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ओवैसी और हुमायूं कबीर की जोड़ी, ममता बनर्जी के लिए चुनौती बनेगी?

कलकत्ता हुमायूं कबीर ने एक बार खुद को पश्चिम बंगाल का असदुद्दीन ओवैसी बताया था. मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनवाने को लेकर चर्चा और विवादों में आए हुमायूं कबीर अब पश्चिम बंगाल में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं – ईद के मौके पर दोनों तरफ से यह बात कंफर्म की गई है।   हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी और मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर ने प्रस्तावित चुनावी गठबंधन का ऐलान किया. असदुद्दीन ओवैसी 25 मार्च को कोलकाता में हुमायूं कबीर के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में औपचारिक घोषणा और चुनावी गठबंधन की रूपरेखा पेश करेंगे।  तृणमूल कांग्रेस से सस्पेंड किए जाने के बाद हुमायूं कबीर ने दिसंबर, 2025 में अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाई थी. आम जनता उन्नयन पार्टी. और, अपनी पार्टी बनाने से पहले ही हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के साथ मिलकर चुनाव लड़ने और ममता बनर्जी के सामने कड़ी चुनौती पेश करने का ऐलान कर दिया था।  तब AIMIM प्रवक्ता सैयद असीम वकार के बयान को लेकर काफी कंफ्यूजन हुआ था, लेकिन बाद में AIMIM के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष इमरान सोलंकी ने प्रवक्ता के बयान से किनारा कर लिया था. हुमायूं कबीर पर गंभीर आरोप लगाते हुए सैयद असीम वकार ने ऐसी किसी भी संभावना से साफ इनकार कर दिया था. सैयद असीम वकार ने हुमायूं कबीर को बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी का करीबी बताया, और हुमायूं कबीर को शुभेंदु अधिकारी के पॉलिटिकल सिस्टम का हिस्सा बताया था. सैयद असीम वकार का कहना था, कबीर के साथ जाने का सवाल ही नहीं उठता… उनके प्रस्ताव हमारी विचारधारा से बिल्कुल मेल नहीं खाते।  AIMIM के पश्चिम बंगाल अध्यक्ष इमरान सोलंकी ने हुमायूं कबीर के साथ बातचीत होने का दावा किया. सैयद असीम वकार के बयान की याद दिलाने पर इमरान सोलंकी ने कहा था, ‘हां, हम जानते हैं कि वकार ने क्या कहा था, लेकिन फिलहाल यह पार्टी का आधिकारिक रुख नहीं है।  बंगाल में ओवैसी और हुमायूं कबीर साथ साथ पश्चिम बंगाल में हुमायूं कबीर की प्रस्तावित बाबरी मस्जिद मैदान पर पहली बार ईद की नमाज अदा की गई. इस मौके पर बीरभूम, नदिया और पूर्वी मेदिनीपुर जैसे जिलों के अलावा झारखंड से भी काफी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग मुर्शिदाबाद पहुंचे थे।  ईद की नमाज का आयोजन करने के बावजूद 'आम जनता उन्नयन पार्टी' के संस्थापक हुमायूं कबीर व्यस्त होने के कारण व्यक्तिगत रूप से मौजूदगी नहीं दर्ज करा सके. हुमायूं कबीर ने फोन पर वहां जुटी भीड़ के बीच अपनी बात रखी – और उसी दौरान ऐलान किया कि आम जनता उन्नयन पार्टी विधानसभा की 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. हुमायूं कबीर ने यह भी बताया कि आम जनता उन्नयन पार्टी और AIMIM के बीच गठबंधन हुआ है, और  AIMIM आठ सीटों पर चुनाव लड़ेगी।  उधर, हैदराबाद में ईद के मौके पर ही एक कार्यक्रम में असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को टार्गेट करते हुए हुमायूं कबीर के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, हमारी कोशिश है कि AIMIM को मजबूत किया जाए, हमारी आवाज को मजबूत किया जाए. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार है, वहां 30 फीसदी मुसलमानों की आबादी है… वहां लगभग पांच लाख पिछड़े वर्ग के प्रमाण पत्रों को रद्द कर दिया गया, जिनमें मुसलमान भी शामिल हैं… ये लोग धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वोट हासिल करते हैं लेकिन जहां AIMIM हिस्सेदारी की बात करती है तो इन्हें तकलीफ होती है।  ममता बनर्जी को कठघरे में खड़ा करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ‘अन्याय की कई कहानियां हैं।  भवानीपुर और नंदीग्राम पर भी हुमायूं कबीर की नजर हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी ने भवानीपुर विधानसभा सीट पर पूनम बेगम को उम्मीदवार बनाया है. भवानीपुर से ही ममता बनर्जी फिलहाल विधायक हैं, और बीजेपी ने उनके खिलाफ विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को टिकट दिया।  काउंटर स्ट्रैटेजी के तहत तृणमूल कांग्रेस ने नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी के ही करीबी पबित्र कर को उम्मीदवार बनाया है. शुभेंदु अधिकारी फिलहाल नंदीग्राम से ही विधायक हैं. और, भवानीपुर के साथ साथ नंदीग्राम से भी चुनाव मैदान में हैं।  भवानीपुर के साथ साथ हुमायूं कबीर ने नंदीग्राम में आम जनता उन्नयन पार्टी की तरफ से शाहिदुल हक को उम्मीदवार बनाया है. इस तरह भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों हाई प्रोफाइल सीटों पर तीनों पार्टियां मैदान में डट गई हैं।  हुमायूं कबीर खुद मुर्शिदाबाद जिले की रेजिनगर और नौदा सीटों से विधानसभा का चुनाव लड़ने जा रहे हैं. ध्यान देने वाली बात है कि हुमायूं कबीर ने अपनी भरतपुर सीट छोड़ दी है, जहां से फिलहाल विधायक हैं।  पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए आम जनता उन्नयन पार्टी का घोषणापत्र 28 मार्च को सामने आएगा. यानी असदुद्दीन ओवैसी के साथ गठबंधन की औपचारिक घोषणा के तीन दिन बाद. पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे, और वोटों की गिनती 4 मई को होगी।  बंगाल के मुस्लिम वोटर और तृणमूल कांग्रेस 2011 की जनगणना के मुताबिक तो पश्चिम बंगाल की आबादी में मुसलमानों की संख्या करीब 27 फीसदी है, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी और कुछ रिपोर्टों की मानें, तो फिलहाल यह 30 फीसदी के आस पास है. पश्चिम बंगाल के मालदा, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर और दक्षिण बंगाल के कई हिस्सों में मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में माने जाते हैं।  2020 के बिहार चुनाव में AIMIM के 5 सीटें जीत लेने के बाद असदुद्दीन ओवैसी को पश्चिम बंगाल चुनाव में भी वैसी ही उम्मीद थी, लेकिन निराशा हाथ लगी. सीट तो एक भी नहीं मिली, वोट शेयर भी मामूली ही रहा – अब हुमायूं कबीर के मैदान में आ जाने के बाद अगर असदुद्दीन ओवैसी मिलकर कोई असर दिखा पाएं, तो चमत्कार ही कहा जाएगा।  बाद में जो भी हो, बाकी राजनीतिक दलों की तरह हुमायूं कबीर का दावा है कि देश की आजादी के बाद, पहली बार पश्चिम बंगाल में शासन की बागडोर एक मुस्लिम मुख्यमंत्री के हाथों में होगी, या फिर मुस्लिम समुदाय से डिप्टी सीएम होगा।  ममता बनर्जी का क्या बिगाड़ पाएंगे? हुमायूं कबीर को लगता है कि मुर्शिदाबाद में नई बाबरी मस्जिद के निर्माण का प्रस्ताव भावनात्मक मुद्दा है, और पश्चिम बंगाल … Read more

