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FASTag और AI की मदद से अब टोल पर बिना रुकें कटेगा शुल्क, जानें सरकार की योजना

 नई दिल्ली देश के हाईवे पर अब वो दिन खत्म होने वाले हैं जब टोल प्लाजा पर लंबी लाइन में खड़े होकर आपका मूड और माइलेज दोनों खराब होता था. अब गाड़ी दौड़ेगी और टोल अपने आप कट जाएगा. यानी ना रुकना, ना बहस, ना चिल्ल-पों. सरकार एक ऐसा सिस्टम ला रही है जिसमें कैमरा नंबर पढ़ेगा और पैसा सीधे आपके खाते से कटेगा. यदि सबकुछ योजना के मुताबिक रहा तो दिसंबर तक ये बदलाव जमीन पर दिखने लगेगा और आपके सफर का एक्सपीरियंस पूरी तरह बदल जाएगा. आइये विस्तार से जानें क्या है पूरा मामला-  देशभर के राष्ट्रीय राजमार्गों पर जल्द ही टोल प्लाजा पर रुकने की झंझट खत्म होने वाली है. केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने घोषणा की है कि दिसंबर 2026 तक कई हाईवे पर सीमलेस और बैरियर-फ्री (Barrier-Free) टोल सिस्टम लागू कर दिया जाएगा. इससे सफर तेज, आसान और बिना किसी झंझट के आगे बढ़ेगा।  लॉजिस्टिक्स पॉवर समिट एंड अवॉर्ड्स 2026 में बोलते हुए गडकरी ने कहा कि, देश में लॉजिस्टिक्स लागत कम करने के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है. उन्होंने बताया कि सरकार दिसंबर तक कई नेशनल हाईवे पर बिना बैरियर वाला टोल सिस्टम लागू करने की योजना पर काम कर रही है. इससे टोल प्लाजा पर लगने वाला समय बचेगा और ट्रैफिक भी कम होगा।  AI और FASTag से होगा ऑटोमैटिक टोल कट इस नए सिस्टम में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. इसमें ऑटोमेटिक नंबर प्लेट रिकॉग्ननिशन (ANPR) और RFID बेस्ड FASTag शामिल होंगे. हाई-परफॉर्मेंस कैमरे गाड़ियों की नंबर प्लेट पहचानेंगे और FASTag के जरिए टोल अपने आप कट जाएगा. ड्राइवर को कहीं रुकने की जरूरत नहीं होगी।  अगर कोई वाहन नियमों का पालन नहीं करता है तो उसे ई-नोटिस भेजा जाएगा. समय पर भुगतान नहीं करने पर FASTag को सस्पेंड किया जा सकता है और VAHAN से जुड़े अन्य जुर्माने भी लग सकते हैं. गडकरी ने कहा कि अगर भारत को ग्लोबल पावर बनना है तो लॉजिस्टिक्स लागत को सिंगल डिजिट तक लाना होगा।  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मद्रास और कानपुर, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट बेंगलुरु की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक्सप्रेसवे और इकोनॉमिक कॉरिडोर बनने से भारत की लॉजिस्टिक्स लागत 16 प्रतिशत से घटकर 10 प्रतिशत तक आ गई है. उन्होंने बताया कि अमेरिका और यूरोप में यह करीब 12 प्रतिशत है, जबकि चीन में 8 से 10 प्रतिशत के बीच है।  ग्रीन फ्यूल पर जोर गडकरी ने कहा कि भारत अपनी 87 प्रतिशत तेल जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है. हर साल करीब 22 लाख करोड़ रुपये का फॉसिल फ्यूल आयात किया जाता है, जिससे प्रदूषण भी बढ़ता है. ऐसे में वैकल्पिक ईंधन और बायोफ्यूल को बढ़ावा देना जरूरी है. उन्होंने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन फ्यूचर का फ्यूल है, लेकिन इसे किफायती बनाने के लिए हाइड्रोजन स्टेशन की लागत कम करनी होगी।  गडकरी ने कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है. सरकार का सपना है कि देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाया जाए. बेहतर सड़क नेटवर्क और कम लॉजिस्टिक्स लागत इस लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।   

क्रिसिल की रिपोर्ट: भारत में कमर्शियल व्हीकल मार्केट 2027 में 12.4 लाख यूनिट्स की रिकॉर्ड बिक्री के लिए तैयार

