुकानों के जरिए अवैध, गैर-कानूनी देसी शराब बनाने और बेचने की "पार्ट-बी" योजना चलाई। इस अवैध शराब का उत्पादन और बिक्री नकली होलोग्राम और गैर-कानूनी बोतलों का इस्तेमाल करके की जाती थी और इसे सरकारी गोदामों को दरकिनार करते हुए सीधे शराब बनाने की भ‌ट्टियों से दुकानों तक पहुंचाया जाता था। यह धोखाधड़ी उक्त उत्पाद शुल्क अधिकारियों की सक्रिय मिलीभगत और साजिश से की गई थी। जांच में यह साबित हुआ कि आबकारी अधिकारियों को उनके अधिकार क्षेत्र में पार्ट-बी शराब की बिक्री की अनुमति देने के लिए प्रति मामले 140 रुपये का निश्चित कमीशन दिया जाता था। अकेले निरंजन दास ने ही 18 करोड़ रुपये से अधिक की पीओसी अर्जित की, जिसके लिए उसे इस घोटाले को अंजाम देने में मदद करने के लिए प्रति माह 50 नाख रुपये की रिश्वत मिलती थी। कुल मिलाकर, 31 आबकारी अधिकारियों ने 89.56 करोड़ रुपये की पीओसी बटोरी/अर्जित की। रायपुर स्थित एसीबी ईओडब्ल्यू द्वारा आईपीसी, 1860 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एफआईआर के आधार पर ईडी ने अपनी जांच शुरू की। पुलिस जांच में पता चला है कि छत्तीसगढ़ शराब घोटाले से राज्य के खजाने को भारी नुकसान हुआ और आरोपियों को इसके बराबर लाभ मिला। वर्तमान कुकर्की राज्य के राजस्व की रक्षा करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की गहरी मिलीभगत को उजागर करती है।'' ‘पार्ट-बी’ योजना से अवैध शराब बिक्री जांच के अनुसार, सरकारी शराब दुकानों के जरिए ‘पार्ट-बी’ योजना चलाई गई। इसके तहत अवैध देसी शराब का निर्माण और बिक्री की गई। नकली होलोग्राम, गैर-कानूनी बोतलों का उपयोग किया गया और सरकारी गोदामों को बायपास कर सीधे भट्टियों से दुकानों तक शराब पहुंचाई गई। यह पूरी प्रक्रिया आबकारी अधिकारियों की मिलीभगत से संचालित होती थी। कमीशन सिस्टम से करोड़ों की कमाई ईडी की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों को प्रति केस 140 रुपये का कमीशन दिया जाता था। अकेले निरंजन दास ने 18 करोड़ रुपये से अधिक की अपराध से अर्जित आय हासिल की, जबकि कुल 31 अधिकारियों ने मिलकर करीब 89.56 करोड़ रुपये की अवैध कमाई की।

भोपाल एम्स की प्रोफेसर रश्मि वर्मा की आत्महत्या के प्रयास के बाद मौत, टॉक्सिक वर्क कल्चर पर उठे सवाल

भोपाल  मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इमरजेंसी एवं ट्रॉमा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ रश्मि वर्मा की सोमवार को मौत हो गई। वह पिछले 24 दिनों से एम्स के एम्स के आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट में भर्ती थीं। जानकारी के अनुसार, डॉ रश्मि वर्मा ने सोमवार की सुबह 10 करीब अंतिम सांस ली। परिजनों को शव सौंप दिया गया है। बीते दिनों पहले उन्होंने एनेस्थीसिया का हाई डोज ले लिया था। जिसके बाद उनके पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. मनमोहन शाक्य उन्हें बेहोशी की हालत में लेकर एम्स पहुंचे थे। 11 दिसंबर को एम्स भोपाल में कराया था भर्ती दरअसल, डॉ. रश्मि वर्मा को 11 दिसंबर को गंभीर हालत में एम्स भोपाल में भर्ती कराया गया था। एनेस्थीसिया का ओवरडोज लेकर खुदकुशी की कोशिश की थी। परिजनों के मुताबिक, उन्हें घर पर अचेत अवस्था में पाया गया, जिसके बाद उनके पति उन्हें तत्काल अस्पताल लेकर पहुंचे। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने उन्हें सीपीआर देकर रिवाइव किया। बताया गया कि उस समय करीब 7 मिनट तक उनकी दिल की धड़कन बंद रही थी। इसके बाद से डॉ. रश्मि का इलाज एम्स के आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर चल रहा था। एम्स के अनुसार, 5 जनवरी की सुबह करीब 11 बजे डॉ. रश्मि वर्मा ने अंतिम सांस ली। उनका शव परिजनों को सौंप दिया गया। डॉ. रश्मि वर्मा ने बेहोशी की दवा (एनेस्थीसिया) का हाई डोज लिया था। उनके पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. मनमोहन शाक्य उन्हें बेहोशी की हालत में एम्स लेकर पहुंचे थे। 