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भुसावल-इटारसी रेल रूट पर बढ़ेगी रफ्तार, नई लाइनों से ट्रेनों की लेटलतीफी होगी कम

बुरहानपुर   मध्य प्रदेश से मुंबई जाने वाली ट्रेनें अब इटारसी रूट पर नहीं पिटेंगी, साथ ही साथ अब इस रूट की ट्रेनों की रफ्तार भी बढ़ेगी. दरअसल, भुसावल-इटारसी मुबंई रूट की तीसरी और चौथी लाइन का काम शुरू हो गया है. इस लाइन के बनने से इटारसी जंक्शन पर भी दबाव कम होगा और ट्रेनें तेज रफ्तार से मुंबई रूट पर दौड़ेंगी. मुंबई जाने वाले मध्य प्रदेश के यात्रियों को इससे बड़ी राहत मिलेगी।  देश के सबसे व्यस्त रेल रूटों में से एक है भुसावल-इटारसी रूट मध्य प्रदेश से होकर गुजरा इटारसी-भुसावल रूट देश के सबसे व्यस्ततम रेल रूटों में से एक है. इस रेल रूट से रोजाना 50 नियमित और एक्सप्रेस ट्रेनें गुजरती हैं, जबकि 100 से ज्यादा लंबी दूरी की ट्रेनें गुजरती हैं. वर्तमान में दो लाइनें होने के बावजूद इस रूट पर भारी दबाव होता है. यही वजह है कि केंद्र सरकार द्वारा भुसावल-इटारसी के बीच तीसरी व चौथी लाइन बनाने के कार्य को प्राथमिकता दी गई है।  मुंबई जाने वाली यात्रियों को होगा फायदा मध्य प्रदेश के इटारसी जंक्शन से होते हुए महाराष्ट्र के मुंबई व अन्य शहरों को जाने वाले यात्रियों को इससे फायदा होगा. तीसरी व चौथी लाइन तैयार होने से ट्रेनों का वेटिंग टाइम कम होगा और तकनीकी समस्या आने या किसी अन्य ट्रेन की देरी की वजह से सारी ट्रेनें प्रभावित नहीं होंगी. इससे सीधे तौर पर यात्रियों को फायदा होगा।  तीसरी और चौथी लाइन के लिए काम तेज बुरहानपुर से लगे लालबाग रेलवे स्टेशन से भुसावल-इटारसी रेलखंड पर तीसरी और चौथी रेल लाइन बिछाने की तैयारी शुरू हो गई है. इस रेलवे लाइन में अड़ंगा बन रहे अतिक्रमणों को भी तोड़ने की कार्रवाई शुरू हुो गई है. शनिवार को चिंचाला क्षेत्र में हुए अतिक्रमण को रेलवे, जीआरपी, आरपीएफ सहित जिला प्रशासन ने संयुक्त कार्रवाई को अंजाम देकर तोड़ दिया ह., एसडीएम अजमेर सिंह गौड़, सीएसपी गौरव पाटिल और लालबाग पुलिस, जीआरपी सहित आरपीएफ ने व्यवस्थाओ को संभाला, इस दौरान रेल भूमि की जद में आ रहे मकानों को हटाया गया है।  बुरहानपुर के रेलवे स्टेशन के पास ग्राम चिंचाला में भी रेलवे और जिला प्रशासन की संयुक्त टीम ने रेल भूमि पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू की. इस दौरान अतिक्रमण करने वाले करीब 17 मकानों को तोड़ा गया. रेलवे प्रशासन ने करीब दो महीने पहले ही प्रभावित लोगों को अतिक्रमण हटाने के नोटिस जारी किए थे।  एसडीएम अजमेर सिंह के मुताबिक, '' रेलवे अधिकारियों ने कहा है कि अतिक्रमण की जद में आ रही भूमि खाली होने के बाद जल्द ही तीसरी और चौथी रेल लाइन बिछाने का कार्य शुरू किया जाएगा, इससे रेलवे यातायात को गति मिलेगी, जिन-जिन स्थानों पर अतिक्रमण हुआ है, वहां अतिक्रमण हटाओ मुहीम शुरू हो चुकी है। 

अब और तेज होगा सफर! भारतीय रेलवे ला रहा 220 किमी/घंटा रफ्तार वाली ट्रेनें, सुरक्षा के लिए ब्लैक बॉक्स भी

