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SC का बड़ा फैसला, रेलवे पर ₹15 हजार करोड़ का सरचार्ज बरकरार; पुरानी दलील नहीं आई काम

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने देश के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ताओं में से एक भारतीय रेलवे को बड़ा वित्तीय झटका दिया है. अदालत ने साफ किया है कि रेलवे बिजली कानून के तहत कोई विशेष दर्जा पाने का हकदार नहीं है. उसे अन्य औद्योगिक इकाइयों की तरह ही अपनी बिजली खपत पर सभी तरह के सरचार्ज देने होंगे. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने रेलवे की आठ अपीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है. कोर्ट ने विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण के पुराने फैसले को सही ठहराया है. इस फैसले से राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को बड़ी राहत मिली है, लेकिन रेलवे के बजट पर इसका बहुत बुरा असर पड़ने की आशंका है।  रेलवे पर क्यों फूटा 15,000 करोड़ रुपये का वित्तीय बम? भारतीय रेलवे हर साल करीब 33 अरब यूनिट से ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करती है. इस बड़े फैसले के बाद रेलवे को बैकडेटेड एरियर यानी पुराना बकाया भी चुकाना होगा. राज्यों के हिसाब से यह क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज 50 पैसे से लेकर 2.5 रुपये प्रति यूनिट तक है।  सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की डिस्कॉम कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे रेलवे के ओपन एक्सेस इस्तेमाल की अवधि और क्षेत्र के हिसाब से बकाया राशि का आकलन करें. रेलवे के आंतरिक अनुमानों के अनुसार यह कुल बकाया राशि कम से कम 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. यह रकम रेलवे के चालू वित्त वर्ष के बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकती है।  10 साल पुराने कानूनी दांवपेंच में कहां मात खा गई रेलवे?     रेलवे साल 2015 से अदालत में यह दलील दे रही थी कि वह एक ‘डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी’ है. इस रणनीति के पीछे रेल मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय का साल 2014 का एक पत्र था।      रेलवे का दावा था कि रेलवे एक्ट 1989 की धारा 11 के तहत उसे खुद का बिजली नेटवर्क और डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम बनाने का अधिकार प्राप्त है. इसलिए वह ग्रिड से सीधे बिजली लेते समय किसी भी तरह का सरचार्ज देने के लिए उत्तरदायी नहीं है।      सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि कानूनन डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी होने के लिए दूसरों को बिजली बेचना जरूरी है, जबकि रेलवे पूरी बिजली खुद ही कंज्यूम करती है।  रेलवे डिस्ट्रीब्यूटर है या सिर्फ एक कंज्यूमर? सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करते हुए कहा कि रेलवे का पूरा ओवरहेड इक्विपमेंट और ट्रैक्शन सबस्टेशन उसका आंतरिक सिस्टम है. यह कोई पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम नहीं है. बिजली कानून के तहत लाइसेंसी कहलाने के लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए।      पहली शर्त यह कि आपके पास डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम हो.     दूसरी यह कि आप किसी तीसरे पक्ष को बिजली की सप्लाई करते हों. रेलवे जो भी बिजली खरीदती है, उसका इस्तेमाल केवल इंजनों, सिग्नलों और स्टेशनों को चलाने में होता है. वह इसे किसी बाहरी उपभोक्ता को नहीं बेचती है. इसी आधार पर कोर्ट ने रेलवे को बिजली कानून की धारा 2(15) के तहत सिर्फ एक कंज्यूमर माना है।  क्या अब फेल हो जाएगी रेलवे की महा-बचत योजना? रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य मोहम्मद जमशेद के अनुसार, इस अदालती आदेश में रेलवे की पूरी वित्तीय बचत को खत्म करने की क्षमता है. रेलवे ने साल 2015 के आसपास एक बड़ी नीतिगत पहल शुरू की थी. इसके तहत ओपन एक्सेस से सस्ती बिजली खरीदकर एक दशक में 41,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बचाने का लक्ष्य था. यह नया फैसला उस पूरी योजना पर पानी फेर सकता है।  रेलवे ने अपने ब्रॉड-गेज नेटवर्क का लगभग 100% इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा कर लिया है. इस मिशन पर करीब 46,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. डीजल पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण को बचाने की यह मुहिम अब ओपन एक्सेस मार्केट के महंगे सरचार्ज के जाल में फंस गई है। 