7 मिनट तक रुकी थी दिल की धड़कन एम्स पहुंचने से पहले करीब 25 मिनट का वक्त निकल चुका था। डॉक्टरों के मुताबिक, इस दौरान डॉ. रश्मि का दिल लगभग 7 मिनट तक धड़कना बंद कर चुका था। इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों ने तुरंत सीपीआर शुरू किया और तीन बार रेससिटेशन के बाद उनकी हार्टबीट वापस लाई जा सकी थी। हालांकि, इतने लंबे समय तक ब्रेन को ऑक्सीजन नहीं मिलने से मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंच चुकी थी। एमआरआई रिपोर्ट में सामने आया गंभीर ब्रेन डैमेज घटना के 72 घंटे बाद कराई गई एमआरआई रिपोर्ट में ‘ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन’ की पुष्टि हुई थी। इसका मतलब था कि उनके पूरे मस्तिष्क को लंबे समय तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिली। डॉक्टरों के अनुसार, यह स्थिति अकसर कार्डियक अरेस्ट के बाद होती है। इसमें रिकवरी की संभावना बेहद कम रहती है। डॉ. रश्मि वर्मा 24 दिनों से एम्स के मेन आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए थी। हर दिन उम्मीद की किरण तलाशने की कोशिश की गई, लेकिन ब्रेन डैमेज इतना गंभीर था कि सुधार नहीं हो सका। कई बार इलाज का खर्च खुद उठाती थीं डॉ. रश्मि डॉ. रश्मि वर्मा ने प्रयागराज के एमएलएन मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर से एमडी (जनरल मेडिसिन) किया था। वे एम्स भोपाल के अलावा एलएन मेडिकल कॉलेज और पीएमएस भोपाल में भी सेवाएं दे चुकी थीं। पांच साल का टीचिंग अनुभव रखने वाली डॉ. रश्मि गरीब मरीजों की मदद के लिए जानी जाती थीं और कई बार इलाज का खर्च भी खुद उठाती थीं। वर्तमान में सीपीआर ट्रेनिंग प्रोग्राम की नोडल अधिकारी भी थी। घटना के बाद हुई थी आपात बैठक, कई फैसले लिए गए थे डॉ. रश्मि की मौत के बाद एम्स के भीतर के कथित टॉक्सिक वर्क कल्चर, प्रशासनिक दबाव और नोटिस सिस्टम को लेकर सवाल और तेज हो गए हैं। घटना के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स प्रबंधन की आपात बैठक हुई थी, जिसमें ट्रॉमा एंड इमरजेंसी विभाग के एचओडी को हटाने और विभाग को दो हिस्सों में बांटने जैसे बड़े फैसले लिए गए थे। इस पूरे मामले की गोपनीय जांच के लिए हाई लेवल कमेटी गठित भी की गई थी, जिसकी अब तक रिपोर्ट सामने नहीं आई है। तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं बची जान बीते 23 दिनों तक डॉक्टरों की टीम ने लगातार प्रयास किए, लेकिन लंबा इलाज और तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। एम्स प्रशासन ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। सहकर्मियों और स्टाफ के बीच शोक की लहर है। डॉ. रश्मि वर्मा एक समर्पित चिकित्सक के रूप में जानी जाती थीं और इमरजेंसी व ट्रॉमा विभाग में उनकी सेवाओं को सराहा जाता रहा है। डॉक्टरों के अनुसार, इमरजेंसी एंड ट्रॉमा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा 11 दिसंबर 2025 को ड्यूटी पूरी करने बाद शाम को घर लौट आईं थी। रश्मि के पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. रतन वर्मा रात करीब साढ़े 10 बजे उनको बेहोशी की हालत में एम्स लेकर आए। डॉ. रतन ने बताया कि घर पर सब नॉर्मल था। सब अपना-अपना काम कर रहे थे। डॉ. रश्मि के पास पहुंचे तो वो बेहोश मिलीं थीं। जिसके बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था। 7 मिनट तक बंद रहा था दिल डॉ रश्मि का दिल करीब 7 मिनट तक बंद रहा, जिससे उनके दिमाग को गंभीर नुकसान पहुंचा । एमआरआई रिपोर्ट में ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन डैमेज की पुष्टि हुई थी। डॉ. रश्मि वर्मा बीते कई दिनों से वेंटिलेटर सपोर्ट पर थी। इलाज में जुटे चिकित्सकों की मानें तो उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी।