मुंबई  क्रिसिल रेटिंग्स के अनुसार, भारत की कमर्शियल व्हीकल इंडस्ट्री फिस्कल साल 2027 में रिकॉर्ड 12.4 लाख यूनिट्स की बिक्री तक पहुंचने वाली है, जो वित्त वर्ष 2019 के पिछले पीक को पार कर जाएगी, लेकिन वित्त वर्ष 2026 में 13 परसेंट की मज़बूत वापसी के बाद ग्रोथ 5-6 प्रतिशत तक कम होने की उम्मीद है।  वित्त वर्ष 2026 में इंडस्ट्री की घरेलू रिकवरी कई वजहों से हुई, जिसमें सितंबर 2025 में GST रेट को 28 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करना भी शामिल है, जिससे परचेज़ इकोनॉमिक्स में सुधार हुआ और डेफर्ड डिमांड अनलॉक हुई. इंटरेस्ट रेट में कमी, बेहतर फ्रेट यूटिलाइजेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर और माइनिंग एक्टिविटी में बढ़ोतरी ने भी वॉल्यूम को सपोर्ट किया।  वित्त वर्ष 2027 में घरेलू डिमांड सपोर्टिव रहने की उम्मीद है, जिसे इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित एक्टिविटी, लगातार रिप्लेसमेंट डिमांड और बेहतर अफोर्डेबिलिटी का सपोर्ट मिलेगा. हालांकि, क्रिसिल ने कहा कि वेस्ट एशिया में चल रहे संकट की वजह से एक्सपोर्ट में जल्द ही रुकावट आ सकती है, जिससे डिमांड खत्म होने के बजाय डिस्पैच में देरी होने की संभावना है।  मार्केट ज़्यादातर घरेलू है, जिसमें लगभग 92 प्रतिशत वॉल्यूम भारत से आता है और बाकी एक्सपोर्ट से आता है. यह इंडस्ट्री मोटे तौर पर हल्के कमर्शियल व्हीकल (LCVs) में बंटी हुई है, जो वॉल्यूम का 60 प्रतिशत हिस्सा हैं, और मीडियम और भारी कमर्शियल व्हीकल (MHCVs) हैं, जिनमें बसें हर एक में एक सब-सेगमेंट के तौर पर हैं।  ई-कॉमर्स और लास्ट-माइल डिलीवरी की मांग की वजह से LCV की ग्रोथ 5-6 प्रतिशत रहने का अनुमान है. इस सेगमेंट में, 2 टन से ज़्यादा ग्रॉस व्हीकल वेट (GVW) वाली गाड़ियां अब LCV सेल्स का 73 प्रतिशथ हिस्सा हैं, जो वित्त वर्ष 2020 में 60 प्रतिशत था, क्योंकि फ्लीट ऑपरेटर ज़्यादा यूनिट जोड़ने के बजाय पेलोड एफिशिएंसी को प्राथमिकता दे रहे हैं।  MHCV वॉल्यूम में 4-5 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने का अनुमान है, जिसे माल ढुलाई और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च से मदद मिलेगी. बेहतर रोड इंफ्रास्ट्रक्चर की मदद से ज़्यादा टन वाले व्हीकल की तरफ़ झुकाव, वॉल्यूम ग्रोथ को कम कर सकता है, भले ही अंदरूनी डिमांड स्थिर रहे।  दोनों डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर – लुधियाना से सोननगर तक पूर्वी DFC और दादरी से JNPT तक पश्चिमी DFC, जो अप्रैल 2026 में पूरी तरह चालू हो जाएंगे – के पूरा होने से लंबी दूरी के माल के लिए रेल से कॉम्पिटिशन भी शुरू होगा, जिससे रिप्लेसमेंट डिमांड पर असर पड़ सकता है।  बस सेगमेंट की बात करें तो इसमें वित्त वर्ष 2027 में 3-4 प्रतिशत की ग्रोथ होने की उम्मीद है, जिसे रिप्लेसमेंट डिमांड और सरकार की तरफ से इलेक्ट्रिक बस खरीदने से सपोर्ट मिलेगा. हालांकि यह अभी भी एक छोटा सब-सेगमेंट है, लेकिन यहां इलेक्ट्रिफिकेशन दूसरी CV कैटेगरी के मुकाबले तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, हालांकि इसकी पहुंच अभी भी कम सिंगल डिजिट में है।  एक्सपोर्ट की बात करें तो, क्रिसिल को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 में ग्रोथ तेज़ी से घटकर 2-4 प्रतिशत हो जाएगी, जो वित्त वर्ष 2026 में 17 प्रतिशत थी. वेस्ट एशिया, जो एक्सपोर्ट का लगभग एक चौथाई हिस्सा है, शिपिंग में रुकावटों की वजह से मुख्य रुकावट है. फिर भी, टॉप MHCV बनाने वाले देशों में से एक के तौर पर भारत की बढ़ती स्थिति एक मज़बूत बेस देती है, और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ ट्रेड एग्रीमेंट को फ़ाइनल करने से मीडियम टर्म में एक्सपोर्ट बढ़ सकता है।  सोच-समझकर कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से रेवेन्यू ग्रोथ, वॉल्यूम ग्रोथ से थोड़ी ज़्यादा रहने की संभावना है. लेकिन जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण स्टील, एल्युमीनियम और फ्यूल की बढ़ती इनपुट कॉस्ट से ऑपरेटिंग मार्जिन वित्त वर्ष 2026 के 12 प्रतिशत से 40-50 बेसिस पॉइंट कम होकर 11.5-11.6 प्रतिशत हो सकता है. अगर एग्रेसिव प्राइस पास-थ्रू से डिमांड पर असर पड़ता है, तो कॉस्ट में ज़्यादा बढ़ोतरी से मार्जिन और खराब हो सकता है।  इंडस्ट्री को बढ़ते कम्प्लायंस कॉस्ट का भी सामना करना पड़ रहा है. नए मॉडल्स के लिए एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम मैंडेट अप्रैल 2026 से और सभी प्रोडक्शन के लिए अक्टूबर 2026 से लागू होंगे, इसके बाद अप्रैल 2027 से कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी-III नॉर्म्स और उसके तुरंत बाद प्रपोज़्ड भारत स्टेज VII लागू होंगे।  R&D, टूलिंग और सर्टिफिकेशन में इन्वेस्टमेंट से वित्त वर्ष 2027 और वित्त वर्ष 2028 तक गाड़ियों की कीमतें बढ़ने की संभावना है, जिससे जल्द ही रिप्लेसमेंट डिमांड बढ़ सकती है. वॉल्यूम और मार्जिन प्रेशर में कमी के बावजूद, क्रिसिल ने कहा कि इंडस्ट्री का क्रेडिट प्रोफ़ाइल स्टेबल बना हुआ है, जिसे मज़बूत कैश फ़्लो और हेल्दी बैलेंस शीट का सपोर्ट मिला है।  इस फ़ाइनेंशियल ईयर में सालाना कैपिटल खर्च 5,500 करोड़ रुपये रहने की उम्मीद है, जो पिछले साल के हिसाब से मॉडर्नाइज़ेशन और रेगुलेटरी कम्प्लायंस पर फ़ोकस करेगा. कैपेक्स-टू-EBITDA रेश्यो 0.3x से नीचे रहने की उम्मीद है. क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव, महंगाई, ब्याज दरें और लॉजिस्टिक्स लागत पर असर डालने वाले जियोपॉलिटिकल डेवलपमेंट पर नज़र रखने लायक मुख्य बातें बनी हुई हैं, क्योंकि इनसे डिमांड और मार्जिन के नज़रिए में बड़ा बदलाव आ सकता है। 

बंगाल चुनाव में अहम मुकाबला, कोलकाता, हावड़ा और 24 परगना की 91 सीटें होंगी निर्णायक