धनबाद  देश में बुलेट ट्रेन की तैयारियों के बीच रेलवे ने अब 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से सेमी हाई स्पीड ट्रेन दौड़ाने के लिए भी कसरत शुरू कर दी है।आईसीएफ यानी इंटीग्रल रेल फैक्ट्री में 100 वंदे भारत और 50 वंदे भारत स्लीपर के नए रैक का निर्माण होगा। अमृत भारत 3.0 वर्जन पटरी पर उतारने की तैयारी शुरू होगी।साथ ही 220 किमी की स्पीड से फर्राटा भरने वाली सेमी हाई स्पीड ट्रेन के रैक भी विकसित किए जाएंगे। इतना ही नहीं हवाई जहाज की तरह यात्री ट्रेनों में ब्लैक बाक्स भी होंगे। देश के अन्य जोन के साथ पूर्व मध्य रेल में ट्रेनों के मेंटेनेंस को डिजिटाइज किया जाएगा। प्रधान मुख्य यांत्रिक अभियंताओं की इसी सप्ताह होनेवाली पीसीएमई कॉन्फ्रेंस में इन सभी एजेंडा को शामिल किया गया है। रेलवे बोर्ड के संयुक्त निदेशक यांत्रिक-इंजीनियर कोचिंग प्रांजल मिश्रा की ओर से सभी जाेन को पत्र जारी किए जाने के बाद संबंधित जोनल रेलवे ने प्रेजेंटेशन समर्पित कर दिया है। आग लगने से पहले और बाद की हर गतिविधि को कैद करेगा ब्लैक बाक्स हवाई जहाज में ब्लैक बाक्स अत्यंत मजबूत इलेक्ट्रानिक डिवाइस है, जिसका उपयोग विमान दुर्घटना के कारणों एवं अंतिम समय की गतिविधियों का पता लगाने के लिए किया जाता है। इसे विमान हादसे की जांच का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक हिस्सा माना जाता है। ठीक इसी तरह ट्रेनों में लगे आग के लिए फायर डिटेक्शन सिस्टम और फायर डिटेक्शन सप्रेशन सिस्टम के लिए ब्लैक बाक्स लगाए जाएंगे। इससे मजबूत और छेड़छाड़ रहित डाटा लागर तैयार होगा। इसका उद्देश्य घटना की जांच के लिए आग लगने से पहले और बाद की गतिविधियों, सिस्टम को चालू ट्रिगर्स और सिस्टम के कामकाज के जुड़े पैरामीटर को रिकार्ड किया जा सकेगा। वंदे भारत और अमृत भारत में आन बोर्ड कंडीशन मॉनीटरिंग सिस्टम वंदे भारत और अमृत भारत जैसी ट्रेनों में ओबीसीएमएस यानी आन बोर्ड कंडीशन मानीटरिंग सिस्टम अपनाए जाएंगे। यह एक अहम डायग्नोस्टिक तकनीक है जिसकी मदद से ट्रेनों के पहिए व बेयरिंग की सुरक्षा, कार्यक्षमता और रियम टाम हेल्थ मॉनीटरिंग हो सकेगी। इससे दुर्घटनाओं की रोकथाम में काफी हद तक मदद मिलेगी। नए कोचिंग डिपो व पुराने के अपग्रेडेशन के साथ कम समय में मेंटेनेंस नए कोचिंग डिपो, कोचिंग टर्मिनल के निर्माण के साथ पुराने कोचिंग डिपो के अपग्रेडेशन की स्थिति संबंधित जोन के पीसीएमई स्पष्ट करेंगे। रैक मेंटेनेंस को कम समय में करने, स्मार्ट मेंटेनेंस और कर्मचारियों से जुड़ी बेंचमार्किंग पर भी नीतिगत चर्चा होगी। कैरेज एंड वैगन विभाग के कर्मचारियों के लिए दुर्घटना व बेपटरी होने जैसी घटनाओं के लिए ट्रेनिंग माड्यूल तय होगा। गरीब रथ ट्रेनों के रैक के उपयोग पर भी निर्णय होंगे।  

बदलेगा बस्तर का भविष्य! मुख्यमंत्री साय बोले- अब विकास, रोजगार और समृद्धि की नई कहानी लिखेगा संभाग

रायपुर  नक्सलवाद का दंश झेलते-झेलते बस्तर चार दशकों तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहा, लेकिन अब नक्सलवाद की समाप्ति के साथ केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयासों से बस्तर को देश का सबसे सुंदर और विकसित आदिवासी संभाग बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने  आज राजधानी रायपुर में आयोजित ‘तेरा राज नहीं आएगा रे’ पुस्तक के विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही। कार्यक्रम में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शशांक शर्मा, पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर सहित अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित थे। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि नक्सलवाद के कारण बस्तर विकास की दौड़ में काफी पीछे रह गया था। अब परिस्थितियां बदल रही हैं और एक नए, विकसित तथा समृद्ध बस्तर के निर्माण का अवसर प्राप्त हुआ है। राज्य सरकार लगातार ऐसे प्रयास कर रही है, जिनसे आमजन को मूलभूत सुविधाओं सहित सभी आवश्यक सेवाएं सहज रूप से उपलब्ध हो सकें। मुख्यमंत्री ने कहा कि दो दिन पूर्व ही यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल के 12 वर्ष पूर्ण किए हैं। उनके नेतृत्व में देश ने अनेक ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं, जिनमें नक्सलवाद की समाप्ति की दिशा में मिली सफलता भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और केंद्रीय गृह मंत्री  अमित शाह के मार्गदर्शन में इस चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना किया गया। उन्होंने कहा कि मजबूत नेतृत्व समाज में विश्वास और उत्साह का संचार करता है। प्रधानमंत्री  मोदी के नेतृत्व में देश में माओवाद के विरुद्ध सामूहिक संकल्प विकसित हुआ। सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ा, आम जनता खुलकर माओवाद के विरोध में सामने आई और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद की। इस संघर्ष में लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मुख्यमंत्री ने उल्लेख किया कि हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बस्तर आए थे, जहां उन्होंने पत्रकारों से मुलाकात कर उनके योगदान की सराहना की थी।

क्या आप ज्यादा पैसे देकर पी रहे हैं ट्रेन की चाय? रेलवे के तय रेट जानकर रह जाएंगे हैरान