टी.आई.ई समिट से मध्यप्रदेश और राजस्थान के युवाओं को मिलेंगे बेहतर रोजगार अवसर: मुख्यमंत्री डॉ. यादव

टी.आई.ई समिट से मध्यप्रदेश और राजस्थान के युवाओं को मिलेंगे रोजगार के बेहतर अवसर : मुख्यमंत्री डॉ. यादव मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने जयपुर विमानतल पर मीडिया से की चर्चा भोपाल  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत आईटी सहित सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश भी सभी सेक्टर में विकास कार्यों को गति देते हुए भारत सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है मध्यप्रदेश और राजस्थान भाई-भाई हैं। दोनों राज्य अपनी साझा विरासत का संरक्षण करते हुए साझा विकास के लिए निरंतर प्रगतिशील हैं। तकनीक के इस समय में आईटी का विशेष महत्व है। इसके दृष्टिगत दोनों राज्यों में युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर मिलें, इस उद्देश्य से स्टार्ट-अप, इनोवेटर्स और उद्योगपतियों से संवाद के लिए जयपुर में टी.आई.ई. ग्लोबल समिट आयोजित की जा रही है। मध्यप्रदेश सरकार ने पड़ौसी राज्य राजस्थान के साथ वर्षों पुराने विवाद को खत्म कर पार्वती-कालीसिंध-चंबल (पीकेसी) परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सोमवार को जयपुर विमानतल पर मीडिया से चर्चा में यह विचार व्यक्त किए। स्टार्टअप्स, इनोवेटर्स एवं उद्योग प्रतिनिधियों से संवाद समिट में मुख्यमंत्री डॉ. यादव मध्यप्रदेश के प्राथमिकता प्राप्त प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में उपलब्ध अवसरों की विस्तृत जानकारी वैश्विक निवेशकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और स्टार्टअप इकोसिस्टम से जुड़े हितधारकों के साथ साझा करेंगे। वे इनोवेशन एक्सपो का भ्रमण करने के साथ-साथ मध्यप्रदेश पवेलियन का दौरा करेंगे और वहां मौजूद स्टार्टअप्स, इनोवेटर्स एवं उद्योग प्रतिनिधियों से सीधा संवाद भी करेंगे। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री सीईओ, निवेशकों और वैश्विक उद्योग प्रतिनिधियों के साथ वन-टू-वन बैठकें कर मध्यप्रदेश में रणनीतिक निवेश के अवसरों और दीर्घकालिक सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे। गौरतलब है कि टीआईई ग्लोबल समिट-2026 में मध्यप्रदेश का विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग सिल्वर स्टेट पार्टनर के रूप में सक्रिय भागीदारी कर रहा है। यह सहभागिता 27 नवंबर 2025 को आयोजित एमपी टेक ग्रोथ कॉन्क्लेव 2.0 के दौरान द इंडस एंटरप्रेन्योर्स (टीआईई) राजस्थान के साथ हुए समझौते के अनुरूप है। समिट के माध्यम से मध्यप्रदेश अपनी नवस्थापित और प्रगतिशील नीतिगत व्यवस्था का प्रभावी प्रदर्शन करेगा, जो राज्य को अगली सेपीढ़ी की तकनीक, डिजिटल इनोवेशन और उच्च-मूल्य वाले रोजगार सृजन के लिए पसंदीदा गंतव्य बनाने की दिशा में केंद्रित है। साथ ही यह पहल भारत के टियर-2 शहरों में प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप है।  

HC ने जारी किए नए दिशा-निर्देश, अधिकारियों को सुनवाई के दौरान खड़ा रहना नहीं होगा जरूरी, अपमानजनक टिप्पणियों पर रोक

भोपाल  दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान सरकारी अधिकारियों के साथ सम्मानजनक और पेशेवर व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकारी पदाधिकारियों की स्वीय उपसंजाति नियम-2025 के तहत न्यायालय में उपस्थित अधिकारियों को पूरी सुनवाई के दौरान खड़े रहने की बाध्यता नहीं होगी। न्यायालय के समक्ष उत्तर देते समय अथवा बयान दर्ज कराते समय ही उन्हें खड़े रहना पड़ेगा। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायालयों को कार्रवाई के दौरान किसी अधिकारी के शारीरिक स्वरूप, शैक्षिक पृष्ठभूमि, सामाजिक स्थिति या परिधान को लेकर अपमानजनक या अनुचित टिप्पणी करने से बचना चाहिए। अनावश्यक रूप से न्यायालय में तलब न किया जाए कोर्ट में सम्मान और व्यावसायिकता का वातावरण बनाए रखना अनिवार्य बताया गया है। न्यायालयों में अधिकारियों के सम्मानजनक व्यवहार के तय नए मानकों में कहा गया है कि अधिकारियों को अनावश्यक रूप से न्यायालय में तलब न किया जाए। दरअसल, शासन से जुड़े मामलों में कई बार विभाग के प्रमुख सचिव व राज्य के मुख्य सचिव तक को तलब कर लिया जाता है। नए नियमों के तहत अब आवश्यक होगा तभी उन्हें तलब किया जाएगा। नए नियम में क्या कहा गया है? नए नियम में कहा गया है कि यदि विवाद से जुड़े मुद्दों का समाधान शपथ पत्रों और दस्तावेजों के आधार पर संभव है, तो व्यक्तिगत उपस्थिति को नियमित या सामान्य प्रक्रिया के रूप में नहीं अपनाया जाना चाहिए। किसी अधिकारी को केवल उन्हीं मामलों में तलब किया जाना चाहिए, जहां न्यायालय को प्रथम दृष्टया यह प्रतीत हो कि आवश्यक जानकारी नहीं दी जा रही है, तथ्य छुपाएं जा रहे हैं या गलत तरीके से प्रस्तुत किए जा रहे हैं। इसके लिए सुनवाई से कम से कम एक दिन पहले न्यायालय की रजिस्ट्री या संबंधित जिला न्यायालय द्वारा अधिकारी को ईमेल, एसएमएस या व्हाट्सएप के जरिए लिंक भेजा जाना अनिवार्य होगा। यदि भौतिक उपस्थिति आवश्यक हो, तो इसके कारण आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाएंगे और अधिकारी को पर्याप्त पूर्व सूचना दी जाएगी। न्यायिक कार्यवाहियों को तीन श्रेणियों में किया वर्गीकृत हाई कोर्ट ने लंबित मामलों के निपटारे की प्रकृति के आधार पर न्यायिक कार्यवाहियों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। पहली श्रेणी साक्ष्य-आधारित मामलों की है, जिनमें दस्तावेज या मौखिक साक्ष्य की आवश्यकता होती है और ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी की भौतिक उपस्थिति आवश्यक हो सकती है। दूसरी श्रेणी संक्षिप्त कार्यवाहियों की है, जो मुख्य रूप से शपथ पत्रों और अभिलेखों पर आधारित होती हैं। तीसरी श्रेणी गैर-प्रतिकूल कार्यवाहियों की है, जिनमें नीति या तकनीकी विषयों को समझने के लिए अधिकारियों की उपस्थिति जरूरी हो सकती है। अवमानना मामलों में संयम बरतने के निर्देश अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ करते समय न्यायालय को संयम और सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। आमतौर पर पहले नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए। नीतिगत और जटिल मामलों में न्यायालय को आदेशों के अनुपालन के लिए युक्तियुक्त समय सीमा निर्धारित करने के निर्देश दिए गए हैं। यदि सरकार को किसी आदेश के पालन के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता हो, तो वह समय सीमा में संशोधन के लिए न्यायालय से अनुरोध कर सकती है, जिस पर विचार किया जा सकता है। 

इंदौर में डायरिया की हालत गंभीर, 516 बोरिंग का पानी रोकने के बाद 398 मरीज, 9 हजार से अधिक की स्क्रीनिंग

इंदौर  इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से अब तक 17 लोगों की जान चली गई। अभी भी यहां लोगों में नर्मदा और टैंकर के पानी को लेकर लोगों में डर का माहौल है। जिससे इलाके में आरओ की डिमांड बढ़ गई है।भागीरथपुरा में अब बोरिंग का पानी भी दूषित मिला है। मामला सामने आने के बाद शहर में बोरिंग के पानी के सैंपल लिए गए थे। जिनमें से 35 सैंपल फेल हो गए हैं। इनका पानी पीने योग्य नहीं है। ऐसे में इलाके के 516 बोरिंग के पानी के यूज पर प्रतिबंध लगा दिया है। इनमें 400 निजी और 116 सरकारी हैं। इसके अलावा 112 पानी की टंकियों, नलों का पानी और बोरिंग के भी रविवार को सैंपल लिए गए। जिनकी जांच निजी लैब में कराई जाएगी। निगम की खुद की एक लैब है, लेकिन वहां भी कम कर्मचारी हैं। 