ममता की सुरक्षित सीट पर बदलते समीकरण, 2021 का चुनावी परिणाम TMC के लिए चुनौतीपूर्ण क्यों

कोलकाता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए कार्यक्रम का ऐलान होने के बाद से सियासी तापमान बढ़ गया है. राजनीतिक दलों ने भी अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अपने 291 उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर चुकी है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भवानीपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरेंगी. विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही दक्षिण कोलकाता के भवानीपुर में राजनीतिक माहौल काफी गरम होता दिख रहा है। भवानीपुर की गलियों में चुनावी हलचल तेज है और यहां की लड़ाई सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि कोलकाता की बदलती पहचान पर जनमत संग्रह की तरह मानी जा रही है. जहां तक नाम का सवाल है, भवानीपुर का अलग आध्यात्मिक इतिहास है. भवानीपुर को देवी भवानी का क्षेत्र माना जाता है और इसकी पहचान पवित्र कालीघाट मंदिर के ऐतिहासिक प्रवेश द्वार के रूप में भी रही है. हालांकि, यह इलाका एक शांत बाहरी बस्ती से अब पॉश इलाके के रूप में तब्दील हो चुका है। भवानीपुर की सामाजिक संरचना बहुत जटिल मानी जाती है. इस इलाके में पारंपरिक बंगाली परिवारों के मोहल्ले हैं, जहां राजनीतिक बहस आम बात है. गुजराती और मारवाड़ी समुदाय इस इलाके की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार माने जाते हैं. भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में सिख और मुस्लिम समुदाय के साथ ही बिहार के लोगों की आबादी भी अच्छी तादाद में है. भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में करीब 70 फीसदी गैर बंगाली आबादी है. साल 1984 में अपने सियासी सफर की शुरुआत के बाद से ही ममता बनर्जी भवानीपुर को अपने मजबूत गढ़ के रूप में देखती रही हैं। 2021 के नतीजे अलार्मिंग  सीएम ममता के इस मजबूत गढ़ में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने भी हालिया समय में अपनी जमीन मजबूत की है. साल 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जिस तरह का प्रदर्शन किया, वह ममता बनर्जी और टीएमसी के लिए अलार्मिंग है. बीजेपी ने टीएमसी के उम्मीदवार को तब न सिर्फ मजबूत चुनौती दी, बल्कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास हरीश चटर्जी स्ट्रीट के आसपास के वार्ड से भी ठीक-ठाक वोट जुटाए. इस बार टीएमसी के सामने दीदी के दुर्ग को मजबूत करने की चुनौती होगी। क्या कहते हैं वोटर जादू बाबू बाजार के आसपास 30 साल से रिक्शा चलाने वाले सिकंदर यादव ने अपना दर्द बयान करते हुए कहा कि कमाई लगभग खत्म हो गई है. उन्होंने कहा कि सरकार को हमारे लिए आगे का रास्ता देना चाहिए. सिकंदर यादव ने कहा कि अगर हमारी जिंदगी नहीं बदलती, तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि सत्ता में कौन बैठा है. पास में ही स्थानीय कसाई बरकत ने सामाजिक कल्याण योजनाओं के असर को स्वीकार किया, लेकिन यह भी जोड़ा कि शहर के सामाजिक ढांचे के भविष्य को लेकर समर्थन सशर्त है. इलाके में कॉस्मोपॉलिटन वोट को लेकर भी बदलाव दिख रहा है. ऊंची इमारतों में रहने वाले मध्यम वर्ग के बीच सफेदपोश उद्योगों की कमी को लेकर नाराजगी महसूस की जा रही है और यह वर्ग विकल्प की तलाश में दिखता है. वहीं दूसरी ओर “मां, माटी, मानुष” का नारा अब भी गरीब और वंचित तबकों में गूंजता है. लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के कारण यह वर्ग तृणमूल का मजबूत समर्थक माना जाता है. बंगाल की राजनीति में संगठन की ताकत अक्सर भाषणों से ज्यादा प्रभावी मानी जाती है। तृणमूल कांग्रेस की बूथ स्तर की मशीनरी काफी मजबूत और सक्रिय दिखती है, जबकि बीजेपी की उम्मीद शहरी मध्य वर्ग की नाराजगी पर टिकी है. पार्टी को इस नाराजगी के सहारे चुनावी समीकरण बदलने की उम्मीद है. भवानीपुर में जीत के लिए केवल राजनीतिक लहर काफी नहीं मानी जा रही. मौजूदा हालात में भवानीपुर को सुरक्षित सीट की बजाय ऐसा राजनीतिक रणक्षेत्र माना जा रहा है, जहां पारंपरिक वफादारी और आधुनिक आकांक्षाओं के बीच का टकराव साफ दिख रहा है. इस बार की चुनावी फाइट पर ध्रुवीकरण की छाप भी नजर आ रही है।