नई दिल्ली भले ही ट्रेन की चाय कैसी भी हो, लेकिन जब लोग ट्रेन में सफर करते हैं तो चाय पी ही लेते हैं. आपने देखा होगा कि ट्रेन में कई तरह की चाय मिलती है, एक चाय तो वो होती है, जो बिना टी बैग के होती है, लेकिन एक वो होती है जिसमें टी बैग भी होता है. इन चाय के रेट भी अलग-अलग वसूले जाते हैं. लेकिन, क्या आप  जानते हैं कि ट्रेन में बिकने वाली चाय की असली रेट कितनी होती है यानी सरकार की ओर से इनकी कितनी रेट तय की गई है? बता दें कि इससे ज्यादा रेट में ट्रेन में चाय नहीं बेची जा सकती है।  आमतौर पर ट्रेन में वेंडर या कैटरिंग स्टाफ एक कप चाय 10 रुपये में बेचते हैं, लेकिन असली रेट काफी अलग है. रेलवे की आधिकारिक कैटरिंग दरों के अनुसार, सामान्य ट्रेनों में मिलने वाली 150 मिलीलीटर स्टैंडर्ड चाय की कीमत सिर्फ 5 रुपये तय है. अगर आपको इसी कैटेगरी की चाय 10 रुपये में बेची जा रही है तो उसकी कीमत तय दर से दोगुनी है।  लेकिन, टीबैग वाली चाय के रेट अलग है. रेलवे के नियमों के अनुसार, टी बैग वाली चाय 10 रुपये की मिलती है. इसके अलावा इंस्टेंट कॉफी के रेट भी 10 रुपये हैं. हालांकि कुछ विशेष ट्रेनों में व्यवस्था अलग होती है. उदाहरण के लिए हमसफर ट्रेनों में एवीएम मशीन के  जरिए चाय दी जा रही है तो उस चाय की कीमत 10 रुपये तय है. यहां 100 मिलीलीटर चाय 120 मिलीलीटर के कप में दी जाती है।  ऐसे में जब भी आप चाय खरीदें तो इस बात का ध्यान रखें कि आखिर आप कौनसी चाय पी रहे हैं, वो स्टैंडर्ड चाय है या फिर वेंडिंग मशीन वाली चाय. रेलवे में सभी ट्रेनों के लिए एक जैसी कैटरिंग व्यवस्था नहीं होती. सामान्य मेल-एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनों में स्टैंडर्ड चाय का रेट 5 रुपये रखा गया है, जबकि कुछ प्रीमियम सेवाओं और वेंडिंग मशीन आधारित व्यवस्था में कीमत अधिक हो सकती है।  क्या हैं पानी की बोतल से जुड़े नियम? भारतीय रेलवे के नियमों के अनुसार, ट्रेन में सिर्फ रेल नीर ही बेचा जा सकता है और उसकी एक लीटर वाली बोतल की रेट 14 रुपये है. ये स्टेशन और ट्रेन दोनों में बराबर है. लेकिन, अगर कुछ परिस्थिति में वेंडर रेल नीर के अलावा दूसरी पानी की बोतल बेचता है तो वो भी कुछ निश्चित कंपनियों का पानी ही ट्रेन में बेचा जा सकता है. इसमें भी खास बात ये है कि दूसरी कंपनी की पानी की बोतल भी 14 रुपये में ही बेचनी होगी. यानी ट्रेन में कोई भी 14 रुपये से ज्यादा दाम में पानी की बोतल नहीं बेच सकता है।  

सोनम रघुवंशी ने तोड़ी चुप्पी, मीडिया से बातचीत में बताईं कई अहम बातें

इंदौर  राजा रघुवंशी हत्याकांड की आरोपी और फिलहाल जमानत पर रिहा सोनम रघुवंशी ने पहली बार सार्वजनिक रूप से सामने आकर अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों का जवाब दिया है। मीडिया से संक्षिप्त बातचीत में सोनम ने साफ कहा कि उसके नेपाल भागने की खबरें पूरी तरह बेबुनियाद हैं और लोगों को ऐसी अफवाहों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। कोर्ट परिसर से बाहर निकलते समय पत्रकारों ने जब उससे सवाल किए तो उसने कहा कि वह कानूनी प्रक्रिया का सम्मान कर रही है और अदालत द्वारा तय सभी शर्तों का पालन कर रही है। इंदौर लौटने को लेकर पूछे गए सवाल पर भी सोनम ने फिलहाल कोई संभावना नहीं जताई और कहा कि अभी उसका वहां जाने का कोई मन नहीं है। लोकेशन बताने से किया इनकार सोनम ने यह जरूर स्वीकार किया कि वह शिलांग में रह रही है, लेकिन सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए अपने ठिकाने की जानकारी साझा करने से मना कर दिया। आर्थिक खर्च और जीवन-यापन से जुड़े सवालों को भी उसने निजी विषय बताते हुए टाल दिया। परिवार के आरोपों पर पलटवार गौरतलब है कि राजा रघुवंशी के बड़े भाई ने हाल ही में आरोप लगाया था कि सोनम देश छोड़कर नेपाल जा सकती है और मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी से कराई जानी चाहिए। अब सोनम ने सामने आकर इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। जमानत पर कानूनी लड़ाई जारी सोनम को निचली अदालत से राहत मिलने के बाद जांच एजेंसी ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। जमानत रद्द कराने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और अदालत का फैसला आना बाकी है। कैसे बना देशभर में चर्चा का विषय यह मामला? राजा रघुवंशी और सोनम रघुवंशी की शादी के कुछ ही दिनों बाद दोनों मेघालय पहुंचे थे। इसके बाद उनके अचानक लापता होने से सनसनी फैल गई। बाद में राजा का शव मिलने और जांच में कई चौंकाने वाले खुलासों के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर सोनम को भी आरोपी बनाया गया था।

कूनो में राष्ट्रपति मुर्मु का विशेष कार्यक्रम, आदिवासी समुदाय से मुलाकात और चीता सफारी की तैयारी पूरी