चारधाम यात्रा पर बढ़ती मौतों ने बढ़ाई चिंता, ऊंचाई और ऑक्सीजन की कमी पर उठे सवाल

देहरादून  उत्तराखंड में इस बार चारधाम यात्रा 19 अप्रैल को शुरू हुई थी. यानि इस यात्रा को 30 दिन पूूरे हो चुके हैं. इस दौरान आधिकारिक तौर पर यात्रा में शामिल 55 लोगों की मृत्यु हो चुकी है. ज़्यादातर मौतों की मुख्य वजह स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, विशेषकर दिल की बीमारियां और ऊंचाई पर होने वाली बीमारियां।  इसमें 30 लोगों की मृत्यु केदारनाथ यात्रा के रास्ते में हुई तो 10 लोगों की मौत बदरीनाथ यात्रा के दौरान हुई तो यमनोत्री और गंगोत्री धाम के रास्ते में 8 और 7 मौतों का आंकड़ा बताया जा रहा है।  उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग और आपदा प्रबंधन अधिकारियों के अनुसार चार धाम यात्रा में मौतों में 70–75% तक मामले खराब स्वास्थ्य यानि प्री‑एक्सिस्टिंग हार्ट डिज़ीज, हाई ब्लडप्रेसर, डायबिटीज, पल्मोनरी एडिमा आदि के कारण होते हैं. कई वृद्ध यात्री या फिटनेस कम वाले लोग ऊंचाई, थकान और तनाव के कारण अचानक हार्ट अटैक, स्ट्रोक या फेफड़ों में सूजन से मर जाते हैं।  आमतौर पर लोग यहां के चार धामों की यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा करते हैं. इसके लिए रजिस्ट्रेशन कराना होता है. चूंकि ये यात्रा हाई अल्टीट्यूड पर ही ज्यादा होती है, लिहाजा लोगों को हृदय संबंधी दिक्कतों से भी जूझना होता है. सलाह दी जाती है कि हृदय संबंधी दिक्कतों वाले इन यात्राओं से बचें. आगे ये जानेंगे कि आखिर ऊंचाई वाली जगहें क्यों दिल संबंधी बीमारियों वालों के लिए जानलेवा भी बन जाती हैं।  उत्तराखंड के चारों धाम ऊंचाई वाली जगहों पर ही हैं. सभी पहाड़ों की ऊंचाई पर हैं, उनमें मौसम भी ठंडा और बर्फीला रहता है, चाहे यमुनोत्री हो या फिर बद्रीनाथ. वहां गर्मी के मौसम में भी इर्द गिर्द के पहाड़ों पर बर्फ ढंकी नजर आती है. लेकिन ऊंचाई वाली जगहें कैसे हृदय स्वास्थ्य पर असर डालती हैं।  अधिक ऊंचाई पर रहना अगर उन व्यक्तियों के लिए फायदेमंद होता है, जिनका हृदय स्वास्थ्य अच्छा होता है. तो उन लोगों के लिए खतरनाक जो मौजूदा तौर पर हृदय जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हों. बहुत से श्रद्धालु बिना पहले से डॉक्टरी जांच, फिटनेस टेस्ट या ऊंचाई के अनुकूलन के बिना सीधे चार धाम के लिए निकल पड़ते हैं।  हाई अल्टीट्यूड यानि उच्च ऊंचाई किसे माना जाता है? – समुद्र तल से 6,560 फीट से नीचे का कोई भी स्थान कम ऊंचाई वाला माना जाता है. इससे ऊपर की यात्रा मध्यम ऊंचाई और उच्च ऊंचाई वाली मानी जाती है. समुद्र तल से 6,560 से 9,840 फीट के बीच वाले स्थानों को मध्यम ऊंचाई वाला माना जाता है. समुद्र तल से 9,840 फीट से ऊपर की जगहें उच्च ऊंचाई वाली होती हैं. ये वो जगहें हैं जहां आपका शरीर ऊंचाई से संबंधित महत्वपूर्ण प्रभावों का अनुभव करने लगता है।  भारत में हाई अल्टीट्यूड एरिया के पैरामीटर्स क्या हैं? – भारतीय सेना उच्च ऊंचाई (एचए) क्षेत्रों को 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर के क्षेत्रों के रूप में परिभाषित करती है। इन्हें ऊंचाई के आधार पर तीन चरणों में वर्गीकृत किया गया है: स्टेज I: 9,000–12,000 फीट (2,750–3,657 मीटर) चरण II: 12,000-15,000 फीट (3,657-4,572 मीटर) चरण III: 15,000 फीट से ऊपर (4,572 मीटर) चार धाम की यात्रा किन ऊंचाइयों से गुजरती है? – छोटा चार धाम के दर्शन के लिए 4000 मीटर से भी ज्‍यादा ऊंचाई तक की चढ़ाई करनी होती है. इसमें कहीं ज्यादा ऊंचाई वाली जगहें होती हैं तो कहीं ज्यादा ऊंचाई वाली जगहें. इसलिए ये यात्रा मुश्किल मानी जाती है।  चार धाम यात्रा गढ़वाल हिमालय में ऊंचाई पर होती है, इसलिए इसे उच्च ऊंचाई वाली यात्रा कहा जाता है. चार धाम यात्रा के चार तीर्थस्थल इन ऊंचाइयों पर हैं. भारतीय सेना के हाई अल्टीट्यूड वाले पैरामीटर्स के हिसाब से भी ये सारी जगहें हाई अल्टीट्यूड एरिया हैं।  यमुनोत्री: 3,291 मीटर गंगोत्री: 3,415 मीटर केदारनाथ: 3,553 मीटर बद्रीनाथ: 3,300 मीटर केदारनाथ: 11,700 फीट गंगोत्री: 10,200 फीट हाई अल्टीट्यूड वाले इलाके आमतौर पर कैसे होते हैं? – उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आमतौर तापमान काफी ठंडा होता है. ज्यादा बारिश होती है, तेज हवाएं चलती हैं. कम वायु दबाव होता है और हवा में ऑक्सीजन का स्तर भी कम होने लगता है।  इस ऊंचाई के लिए कई तरह के दिशा निर्देश दिए जाते हैं 1. धीरे-धीरे चढ़ो 2. एक दिन में कम ऊंचाई से सीधे 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर जाने से बचें 3. एक बार 9,000 फीट (2,750 मीटर) से ऊपर सोने की ऊंचाई को प्रतिदिन 1,600 फीट (500 मीटर) से अधिक नहीं बढ़ाएं 4. प्रत्येक 3,300 फीट (1,000 मीटर) पर अनुकूलन के लिए एक अतिरिक्त दिन की योजना बनाएं. उच्च ऊंचाई आपके शरीर को कैसे प्रभावित करती है? – जब आप अधिक ऊंचाई पर होते हैं, तो पतली हवा के कारण आपके फेफड़ों को कम ऑक्सीजन प्राप्त होती है. यह आपके फेफड़ों और हृदय पर इसलिए ज्यादा जोर बढ़ा देता है क्योंकि आपके शरीर के बाकी हिस्सों को भी लगातार ऑक्सीजन युक्त रक्त की जरूरत होती है. जिसकी मात्रा पर अशर पड़ने लगता है. इसी वजह से बहुत अधिक ऊंचाई पर बहुत से स्वस्थ लोगों को भी चक्कर आना, सिरदर्द और थकान जैसे दिक्कतें होने लगती हैं।  अगर कोई हृदय संबंधी दिक्कतों से गुजर रहा है तो इस ऊंचाई पर क्या अनुभव करता है? – यदि आप किसी हृदय संबंधी स्वास्थ्य संबंधी समस्या का अनुभव करते हैं तो अधिक ऊंचाई का आपके शरीर पर और भी अधिक प्रभाव पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को आमतौर पर ऊंचाई वाले स्थान पर पहुंचने के तुरंत बाद हृदय गति और रक्तचाप दोनों में बढोतरी महसूस होगी. ये समस्याएं आमतौर पर रात में और ज्यादा हो जाएंगी।  अधिक ऊंचाई पर रहने से हृदय स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी होता है क्या? – इस बात के प्रमाण हैं कि अधिक ऊंचाई पर रहने से हृदय स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं. हार्वर्ड स्कूल ऑफ ग्लोबल हेल्थ के एक अध्ययन में पाया गया कि अधिक ऊंचाई पर रहने वाले व्यक्तियों में इस्केमिक हृदय रोग से मरने की संभावना कम होती है. उनकी जीवन प्रत्याशा आमतौर पर लंबी होती है।  क्या हृदय रोग से पीड़ित रोगी अधिक ऊंचाई पर यात्रा कर सकते हैं? – जर्नल ऑफ द अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में पाया गया कि … Read more