9 हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग, 20 नए केस  डायरिया संक्रमण के ग्राउंड जीरो माने जा रहे भगीरथपुरा इलाके में स्वास्थ्य टीमों ने रविवार को 2,354 घरों के 9,416 लोगों की जांच की. इस दौरान 20 नए डायरिया मरीज सामने आए. 429 पुराने मरीजों का फॉलोअप भी किया गया. इसी इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 6 लोगों की मौत हो चुकी है. जांच में जुटी ICMR से जुड़ी टीम मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव प्रसाद हासानी ने बताया कि कोलकाता स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन बैक्टीरियल इंफेक्शंस (NIRBI) की एक टीम इंदौर पहुंच चुकी है. यह संस्थान ICMR से संबद्ध है. उन्होंने कहा कि NIRBI के विशेषज्ञ स्वास्थ्य विभाग को तकनीकी सहयोग दे रहे हैं, ताकि संक्रमण को पूरी तरह रोका जा सके और इसके कारणों की गहराई से जांच हो सके.  डॉ. हासानी ने बताया कि भागीरथपुरा इलाके के प्रत्येक घर में ओआरएस के 10 पैकेट और 30 जिंक गोलियां वितरित की गईं. पानी को शुद्ध करने के लिए क्लीन वेट की बोतल की किट प्रत्येक घरों में दी गई है. उपयोग के बारे में भी विस्तार से बताया जा रहा है. इलाके में 17 टीमें लगाई हैं. यहां 5 एंबुलेंस लगाई गई हैं. 24 घंटे डॉक्टर्स की ड्यूटी है.  मौतों के आंकड़ों पर विवाद प्रशासन ने अब तक 6 मौतों की आधिकारिक पुष्टि की है. हालांकि, इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने मृतकों की संख्या 10 बताई है. स्थानीय लोगों का दावा है कि 6 महीने के बच्चे समेत 16 लोगों की मौत हुई है. 'घंटा' बयान पर सियासी बवाल मौतों को लेकर आक्रोश के बीच कांग्रेस ने पूरे मध्य प्रदेश में घंटी बजाकर प्रदर्शन किया. यह विरोध मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के उस बयान को लेकर था, जिसमें उन्होंने 31 दिसंबर की रात मीडिया के सवाल पर कैमरे के सामने 'घंटा' शब्द का इस्तेमाल किया था. कांग्रेस ने इसे असंवेदनशील और अमानवीय बताते हुए विजयवर्गीय के इस्तीफे और न्यायिक जांच की मांग की. विजयवर्गीय के पास शहरी विकास और आवास विभाग का प्रभार है और भगीरथपुरा इलाका उनकी इंदौर-1 विधानसभा सीट में आता है. 11 जनवरी से आंदोलन की चेतावनी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने चेतावनी दी कि अगर मांगें नहीं मानी गईं तो 11 जनवरी से बड़ा आंदोलन किया जाएगा. पटवारी ने इंदौर मेयर पुष्यमित्र भार्गव और संबंधित नगर निगम अधिकारियों के खिलाफ गैर-इरादतन हत्या का केस दर्ज करने की मांग की. उन्होंने कहा, 16 लोगों की मौत हुई है. ये मौतें बीजेपी को मिले जनादेश की हत्या हैं. दूषित पानी से हुई मौतों की न्यायिक जांच होनी चाहिए और दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए. पटवारी ने दावा किया कि भगीरथपुरा के लोग पिछले 8 महीनों से नलों में गंदा पानी आने की शिकायत कर रहे थे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि टैंकरों से सप्लाई किया जा रहा पानी भी दूषित है. देवास में SDM सस्पेंड इस पूरे विवाद के बीच पड़ोसी जिले देवास में एक SDM को सस्पेंड कर दिया गया है. आरोप है कि SDM ने अपने आधिकारिक आदेश में मंत्री के विवादित बयान और कांग्रेस के आरोपों का उल्लेख कर दिया. उज्जैन संभाग के आयुक्त आशीष सिंह ने SDM को गंभीर लापरवाही, उदासीनता और अनियमितताओं के आरोप में निलंबित किया. अधिकारियों के मुताबिक, SDM ने कांग्रेस के ज्ञापन के एक हिस्से को जैसा का तैसा सरकारी आदेश में कॉपी कर दिया था.   ‘सिस्टम की देन है यह आपदा’ प्रसिद्ध जल संरक्षण विशेषज्ञ और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह ने इन मौतों को सिस्टम से पैदा हुई आपदा करार दिया. उन्होंने कहा कि यह हैरान करने वाला है कि भारत के सबसे साफ शहर में ऐसा संकट पैदा हुआ. अगर क्लीन सिटी में यह हाल है, तो बाकी शहरों में पीने के पानी की हालत कितनी खराब होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. राजेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि सीवर लाइन से निकला गंदा पानी पेयजल पाइपलाइन में मिल