ग्वालियर  राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सोमवार, 22 जून को चीतों की धरती श्योपुर जिले स्थित कूनो नेशनल पार्क में आ रही हैं। राष्ट्रपति यहां सहरिया आदिवासियों की संस्कृति से रूबरू होंगी और उनसे चर्चा भी करेंगी। इसके अलावा कूनो नेशनल पार्क में दो नंबर बाड़ा और तीन-ए बाड़ा में तैयारियां जारी हैं क्योंकि यहां राष्ट्रपति को सफारी का अनुभव कराए जाने का प्रस्तावित है। तीन-ए बाड़ा में यहां जन्मी चीता मुखी व उसके चार शावक चीते हैं। कूनो में जोर शोर से तैयारियां की जा रही हैं चार हैलीपेड तैयार किए जा चुके हैं और आदिवासियों को चिन्हित भी किया जा रहा है जिन्हें राष्ट्रपति से मिलवाया जाएगा। इसके अलावा चीता मित्र भी इस दौरान मौजूद रहेंगे। राष्ट्रपति 21 जून को ग्वालियर होकर कूनो पहुंच जाएंगी और रात्रि विश्राम यहीं कर 22 जून को यहां विजिट प्रस्तावित है। बता दें, राष्ट्रपति दौपद्री मुर्मु इन दिनों मप्र के प्रवास पर हैं जिस क्रम में उनका ग्वालियर चंबल आगमन प्रस्तावित है। श्योपुर स्थित कूनो नेशनल पार्क में उनके आगमन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था सहित मैदानी इंतजाम किए जा रहे हैं। चार हैलीपेड तैयार कर दिए गए हैं और 200 बैरीकेड से हद तैयार की जा रही है। श्योपुर पुलिस प्रशासन की ओर से नो फ्लाइंग जोन के आदेश भी जारी कर दिए गए हैं। आदिवासियों को प्रशिक्षण भी मिलेगा सहरिया आदिवासियों के गांवों की श्योपुर जिले में काफी संख्या है, इन आदिवासियों को पहले चीते को लेकर जागरूक भी किया जा चुका है और कई चीता मित्र की भूमिका भी निभा रहे हैं। ऐसे में कुछ आदिवासियों को चिन्हित कर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है क्योंकि राष्ट्रपति सहरिया आदिवासियों से चर्चा कर सकती हैं। वन विभाग की ओर से वन रक्षकों को भी चीता मित्रों से संपर्क करने के लिए निर्देश मिले हैं। मुखी चीता को सफारी में देख सकती हैं राष्ट्रपति जानकारी के अनुसार मादा चीता मुखी को सफारी के दौरान राष्ट्रपति को दिखाया जा सकता है क्योंकि यह पहली भारतीय मादा चीता है। दोनों बाड़ों में विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं।  

पेट्रोल को रिप्लेस करेगा E100 Fuel? किसानों के लिए वरदान, लेकिन राह में कई बड़ी चुनौतियां