MP में रेलवे का मेगा प्रोजेक्ट, 4329 करोड़ की चौथी लाइन से भोपाल-इटारसी सफर होगा और तेज

भोपाल   मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से बीना के बीच जल्द ही ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने जा रही है. इटारसी भोपाल बीना के बीच बनने जा रही चौथी रेल लाइन के काम ने तेजी पकड़ ली है. चौथी रेल लाइन को केन्द्रीय बजट में स्वीकृति मिलने के बाद इसके सर्वे का काम पूरा हो गया है. रेल्वे अधिकारियों के मुताबिक इसके लिए टेंडर प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है, जो जल्द ही पूरी कर ली जाएगी. 237 किलोमीटर लंबे रूट की इस परियोजना के लिए केन्द्र सरकार द्वारा 100 करोड़ का बजट भी आवंटित कर दिया गया है।  237 किलोमीटर रूट पर बनेंगे 39 बड़े पुल इटारसी भोपाल बीना तीनों बड़े जंक्शन हैं, जो देश के अलग-अलग हिस्सों को रेल लाइन से जोड़ते हैं. तीनों बड़े स्टेशनों के बीच कुल लंबाई 237 रूट किलोमीटर है. इन रूट पर लगातार यात्री गाड़ियों और मालगाड़ियों के संचालन का दबाव बढ़ रहा है. इसको देखते हुए इटारसी से बीना तक चौथी रेल लाइन का काम शुरू होने जा रहा है. इस परियोजना के पूरे होने के बाद ट्रेन 9 सुरंगों से होकर गुजरेगी. इसके अलावा 4 महत्वपूर्ण पुलों का भी निर्माण किया जाएगा।  4329 करोड़ होंगे खर्च इस रूट में 39 बड़े पुल, 151 छोटे पुल, 43 रोड ओवर ब्रिज और 39 रोड अंडर ब्रिज का निर्माण किया जाएगा. इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत 4329 करोड़ रुपए हैं. परियोजना के लिए समय सीमा 4 साल निर्धारित की गई है।  रेल रूट से जुड़ेगी हेरीटेज साइट चौथी रेल लाइन का काम पूरा होने से मध्यप्रदेश और आसपास के दूसरे राज्यों के प्रमुख हेरीटेज साइज और ईकोटूरिज्म साइट की कनेक्टीविटी और बेहतर होगी. खासतौर से वर्ल्ड हेरीटेज साइट सांची, भीमबेटिका, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के अलावा दूसरे कई टूरिस्ट स्पॉट्स तक पहुंचना और आसान हो जाएगा. यह नया रेल कॉरिडोर इटारसी से शुरू होकर भोपाल होते हुए बीना तक जाएगा. इस रूट पर सीहोर, भोपाल, विदिशा, रायसेन, सागर जिले सीधे तौर से जुड़ेंगे।  उत्तर से दक्षिण भारत की कनेक्टिविटी और बेहतर होगी इस रेल लाइन का काम पूरे होने से ट्रेफिक का दबाव कम होगा ओर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ेगी. भोपाल रेल मंडल के डीसीएम नवल अग्रवाल ने बताया, '' इस परियोजना के पूरे होने से 15.2 मिलियन टन अतिरिक्त माल ढुलाई की क्षमता सालाना विकसित होगी. इसका फायदा क्षेत्र में उद्योग और लॉजिस्टिक को मिलेगा. इस रूट पर 25 जोड़ी यात्री ट्रेनों के अलावा करीबन 200 मालगाड़ियों का संचालन और बढ़ेगा. इस परियोजना को चार चरणों में पूरा किया जा रहा है. पहला बीना से सुमेर, दूसरा सुमेर से रानी कमलापति स्टेशन, तीसरा रानीकमलापति रेल्वे स्टेशन से बरखेड़ा और बरखेड़ा से इटारसी तक रहेगा. इसके लिए भूमि अधिग्रहण काम चल रहा है। 