ममता सरकार को SC की चेतावनी: ‘चुनाव आयोग नहीं तो ट्रेनिंग देने की जिम्मेदारी किसकी?’

मुंबई  सुप्रीम कोर्ट ने  पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को पूरा करने में देरी करने के उद्देश्य से बार-बार 'अस्पष्ट और अप्रासंगिक' कारणों के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाने पर राज्य सरकार के प्रति गहरी नाराजगी जताई। गौरतलब है कि इस मतदाता सूची की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड और ओडिशा से न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा- कृपया अस्पष्ट कारणों के साथ अदालत में न आएं और प्रक्रिया में देरी करने की कोशिश न करें। हर दिन कोई न कोई बेमतलब का बहाना नहीं हो सकता। इसे अब खत्म होना चाहिए। उन्होंने आगे कहा- हमने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर (संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए) उन न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का निर्देश दिया है, जो काम मूल रूप से चुनाव आयोग (EC) के अधिकार क्षेत्र का है। लेकिन आप (राज्य सरकार) बेवजह की शिकायतें कर रहे हैं। कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग पर लगाए आरोप  रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत की यह टिप्पणी तब आई जब पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सीजेआई और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष गंभीर आरोप लगाए। सिब्बल ने कहा कि अजीब चीजें हो रही हैं। उन्होंने दावा किया कि चुनाव आयोग के अधिकारी उन न्यायिक अधिकारियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं (जिन्हें कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा तैनात किया गया था) कि मतदाताओं के दावों के साथ जमा किए गए किन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाना है। सिब्बल ने तर्क दिया कि यह सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का उल्लंघन है, जिसमें कहा गया था कि इसके 'तौर-तरीके' कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा तय किए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल की दलील को किया खारिज पीठ ने बंगाल सरकार द्वारा आए दिन इस मुद्दे को उठाए जाने पर नाखुशी जताई। अदालत ने सिब्बल की दलीलों से असहमति जताते हुए स्पष्ट किया- जब हमने कहा था कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तौर-तरीके तय करेंगे, तो हमारा मतलब यह था कि वह यह तय करेंगे कि किस न्यायिक अधिकारी को कहां तैनात किया जाएगा और उन्हें क्या सुविधाएं दी जाएंगी। दावों का निपटान और मतदाताओं द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की वैधता पर निर्णय केवल न्यायिक अधिकारी ही लेंगे। जस्टिस बागची का स्पष्टीकरण और मुख्य सचिव का मुद्दा जस्टिस बागची ने स्थिति साफ करते हुए कहा- अगर चुनाव आयोग के अधिकारी न्यायिक अधिकारियों को ट्रेनिंग नहीं देंगे, तो और कौन देगा? हमारा आदेश दिन के उजाले की तरह साफ है। हमने SIR की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए न्यायिक अधिकारियों को एक ऐसी जिम्मेदारी दी है जो उनके सामान्य कामकाज से अलग है। राज्य सरकार और चुनाव आयोग दोनों को मिलकर उनके लिए काम करने का अनुकूल माहौल बनाना चाहिए। इस दौरान, खुद को बचाव की मुद्रा में पाते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि राज्य की मुख्य सचिव भी अदालत में मौजूद हैं क्योंकि दुर्भाग्य से चुनाव आयोग द्वारा उनके खुद के मतदान के अधिकारों पर सवाल उठाया जा रहा है। पीठ का अंतिम निर्देश इस पर पीठ ने निर्देश दिया- अपने मुख्य सचिव से कहें कि वह SIR को शीघ्र पूरा करने के लिए चुनाव आयोग और न्यायिक अधिकारियों के साथ मिलकर काम करें। अंत में सिब्बल ने अदालत से यह भी मांग की कि 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद, जैसे-जैसे न्यायिक अधिकारी मतदाताओं के नामों को शामिल करने का फैसला लें, चुनाव आयोग को 'पूरक मतदाता सूची' भी प्रकाशित करनी चाहिए। इसके जवाब में पीठ ने स्पष्ट किया कि SIR की प्रक्रिया पूरी तरह से अदालत के आदेशों के अनुसार ही की जाएगी, जिसमें यह पहले से ही निर्दिष्ट है कि दावों की जांच के लिए किन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाना है।