कलकत्ता पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आगामी 4 मई को सामने आ जाएंगे। इससे पहले राज्य में सियासी पारा हाई है। पहले चरण के चुनावों में बंपर वोटिंग के बाद जहां भारतीय जनता पार्टी को इस बार बंगाल में बदलाव की उम्मीद है, वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर जीत का दावा कर रही हैं। ऐसे में मतगणना के दिन का बेसब्री से इंतजार है। इतिहास की बात करें तो उत्तरी बंगाल की पहाड़ियों या जंगलमहल के वनक्षेत्र की सरकार बनाने में बहुत कम भूमिका होती है। यहां आमतौर पर सत्ता का फैसला दक्षिणी बंगाल के घनी आबादी वाले मैदानी इलाकों से ही होता है और इस बार भी निगाहें इन्हीं सीटों पर टिकी हैं। उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिले इस चुनावी जंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। यह दोनों जिले कोलकाता और हावड़ा के साथ तृणमूल कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह सत्ता हासिल करने का महत्वपूर्ण रास्ता है। भाजपा सत्तारूढ़ पार्टी के दक्षिणी गढ़ में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है, जिसके साथ दो सबसे बड़े जिले, 33 सीट वाला उत्तर 24 परगना और 31 सीट वाला दक्षिण 24 परगना, एक बार फिर बंगाल के चुनाव जीतने की कुंजी साबित होंगे। ये हैं सबसे निर्णायक क्षेत्र कोलकाता की 11 सीट और हावड़ा की 16 सीट के साथ, ये चार जिले बंगाल विधानसभा की 294 सीट में से 91 सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो सदन का लगभग एक तिहाई हिस्सा होने के कारण 2026 के चुनावों में सबसे निर्णायक क्षेत्र बन जाते हैं। वहीं उत्तर और दक्षिण 24 परगना उस मुकाबले का केंद्र बने हुए हैं, जिसे बंगाल के राजनेता अक्सर ''बंगाल के उत्तर प्रदेश का चुनावी नक्शा'' कहते हैं। यह वह क्षेत्र है जो राज्य सचिवालय नबान्न में सत्ता बना या बिगाड़ सकता है। प्रेसिडेंसी प्रभाग में कोलकाता, हावड़ा, नादिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना शामिल है तथा यहां 111 सीट है, जो तृणमूल कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ बना हुआ है। पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के मजबूत प्रयासों के बावजूद तृणमूल कांग्रेस ने इन 111 में से 96 सीट जीतीं, जबकि भाजपा को केवल 14 और इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) को एक सीट ही मिल पाई। भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी पकड़ मजबूत की और यहां की 21 सीट पर बढ़त हासिल की, जबकि तृणमूल कांग्रेस 90 सीट में आगे रही। TMC-BJP दोनों को उम्मीद तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनावी गणित बिल्कुल स्पष्ट है। वह अगर इस स्थिति को बरकरार रखती है तो उसका लगातार चौथी बार सत्ता में आने का रास्ता खुला रहेगा। तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा, “अगर हम उत्तर और दक्षिण 24 परगना, कोलकाता और हावड़ा को अपने पास बनाए रखते हैं, तो बंगाल हमारे पास रहेगा। ये सिर्फ सीट नहीं हैं, ये ममता बनर्जी की राजनीति का सामाजिक आधार हैं।” जबकि भाजपा इसी भौगोलिक क्षेत्र को सत्ता परिवर्तन का मार्ग मानती है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "उत्तर 24 परगना, कोलकाता और हावड़ा में पैठ बनाए बिना हमारे लिए सत्ता तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है। मतुआ और शरणार्थी वोट के कारण उत्तर 24 परगना ही हमारे लिए सत्ता का प्रवेश द्वार है।"

चंद्रयान-2 ने रीवा के सौरभ को ISRO में वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा दी

रीवा  कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों, तो छोटे से गांव की मिट्टी भी आसमान छूने का हौसला दे देती है। ऐसा ही कर दिखाया है रीवा जिले की जवा तहसील के गांव पुरौना के होनहार युवा सौरभ द्विवेदी ने, जिनका चयन देश की प्रतिष्ठित अंतरिक्ष संस्था इसरो (ISRO) में वैज्ञानिक पद पर हुआ है। साधारण परिवार से आने वाले सौरभ ने यह साबित कर दिया कि सफलता संसाधनों की मोहताज नहीं, बल्कि मेहनत, लगन और सपनों की उड़ान पर टिकी होती है। उनके पिता शैलेन्द्र द्विवेदी एक शिक्षक हैं, जिन्होंने बेटे को शुरू से ही शिक्षा का महत्व समझाया, वहीं मां गीता द्विवेदी ने हर मुश्किल घड़ी में उनका हौसला बढ़ाया।  आईआईटी दिल्ली से एमटेक किया सौरभ की शुरुआती पढ़ाई शासकीय मार्तण्ड उत्कृष्ट क्रमांक-एक विद्यालय से हुई। इसके बाद उन्होंने भोपाल से बीटेक और देश के शीर्ष संस्थान आईआईटी दिल्ली से एमटेक की पढ़ाई पूरी की। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। चंद्रयान- दो  के प्रक्षेपण से मिली थी प्रेरणा सौरभ बताते हैं कि उनका सपना तब आकार लेने लगा, जब उन्होंने चंद्रयान-दो  के प्रक्षेपण को देखा। उसी पल उन्होंने ठान लिया था कि एक दिन वे भी देश के अंतरिक्ष मिशनों का हिस्सा बनेंगे और आज उनकी मेहनत रंग लाई है। पुरौना गांव में जश्न का माहौल यह सफलता सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा है। सौरभ अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र में वैज्ञानिक के रूप में देश की अंतरिक्ष उपलब्धियों में योगदान देंगे और रीवा जिले का नाम राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित करेंगे। गांव पुरौना से लेकर पूरे रीवा जिले तक खुशी और गर्व का माहौल है। हर कोई सौरभ की इस उपलब्धि को सलाम कर रहा है। 

भोपाल की ट्रेनों में सस्ते एसी कोच की शुरुआत, अब कम किराए में मिलेगा एसी यात्रा का मजा

