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मांसाहार की बढ़ती मांग का पर्यावरण पर असर, UN की रिपोर्ट ने दुनिया को किया सतर्क

मुंबई  चिकन-मटन शौक से खाने वाले लोगों की वजह से दुनिया में एक नया संकट पैदा हो गया है, जिसके बारे में खुद संयुक्त राष्ट्र ने रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में कई डराने वाले खुलासे हुए हैं. बताया जा रहा है कि पिछले 60 सालों में ग्लोबल डाइट पूरी तरह से बदल चुकी है. लोग अब साग-सब्जी और शाकाहार को छोड़कर अंधाधुंध तरीके से नॉन-वेज की तरफ भाग रहे हैं. चिकन और मटन की इस दीवानगी ने स्वाद का चस्का तो बढ़ा दिया है, लेकिन हमारी बेचारी धरती के लिए एक ऐसा खौफनाक संकट खड़ा कर दिया है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।  यूएन के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) द्वारा जारी इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया के बड़े-बड़े नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के कान खड़े कर दिए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, जहां लोगों की थाली में मीट का वजन लगातार भारी होता जा रहा है, वहीं इसके चलते हमारी धरती पर प्रदूषण, जहरीली गैसों और ग्लोबल वॉर्मिंग का खतरा भी एक डरावने स्तर पर पहुंच रहा है।  25 किलो से सीधे 47 किलो पर पहुंची चिकन-मटन की खपत इस रिपोर्ट में जो आंकड़े निकलकर सामने आए हैं, वे वाकई किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी हैं. अगर हम साल 1961 के दौर की बात करें तो उस समय दुनिया में प्रति व्यक्ति सालाना मांस की कुल सप्लाई औसतन सिर्फ 25 किलोग्राम हुआ करती थी लेकिन साल 2022 तक आते-आते ये आंकड़ा करीब-करीब दोगुना बढ़कर 47 किलोग्राम प्रति व्यक्ति सालाना पर पहुंच गया है. यानी हर साल इंसानी बस्तियां लाखों टन मांस डकार रही हैं।  चिकन ने तोड़े सारे रिकॉर्ड: साल 1961 में एक इंसान सालभर में औसतन 3 किलो से भी कम चिकन खाता था, लेकिन साल 2022 में यह आंकड़ा सीधे 17 किलोग्राम पर पहुंच गया. इसका मतलब ये हुआ कि चिकन की खपत में करीब 6 गुना का बंपर और ऐतिहासिक उछाल आया है. आज गली-कूचों से लेकर बड़े-बड़े रेस्टोरेंट में चिकन की डिमांड सबसे ज्यादा है।  पोर्क और बीफ का हाल: इस दौरान पोर्क खाने की आदत भी इंसानों में दोगुनी हो गई है और ये अब 15 किलो प्रति व्यक्ति पर जा पहुंची है. हालांकि, इस पूरे खेल में बीफ की खपत में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं देखा गया है और ये दुनिया भर में करीब 9 किलोग्राम पर स्थिर है।  मीट की मांग क्यों बढ़ी? एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे असली खेल पैसे और लाइफस्टाइल का है. जिन देशों में लोगों की आमदनी बढ़ रही है और जहां शहरीकरण बहुत तेजी से फैल रहा है, वहां लोगों का रहन-सहन और खान-पान का तरीका बिल्कुल बदल चुका है. लोग अब पारंपरिक दाल-चावल या हरी सब्जियों को छोड़कर मीट को स्टेटस सिंबल और अपनी रोजाना की डाइट का मुख्य हिस्सा बना रहे हैं. इस लजीज स्वाद की जो कीमत हमारी धरती को चुकानी पड़ रही है, वो बहुत भयानक है।  आसमान छूता प्रदूषण: आज के समय में दुनिया भर में होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में एग्रीकल्चर और पशुपालन दूसरा सबसे बड़ा विलेन बनकर उभरा है. फैक्ट्रियों और गाड़ियों के बाद यही सेक्टर सबसे ज्यादा जहर उगल रहा है।  Livestock का जानलेवा खतरा: पर्यावरण में गर्मी बढ़ाने वाली और ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों में अकेले पशुपालन का हिस्सा 12% से लेकर 20% तक है. आशंका जताई जा रही है कि अगले दशक में इस सेक्टर से होने वाला प्रदूषण 7.6% तक और ज्यादा बढ़ सकता है, जिसका 80% कारण सिर्फ और सिर्फ ये पशुपालन होगा।  अमीर-गरीब का फासला इस रिपोर्ट में एक और बेहद कड़वा और परेशान करने वाला सच सामने आया है कि अमीर और गरीब देशों के बीच खाने की थाली को लेकर कितनी बड़ी खाई मौजूद है. अमीर देशों में तो लोग अपनी हैसियत के दम पर भर-भर कर मीट खा रहे हैं और वहां मांस की सप्लाई बहुत ज्यादा और स्थिर बनी हुई है।  हालांकि, कई गरीब और कम आय वाले देशों में आज भी भुखमरी का खौफनाक माहौल है. वहां लोगों के लिए पौष्टिक खाना और दूध तो बहुत दूर की बात है, दो वक्त की सूखी रोटी जुटाना भी एक बहुत बड़ी जंग जैसा बना हुआ है।  UN के सॉफ्ट स्टैंड पर भड़के वैज्ञानिक हैरान करने वाली बात ये है कि पर्यावरण के ऊपर मंडरा रहे इतने बड़े खतरे के बावजूद यूएन की संस्था एफएओ (FAO) ने अमीर देशों को मीट की खपत कम करने की कोई सीधी या सख्त सलाह नहीं दी. इसके बजाय, यूएन ने बहुत ही ‘सॉफ्ट’ स्टैंड लेते हुए गोलमोल बातें कीं. उन्होंने कहा कि खेती के तरीकों को थोड़ा बेहतर बनाया जाए, खाना बर्बाद होने से रोका जाए और नई-नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पशुपालन से होने वाले प्रदूषण को कम किया जाए।  यूएन के इस ढुलमुल रवैए ने दुनिया भर के बड़े वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों को भड़का दिया है और वे इसकी कड़ी आलोचना कर रहे हैं. वैज्ञानिकों का साफ और दोटूक शब्दों में कहना है कि अगर अमीर देश मांस खाना थोड़ा कम कर दें और ‘प्लांट-बेस्ड डाइट’ की तरफ वापस लौटें, तो क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वॉर्मिंग के इस बड़े खतरे को बहुत आसानी से और बहुत जल्दी टाला जा सकता है। 

