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बिहार की राजनीति में हलचल: प्रशांत किशोर बोले- CM नीतीश कुमार छोड़ सकते हैं कुर्सी, BJP की बढ़ी दावेदारी

पटना जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने शनिवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर बड़ा आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार अपना पद छोड़ रहे हैं क्योंकि केंद्र में सत्ता में मौजूद भाजपा, जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में NDA को “तैयार किया हुआ जनादेश” दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी, अब बिहार में अपना हिस्सा चाहती है। ईद के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम के इतर पत्रकारों से बातचीत में किशोर ने दोहराया कि जनता दल (यूनाइटेड) के प्रमुख नीतीश कुमार राज्य का नेतृत्व करने के लिए “शारीरिक और मानसिक रूप से अयोग्य” हैं। ‘मेरी भविष्यवाणी सही साबित हुई’ प्रशांत किशोर ने कहा, “मैं यह नहीं कह सकता कि नीतीश कुमार अपनी मर्जी से पद छोड़ रहे हैं या किसी दबाव में ऐसा कर रहे हैं। लेकिन एक तरह से मेरी बात सही साबित हुई है। विधानसभा चुनाव से पहले जब मैंने कहा था कि NDA जीत भी जाए, तब भी उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाएगा, तब मेरी आलोचना हुई थी।” 47 वर्षीय किशोर ने आगे कहा, “मेरी यह भविष्यवाणी कि NDA हार सकती है, भले ही गलत साबित हुई हो, लेकिन नीतीश कुमार के बारे में मेरी बात सही निकली। जो व्यक्ति स्पष्ट रूप से शारीरिक और मानसिक रूप से अयोग्य है, वह कैसे कुछ ही महीनों में, जब गठबंधन को भारी बहुमत मिला हो, मुख्यमंत्री पद छोड़ सकता है?” ‘जनादेश तैयार किया गया था’ IPAC के संस्थापक रहे किशोर, जिन्होंने 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान को संभालकर बड़ी सफलता हासिल की थी, ने आरोप लगाया कि पिछले बिहार चुनाव में NDA को जो जनादेश मिला, वह “तैयार किया हुआ” था। उन्होंने कहा, “वोट 10,000 रुपये बांटकर खरीदे गए।” उनका इशारा चुनाव से ठीक पहले शुरू की गई मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की ओर था, जिसके तहत करीब 1.50 करोड़ महिलाओं के खातों में 10,000 रुपये ट्रांसफर किए गए थे। भाजपा और केंद्र की भूमिका पर सवाल हल्के-फुल्के अंदाज में किशोर ने यह भी कहा, “केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा, केंद्रीय गृह मंत्री और चुनाव आयोग ने NDA को बड़ा जनादेश दिलाने में अपनी-अपनी भूमिका निभाई होगी। इसलिए यह स्वाभाविक है कि केंद्र की पार्टी अब बिहार में अपना हिस्सा चाहती है।” राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि हाल ही में राज्यसभा के लिए चुने गए नीतीश कुमार दिल्ली जा सकते हैं और उनके बाद बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बन सकता है। कौन बनेगा मुख्यमंत्री? जवाब टाला हालांकि जब किशोर से पूछा गया कि सत्ता की कुर्सी पर कौन बैठ सकता है, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “मेरी अपनी पार्टी को लेकर की गई भविष्यवाणी ही गलत साबित हुई थी इसलिए इस पर कुछ कहना ठीक नहीं होगा।” ‘बिहार मेरा मिशन, अन्य राज्यों पर नहीं ध्यान’ राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में पहचान बनाने वाले किशोर, जिन्होंने 2021 में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में लगातार तीसरी बार भारी बहुमत दिलाने के बाद कंसल्टेंसी छोड़ दी थी, ने पड़ोसी राज्यों के चुनावों पर कोई भविष्यवाणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “मैंने अपने गृह राज्य बिहार के लिए एक मजबूत विकल्प तैयार करने के उद्देश्य से राजनीति में सक्रिय भूमिका अपनाई है। पिछले चुनाव में मैंने पूरी कोशिश की, और जन सुराज पार्टी की हार को स्वीकार करते हुए अब फिर से जनता के बीच जा रहा हूं। जब तक बिहार में मेरा मिशन पूरा नहीं होता, मैं दूसरे राज्यों के बारे में नहीं सोचूंगा।” निशांत की एंट्री पर क्या बोले? नीतीश कुमार के बेटे निशांत की राजनीति में एंट्री को लेकर पूछे गए सवाल पर किशोर ने कहा कि लोकतंत्र में हर किसी को सार्वजनिक जीवन में आने का अधिकार है। उन्होंने कहा, “हम उन्हें शुभकामनाएं देते हैं, हालांकि यह बिहार में किसी नेता द्वारा अपने परिवार को आगे बढ़ाने का एक और उदाहरण है।”