भोपाल  यात्रियों की सुविधा के लिए भोपाल रेल मंडल ने बड़ी कवायद की है। गर्मी के मौसम में मंडल ने सुरक्षित और ठंडक से भरा सफर कराने की पहल की है। इसके लिए ट्रेनों में इकोनॉमी एसी कोच लगाए जा रहे हैं। भोपाल रेल मंडल के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार इन कोचों में यात्रियों को कम किराए में एसी का आरामदायक सफर करने की सुविधा मिलेगी। इससे लोगों को भीषण गर्मी से राहत मिल सकेगी। समर सीजन में हमेशा की तरह इस बार भी ट्रेनों में जबर्दस्त भीड़ चल रही है। भीषण गर्मी के कारण लोग एसी में यात्रा करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे खासतौर पर एसी थ्री कोच में लंबी वेटिंग चल रही है। ऐसे में यात्रियों की परेशानी बढ़ गई है। एसी का सस्ता विकल्प उपलब्ध कराने के लिए भोपाल रेल मंडल ने ट्रेनों में इकोनॉमी एसी कोच लगाने का निर्णय लिया यात्रियों को लंबी वेटिंग से निजात दिलाने और एसी का सस्ता विकल्प उपलब्ध कराने के लिए भोपाल रेल मंडल ने ट्रेनों में इकोनॉमी एसी कोच लगाने का निर्णय लिया है। भोपाल रेल मंडल के सीनियर डीसीएम सौरभ कटारिया ने बताया कि यात्रियों की बढ़ती संख्या को ध्यान में रखते हुए दस ट्रेनों में एसी इकोनॉमी कोच लगाए जाएंगे। रेल यात्रियों को जून से ये सुविधा मिलनी शुरू हो जाएगी। मई के महीने में पहले ही 5 ट्रेनों में एसी इकोनॉमी के एक्सट्रा कोच लगाने का शेड्यूल जारी कर दिया गया है। रेलवे का मानना है कि एसी इकॉनॉमी कोच के जुडऩे से ज्यादा यात्रियों को कम किराए में एसी सुविधा मिल सकेगी। रेलवे से संबंधित एक गंभीर वारदात इधर रेलवे से संबंधित एक गंभीर वारदात भी सामने आई है। हरदा जिले में टिमरनी के पास 5 मवेशियों को चुराकर रेलवे ट्रैक पर बांध दिया जिससे ट्रेन से कटने पर उनकी मौत हो गई। छिदगांव मेल के गंजालेश्वर आश्रम से चोरों ने शनिवार रात को पांच गोवंश को चुराकर रेलवे ट्रैक पर बांध दिया। ट्रेन की चपेट में आने से सभी की मौत हो गई। रविवार सुबह छिदगांव मेल में ट्रैक के पास मवेशियों के शव और रस्सी के टुकड़े मिले। जानकारी लगते ही विश्व हिंदू परिषद बजरंग दल के कार्यकर्ता सुबह मौके पर पहुंचे और छिदगांव मेल में हाइवे किनारे पर पांच घंटे तक प्रदर्शन करते हुए धरना दिया। इस बीच टिमरनी एसडीएम संजीव कुमार नागू, टिमरनी थाना प्रभारी मुकेश गौड़ मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने बजरंग दल के कार्यकर्ताओं व ग्रामीणों को समझाइश दी। जल्द ही आरोपियों की तलाश कर गिरफ़्तारी का विश्वास दिलाया। बजरंग दल के विकास शर्मा ने कहा कि पुलिस को आरोपियों की गिरफ़्तारी के लिए 30 अप्रेल का समय दिया है। आरोपी नहीं पकड़े गए तो आंदोलन करेंगे। इस मामले में रेलवे ने भी नियमानुसार कार्यवाही शुरु कर दी है।

निगम की नई पहल: नैनो एरेटर तकनीक से तालाबों में पानी की गुणवत्ता में सुधार, 10 दिन में असर दिखा

उज्जैन  शहर के तालाबों की बिगड़ती स्थिति को सुधारने के लिए नगर निगम ने नैनो डिफ्यूजर सॉफ्ट एरेटर तकनीक का प्रयोग शुरू किया है। इसकी शुरुआत क्षीरसागर तालाब से की गई है, जहां 10 दिनों से यह तकनीक काम कर रही है। अधिकारियों द्वारा लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है और शुरुआती निरीक्षण में पानी की गुणवत्ता में सुधार देखा गया है। नगर निगम आयुक्त अभिलाष मिश्रा ने हाल ही में स्थल निरीक्षण किया, जिसमें पानी पहले की तुलना में साफ नजर आया। शहर में शिप्रा नदी के साथ-साथ सप्त सागर का धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व है, लेकिन जल प्रवाह नहीं होने से तालाबों का पानी अक्सर दूषित हो जाता है। इससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों की मृत्यु होती है। गर्मी में बदबू के कारण आसपास रहना भी मुश्किल हो जाता है। क्षीरसागर में बड़ी संख्या में मछलियां हैं, लेकिन ऑक्सीजन की कमी के कारण उनकी मौत की घटनाएं सामने आती रही हैं। इस समस्या के समाधान के लिए निगम ने यह तकनीक शुरू की है। सफल होने पर इसे शहर के अन्य तालाबों में भी लागू किया जा सकेगा। यह कार्य पर्यावरणविद एसपीएस रंधावा और उनकी टीम की देखरेख में किया जा रहा है। कैसे काम करती है तकनीक नैनो डिफ्यूजर सॉफ्ट एरेटर तकनीक के तहत तालाब में ऐसे उपकरण लगाए जाते हैं जो पानी के भीतर बेहद छोटे-छोटे हवा के बुलबुले छोड़ते हैं। ये नैनो बुलबुले पानी में घुलकर ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाते हैं, जिससे गंदगी फैलाने वाले बैक्टीरिया खत्म होते हैं और पानी धीरे-धीरे साफ व पारदर्शी बनने लगता है। फाउंटेन से अलग क्यों है तालाबों में पहले से लगे फव्वारे मुख्य रूप से सतह पर ही असर करते हैं और सजावटी होते हैं। नैनो एरेटर तकनीक पानी की गहराई तक पहुंचकर वास्तविक सफाई करती है और लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखती है। इसके मुख्य फायदे पानी की गुणवत्ता में सुधार बदबू और गंदगी में कमी मछलियों और जलीय जीवों को बेहतर वातावरण मिलने से उनकी मौत नहीं होगी। किनारे पर जमने वाली काई (ग्रीन लेयर) पर नियंत्रण।