SC का ममता सरकार को झटका, 31 मार्च तक कर्मचारियों को DA भुगतान करने का निर्देश

कलकत्ता पश्चिम बंगाल के लाखों सरकारी कर्मचारियों के लिए आज का दिन ऐतिहासिक राहत लेकर आया है। सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने ममता बनर्जी सरकार को कड़ा निर्देश देते हुए 31 मार्च 2026 तक महंगाई भत्ते (DA) के कुल बकाया का 25 प्रतिशत भुगतान करने का आदेश दिया है। यह आदेश उस दिन आया है जब बंगाल विधानसभा में लेखानुदान पेश किया जाना है। इससे राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि कर्मचारियों के लंबे समय से लंबित DA बकाया का एक-चौथाई हिस्सा 31 मार्च तक चुकाया जाए। शेष 75 प्रतिशत बकाया राशि के भुगतान का तरीका और समय सीमा तय करने के लिए अदालत ने एक उच्च स्तरीय चार सदस्यीय समिति बनाने का आदेश दिया है। आपको बता दें कि पिछले साल 16 मई को कोर्ट ने तीन महीने के भीतर यह भुगतान करने को कहा था, लेकिन राज्य सरकार ने फंड की कमी का हवाला देकर 6 महीने की मोहलत मांगी थी। कोर्ट ने बार-बार मिल रही तारीखों पर कड़ा रुख अपनाते हुए अब अंतिम समय सीमा तय कर दी है। DA खैरात नहीं, अधिकार है: शुभेंदु अधिकारी विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों की जीत बताया। उन्होंने कहा, "ममता बनर्जी आज गलत साबित हुई हैं। सालों तक उन्होंने दावा किया कि DA कोई अधिकार नहीं है, बल्कि एक दान है। आज शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि यह कर्मचारियों का हक है। राज्य सरकार ने कर्मचारियों को उनके हक से वंचित करने के लिए नामी वकीलों पर करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन अंततः न्याय की जीत हुई।" केंद्र और राज्य के बीच बढ़ता अंतर पश्चिम बंगाल में DA को लेकर विवाद काफी गहरा है। वर्तमान स्थिति यह है कि 1 अप्रैल 2025 से बंगाल के कर्मचारियों का DA मूल वेतन का 18 प्रतिशत तय किया गया था। वहीं, केंद्र सरकार के कर्मचारियों को मिलने वाले DA और राज्य सरकार के कर्मचारियों के बीच अब भी करीब 37 से 40 प्रतिशत का बड़ा अंतर बना हुआ है। आपको बता दें कि केंद्रीय कर्मचारियों को 55 प्रतिशत डीए मिलता है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, इसलिए राज्य सरकार ने वर्तमान में केवल लेखानुदान पेश करने का निर्णय लिया है। पूर्ण बजट नई सरकार के गठन के बाद आएगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने ममता सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ा दिया है, क्योंकि 25% बकाया चुकाने के लिए राज्य को हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान करना होगा।

चुनावी बजट: महिलाओं को ₹500 अतिरिक्त, गिग वर्कर्स की भी होगी मदद, ममता सरकार का बड़ा ऐलान