MP के इस शहर में 100 ई-बसों की शुरुआत, यात्रियों के लिए नई सुविधाएं और 10 रूट तय

ग्वालियर ग्वालियर शहर में सार्वजनिक परिवहन को आधुनिक और प्रदूषण मुक्त बनाने की दिशा में बड़ी तैयारी चल रही है। केंद्र सरकार की पीएम-ई बस सेवा के तहत ग्वालियर को मिलने वाली 100 इलेक्ट्रिक बसें डिपो का काम पूरा होते ही सड़कों पर दौड़ेंगी। इन बसों को इंटेलिजेंट ट्रांजिट मैनेजमेंट सिस्टम (आइटीएमएस) और पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम (पीआईएस) से लैस किया जाएगा, जिससे उनकी हर गतिविधि स्मार्ट सिटी के कंट्रोल एंड कमांड सेंटर से लाइव मॉनिटर की जा सकेगी। निगम के अधिकारियों ने धार के पीथमपुर में तैयार हो रही बसों का निरीक्षण भी कर लिया है। हालांकि जलालपुर आइएसबीटी और रमौआ डिपो पर सिविल और इलेक्ट्रिकल कार्य देरी से शुरू होने के कारण परियोजना में कुछ विलंब हो सकता है। ऐसे में अब ई-बसों के मई-जून 2026 तक शहर में शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है। बसों का संचालन अब नगर निगम की जगह राज्य सरकार की होल्डिंग कंपनी के माध्यम से किया जाएगा, जिसकी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। केंद्र सरकार करेगी सिस्टम का टेंडर बसों में लगाए जाने वाले आइटीएमएस और पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम के लिए टेंडर और कंपनी का चयन केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा। बसों में स्पीकर सिस्टम भी होगा, जिससे किसी भी आपात स्थिति में कंट्रोल रूम से ड्राइवर और कंडक्टर को सीधे निर्देश दिए जा सकेंगे। ऐसे चलेगी ई-बस सेवा पीएम-ई बस सेवा के तहत शहर में कुल 100 बसें चलाई जाएंगी। पहले चरण में 60 बसें और दूसरे चरण में 40 बसें आएंगी। सभी बसें 9 मीटर लंबी मिडी इलेक्ट्रिक बसें होंगी। इनका संचालन जलालपुर आइएसबीटी और रमौआ डिपो से होगा और यहीं बनाए जा रहे चार्जिंग स्टेशन से बसों को चार्ज किया जाएगा। 10 रूट किए गए फाइनल शहर में बस संचालन के लिए 10 रूट तय किए जा चुके हैं। अधिकारियों ने इन रूटों का निरीक्षण कर नागरिकों से सुझाव भी लिए हैं। बसें आते ही इन्हीं रूटों पर संचालन शुरू किया जाएगा। 15.50 करोड़ से बन रहे डिपो और चार्जिंग स्टेशन ई-बस सेवा के संचालन और रखरखाव के लिए रमौआ और आइएसबीटी डिपो पर करीब 15.50 करोड़ रुपए से सिविल और इलेक्ट्रिकल कार्य कराए जा रहे हैं। इसमें रमौआ डिपो पर सिविल व आंतरिक इलेक्ट्रिकल कार्य 4.29 करोड़, चार्जिंग के लिए एचटी कनेक्शन 7.31 करोड़, आइएसबीटी में सिविल व आंतरिक इलेक्ट्रिकल कार्य 1.16 करोड़ और बाहरी इलेक्ट्रिकल कनेक्शन के लिए 2.73 करोड़ रुपए शामिल हैं। 58.14 रुपए प्रति किलोमीटर का भुगतान बस संचालन के लिए एजेंसी को नगर निगम 58.14 रुपए प्रति किलोमीटर का भुगतान करेगा। इसमें केंद्र सरकार 22 रुपए प्रति किलोमीटर देगी, जबकि शेष 36.14 रुपए नगर निगम को वहन करना होगा। निगम को उम्मीद है कि बसों से होने वाले कलेक्शन से इस खर्च की भरपाई हो जाएगी। बसों में मिलेंगी आधुनिक सुविधाएं पीएम-ई बसें पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल होंगी। इनमें सीसीटीवी कैमरे, पैनिक बटन, डिजिटल डिस्प्ले और पैसेंजर सूचना प्रणाली जैसी सुविधाएं होंगी। बस जिस स्थान से गुजरेगी, उस क्षेत्र की जानकारी डिस्प्ले स्क्रीन पर दिखाई देगी। ये बसें एक बार चार्ज होने पर लगभग 180 किलोमीटर तक चल सकेंगी। नोडल अधिकारी मुनीष सिकरवार के अनुसार पीथमपुर में बसों का निरीक्षण किया जा चुका है और बसें तैयार हैं। रमौआ और आइएसबीटी में चार्जिंग स्टेशन का कार्य पूरा होते ही संभावित रूप से मई-जून तक बसें ग्वालियर में आ सकती हैं। पहले चरण में 60 बसें आएंगी।  

दूध वाले की 60,000 करोड़ की ठगी, मिडिल क्लास को पड़ा भारी, क्या मिलेगा पैसा वापस?