  नई दिल्ली E100 Fuel Explained- Pros & Cons: पेट्रोल महंगा है, डीजल का भविष्य धुंधला है और इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर अभी भी रेंज एंजायटी का साया मंडरा रहा है. ऐसे में सरकार ने अब एक नया दांव चला है. E100 फ्यूल को मंजूरी मिल गई है और दावा किया जा रहा है कि यह भारत की तेल आयात पर निर्भरता कम कर सकता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई प्योर इथेनॉल पर चलने वाली गाड़ियां पेट्रोल को रिप्लेस कर पाएंगी, या फिर यह भी लंबा प्रयोग साबित होगा? आइए समझते हैं कि E100 फ्यूल आखिर है क्या, इसके फायदे क्या हैं और इसकी राह में कौन-कौन सी बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं।  केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने हाल ही में नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में बड़ी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि, E100 फ्यूल के लिए नियमों को मंजूरी दे दी गई है. इसके लिए उन्होंने रात 8 बजे फाइल पर हस्ताक्षर किए और अब E100 फ्यूल कानूनी रूप से देश में इस्तेमाल होने के लिए तैयार है।  सरकार के इस फैसले के बाद एक बार फिर इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल चर्चा में है. केंद्रीय मंत्री का कहना है कि, आने वाले डेढ़-दो महीनों में हुंडई, टोयोटा और एमजी मोटर जैसी कंपनियां भी अपनी फ्लेक्स फ्यूल कारों को पेश करेंगी. हाल ही में उन्होंने मारुति सुजुकी की लोकप्रिय कार वैनगआर के फ्लेक्स फ्यूल वर्जन को पेश किया था. जिसे शुरुआत में फ्लीट ऑपरेटर्स (कैब सर्विस प्रोवाइडर्स) के लिए उपलब्ध कराया जाएगा. आगे चलकर कंपनी इसे प्राइवेट व्हीकल के तौर पर भी पेश कर सकती है।  क्या है E100 फ्यूल? E100 एक ऐसा फ्यूल है जिसमें लगभग 100 प्रतिशत इथेनॉल होता है और इसमें पारंपरिक पेट्रोल नहीं मिलाया जाता. इथेनॉल एक ऐसा फ्यूल है, जिसे गन्ना, मक्का, चावल और और कृषि अपशिष्ट जैसी चीजों से तैयार किया जाता है. भारत में अभी E20 पेट्रोल का इस्तेमाल पहले से ही हो रहा है. जिसमें 20 प्रतिशत इथेनॉल और 80 प्रतिशत पेट्रोल होता है. E100 इसी दिशा में अगला कदम है, जिसे पूरी तरह इथेनॉल पर चलने के लिए तैयार किया गया है।  E20 फ्यूल के इस्तेमाल को लेकर पहले ही तमाम शिकायतें सामने आ चुकी हैं. कई वाहन मालिकों ने कहा है कि, E20 फ्यूल के इस्तेमाल के बाद उनके वाहनों का माइलेज गिरा है और साथ ही मेंटनेंस कॉस्ट भी बढ़ी है. इस बात से सरकार भी इंकार नहीं कर रही है, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) ने सोशल नेटवर्किंग साइट 'X' पर अपने एक बयान में कहा है कि, "रेगुलर पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी कम होने के कारण, माइलेज में मामूली कमी आती है. जो E10 के लिए डिज़ाइन किए गए और E20 के लिए कैलिब्रेट किए गए चार पहिया वाहनों के लिए अनुमानित 1-2%, और अन्य वाहनों के लिए लगभग 3-6% है।  E100 फ्यूल पर इतना जोर क्यों? सरकार की मानें तो भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में विदेशों से आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. ऐसे में सरकार E100 फ्यूल के जरिए इंपोर्टेड तेल पर निर्भरता कम करना चाहती है. देश में तैयार होने वाला इथेनॉल के जरिए तेल आयात पर होने वाला खर्च भी घट सकता है।  बताया जा रहा है कि, इसका एक बड़ा फायदा किसानों को भी मिलेगा. इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी, जिससे किसानों की आय में बढ़ोतरी हो सकती है. सरकार के अनुसार इथेनॉल प्रोग्राम की वजह से अब तक कच्चे तेल के आयात में 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई है और किसानों को करीब 80,000 करोड़ रुपये की एक्स्ट्रा इनकम हुई है।  क्या E100 फ्यूल पेट्रोल की जगह ले सकता है? अब एक बड़ा सवाल ये है कि, क्या E100 फ्यूल पूरी तरह से पेट्रोल को रिप्लेस कर सकता है. सैद्धांतिक रूप से E100 फ्यूल पेट्रोल की जगह ले सकता है, लेकिन यह बदलाव तुरंत संभव नहीं है. इसके लिए स्पेशली डिजाइन किए गए वाहनों की जरूरत होगी. मौजूदा समय में भारत की सड़कों पर चल रही करोड़ों पेट्रोल कारें, बाइक और स्कूटर E100 फ्यूल पर चलने के लिए तैयार नहीं हैं. ये वाहन रेगुलर पेट्रोल या E20 फ्यूल के लिए बनाए गए हैं।  इन वाहनों में एक बड़ी संख्या उनकी भी है, जो पूरी तरह से E20 फ्यूल के लिए भी तैयार नहीं है. यही कारण है कि, पुराने वाहन मालिकों को नए फ्यूल के इस्तेमाल के बाद तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. एक अनुमान है कि, आने वाले सालों में E20 और E100 फ्यूल दोनों साथ-साथ मौजूद रहेंगे. धीरे-धीरे फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की संख्या बढ़ने के बाद ही E100 का इस्तेमाल बड़े स्तर पर संभव हो पाएगा।  किन वाहनों में इस्तेमाल होगा E100? E100 फ्यूल हर वाहन में नहीं डाला जा सकता. इथेनॉल का गुण और व्यवहार पेट्रोल से बिल्कुल अलग होता है, इसलिए इंजन, फ्यूल पंप, इंजेक्टर और फ्यूल लाइन में विशेष बदलाव करने पड़ते हैं. इसके लिए फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक वाले वाहन जरूरी होते हैं. मारुति सुजुकी ने वैगनआर फ्लेक्स-फ्यूल प्रोटोटाइप पेश किया है, जिसे E100 जैसे हाई इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल पर चलाया जा सकता है. दोपहिया सेगमेंट में हीरो मोटोकॉर्प ने स्प्लेंडर और HF डीलक्स के फ्लेक्स-फ्यूल वर्जन भी पेश किए हैं. इसके अलावा सुजुकी के पोर्टफोलियो में भी एक मॉडल है और होंडा ने भी अपनी सीबी 350 के फ्लेक्स फ्यूल मॉडल को पेश किया था, जिसे अब डिस्कंटीन्यू किया जा चुका है।  फ्लेक्स-फ्यू वाले वाहन और उनकी कीमत वाहन     कीमत (एक्स-शोरूम) HF Deluxe Flex Fuel     72,792 रुपये  Splendor+ Flex Fuel     82,710 रुपये  Suzuki Gixxer SF 250 Flex Fuel     2,26,382 रुपये Maruti Wagon R Flex Fuel     बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं  E100 फ्यूल के बड़े फायदे E100 फ्यूल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे भारत की विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता कम हो सकती है. चूंकि इथेनॉल देश में ही तैयार किया जा सकता है, इसलिए इसका इसका इस्तेमाल बढ़ा कर पेट्रोल की कीमतों में भी कमी आने की उम्मीद की जा रही … Read more

ईंधन से लेकर फर्टिलाइज़र तक राहत की उम्मीद, US-Iran तनाव कम होने का भारत को डबल फायदा