कोलकाता  पश्चिम बंगाल की वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 4.06 लाख करोड़ रुपये का अंतरिम बजट पेश किया. इस बजट में सबसे बड़ा ऐलान ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना को लेकर हुआ है. राज्य की 2.42 करोड़ महिलाओं के लिए मासिक सहायता राशि में 500 रुपये की बढ़ोतरी की गई है. यह बढ़ी हुई राशि फरवरी 2026 से ही लागू हो जाएगी. इस कदम को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है. क्या है बंगाल बजट की अन्य बड़ी घोषणाएं? पश्चिम बंगाल बजट में केवल महिलाओं ही नहीं, बल्कि अन्य वर्गों पर भी फोकस किया गया है. गिग वर्कर्स यानी जोमैटो और स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म पर काम करने वालों को अब ‘स्वास्थ्य साथी’ जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिलेगा. इसके अलावा आंगनवाड़ी वर्कर्स और सहायिकाओं के मानदेय में अप्रैल 2026 से 1000 रुपये की वृद्धि की जाएगी. बेरोजगारी दूर करने के लिए युवाओं को 1500 रुपये प्रति माह का भत्ता देने की नई योजना भी शुरू होगी. ‘लक्ष्मी भंडार’ के बदले समीकरण लक्ष्मी भंडार योजना ममता बनर्जी की सबसे सफल योजनाओं में से एक मानी जाती है. वर्तमान में इसमें सामान्य वर्ग को 1000 और एससी-एसटी वर्ग को 1200 रुपये मिलते हैं. अब 500 रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी के बाद यह राशि और बढ़ जाएगी. जानकारों का मानना है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में महिलाओं के भारी मतदान ने एनडीए की जीत तय की थी. इसी पैटर्न को देखते हुए बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ मजबूत कर रही है. महिलाओं को लुभाने की मची होड़ आजकल राजनीति में महिलाएं नई ‘किंगमेकर’ बनकर उभरी हैं. पश्चिम बंगाल ही नहीं, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी यही ट्रेंड दिख रहा है. महाराष्ट्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना’ के तहत 2.5 करोड़ महिलाओं को दिसंबर और जनवरी की किस्त एक साथ देने का फैसला किया है. तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने भी ‘कलैग्नार मगलिर उरीमई थिट्टम’ योजना का दायरा बढ़ा दिया है. सभी पार्टियां जानती हैं कि महिलाओं का वोट जीत की गारंटी है.

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, ED अफसरों पर दर्ज FIR पर ममता सरकार को झटका

नई दिल्ली  बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में सियासी पारा हाई है. पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक पर छापेमारी के बाद ये केस सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है, जिसपर आज शीर्ष न्यायालय में सुनवाई हुई. इस सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के अधिकारी पर दर्ज की गई एफआईआर पर रोक लगाने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमारी नजर में यह गम्भीर मामला है. कोर्ट ने कहा कि ये केंद्रीय जांच एजेंसी के काम मे स्टेट एजेंसी के काम मे दखल का गम्भीर मामला है. लोकतंत्र में व्यवस्था जा हर अंग अपना काम कर सके, हमारे लिए इस मसले पर सुनवाई ज़रूरी है ताकि क़ानून का उल्लंघन करने वाले न बचे. SC ने ममता बनर्जी और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया.  सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, ये केस कैसे सुनवाई योग्य हैं ? इस पर ED की तरफ से SG मेहता ने कहा, यह केस बहुत ही चौंकाने वाली स्थिति दिखाता है.⁠CM ममता बनर्जी उस जगह पर घुस गईं, जहां PMLA केस में रेड हो रही थी. CM ने ‘कानून हाथ में लेने का एक पैटर्न बना लिया है'. बंगाल पुलिस का गलत इस्तेमाल किया है. ED को जानकारी मिली थी कि एक ऑफिस में आपत्तिजनक सामान पड़ा है. CM बिना इजाज़त के घुसीं और फाइलें, डिजिटल डिवाइस, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड ले गईं. इसमें ED अधिकारी का फोन भी शामिल था. डायरेक्टर, पुलिस कमिश्नर उनके साथ थे. अधिकारी राजनीतिक नेताओं के साथ धरने पर बैठे थे.⁠CBI के जॉइंट डायरेक्टर के घर का घेराव किया गया और पत्थर फेंके गए. प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में नई अर्जी दाखिल कर पश्चिम बंगाल पुलिस के डीजीपी को हटाए जाने की मांग की है.प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई अर्जी दाखिल कर पश्चिम बंगाल पुलिस के शीर्ष अधिकारियों, जिनमें डीजीपी राजीव कुमार भी शामिल हैं, को निलंबित किए जाने की मांग की है. अर्जी में आरोप लगाया गया है कि इन अधिकारियों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ मिलकर जांच में बाधा डाली और सबूतों की कथित तौर पर चोरी में मदद की. SG तुषार मेहता की बड़ी दलीलें…     ED के अधिकारियों ने पुलिस को बताया था कि PMLA की धारा 17 के तहत IPAC की जांच करनी है     पुलिस अधिकारियों और CM ममता बनर्जी ने जबरन सारी फाइलें ले लीं.     ⁠यह चोरी है, ⁠उन्होंने एक ED अधिकारी का फोन भी ले लिया.⁠इससे सेंट्रल फोर्स का मनोबल गिरेगा     ⁠दूसरे राज्यों को लगेगा कि वे भी ऐसा कर  सकते हैं और फिर धरने पर बैठ सकते हैं.     ⁠जो अधिकारी वहां मौजूद थे, उन्हें सस्पेंड किया जाना चाहिए बंगाल के डीजीपी को हटाने की मांग ईडी ने अपनी नई अर्जी में केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DOPT), भारत सरकार को निर्देश देने की मांग की है कि संबंधित अधिकारियों को निलंबित किया जाए. अर्जी में यह भी उल्लेख किया गया है कि डीजीपी राजीव कुमार पूर्व में कोलकाता पुलिस कमिश्नर के पद पर रहते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ धरने पर बैठे थे. डीजीपी राजीव कुमार और पुलिस कमिश्नर पर आरोप प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में बंगाल की सीएम ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के साथ डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार को पक्षकार बनाया है. उन पर FIR दर्ज करने की मांग की है. प्रवर्तन निदेशालय का कहना है कि Indian Political Action Committee के खिलाफ कोलकाता में छापेमारी के दौरान बंगाल की पुलिस प्रशासन की मशीनरी पर जांच में रुकावट का आरोप लगाया है. साथ ही साक्ष्यों से छेड़छाड़ और उन्हें खत्म करने का आरोप लगाया है. ED अफसरों को डराने धमकाने और उनके पास अहम फाइलों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड छीने गए. सुप्रीम कोर्ट में दलीलें सुप्रीम कोर्ट में ईडी ने कहा है कि निष्पक्ष जांच के एजेंसी के अधिकार में बाधा डालने का काम किया गया. इस घटना की CBI जांच कराने की मांग रखी गई है. कलकत्ता हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान 'CM और उनके समर्थकों के प्रभाव' का इस्तेमाल कर कोर्ट में हंगामा किया गया.इससे जज को सुनवाई तक टालनी पड़ी. जांच एजेंसी ने कहा कि CM, DGP और कोलकाता पुलिस कमिश्नर पर बीएनसी की 17 गंभीर  धाराओं के तहत आरोप लगाए जा सकते हैं. IPAC के पास पार्टी का बहुत सारा डेटा था- कपिल सिब्बल वहीं, ममता सरकार की ओर से कोर्ट में पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि IPAC के पास पार्टी का बहुत सारा डेटा था। जब ED वहां गई, तो उसे पता था कि संवेदनशील पार्टी की जानकारी वहां मौजूद होगी। उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट को पहले इस मामले की सुनवाई करनी चाहिए और अपना फैसला देना चाहिए, जिसके बाद पार्टियां अपीलीय फोरम में जा सकती हैं। उन्होंने दलील दी कि अब समानांतर कार्यवाही शुरू कर दी गई है, जबकि हाई कोर्ट के पास आर्टिकल 226 के तहत अधिकार क्षेत्र है, और यही सही क्रम है जिसका पालन किया जाना चाहिए। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में राज्य और DGP की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक सिंघवी ने याचिका की स्वीकार्यता पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अगर नोटिस जारी किया जाता है, तो यह साफ किया जाना चाहिए कि यह स्वीकार्यता पर उनकी आपत्ति के अधीन होगा। सिंघवी ने तर्क दिया कि ED की ओर से सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाना केवल असाधारण स्थितियों में ही स्वीकार्य है, जहां कोई प्रभावी उपाय उपलब्ध न हो। 'चुनावी काम में ईडी को दखल देने का अधिकार नहीं…' सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की बात सुनने के बाद कहा कि यह याचिका ED और दूसरी केंद्रीय एजेंसियों की जांच और राज्य अधिकारियों द्वारा कथित दखल के बारे में एक गंभीर मुद्दा उठाती है. कोर्ट ने ज़ोर दिया कि कानून का राज बनाए रखने और हर एजेंसी को आज़ादी से काम करने देने के लिए, इस मामले की जांच होनी चाहिए, जिससे यह पक्का हो सके कि किसी भी राज्य की सुरक्षा की आड़ में अपराधियों को बचाया न जाए. बेंच ने कहा कि इसमें … Read more