रायगढ़ जिला के 2,705 परिवार हुए बिजली बिल से मुक्त

रायपुर प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना छत्तीसगढ़ में हरित विकास और ऊर्जा आत्मनिर्भरता का नया पर्याय बन चुकी है। मुख्यमंत्री  विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे व्यापक जागरूकता अभियानों के फलस्वरूप प्रदेश में सौर ऊर्जा को लेकर भारी उत्साह है। इस महा-अभियान में रायगढ़ जिला उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर पूरे प्रदेश में अग्रणी बनकर उभरा है। रायगढ़ जिले में अब तक 2,705 परिवारों के घरों की छतों पर सोलर रूफटॉप संयंत्र (Solar Rooftop) सफलतापूर्वक स्थापित किए जा चुके हैं, जिससे ये परिवार पूरी तरह ऊर्जा आत्मनिर्भर हो गए हैं।  रायगढ़ जिले की उपलब्धियां            रायगढ़ जिले में स्थापित 2,705 सोलर संयंत्रों की कुल क्षमता 11,504 किलोवाट से अधिक है। इनसे प्रतिदिन लगभग 46 हजार यूनिट तथा प्रतिमाह करीब 13.80 लाख यूनिट हरित बिजली का उत्पादन हो रहा है। इससे उपभोक्ताओं की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता भी कम हो रही है। बढ़ता जनविश्वास          योजना के तहत अब तक कुल 6,701 आवेदन प्राप्त हुए हैं। केवल मई माह में ही 912 नए आवेदन मिले, जिनमें से 411 घरों में सोलर प्लांट लगाए जा चुके हैं। जिले में हर हफ्ते औसतन 228 नए आवेदन आ रहे हैं और 100 से अधिक घरों में नियमित रूप से सोलर पैनल स्थापित किए जा रहे हैं।  भीषण गर्मी में उपभोक्ताओं को बड़ी राहत          गर्मी के इस मौसम में जब एयर कंडीशनर और कूलर के चलने से बिजली की मांग और बिल दोनों बढ़ जाते हैं, तब यह योजना आम उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा कवच साबित हो रही है। योजना से जुड़े परिवार अपनी जरूरत की अधिकांश बिजली खुद बना रहे हैं, जिससे उनका मासिक बिजली का खर्च (बिल) नगण्य हो गया है। सब्सिडी और बिजली उत्पादन का गणित विद्युत विभाग के अनुसार केंद्र और राज्य सरकार के समन्वय से उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ को न्यूनतम कर दिया गया है। पात्र हितग्राहियों को 1 लाख 8 हजार रुपये तक की सब्सिडी दी जा रही है। सोलर प्लांट लगाने के लिए बैंकों के माध्यम से आसान लोन की व्यवस्था भी है। क्षमता और उत्पादन  1 किलोवाट के सोलर संयत्र प्लांट सेे प्रतिमाह लगभग 120 यूनिट बिजली उत्पादन हो रहा है। इसी प्रकार 2 किलोवाट के सोलर संयत्र प्लांट से प्रतिमाह लगभग 240 यूनिट बिजली उत्पादन और 3 किलोवाट के सोलर संयत्र प्लांट से प्रतिमाह लगभग 360 यूनिट बिजली उत्पादन हो रहा है।  आवेदन की प्रक्रिया हुई बेहद सरल और पारदर्शी         प्रधानमंत्री सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना को पूरी तरह ऑनलाइन और बिचौलियों से मुक्त रखा गया है। इच्छुक नागरिक निम्नलिखित माध्यमों से आसानी से आवेदन कर सकते हैं। पीएम सूर्यघर पोर्टल (PM Surya Ghar Portal)  या मोबाइल ऐप,  CSPDCL की विभागीय डिजिटल सेवा से या टोल-फ्री नंबररू उपभोक्ता 1912 पर कॉल करके सहायता ले सकते हैं। ऑनलाइन प्रक्रिया के तहत उपभोक्ता अपनी मर्जी से अधिकृत वेंडर चुन सकते हैं। सौर ऊर्जा का यह बढ़ता कारवां न केवल रायगढ़ बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ को स्वच्छ, प्रदूषण-मुक्त और हरित भविष्य की ओर ले जा रहा है। यह योजना आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को जमीनी धरातल पर सच कर रही है।

भारत में बढ़ा इलेक्ट्रिक वाहनों का क्रेज, Tata Motors की रिकॉर्ड बिक्री ने सबको चौंकाया