रूपनगर एक दूध बेचने वाला व्यक्ति जिसने 60,000 करोड़ के घोटाले को अंजाम देकर पूरे देश की इकोनॉमी को ही हिला कर रख दिया, जब भी देश में बड़े-बड़े घोटालों की बात आती है तो इस व्यक्ति और स्कैम का नाम भी जरूर आता है. करोड़ों रुपये के इस घोटाले ने निवेशकों की नींद उठा दी. हम बात कर रहे हैं पीएसीएल (PACL) यानी पर्ल एग्रोटेक कॉरपोरेशन लिमिटेड स्कैम को दूध बेचने वाले निर्मल सिंह भंगू ने अंजाम दिया था. ये मामला अब एक बार फिर यह मामला सुर्खियों में है, क्योंकि 20 मार्च 2026 को ED ने बड़ी कार्रवाई की. ED ने पंजाब और दिल्ली में PACL से जुड़ी 126 अचल संपत्तियां जब्त कीं, जिनकी कीमत 5,046.91 करोड़ रुपये है. इस एक्शन के साथ इस केस में कुल जब्त संपत्तियों का मूल्य बढ़कर 22,656.91 करोड़ रुपये हो गया है. ED का कहना है कि यह एक ही मामले में अब तक की सबसे बड़ी अटैचमेंट है और ये एजेंसी के इतिहास की सबसे बड़ी कार्रवाई।  इस घोटले की शुरुआत पंजाब के रूपनगर जिले के बेला गांव में रहने वाले निर्मल सिंह भंगू ने की. वह दूध का कारोबार करते था. 1990 के दशक में उन्होंने PACL लिमिटेड शुरू की. कंपनी ने खुद को कृषि भूमि बेचने और विकसित करने वाली फर्म बताया. लोग छोटी-छोटी किस्तों में या कैश में पैसे देते थे, और बदले में कृषि जमीन का प्लॉट मिलने का वादा किया जाता था. कंपनी जिस जमीन में निवेश का दावा करती थी, उसके कोई पुख्ता कागज या सेल डीड निवेशकों को नहीं दिखाए जाते थे. लोगों को सिर्फ एक साधारण रिसीट दी जाती थी, जो असल में ज्यादा भरोसेमंद नहीं होती थी।  10 साल में पैसा 4 गुना करने का वादा कंपनी कहती थी कि वह देश के किसी भी हिस्से में जमीन खरीदेगी, लेकिन निवेशकों को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि उन्हें फिक्स रिटर्न का लालच दिया जाता था. कंपनी का दावा था कि 5 साल बाद निवेशक चाहें तो पैसा ले सकते हैं या जमीन हासिल कर सकते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग सिर्फ रिटर्न पर ही ध्यान देते थे. इतना ही नहीं, 10 साल में पैसा 4 गुना करने का वादा भी किया जाता था, जिसने लोगों को तेजी से आकर्षित किया। पोंजी स्कीम से निवेशकों को लुभाया यह एक पोंजी स्कीम थी और इसे उसी तरीके से चलाया गया. शुरुआत में कंपनी ने कुछ निवेशकों को अच्छा रिटर्न दिया, जिससे लोगों का भरोसा बढ़ा और वे दूसरों को भी जोड़ने लगे. दरअसल, नए निवेशकों के पैसे से पुराने निवेशकों को भुगतान किया जा रहा था. ज्यादा रिटर्न देखकर और लोग इसमें पैसा लगाने लगे. स्कीम को फैलाने के लिए कंपनी ने पिरामिड मॉडल अपनाया, जिसमें हर व्यक्ति को अपने नीचे नए लोगों को जोड़ना होता था. एजेंट्स को मोटा कमीशन दिया जाता था, जिससे वे अपने जान-पहचान के लोगों को इसमें शामिल करते गए. लोगों को आकर्षित करने के लिए कंपनी बड़े-बड़े सेमिनार भी आयोजित करती थी, जहां निवेश के फायदे गिनाए जाते थे।  कंपनी दावा करती थी कि वह 1983 से काम कर रही है, जबकि हकीकत में इसकी शुरुआत 1996 में हुई थी. 1983 में पर्ल्स ग्रुप की एक दूसरी कंपनी PGF शुरू हुई थी, जिसका सहारा लेकर लोगों का भरोसा जीता गया. निवेशकों को यह भी कहा जाता था कि अगर कंपनी बंद हो जाए तो वे अपनी रसीद लेकर कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री (MCA) में जा सकते हैं, क्योंकि कंपनी वहां रजिस्टर्ड है. लेकिन सच्चाई यह थी कि वह रसीद किसी कानूनी सुरक्षा की गारंटी नहीं देती थी और निवेशकों के लिए बेकार साबित हुई।  एग्रीकल्चरल इनकम का लालच कंपनी ने देश भर में 70 लाख एजेंट्स की मदद ली. ये एजेंट ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में घूम-घूमकर लोगों को लुभाते थे. टैक्स-फ्री “एग्रीकल्चरल इनकम” का लालच दिया जाता था. कुल मिलाकर कंपनी ने 60,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाए, जिसमें से करीब 48,000 करोड़ रुपये निवेशकों को आज तक नहीं लौटाए गए. इस घोटले से प्रभावित लोग 5.5 करोड़ से ज्यादा हैं और इसमें ज्यादातर गांव और मिडिल क्लास के परिवार वाले हैं, जिन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी इसमें लगा दी।  सुप्रीम कोर्ट ने लिया अहम फैसला 1998-99 के दौरान ऐसी कई स्कीमों की शिकायतें मिलने के बाद सेबी ने “कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम (CIS) रेगुलेशन” लागू किया. इसके तहत कंपनियों को निवेशकों से जुटाए गए पैसे का सही इस्तेमाल करना होता है और उससे मिलने वाला रिटर्न ट्रांसपरेंट तरीके से देना होता है. जांच में सेबी ने पाया कि PACL और PGF इन नियमों का पालन नहीं कर रही थीं, जिसके बाद सेबी ने दोनों कंपनियों को बंद करने और निवेशकों का पैसा लौटाने का निर्देश दिया।  मामला आगे बढ़ने पर सेबी सुप्रीम कोर्ट पहुंची और 25 फरवरी 2013 को कोर्ट ने साफ कहा कि यह कलेक्टिव इन्वेस्टमेंट स्कीम (CIS) है, इसलिए सेबी को जांच और कार्रवाई का अधिकार है. इस दौरान PACL के प्रमोटर्स निवेशकों के पैसों से अपनी संपत्तियां बढ़ाते रहे. कंपनी ने P7 नाम का एक न्यूज चैनल भी शुरू किया, जिससे लोगों का भरोसा बनाए रखा गया. इतना ही नहीं, कंपनी आईपीएल टीम किंग्स इलेवन पंजाब की स्पॉन्सर भी रह चुकी थी और क्रिकेटर ब्रेट ली को ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था. लंबे समय तक मामला कोर्ट में चलता रहा, इसी बीच कंपनी ने तेजी से पैसे जुटाए और करीब 5.5 करोड़ लोग इस घोटाले का शिकार हो गए, जिनमें पंजाब, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के लोग बड़ी संख्या में शामिल थे।  निर्मल सिंह भंगू की गिरफ्तारी 22 अगस्त 2014 को सेबी ने जांच के बाद कंपनी को निवेशकों का पैसा लौटाने का आदेश दिया, लेकिन PACL ने इसका पालन नहीं किया. इसके बाद मामला ED के पास गया, जिसने कंपनी के प्रमुख निर्मल सिंह भंगू से पूछताछ शुरू की और उनकी संपत्तियां अटैच करनी शुरू कर दीं. जांच में ऑस्ट्रेलिया में करीब 500 करोड़ रुपये की संपत्ति समेत कई अन्य असेट्स का पता चला, जिसके बाद रिफंड की प्रक्रिया शुरू की गई. 2016 में CBI ने निर्मल सिंह भंगू को गिरफ्तार किया. जांच के दौरान करीब 1300 संदिग्ध बैंक खाते मिले और लगभग 280 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त की गईं. साथ … Read more