कूनो में चीतों का सफल प्रजनन, 4 मादा चीतों ने 3 महीने में दी संतान, जंगल में प्रजनन को बताया टास्क

श्योपुर मध्यप्रदेश का कूनो नेशनल पार्क अब चीतों का केवल आश्रय स्थल नहीं रहा, बल्कि एक सफल चीता प्रजनन केन्द्र के रूप में दुनिया भर में अलग पहचान बना चुका है। नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीते यहां की जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र में पूरी तरह से रच बस गये हैं। कूनो की धरती अब आये दिन नन्हे शावकों की किलकारियों से गूंज रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का लुप्त हो चुके चीतों के देश में फिर से बसाने का सपना ‘प्रोजेक्ट चीता’ मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में केन्द्र-राज्य के विभागों के समन्वय और प्रबंधन से वन्य-जीव संरक्षण के क्षेत्र में नये इतिहास लिखे जाने के साथ साकार हो रहा है। चुनौतियों पर विजय के बाद मिली ऐतिहासिक सफलता प्रोजेक्ट चीता का प्रारंभिक चरण शुरुआती चुनौतियों से भरा हुआ था, लेकिन कूनो की आबोहवा और विभाग के विशेषज्ञों के कुशल प्रबंधन ने सभी चुनौतियों से पार पाते हुए वन्य-जीव संरक्षण की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लुप्त प्रजाति की पुनर्स्थापना का सफलतम पर्याय बना दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यहां की भौगोलिक परिस्थितियां और पर्याप्त शिकार चीतों के प्रजनन के लिए बेहद अनुकूल सिद्ध हुए हैं। मादा चीतों द्वारा लगातार शावकों को जन्म देना इस बात का प्रमाण है कि वे तनावमुक्त हैं और कूनो को अपना प्राकृतिक आवास मान चुकी हैं। क्यों बढ़ा कूनो पर दबाव?  कूनो में लगातार बढ़ रही चीतों की आबादी के कारण संसाधनों पर असर पड़ रहा है। वन क्षेत्र की सीमित क्षमता के चलते सभी चीतों को एक ही स्थान पर रखना चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा संख्या होने पर भोजन और क्षेत्र को लेकर संघर्ष बढ़ सकता है। इसके अलावा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना भी जरूरी होता है। इन्हीं कारणों से चीतों को दूसरे उपयुक्त स्थानों पर स्थानांतरित करने की योजना बनाई जा रही है। वन विभाग इस दिशा में वैज्ञानिक तरीके से निर्णय ले रहा है। ताकि चीतों की सुरक्षा और उनके प्राकृतिक व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।   गांधी सागर बन रहा नया ठिकाना  गांधी सागर अभयारण्य को चीतों के नए आवास के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह क्षेत्र भौगोलिक और पर्यावरणीय दृष्टि से चीतों के लिए उपयुक्त माना गया है। फिलहाल यहां तीन चीतों को पहले ही बसाया जा चुका है। आने वाले समय में और चीतों को यहां शिफ्ट करने की योजना है। इससे कूनो पर दबाव कम होगा और चीतों को नया क्षेत्र मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग स्थानों पर आबादी फैलाने से उनकी संख्या सुरक्षित रूप से बढ़ेगी। यह रणनीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनाई जाती है। गांधी सागर को चीता हब के रूप में तैयार किया जा रहा है। भारत बना वन्यजीव संरक्षण का उदाहरण  ‘प्रोजेक्ट चीता’ की सफलता ने भारत को दुनिया के सामने एक उदाहरण के रूप में स्थापित किया है। यह पहल दिखाती है कि सही योजना और दृढ़ इच्छाशक्ति से विलुप्त प्रजातियों को फिर से बसाया जा सकता है। कूनो अब केवल एक राष्ट्रीय पार्क नहीं, बल्कि एक ग्लोबल ब्रीडिंग सेंटर के रूप में उभर रहा है। दुनियाभर के वन्यजीव विशेषज्ञ इस परियोजना पर नजर बनाए हुए हैं। यह उपलब्धि भारत के संरक्षण प्रयासों की बड़ी जीत मानी जा रही है। साथ ही यह अन्य देशों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई है।   बढ़ता कुनबा : प्रोजेक्ट चीता की नई उड़ान              नए शावकों का जन्म: अप्रैल 2026 में मादा चीता गामिनी ने 3 स्वस्थ शावकों को जन्म दिया। इससे पहले फरवरी-मार्च 2026 में ज्वाला, निर्वा और आशा भी शावकों को जन्म दे चुकी हैं।              कुल संख्या: कूनो में चीतों की संख्या अब 57 हो चुकी है।              भारत में जन्मे शावक: 27 से अधिक शावकों का जन्म भारत में ही हुआ है, जो इस परियोजना की सबसे बड़ी सफलता है।              विदेशी सहयोग: फरवरी 2026 में बोत्सवाना से 8-9 नए चीते लाए गए, जिससे परियोजना को और मजबूती मिली। पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बूस्ट कूनो का ब्रीडिंग सेंटर बनना केवल पर्यावरणीय उपलब्धि नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। चीतों की बढ़ती संख्या के साथ यहां वाइल्डलाइफ टूरिज्म की संभावनाएं कई गुना बढ़ गई हैं। इससे श्योपुर और आसपास के जिलों में रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं और स्थानीय युवाओं के लिए नई संभावनाएं खुल रही हैं। प्रोजेक्ट चीता-एक ऐतिहासिक यात्रा              17 सितंबर 2022: प्रधानमंत्री श्री मोदी ने नामीबिया से आए 8 चीतों को कूनो में छोड़ा— यह दुनिया का पहला अंतरमहाद्वीपीय बिग प्रेडेटर स्थानांतरण पुनर्स्थापना प्रोजेक्ट था।              फरवरी 2023: दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते आए।              मार्च 2023: ज्वाला ने 70 वर्षों बाद भारत में पहले शावकों को जन्म दिया।              2024: आशा और गामिनी जैसी मादा चीतों ने नई पीढ़ी को जन्म दिया, जिसमें गामिनी ने एक साथ 5 शावकों का रिकॉर्ड बनाया।              2025-26: नई खेप के साथ प्रोजेक्ट का विस्तार और शावकों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती गई। नई पीढ़ी और भविष्य की दिशा कूनो में अब दूसरी पीढ़ी के चीते भी विकसित हो रहे हैं। मुखी जैसी भारत में जन्मी मादा चीता का शावकों को जन्म देना पुनर्स्थापना प्रोजेक्ट में जैनेटिक ब्रीडिंग के रूप में मील का पत्थर माना जा रहा है। वन विभाग अब शावकों की पहचान नामों के बजाय कोड (जैसे KP-1, KP-2) से कर रहा है, ताकि उनकी वंशावली को वैज्ञानिक तरीके से ट्रैक किया जा सके। आगे की योजना-दूसरा घर तैयार कूनो पर बढ़ते दबाव को देखते हुए अब प्रदेश के गांधी सागर अभयारण्य को चीतों के दूसरे घर के रूप में विकसित करने की योजना पर काम किया जा रहा है। इससे प्रोजेक्ट चीता को और विस्तार मिलेगा और भारत में चीतों की स्थायी वापसी सुनिश्चित होगी। कूनो नेशनल पार्क में चीतों की बढ़ती संख्या और सफल प्रजनन ने यह साबित कर दिया है कि भारत में चीतों की वापसी का सपना अब साकार हो रहा है। यह … Read more