 नई दिल्ली भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार बढ़ रहा है. साल-दर-साल… महीने-दर-महीने कंपनियों की सेल पहले से बेहतर हो रही हैं. ये सिलसिला दिखा रहा है कि लोग अब इलेक्ट्रिक गाड़ियों को स्वीकार कर रहे हैं. मई 2026 में सभी कंपनियों की मिलाकर 25,880 इलेक्ट्रिक कारें रजिस्टर हुई हैं।   यानी इतने लोगों ने इलेक्ट्रिक कारों को खरीदा है. पिछले साल मई के मुकाबले ग्रोथ 80.7 फीसदी की है. मई 2025 में सभी कंपनियों की कुल सेल 14,323 यूनिट्स तक ही पहुंच पाई थी. इलेक्ट्रिक कारों की सेल में ये ग्रोथ सिर्फ ईयर-ऑन-ईयर ही नहीं बल्कि मंथ-ऑन-मंथ भी है।  पिछले महीने यानी अप्रैल 2026 में भारतीय बाजार में कुल 24,753 इलेक्ट्रिक कारें बिकी थीं. मंथ-ऑन-मंथ इस सेगमेंट में 4.6 फीसदी की ग्रोथ है. आइए जानते हैं भारती बाजार में किस कंपनी ने कितनी इलेक्ट्रिक कारों को बेचा है।  टॉप पर टाटा मोटर्स सबसे पहले बात करते हैं, टाटा मोटर्स की जिसने मई 2026 में रिकॉर्ड बिक्री की है. टाटा मोटर्स के लिए मई का महीना शानदार रहा है. कंपनी ने पहली बार 10 हजार यूनिट्स की सेल का आंकड़ा पार किया है. मई महीने में टाटा मोटर्स ने सबसे ज्यादा इलेक्ट्रिक कारों को बेचा है. कंपनी ने कुल 10,339 यूनिट्स बेची है, जो पिछले साल मई में सिर्फ 5,083 यूनिट्स थी. कंपनी की ग्रोथ 103.4 फीसदी है।  वहीं महिंद्रा की बात करें, तो कंपनी इलेक्ट्रिक कारों के बाजार में दूसरा सबसे बड़ा ब्रांड है. कंपनी ने मई 2026 में 6,210 कारों को बेचा है. वहीं मई 2025 में कंपनी की इलेक्ट्रिक व्हीकल सेल 3,131 यूनिट्स थी. अप्रैल 2026 की बात करें, तो कंपनी ने 5,864 कारें बेची थीं।  रफ्तार भरती मारुति सुजुकी  एमजी मार्केट का तीसरा बड़ा प्लेयर है, जिसने मई 2026 में 4,985 कारों को बेचा है. पिछले साल कंपनी ने 4,599 यूनिट्स बेची थी, जबकि अप्रैल 2026 में कंपनी ने 5,420 यूनिट्स को बेचा था. मारुति सुजुकी तेजी से इस लिस्ट में ऊपर आया है. कंपनी के पास सिर्फ एक इलेक्ट्रिक कार है, जिसकी मई में 1,591 यूनिट्स बिकी हैं।  भारत में नई कंपनी होने के बाद भी विनफास्ट बेहतर परफॉर्म कर रही है. कंपनी ने मई 2026 में 1,238 कारों को बेचा है. अप्रैल 2026 में कंपनी ने 1,290 कारें बेची थीं. चीनी ब्रांड बीवाईडी की सेल अभी भी एक हजार यूनिट्स से कम है. कंपनी ने मई में 686 यूनिट्स को बेचा है।  इनके अलावा हुंडई ने 460 इलेक्ट्रिक कारों को मई 2026 में बेचा है. पिछले साल मई में कंपनी ने 719 कारें बेची थीं, जबकि अप्रैल 2026 में कंपनी ने 559 कारें बेची थीं. वहीं किआ मोटर्स ने 349 इलेक्ट्रिक कारों को बेचा है. वहीं सिट्रोएन की इलेक्ट्रिक कारों का आंकड़ा 22 पर ही सिमट गया है. पिछले साल कंपनी ने 129 कारों को बेचा था। 

समंदर किनारे नायरा बनर्जी का बोल्ड अवतार, बिकिनी में शेयर की तस्वीरें; फैंस बोले- ‘कमाल कर दिया’

मुंबई  मशहूर टीवी एक्ट्रेस और बिग बॉस फेम नायरा बनर्जी स्क्रीन पर भले ही कई संस्कारी रोल में नजर आ चुकी हैं. मगर रियल लाइफ में वो काफी बोल्ड और बिंदास हैं। नायरा बनर्जी ने अब बिकिनी में अपनी सुपर सिजलिंग तस्वीरें शेयर की हैं, जिन्हें देखकर किसी की भी धड़कनें तेज हो सकती हैं। ब्लैक प्लोरल प्रिंटेड बिकिनी में एक्ट्रेस समंदर में नहाती हुई दिखाई दे रही हैं. उन्होंने भीगी जुल्फें लहराकर कई किलर पोज दिए।                बिकिनी पहने बीच पर नायरा जलवे बिखेरती नजर आईं. ओपन हेयर और सटल मेकअप में वो डीवा लग रही हैं। नायरा ने अपनी बिकिनी फोटोज के साथ कैप्शन में लिखा- संभालना मुश्किल नहीं, पर भूलना नामुमकिन है. रेड फ्लैग या रिलेशनशिप गोल? नायरा का फैशन सेंस हमेशा ऑन पॉइंट रहता है. एक्ट्रेस के एक्सप्रेशन्स, अदाएं और बिंदास एटीट्यूड देखते ही बनता है। नायरा बनर्जी सोशल मीडिया पर अक्सर अपनी ग्लैमरस तस्वीरें शेयर करती रहती हैं और उनकी लेटेस्ट बिकिनी फोटोज इंटरनेट पर जमकर वायरल हो रही हैं।          नायरा के बोल्ड बिकिनी लुक पर फैंस दिल हार रहे हैं. कमेंट सेक्शन में फैंस उनकी तारीफ करते थक नहीं रहे हैं।नायरा की बात करें तो वो टीवी की जानी-मानी एक्ट्रेस हैं. वो 'दिव्य दृष्टि', 'पिशाचिनी' में नजर आ चुकी हैं. नायरा ने रियलिटी शोज खतरों के खिलाड़ी और बिग बॉस भी किया है।  अब नायरा ने अपने बोल्ड बिकिनी लुक से हर किसी को अपना दीवाना बना दिया है. एक्ट्रेस का बिकिनी लुक आपको कैसा लगा?  