मैनिट के वैज्ञानिकों का कमाल, चार पैरों वाला क्वाड्रेट रोबोट और एडवांस ड्रोन तैयार

भोपाल भोपाल: राजधानी का मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानि मैनिट अब सिर्फ इंजीनियरिंग केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि भविष्य की रोबोटिक क्रांति की प्रयोगशाला बनता जा रहा है. यहां ऐसे स्मार्ट रोबोट और एडवांस ड्रोन तैयार किए जा रहे हैं, जो खदानों, सीवर लाइन, जहरीली गैस वाले इलाकों और दुर्गम पहाड़ी इलाकों के मिशन में इंसानों की जगह काम करेंगे. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लैस ये मशीनें उन जगहों पर भेजी जाएंगी, जहां हर कदम पर जान का खतरा होता है।  मैनिट में भविष्य की रोबोटिक टेक्नोलॉजी मैनिट स्थित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेंटर और आईओटी एंड रोबोटिक्स लैब में कई हाईटेक प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम चल रहा है. यहां वैज्ञानिक और रिसर्चर्स ह्यूमनॉइड रोबोट, क्वाड्रेट रोबोट और एडवांस सर्विलांस ड्रोन विकसित कर रहे हैं. इन मशीनों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और रिस्क एरिया में बिना मानवीय हस्तक्षेप के काम कर सकें. यह तकनीक आने वाले समय में औद्योगिक सुरक्षा और सामरिक मिशनों में बड़ा बदलाव ला सकती है।  जहां इंसान नहीं पहुंच सकते, वहां जाएंगे ये रोबोट खदानों, केमिकल इंडस्ट्री और गैस रिस्क एरिया में अक्सर जहरीली गैसों के रिसाव या आक्सीजन की कमी के कारण बड़े हादसे होते हैं. ऐसे हालात में इंसानों को भेजना बेहद खतरनाक साबित होता है. मैनिट में तैयार किए जा रहे रोबोट्स को खासतौर पर ऐसे ही क्षेत्रों के लिए डिजाइन किया जा रहा है. ये मशीनें खतरनाक जगहों पर जाकर डेटा जुटाएंगी, गैस लेवल की जांच करेंगी और रियल टाइम मॉनिटरिंग करेंगी. इससे रेस्क्यू ऑपरेशन ज्यादा सुरक्षित और तेज हो सकेंगे।  चार पैरों वाले क्वाड्रेट रोबोट होंगे खास आकर्षण मैनिट की लैब में विकसित किए जा रहे क्वाड्रेट रोबोट सबसे ज्यादा चर्चा में हैं. चार पैरों पर चलने वाले ये रोबोट ऊबड़-खाबड़ रास्तों, पहाड़ी इलाकों और संकरी सुरंगों में आसानी से मूव कर सकते हैं. इनकी डिजाइनिंग ऐसी की जा रही है कि वे इंसानों की तरह संतुलन बनाए रखते हुए कठिन परिस्थितियों में भी लगातार काम कर सकें. भविष्य में इनका उपयोग सेना, आपदा प्रबंधन और इंडस्ट्रियल सर्विलांस में किया जा सकता है।  हाई-अल्टीट्यूड मिशन के लिए बन रहे एडवांस ड्रोन मैनिट के प्रोफेसर मितुल कुमार अहिरवार ने बताया कि "रोबोटिक्स प्रोजेक्ट के साथ-साथ मैनिट में हाई-अल्टीट्यूड ड्रोन टेक्नोलॉजी पर भी रिसर्च चल रही है. ये ड्रोन पहाड़ी क्षेत्रों, सीमावर्ती इलाकों और जटिल संरचनाओं की निगरानी कर सकेंगे. खराब मौसम या जोखिम वाले क्षेत्रों में भी इनकी मदद से सटीक सर्विलांस किया जा सकेगा. आपदा प्रबंधन के दौरान यह तकनीक राहत और बचाव कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।  कम लागत में तैयार होगी स्वदेशी तकनीक दरअसल, विदेशी रोबोटिक मशीनों की कीमत काफी अधिक होती है, जिससे उनका बड़े स्तर पर उपयोग मुश्किल हो जाता है. मैनिट की टीम इन रोबोट्स और ड्रोन को कम लागत में विकसित करने पर फोकस कर रही है. रिसर्च का दावा है कि कम बजट के बावजूद इनकी एक्यूरेसी और कार्यक्षमता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. इससे देश में सस्ती और भरोसेमंद रोबोटिक तकनीक उपलब्ध हो सकेगी।  पेटेंट के बाद बाजार में आएंगी तकनीकें मैनिट में चल रहे कई प्रोजेक्ट अब एडवांस रिसर्च लेवल तक पहुंच चुके हैं. इन तकनीकों के लिए पेटेंट भी फाइल किए जा चुके हैं. पेटेंट प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन रोबोट्स और ड्रोन को कमर्शियल मार्केट और पब्लिक डोमेन में उतारा जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में ये तकनीकें देश की सुरक्षा, इंडस्ट्रियल मानिटरिंग और रिस्की आपरेशंस का चेहरा बदल सकती हैं। 