पंजाब किंग्स की कप्तानी का मुश्किल ‘कांटों भरा ताज’, 17 धुरंधर हुए असफल

चंडीगढ़  इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के पहले सीजन से अब तक टूर्नामेंट खेलते हुई आ रहीं दो टीमें ऐसी हैं, जो चैंपियन नहीं बन पाई हैं। इनमें एक टीम तो ऐसी है, जिसने 17 कप्तान बदल दिए हैं, लेकिन खिताबी सूखा समाप्त नहीं हुआ है। दो बार टीम फाइनल तक जरूर पहुंची है, लेकिन फिर भी खिताब से दूर रह गई है। 2014 के बाद 2025 में टीम आईपीएल के फाइनल में पहुंची, लेकिन फिर भी खिताब दूर है। दूसरी टीम दिल्ली कैपिटल्स है, जो 2008 से खेल रही है, लेकिन खिताब नहीं जीता है। दोनों का नाम भी बदल गया है। पहले नाम पंजाब किंग्स का किंग्स इलेवन पंजाब था, जबकि दिल्ली कैपिटल्स का दिल्ली डेयरडेविल्स। हालांकि, दिल्ली ने कम कप्तान बदले हैं। पंजाब किंग्स की बात करें तो इस फ्रेंचाइजी ने अब तक 18 सीजन में 9 भारतीय और 8 विदेशी खिलाड़ियों समेत कुल 17 खिलाड़ियों को कप्तानी सौंप दी है, लेकिन टीम ट्रॉफी नहीं जीत पाई है। हालांकि, 3 खिलाड़ियों को तो सिर्फ नाम मात्र के लिए कप्तानी मिली है, क्योंकि उन्होंने एक-एक मैच में ही कप्तानी की है। इसके अलावा दो कप्तान ऐसे हैं, जिन्होंने 6 और 8 मैचों में कप्तानी है, लेकिन बाकी के कप्तानों ने 10 से ज्यादा मैचों में पंजाब की टीम की कप्तानी की हुई है। महेला जयवर्धने, वीरेंद्र सहवाग और जितेश शर्मा ने एक-एक मैच में कप्तानी की है, जबकि डेविड मिलर ने 6 और मुरली विजय ने 8 मैचों में टीम का नेतृत्व किया है। पंजाब किंग्स के अब तक के 17 कप्तानों में सरपंच श्रेयस अय्यर एकमात्र कप्तान हैं, जिनका विनिंग पर्सेंटेज 60 से ज्यादा का है। युवराज सिंह इस फ्रेंचाइजी के पहले कप्तान थे, लेकिन 2008 से 2009 तक कप्तानी उन्होंने की, लेकिन टीम खिताब से कोसों दूर रही। पंजाब किंग्स के कप्तानों की लिस्ट 1. युवराज सिंह (29 मैच 17 जीत) 2. कुमार संगकारा (13 मैच 3 जीत) 3. महेला जयवर्धने (1 मैच) 4. कुमार संगकारा (34 मैच 17 जीत) 5. डेविड हसी (12 मैच 6 जीत) 6. जॉर्ज बेली (35 मैच 18 जीत) 7. वीरेंद्र सहवाग (1 मैच) 8. डेविड मिलर (6 मैच 1 जीत) 9. मुरली विजय (8 मैच 3 जीत) 10. ग्लेन मैक्सवेल (14 मैच 7 जीत) 11. आर अश्विन (28 मैच 12 जीत) 12. केएल राहुल (27 मैच 11 जीत) 13. मयंक अग्रवाल (14 मैच 7 जीत) 14. शिखर धवन (17 मैच 6 जीत) 15. सैम करन (11 मैच 5 जीत) 16. जितेश शर्मा (1 मैच) 17. श्रेयस अय्यर (17 मैच 10 जीत)