रेत माफियाओं पर प्रशासन का सख्त प्रहार अवैध उत्खनन में लगी पोकलेन मशीन जब्त, प्रदेशभर में निगरानी तेज

रायपुर  रेत माफियाओं के खिलाफ छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में प्रशासन का रुख बेहद सख्त हो गया है। अवैध उत्खनन, परिवहन और राजस्व की चोरी पर  अंकुश लगाने के लिए जिला प्रशासन, पुलिस और खनिज विभाग द्वारा लगातार ताबड़तोड़ छापेमार कार्रवाई की जा रही है। इसी कड़ी में रायगढ़ जिले के खरसिया विकासखंड अंतर्गत ग्राम बड़े डूमरपाली में अवैध रेत उत्खनन के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई की गई है। कलेक्टर के निर्देश पर खनिज विभाग ने मौके से एक चौन माउंटेड पोकलेन मशीन को जब्त कर सील कर दिया है।  शिकायत पर त्वरित एक्शनः मौके पर पकड़ाया अवैध खनन             खनिज विभाग के अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार रायगढ़ जिले के बड़े डूमरपाली निवासी यशवंत डडसेना द्वारा नदी क्षेत्र में पोकलेन मशीन लगाकर अवैध रूप से रेत निकालने और उसके परिवहन की लगातार शिकायतें मिल रही थीं। शिकायत की सत्यता जांचने के लिए खनि निरीक्षक और खनिज उड़नदस्ता दल ने संयुक्त रूप से औचक छापा मारा। मौके पर अवैध खनन में संलिप्त पोकलेन मशीन को जब्त किया गया और कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर उसे ग्राम सरपंच की सुपुर्दगी में सौंप दिया गया। कड़े कानूनों के तहत मामला दर्ज            प्रशासन ने पर्यावरण और राजस्व को नुकसान पहुंचाने वाले वाहन मालिक के खिलाफ सख्त कानूनी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियम, 2015 के नियम 71, खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 की धारा 21 एवं 23(क) की इन धाराओं के तहत वाहन मालिक के विरुद्ध प्रकरण दर्ज कर आगे की दंडात्मक कार्रवाई की जा रही है। आधुनिक तकनीक और उड़नदस्ता दलों से प्रदेशव्यापी निगरानी            खनिज विभाग ने साफ किया है कि यह कार्रवाई किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। राज्य सरकार के निर्देशानुसार पूरे प्रदेश में अवैध उत्खनन, अवैध परिवहन और अवैध भंडारण के खिलाफ एक व्यापक अभियान चलाया जा रहा है।  खनजिों के अवैध उत्खनन, परिवहन और राजस्व की चोरी को रोकने के लिए प्रशासन द्वारा अब आधुनिक तकनीक, स्थानीय खुफिया इनपुट और मुस्तैद उड़नदस्ता दलों का सहारा लिया जा रहा है।  पर्यावरण संरक्षण और राजस्व की सुरक्षा सर्वाेपरि          अधिकारियों ने बताया कि अनियंत्रित और अवैध रेत उत्खनन से न केवल नदियों का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होता है, बल्कि भूजल स्तर गिरने से पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ता है। ऐसे में प्रशासन की यह कार्रवाई खनिज संपदा की रक्षा के साथ-साथ प्रकृति और सरकारी राजस्व को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है। खनिज विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि प्रदेश में कहीं भी खनिजों के अवैध दोहन, परिवहन या भंडारण में संलिप्त पाए जाने वाले लोगों को कतई बख्शा नहीं जाएगा। आने वाले दिनों में यह जांच अभियान और अधिक आक्रामक और प्रभावी ढंग से जारी रहेगा।

RBI रिपोर्ट ने खोली पोल, बाजार में पैसा भरपूर लेकिन ATM में नहीं मिल रहा कैश; इंडस्ट्री परेशान