SC में ED की बड़ी डिमांड: ‘कोलकाता कमिश्नर और बंगाल DGP को हटाया जाए’

कलकत्ता / नई दिल्ली I-PAC रेड मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई अर्जी दाखिल करते हुए पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है. ईडी ने अपनी याचिका में इन अधिकारियों को तुरंत निलंबित करने, उनके खिलाफ FIR दर्ज करने और अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने की मांग की है.  जांच एजेंसी का आरोप है कि इन अधिकारियों ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ मिलकर जांच में बाधा डाली और सबूतों की कथित चोरी में मदद की. ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से गृह मंत्रालय (MHA) और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को निर्देश देने का अनुरोध किया है कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की जाए.  अर्जी में विशेष रूप से डीजीपी राजीव कुमार के पिछले आचरण का जिक्र करते हुए कहा गया है कि वे कोलकाता पुलिस कमिश्नर रहते हुए मुख्यमंत्री के साथ धरने पर बैठे थे, जो एक टॉप पुलिस अधिकारी के लिए सही नहीं है. डीजीपी और पुलिस कमिश्नर पर गंभीर आरोप प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी अर्जी में पश्चिम बंगाल पुलिस के टॉप अधिकारियों पर तीखा हमला बोला है. एजेंसी के मुताबिक, डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर ने न केवल जांच की प्रक्रिया को प्रभावित किया, बल्कि साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ करने में भी कथित तौर पर भूमिका निभाई. ईडी ने तर्क दिया है कि इन अधिकारियों की मौजूदगी में निष्पक्ष जांच संभव नहीं है, इसलिए इनका निलंबन और विभागीय जांच जरूरी है.