MP के सरकारी स्कूलों में जल्द होगी गेस्ट टीचर्स की एंट्री, छुट्टियों के बाद शुरू होगा जॉइनिंग अभियान

भोपाल  मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग ने अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया शुरू कर दी है। ग्रीष्मावकाश समाप्त होने के बाद 16 जून से स्कूल खुलते ही रिक्त पदों पर ज्वाइनिंग दी जाएगी। इसके लिए विभाग द्वारा विषयवार खाली पदों की सूची भी जारी कर दी गई है। इसके अनुसार माध्यमिक शिक्षक वर्ग में सबसे अधिक रिक्तियां अंग्रेजी, गणित और संस्कृत विषय में सामने आई हैं। इन विषयों में नियमित शिक्षकों की कमी के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। ऐसे में नए शिक्षा सत्र की शुरुआत से पहले ही अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था सुनिश्चित करने की तैयारी की जा रही है। स्कूल शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि जिलेवार और विषयवार रिक्त पदों के अनुसार पात्र अभ्यर्थियों से आवेदन आमंत्रित किए जा रहे हैं। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित स्कूलों में आवश्यकता के अनुसार अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति एक जुलाई से की जाएगी। इससे स्कूलों में पढ़ाई सुचारु रूप से संचालित हो सकेगी। 70 हजार पद पर अतिथि शिक्षक पदस्थ प्रदेशभर के सरकारी स्कूलों में हर वर्ष बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति की जाती है। इस बार भी 70 हजार पदों पर अतिथि शिक्षकों को अवसर मिलने की संभावना है। इनकी सेवाएं 30 अप्रैल को समाप्त हुई है। अब एक जुलाई से इनकी पदस्थापना की जाएगी। अतिथि शिक्षकों से आनलाइन पोर्टल पर स्कोर कार्ड जनरेट किए जा रहे हैं।

बढ़ती CNG-पेट्रोल कीमतों के खिलाफ ड्राइवरों का विरोध, तीन दिन चक्का जाम का ऐलान

नई दिल्ली दिल्ली-NCR में टैक्सी, ऑटो और अन्य कमर्शियल वाहनों के ड्राइवरों ने 21 मई से 23 मई तक तीन दिन की हड़ताल का ऐलान किया है। ANI ने प्लेटफॉर्म X पर इस फैसले की जानकारी साझा करते हुए बताया कि ड्राइवर यूनियनों का कहना है कि पिछले 15 सालों से दिल्ली-NCR में टैक्सी और ऑटो के किराए में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, जबकि इस दौरान CNG, पेट्रोल और डीजल की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। इसी वजह से ड्राइवर अब आर्थिक दबाव में हैं और सरकार से तुरंत किराया बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। ANI के मुताबिक यूनियनों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं हुआ तो आंदोलन को और बड़ा किया जाएगा। इसका सीधा असर दिल्ली-NCR में रोजाना सफर करने वाले लाखों यात्रियों पर पड़ सकता है। तीन दिन की इस हड़ताल के दौरान टैक्सी, ऑटो और कुछ अन्य कमर्शियल वाहन सड़कों से गायब रह सकते हैं, जिससे ऑफिस जाने वाले लोगों, एयरपोर्ट यात्रियों और लोकल ट्रांसपोर्ट पर निर्भर आम जनता को भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। किराया बढ़ाने की मांग क्यों बढ़ी? ड्राइवर संगठनों का कहना है कि दिल्ली में टैक्सी और ऑटो का किराया लंबे समय से नहीं बढ़ाया गया, जबकि वाहन चलाने की लागत लगातार बढ़ती गई। यूनियनों के मुताबिक CNG, पेट्रोल, डीजल, वाहन मेंटेनेंस, इंश्योरेंस और परमिट फीस के बढ़ते खर्च ने ड्राइवरों की कमाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। ड्राइवरों का आरोप है कि मौजूदा किराए में परिवार चलाना मुश्किल हो गया है और कई ड्राइवर कर्ज में डूब रहे हैं। इसी कारण ‘चालक शक्ति यूनियन’ समेत कई संगठनों ने संयुक्त रूप से चक्का जाम का फैसला लिया है। सरकार और ऐप कंपनियों पर भी उठाए सवाल यूनियनों ने सरकार के साथ-साथ ऐप आधारित कैब कंपनियों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि Ola और Uber जैसी कंपनियां मनमाने तरीके से किराया तय करती हैं, जबकि ड्राइवरों को उसका उचित हिस्सा नहीं मिलता। संगठनों ने दावा किया कि पिछले साल इस मुद्दे को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया था, जहां ड्राइवरों की समस्याओं के समाधान और किराया संशोधन को लेकर निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ। यूनियनों ने साफ कहा है कि अगर एक-दो सप्ताह के भीतर किराया बढ़ाने का नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा तथा 23 मई को दिल्ली सचिवालय के बाहर बड़ा प्रदर्शन भी किया जा सकता है।