 नई दिल्‍ली ऑनलाइन पेमेंट आने के बाद और यूपीआई का चलन बढ़ने के बाद से ही पिछले कुछ सालों में कैश को लेकर परेशानी बढ़ गई है. भारतीय रिजर्व बैंक के नए आंकड़ों ने कई बड़े खुलासे किए हैं, जिसके अनुसार 29 मई 2026 तक चलन में कैश 42.56 लाख करोड़ रुपये से अधिक थी. यह पिछले साल की तुलना में 12 फीसदी की बढ़ोतरी है. इसके बावजूद कुछ एटीएम मशीनों में कैश की कमी होती दिख रही है. लोगों को कैश निकालने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है।    एटीएम ऑपरेटरों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था, एटीएम उद्योग परिसंघ (CATMi) ने भारतीय बैंक संघ (IBA) को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि एटीएम में कैश भरने के लिए उपलब्ध कैश  में कमी आ रही है. लेटर में कहा गया है कि नवंबर 2025 में कैश आपूति 80 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि 20 फीसदी की कमी थी।  यह कमी लगातार बढ़ रही है, जो मार्च 2026 में 36 फीसदी और अप्रैल में 43 फीसदी थी. आसान शब्‍दों में कहें तो ATM ऑपरेटरों को अप्रैल में अपनी कैश जरूरतों का सिर्फ 57 फीसदी ही मिला. लेटर में कहा गया है कि दिसंबर 225 के अंत से, हमारे सदस्‍यों को कई राज्‍यों में बैंक ब्रांचेज और करेंसी चेस्‍ट से ATM में कैश डालने में लगातार परेशानियां छेलनी पड़ रही है।    क्‍यों घट रहा एटीएम में कैश?  एटीएम से निकासी में गिरावट आई है. CATMi के अनुसार, मासिक एटीएम निकासी जनवरी 2023 में लगभग 57 करोड़ से घटकर सितंबर 2025 तक लगभग 44 करोड़ हो गई है. डिजिटल भुगतान, खासकर यूपीआई की बढ़ती संख्‍या इस गिरावट का मुख्‍य कारण बताया जा रहा है।    CATMi ने कहा कि वर्तमान एटीएम कॉन्‍ट्रैक्‍ट्स 2.5 प्रतिशत से 3.0 प्रतिशत प्रति साल की मामूली गिरावट पर आधारित थे, जिसे सीपीआई से जुड़ी वृद्धि द्वारा समायोजित किया जाना था. वास्तविक स्थिति इससे बिल्कुल अलग है. इसने यह भी बताया कि कस्‍टमर द्वारा फ्री लिमिट से अधिक एटीएम उपयोग के लिए भुगतान किया जाने वाला शुल्क बढ़ गया है, इसने अधिक लोगों को डिजिटल की ओर धकेल दिया है, जिससे गिरावट तेज हो गई है और ऑपरेटरों के राजस्व में कमी आ रही है।     एटीएम ऑपरेट करने की कॉस्‍ट बढ़ी  उद्योग के जानकारों का यह भी कहना है कि बढ़ती लागत ऑपरेटरों पर दबाव बढ़ा रही है. इसमें परिवहन की कुल लागत, ईंधन, साथ ही सुरक्षा गार्डों और अन्य कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन शामिल हैं. विनिमय लागत (यह वह राशि है जो एक बैंक दूसरे बैंक को तब देता है जब कोई ग्राहक एक बैंक के डेबिट कार्ड का उपयोग दूसरे बैंक के एटीएम में करता है) से परिचालन लागत के कुछ हिस्से की भरपाई होने की उम्मीद थी, लेकिन उनका कहना है कि 19 रुपये से 21 रुपये तक की 2 रुपये की वृद्धि बढ़ती लागतों की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं रही है।    आरबीआई गवर्नर ने क्‍या कहा?  कैश संकट के बारे में पूछे जाने पर, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने शुक्रवार को कहा कि वे हर साल करेंसी की आवश्यकता का एक प्लान बनाते हैं और आवश्यकतानुसार बैंकों को उपलब्ध कराते हैं. उन्होंने कहा कि अगर कहीं भी नकदी की कमी होती है, तो वे यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि नकदी शीघ्रता से उपलब्ध कराई जाए।    मॉनिटरी पॉलिसी की घोषणा के बाद हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि हम यह सुनिश्चित करेंगे कि नकदी की कमी होने पर हमारे पास एटीएम और बैंक शाखाओं को भरने और फिर से भरने के लिए पर्याप्त पैस हो. डिजिटल भुगतान आम होने के कारण, विशेषकर बड़े शहरों में रहने वाले लोग एटीएम में नकदी खत्म होने की स्थिति में शायद ज्यादा चिंतित न हों।  हालांकि, सरकार से डायरेक्‍ट बेनिफिट मिलने वाले लोगों को नकदी की कमी का असर महसूस हो सकता है क्योंकि उनके शहर के एटीएम में पर्याप्त नकदी न हो. कई वरिष्ठ नागरिक अभी भी अपनी दैनिक जरूरतों के लिए नकदी निकालते हैं. छोटे व्यापारी भी आमतौर पर नकदी लेनदेन पर निर्भर रहते हैं. CATMi ने सदस्य बैंकों से एटीएम में नकदी की विश्वसनीय बनाए रखने और बैंकों से इस मुद्दे को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए कहा है। 

पॉलीमर नोटों पर चल रहा विचार, लेकिन अभी अंतिम फैसला नहीं; RBI गवर्नर ने साफ की स्थिति

मुंबई  भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने देश की मुद्रा को लेकर एक बहुत बड़ी जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि आरबीआई भारत में प्लास्टिक यानी पॉलीमर के नोट चलाने के विचार पर काम कर रहा है. हालांकि, गवर्नर ने यह साफ किया कि यह योजना अभी बिल्कुल शुरुआती दौर में है और इस पर कोई आखिरी फैसला नहीं लिया गया है. बैंक अभी इसके हर फायदे और नुकसान की अच्छे से जांच कर रहा है।  पहले क्यों नहीं चल पाए थे प्लास्टिक के नोट? भारत में प्लास्टिक के नोट चलाने की कोशिश पहले भी हो चुकी है. साल 2014 के आसपास सरकार ने देश के पांच शहरों—जयपुर, शिमला, भुवनेश्वर, मैसूर और कोच्चि में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का एक छोटा सा टेस्ट (ट्रायल) किया था. लेकिन उस समय यह तरीका सफल नहीं हो पाया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि देश के ATM और बैंकों की नोट गिनने वाली मशीनें केवल कागजी नोटों के हिसाब से बनी थीं. प्लास्टिक के नोटों की वजह से मशीनें बार-बार जाम होने लगीं. साथ ही, भारत की तेज गर्मी में इन नोटों के आपस में चिपकने और सिकुड़ने का डर भी था. इसी वजह से तब इस काम को रोक दिया गया था. अब आरबीआई इन सभी पुरानी कमियों को दूर करने की तैयारी कर रहा है।  क्या होते हैं पॉलीमर नोट और इनके क्या फायदे हैं? प्लास्टिक या पॉलीमर नोट किसी कड़क प्लास्टिक कार्ड (जैसे एटीएम कार्ड) की तरह नहीं होते. ये एक खास तरह के बहुत पतले और लचीले प्लास्टिक (BOPP) से बनते हैं. इन्हें आप आम कागजी नोटों की तरह ही आसानी से मोड़कर जेब या पर्स में रख सकते हैं. इन नोटों के कई बड़े फायदे हैं:     ज्यादा मजबूती: ये नोट पानी या पसीने से गलते नहीं हैं और आसानी से फटते भी नहीं हैं. इसलिए ये बहुत लंबे समय तक चलते हैं।      गंदगी का असर नहीं: इन नोटों पर धूल, मिट्टी या पानी का असर नहीं होता, जिससे ये गंदे और काले नहीं पड़ते।      नकली नोटों पर रोक: प्लास्टिक के नोटों पर ऐसे सुरक्षा घेरे (सिक्योरिटी फीचर्स) लगाए जा सकते हैं, जिनकी नकल करना नामुमकिन होता है. इससे देश में नकली नोटों का धंधा पूरी तरह बंद हो जाएगा।      पैसों की बचत: हालांकि इन्हें छापने का शुरुआती खर्च ज्यादा होता है, लेकिन लंबे समय तक चलने के कारण बार-बार नए नोट छापने का सरकारी खर्च बच जाता है।  दुनिया के कई देशों में है यह व्यवस्था दुनिया में सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने साल 1988 में प्लास्टिक के नोटों का इस्तेमाल शुरू किया था. आज के समय में ब्रिटेन (यूके), कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया और थाईलैंड समेत दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में प्लास्टिक के नोट बहुत कामयाबी से चल रहे हैं. आरबीआई गवर्नर ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि इस नए बदलाव के दौरान देश में पैसों की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। 

पंजाब भाजपा में बदलाव की बयार, नए चेहरे के साथ बदला 2027 चुनाव का पूरा गेमप्लान

चंडीगढ़  पंजाब भाजपा में प्रदेशाध्यक्ष बदलने का फैसला केवल संगठनात्मक फेरबदल नहीं माना जा रहा। सुनील जाखड़ की जगह केवल सिंह ढिल्लों को कमान सौंपने को पार्टी की चुनावी दिशा में बदलाव और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक पुनर्संतुलन की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक रूप से यह फैसला ऐसे समय आया है जब पंजाब की राजनीति अपने सबसे दिलचस्प दौर में प्रवेश कर रही है।सत्ता में आम आदमी पार्टी (आप) सरकार अब शासन के मूल्यांकन के दौर में है। कांग्रेस नेतृत्व और संगठन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में है। शिरोमणि अकाली दल (शिअद) अपने पुराने प्रभाव को फिर से खड़ा करने की लड़ाई लड़ रहा है। इसी बीच भाजपा ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसने साफ कर दिया कि वह अब पंजाब में केवल उपस्थिति नहीं, हिस्सेदारी बढ़ाने की राजनीति करना चाहती है। प्रदेशाध्यक्ष बदलने के इस फैसले को समझने के लिए केवल व्यक्तियों को नहीं, बल्कि पंजाब की बदलती राजनीति को पढ़ना होगा। प्रदेशाध्यक्ष बदलकर भाजपा ने केवल अपने कार्यकर्ताओं को संदेश नहीं दिया है। यह कदम विपक्षी दलों के लिए भी संकेत माना जा रहा है। कांग्रेस के सामने अब अपना पारंपरिक सामाजिक आधार बचाए रखने की चुनौती होगी। आप को सत्ता विरोधी माहौल को संभालना होगा। वहीं अकाली दल के लिए यह संकेत है कि भाजपा अब पुराने गठबंधन वाले ढांचे में लौटने के बजाय स्वतंत्र विस्तार की राह पर भी आगे बढ़ रही है। फिलहाल इतना साफ दिखाई देता है कि पंजाब भाजपा ने प्रदेशाध्यक्ष बदलकर केवल नया चेहरा नहीं चुना। उसने 2027 की लड़ाई के लिए अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं तय कर दी हैं। अब असली सवाल यह नहीं कि ढिल्लों अध्यक्ष के तौर पर कितने सफल होंगे। सवाल यह भी है कि क्या भाजपा पंजाब में अपनी राजनीतिक पहचान की नई परिभाषा को गढ़ पाएगी। केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेशाध्यक्ष बनाना पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती से निपटने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा को पहली बार यह समझ आया कि पंजाब में स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनने के लिए उसे अपने सामाजिक आधार का विस्तार करना होगा। –-राजनीतिक खालीपन को पढ़ रही भाजपा पंजाब की राजनीति में लंबे समय तक अकाली दल सिख नेतृत्व और ग्रामीण सामाजिक आधार का सबसे बड़ा केंद्र रहा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई है और भाजपा शायद इसी बदलते परिदृश्य को अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी चाहती है कि सिख समाज का एक हिस्सा उसे भी राजनीतिक विकल्प के रूप में देखना शुरू करे। इसी वजह से ढिल्लों का चयन केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और प्रतीकात्मक राजनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है। –भाजपा के लिए अस्तित्व नहीं, विस्तार की परीक्षा आने वाला विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए केवल सीटों का मुकाबला नहीं होगा। यह चुनाव तय करेगा कि पार्टी पंजाब में गठबंधन आधारित राजनीति से आगे निकलकर स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बन पाती है या नहीं। भाजपा के सामने चुनौती कई स्तरों पर है। उसे अपना शहरी आधार बनाए रखना होगा। सिख मतदाताओं में भरोसा बनाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन खड़ा करना होगा और राज्य के वास्तविक मुद्दों को अपने राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना होगा।

बंदूक छोड़ विकास की राह पर बढ़े युवा, सुकमा में आत्मसमर्पण के बाद बदल रही जिंदगी की तस्वीर