गर्मी की छुट्टियों में स्पेशल ट्रेनें और बढ़ेगा AC कोच, अब आसानी से मिलेगा सीट

सागर  रेलवे ने गर्मी के मौसम में यात्रियों की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाने का फैसला किया है। इस पहल से यात्रियों को काफी राहत मिलेगी, जिससे उन्हें अपने गंतव्य तक पहुंचने में कोई परेशानी नहीं होगी। एसएमटी-गोरखपुर-सीएसएमटी प्रतिदिन स्पेशल ट्रेन 01079 सीएमएमटी से गोरखपुर स्पेशल ट्रेन 1 से 14 अप्रेल तक (14 ट्रिप) एवं समर के समय 15 से 30 अप्रैल तक (16 ट्रिप) प्रतिदिन सीएमएमटी स्टेशन से रात 10.30 बजे चलेगी जो. अगले दिन शाम 6.15 बजे बीना जंक्शन पहुंचकर तीसरे दिन सुबह 10 बजे गोरखपुर स्टेशन पहुंचेगी। इसी प्रकार 01080 गोरखपुर से सीएमएमटी स्पेशल 3 से 16 अप्रेल तक (14 ट्रिप) एवं समर के अवसर पर 17 अप्रेल से 2 मई तक (16 ट्रिप) प्रतिदिन गोरखपुर स्टेशन से दोपहर 2.30 बजे चलेगी, जो अगले दिन सुबह 6.10 बजे बीना रुकते हुए तीसरे दिन रात 12.40 बजे सीएमएमटी स्टेशन पहुंचेगी। इस ट्रेन में कुल 22 कोच रहेंगे। ट्रेन दोनों तरफ से दादर, ठाणे, कल्याण, नासिक रोड, मनमाड, जलगांव, भुसावल, खंडवा, इटारसी, भौपाल, बीना, वीरांगना लक्ष्मीबाई झांसी, उरई, कानपुर, सेंट्रल, लखनऊ, गोंडा, बस्ती एवं खलीलाबाद स्टेशनों पर रुकेगी। एलटीटी-बनारस-एलटीटी द्वि-साप्ताहिक स्पेशल ट्रेन 01073 एलटीटी से बनारस स्पेशल ट्रेन 1 से 9 अप्रैल तक (4 ट्रिप) एवं समर सीजन में 15 से 30 अप्रैल तक (6 ट्रिप) द्वि- साप्ताहिक (बुधवार एवं गुरुवार) लोकमान्य तिलक टर्मिनस स्टेशन से दोपहर 12.15 बजे चलेगी, जो अगले दिन सुबह 7.55 बजे बीना पहुंचकर रात 11.30 बजे बनारस स्टेशन पहुंचेगी। इसी प्रकार 01074 बनारस से एलटीटी स्पेशल ट्रेन 3 से 11 अप्रैल तक (4 ट्रिप) एवं समर सीजन में 17 अप्रैल से 2 मई तक (6 ट्रिप) द्वि-साप्ताहिक (शुक्रवार एवं शनिवार) बनारस स्टेशन से सुबह 5.30 बजे चलेगी, जो रात 10.25 बजे बीना पहुंचकर अगले दिन शाम 4.40 बजे लोकमान्य तिलक टर्मिनस स्टेशन पहुंचेगी। इस ट्रेन में कुल 22 कोच रहेंगे। ट्रेन दोनों तरफ से ठाणे, कल्याण, इगतपुरी, नासिक रोड, जलगांव, भुसावल, खंडवा, इटारसी. रानी कमलापति बीना, वीरांगना लक्ष्मीबाई झांसी, उरई गोविंदपुरी, फतेहपुर एवं सूबेदारगंज (प्रयागराज) स्टेशनों पर रुकेगी। अहमदाबाद-कोलकाता में बढ़ाया गया एसी कोच रेलवे ने समर सीजन में यात्रियों की जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए बीना जंक्शन से होकर जाने वाली अहमदाबाद-कोलकाता-अहमदाबाद एक्सप्रेस एक थर्ड एसी कोच मई माह से अगले आदेश तक बढ़ाने का निर्णय लिया है। 19413/14 अहमदाबाद-कोलकाता-अहमदाबाद एक्सप्रेस में 27 मई को अहमदाबाद से एवं 30 मई को कोलकाता से इस ट्रेन में अब 6 थर्ड एसी कोच होंगें। 

अखाड़ा परिषद का बड़ा फैसला, अर्धकुंभ 2027 और महाकुंभ 2028 में बिना पहचान पत्र के नहीं होंगे साधु संतों का प्रवेश

हरिद्वार साल 2027 में हरिद्वार में अर्ध कुंभ और 2028 में उज्जैन में महाकुंभ का आयोजन होने वाला है। यह दोनों ही आयोजन सुव्यवस्थित तथा पारदर्शी तरीके से हो सकें इसके लिए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद की ओर से एक बड़ा निर्णय लिया गया है। दरअसल भारतीय खड़ा परिषद एवं श्रीमनसा देवी ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री महेंद्र रवींद्र पुरी नहीं निर्णय लिया है कि हरिद्वार अर्धकुंभ और सिंहस्थ महाकुंभ में किसी भी साधु संत को बिना आधिकारिक पहचान के प्रवेश नहीं दिया जाएगा। सभी को अपना आधार कार्ड अनिवार्य रूप से अपने साथ रखना होगा। अखाड़ा परिषद का बड़ा निर्णय श्री महंत रवींद्र पुरी ने बताया कि यह निर्णय अखाड़ा परिषद की ओर से इसलिए लिया गया है ताकि फर्जी साधुओं पर अंकुश लगाया जा सके। जो भी भगवाधारी बिना पहचान पत्र के मिलेंगे उनकी विशेष जांच की जाएगी और अगर आवश्यकता पड़ी तो उन्हें मेले में प्रवेश से रोका भी जाएगा। अखाड़ा अध्यक्ष के मुताबिक यह दोनों ही मिले सनातन धर्म की आस्था, परंपरा और संस्कृति का प्रतीक है। फर्जी साधुओं की मौजूदगी से श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हो सकती है। उन्होंने सभी अखाड़ों से इस अभियान में सहयोग करने की अपील की है। श्रद्धालुओं से भी अपील की गई है कि वह सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति के झांसे में ना आएं।