गया, जिससे उल्टी-दस्त के गंभीर मामले सामने आए. उन्होंने कहा, पैसा बचाने के चक्कर में ठेकेदार ड्रेनेज लाइन के पास ही पानी की पाइपलाइन डाल देते हैं. भ्रष्टाचार ने पूरे सिस्टम को बर्बाद कर दिया है. नर्मदा पर निर्भर इंदौर इंदौर की पानी की जरूरतें पूरी तरह नर्मदा नदी पर निर्भर हैं. नगर निगम की पाइपलाइनों के जरिए खरगोन जिले के जलूद से 80 किलोमीटर दूर से नर्मदा का पानी इंदौर लाया जाता है और एक दिन छोड़कर एक दिन घरों में सप्लाई किया जाता है. नगर निगम अधिकारियों के मुताबिक, इस परियोजना में सिर्फ बिजली बिल पर हर महीने करीब 25 करोड़ रुपये खर्च होते हैं. 'हम पानी नहीं, घी पीते हैं' इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने 27 जून 2024 को एक सेमिनार में कहा था, मेयर बनने के बाद से मैं मजाक करता हूं कि इंदौर एशिया के सबसे अमीर शहरों में से एक है, क्योंकि हम 21 रुपये प्रति लीटर का पानी पीते हैं और उसे बेकार भी बहा देते हैं. हम पानी नहीं, घी पीते हैं. अब यह बयान इंदौर के जल संकट के बीच चर्चा में है. मामला सामने आने के बाद से डर का माहौल 29 दिसंबर को मामला सामने आने के बाद से इलाके में डर का माहौल है। कई लोग जहां नर्मदा का पानी भरने से बच रहे … Read more

‘पैसे बचाने के चक्कर में ड्रेनेज के पास बिछाई गई वॉटर लाइन’, इंदौर त्रासदी पर ‘वॉटरमैन ऑफ इंडिया’ ने उठाए सवाल

इंदौर जाने-माने जल संरक्षणवादी राजेंद्र सिंह ने दूषित पीने के पानी से हुई मौतों को सिस्टम की बनाई हुई आपदा बताया, और आरोप लगाया कि इस त्रासदी के लिए गहरे तक फैला भ्रष्टाचार जिम्मेदार है. मैगसेसे अवॉर्ड विजेता ने चिंता जताई कि इंदौर जैसे शहर में ऐसा संकट कैसे हो सकता है, जिसे लगातार भारत का सबसे साफ शहर माना जाता है. 'वॉटरमैन ऑफ इंडिया' कहे जाने वाले राजेंद्र सिंह ने एक न्यूज एजेंसी को बताया, "अगर देश के सबसे साफ शहर में ऐसी त्रासदी हो सकती है, तो इससे पता चलता है कि दूसरे शहरों में पीने के पानी की सप्लाई सिस्टम की हालत कितनी गंभीर होगी." सरकारी अधिकारियों ने माना कि टॉयलेट से सीवेज का पानी ओवरफ्लो होकर पानी की मेन पाइपलाइन में मिल गया, जिससे उल्टी और दस्त के गंभीर मामले सामने आए. राजेंद्र सिंह ने दावा किया, "इंदौर में दूषित पीने के पानी का संकट सिस्टम की बनाई हुई आपदा है. पैसे बचाने के लिए ठेकेदार पीने के पानी की पाइपलाइन को ड्रेनेज लाइन के बहुत पास बिछाते हैं." उन्होंने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार ने पूरे सिस्टम को बर्बाद कर दिया है. उन्होंने कहा कि इंदौर की घटना इसी भ्रष्ट सिस्टम का सीधा नतीजा है. सिंह ने कहा, "इंदौर में हर साल गिरता भूजल स्तर सबसे ज्यादा चिंता की बात है. मैं 1992 में पहली बार इंदौर गया था. तब भी मैंने पूछा था कि यह शहर नर्मदा नदी के पानी पर कब तक निर्भर रहेगा?" इंदौर का भूजल स्तर साल-दर-साल खतरनाक ढंग से गिर रहा है, जिसे उन्होंने सबसे बड़ी चुनौती बताया. ताजा अपडेट के मुताबिक, इंदौर में दूषित पीने के पानी से फैले डायरिया के प्रकोप के बीच फिलहाल 142 लोग अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से 11 ICU में हैं. वहीं, संक्रमण के केंद्र भागीरथपुरा इलाके में 9 हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग के दौरान 20 नए मरीज पाए गए. भागीरथपुरा में चल रहे सर्वे के दौरान स्वास्थ्य टीमों ने 2354 घरों के 9416 लोगों की जांच की, जहां दूषित पानी से आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार छह लोगों की मौत हो गई है और 20 नए मामले सामने आए हैं. प्रकोप के बाद अब तक 398 मरीजों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया था. इनमें से 256 मरीज ठीक होने के बाद डिस्चार्ज हो चुके हैं. फिलहाल 142 मरीज अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं, जिनमें से 11 ICU में भर्ती हैं.  