जब बंदूक छूटी, तो हाथों में आया सुनहरा भविष्य :  सुकमा में आत्मसमर्पित युवाओं की जिंदगी लिख रही विकास की नई कहानी जिन हाथों में कभी हथियार थे, अब वे बनाएंगे गरीबों के आशियाने सोड़ी हूंगी और पदम रैनू जैसे युवाओं के जीवन में लौटी उम्मीद, हुनर ने दिया सम्मान से जीने का नया आधार सुकमा में पुनर्वास की अनूठी पहल बनी राष्ट्रीय मिसाल, 280 से अधिक आत्मसमर्पित युवाओं को मिला रोजगार का रास्ता रायपुर, बस्तर की पहचान लंबे समय तक संघर्ष, भय और नक्सल हिंसा के साये से जुड़ी रही है। सुकमा जैसे जिले के घने जंगलों में ऐसी कई पीढ़ियां बड़ी हुईं, जिन्होंने विकास से ज्यादा बंदूक की आवाज सुनी, स्कूल से ज्यादा भय देखा और सपनों से ज्यादा संघर्षों का सामना किया। लेकिन आज उसी सुकमा से एक ऐसी कहानी निकलकर सामने आ रही है, जो केवल बदलाव की नहीं, बल्कि उम्मीद और विश्वास की कहानी है। यह कहानी उन युवाओं की है, जिन्होंने कभी हिंसा का रास्ता चुना था, लेकिन आज वे अपने हाथों में निर्माण के औजार लेकर समाज के विकास में भागीदार बनने की तैयारी कर रहे हैं। यह कहानी उन बेटियों की है, जिन्होंने जंगलों की अनिश्चित जिंदगी छोड़कर आत्मनिर्भरता का रास्ता चुना है। यह कहानी उस प्रशासनिक संवेदनशीलता की है, जिसने आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं को केवल मुख्यधारा में लौटने का अवसर नहीं दिया, बल्कि उन्हें सम्मान के साथ जीने का नया आधार भी दिया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा संचालित पुनर्वास और कौशल विकास कार्यक्रम के तहत जिला प्रशासन सुकमा और एसबीआई आरसेटी के संयुक्त प्रयासों से 25 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इनमें 13 महिलाएं और 12 पुरुष शामिल हैं। यह प्रशिक्षण केवल रोजगार देने का माध्यम नहीं, बल्कि जिंदगी को नए सिरे से गढ़ने का अवसर बन गया है। जंगलों की खामोशी से निर्माण स्थलों की रौनक तक इन युवाओं का अतीत संघर्षों से भरा रहा है। जंगलों में बिताए वर्षों ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में जीना सिखाया, लेकिन भविष्य के सपने देखने का अवसर नहीं दिया। आज जब वे प्रशिक्षण केंद्र में ईंट जोड़ना, दीवार खड़ी करना और मकान बनाना सीख रहे हैं, तब वे केवल भवन निर्माण नहीं सीख रहे, बल्कि अपनी टूटी हुई उम्मीदों को भी फिर से जोड़ रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें आधुनिक निर्माण तकनीक, माप-जोख, चिनाई, प्लास्टर और भवन निर्माण के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी जा रही है। आने वाले समय में यही युवा प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) सहित विभिन्न निर्माण कार्यों में अपनी भूमिका निभाएंगे। जिन हाथों में कभी हथियार थे, वही हाथ अब किसी गरीब परिवार के सपनों का घर खड़ा करेंगे। सोड़ी हूंगी : अब जिंदगी में डर नहीं, सपनों की जगह है कोंटा क्षेत्र के अरलमपल्ली गांव की रहने वाली सोड़ी हूंगी उन महिलाओं में शामिल हैं, जिनके जीवन ने यह साबित किया है कि अवसर मिले तो परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, बदलाव संभव है। हूंगी बताती हैं कि एक समय ऐसा था जब जीवन में हर दिन अनिश्चितता थी। लेकिन आत्मसमर्पण के बाद प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा, सम्मान और सीखने का अवसर दिया। आज वे राजमिस्त्री का प्रशिक्षण ले रही हैं और अपने भविष्य को लेकर उत्साहित हैं। उनकी आंखों में आत्मविश्वास झलकता है जब वे कहती हैं, अब हम किसी पर बोझ नहीं रहेंगे। अपने हाथों की मेहनत से कमाएंगे और परिवार का सहारा बनेंगे। हूंगी जैसी कई महिलाओं के लिए यह प्रशिक्षण केवल रोजगार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वतंत्र पहचान का माध्यम बन गया है। ’पदम रैनू: ‘सरकार ने हमें भटकने से बचाया’ जगरगुंडा के मंडीमरका गांव के निवासी ’पदम रैनू’ की कहानी भी उतनी ही भावुक और प्रेरणादायक है। जंगलों में बीते वर्षों को याद करते हुए वे कहते हैं कि वहां जीवन केवल संघर्ष और अनिश्चितता का पर्याय था। न रहने का ठिकाना, न भविष्य की कोई गारंटी। हर दिन नई चिंता होती थी। लेकिन आज हमें रहने की सुविधा मिली है, सीखने का अवसर मिला है और सबसे बड़ी बात यह कि सम्मान मिला है। सरकार ने हमें भटकने से बचाया और जीने का नया रास्ता दिखाया। पदम की यह बात केवल उनकी व्यक्तिगत भावना नहीं, बल्कि उन सैकड़ों युवाओं की आवाज है, जिनके जीवन में पुनर्वास योजनाओं ने नया विश्वास पैदा किया है। एक पहल जिसने बदल दी दो तस्वीरें जिला प्रशासन की यह पहल केवल आत्मसमर्पित युवाओं के पुनर्वास तक सीमित नहीं है। इसका सकारात्मक प्रभाव जिले के विकास पर भी दिखाई दे रहा है। सुकमा के अनेक दूरस्थ क्षेत्रों में लंबे समय से कुशल राजमिस्त्रियों की कमी महसूस की जाती रही है। इससे प्रधानमंत्री आवास योजना और अन्य निर्माण कार्यों की गति प्रभावित होती थी। अब प्रशिक्षित युवा न केवल अपने लिए रोजगार का रास्ता बना रहे हैं, बल्कि जिले के विकास कार्यों को भी नई गति देने वाले हैं। इस प्रकार एक ही पहल ने दो बड़े लक्ष्य साध लिए हैं, एक ओर युवाओं को सम्मानजनक जीवन का अवसर मिला, दूसरी ओर विकास कार्यों को स्थानीय स्तर पर कुशल मानव संसाधन प्राप्त हुआ। 280 से अधिक युवाओं की जिंदगी में आया बदलाव कलेक्टर अमित कुमार बताते हैं कि आत्मसमर्पण केवल हथियार छोड़ने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि व्यक्ति को समाज का जिम्मेदार और आत्मनिर्भर नागरिक बनाने की यात्रा है। इसी सोच के साथ अब तक लगभग 280 आत्मसमर्पित युवाओं को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। प्रशासन का लक्ष्य है कि पुनर्वासित युवाओं को ऐसा कौशल मिले, जिससे वे स्थायी रोजगार प्राप्त कर सकें और समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। यही कारण है कि प्रशिक्षण के साथ-साथ उनके सामाजिक और आर्थिक पुनर्स्थापन पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बदलते बस्तर की नई पहचान आज सुकमा की यह कहानी केवल सरकारी योजना की सफलता नहीं है। यह उस विश्वास की जीत है, जो कहता है कि हर व्यक्ति को दूसरा अवसर मिलना चाहिए। यह उस संवेदनशील शासन व्यवस्था की कहानी है, जिसने भटके हुए युवाओं में भी संभावनाएं देखीं। यह उस बदलते बस्तर की कहानी है, जहां अब विकास की चर्चा होती है, रोजगार की बात होती है और सपनों को सच करने की कोशिश होती है। कभी जिन पगडंडियों पर भय … Read more