नई दिल्ली क्या आप जानते हैं कि खाड़ी देशों में होने वाले तनाव का सीधा असर आपकी रसोई और जेब पर कैसे पड़ता है? जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध चल रहा था तो भारत में सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि दूध, सब्जी से लेकर हवाई टिकट तक सब कुछ महंगा हो गया. लेकिन अब चूंकि यह युद्ध खत्म होने जा रहा है, तो अब क्या-क्या सस्ता होगा? यहां हम उन चीजों की लिस्ट दे रहे हैं।   1. रसोई गैस और कमर्शियल सिलेंडर (LPG): भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी खाड़ी देशों से आयात करता है. युद्ध के समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रोपेन और ब्यूटेन (एलपीजी के मुख्य घटक) की कीमतें 800 डॉलर प्रति मीट्रिक टन पार कर गई थीं. तनाव खत्म होने से यह कीमत गिरकर 550-600 डॉलर के दायरे में आ सकती हैं, जिससे घरेलू एलपीजी सिलेंडर के दामों में 70 से 100 रुपये तक की कटौती देखने को मिल सकती है. हालांकि सरकार पहले से ही सिलेंडर पर सब्सिडी देती है, तो ऐसे में देखना होगा कि क्या सरकार इसे आम लोगों तक पास करेगी, या नहीं।  2. विदेशी फल और ड्राई फ्रूट्स (खजूर और अंजीर): भारत सालाना करीब 90 हजार से 1 लाख मीट्रिक टन खजूर ईरान और खाड़ी देशों से मंगाता है. समुद्री नाकेबंदी के कारण भारतीय थोक बाजारों में कीमिया और मजलूम खजूर के दाम 35 से 40 प्रतिशत तक बढ़ गए थे. रूट खुलते ही सप्लाई सामान्य होने से इनके थोक और रिटेल दामों में 25 से 30 फीसदी की सीधी गिरावट आने की संभावना है।  3. सीएनजी और पीएनजी (CNG & PNG): भारत अपनी कुल नेचुरल गैस की जरूरत का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा (LNG के रूप में) कतर और यूएई जैसे देशों से इम्पोर्ट करता है. युद्ध के डर से स्पॉट एलएनजी की कीमतें 15-18 डॉलर प्रति mmBtu (Million British Thermal Units) तक पहुंच गई थीं. अब वैश्विक बाजार में गैस की कीमत घटकर 9-10 डॉलर प्रति mmBtu के स्तर पर आने की संभावना है, जिससे घरेलू स्तर पर सीएनजी और पीएनजी के दाम 4 से 6 प्रति किलो/Scm तक सस्ते हो सकते हैं।   4. रासायनिक उर्वरक (Chemical Fertilizers): भारत सालाना लगभग 70 से 80 लाख टन यूरिया और फॉस्फेटिक खादों का आयात करता है, जिसमें ओमान और सऊदी अरब की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है. सप्लाई चेन टूटने से प्रति टन आयात लागत में 50 से 70 डॉलर का उछाल आया था. होर्मुज रूट खुलने से फर्टिलाइजर कंपनियों की इनपुट कॉस्ट 12 से 15 प्रतिशत तक कम होगी, जिससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ घटेगा और खुले बाजार में खाद की किल्लत खत्म होगी।  5. प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्रियां (Polymers): भारतीय प्लास्टिक उद्योग अपनी जरूरत का लगभग 40% पॉलीमर और प्लास्टिक दाना खाड़ी देशों की पेट्रोकेमिकल रिफाइनरियों से मंगाता है. कच्चे तेल के 125 डॉलर होने से पॉलिमर के दाम 20% तक महंगे हो गए थे. कच्चे तेल की कीमतें 75-80 डॉलर के सामान्य स्तर पर आने से प्लास्टिक इनपुट कॉस्ट में 15% तक की कमी आएगी, जिससे पैकेजिंग मैटेरियल सीधे सस्ते होंगे।  6. हवाई सफर (Air Tickets): किसी भी एयरलाइंस कंपनी के कुल ऑपरेटिंग खर्च का 40% हिस्सा अकेले एटीएफ (Aviation Turbine Fuel) पर खर्च होता है. क्रूड के 125 डॉलर पार जाने से एटीएफ की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर थीं. कच्चे तेल में गिरावट के बाद एटीएफ की कीमतों में 10% से 12% की कटौती तय है, जिससे एयरलाइंस कंपनियां हवाई किराए (Airfares) में 8% से 10% तक की कमी कर सकती हैं।  7. स्क्रैप मेटल और रीसाइक्लिंग उत्पाद: भारत यूएई और खाड़ी देशों से हर साल लाखों टन एल्युमिनियम और कॉपर स्क्रैप इम्पोर्ट करता है. युद्ध के दौरान समुद्री जहाजों का भाड़ा (Freight Rate) और वॉर रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम 300% तक बढ़ गया था. शिपिंग रूट सामान्य होने से माल ढुलाई का भाड़ा 30% तक कम होने की संभावना है, जिससे घरेलू रिसाइक्लिंग यूनिट्स को कच्चा माल 8 से 10 प्रतिशत सस्ता मिलेगा।  8. इंडस्ट्रियल सल्फर (Industrial Sulfur): रबर और केमिकल इंडस्ट्री के लिए बेहद जरूरी सल्फर का भारत एक बड़ा आयातक है. खाड़ी देशों से सप्लाई रुकने से भारत में सल्फर की घरेलू कीमतें 18% से 22% तक उछल गई थीं. रिफाइनरियों में उत्पादन सामान्य होने और शिपमेंट शुरू होने से इंडस्ट्रियल सल्फर के दाम 15% तक नीचे आ सकते हैं।   9. पेंट्स और कोटिंग्स (Paints & Solvents): पेंट्स बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (जैसे रेजिन और सॉल्वैंट्स) का करीब 50% हिस्सा पेट्रोकेमिकल डेरिवेटिव्स होता है. कच्चे तेल और गैस के दाम टूटने से पेंट कंपनियों की कुल मैन्युफैक्चरिंग लागत में 6 से 8 प्रतिशत की कमी आएगी, जिसका सीधा फायदा वे उपभोक्ताओं को कीमतों में कटौती या डिस्काउंट के रूप में देंगी।  10. ऑनलाइन डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स सेवाएं: भारत का लॉजिस्टिक्स इंडेक्स सीधे तौर पर ईंधन और परिचालन लागत से जुड़ा है. वैश्विक ऊर्जा संकट थमने से माल ढुलाई इंडेक्स (Freight Index) में 7 से 10 फीसदी की गिरावट आने का अनुमान है. इसका सीधा असर ई-कॉमर्स और फूड डिलीवरी कंपनियों पर पड़ेगा, जिससे डिलीवरी चार्जेस और कूरियर फीस में 5 से 8 प्रतिशथ तक की राहत मिल सकती है। 