वेट लॉस इंजेक्शन पर 70% की छूट, जानें क्यों गिर रहे हैं दाम

नई दिल्ली भारत में वेगोवी, मौनजारो और ओजेम्पिक जैसी दवाएं वेट लॉस के लिए इस्तेमाल की जा रही थीं. डायबिटीज मैनेज करने वाली इन दवाओं की मासिक कीमत आम आदमी की पहुंच से काफी दूर होती थी लेकिन अब 21 मार्च से ये दवाएं सस्ती हो रही हैं. दरअसल, दुनिया की मशहूर वेट लॉस ड्रग 'सेमाग्लूटाइड' (Semaglutide) का पेटेंट 20 मार्च को खत्म हो रहा है. इसका सीधा मतलब यह है कि अब तक जिस दवा पर चुनिंदा विदेशी कंपनियों का कब्जा था, पेटेंट खत्म होने के बाद अब अब भारत की दिग्गज फार्मा कंपनियां उनके जेनेरिक वर्जन बाजार में उतार सकेंगी. शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक कीमतें करीब 70 फीसदी तक गिर सकती हैं।   5 हजार से कम होंगी कीमतें भारत में अभी इन वेट लॉस इंजेक्शंस का मासिक खर्च 9,000 रुपये से लेकर 28,000 रुपये तक होता है. लेकिन 21 मार्च से शुरू हो रहे 'पेटेंट क्लिफ' (पेटेंट खत्म होना) के बाद ये कीमतें 30 या 50 नहीं, बल्कि सीधे 70 फीसदी तक कम हो सकती हैं।  एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले कुछ समय में यह खर्च घटकर महज 3,000 से 4,000 रुपये प्रति महीना रह जाएगा. जेनेरिक दवाएं इसलिए सस्ती होती हैं क्योंकि कंपनियों को रिसर्च पर अरबों डॉलर खर्च नहीं करने पड़ते, वे सीधे उसी फार्मूले पर दवा तैयार करती हैं जिसकी प्रभावशीलता पहले ही साबित हो चुकी है।  54 से ज्यादा कंपनियां बाजार में उतारेंगी दवा सेमाग्लूटाइड वही साल्ट है जो दुनिया भर में 'ओजेंपिक' और 'वेगोवी' जैसे ब्रांड्स के नाम से मशहूर है. अब तक इसके पेटेंट की वजह से मोनोपॉली बनी हुई थी लेकिन अब भारत की करीब 54 कंपनियां अपनी जेनेरिक वर्जन लाने के लिए तैयार हैं।  रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत की बड़ी दवा कंपनियां जैसे Sun Pharma, Dr Reddy’s, Lupin, Ajanta, Zydus Lifesciences, Natco आदि जेनेरिक सेमाग्लूटाइड इंजेक्शन के लिए रेगुलेटरी तैयारियां काफी आगे बढ़ा चुकी हैं।  इंडस्ट्री अनुमान कहता है कि इतने अधिक ब्रांड मार्केट में आने से न केवल कीमतों पर दबाव बढ़ेगा, बल्कि डोज, पेन डिवाइस और सर्विस मॉडल के स्तर पर भी कंपनियों के बीच कॉम्पिटिशन दिख सकता है।  शॉर्टकट ना समझें  इंडियन एंडोक्राइनोलॉजिस्ट और ओबेसिटी एक्सपर्ट ये इंजेक्शन लॉन्च होने के बाद से ही चेतावनी दे रहे हैं कि GLP-1 ड्रग्स को सोशल मीडिया ट्रेंड या जल्दी वजन घटाने का शॉर्टकट मानना खतरनाक हो सकता है. दिल्ली और मुंबई के ओबेसिटी एक्सपर्ट और डॉक्टर्स ने इंटरव्यू में साफ कहा है कि ये इंजेक्शन सिर्फ उन मरीजों के लिए हैं जो क्लिनिकली मोटापे से ग्रस्त हैं यानी BMI, कॉमॉर्बिडिटीज और मेडिकल हिस्ट्री के हिसाब से डॉक्यूमेंटेड मोटापे से जूझ रहे हैं न कि उन लोगों के लिए जिनका उद्देश्य सिर्फ कुछ किलो वजन घटाना है।  भले ही ये इंजेक्शन सस्ते और आसानी से उपलब्ध होने जा रहे हैं लेकिन डॉक्टर्स ने कड़ी चेतावनी भी दी है. यह कोई शॉर्टकट नहीं है जिसे कोई भी अपनी मर्जी से लगा ले. सेमाग्लूटाइड एक पावरफुल मेटाबॉलिक दवा है जो शरीर के हार्मोन्स, ब्लड शुगर और पाचन तंत्र पर सीधा असर डालती है. इसे केवल क्रॉनिक ओबेसिटी (अत्यधिक मोटापा) या गंभीर डायबिटीज के मरीजों को ही इस्तेमाल करना चाहिए।  डॉक्टर्स ने दी ये चेतावनी डायबिटीज के क्षेत्र में जाने-माने नाम डॉ. वी. मोहन ने 'पेटेंट क्लिफ' के बारे में इंटरव्यू के दौरान कहा, 'अब तक इसकी कीमत एक बड़ी बाधा थी, लेकिन मार्च 2026 के बाद जब 40 से ज्यादा कंपनियां बाजार में उतरेंगी, तो यह आम आदमी की पहुंच में होगा. लेकिन इनसे 'स्टोमक पैरालिसिस' जैसे दुर्लभ साइड-इफेक्ट्स भी हो सकते हैं जिससे सावधान रहने की जरूरत है।  पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. अंबरीश मिथल ने आजतक हेल्थ समिट में कहा था, 'सेमाग्लूटाइड' जैसे GLP-1 ड्रग्स केवल शुगर कंट्रोल नहीं करते, बल्कि शरीर का 15 से 18% वजन कम करने में मदद कर सकते हैं लेकिन यह कोई 'मैजिक पिल' नहीं है. इसे बिना डॉक्टर की सलाह के लेना खतरनाक हो सकता है. साथ ही, इसके साथ प्रोटीन डाइट और एक्सरसाइज भी जरूरी है।  एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और महाराष्ट्र टास्क फोर्स के मेंबर डॉ. शशांक जोशी ने इन दवाओं के बारे में कहा था, 'ये दवाएं केवल वजन नहीं घटातीं बल्कि लिवर और पैंक्रियाज में जमा चर्बी को भी कम करती हैं, जिससे डायबिटीज को 'रिमिसन' (खत्म होने की स्थिति) में ले जाना संभव हो सकता है लेकिन बिना एक्सपर्ट की सलाह के बिना इनका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।  बिना डॉक्टरी सलाह के न लें दवा हेल्थ एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इन दवाओं को शुरू करने से पहले शरीर के कई टेस्ट जरूरी हैं. इसे केवल एंडोक्रिनोलॉजिस्ट या इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट की देखरेख में ही लिया जाना चाहिए. साथ ही, यह ध्यान रखना जरूरी है कि केवल सेमाग्लूटाइड का पेटेंट खत्म हुआ है. अन्य एडवांस ड्रग्स जैसे 'टिर्जेपेटाइड' (मौनजारो) के दाम फिलहाल कम नहीं होंगे क्योंकि उनका पेटेंट अभी प्रभावी है। 

मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल में खाली पड़े 60% पद, 187 में से सिर्फ 73 कर्मचारी ही कार्यरत

भोपाल  मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (ESB), जो विभिन्न शासकीय विभागों के लिए भर्ती प्रक्रिया संचालित करता है, खुद अपने ही विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है। हालात यह हैं कि मंडल में स्वीकृत 187 पदों के मुकाबले सिर्फ 73 कर्मचारी ही कार्यरत हैं, जबकि 114 पद अब भी खाली पड़े हैं। यानी करीब 60% पद रिक्त हैं। मंडल का मुख्य कार्य अलग-अलग सरकारी विभागों के लिए भर्ती करना है, लेकिन अपने ही यहां कर्मचारियों की कमी के कारण यह काम प्रभावित हो रहा है। कई अहम पद जैसे अतिरिक्त संचालक, नियंत्रक, संयुक्त संचालक, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, प्रोग्रामर, सहायक संचालक, लेखा अधिकारी और अधीक्षक के पद खाली हैं।  डिप्टी कंट्रोलर के 5 पदों में से 4 खाली हैं, जबकि जूनियर अकाउंट्स ऑफिसर के 2 पदों में से 1 पद रिक्त है। सहायक ग्रेड-1 के 13 में से 10 पद, सहायक ग्रेड-2 के 28 में से 15 पद और सहायक ग्रेड-3 के 41 में से 23 पद खाली हैं। डाटा एंट्री ऑपरेटर के 5 में से 2 पद भी रिक्त हैं। इसके अलावा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के अधिकांश पद भी खाली पड़े हैं।   अतिरिक्त प्रभार से चल रहा काम कई महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार देकर काम चलाया जा रहा है। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के अतिरिक्त मुख्य सचिव संजय शुक्ला मंडल के अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे हैं, जबकि अजॉय कटेसरिया निदेशक का अतिरिक्त जिम्मा देख रहे हैं। भर्ती परीक्षाओं पर भी असर स्टाफ की कमी का असर मंडल की कार्यप्रणाली पर भी पड़ रहा है। पिछले साल मंडल ने 16 परीक्षाएं आयोजित की थीं, जबकि इस साल 22 परीक्षाएं कराने की योजना है। कर्मचारियों की कमी के कारण कई काम आउटसोर्स कर्मचारियों से कराए जा रहे हैं और निगरानी भी प्रभावित हो रही है। मंडल में पद खाली रहने की एक बड़ी वजह भर्ती परीक्षाओं में सामने आई अनियमितताएं भी मानी जा रही हैं, जिसके चलते व्यवस्था प्रभावित हुई है। 

कानपुर मेट्रो के कॉरिडोर-1 के शेष हिस्से में जल्द शुरू होंगी यात्री सेवाएं, कॉरिडोर-2 का भी तेज गति से हो रहा निर्माण