SC में ED का गंभीर आरोप, ममता बनर्जी पर ₹2,742 करोड़ के घोटाले और 20 करोड़ हवाला के लिंक का आरोप

 नई दिल्ली पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' (I-PAC) के कोलकाता दफ्तर और कंपनी के डायरेक्टर प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी के मामले में ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. ईडी ने पश्चिम बंगाल सरकार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, राज्य के डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज वर्मा के खिलाफ अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की है. केंद्रीय एजेंसी ने आरोप लगाया है कि 8 जनवरी 2026 को उसके वैधानिक सर्च ऑपरेशन में जानबूझकर बाधा डाली गई, जांच को पटरी से उतारने की कोशिश की गई और सबूतों से छेड़छाड़ व उन्हें नष्ट किया गया. ईडी ने अपनी याचिका में कहा है कि यह सर्च ऑपरेशन धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 17 के तहत “रीजन टू बिलीव” दर्ज करने के बाद किया गया था. छापेमारी दो स्थानों पर हुई- कोलकाता के पार्क स्ट्रीट स्थित प्रतीक जैन के आवास और बिधाननगर के सेक्टर-वी में स्थित इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड (IPAC) के दफ्तर में. यह मामला ₹2,742.32 करोड़ के कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग घोटाले से जुड़ा है. ईडी का दावा है कि इस घोटाले से जुड़े 20 करोड़ रुपये से अधिक की राशि हवाला चैनलों के जरिए IPAC तक पहुंचाई गई. ईडी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी करीब 100 से अधिक पुलिसकर्मियों के साथ प्रतीक जैन के आवास पर पहुंचीं और सर्च के दौरान ईडी अधिकारियों को रोका गया. आरोप है कि जब्त किए गए लैपटॉप, मोबाइल फोन और दस्तावेज जबरन लेकर पुलिस कस्टडी में लगभग दो घंटे तक रखे गए. ईडी का कहना है कि अधिकारियों को धमकाया गया, पंचनामा की कार्यवाही प्रभावित हुई और जांच पूरी नहीं करने दी गई. इसके बाद दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के तहत कोलकाता के अलग-अलग थानों में ED अधिकारियों के खिलाफ चार FIR दर्ज की गईं. ईडी ने अपनी याचिका में यह भी कहा है कि कलकत्ता हाई कोर्ट की कार्यवाही के दौरान सत्तारूढ़ दल के समर्थकों द्वारा कथित तौर पर हंगामा किया गया, जिसके चलते न्यायालय ने माहौल को सुनवाई के लिए प्रतिकूल बताया. ED का तर्क है कि ऐसे हालात में हाई कोर्ट में वैकल्पिक उपाय प्रभावहीन हो गया है. ED ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, डीजीपी, पुलिस कमिश्नर और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की CBI जांच की मांग की है. एजेंसी का कहना है कि इन घटनाओं में BNS, 2023 के तहत चोरी, डकैती, आपराधिक अतिक्रमण, सरकारी कर्मियों के कार्य में बाधा, सबूत नष्ट करने और आपराधिक धमकी जैसे संज्ञेय अपराध बनते हैं. ईडी ने अंतरिम राहत के तौर पर अपने अधिकारियों के खिलाफ दर्ज FIR पर रोक, किसी भी तरह की बदले की कार्रवाई  से सुरक्षा, और जब्त डिजिटल साक्ष्यों को सील कर सुरक्षित रखने व फॉरेंसिक संरक्षण की मांग की है. वहीं, IPAC ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बयान जारी कर किसी भी राजनीतिक या चुनावी डेटा की जब्ती से इनकार किया है और जांच एजेंसी के साथ पूर्ण सहयोग का दावा किया है.

दिल्ली में TMC सांसदों का हंगामा: गृह मंत्रालय के बाहर 8 सांसदों का धरना, ममता ने कराई FIR