ऐप-बेस्ड कैब और डिलीवरी सेवाओं के लिए नया सख्त नियम, सुरक्षा और बीमा व्यवस्था अनिवार्य

चंडीगढ़ हरियाणा में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में सोमवार को हुई कैबिनेट मीटिंग में अहम फैसले लिए गए. कैबिनेट की मीटिंग में हरियाणा मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1993 में बदलाव को मंजूरी दी गई.  इसमें मिनिस्ट्री ऑफ़ रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाईवेज़ की ओर से जारी दिशानिर्देश के तहत बदलाव किया गया और कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट के निर्देशों के चलते भी एग्रीगेटर लाइसेंस देने के लिए नियमों को मंज़ूरी दी गई. हरियाणा कैबिनेट ने यह फैसला राज्य के एनसीआर जिलों में बेहतर परिवहन को बढ़ावा देने, वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने और वायु गुणवता को बेहतर बनाने के लिए लिया गया है. संशोधित नियमों के तहत 1 जनवरी, 2026 से राष्ट्रीय राजधानी इलाकों में एग्रीगेटर्स, डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर्स और ई-कॉमर्स कंपनियों के बेड़े में शामिल सभी गाड़ियां आवश्यक तौर पर सीएनजी, इलेक्ट्रिक व्हीकल, बैटरी से चलने वाली गाड़ियां या किसी दूसरे स्वछ्तम ईंधन पर आधारित होंगी. इसके अलावा,  एनसीआर इलाकों में मौजूदा बेड़े में सिर्फ़ सीएनजी या इलेक्ट्रिक 3-व्हीलर, ऑटो-रिक्शा को ही शामिल करने की अनुमति सरकार की तरफ से दी जाएगी. कैबिनेट ने राज्य में चल रहे ऐप-बेस्ड पैसेंजर एग्रीगेटर्स और डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए एक बड़ा रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाने के लिए हरियाणा मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1993 के रूल 86 ए में बदलाव की भी मंज़ूरी दी. नए नियमों में एग्रीगेटर्स और डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर्स के लिए आवश्यक लाइसेंसिंग, ड्राइवरों और गाड़ियों के लिए ऑनबोर्डिंग नियम, पैसेंजर सुरक्षा के उपाय, शिकायत सुलझाने के तरीके, प्रेरणा और पुनरावलोकन प्रशिक्षण कार्यक्रम, ड्राइवरों और पैसेंजर के लिए इंश्योरेंस कवरेज, ऐप्स के लिए साइबर सिक्योरिटी का पालन और किराए का रेगुलेशन शामिल हैं. नियमों अनुसार, एग्रीगेटर्स और डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर्स को यात्रियों के लिए कम से कम 5 लाख रुपये का बीमा कवरेज, ड्राइवरों के लिए कम से कम 5 लाख रुपये का स्वास्थय बीमा और ऑनबोर्डेड ड्राइवरों के लिए कम से कम 10 लाख रुपये का टर्म इंश्योरेंस करवाना अनिवार्य होगा. इन नियमों के तहत गाड़ियों में व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस, पैनिक बटन, फर्स्ट-एड किट और फायर एक्सटिंग्विशर लगाना भी ज़रूरी है. एग्रीगेटर्स को पैसेंजर की मदद और शिकायत दूर करने के लिए 24×7 घण्टे कंट्रोल रूम और कॉल सेंटर भी बनाने होंगे. कैबिनेट ने तय किया है कि पारदर्शी और जिम्मेवारी को मज़बूत करने के लिए नियमों में वाहन और सारथी पोर्टल के ज़रिए गाड़ी और ड्राइवर की डिटेल्स के वाहन का डिजिटल प्रमाणीकरण का प्रबंध करना है. एग्रीगेटर्स और डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर्स को ऑनबोर्डेड ड्राइवरों और गाड़ियों का डिटेल्ड डिजिटल रिकॉर्ड भी रखना होगा. यहां करना होगा रजिस्ट्रेशन बैठक में मंत्रिपरषद को अवगत करवाया गया कि एग्रीगेटर्स, डिलीवरी सर्विस प्रोवाइडर्स और ई-कॉमर्स संस्थाओं के लिए रजिस्ट्रेशन और लाइसेंसिंग प्रोसेस निर्धारित पोर्टल cleanmobility.haryanatransport.gov.in. के ज़रिए संचालन किया जाएगा. नए फ्रेमवर्क में ड्राइवर वेलफेयर, किराया शेयरिंग, सेफ्टी स्टैंडर्ड, दिव्यांगजन-फ्रेंडली गाड़ियों को शामिल करने और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर बढ़ने से जुड़े नियम भी शामिल किए हैं. कितना है एनसीआर का इलाका गौरतलब है कि दिल्ली और एनसीआर में हरियाणा के 14 जिले आते हैं. इसमें गुरुग्राम, फरीदाबाद, रेवाड़ी, सोनीपत, जींद, पानीपत और करनाल के कुछ हिस्से शामिल हैं. ऐसे में इस फैसले का असर इन जिलों पर होगा.