पंजाब की सियासत में बढ़ी हलचल, जल्द चुनाव की संभावना पर कांग्रेस ने कसी कमर

चंडीगढ़ पंजाब विधानसभा चुनाव भले ही आधिकारिक तौर पर फरवरी 2027 में प्रस्तावित हों, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ती जा रही है कि राज्य में चुनाव तय समय से पहले, यानी नवंबर 2026 में भी कराए जा सकते हैं। इस संभावित राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए राज्य की प्रमुख पार्टियों ने अपनी-अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) जहां सरकार की उपलब्धियों के सहारे चुनावी अभियान की शुरुआत कर चुकी है, वहीं कांग्रेस भी संगठनात्मक स्तर पर सक्रिय होती दिखाई दे रही है। पार्टी आलाकमान लगातार पंजाब इकाई के नेताओं के साथ बैठकें कर रणनीति बनाने में जुटा है। पंजाब की राजनीति में पिछले कुछ सप्ताह से असामान्य गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की दिल्ली में लगातार बैठकें, राज्य के नेताओं से फीडबैक लेना, संगठन की स्थिति की समीक्षा और चुनावी तैयारियों पर जोर इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पार्टी किसी भी संभावित राजनीतिक परिस्थिति के लिए तैयार रहना चाहती है। कांग्रेस ने शुरू की चुनावी तैयारी सूत्रों के अनुसार, पिछले लगभग एक महीने के दौरान कांग्रेस आलाकमान की ओर से पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ चार से पांच महत्वपूर्ण बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं। इन बैठकों में संगठन की स्थिति, पार्टी की मजबूती और कमजोरियों, संभावित उम्मीदवारों, विभिन्न जिलों की राजनीतिक परिस्थितियों और चुनावी रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई। इन बैठकों में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, विधायक दल के नेता, पूर्व मंत्रियों और विभिन्न जिलों से जुड़े वरिष्ठ नेताओं की राय भी ली गई। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि पंजाब में कांग्रेस अभी भी एक मजबूत राजनीतिक विकल्प के रूप में मौजूद है और यदि संगठन को एकजुट रखते हुए समय रहते तैयारी कर ली जाए तो आगामी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया जा सकता है। तीन सदस्यीय ऑब्जर्वर कमेटी का गठन कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब की राजनीतिक स्थिति पर नजर रखने और संगठनात्मक तैयारियों का आकलन करने के लिए तीन सदस्यीय ऑब्जर्वर कमेटी का गठन भी किया है। इस समिति में पार्टी के वरिष्ठ नेता अजय माकन, मीनाक्षी नटराजन और भजनलाल जाधव को शामिल किया गया है। कमेटी की जिम्मेदारी राज्य के नेताओं से संवाद स्थापित करना, संगठन की गतिविधियों की निगरानी करना, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता का मूल्यांकन करना और आगामी चुनाव के लिए पार्टी को आवश्यक सुझाव देना है। माना जा रहा है कि यह समिति नियमित रूप से अपनी रिपोर्ट कांग्रेस अध्यक्ष और केंद्रीय नेतृत्व को सौंपेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पंजाब में कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी की समस्या से जूझती रही है। ऐसे में ऑब्जर्वर कमेटी का गठन संगठन को एकजुट रखने और संभावित मतभेदों को समय रहते दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। जमीनी स्तर पर सक्रिय हुई पंजाब कांग्रेस पंजाब कांग्रेस ने भी चुनावी तैयारियों को लेकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना शुरू कर दिया है। जिला और ब्लॉक स्तर पर बैठकों का दौर चल रहा है। बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की रणनीति बनाई जा रही है ताकि चुनावी समय में पार्टी के पास प्रभावी नेटवर्क मौजूद रहे। सूत्रों के मुताबिक आने वाले दिनों में विभिन्न जनसंपर्क अभियानों की शुरुआत की जाएगी। गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों से संवाद स्थापित करने, मौजूदा सरकार के खिलाफ मुद्दों को उठाने और कांग्रेस की नीतियों को जनता तक पहुंचाने की योजना तैयार की जा रही है। इसके अलावा युवाओं, महिलाओं, किसानों और व्यापारियों जैसे विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए जाने की भी तैयारी है। कांग्रेस का मानना है कि यदि जनता के बीच लगातार उपस्थिति बनाए रखी जाए तो पार्टी के पक्ष में माहौल तैयार किया जा सकता है।  

बिना ड्राइवर दौड़ेंगी कारें! क्या भारत में जल्द आएगी सेल्फ-ड्राइविंग टेक्नोलॉजी, जानिए पूरा प्लान