नर्मदा लाइन के ऊपर बिछा दी ड्रेनेज, अब उजागर निगम की लापरवाही  भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से हुई गंभीर घटना के बाद अब नगर निगम हरकत में आया है। पिछले दो दिनों से निगम की टीमें गलियों में नर्मदा जल लाइन के लीकेज की जांच कर रही हैं। इसी दौरान निगम की लापरवाही और तथाकथित इंजीनियरिंग व्यवस्था की चौंकाने वाली सच्चाई सामने आई है। जांच में पाया गया कि क्षेत्र की अधिकांश गलियों में नर्मदा जल सप्लाई लाइन के ठीक ऊपर ड्रेनेज लाइन बिछाई गई है। यही नहीं, ड्रेनेज के चैंबर भी जल लाइन के ऊपर ही बनाए गए हैं, जिससे सीवरेज और पेयजल के मिलने का गंभीर खतरा पैदा हो गया। नवंबर 2024 से जुड़ी है विवाद की जड़ इस पूरे मामले की जड़ नवंबर 2024 में डाली गई ड्रेनेज योजना से जुड़ी है। उस समय रहवासियों ने स्पष्ट रूप से मांग की थी कि ड्रेनेज लाइन घरों के पीछे मौजूद बैकलेन से बिछाई जाए, जहां पर्याप्त जगह उपलब्ध है। लेकिन क्षेत्र के भाजपा पार्षद कमल वाघेला ने इस प्रस्ताव का विरोध कर दिया। पार्षद व रहवासी आमने-सामने आ गए और विवाद इतना बढ़ा कि पार्षद धरने पर बैठ गए। अंततः निगम ने विवाद से बचने के लिए ड्रेनेज लाइन का काम ही रोक दिया, जिसका खामियाजा अब पूरे इलाके को भुगतना पड़ रहा है। छह महीने से शिकायतें, लेकिन सुनवाई नहीं क्षेत्र के रहवासी पार्षद के रवैये को लेकर बेहद नाराज हैं। उनका आरोप है कि बीते छह महीनों से वे गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। भागीरथपुरा टंकी पर निगमकर्मी की जगह पार्षद के कार्यकर्ता बैठते थे, जो शिकायत तो दर्ज करते थे, लेकिन जोनल कार्यालय के कर्मचारी शिकायत मिलने से ही इन्कार कर रहे हैं। रहवासी पुरुषोत्तम यादव का कहना है कि वे कई बार समस्या लेकर पार्षद के घर गए, लेकिन कभी गंभीरता से नहीं सुना गया। अब दूषित पानी से सैकड़ों लोगों के बीमार होने की घटना के बाद निगम और जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।  

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं, बाकी 5 आरोपियों को मिली राहत

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के आरोपियों शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज कर दी है. हालांकि शीर्ष अदालत ने इस मामले में पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि दिल्ली दंगों में इन दोनों आरोपियों की भूमिका अन्य से अलग थी. इस दोनों की भूमिका इस पूरे मामले के षड्यंत्र के केंद्र में दिखती है. ऐसे में इनको जमानत नहीं दी जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि आदेश काफी विस्तृत है, इसलिए केवल कुछ महत्वपूर्ण अंश ही पढ़े जाएंगे. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मामले में त्वरित सुनवाई बेहद आवश्यक है. बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि जांच और ट्रायल में हुई देरी के लिए अभियोजन यानी दिल्ली पुलिस जिम्मेदार है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट की इसी टिप्पणी में शरजील और उमर के लिए उम्मीद दिख रही है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हो सकता है कि मामले की त्वरित सुनवाई हो और सुनवाई के दौरान ये दोनों निर्देश पाए जाते हैं तो उनको राहत मिल सकती है. 5 आरोपियों को दर्जनभर शर्तों पर जमानत सर्वोच्च अदालत ने गुलफिशा फातिमा, मेरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दी है। अदालत ने कहा कि इन अभियुक्तों को जमानत दिए जाने से उनके विरुद्ध लगाए गए आरोपों में किसी प्रकार की ढील या कमजोरी नहीं मानी जाएगी। इन्हें कुछ शर्तों (लगभग 12 शर्तें) के अधीन जमानत पर रिहा किया जाएगा। यदि किसी भी शर्त का उल्लंघन किया जाता है, तो ट्रायल कोर्ट अभियुक्तों को सुनवाई का अवसर देने के बाद जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा। हाई कोर्ट ने भी जमानत से किया था इनकार आरोपियों ने फरवरी 2020 के दंगों की 'बड़ी साजिश' रचने से जुड़े मामले में जमानत से इनकार के दिल्ली हाई कोर्ट के 2 सितंबर के आदेश को चुनौती देते हुए शीर्ष न्यायालय का रुख किया था। 