नई दिल्ली पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, सियासी सरगर्मी बढ़ती जा रही है. गुरुवार को, कोलकाता में पॉलिटिकल कंसल्टेंसी और इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनी I-PAC के दफ्तर में ईडी ने छापा मारा. इस दौरान सीएम ममता बनर्जी भी मौके पर पहुंचीं और इसके बाद मामले ने तूल पकड़ लिया. बंगाल में ईडी के खिलाफ दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज किया गया है. इसके साथ ही, मामला कोर्ट भी पहुंच गया है. TMC ने कोर्ट से ED की कार्रवाई को गैर-कानूनी घोषित करने और पार्टी के सभी गोपनीय दस्तावेज़ तुरंत वापस करने के निर्देश देने की मांग की है. इससे पहले दिन में, ED ने एक याचिका दायर की और दावा किया कि ये छापे 'बंगाल कोयला खनन' घोटाले से जुड़े थे और ममता पर आधिकारिक जांच में 'बाधा डालने' का आरोप लगाया है. प्रदर्शन में डेरेक ओ'ब्रायन, शताब्दी रॉय, महुआ मोइत्रा और कीर्ति आजाद जैसे प्रमुख सांसद शामिल हैं। टीएमसी सांसद ईडी की कोलकाता में आई-पैक कार्यालयों और इसके सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। मौके पर पहुंची पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाया और महुआ मोइत्रा और डेरेक ओ'ब्रायन को हिरासत में लिया। मौके पर पहुंची पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाया है। TMC सांसद डेरेक ओ ब्रायन और महुआ मोइत्रा को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ऑफिस के बाहर विरोध प्रदर्शन करते समय पुलिस ने हिरासत में ले लिया। टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन और महुआ मोइत्रा हिरासत में त्रिणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद रेक ओ ब्रायन और महुआ मोइत्रा को पुलिस ने हिरासत में लिया। यह कार्रवाई तब हुई जब दोनों सांसद केंद्र के गृह मंत्री अमित शाह के कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा 'हम भाजपा को हराएंगे। पूरा देश देख रहा है कि दिल्ली पुलिस एक चुने हुए सांसद के साथ कैसा व्यवहार कर रही है।' वहीं सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने भी कहा 'आप देख रहे हैं कि यहां सांसदों के साथ क्या हो रहा है।    बंगाल में ईडी की कार्रवाई का विरोध, तृणमूल सांसदों ने गृह मंत्री के घर के बाहर प्रदर्शन किया टीएमसी ने आरोप लगाया कि केंद्रीय एजेंसियां चुनाव से पहले पार्टी के रणनीतिक दस्तावेजों तथा डेटा को हाथ लगाने की कोशिश कर रही हैं, जिससे राजनीतिक माहौल और गरमाया गया है। पार्टी का कहना है कि यह कार्रवाई चुनाव वर्ष में राजनीतिक दबाव पैदा करने की साजिश का हिस्सा है। दिल्ली समेत कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन जारी है, जिसमें टीएमसी नेताओं ने प्रवर्तन निदेशालय की I‑PAC के खिलाफ छापेमारी का विरोध करते हुए केंद्र सरकार पर कड़ी टिप्पणियां कीं।  TMC सांसद कीर्ति आजाद ने कहा, "ED ने गलत तरीके से छापे मारे हैं, और यह अलोकतांत्रिक तरीके से चुनाव जीतने की कोशिश है, बीजेपी इस तरह से चुनाव नहीं जीत पाएगी…" सिर्फ चुनाव के दौरान ED, CBI TMC सांसद शताब्दी रॉय ने कहा कि कल ED की टीम भेजी और उन्हें चुनाव के समय सब कुछ याद आता है, वे सिर्फ जीतने के लिए चुनाव के दौरान ED, CBI की टीमें भेजते हैं, लेकिन वे चुनाव नहीं जीतेंगे…" प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी के खिलाफ ममता बनर्जी ने आज यानी शुक्रवार को विरोध मार्च निकालने की का ऐलान किया है. उन्होंने इस कार्रवाई को राजनीतिक रूप से प्रेरित और चुनावों से पहले TMC को डराने की कोशिश बताया. बंगाल कांग्रेस ने भी ईडी की छापेमारी का विरोध किया है. विपक्ष आए दिनों यह आरोप लगाता रहता है कि मोदी सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरिए उनके नेताओं को जानबूझकर और चुन-चुनकर निशाना बना रही हैं. 

ममता बनर्जी के लिए चुनौती: बंगाल में हुमायूं कबीर समेत तीन मुस्लिम नेताओं की सक्रियता

कलकत्ता पश्चिम बंगाल की राजनीति तेजी से गरमा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होना है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यहां सत्ता बचाने की चुनौती है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (BJP) यहां पहली बार सरकार बनाने तमन्ना लिए बैठी है। इस सबके बीच चुनावी बिसात पर बागी विधायक हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की दिक्कतें बढ़ा दी है। कबीर के एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन औवेसी और इंडिया सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ) के प्रमुख पीरजादा अब्बास सिद्दीकी से संपर्क साधने से राज्य की राजनीति में गरमाहट आ गई है। दूसरी तरफ तो भाजपा ने अपने मजबूत बूथ प्रबंधन से बदलाव की स्थिति बनाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच लगभग सीधा मुकाबला है। कांग्रेस और तीन दशक तक राज्य में सत्ता पर काबिज रही माकपा और उसके सहयोगी दल हाशिए पर जा चुके हैं। ऐसे में तृणमूल से बाहर निकले हुमायूं तीसरी ताकत के रूप में उभरने की कोशिश में है। हालांकि वह अकेले एक क्षेत्र विशेष तक सीमित है पर यदि उनको औवेसी व पीरजादा का साथ मिला तो कई सीटों पर समीकरण प्रभावित कर सकते हैं। तीन मुस्लिम नेता एक साथ औवेसी ने हाल में बिहार में जो सफलता हासिल की है उससे साफ हुआ है कि मुस्लिम मतदाताओं ने इस पार्टी को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। आईएसएफ ने पिछले चुनाव में ही अपनी स्थिति साफ कर दी थी, जब उसने एक सीट जीत ली थी। ऐसे में अगर तीन प्रमुख मुस्लिम नेता एक मंच पर आते हैं तो मुसलमानों के बीच वह अपनी पैठ बढ़ा सकते हैं। ध्रुवीकरण से ममता को नुकसान बंगाल की लगभग 30% मुस्लिम आबादी है। हुमायूं कबीर जिस तरह से माहौल बना रहे हैं उसमें वह अगर मुस्लिम मतों का थोड़ा भी ध्रुवीकरण करने में सफल रहते हैं तो ममता बनर्जी को काफी नुकसान हो सकता है। इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है। भाजपा विधायक भी मैदान में डटे भाजपा ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी अपना विस्तार किया है। उसके विधायक मैदान में डटे रहे हैं। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व पहले से ही आक्रामक और राज्य की मौजूदा स्थितियों में और ज्यादा आक्रामकता दिखाकर ममता बनर्जी की दिक्कतें बढ़ाएगा। पिछली बार भाजपा अपने बूथ प्रबंधन में कमजोर रही थी, इसलिए पार्टी ने इस बार पूरा जोर बूथ प्रबंधन पर लगाया है।