गंगा एक्सप्रेसवे बनेगा यूपी का सबसे बड़ा इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, 29 अप्रैल को पीएम करेंगे लोकार्पण

लखनऊ उत्तर प्रदेश की विकास यात्रा में 29 अप्रैल का दिन ऐतिहासिक होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हरदोई में देश के सबसे लंबे एक्सप्रेसवे में से एक 'गंगा एक्सप्रेसवे' को राष्ट्र को समर्पित करेंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन के अनुरूप, यह एक्सप्रेसवे केवल एक सड़क मार्ग नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा "इंडस्ट्रियल कॉरिडोर" बनने जा रहा है। बुनियादी ढांचे को औद्योगिक रफ्तार देने के लिए इसे इंटीग्रेटेड मैन्युफैक्चरिंग एंड लॉजिस्टिक्स क्लस्टर (आईएमएलसी) मॉडल पर तैयार किया गया है, जो प्रदेश की अर्थव्यवस्था को $1 ट्रिलियन बनाने की दिशा में संजीवनी साबित होगा। 594 किमी का विशाल इंडस्ट्रियल नेटवर्क यूपीडा (UPEIDA) की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत 594 किमी लंबे कॉरिडोर के किनारे 12 औद्योगिक नोड्स विकसित किए जा रहे हैं। इसके लिए सरकार ने 6,507 एकड़ भूमि चिन्हित की है। मेरठ से प्रयागराज तक फैले इन नोड्स को वेयरहाउसिंग, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स की आधुनिक संभावनाओं को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। यह स्ट्रैटेजिक प्लानिंग पूरे एक्सप्रेसवे को एक 'इकोनॉमिक ग्रोथ बेल्ट' में बदल देगी, जिससे माल ढुलाई तेज और सस्ती होगी। निवेश की बारिश और रोजगार के अवसर गंगा एक्सप्रेसवे के किनारे उद्योगों को लेकर निवेशकों में जबरदस्त उत्साह है। अब तक सरकार को 987 निवेश प्रस्ताव (EOI) मिल चुके हैं, जिनके जरिए लगभग ₹46,660 करोड़ के निवेश का लक्ष्य है। यह निवेश मुख्य रूप से एग्री-प्रोसेसिंग, ई-कॉमर्स सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स पार्क जैसे क्षेत्रों में आएगा। इससे न केवल उद्योगों की लागत घटेगी, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे। क्षेत्रीय असमानता का अंत, हरदोई बनेगा सेंटर यह एक्सप्रेसवे कॉरिडोर यूपी के 12 जिलों के बीच विकास के संतुलन को बेहतर करेगा। हरदोई, उन्नाव, प्रतापगढ़ और रायबरेली जैसे जिलों में, जहाँ औद्योगिक गतिविधियां कम थीं, अब वहां विकास की नई लहर दौड़ेगी। इस योजना में बुलंदशहर नोड सबसे बड़ा क्लस्टर होगा, जो 2,798 एकड़ में फैला है। योगी सरकार का लक्ष्य सड़क निर्माण को केवल आवाजाही तक सीमित न रखकर, उसे प्रदेश के औद्योगिक सशक्तिकरण का जरिया बनाना है। मेरठ से प्रयागराज तक नोड्स की स्थिति (एट ए ग्लेंस) गंगा एक्सप्रेसवे पर उद्योगों का जाल कुछ इस तरह बिछाया गया है:     पश्चिमी यूपी: मेरठ (529 एकड़), हापुड़ (304 एकड़), बुलंदशहर (2,798 एकड़) और अमरोहा (348 एकड़)।     मध्य यूपी: संभल (591 एकड़), बदायूं (269 एकड़), शाहजहांपुर (252 एकड़) और हरदोई (335 एकड़)।     पूर्वी एवं तराई क्षेत्र: उन्नाव (333 एकड़), रायबरेली (232 एकड़), प्रतापगढ़ (263 एकड़) और प्रयागराज (251 एकड़)।  

पुतिन का 150 साल जीने का सपना, वैज्ञानिक कर रहे हैं उसे साकार, क्या थम जाएगी उम्र?