10 दिसंबर को सुनवाई पूरी होने के बाद जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता, अतिरिक्त सॉलीसिटर जनरल एसवी राजू और वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, सिद्धार्थ दवे, सलमान खुर्शीद और सिद्धार्थ लूथरा के बीच लंबी दलीलें चली थीं। दिल्ली पुलिस ने इन दलीलों के साथ किया था जमानत याचिका का विरोध दिल्ली पुलिस ने उमर, शरजील और अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए कहा था कि फरवरी 2020 में दंगे अचानक नहीं हुए थे बल्कि भारत की संप्रभुता पर हमला करने के लिए पूर्व नियोजित तरीके से इन्हें अंजाम दिया गया था। उमर, शरजील और अन्य आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1967 और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था। उन पर आरोप है कि वे 2020 के दंगों के 'सरगना' हैं, जिनमें 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। शरजील इमाम और उमर खालिद की तरफ से क्या दलीलें शरजील इमाम की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने अदालत में कहा था, 'वह आतंकवादी नहीं हैं, जैसा कि प्रतिवादी (पुलिस) ने उन्हें कहा है। वह राष्ट्र-विरोधी नहीं हैं, जैसा कि सरकार ने कहा है। वह इस देश के नागरिक हैं, जन्म से नागरिक हैं और उन्हें अब तक किसी भी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया है।' उन्होंने दलील दी कि इमाम को 28 जनवरी, 2020 को गिरफ्तार किया गया था, जो कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा से पहले की बात है। उमर खालिद की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि फरवरी 2020 में जब दंगे भड़के थे तब उनका मुवक्किल दिल्ली में नहीं था और उसे इस तरह कैद में नहीं रखा जा सकता। गुलफिशा फातिमा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने अदालत को बताया कि कार्यकर्ता ने छह साल जेल में बिताए हैं और उन्होंने मुकदमे में देरी को 'आश्चर्यजनक और अभूतपूर्व' बताया। खालिद, इमाम और अन्य की जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध करते हुए, दिल्ली पुलिस ने कहा कि फरवरी 2020 के दंगे कोई स्वतःस्फूर्त घटना नहीं थे, बल्कि भारत की संप्रभुता पर एक 'सुनियोजित, पूर्व नियोजित और सुनियोजित' हमला थे। फैसले में कहा गया कि देरी न्यायिक जांच को और अधिक सख्त बनाने का एक कारण बनती है. आदेश में कहा गया, “अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में केंद्रीय स्थान रखता है. विचाराधीन कैद को सजा के रूप में नहीं माना जा सकता. स्वतंत्रता से वंचित करना मनमाना नहीं होना चाहिए. यूएपीए एक विशेष कानून है, जो यह तय करता है कि ट्रायल से पहले जमानत किन परिस्थितियों में दी जा सकती है.” सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि उमर खालिद और शरजील इमाम की स्थिति अन्य आरोपियों से गुणात्मक रूप से अलग है. यह अदालत की प्रमुख टिप्पणियों में से एक है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम यूएपीए की धारा 43(डी)(5) के तहत निर्धारित कसौटी पर खरे नहीं उतरते. ऐसे में इन दोनों की याचिकाएं खारिज की जाती है. पांच अन्य आरोपियों को राहत सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए सोमवार को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े यूएपीए मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं. लेकिन दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जमानत से इनकार किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी. हालांकि, शीर्ष अदालत ने इसी मामले में गल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी.