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रूसी तेल से और बैन हटा सकता है US

नई दिल्ली. वैश्विक कूटनीति और ऊर्जा बाजार में पिछले कुछ दिनों में एक बड़ा और हैरान करने वाला बदलाव देखने को मिला है। हमेशा आक्रामक रुख अपनाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अचानक रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील दे दी। इसके साथ ही, बिना किसी शोर-शराबे के भारत ने अपने लिए एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल कर ली है। अमेरिकी ट्रेजरी (वित्त) मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा कि अमेरिकी सरकार और अधिक रूसी तेल से प्रतिबंध हटाने पर विचार कर रही है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। इससे ठीक एक दिन पहले, अमेरिका ने भारत को मॉस्को से तेल खरीदने की अस्थायी मंजूरी दी थी। बाजार में आपूर्ति बढ़ाने की रणनीति फॉक्स बिजनेस से बात करते हुए ट्रंप के मंत्री स्कॉट बेसेंट ने शुक्रवार को कहा, 'हम अन्य रूसी तेलों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं।' उन्होंने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि समुद्र में करोड़ों बैरल प्रतिबंधित कच्चा तेल जहाजों पर मौजूद है। अनिवार्य रूप से, उन पर से प्रतिबंध हटाकर ट्रेजरी बाजार में एक नई सप्लाई पैदा कर सकता है। अमेरिका ने इस बात पर जोर दिया है कि इन नए कदमों का उद्देश्य मॉस्को को राहत देना बिल्कुल नहीं है। रूस पर ये प्रतिबंध यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की बातचीत में उसके आचरण के कारण लगाए गए थे। अमेरिका का कहना है कि यह नई छूट केवल उस सप्लाई को प्रभावित करेगी जो पहले से ही ट्रांजिट में है या जहाजों पर लदी है। बेसेंट ने यह भी कहा कि इस संघर्ष के दौरान बाजार को राहत पहुंचाने के लिए अमेरिका लगातार नए कदमों की घोषणा करता रहेगा, क्योंकि तेल की ऊंची कीमतें अमेरिकी घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए परेशानी का सबब बन गई हैं। भारत को मिली विशेष छूट इससे पहले गुरुवार को, अमेरिकी सरकार ने आर्थिक प्रतिबंधों में अस्थायी रूप से ढील दी थी ताकि समुद्र में फंसे रूसी तेल को भारत को बेचा जा सके। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न प्रतिबंध व्यवस्थाओं द्वारा रोके गए जहाजों से होने वाले लेनदेन सहित इस तरह की खरीद-फरोख्त को 3 अप्रैल, 2026 के अंत तक के लिए अधिकृत किया गया है। अचानक क्यों ढीले पड़े ट्रंप के तेवर? (अमेरिका की मजबूरी) अमेरिका द्वारा रूसी तेल पर से प्रतिबंध हटाने या ढील देने के पीछे रूस से कोई प्रेम नहीं है, बल्कि यह एक भयंकर आर्थिक और भू-राजनीतिक मजबूरी है। अमेरिका और इजरायल का ईरान के साथ जो सीधा युद्ध छिड़ गया है, उसने खाड़ी क्षेत्र में आग लगा दी है। ईरान के जवाबी हमलों के कारण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' से होने वाला व्यापार लगभग ठप हो गया है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है। इस चोकपॉइंट के बंद होने से महज एक हफ्ते में कच्चे तेल की कीमतों में 30% का भारी उछाल आया है। शुक्रवार को कच्चे तेल की कीमतों में 8.5 प्रतिशत का भारी उछाल दर्ज किया गया। यह उछाल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान के बाद आया जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य पूर्व का यह युद्ध केवल ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण पर ही समाप्त होगा। अमेरिका में बढ़ती महंगाई और पेट्रोल की ऊंची कीमतें राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू स्तर पर राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकती हैं। ट्रंप ने भले ही ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण तक युद्ध जारी रखने की बात कही हो, लेकिन वे जानते हैं कि लंबे समय तक तेल की इतनी ऊंची कीमतें अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकती हैं। बाजार को शांत करने के लिए अमेरिका को तुरंत किसी भी कीमत पर बाजार में तेल की जरूरत है। रूसी तेल से और बैन हटा सकता है अमेरिका: इसका मतलब क्या है? अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का बयान बहुत नपा-तुला लेकिन स्पष्ट है। अमेरिका रूस पर लगे मूल प्रतिबंधों को खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि एक तकनीकी ढील निकाल रहा है। बेसेंट के अनुसार, प्रतिबंधों के कारण करोड़ों बैरल रूसी कच्चा तेल वर्तमान में जहाजों पर समुद्र में फंसा हुआ है। अमेरिका इन विशेष जहाजों पर से प्रतिबंध हटाकर इस तेल को बाजार में उतारना चाहता है। इससे वैश्विक आपूर्ति बढ़ेगी और तेल की कीमतों में कुछ नरमी आएगी। वाशिंगटन इसे रूस को राहत के तौर पर पेश नहीं कर रहा है। उनका तर्क है कि यह केवल ट्रांजिट में फंसे तेल के लिए है, न कि रूस के भविष्य के तेल उत्पादन के लिए। यह अमेरिका की मजबूरी में उठाया गया कदम है ताकि वैश्विक तेल संकट को टाला जा सके। खामोश रहकर भी भारत की जीत कैसे? इस पूरे वैश्विक उथल-पुथल में भारत सबसे बड़े विजेता के रूप में उभरा है, और वह भी बिना अमेरिका से कोई सीधा टकराव मोल लिए। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। महंगे तेल का सीधा असर भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अमेरिका ने भारत को 3 अप्रैल 2026 तक समुद्र में फंसे इस रूसी तेल को खरीदने की विशेष और अस्थायी छूट दे दी है। चूंकि यह तेल प्रतिबंधित और फंसा हुआ था, इसलिए भारत इसे रूस से भारी डिस्काउंट पर खरीद सकेगा। इससे भारत का आयात बिल काफी कम होगा। भारत ने इस पूरे संकट में 'स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी' बनाए रखी। भारत ने ना तो अमेरिका का विरोध किया और ना ही रूस से अपने संबंध तोड़े। खामोश रहकर भारत ने बस सही समय का इंतजार किया। अमेरिका को वैश्विक तेल बाजार को क्रैश होने से बचाने के लिए भारत जैसे बड़े खरीदार की जरूरत थी, जो इस तेल को खपा सके। पहले जो तेल खरीदने पर भारत पर अमेरिकी प्रतिबंधों का खतरा मंडराता था, अब वही तेल भारत अमेरिकी सरकार की 'आधिकारिक मंजूरी' से खरीदेगा।

सुरक्षा एजेंसियों के खौफ से बस्तर में नक्सलियों के TCOC पर सन्नाटा

बस्तर. देश के सबसे बड़े नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में इस बार एक अलग स्थिति देखने को मिल रही है। करीब दो दशक में पहली बार ऐसा लग रहा है कि नक्सली अपने अहम सैन्य अभियान TCOC (Tactical Counter Offensive Campaign) की शुरुआत तय समय पर नहीं कर पाए हैं। आमतौर पर यह अभियान हर साल 8 मार्च के बाद शुरू होकर जून तक चलता है, जिसका उद्देश्य सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला करना और बस्तर जैसे क्षेत्रों में अपनी पैठ बढ़ाना होता है। यह अभियान उनके गुरिल्ला युद्ध का हिस्सा है, जिसमें वे सूखे और पतझड़ के मौसम का फायदा उठाते हैं। लेकिन इस बार शुरुआती दिनों में किसी बड़ी गतिविधि के संकेत नहीं मिले हैं। बता दें कि सुरक्षा एजेंसियां इसे नक्सल संगठन पर बढ़ते दबाव और कमजोर होती संरचना का परिणाम मान रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में लगातार चलाए गए ऑपरेशन में कई बड़े कमांडर मारे गए, गिरफ्तार हुए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। इसके साथ ही जंगलों में नए सुरक्षा कैंप, सड़कों का तेजी से विस्तार और ड्रोन सर्विलांस ने नक्सलियों की गतिविधियों को काफी सीमित कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक सुरक्षा एजेंसियों के खौफ से अब नक्सली बड़ी संख्या में एकत्र होकर रणनीति बनाने में भी मुश्किल महसूस कर रहे हैं। ऐसे में बड़े हमलों की योजना बनाना उनके लिए पहले जितना आसान नहीं रह गया है।हालांकि सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं। आशंका है कि नक्सली छोटे या मध्यम स्तर के हमलों के जरिए अभियान की शुरुआत कर सकते हैं। इसे देखते हुए बस्तर संभाग के सभी जिलों में सुरक्षा बलों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। यदि इस साल भी टीसीओसी प्रभावी रूप से शुरू नहीं हो पाता, तो यह नक्सली आंदोलन के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका साबित हो सकता है।

दुबई में सड़ रहे 1000 कंटेनर, केले, अंगूर, अनार और सब्जियों का भारी नुकसान भारत को

 नई दिल्‍ली मिडिल ईस्‍ट में संघर्ष के कारण महाराष्‍ट्र के किसानों और निर्यातकों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. एग्री प्रोडक्‍ट्स से जुड़े 800 से 1000 कंटेनर दुबई के जेबल अली बंदरगाह पर फंसे हुए हैं. 28 फरवरी से ही इनका कामकाज ठप है. कंटेनर अलग-अलग देशों या क्षेत्रों में एक्‍सपोर्ट नहीं हो पा रहे हैं, जिस कारण लाखों-करोड़ों के सामान खराब हो रहे हैं। दुबई का जेबेल अली पोर्ट मिडिल ईस्‍ट का एक प्रमुख बंदरगाह, जो खाड़ी क्षेत्र में कृषि उत्पादों के वितरण का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. हालांकि, संघर्ष के कारण कामकाज पूरी तरह से ठप हो चुका है. इस कारण दुबई पहुंच चुके या भारत से आ रहे कई शिपमेंट बंदरगाह पर ही फंसे हुए हैं। निर्यातकों को भारी नुकसान फंसे हुए कंटेनरों में मुख्य रूप से केले, अंगूर, अनार, तरबूज, पत्तेदार सब्जियां और प्याज जैसे कम समय तक टिकने वाले कृषि उत्‍पाद हैं. यह महाराष्ट्र से निर्यात होने वाले प्रमुख उत्पाद भी हैं. कंटेनर फंस जाने के कारण ये खराब हो सकते हैं, जिसका मतलब है कि निर्यातकों को भारी नुकसान होगा. कंटेनर ऐसे समय में भी फंसे हैं जब खाड़ी देशों में रमजान के दौरान इन फलों, विशेष रूप से अंगूर और अनार की मांग चरम पर होती है. इसलिए कारोबार कम होने की भी आशंका है। घाटे में बेचना पड़ सकता है अंगूर वॉर के कारण कंटेनर तो फंसे ही हैं, जिससे मांग पूरी नहीं हो पा रही है. दूसरी ओर, खाड़ी देशों में फलों की मांग में परंपरागत रूप से वृद्धि देखी जाती है. वहीं किसान इस मौसमी बदलाव के अनुसार अपनी फसल की कटाई की योजना बनाते हैं. हालांकि, इस वर्ष संघर्ष के कारण निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है. बंदरगाहों पर मौजूद लगभग 5,000 से 6,000 टन अंगूर प्रभावित होने की आशंका है और खेतों में मौजूद निर्यात योग्य गुणवत्ता वाले 10,000 टन अंगूरों को अब स्थानीय स्तर पर घाटे में बेचना पड़ सकता है। बंदरगाह पर भीड़भाड़ के कारण और देरी  मुंबई के जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह (JNPT) पर दुबई जाने वाले अंगूर के लगभग 80 कंटेनर अभी तक अनलोड नहीं किए गए हैं. नासिक से निर्यात के लिए आ रहे 200 से अधिक कंटेनर बंदरगाह के बाहर फंसे हुए हैं, जिससे भारी जाम लग गया है. स्थिति गंभीर है और निर्यातकों का कहना है कि जब तक जहाजरानी सर्विस फिर से शुरू नहीं हो जातीं, तब तक यह समस्या बनी रहेगी. इंडियन ग्रेप एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के निदेशक मधुकर क्षीरसागर के अनुसार, फंसे हुए हर कंटेनर से भारी नुकसान होता है, जिससे लाखों रुपये का वित्तीय नुकसान होता है। किसानों ने सरकार से अपील की किसान संगठन तत्काल सरकारी सहायता की मांग कर रहे हैं. महाराष्ट्र राज्य प्याज उत्पादक संघ के अध्यक्ष भरत दिघोले ने सरकार से प्रति क्विंटल 1,500 रुपये की सब्सिडी देने के साथ-साथ फंसे हुए कंटेनरों के लिए बंदरगाह शुल्क और विलंब शुल्क माफ करने का अनुरोध किया है. इसके अलावा, निर्यातकों की सहायता के लिए एक अस्थायी खरीद योजना शुरू करने की भी मांग की गई है, ताकि माल की निकासी होने तक उन्हें सहायता मिल सके। निर्यातकों ने खेप वापस मंगाई कुछ निर्यातकों ने पहले ही अपने माल को वापस मंगाना शुरू कर दिया है. प्रमुख निर्यातक प्रकाश गायकवाड़ ने बताया कि लंबे समय तक देरी के कारण उन्हें जेएनपीटी से केले और प्याज के कंटेनर वापस मंगाने पड़े, क्योंकि देरी से फसल खराब हो रही थी. नासिक सीमा शुल्क को भेजे गए प्याज के एक शिपमेंट को मंजूरी मिलने में चार दिन लग गए, तब तक पूरा माल खराब हो चुका था। कृषि आयात और निर्यात पर व्यापक प्रभाव इस रुकावट का असर खाड़ी देशों और ईरान से आयात पर भी पड़ा है. सेब, कीवी और खजूर जैसे उत्पादों से भरे लगभग 600-700 कंटेनर ईरानी बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं. फल व्यापारी सुयोग ज़ेदे के अनुसार, इन कंटेनरों का मूल्य काफी अधिक है, जिनमें कीवी के कंटेनरों का मूल्य 30-32 लाख रुपये और खजूर के कंटेनरों का मूल्य 45 लाख रुपये है। इसके अलावा, भारत के चीनी निर्यात अनिश्चितताओं का सामना कर रहे हैं. केंद्र ने इस सीजन में 20 लाख टन चीनी के निर्यात को मंजूरी दी थी, लेकिन निर्यातकों का अनुमान है कि मौजूदा व्यवधानों के कारण केवल लगभग 5 लाख टन चीनी ही बाजार तक पहुंच पाएगी।

धार के लाल पक्षाल सेक्रेटरी ने UPSC में 8वीं रैंक हासिल कर देशभर में लहराया परचम

धार   धार जिले के छोटे कस्बे बाग के लिए गर्व की बात है कि यहां के होनहार युवा पक्षाल सेक्रेटरी ने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 8 हासिल कर क्षेत्र का नाम पूरे देश में रोशन किया है। उनकी इस उपलब्धि से परिवार सहित पूरे नगर में खुशी और गर्व का माहौल है। लोगों ने मिठाई बांटकर और आतिशबाजी कर खुशियां मनाईं। माता-पिता का आशीर्वाद पक्षाल सेक्रेटरी का कहना है कि माता-पिता का आशीर्वाद और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण ही उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा रही। उनके पिता निलेश जैन कपड़ा व्यवसायी हैं, जबकि माता दीप्ति जैन गृहिणी हैं। परिवार के अनुसार प्रक्षाल बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी रहे हैं और उन्होंने कड़ी मेहनत व लगन से यह मुकाम हासिल किया। पक्षाल की प्रारंभिक पढ़ाई बाग के महेश मेमोरियल स्कूल में हुई। आगे की पढ़ाई के लिए वे इंदौर चले गए और बाद में उन्होंने आईआईटी कानपुर से फाइनेंस में पढ़ाई की। आईआईटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट क्षेत्र में जाने के बजाय देश सेवा का रास्ता चुना और सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी। दिल्ली में रहकर तैयारी पक्षाल वर्ष 2022-23 के आसपास दिल्ली चले गए और वहीं रहकर यूपीएससी की तैयारी की। उनकी छोटी बहन क्रिया जैन ने बताया कि तैयारी के दौरान उन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना किया। कई बार ऐसा समय भी आया जब वे रोजाना केवल 3 से 4 घंटे ही सोते थे और दिनभर लाइब्रेरी में पढ़ाई करते थे। प्रयास जारी रहा पहले प्रयास में उन्हें भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) मिलने की संभावना थी, लेकिन उनका लक्ष्य आईएएस बनना था, इसलिए उन्होंने तैयारी जारी रखी। दूसरे प्रयास में वे प्रीलिम्स में ही रह गए, लेकिन तीसरे प्रयास में उन्होंने शानदार सफलता हासिल करते हुए ऑल इंडिया रैंक 8 प्राप्त की। तैयारी के दौरान कई चुनौतियां भी सामने आईं। एक बार इंटरव्यू से एक दिन पहले उनका पैर मुड़ गया था, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पक्षाल जैन की इस सफलता से बाग सहित पूरे क्षेत्र के युवाओं को प्रेरणा मिली है कि छोटे कस्बों से भी बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं।

Xiaomi ने फैक्ट्री में इंसान जैसे ह्यूमनॉइड रोबोट्स उतारे, अब इंसानों की जरूरत नहीं होगी!

नई दिल्ली चीन की टेक कंपनी Xiaomi अब स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक कार के बाद एक और बड़ी टेक्नोलॉजी रेस में उतर चुकी है. कंपनी के मुताबिक आने वाले कुछ सालों में उनकी फैक्ट्रियों में इंसानों की जगह ह्यूमनॉइड रोबोट बड़ी संख्या में काम करते दिखाई दे सकते हैं। Xiaomi के CEO ली जुन ने बताया है कि कंपनी अगले पांच साल के भीतर अपने प्रोडक्शन प्लांट्स में बड़ी संख्या में ऐसे रोबोट तैनात करने की योजना बना रही है. कंपनी के वीडियो में ह्यूमनॉइड रोबोट्स को फैक्ट्री में काम करते हुए देखा जा सकता है। दरअसल Xiaomi ने हाल ही में अपने ऑटोमोबाइल फैक्ट्री में ह्यूमनॉइड रोबोट का ट्रायल शुरू किया है. इस टेस्ट के दौरान रोबोट ने बिना किसी इंसानी मदद के करीब तीन घंटे तक लगातार काम किया और कार असेंबली से जुड़े कई काम पूरे किए। इन रोबोट्स को कार के फ्लोर पर स्क्रू लगाना और छोटे-छोटे पार्ट्स फिट करने जैसे काम दिए गए थे, जिनमें करीब 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता दर देखने को मिली। Xiaomi के मुताबिक इन रोबोट्स को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे फैक्ट्री के तेज प्रोडक्शन सिस्टम के साथ तालमेल बिठा सकें. कंपनी की कार फैक्ट्री में एक गाड़ी बनाने में लगभग 76 सेकंड लगते हैं, और रोबोट को उसी गति के साथ काम करने के लिए ट्रेन किया जा रहा है। इन रोबोट्स के पीछे Xiaomi का अपना AI सिस्टम और रोबोटिक्स प्लेटफॉर्म काम करता है. कंपनी ने इसके लिए विज़न-लैंग्वेज-एक्शन मॉडल और मल्टीमॉडल AI टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। इससे रोबोट न सिर्फ चीजों को पहचान सकता है बल्कि यह भी समझ सकता है कि उन्हें कैसे इस्तेमाल करना है. इसी वजह से रोबोट असेंबली लाइन में छोटे-छोटे जटिल काम भी कर पा रहा है। Xiaomi की स्ट्रैटिजी फिलहाल फैक्ट्री-फर्स्ट मानी जा रही है. यानी कंपनी पहले कंट्रोल्ड माहौल वाले इंडस्ट्रियल प्लांट में रोबोट को ट्रेन करेगी, ताकि वे असली दुनिया के काम सीख सकें. बाद में इसी तकनीक को घरों और सर्विस सेक्टर में इस्तेमाल करने की योजना है। दरअसल चीन इस समय आर्टिफिशियल इ्ंटेलिजेंस और रोबोटिक्स को लेकर काफी आक्रामक रणनीति अपना रहा है. कई टेक कंपनियां और स्टार्टअप ह्यूमनॉइड रोबोट विकसित कर रही हैं, जिन्हें मैन्युफैक्चरिंग से लेकर लॉजिस्टिक्स तक के कामों में लगाया जा सकता है। सरकार भी इस सेक्टर को भविष्य की इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी मानकर तेजी से बढ़ावा दे रही है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह तकनीक सफल होती है तो आने वाले दशक में फैक्ट्रियों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है. कई जगहों पर इंसानों की जगह रोबोट काम करते दिखाई देंगे, जिससे उत्पादन तेज और सस्ता हो सकता है। हालांकि इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगा है कि बड़े पैमाने पर रोबोट के इस्तेमाल से मानव नौकरियों पर कितना असर पड़ेगा. फिलहाल Xiaomi का यह एक्सपेरिमेंट से ये तो क्लियर है कि आने वाले समय में स्मार्टफोन कंपनियां सिर्फ गैजेट्स नहीं बनाएंगी, बल्कि AI और रोबोटिक्स के जरिए पूरी इंडस्ट्रियल दुनिया को बदलने की कोशिश करेंगी।

पीएम किसान योजना की 22वीं किस्त का इंतजार खत्म, असम दौरे से हो सकती है घोषणा

भोपाल   प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की अगली किस्त को लेकर किसानों के बीच उत्सुकता बढ़ गई है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि पीएम मोदी असम दौरे के दौरान पीएम किसान सम्मान निधि की 22वीं किस्त किसानों के बैंक खातों में ट्रांसफर कर सकते हैं। बता दें कि पीएम किसान योजना के तहत किसानों को हर साल 6 हजार रुपये की सहायता तीन किस्तों में दी जाती है। असम दौरे पर रहेंगे प्रधानमंत्री जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 13 मार्च को असम के कोकराझार दौरे पर जाएंगे। यहां वे बोडोलैंड टेरिटोरियल एरियाज डिस्ट्रिक्ट में आयोजित कई सरकारी कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे। इस दौरान प्रधानमंत्री विभिन्न विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास करेंगे तथा एक बड़ी जनसभा को भी संबोधित करेंगे। रैली में हो सकती है किस्त जारी करने की घोषणा राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि कोकराझार में होने वाली इस रैली के दौरान प्रधानमंत्री पीएम किसान सम्मान निधि की 22वीं किस्त जारी करने की घोषणा कर सकते हैं। हालांकि अभी इसे लेकर केवल कयास लगाए जा रहे हैं और आधिकारिक पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है। पहले कब जारी हुई थीं किस्तें पीएम किसान योजना के तहत किसानों को हर साल 6 हजार रुपये की सहायता तीन किस्तों में दी जाती है।     20वीं किस्त 2 अगस्त 2025 को वाराणसी से जारी की गई थी।     21वीं किस्त नवंबर 2025 में तमिलनाडु के कोयंबटूर से जारी हुई थी। मध्यप्रदेश के 81 लाख से ज्यादा किसान लाभार्थी ताजा आंकड़ों के मुताबिक, मध्यप्रदेश में करीब 81 लाख 81 हजार 751 किसान इस योजना का लाभ ले रहे हैं। लेकिन सरकार अपात्र लाभार्थियों की पहचान को लेकर सख्त हो गई है। फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में प्रदेश के करीब 1.66 लाख किसानों के नाम पात्रता सूची से हटाए जा चुके हैं। किसानों के लिए कई योजनाएं लागू सरकार के अनुसार अब तक करीब 10 करोड़ किसानों को इस योजना के तहत 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी जा चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुताबिक कृषि क्षेत्र में कई सुधार किए गए हैं     एमएसपी सुधारों से किसानों को लागत का डेढ़ गुना तक लाभ मिल रहा है।     इंस्टीट्यूशनल क्रेडिट कवरेज 75 प्रतिशत से अधिक हो चुका है।     प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के दावे निपटाए गए हैं। प्रधानमंत्री ने कहा है कि इन प्रयासों से किसानों का जोखिम काफी कम हुआ है और उन्हें आर्थिक सुरक्षा का एक मजबूत आधार मिला है।

रॉयल एनफील्ड गुरिल्ला 450 का जल्द होगा लॉन्च, 450cc सेगमेंट में कंपनी की बड़ी रणनीति

मुंबई  भारतीय बाइक बाजार में अपनी मजबूत पहचान रखने वाली रॉयल एनफील्ड जल्द ही अपने पोर्टफोलियो को और मजबूत करने जा रही है। खबर है कि कंपनी अपनी नई और दमदार बाइक गुरिल्ला 450 को मार्च 2026 के अंत तक लॉन्च कर सकती है। यह बाइक कंपनी की 450cc लाइनअप का सबसे किफायती मॉडल मानी जा रही है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि यह मॉडल कंपनी की बिक्री को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है। नई बाइक को लेकर बाइक प्रेमियों में पहले से ही काफी उत्सुकता देखी जा रही है। 450cc सेगमेंट में पकड़ मजबूत करने की तैयारी रॉयल एनफील्ड लंबे समय से 350cc सेगमेंट में मजबूत पकड़ बनाए हुए है। हालांकि 450cc श्रेणी में कंपनी को अभी उतनी सफलता नहीं मिली, जितनी उम्मीद की जा रही थी। यहां तक कि कंपनी की 650cc सीरीज की कुछ बाइक्स भी बिक्री के मामले में बेहतर प्रदर्शन करती नजर आई हैं। ऐसे में कंपनी अब गुरिल्ला 450 को अपडेटेड फीचर्स और बेहतर राइडिंग अनुभव के साथ पेश करने की तैयारी में है, ताकि इस सेगमेंट में अपनी स्थिति मजबूत की जा सके। सस्पेंशन और राइड क्वालिटी में सुधार की संभावना हालांकि कंपनी ने अभी तक आधिकारिक तौर पर नए अपडेट्स का खुलासा नहीं किया है, लेकिन ऑटो इंडस्ट्री में चर्चा है कि नए मॉडल में सस्पेंशन सेटअप को बेहतर बनाया जा सकता है। मौजूदा मॉडल में खराब सड़कों पर राइड थोड़ी सख्त महसूस होने की शिकायत कुछ राइडर्स ने की थी। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि नए वर्जन में बेहतर रियर सस्पेंशन दिया जा सकता है, जिससे राइडिंग अनुभव और आरामदायक हो सके। फ्रेश डिजाइन और नए कलर ऑप्शन नई गुरिल्ला 450 के साथ कुछ नए कलर ऑप्शन भी देखने को मिल सकते हैं। इसके अलावा अगर कंपनी इसमें अपसाइड डाउन (USD) फ्रंट फोर्क्स जैसे फीचर्स देती है, तो बाइक की हैंडलिंग और लुक दोनों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इससे बाइक का रोडस्टर कैरेक्टर और ज्यादा मजबूत हो सकता है, खासकर लंबी दूरी की राइड के दौरान। दमदार इंजन और परफॉर्मेंस इंजन की बात करें तो 2026 गुरिल्ला 450 में कंपनी का भरोसेमंद Sherpa 450 इंजन ही मिलने की उम्मीद है। यह 452cc का सिंगल सिलेंडर, DOHC, 4-वॉल्व लिक्विड कूल्ड इंजन होगा, जो करीब 40 bhp की पावर और लगभग 40 Nm का टॉर्क जनरेट कर सकता है। इसके साथ 6-स्पीड गियरबॉक्स, स्लिपर क्लच और इलेक्ट्रॉनिक थ्रॉटल जैसे फीचर्स भी दिए जा सकते हैं। यह इंजन पहले से ही स्मूद परफॉर्मेंस और दमदार राइड के लिए जाना जाता है। क्या खरीदने से पहले इंतजार करना चाहिए? अगर आप रॉयल एनफील्ड गुरिल्ला 450 खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो मार्च के अंत तक इंतजार करना समझदारी भरा फैसला हो सकता है। संभावना है कि नया मॉडल बेहतर फीचर्स और अपडेटेड सेटअप के साथ आए, जिससे राइडिंग अनुभव और भी बेहतर हो जाए। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नया मॉडल 450cc सेगमेंट में कंपनी के लिए कितना बड़ा बदलाव साबित होता है।

भारत ने तैयार किया शाहेद ड्रोन से भी खतरनाक और एडवांस हथियार, बढ़ेगा सैन्य शक्ति

 नई दिल्ली ईरान के सस्ते शाहेद-136 ड्रोन और अमेरिका के नए LUCAS ड्रोन ने युद्ध में कम कीमत पर बहुत बड़ा नुकसान पहुंचाया है. इन ड्रोनों से दुश्मन की महंगी एयर डिफेंस को भारी संख्या में हमला करके चकमा दिया जा सकता है. इसी तरह भारत भी अपना जवाब तैयार कर चुका है। बेंगलुरु की कंपनी न्यूस्पेस रिसर्च टेक्नोलॉजीज (NRT) ने शेषनाग-150 नाम का लंबी दूरी का स्वार्म अटैक ड्रोन बनाया है. यह ड्रोन पूरी तरह स्वदेशी है. विकास परीक्षण में तेजी से आगे बढ़ रहा है. यह ड्रोन पहली बार करीब एक साल पहले उड़ा था. अब ऑपरेशन सिंदूर जैसी हाल की घटनाओं के बाद इसकी जरूरत और ज्यादा तेज हो गई है। शेषनाग-150 ड्रोन क्या है और इसकी खासियतें शेषनाग-150 एक लंबी दूरी का लॉयटरिंग मुनिशन है, यानी यह लक्ष्य के ऊपर घूम सकता है. निगरानी कर सकता है. फिर हमला कर सकता है. इसकी रेंज 1000 किलोमीटर से ज्यादा है. यह 5 घंटे से अधिक समय तक हवा में रह सकता है. इसमें 25 से 40 किलोग्राम का वॉरहेड लगाया जा सकता है, जो इमारतों, वाहनों, रडार या सैनिकों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है. यह ड्रोन स्वार्म अटैक कर सकता है, यानी कई ड्रोन साथ मिलकर हमला करते हैं। इससे दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम को ओवरलोड करके तोड़ा जा सकता है. ड्रोन खुद लक्ष्य ढूंढता है, ट्रैक करता है और हमला करता है. यह GPS बंद होने पर भी काम कर सकता है क्योंकि इसमें विजुअल नेविगेशन सिस्टम है, जो कैमरे से रास्ता देखता है। स्वार्म टेक्नोलॉजी और मदर-कोड की ताकत शेषनाग-150 का असली राज उसका स्वदेशी मदर-कोड है. यह एक खास सॉफ्टवेयर है जो कई ड्रोनों को एक साथ कंट्रोल करता है. ड्रोन आपस में बात करते हैं, खुद प्लान बनाते हैं और हमला करते हैं. अगर एक ड्रोन खराब हो जाए तो बाकी काम जारी रखते हैं. यह कोड ड्रोन को बहुत स्मार्ट बनाता है।  दुनिया में ऐसे स्वार्म ड्रोन कम हैं. भारत का यह सिस्टम ईरान के शाहेद से आगे है क्योंकि इसमें ज्यादा एडवांस्ड स्वार्म और GPS-डिनाइड नेविगेशन है. कंपनी ने इसे मॉड्यूलर बनाया है, यानी भविष्य में आसानी से बदलाव किए जा सकते हैं। क्यों अब यह ड्रोन इतना जरूरी हो गया पिछले कुछ सालों में यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व में संघर्ष और हाल ही में भारत-पाकिस्तान के बीच ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाया कि सस्ते ड्रोन कितने खतरनाक हैं. पाकिस्तान ने सैकड़ों सस्ते ड्रोन से भारत की एयर डिफेंस को थका देने की कोशिश की. लेकिन भारत ने कम लेकिन ज्यादा प्रभावी ड्रोन और लॉयटरिंग मुनिशन से पाकिस्तान के रडार और एयर डिफेंस को निशाना बनाया। ऑपरेशन सिंदूर में NRT की कंपनी ने अपनी अन्य ड्रोन क्षमताएं दीं, जिससे शेषनाग-150 पर फोकस बढ़ गया. अब भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना के लिए यह ड्रोन बहुत महत्वपूर्ण है. यह सस्ता, ज्यादा संख्या में बनाया जा सकता है. दुश्मन के महंगे सिस्टम को आसानी से नष्ट कर सकता है। भविष्य में क्या होगा शेषनाग-150 अभी विकास और परीक्षण के दौर में है. हाल में वर्ल्ड डिफेंस शो में इसका मॉडल दिखाया गया. कंपनी इसे सेना को पेश कर रही है. अगर यह सफल हुआ तो भारत की ड्रोन युद्ध क्षमता बहुत मजबूत हो जाएगी।

बड़े तालाब में अतिक्रमण पर कड़ी कार्रवाई, IAS बंगला और 200 अन्य अवैध निर्माण चिन्हित

भोपाल  राजधानी भोपाल की लाइफलाइन कहे जाने वाले बड़े तालाब को अतिक्रमण से मुक्त कराने की कार्रवाई तेज हो गई है. प्रशासन ने सर्वे के बाद बड़ा तालाब के एफटीएल (फुल टैंक लेवल) और 50 मीटर दायरे में बने करीब 200 अवैध निर्माणों को चिन्हित कर लिया है, जिनमें एक आईएएस के बंगले के साथ 150 से अधिक झुग्गियां भी शामिल हैं। अलग से एडिशनल कलेक्टर तैनात करने की मांग बड़े तालाब के सीमांकन के बीच भोपाल सांसद आलोक शर्मा ने साफ कहा है कि "तालाब क्षेत्र में बने किसी भी अवैध निर्माण को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह धार्मिक स्थल ही क्यों न हो. उन्होंने तालाब संरक्षण और अतिक्रमण हटाने के लिए अलग से एडिशनल कलेक्टर तैनात करने की मांग भी की है। 'प्रभावशाली लोगों के खिलाफ भी होगी कार्रवाई' सांसद आलोक शर्मा ने कहा कि "भोपाल का बड़ा तालाब इस शहर की जीवनरेखा है. करीब 1100 वर्ष पहले राजा भोज ने इसका निर्माण कराया था और आज भी शहर की आधी से ज्यादा आबादी इसी तालाब के पानी पर निर्भर है. तालाब के एफटीएल क्षेत्र और आसपास किसी भी तरह का अतिक्रमण स्वीकार नहीं किया जाएगा. यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति ने भी नियमों का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। 'बड़े तालाब को लेकर मुख्यमंत्री से करेंगे चर्चा' सांसद आलोक शर्मा ने बताया कि "इस मुद्दे को लेकर वे जल्द ही मुख्यमंत्री से भी चर्चा करेंगे. साथ ही समय-समय पर समीक्षा बैठक कर तालाब संरक्षण की कार्रवाई को तेज किया जाएगा." उन्होंने कलेक्टर भोपाल से कहा है कि "प्रशासनिक कार्यों के बढ़ते दबाव को देखते हुए तालाब संरक्षण के लिए अलग से एक एडिशनल कलेक्टर की जिम्मेदारी तय की जाए और अतिक्रमण हटाने के लिए अलग दस्ता बनाया जाए। सीमांकन में सामने आए 200 अवैध निर्माण बड़े तालाब की सीमांकन प्रक्रिया इन दिनों लगातार जारी है. संत हिरदाराम नगर तहसील के राजस्व अमले ने गुरुवार को ग्राम लाउखेड़ी, बोरवन और बेहटा में एफटीएल और 50 मीटर दायरे का सीमांकन किया. इस दौरान करीब 150 से अधिक झुग्गियां चिन्हित की गईं, जिन पर अमले ने लाल निशान लगाए. सीमांकन के दौरान कुछ रहवासियों ने विरोध भी किया, लेकिन अधिकारियों ने टीएंडसीपी के नक्शे और एनजीटी व सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कार्रवाई पूरी कराई। कई क्षेत्रों में हुई कार्रवाई जानकारी के अनुसार बड़े तालाब के सीमांकन की प्रक्रिया एक सप्ताह पहले वीआइपी रोड क्षेत्र से शुरू हुई थी. होली के अवकाश के कारण इसे बीच में रोका गया था, जिसे अब दोबारा शुरू किया गया है. गुरुवार को राजस्व, वन विभाग और नगर निगम की संयुक्त टीम ने टीएंडसीपी के नक्शे के अनुसार एफटीएल और 50 मीटर दायरे का सीमांकन किया. अमले ने ग्राम बोरवन में करीब 100 झुग्गियों पर लाल निशान लगाए, जबकि ग्राम बेहटा के ओल्ड डेयरी फार्म क्षेत्र में 60 से 70 झुग्गियां चिन्हित की गईं. इसके अलावा वीआइपी रोड, खानूगांव और हलालपुर क्षेत्र में भी कई निर्माण इस दायरे में पाए गए हैं। वीआईपी रोड से गांवों तक अतिक्रमण राजस्व अमले ने वीआईपी रोड, खानूगांव, हलालपुर, लाउखेड़ी, बोरवन और बेहटा में सीमांकन करते हुए करीब 200 निर्माण चिन्हित किए हैं. इनमें केके हाउस, सुपर बिल्डर, कोचिंग सेंटर, शासकीय बंगला, गुलबाग लॉन, एक आईएएस का बंगला, चादर शेड और बड़ी संख्या में झुग्गियां शामिल हैं। संत हिरदाराम नगर एसडीएम रविशंकर राय ने बताया कि "बड़े तालाब की सीमाएं चिन्हित करने की कार्रवाई लगातार जारी है. जिन निर्माणों पर लाल निशान लगाए गए हैं, उन पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

भारत बना रहा तीनों सेनाओं का नया कमांड, ईरान जंग से कुवैत जैसी गलती न हो, अमेरिका से लिया सबक

नई दिल्ली भारत अब अपनी सेनाओं को और मजबूत बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. लंबे समय से मांग हो रही संयुक्त थिएटर कमांड (Joint Theatre Commands) को लागू करने की तैयारी तेज हो गई है. यह सुधार सेना, नौसेना और वायुसेना को एक साथ मिलाकर एकीकृत कमान बनाने का काम करेगा. यानी तीनों सेनाएं अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही कमांडर के अधीन काम करेंगी. यह बदलाव भारत की सैन्य ताकत को बहुत बढ़ाएगा और दुश्मन के सामने बेहतर तैयारी करेगा। ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध से सबक लेते हुए भारत तैयार हो रहा मध्य पूर्व में चल रहे ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध से भारत ने बहुत कुछ सीखा है. इस युद्ध में हवाई हमलों और ड्रोन-मिसाइलों की संख्या बहुत ज्यादा है. ऐसे में भारत अपनी हवाई रक्षा और कमांड सिस्टम को मजबूत कर रहा है. इसी क्रम में तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल के लिए इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम (IACCS) विकसित किया जा रहा है. यह सिस्टम ग्राउंड रडार, हवाई चेतावनी विमान (AEW&C) और फाइटर जेट्स से आने वाले डेटा को एक जगह इकट्ठा करेगा और पूरी हवाई स्थिति का एक साफ नक्शा दिखाएगा। ग्रुप कैप्टन अनुपम बनर्जी ने क्या कहा पूर्व फाइटर पायलट और वायुसेना के पूर्व प्रवक्ता ग्रुप कैप्टन अनुपम बनर्जी ने इंडिया टुडे को बताया कि रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अब ईरान युद्ध – भारत हर बदलती स्थिति से सीख रहा है. खासकर एयर डिफेंस के मामले में तीनों सेनाओं के लिए एक ही स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि भारत के पास पहले से ही कई सिस्टम मौजूद हैं लेकिन अब उन्हें और एकीकृत किया जा रहा है ताकि कोई गलती न हो। IACCS क्या है और यह कैसे काम करेगा IACCS एक बहुत उन्नत और ऑटोमेटिक कमांड-कंट्रोल नेटवर्क है. यह भारत के लिए एक संयुक्त हवाई रक्षा कवच (एयर डिफेंस शील्ड) बनाएगा. इस सिस्टम से…     खतरे की तुरंत पहचान होगी।     दुश्मन के हवाई हमले को जल्दी नाकाम किया जा सकेगा.     फ्रेंडली फायर (अपनी ही सेना पर गलती से हमला) की घटनाएं रुकेंगी. ईरान युद्ध में अमेरिकी F-15 फाइटर जेट्स की क्रैश जैसी घटनाओं से बचने के लिए ही यह सिस्टम बनाया जा रहा है. IACCS आर्मी के अकाशतीर सिस्टम से भी जुड़ेगा ताकि तीनों सेनाओं में पूरी तरह तालमेल रहे। कौन बना रहा है और कब तैयार होगा? यह सिस्टम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) बना रहा है. BEL भारत की सबसे बड़ी डिफेंस कंपनी है जो रडार और कमांड सिस्टम में माहिर है. IACCS को 2026 तक पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य है. एक बार यह काम कर गया तो भारतीय वायुसेना (IAF) किसी भी हवाई खतरे का बहुत तेज और प्रभावी जवाब दे सकेगी। संयुक्त थिएटर कमांड और IACCS का बड़ा फायदा संयुक्त थिएटर कमांड से भारत की सेनाएं अब क्षेत्रीय आधार पर काम करेंगी. जैसे उत्तरी थिएटर में चीन के खिलाफ, पश्चिमी थिएटर में पाकिस्तान के खिलाफ – एक ही कमांडर तीनों सेनाओं को नियंत्रित करेगा. IACCS इस कमांड को हवाई हिस्से में और मजबूत बनाएगा. इससे…     फैसले तेज होंगे.       संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होगा.       दुश्मन के सामने एकजुट ताकत दिखेगी.     यह सुधार भारत को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार कर रहा है जहां हवाई, जमीन और समुद्री ताकत एक साथ काम करती है। भविष्य में क्या होगा भारत की सेनाएं अब दुनिया के बड़े युद्धों से सीख रही हैं. अपनी कमजोरियों को दूर कर रही हैं. IACCS और संयुक्त थिएटर कमांड जैसे कदम भारत को न सिर्फ मजबूत बनाएंगे बल्कि पड़ोसी देशों को भी संदेश देंगे कि भारत की रक्षा व्यवस्था अब बहुत उन्नत हो गई है. 2026 तक IACCS चालू होने पर भारत की हवाई सुरक्षा दुनिया की सबसे बेहतरीन में शुमार हो जाएगी।