मॉस्को  रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन उम्र बढ़ाने वाली नई दवा पर बहुत ध्यान दे रहे हैं. कुछ महीने पहले नवंबर में एक एआई समिट में 73 साल के पुतिन ने कहा था कि इंसान 150 साल तक जी सकता है. अब रूस के विज्ञान और शिक्षा मंत्री डेनिस सेकिरिंस्की ने दावा किया है कि उनके देश के वैज्ञानिक दुनिया की पहली जीन थेरेपी दवा बना रहे हैं जो बूढ़ा होने के प्रोसेस को रोक सकती है।  यह दवा RAGE नाम के जीन को ब्लॉक करेगी जो कोशिकाओं को बूढ़ा बनाने का काम करती है. सेकिरिंस्की ने कहा कि इस जीन को सक्रिय होने से कोशिकाएं बूढ़ी हो जाती हैं लेकिन इसे रोकने से कोशिकाओं की जवानी लंबी हो सकती है. यह खबर पुतिन की लंबी उम्र की चाहत से जुड़ी हुई लग रही है।  RAGE जीन क्या है और दवा कैसे काम करेगी RAGE का पूरा नाम रिसेप्टर फॉर एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंडप्रोडक्ट्स है. यह एक रिसेप्टर है जो कोशिकाओं में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया शुरू कर देता है. रूस के वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि जीन थेरेपी से इस रिसेप्टर को ब्लॉक किया जाए ताकि कोशिकाएं ज्यादा समय तक युवा रहें. सेकिरिंस्की ने सरांस्क शहर में लॉन्गेविटी मेडिसिन फोरम में यह बात कही।  उन्होंने कहा कि यह जीन थेरेपी उम्र बढ़ने के खिलाफ लड़ाई में सबसे आशाजनक क्षेत्र है. यह दवा बायोलॉजी ऑफ एजिंग एंड मेडिसिन इंस्टीट्यूट में विकसित की जा रही है. अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया है लेकिन यह पुतिन के लंबे समय के लक्ष्यों से मेल खाता है।  पुतिन और शी जिनपिंग की अमरता वाली अफवाह पुतिन सिर्फ 150 साल तक जीने से संतुष्ट नहीं हैं. उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से बातचीत में कहा था कि इंसान के अंगों को बार-बार ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. जितना ज्यादा जीएंगे उतने युवा लगेंगे. दोनों नेताओं की यह बातचीत सुन ली गई थी. पुतिन लंबे समय से उम्र बढ़ाने के शौकीन हैं. उनके दुश्मन डरते हैं कि वे दशकों तक सत्ता में रहना चाहते हैं. फिर अपनी सबसे बड़ी बेटी या बेटे इवान स्पिरोडोनोव को सत्ता सौंपेंगे. इवान अभी सिर्फ 11 साल के हैं।  वैज्ञानिकों पर दबाव और पुतिन का आदेश रूसी वैज्ञानिकों को हाल ही में आदेश दिया गया कि वे उम्र बढ़ाने से लड़ने वाली अपनी सारी रिसर्च तुरंत सरकार को सौंप दें. एक सूत्र ने बताया कि सबसे बड़े बॉस यानी पुतिन ने टास्क दिया और अधिकारी हर तरीके से इसे लागू कर रहे हैं. वैज्ञानिकों को कहा गया कि कोशिकाओं के खराब होने को रोकने की नई तकनीक, दिमाग और इंद्रियों की कमजोरी रोकने वाले उपाय, इम्यून सिस्टम सुधारने के तरीके और बायोप्रिंटिंग जैसी नई मेडिकल टेक्नोलॉजी के प्रपोजल भेजें।  पुतिन ने रूस में एक नेशनल मिशन शुरू किया है जिसका लक्ष्य नागरिकों की सेहत बचाना और उम्र बढ़ने से लड़ना है. 2030 तक 1 लाख 75 हजार जानें बचाने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन वहीं यूक्रेन युद्ध में लाखों जानें जा चुकी हैं. पुतिन के सभी महलों में आधुनिक अस्पताल बने हैं ताकि उनकी सेहत हमेशा अच्छी रहे. उनकी सबसे बड़ी बेटी मारिया वोरोन्त्सोवा जो 40 साल की एंडोक्रिनोलॉजिस्ट हैं वे भी इस उम्र बढ़ाने वाली रिसर्च में शामिल बताई जाती हैं।  पुतिन के एंटी-एजिंग गुरु की मौत पिछले साल पुतिन को बड़ा झटका लगा जब उनके लंबे समय के एंटी-एजिंग गुरु प्रोफेसर व्लादिमीर खाविन्सन की 77 साल की उम्र में अचानक मौत हो गई. खाविन्सन ने दावा किया था कि वे इंसानों को 110-120 साल तक जीने का राज बता रहे थे. उन्होंने पुतिन को तीन पुराने सोवियत नेताओं से बेहतर बताया था।  पुतिन और उनकी प्रेमिका अलिना काबाएवा दोनों खाविन्सन के एंटी-एजिंग कॉकटेल लेते रहे हैं जो सोवियत आर्मी के समय से तैयार किए गए थे. इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर इलिया दावल्याटचिन का कहना है कि पुतिन वास्तव में 150 नहीं बल्कि 97 साल तक जीना चाहते हैं।  2050 में उनका बेटा इवान 35 साल का हो जाएगा जो रूसी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने की उम्र है. कुल मिलाकर पुतिन उम्र बढ़ाने की दवा को अपने और अपने करीबियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं लेकिन यह अभी प्रयोग की स्टेज पर है और कोई गारंटी नहीं है. दुनिया देख रही है कि क्या रूस सच में उम्र बढ़ाने की दुनिया की पहली दवा बना पाएगा। 