कानपुर मेट्रो के कॉरिडोर-1 और 2 का विस्तारीकरण प्रगति पर, मार्च 2027 तक होगा पूरा कानपुर मेट्रो के कॉरिडोर-1 के शेष हिस्से में जल्द शुरू होंगी यात्री सेवाएं, कॉरिडोर-2 का भी तेज गति से हो रहा निर्माण कानपुर मेट्रो के विस्तार से शहर को मिलेगी आधुनिक यातायात व्यवस्था और औद्योगिक विकास को रफ्तार लखनऊ  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सतत विकास के विजन के अनुरूप प्रदेश के प्रमुख शहरों में तेज, भविष्योन्मुखी और प्रदूषण रहित मेट्रो परियोजनाओं का विकास किया जा रहा है। इस क्रम में औद्योगिक नगरी कानपुर में मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम के तहत विकसित हो रही मेट्रो परियोजना तेजी से अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है। जिसके तहत कानपुर मेट्रो परियोजना के कॉरिडोर-1 में आईआईटी कानपुर से कानपुर सेंट्रल तक मेट्रो सेवा का सुगम परिचालन हो रहा है, शेष भाग का कार्य इस वर्ष तक पूरा हो जाएगा। जिसमें बारादेवी से नौबस्ता तक पांच एलिवेटेड स्टेशनों में टेस्टिंग और ट्रायल रन चल रहा है। वहीं कॉरिडोर-2 के तहत सीएसए यूनिवर्सिटी से बर्रा मेट्रो स्टेशन तक निर्माण कार्य भी तेज गति से चल रहा है, जिसके मार्च 2027 तक पूरा होने की संभावना है। कॉरिडोर-1 के 5 एलिवेटेड स्टेशनों में चल रहा है ट्रायल रन कानपुर मेट्रो का कॉरिडोर-1, जो आईआईटी से नौबस्ता तक लगभग 23 किलोमीटर लंबा है, इसमें से 15.4 किलोमीटर का सेक्शन परिचालन में है। शेष हिस्से में अंडरग्राउंड व एलिवेटेड दोनों सेक्शन का निर्माण कार्य तेज गति से चल रहा है। इसके तहत झकरकट्टी से ट्रांसपोर्ट नगर तक दो अंडरग्राउंड स्टेशनों का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है, इनमें फिनिशिंग का कार्य भी समाप्ति की ओर है। टीबीएम सुरंग की अप लाइन में ट्रैक बिछाया जा चुका है, जबकि डाउन लाइन में कार्य अंतिम चरण में है। वहीं, बारादेवी से नौबस्ता तक पांच एलिवेटेड स्टेशनों का भी संरचनात्मक कार्य पूरा हो चुका है, फिनिशिंग का कार्य तेज गति से चल रहा है। इस सेक्शन में जनवरी 2026 से ट्रेन टेस्टिंग और ट्रायल रन किया जा रहा है, जिससे जल्द ही इस हिस्से में यात्री सेवाएं शुरू होने की उम्मीद है। सीएसए यूनिवर्सिटी से बर्रा तक कॉरिडोर-2 में हो रहा तेज गति से विकास कानपुर मेट्रो परियोजना के तहत सीएसए यूनिवर्सिटी से बर्रा तक लगभग 8.6 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर-2 का निर्माण कार्य भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। इस कॉरिडोर के तहत रावतपुर से डबल पुलिया तक तीन भूमिगत स्टेशनों का निर्माण कार्य जारी है, टीबीएम सुरंग का कार्य लगभग पूरा हो चुका है। इसके अलावा सीएसए यूनिवर्सिटी/विजय नगर से बर्रा तक पांच एलिवेटेड स्टेशनों का निर्माण कार्य भी प्रगति पर है। ये सभी निर्माण कार्य मार्च 2027 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। कानपुर मेट्रो परियोजना के पूरा होने से शहर की यातायात व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। इससे न केवल ट्रैफिक जाम और प्रदूषण की समस्या में कमी आएगी, बल्कि शहर के आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी। कानपुर मेट्रो परियोजना, शहर को आधुनिक, सुगम और पर्यावरण अनुकूल परिवहन प्रणाली प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।

एमपी हाईकोर्ट का अहम फैसला, पति की संपत्ति और नौकरी पर दावे को लेकर दिया आदेश

जबलपुर  भारतीयों में आजकल बिना विधिवत तलाक लिए दूसरी शादी करने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कई समाजों में बहुविवाह की भी प्रथा है जिसका सहारा लेकर इसे मान्यता देने की कोशिश की जाती है। इस पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। पति की संपत्ति और नौकरी के दावे पर एमपी हाईकोर्ट MP High Court ने बड़ा फैसला देते हुए दूसरी पत्नी की याचिका खारिज कर दी। महिला ने आदिवासी समाज की प्रथाओं का जिक्र किया था जिसपर कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बिना ठोस साक्ष्य के बहुविवाह की परंपरा मान्य नहीं की जा सकती है। इसी के साथ दूसरी पत्नी का दावा भी खारिज कर दिया। आदिवासी समाज में बहुविवाह की प्रथा है। इसका हवाला देकर शहडोल की पाव जनजाति की महिला मुन्नी बाई ने खुद को भगत सिंह की दूसरी पत्नी बताते हुए पति की मौत के बाद मिले नौकरी से जुड़े लाभ और उनकी संपत्ति देने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इधर पहली पत्नी फूलमती ने खुद को अकेली वैध पत्नी बताते हुए कहा कि सरकारी सेवा अभिलेख में भी पत्नी के तौर पर उनका ही नाम दर्ज है। जबलपुर हाईकोर्ट ने केस की सुनवाई करते हुए कहा है कि बिना प्रमाण के किसी समाज में बहुविवाह की परंपरा को मान्यता नहीं दी जा सकती। सिर्फ आदिवासी परंपरा का हवाला देकर किसी महिला को पति की संपदा या नौकरी में अधिकार नहीं मिल सकता। इसके साथ शहडोल की महिला की याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे दावे के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। दरअसल, मुन्नी बाई ने याचिका दायर कर कहा था, वह भगत सिंह की दूसरी पत्नी है। वे पाव जनजाति से हैं। इसमें बहुविवाह की परंपरा है। उन पर हिन्दू विवाह अधिनियम लागू नहीं होता। उसने पति की मृत्यु के बाद संपत्ति में हिस्सा और नौकरी से जुड़े लाभ देने की मांग की थी। पहली पत्नी फूलमती ने इसका विरोध किया। दस्तावेज में पहली पत्नी का नाम पहली पत्नी फूलमती की ओर से तर्क दिया गया, वह अकेली वैध पत्नी है। सरकारी सेवा अभिलेख में भी पत्नी के तौर पर उनका नाम दर्ज है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि याचिकाकर्ता ने कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया है। कोई मान्य दस्तावेज, परंपरा का प्रमाण भी नहीं पेश किए। इसके बाद फैसला सुनाया।