बालेन सरकार की कार्रवाई का भारत पर असर? नेपाल सीमा पर बढ़ाई गई निगरानी

गोरखपुर  नेपाल में अवैध निर्माण, अतिक्रमण और सरकारी जमीनों पर कब्जे के खिलाफ चल रहे बुलडोजर अभियान के बाद भारत-नेपाल सीमा से जुड़े जिलों में सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गई हैं।  उत्तर प्रदेश पुलिस की अभिसूचना इकाई नेपाल बार्डर (एनबी) शाखा की रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि नेपाल में बढ़ते दबाव और कार्रवाई के चलते वहां रह रहे रोहिंग्या मुसलमान रोजगार और शरण के लिए अवैध रूप से भारतीय सीमा में प्रवेश करने की कोशिश कर सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल सरकार पूरे देश में अवैध निर्माण, झुग्गी-झोपड़ियों और सरकारी जमीनों पर कब्जों के खिलाफ अभियान चला रही है। इस कार्रवाई के तहत बुलडोजर से ध्वस्तीकरण किया जा रहा है। नेपाली सेना ने भी संबंधित निकायों से अवैध बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों का विस्तृत आंकड़ा मांगा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि काठमांडू के कपन क्षेत्र समेत नेपाल के विभिन्न हिस्सों में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। हिंदूवादी संगठनों द्वारा नेपाल में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों की बस्तियों को हटाने की मांग की जा रही है। नेपाल सरकार की कार्रवाई, सेना के डाटा संकलन और हिंदूवादी संगठनों के विरोध के कारण रोहिंग्या के सामने रोजगार, आवास और आजीविका का संकट गहराने लगा है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि अधिकांश रोहिंग्या मुसलमान उर्दू के साथ नेपाली भाषा भी सीख चुके हैं। कई लोगों द्वारा अवैध तरीके से पहचान पत्र बनवाने की जानकारी भी सामने आई है। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि यही वजह है कि सीमावर्ती इलाकों में उनकी पहचान कर पाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। नेपाल में बलरामपुर जिले की सीमा से सटे गढ़वा गांव पालिका के कोईलावास वार्ड नंबर-8 में अवैध बस्तियों का चिन्हांकन भी शुरू कर दिया गया है।वहां के वर्तमान प्रधान अब्दुल खालिक सिद्दीकी इस कार्रवाई का विरोध कर रहा है और अवैध रुप से रहने वालों को कानूनी अधिकार व जमीन के दस्तावेज देने की मांग कर रहा है। खुफिया एजेंसियों ने आशंका जताई है कि नेपाल में प्रतिकूल हालात बनने पर रोहिंग्या और बांग्लादेशी सीमावर्ती रास्तों का इस्तेमाल कर भारतीय सीमा में प्रवेश की कोशिश कर सकते हैं। इसी को देखते हुए सीमावर्ती जिलों में निगरानी बढ़ाने, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने और खुफिया नेटवर्क को सक्रिय करने के निर्देश दिए गए हैं।  