हिमालय के ग्लेशियरों पर बढ़ी गर्मी का असर, 50 करोड़ लोगों के लिए बढ़ा संकट

 नई दिल्ली दुनिया भर में इस समय ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन का असर जमीन पर साफ-साफ दिख रहा है.  पर्वतीय क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है. दो अरब लोगों को भोजन और पानी देने वाले हिंदूकुश हिमालय से लेकर समुद्र की गहराई तक पृथ्वी गर्म हो रही है. विश्व के सभी पहाड़ पृथ्वी की सतह के लगभग 20% के क्षेत्रफल पर फैले हुए हैं।  ये पहाड़ दुनिया की कुल जनसंख्या के 10% लोगों को घर और 50% लोगों को खेती की जमीन को सिंचाई हेतु जल, औद्योगिक उपयोग और घरेलू उपभोग के लिए मीठा पानी प्रदान करते हैं. पर्वतीय क्षेत्र आनुवांशिक एवं जैव विविधता के भंडार रहे हैं. पर्वतीय क्षेत्र अन्य आवश्यक संसाधन जैसे लकड़ी, खनिज, जल-विद्युत और मनोरंजक पर्यटन स्थल आदि उपलब्ध कराते है, किन्तु पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन और बढ़ती हुई जनसंख्या, जंगलों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक इस्तेमाल और अवैज्ञानिक कृषि पद्धति  के कारण पर्वतीय क्षेत्रों के मौसम को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ रहा है।  ग्लोबलाइजेशन के बाद प्राकृतिक संपदा के दोहन से जो औद्योगिक विकास हुआ है, उससे उत्सर्जित कॉर्बन ने इनके पिघलने की तीव्रता को बढ़ा दिया है. एक शताब्दी पूर्व भी हिमखण्ड पिघलते थे, लेकिन बर्फ गिरने के बाद इनका दायरा निरंतर बढ़ता रहता था. इसलिए गंगा और यमुना जैसी नदियों का प्रवाह सतत बना रहा. किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा तीन से चार मीटर प्रति वर्ष घटना शुरू हो गया था।  गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे घटने की औसत दर 30-60 मीटर प्रति दशक है जो एक चिंता का विषय है. ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में प्रसिद्ध गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा का मुख्य स्रोत भी है, तेजी से प्रति वर्ष 28-30 मीटर की दर से पीछे को घट रहा है. 1935 से 2022 के बीच यह लगभग 1700 मीटर पीछे हट चुका है. पिछले दो दशकों में पिघलने की दर भी दोगुनी हो गई है।  यह हिमालय के ईकोसिस्टम और उत्तर भारत की वाटर सिक्योरिटी के लिए एक गंभीर संकट है. देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. पीछे हट रहे हैं. सिक्किम और लद्दाख (जांस्कर) के ग्लेशियरों पर की गई स्टडी में पाया गया है कि गर्मी के मौसम तापमान में वृद्धि और कम हिमपात इसके मुख्य कारण हैं।  हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में बसे देश भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान जहां दुनिया की खासी आबादी रहती है, यहां इन प्रभावों का अधिक जोखिम बना हुआ है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिंदूकुश हिमालय  क्षेत्र के ग्लेशियरों  के तेजी से पिघलने के कारण सदी के अंत तक 75% बर्फ के खत्म होने का खतरा है. भारतीय हिमालय में कुल 9,975 ग्लेशियर हैं. इनमें 900 उत्तराखंड में आते हैं।  ग्लेशियर पिघलेंगे तो नदियों का क्या होगा? इन ग्लेशियरों से ही ज्यादातर नदियां निकली हैं, जो देश की 40 प्रतिशत आबादी को पीने, सिंचाई व आजीविका के अनेक संसाधन उपलब्ध कराती हैं. किंतु ग्लेशियरों के पिघलने और टूटने का यही सिलसिला बना रहा तो देश के पास ऐसा कोई उपाय नहीं है कि वह इन नदियों से जीवन-यापन कर रही 50 करोड़ आबादी को रोजगार व आजीविका के वैकल्पिक संसाधन दे सके?   पड़ोसी देश नेपाल, जो जलवायु परिवर्तन के जोखिम के मामले में दुनिया में चौथा सबसे संवेदनशील देश माना जाता है. नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं, जिसमें तेजी से पिघलते ग्लेशियर, अनियमित मानसून और बाढ़/भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी शामिल है. हिमालयी ईकोसिस्टम में बदलाव के कारण कृषि उत्पादन कम हो रहा है. पानी के स्रोत सूख रहे हैं. जैव विविधता को नुकसान हो रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा जोखिम में है. नेपाल  जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पिछले दो दशकों से अनुकूलन और कम करने के प्रयास भी कर रहा है।  बढ़ता तापमान ही है मुसीबत की जड़ आईसीआईएमओडी (ICIMOD), एकीकृत पर्वतीय विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्र आठ सदस्य देशों (अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान) के सहयोग से पर्वतीय आजीविका और पर्यावरण के संरक्षण के लिए काम करता है।  ICIMOD की चेतावनी के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि को  1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं रोका गया, तो इस सदी के अंत तक हिमालय के 80% ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं, जिसका सीधा असर पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर पड़ेगा. क्योंकि हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला है जो एशिया के 8 देशों में फैली हुई है. इसे तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है. आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाहर यहां बर्फ का सबसे बड़ा भंडार है।  ग्लोबल चेंज बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन अगर बिना रोक टोक इसी रफ्तार से बढ़ता गया तो बढ़ते तापमान की वजह से पिघल रहे अंटार्कटिक बर्फ के चलते एंपरर पेंग्विन की 98 आबादी इक्कीसवीं सदी तक गायब हो सकती है।  जैसे-जैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे जलवायु  परिवर्तन गति पकड़ रहा है. दुनिया भर की आबादी चरम मौसम और जलवायु घटनाओं से गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है. अल-नीनो या ला-नीना जो समझ में आता हो या ना आता हो, लेकिन इस बार जिस तरह से प्रचंड गर्मी ने हालात पैदा किए हैं. उसने कुछ जरूर सिखा दिया होगा. बढ़ते तापमान को रोकना आसान काम नहीं है।  स्नो हार्वेस्टिंग का समय आ रहा है बावजूद इसके हम अपने हिमखंडों को टूटने और पिघलने से बचाने के उपाय औद्योगिक गतिविधियों को विराम देकर एक हद तक रोक सकते हैं. पर्यटन के रूप में मानव समुदायों की जो आवाजाही हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही है. उस पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है. इसके अलावा वाकई हम अपनी बर्फीली शिलाओं को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमारी ज्ञान परंपरा में हिमखंडों के सुरक्षा के जो उपाय उपलब्ध हैं, उन्हें भी महत्व देना होगा।  हिमालय के शिखरों पर रहने वाले लोग आजादी के दो दशक बाद तक बरसात के समय छोटी-छोटी क्यारियां बनाकर पानी रोक देते थे. तापमान … Read more