नई दिल्ली कई बार कुछ फैसले इतने टेक्निकल और जटिल होते हैं कि उनकी अहमियत तुरंत समझ में नहीं आती. लेकिन कुछ साल बाद वही फैसले आपकी डेली-लाइफ, रूटीन और पूरी इंडस्ट्री की दिशा बदल देते हैं. ऑटोमोटिव रडार और कनेक्टेड कार टेक्नोलॉजी के लिए लाइसेंस की अनिवार्यता खत्म करने का सरकार फैसला भी ऐसा ही एक कदम माना जा रहा है. पहली नजर में यह सिर्फ नियमों में बदलाव जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में यह भारत को सेफ, स्मार्ट और फ्यूचर की सेल्फ-ड्राइविंग मोबिलिटी की ओर ले जाने वाला बड़ा दरवाजा खोल सकता है।  रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सरकार ने 77GHz से 81GHz फ्रीक्वेंसी बैंड पर काम करने वाले ऑटोमोटिव रडार सिस्टम के लाइसेंस की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है. इसके अलावा 5.9GHz बैंड पर चलने वाले सिस्टम के लिए भी लाइसेंस की जरूरत खत्म कर दी गई है. यही फ्रीक्वेंसी वाहन और सड़क किनारे लगे इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच कम्युनिकेशन के लिए इस्तेमाल होती है. यह फैसला भारत को अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित ऑटोमोबाइल बाजारों के बराबर खड़ा करता है, जहां ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल के लिए पहले से कहीं ज्यादा आसान नियम बनाए गए हैं।  भारत में जब भी नई ऑटोमोबाइल तकनीक आती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ कीमत नहीं होती, बल्कि नियमों और मंजूरियों की जटिल प्रक्रिया भी होती है. किसी नई तकनीक को बाजार में लाने के लिए कंपनियों को ज्यादा समय और पैसे खर्च करने पड़ते हैं. इसका सीधा असर ग्राहकों की जेब पर पड़ता है।  अब जब रडार बेस्ड सिस्टम के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं रहेगी, तो वाहन निर्माता कंपनियां दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले हार्डवेयर और तकनीक को भारत में भी आसानी से ला सकेंगी. उन्हें भारत के लिए अलग एडिशन तैयार करने की जरूरत कम पड़ेगी. इससे लागत घट सकती है और नई तकनीकियों का इस्तेमाल आसान और तेज हो जाएगा।  ADAS अब लग्जरी फीचर नहीं रहेगा कुछ साल पहले तक ADAS यानी एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम केवल महंगी लग्जरी कारों में देखने को मिलता था. लेकिन अब धीरे-धीरे यह तकनीक मुख्यधारा की कारों तक पहुंच रही है. अब कम दाम या यूं कहें कि मिड-साइज एसयूवी और अन्य कारों में भी यह फीचर दिया जाने लगा है. कम्पटीशन के इस दौर में तकरीबन हर वाहन निर्माता की कोशिश है कि, वो अपनी काम में अपने प्रतिद्वंदी के मुकाबले ज्यादा फीचर दे सके. इसके लिए ग्राहक ज्यादा पैसे खर्च करने को भी तैयार हैं।  ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, अडैप्टिव क्रूज कंट्रोल और ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग जैसे फीचर्स रडार सेंसर की मदद से काम करते हैं. ये सिस्टम सिर्फ सुविधा नहीं देते, बल्कि कई बार गंभीर दुर्घटनाओं को रोकने में भी मदद करते हैं. भारत में अब तक ADAS तकनीक का इस्तेमाल सिमित रहा है. इसकी एक वजह लागत और दूसरी वजह नियम और प्रोसेस हैं. ऐसे में लाइसेंस की बाध्यता हटना इस तकनीक को ज्यादा तेजी से फैलाने में मदद कर सकता है।  सेल्फ-ड्राइविंग कारों की बुनियाद आज दुनिया के कई देश सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों पर तेजी से काम कर रहे हैं. भारत अभी उस लेवल से काफी दूर है, लेकिन किसी भी तकनीक की शुरुआत इंफ्रा से ही होती है. रडार सेंसर और व्हीकल कम्युनिकेशन सिस्टम भविष्य में आने वाली ऑटोनॉमस यानी सेल्फ-ड्राइविंग कारों के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक हैं. इसलिए यह फैसला सिर्फ आज की कारों के लिए नहीं, बल्कि अगले दशक की मोबिलिटी को ध्यान में रखकर लिया गया कदम भी माना जा रहा है।  इस फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू 5.9GHz बैंड से जुड़ा है. यह V2X यानी व्हीकल-टू-एवरीथिंग सिस्टम को सपोर्ट करता है. सरल भाषा में समझें तो भविष्य में गाड़ियां सिर्फ सड़क पर नहीं चलेंगी, बल्कि एक-दूसरे से बातचीत भी करेंगी. कोई वाहन अचानक ब्रेक लगाए, किसी ब्लाइंड मोड़ के पीछे खतरा हो या कोई एम्बुलेंस तेजी से आ रही हो, तो ऐसी जानकारी पहले ही दूसरी गाड़ियों तक पहुंच सकती है। ऐसी तकनीकियां इंसानी आंखों की तरह काम करेंगी. जो सड़क पर अचानक से रिएक्ट करने की समय को कम करने में मदद करेंगी. यही कारण है कि दुनिया भर में इन्हें रोड सेफ्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।  इन कंपनियों को फायदा अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि नई तकनीक का फायदा केवल विदेशी कंपनियों को मिलता है. लेकिन इस मामले में तस्वीर कुछ अलग है. जहां मर्सिडीज बेंज और बीएमडब्ल्यू जैसी कंपनियां ग्लोबल टेक्नोलॉजी को आसानी से भारत ला सकेंगी. वहीं मारुति सुजुकी, टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी भारतीय कंपनियों के लिए भी यह मौका होगा कि वे तेजी से ADAS बेस्ड फीचर्स को अपनी गाड़ियों में शामिल करें।  हालांकि ये भारतीय कंपनियां पहले से ही अपने कुछ प्रीमियम मॉडलों में ये फीचर दे रही हैं. लेकिन आने वाले समय में जब ये तकनीकी और किफायती होगी तो इसका इस्तेमाल सस्ती कारों में भी देखने को मिल सकता है. इसके अलावा Bosch, Continental और Qualcomm जैसी तकनीकी कंपनियों को भी नए अवसर मिल सकते हैं, क्योंकि आधुनिक वाहनों में इनकी टेक्नोलॉजी की मांग बढ़ेगी।  इस फैसले की सबसे मजबूत वजह रोड सेफ्टी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में भारत में लगभग पांच लाख सड़क दुर्घटनाएं हुईं और 1.77 लाख से ज्यादा लोगों की जान गई. ये आंकड़े बताते हैं कि सड़क सुरक्षा केवल ट्रैफिक नियमों या बेहतर सड़कों का मुद्दा नहीं है. आधुनिक तकनीक भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. ADAS और V2X जैसे सिस्टम उन परिस्थितियों में एक्स्ट्रा सेफ्टी दे सकते हैं जहां ड्राइवर की नजर या रिएक्ट करने की क्षमता कम हो जाती है।  अभी शुरुआत है, मंजिल नहीं यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि सरकार ने इस टेक्नोलॉजी को अनिवार्य नहीं बनाया है. केवल लाइसेंस की बाध्यता हटाई गई है. यानी यह फैसला रास्ता साफ करता है, लेकिन यह पक्का नहीं करता कि हर नई कार में तुरंत ये तकनीकी दिखाई देने लगेंगी. फिर भी यह एक ऐसा कदम है जो इंडस्ट्री को सही दिशा देने में मददगार साबित होगा. जब नियम आसान होते हैं, लागत कम होती है और तकनीक तेजी से पहुंचती है, तो अंततः फायदा ग्राहक को ही मिलता है।