झारखंड में 60 लाख महिलाओं को मंईयां सम्मान योजना से मिल रही आर्थिक मदद

रांची झारखंड मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि आधी आबादी को मुख्यधारा में शामिल किए बिना राज्य का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। वर्तमान में राज्य की लगभग 60 लाख महिलाओं को झारखंड मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना के अंतर्गत प्रति माह वित्तीय सहायता प्रदान कर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसा हो सकता है कि इस योजना का पांच से दस प्रतिशत लोग गलत तरीके से लाभ ले रहे हों, लेकिन ऐसे लोगों को रोकने के लिए 90 प्रतिशत लोगों को प्रभावित नहीं किया जा सकता। हेमंत सोरेन सोमवार को झारखंड मंत्रालय में आयोजित नवनियुक्त इंटर एवं स्नातक प्रशिक्षित सहायक आचार्यों का नियुक्ति-पत्र वितरण समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह अवसर न केवल नवनियुक्त अभ्यर्थियों के लिए गौरव का क्षण है, बल्कि राज्य के समग्र और समावेशी विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमें यह देखकर प्रसन्नता होती है कि इस योजना का लाभ लेने वाली बेटियां आज कलेक्टर जैसे पदों तक पहुंच रही हैं। महिलाओं को मुख्यधारा में लाने का प्रयास महिलाओं को मुख्यधारा में लाने का कार्य भी निरंतर हो रहा है। अब वह समय बीत चुका है, जब महिलाओं को चाहरदीवारी के भीतर सीमित रखा जाता था। आज उन्हें आगे आना है और समाज को भी उन्हें आगे बढ़ाने का संकल्प लेना है। इस अवसर पर राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, श्रम मंत्री संजय प्रसाद यादव, मुख्य सचिव अविनाश कुमार, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता सचिव उमा शंकर सिंह, प्राथमिक शिक्षा निदेशक मनोज कुमार रंजन सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित थे। महिलाओं-बच्चों का तैयार करना है भविष्य राज्य सरकार समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। राज्य का एक बड़ा हिस्सा आदिवासी, दलित और पिछड़ा वर्ग बाहुल्य है, जो कई कारणों से विकास की गति में पीछे छूट गया था। नवनियुक्त कर्मी गांव-गांव और घर-घर जाकर सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करें। यह सिर्फ एक नौकरी नहीं है, बल्कि आपके माध्यम से सरकार गांव-गांव, घर-घर और हर व्यक्ति तक पहुंचना चाहती है। खासकर महिलाओं और बच्चों तक, जिन्हें हमें आने वाले भविष्य के लिए तैयार करना है। सीमित दायरे में जीवन जीने वाले इन लोगों को बदलते परिवेश के अनुरूप आगे बढ़ाना, उनका सशक्तिकरण करना, यह बड़ी चुनौती आपके कंधों पर होगी। सरकार निष्पक्ष तरीके से रोजगार देने को प्रतिबद्ध नियुक्ति पत्र वितरण समारोह सभागार उत्साह, उमंग एवं गौरवपूर्ण माहौल से सराबोर रहा। मुख्यमंत्री ने नियुक्ति पत्र प्राप्त करने वाले सभी अभ्यर्थियों को बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि यह केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज और राज्य के विकास की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि शिक्षक राष्ट्र निर्माण की आधारशिला होते हैं, वहीं महिला पर्यवेक्षकाएं समाज में महिलाओं एवं बच्चों के कल्याण से जुड़ी योजनाओं को धरातल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार युवाओं को पारदर्शी एवं निष्पक्ष तरीके से रोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने, विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने तथा महिला एवं बाल विकास योजना को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से लगातार नियुक्तियां की जा रही हैं।

पश्चिमी सिंहभूम में बड़ा एनकाउंटर, कोबरा 209 बटालियन और नक्सलियों में मुठभेड़

 चक्रधरपुर  पश्चिमी सिंहभूम जिले के पोड़ाहाट जंगल में केड़ाबीर के पास मंगलवार तड़के पुलिस और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ में हुई है। सूचना है कि मुठभेड़ के दौरान नक्सली मारे गए हैं। हालांकि अभी तक अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है कि कितने नक्सली मारे गए हैं। घटना सोनुवा थाना क्षेत्र के केड़ाबीर इलाके में हुई। तड़के साढ़े छह बजे हुई मुठभेड़ पुलिस सूत्रों के अनुसार, कोबरा 209 बटालियन के जवान पिछले दो दिनों से सोनुवा, गोइलकेरा थाना क्षेत्र के घने जंगलों में सर्च अभियान चला रहे थे। तड़के करीब छह बजे कॉम्बिंग ऑपरेशन के दौरान जवानों का नक्सलियों से आमना-सामना हो गया। इसके बाद दोनों ओर से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू हो गई। रुक-रुक कर चली गोलीबारी में एक या दो नक्सली मारे गए हैं। सूचना है कि पुलिस ने उसके पास से हथियार समेत अन्य सामान बरामद किया है। एसपी ने की पुष्टि, हाई अलर्ट जारी पश्चिमी सिंहभूम के एसपी अमित रेणु ने मुठभेड़ की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि इलाके में ऑपरेशन जारी है। मुठभेड़ के बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षाबलों की सतर्कता बढ़ा दी गई है और सघन तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। पूरे सारंडा क्षेत्र में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। मिसिर बेसरा के नेतृत्व में सक्रिय नक्सली सूत्रों के अनुसार इलाके में माओवादी नेता मिसिर बेसरा के नेतृत्व में नक्सली अब भी सक्रिय हैं। हाल ही में गोईलकेरा थाना क्षेत्र में एक पूर्व नक्सली रमेश चांपिया की हत्या के बाद संकेत मिल रहे थे कि नक्सली सारंडा से निकलकर कोल्हान और पोड़ाहाट जंगल में आसपास के इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। इसके बाद 29 अप्रैल को सुरक्षा बल के साथ मुठभेड़ में मारे गए 1 लाख के इनामी नक्सली इसराइल पूर्ति उर्फ अमृत को मार गिराया था। इसके बाद से सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि नक्सलियों के खिलाफ जल्द बड़ी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल जंगल क्षेत्रों में पुलिस और नक्सलियों के बीच लुकाछिपी का खेल जारी है। सुरक्षाबल हर गतिविधि पर कड़ी नजर रखे हुए हैं।