गोल्ड वैल्यू में बड़ी गिरावट से बढ़ी चर्चा, RBI ने साफ किया- रिजर्व का सोना सुरक्षित है

नई दिल्‍ली भारतीय रिजर्व बैंक के गोल्‍ड रिजर्व वैल्‍यू में गिरावट आई है. यह वैल्‍यू 2 अरब डॉलर से ज्‍यादा कम हो चुका है. RBI के नए वीकली रिपोर्ट में 29 मई, 2026 को समाप्त सप्ताह के दौरान उसके सोने के भंडार की वैल्‍यू में 2.19 अरब डॉलर की गिरावट आई है।  इस गिरावट से बाजार में यह अटकलें लगने लगीं कि RBI ने अपने सोने के भंडार का कुछ हिस्‍सा बेच दिया होगा, लेकिन गवर्नर संजय मल्‍होत्रा ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केंद्रीय बैंक का गोल्‍ड रिजर्व बरकरार है, बल्कि इसमें मामूली बढ़ोतरी हुई है।  RBI के आंकड़ों के अनुसार, 29 मई तक गोल्‍ड रिजर्व की वैल्‍यू 112.60 अरब डॉलर थी. इसी सप्ताह के दौरान, फॉरेन करेंसी असेट (भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा घटक) में 3.12 अरब डॉलर की बढ़ोतरी देखी गई और यह बढ़कर 546.15 अरब डॉलर हो गया. गोल्‍ड रिजर्व की रिपोर्ट किए गए वैल्‍यू में गिरावट के बावजूद, विदेशी मुद्रा परिसंपत्ति में बढ़ोतरी ने देश की पूरी रिजर्व स्थिति को मजबूत करने में मदद की।  सोने के भंडार में गिरावट?  RBI ने स्पष्ट किया कि सोने के भंडार में गिरावट खासतौर पर वैल्‍यू में बदलाव के कारण हुई है, न कि कीमती धातु की बिक्री के कारण. सोने के भंडार अमेरिकी डॉलर में दर्ज किए जाते हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजार प्राइस के आधार पर हर सप्ताह इनका वैल्‍यूवेशन किया जाता है. इसी कारण, वैश्विक सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मुद्रा के परिवर्तन भंडार के रिपोर्ट किए गए प्राइस को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं, चाहे केंद्रीय बैंक के पास मौजूद सोने की मात्रा अनचेंज रहे।  शुक्रवार को मॉनेटरी पॉलिसी के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुद्दे पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए मल्होत्रा ​​ने कहा कि ऐसी खबरों का कोई आधार नहीं है जिनमें यह सुझाव दिया गया है कि आरबीआई ने सोना बेचा है. उन्‍होंने  कहा कि नहीं, RBI ने सोना नहीं बेचा है. हमारे सोने के भंडार में मामूली बढ़ोतरी हुई है।  RBI ने ब्लूमबर्ग की रिपोर्टों का खंडन किया यह स्पष्टीकरण ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के एक विश्लेषण के बाद आया है जिसमें सुझाव दिया गया था कि भंडार के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि 22 मई को समाप्त होने वाले दो सप्ताह की अवधि के दौरान लगभग 12 अरब डॉलर वैल्‍यू के सोने की बिक्री हुई, जबकि इसी अवधि में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में वृद्धि हुई. इस विश्लेषण के कारण यह अटकलें लगाई गईं कि वैश्विक बाजार की अनिश्चितता के बीच केंद्रीय बैंक ने रुपये को सहारा देने या अपनी विदेशी मुद्रा स्थिति को मजबूत करने के लिए सोने के भंडार का उपयोग किया होगा।  हालांकि, आरबीआई ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उसके पास मौजूद सोने का फिजिकल रिजर्व 880.52 टन पर अनचेंज है. केंद्रीय बैंक ने इस बात पर जोर दिया कि सोने के भंडार के प्राइस में होने वाले उतार-चढ़ाव को वास्तविक भंडार में होने वाले बदलाव से भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इसमें लाभ और नुकसान भंडार प्रबंधन की एक नियमित प्रक्रिया है।  पीआईबी ने भी खबरों का किया खंडन  सरकार की सूचना जांच एजेंसी, प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) ने भी सोने की बिक्री से जुड़ी खबरों को 'फर्जी' बताया. आरबीआई के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए, पीआईबी ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है. सितंबर 2025 के अंत में कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी 13.92% थी, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 16.70% हो गई और 22 मई 2026 तक और बढ़कर 16.85% हो गई।